गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

शिव गीता अध्याय5

अध्याय 5

शिव जी था पाँच मार्ग जाए तो जी कहते हैं इसके उपरान्त उस स्थान में एक आठ का बड़ा रख प्रादुर्भूत हुआ जिसकी अनेक रतनी किसी क्रांति से सब दिशाएं चित्र विचित्र हो गई थी
नदी के किनारे के पंख में जिसके चारों चक्र फिर थे मूर्तियों की झालर और सैकड़ों फिर क्षेत्र से युक्त
के खुर मरे हुए चार गोलों से शोभित मोतियों की झालर और चंदू वे शोभायमान जिसके ध्वजा में विषयों का छिलने था जिसके निकट एक मत नहीं चाहती थी जिस पर रेशम की गड्डियां बिछाई थी
पाँच भूतों के अधिष्ठाता देवताओं से शोभित पारिजात कल्प वृक्ष के फूलों की मालाओं से कच्चे तेल में रखना भी भी उत्पन्न हुई कटोरी के मधुबाला कपूर और अगर धूप खिल उठे हुए से बोरों को आकर्षित करने वाला
प्रलय काल के समान श्रद्धा महान अनेक प्रकार के बाजू से युक्त वीणा वेल्डिंग मधुर मधुरभाषी और किन्नर घरों से युक्त वह रथ था
इस प्रकार की शेष रथ को देखकर वृषभ से उत्तर शिवजी पार्वती सहित वस्त्र की शैय्या वाले कुदरत के स्थान में प्रवेश लिए हुई उसमें देवांगना शेर चमार और वेतन के चलाने थी शिवजी को प्रसन्न करने लगी
शब्दार्थ वहां कंगनों की धूनी और निर्मल मंजूरी के शव वीणा वीरों के ही से मान लो को पूर्ण रही थी
तोतों के वाक्य की मधुरता और फिर कबूतरों के शब्द से जगह शब्द गायब हो गया
प्रसन्नता से अपने फन उठाए हुए शिव जी के भूषण रोग शरीर में लिपटी कपूर को देखकर करोड़ों मयूर प्रखंड को अपनी का दिखाते हुए नृत्य करने की तब शिव जी प्रणाम करते हुए राम को उठाकर प्रसन्न मन से
ढिबरी रखने गई आई और भी दिव्य कमंडल के जल से सावधान तो आचमन कर रामचंद्र को आचमन कर आया और अपनी गोद में बिठाया इसके उपरांत रामचंद्र को दिव्य धनुष अच्छे रखकर और माह पाशुपतास्त्र
प्रदान किया और रामचंद्र ली
हीरा यह मेरा उग्र अर्थ जगत का नाश करने वाला है इस कारण सामान्य युद्ध में इसका प्रयोग नहीं करना इसका निवारण करने वाला त्रिलोकी में दूसरा नहीं है इस कारण ही रहा प्राण संकट उपस्थित होने पर ही
इसका प्रयोग करना उचित है धूसरित समय में इसका प्रयोग करने से जगत का नाश जाता है
फिर जी देवताओं में श्रेष्ठ लोकपालों को बुला प्रसन्न मन होली रामचंद्र को सब कोई अपने अपने अस्त्र प्रधान करून यह रामचंद्र उन रूपी रावण को हुआ भी कहा कि मैंने उसको व भैया है
किन्तु देवताओं से हमारे था इस कारण तुम सब युद्ध में भयंकर कम करने वाले वाहनों का शरीर धारण करके इनकी सहायता करो
इससे तुम सुखी हो कि शिव जी की आज्ञा को सिर पर धारण कर परिणाम कर हाथ जो देवताओं ने शिव जी के चरणों में प्रणाम कर अपने अपने अस्त्र श्रीराम खुद ही विष्णु ने नारायणगढ़ इंद्र ने अहमदाबाद में
ने मुहम्मद पुत्र अगली आग्नेयास्त्र दिया यमराज ने या में आह निकली थी तीली मोहना वरुण ने वध रहा ग्रुप वायु उन्हें भय व्याप्त कुबेर ने सौम्या ईशान ने रुद्र हप्र
सूर्य चंद्रमा भी सौम्या विशुद्ध दिवाली पर्व का आठों भी वाह वाह पत्र प्रदान किया था
दशरथ कुंभा रामचंद्र प्रसन्न हो शिव जी को प्रणाम कर हाथ जोड़े खड़े हो भक्तिपूर्वक श्री रामचंद्र बोली हे भगवन मनुष्यों से तो शहर समुद्र उल्लंघन नहीं किया जाएगा और लंका दूर भेजा था
दानवों को भी दुर्गम ही और वहां करोड़ लोग बड़ी राक्षस रहते ही वे जितेन्द्रिय वेद पाठ करने में तत्पर और आपके हफ्ते ही अनेक प्रकार की माया जानने वाले बुद्धिमान अग्निहोत्री केवल में
और भ्राता लक्ष्मण युद्ध में उनको कैसे झील सकेंगे
शिवजी बोली ही रामचंद्र राव और राक्षसों के मायने में ही विचार करने की कुछ आवश्यकता नहीं है
कि उसका कहा आ गया है
विद्रोही में था और ब्राह्मण का दुख देने रूपी अगर हम में प्रवृत्त हुआ है
झूम रहे थे इस कारण उसकी आयु और लक्ष्मी का भी छः गया है
राज्य जानकी जी की अवमानना की गई
इस कारण तुम भी सहज भारत को की कहा कि वह में मध्य पाने में असमर्थ रहता है
धर्म में वृद्धि करने वाला शत्रु भाग्य से ही प्राप्त होता है
जिस वेद शास्त्र पड़ा हो और सदा धर्म में प्रीति करता हो वह विनाशकाल आने पर धर्म का त्याग कर देता है
जो काफी बडा देवता ब्रह्मा और शिव को दुःख देता कि उसका नाश स्वयं है
घेरा किष्किन्धा नामक नगर में देवताओं के अंश से बहुत से महाबली और तुझे वार्नर उत्पन्न हुए वे सब तुम्हारी सहायता करेंगी
उनके द्वारा ढोल सागर पर सेतु मंगवाना अनेक परिवर्तन लाकर वे भावना पुल भी कि उस पर सपा न उधर जाएंगे
इस प्रकार रावण को उसके साथियों सहित मारकर वहां से ही अपनी प्रिया को दिया जहां संग्राम में शस्त्र से ही जय प्राप्त होने की संभावना हो वहां उत्तरों का प्रयोग न करना और जिनके पास आजकल नहीं है अथवा थोडे शव
तरह ही तो है जो भाग रहे हैं ऐसे पुरुषों के ऊपर दिव्यास्त्र का प्रयोग करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है
बहुत कहने से क्या हल्ला यह संस्था जो मेरा ही उत्पन्न किया में ही इसका पालन और में ही इसका शाह करता हूं
में ही एक जगत की मृत्यु का भी मृत्यु रूप को राज्य में ही इस चराचर जगत का भक्षण करने वाला हूँ
युद्ध रुमा तो सब राक्षस तो मेरे मुख में प्राप्त हो चुके ही तुम निमित्त मात्र होकर संग्राम भी की होगी

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