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रविवार, 24 दिसंबर 2023

राजू श्रीवास्तव

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राजू श्रीवास्तव 

🎂जन्म : 25 दिसंबर 1963 ⚰️21 सितम्बर 2022

भारत के प्रसिद्ध हास्य कलाकार थे वह मुख्यत:आमआदमी और रोज़मर्रा की छोटी छोटी घटनाओं पे व्यंग सुनाने के लिए जाने जाते थे उनकी मृत्यु 21 सितम्बर 2022 को हो गयी।

श्रीवास्तव 1993से हास्य की दुनिया में काम कर रहे थे। उन्होंने कल्यानजी आनंदजी, बप्पी लाहिड़ी एवं नितिन मुकेश जैसे कलाकारों के साथ भारत व विदेश में काम किया है। वह अपनी कुशल मिमिक्री के लिए जाने जाते हैं।उनको असली सफलता ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज से मिली। इस शो में अपने कमाल के प्रदर्शन की बदौलत वह घर-घर में सबकी जुबान पर आ गए। उन्होंने बिग बॉस 3, में हिस्सा लिया और 2 महीने तक घर में सबको गुदगुदाने के बाद 4 दिसम्बर,2009को वोट आउट कर दिए गए।

2010 में, श्रीवास्तव अपने शो के दौरान अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम  और पाकिस्तान पर मजाक भी किया करते थे लेकिन उन्हें पाकिस्तान से धमकी भरे फोन आए और चेतावनी दी कि वे इन पर मजाक न करे

श्रीवास्तव ने बिग बॉस 3  (Bigg Boss 3)  में भी भाग लिया. बाद में उन्होंने कॉमेडी शो, कॉमेडी का महा मुकाबला में भाग लिया. 2013 में, राजू ने अपनी पत्नी के साथ नच बलिए सीजन 6 में भाग लिया| समाजवादी पार्टी (SP) ने 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए राजू श्रीवास्तव को कानपुर से मैदान में उतारा. लेकिन 11 मार्च 2014 को श्रीवास्तव ने यह कहते हुए टिकट वापस कर दिया कि उन्हें पार्टी की स्थानीय इकाइयों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा है. उसके बाद, वह 19 मार्च 2014 को भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा बनने के लिए नामित किया।
📽️
मैंने प्यार किया ट्रक क्लीनर
बाज़ीगर कॉलेज विद्यार्थी
मिस्टर आज़ाद 
अभय 
आमदनी अठन्नी खर्चा रुपइया
वाह! तेरा क्या कहना
मैं प्रेम की दीवानी हूँ
विद्यार्थी: द पावर ऑफ स्टूडेंट्स
बिग ब्रदर
बॉम्बे टू गोवा एंथनी गोंसाल्वेस 
भावनाओं को समझो
बारूद: द फायर - अ लव स्टोरी' 
टॉयलेट: एक प्रेम कथा 
तेज़ाब विशेष उपस्थिति
फिरंगी
📺
शक्तिमान
बिग बॉस 3
ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज

शनिवार, 23 दिसंबर 2023

महान गायिका मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ

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#23dic 
महान गायिका मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म 21 सितम्बर, 1926 ई.
⚰️23 दिसम्बर, 2000 
नूरजहाँ 'भारतीय सिनेमा' की ख्याति प्राप्त अभिनेत्री और पार्श्वगायिकाओं में से एक थीं। उनका वास्तविक नाम 'अल्ला वसई' था। दक्षिण एशिया की महानतम गायिकाओं में शुमार की जाने वाली 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' नूरजहाँ को लोकप्रिय संगीत में क्रांति लाने और पंजाबी लोकगीतों को नया आयाम देने का श्रेय जाता है। उनकी गायकी में वह जादू था कि हर उदयमान गायक की प्रेरणा स्रोत स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने भी जब अपने कॅरियर का आगाज किया तो उन पर नूरजहाँ की गायकी का प्रभाव था। नूरजहाँ अपनी आवाज़ में नित्य नए प्रयोग किया करती थीं। अपनी इन खूबियों की वजह से ही वे ठुमरी गायिकी की महारानी कहलाने लगी थीं।

जन्म_तथा_शिक्षा

नूरजहाँ का जन्म 21 सितम्बर, 1926 ई. को ब्रिटिश भारत में पंजाब के 'कसूर' नामक स्थान पर एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम 'मदद अली' था और माता 'फ़तेह बीबी' थीं। नूरजहाँ के पिता पेशेवर संगीतकार थे। माता-पिता की ग्यारह संतानों में से नूरजहाँ एक थीं।संगीतकारों के परिवार में जन्मी नूरजहाँ को बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा लगाव था। नूरजहाँ ने पाँच-छह साल की उम्र से ही गायन शुरू कर दिया था। वे किसी भी लोकगीत को सुनने के बाद उसे अच्छी तरह याद कर लिया करती थीं। इसको देखते हुए उनकी माँ ने उन्हें संगीत का प्रशिक्षण दिलाने का इंतजाम किया। उस दौरान उनकी बहन 'आइदान' पहले से ही नृत्य और गायन का प्रशिक्षण ले रही थीं।

फ़िल्मों_में_प्रवेश

तत्कालीन समय में कलकत्ता, वर्तमान कोलकाता थिएटर का गढ़ हुआ करता था। वहाँ अभिनय करने वाले कलाकारों, पटकथा लेखकों आदि की काफ़ी माँग थी। इसी को ध्यान में रखकर नूरजहाँ का परिवार 1930 के दशक के मध्य में कलकत्ता चला आया। जल्द ही नूरजहाँ और उनकी बहन को वहाँ नृत्य और गायन का अवसर मिल गया। नूरजहाँ की गायकी से प्रभावित होकर संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने उन्हें के. डी. मेहरा की पहली पंजाबी फ़िल्म 'शीला' उर्फ 'पिंड दी कुड़ी' में उन्हें बाल कलाकार की संक्षिप्त भूमिका दिलाई। वर्ष 1935 में रिलीज हुई यह फ़िल्म पूरे पंजाब में हिट रही। इसने 'पंजाबी फ़िल्म उद्योग' की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया। फ़िल्म के गीत बहुत हिट रहे।

सफलता_व_विवाह

1930 के दशक के उत्तरार्ध तक लाहौर में कई स्टूडियो अस्तित्व में आ गए थे। गायकों की बढ़ती माँग को देखते हुए नूरजहाँ का परिवार 1937 में लाहौर आ गया। डलसुख एल पंचोली ने बेबी नूरजहाँ को सुना और 'गुल-ए-बकवाली' फ़िल्म में उन्हें भूमिका दी। यह फ़िल्म भी काफ़ी हिट रही और गीत भी बहुत लोकप्रिय हुए। इसके बाद उनकी 'यमला जट' (1940), 'चौधरी' फ़िल्म प्रदर्शित हुई। इनके गाने 'कचियाँ वे कलियाँ ना तोड़' और 'बस बस वे ढोलना कि तेरे नाल बोलना' बहुत लोकप्रिय हुए। वर्ष 1942 में नूरजहाँ ने अपने नाम से 'बेबी' शब्द हटा दिया। इसी साल उनकी फ़िल्म 'खानदान' आई, जिसमें पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसी फ़िल्म के निर्देशक शौक़त हुसैन रिज़वी के साथ उन्होंने विवाह कर लिया।[1] बाद के समय में नूरजहाँ ने अपने से दस वर्ष छोटे 'एजाज दुर्रानी' से विवाह किया।

मुम्बई_आगमन

वर्ष 1943 में नूरजहाँ मुम्बई चली आईं। महज चार साल की संक्षिप्त अवधि के भीतर वे अपने सभी समकालीनों से काफ़ी आगे निकल गईं। भारत और पाकिस्तान दोनों जगह के पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी क्लासिक फ़िल्मों 'लाल हवेली'’ 'जीनत', 'बड़ी माँ', 'गाँव की गोरी' और 'मिर्जा साहिबाँ' फ़िल्मों के आज भी दीवाने हैं। फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का संगीत अपने समय के ख्यातिप्राप्त संगीतकार नौशाद ने दिया था। उसके गीत 'आवाज दे कहाँ है', 'जवाँ है मोहब्बत' और 'मेरे बचपन के साथी' जैसे गीत आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं।

लाहौर_प्रस्थान

नूरजहाँ देश के विभाजन के बाद अपने पति शौक़त हुसैन रिज़वी के साथ बंबई छोड़कर लाहौर चली गईं। लाहौर में रिजवी ने एक स्टूडियो का अधिग्रहण किया और वहाँ 'शाहनूर स्टूडियो' की शुरुआत की। 'शाहनूर प्रोडक्शन' ने फ़िल्म 'चन्न वे' (1950) का निर्माण किया, जिसका निर्देशन नूरजहाँ ने किया। यह फ़िल्म बेहद सफल रही। इसमें 'तेरे मुखड़े पे काला तिल वे' जैसे लोकप्रिय गाने थे। उनकी पहली उर्दू फ़िल्म 'दुपट्टा'’ थी। इसके गीत 'चाँदनी रातें...चाँदनी रातें' आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं।

देश के विभाजन के बाद जहाँ एक तरफ़ ए. आर. कारदार और महबूब ख़ान जैसे कलाकार यहीं रह गए, वहीं बहुत-से ऐसे कलाकार भी थे, जिन्हें पाकिस्तान चले जाना पड़ा था। नूरजहाँ भी इनमें से एक थीं। भारत छोड़ पाक़िस्तान जा बसने की उनकी मजबूरी के बारे में उन्होंने 'विविध भारती' में बताया था कि- "आपको ये सब तो मालूम है, ये सबों को मालूम है कि कैसी नफ़सा-नफ़सी थी, जब मैं यहाँ से गई। मेरे मियाँ मुझे ले गए और मुझे उनके साथ जाना पड़ा, जिनका नाम सैय्यद शौक़त हुसैन रिज़वी है। उस वक़्त अगर मेरा बस चलता तो मैं उन्हें समझा सकती, कोई भी अपना घर उजाड़ कर जाना तो पसन्द नहीं करता, हालात ऐसे थे कि मुझे जाना पड़ा। और ये आप नहीं कह सकते कि आप लोगों ने मुझे याद रखा और मैंने नहीं रखा, अपने-अपने हालात ही की बिना पे होता है किसी-किसी का वक़्त निकालना, और बिलकुल यकीन करें, अगर मैं सबको भूल जाती तो मैं यहाँ कैसे आती?"

पाकिस्तान स्थानान्तरित हो जाने से पहले नूरजहाँ के अभिनय व गायन से सजी दो फ़िल्में 1947 में प्रदर्शित हुई थीं- 'जुगनू' और 'मिर्ज़ा साहिबाँ'। 'जुगनू' शौक़त हुसैन रिज़वी की फ़िल्म थी 'शौक़त आर्ट प्रोडक्शन्स' के बैनर तले निर्मित, जिसमें नूरजहाँ के नायक दिलीप कुमार थे। संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी ने मोहम्मद रफ़ी और नूरजहाँ से एक ऐसा डुएट गीत इस फ़िल्म में गवाया, जो इस जोड़ी का सबसे ज़्यादा मशहूर डुएट सिद्ध हुआ। गीत था "यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है, मोहब्बत करके भी देखा, मोहब्बत में भी धोखा है"। इस गीत की अवधि क़रीब 5 मिनट और 45 सेकण्ड्स की थी, जो उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी लम्बी थी। कहते हैं कि इस गीत को शौक़त हुसैन रिज़वी ने ख़ुद ही लिखा था, पर 'हमराज़ गीत कोश' के अनुसार फ़िल्म के गीत एम. जी. अदीब और असगर सरहदी ने लिखे थे।

📽️प्रमुख_फ़िल्में

1. यमला जट 1940 
2. रेड सिग्नल 1941
3. सुसराल 1941 
4. खानदान 1942
5. नादान 1943 
6. दुहाई 1943
7. लाल हवेली 1944 
8. गाँव की गोरी 1945
9. बड़ी माँ 1945 
10. भाईजान 1945
11. अनमोल घड़ी 1946 
12. जादूगर 1946
13. जुगनू 1947 
14. चनवे 1951
15. दुपट्टा 1952 
16. गुलनार 1953
17. फ़तेह ख़ान 1955 
18. इंतज़ार 1956
19. लख़्त-ए-जिगर 1956 
20. अनारकली 1958
21. छूमंतर 1958 
22. परदेशियाँ 1959
23. कोयल 1959 
24. मिर्ज़ा गालिब 1961

अंतिम_फ़िल्म

बतौर अभिनेत्री नूरजहाँ की आखिरी फ़िल्म 'बाजी' थी, जो 1963 में प्रदर्शित हुई। उन्होंने पाकिस्तान में 14 फ़िल्में बनाई थीं, जिसमें 10 उर्दू फ़िल्में थीं। पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें अभिनय को अलविदा करना पड़ा। हालाँकि, उन्होंने गायन जारी रखा। पाकिस्तान में पार्श्वगायिका के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म 'जान-ए-बहार' (1958) थी। इस फ़िल्म का 'कैसा नसीब लाई' गाना काफ़ी लोकप्रिय हुआ।

पुरस्कार_व_सम्मान

नूरजहाँ ने अपने आधी शताब्दी से अधिक के फ़िल्मी कैरियर में उर्दू, पंजाबी और सिंधी आदि भाषाओं में कई गाने गाए। उन्हें मनोरंजन के क्षेत्र में पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान 'तमगा-ए-इम्तियाज' से सम्मानित किया गया था।

⚰️मृत्यु

अपनी दिलकश आवाज़ और अदाओं से दर्शकों को मदहोश कर देने वाली नूरजहाँ का दिल का दौरा पड़ने से 23 दिसम्बर, 2000 को निधन हुआ। वर्ष 1996 में ही नूरजहाँ आवाज़ की दुनिया से जुदा हो गई थीं। 1996 में प्रदर्शित एक पंजाबी फ़िल्म 'सखी बादशाह' में उन्होंने अपना अंतिम गाना गाया था। नूरजहाँ ने अपने संपूर्ण फ़िल्मी कैरियर में लगभग एक हज़ार गाने गाए।

रोचक_तथ्य

सन 2000 में जब नूरजहाँ की मौत हुई, तो उनकी एक बुज़ुर्ग चाची ने कहा था- "जब नूर पैदा हुई थी तो उनके रोने की आवाज़ सुनकर उनकी बुआ ने उनके पिता से कहा था कि यह लड़की तो रोती भी सुर में है।"
नूरजहाँ के बारे में एक और कहानी भी मशहूर है। तीस के दशक में एक बार लाहौर में एक स्थानीय पीर के भक्तों ने उनके सम्मान में भक्ति संगीत की एक ख़ास शाम का आयोजन किया था। एक लड़की ने वहाँ पर कुछ नात सुनाए। पीर ने उस लड़की से कहा- "बेटी कुछ पंजाबी में भी हमको सुनाओ।" उस लड़की ने तुरंत पंजाबी में तान ली, जिसका आशय कुछ इस तरह का था- "इस पाँच नदियों की धरती की पतंग आसमान तक पहुँचे।" जब वह लड़की यह गीत गा रही थी, तो पीर अवचेतन की अवस्था में चले गए। थोड़ी देर बाद वह उठे और लड़की के सिर पर हाथ रख कर कहा- "लड़की तेरी पतंग भी एक दिन आसमान को छुएगी।"
नूरजहाँ को दावतों के बाद या लोगों की फ़रमाइश पर गाना सख़्त नापसंद था। एक बार दिल्ली के विकास पब्लिशिंग हाउस के प्रमुख नरेंद्र कुमार उनसे मिलने लाहौर गए। उनके साथ उनका किशोर बेटा भी था। यकायक नरेंद्र ने मैडम से कहा- "मैं अपने बेटे के लिए आपसे कुछ माँगना चाह रहा हूँ, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि वह इस क्षण को ताज़िंदगी याद रखे। सालों बाद वह लोगों से कह सके कि एक सुबह वह एक कमरे में नूरजहाँ के साथ बैठा था और नूरजहाँ ने उसके लिए एक गाना गाया था।" वहाँ उपस्थित लोगों की सांसे रुक गईं, क्योंकि उन्हें पता था कि नूरजहाँ ऐसा कभी कभार ही करती हैं। नूरजहाँ ने पहले नरेंद्र को देखा, फिर उनके पुत्र को और फिर अपने उस्ताद ग़ुलाम मोहम्मद उर्फ़ ग़म्मे ख़ाँ को। 'ज़रा बाजा तो मँगवाना', उन्होंने उस्ताद से कहा। एक लड़का बग़ल के कमरे से बाजा यानी हारमोनियम उठा लाया। उन्होंने नरेंद्र से पूछा क्या गाऊँ? नरेंद्र को कुछ नहीं सूझा। किसी ने कहा 'बदनाम मौहब्बत कौन करे गाइए'। नूरजहाँ के चेहरे पर जैसे नूर आ गया। उन्होंने मुखड़ा गाया और फिर बीच में रुक कर नरेंद्र से कहा- "नरेंद्र साहब, आपको पता है, इस देश में ढंग का हारमोनियम नहीं मिलता। सिर्फ़ कोलकाता में अच्छा हारमोनियम मिलता है। यह सभी लोग भारत जाते हैं, बाजे लाते हैं और मुझे उनके बारे में बताते हैं, लेकिन..... टूटपैने मेरे लिए कोई हारमोनियम नहीं लाता।
दुनिया के किसी भी कोने में 'मैडम' शब्द का जो भी अर्थ लगाया जाता हो, किंतु पाकिस्तान में यह शब्द सिर्फ़ 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' नूरजहाँ के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
जब नूरजहाँ को दिल का दौरा पड़ा, तो उनके एक मुरीद और नामी पाकिस्तानी पत्रकार ख़ालिद हसन ने लिखा था- "दिल का दौरा तो उन्हें पड़ना ही था। पता नहीं कितने दावेदार थे उसके, और पता नहीं कितनी बार वह धड़का था, उन लोगों के लिए जिन पर मुस्कराने की इनायत उन्होंने की थी।"

बुधवार, 20 सितंबर 2023

रीमा सेन

रिमी सेन
स्क्रीन नाम रिमी सेन
के रूप में जन्मे शुभमित्र सेन
पेशा अभिनेत्री

🎂जन्म21सितम्बर1981
जन्म (शहर) कलकत्ता, पश्चिम बंगाल

राष्ट्रीयता भारतीय
पिता राजा सेन
माँ पापिया सेन
उल्लेखनीय कार्य
पारोमिटर एक दिन (2000),
फिर हेरा फेरी (2006),
गोलमाल फन अनलिमिटेड (2006),
धूम 2 (2006),
जॉनी गद्दार (2007)
रिमी की पहली हिन्दी फिल्म हंगामा थी। उसके बाद वो बाग़बान में छोटे से रोल में दिखीं। उनकी कुछ सफल फिल्में हैं:- धूम, दीवाने हुए पागल, फिर हेरा फेरी और गोलमाल। बिग बॉस 9 में वो हिस्सा ले चुकी है। 2017 में उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली।
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2008 दे ताली 
2007 जॉनी गद्दार 
2007 हैटट्रिक
2006 फिर हेरा फेरी 
2006 धूम 2 
2006 गोलमाल 
2005 क्योंकि माया 
2005 गरम मसाला 
2005 दीवाने हुए पागल 
2004 धूम स्वीटी 
2003 हंगामा 
2003 बाघबान

नूर जहां

अल्लाह रखा वसई (नूर_जहां)
🎂जन्म21सितम्बर1926
कसूर , पंजाब , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत23दिसंबर2000 (आयु 74 वर्ष)
कराची , सिंध , पाकिस्तान
शांत स्थान
गिज़री कब्रिस्तान, कराची
राष्ट्रीयता
पाकिस्तानी (1947-2000)
अन्य नामों
पूरब की कोकिला 
दिलों की रानी 
राष्ट्र की बेटी 
पंजाब की कोकिला 
व्यवसायों
पार्श्वगायकसंगीतकारअभिनेत्रीनिदेशक
सक्रिय वर्ष
1930 - 2000
उल्लेखनीय कार्य
ज़ीनत (1945)
अनमोल घड़ी (1946)
जुगनू (1947)
मिर्ज़ा साहिबान (1947)
चान वे (1951)
दुपट्टा (1952)
इंतेज़ार (1956)
अनारकली (1958)
कोयल (1959)
शैली
फिल्मीग़ज़लशास्त्रीय संगीतकव्वाली
शीर्षक
"मलिका-ए-तरन्नुम" (राग की रानी)
जीवन साथी
शौकत हुसैन रिज़वी
​( एम.  1941; प्रभाग  1953 )
इजाज़ दुर्रानी
​( एम.  1959; प्रभाग  1971 )
बच्चे
ज़िल-ए-हुमा , नाज़िया एज़ाज़ खान सहित 4
अभिभावक
इमदाद अली (पिता)फ़तेह बीबी (मां)
रिश्तेदार
सोन्या जहान (पोती)
सिकंदर रिज़वी (पौत्र)
अहमद अली बट (पौत्र)
पुरस्कार
15 निगार पुरस्कार
सम्मान
प्रदर्शन का गौरव (1965)
तमग़ा-ए-इम्तियाज़ (1965)
सितारा-ए-इम्तियाज़ (1996)

अहमद रुश्दी के साथ , उनके पास पाकिस्तानी सिनेमा के इतिहास में सबसे अधिक फिल्मी गीतों को आवाज देने का रिकॉर्ड है। उन्होंने उर्दू, पंजाबी और सिंधी सहित विभिन्न भाषाओं में लगभग 20,000 गाने रिकॉर्ड किए।  आधी सदी से भी अधिक लंबे करियर के दौरान उन्होंने 1,148 पाकिस्तानी फिल्मों में कुल 2,422 गाने गाए। उन्हें पहली महिला पाकिस्तानी फिल्म निर्देशक भी माना जाता है। 
नूरजहाँ  वह इमदाद अली और फतेह बीबी की ग्यारह संतानों में से एक थीं।
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1935 पिंड दी कुड़ी
1935 शिला
1936 मिस्र का सितारा
1937 हीर सियाल
1939 गुल बकावली
1939 इमानदार 
1939 पयाम-ए-हक 
1936 गुल-ए-बकावली
1940 सजनी 
1940 यमला जाट 
1941 चौधरी 
1941 लाल सिग्नल 
1941 उम्मीद 
1941 सुसराल 
1942 चांदनी 
1942 धीरज 
1942 फरयाद 
1942 खानदान
1943 नादान 
1943 दुहाई
1943 नौकर (1943 की पांचवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्म)
1944 लाल हवेली 
1944 दोस्त
1945 जीनत
1945 गाँव की गोरी
1945 बड़ी माँ
1945 भाई जान 
1946 अनमोल घड़ी
1946 दिल 
1946 हमजोली 
1946 सोफिया 
1946 महाराणा प्रताप 
1947 मिर्ज़ा साहिबान
1947 जुगनू 
1947 आबिदा 
1947 मीराबाई 
1951 चानवे
1952 दोपट्टा  पाकिस्तान में 1952 की सबसे बड़ी हिट
1953 गुलनार 
1955 पतेय खान 
1956 लक्त-ए-जिगर
1956 Intezaar
1997 नूरन
1958 छू मंतर 
1958 अनारकली
1959 नींद 
1959 Pardaisan 
1959 कोयल
1961 ग़ालिब 
1994 डंडा पीर 
1996 दम मस्त कलंदर/आलमी गुंडे

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...