#06april
माया गोविंद
(🎂17 जनवरी 1940 -⚰️06 अप्रैल 2022)
एक भारतीय गीतकार थे जिन्होंने कई बॉलीवुड फिल्मों के लिए गीत लिखे। उन्होंने "मेरा पिया घर आया", "गेले में लाल ताई", "मैंने पायल है छनकायी", "मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी", "आंखों में बसे हो तुम" आदि जैसे लोकप्रिय गीत लिखे थे। उन्होंने आरोप(1974), में खिलाड़ी तू अनाड़ी (1994), टक्कर(1995), याराना (1995), हम तुम्हारे है सनम(2001) आदि फिल्मों में गीत लिखे। उन्होंने 800 से अधिक गाने लिखे हैं।
🎂जन्म17 जनवरी 1940
⚰️मृत्यु 06 अप्रैल 2022
हिन्दी सिनेमा में गीतलेखन के क्षेत्र में हमेशा से ही पुरूषों का एकाधिकार रहा है, हालांकि अपवाद के तौर पर कभी कभार महिलाएं भी इस विधा में हाथ आज़माती रहीं| जैसे साल 1936 की फिल्म ‘मैडम फैशन’ में फ़िल्म की निर्मात्री-निर्देशिका-संगीतकार जद्दनबाई या 1958 की फ़िल्म ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ में फ़िल्म की नायिका निरूपा रॉय, या फिर सरोज मोहिनी नैयर, पद्मा सचदेव, रानी मलिक, कौसर मुनीर| ये सभी महिलाएं समय समय पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज ज़रूर कराती आयीं लेकिन गीतलेखन की मुख्यधारा में वो कभी भी शामिल नहीं हो पायीं| लेकिन इन सभी के बीच एक नाम ऐसा है जिन्होंने न सिर्फ़ इस क्षेत्र में पुरूषों के वर्चस्व को तोड़ा बल्कि लम्बे समय तक अपना एक सम्मानजनक स्थान भी बनाए रखा| और वो नाम है श्रीमती माया गोविन्द का|
17 जनवरी 1940 को लखनऊ के एक खत्री परिवार में जन्मीं माया जी के पिता श्री हरनाथ वहाल कपड़े के कारोबारी थे| माता पिता की 3 बेटियों में माया जी सबसे बड़ी थीं| वो बताती हैं, “हमारा सरनेम मूलत: ‘बहल’ था जो आगे चलकर वहाल हो गया था| पिताजी का कारोबार अच्छा चल रहा था लेकिन अचानक ही उनकी आंखों की रोशनी चली गयी| हम तीनों बहनें बहुत छोटी थीं| मां एक सीधीसादी गृहिणी थीं| हममें से कोई भी ऐसा नहीं था जो घर-व्यापार को संभाल सके| ऐसे में हमारी सभी 3-4 दुकानों और बंगले पर पिताजी के भाईयों ने कब्ज़ा कर लिया| और हम किराए के मकान में रहने पर मजबूर हो गए|”
माया जी 5 साल की हुईं तो उनके पिता गुज़र गए| नतीजतन घर के माली हालात और भी बदतर होते चले गए| ऐसे में माया जी की मां के मामा मदद के लिए आगे आये| माया जी बताती हैं, “मां के मामा की दी गयी ढाई सौ रूपये महीने की मदद से हम तीनों बहनें पलींबढ़ी| मैंने वैदिक कन्या पाठशाला से 12वीं करने के बाद महिला कॉलेज से बी.ए. किया और फिर बी.एड. में दाखिला ले लिया| बी.एड. के पहले साल में थी कि मेरी शादी प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में कर दी गयी| लेकिन उस घर में एक एक दिन बिताना मेरे लिए मुश्किल हो गया| बहुत ही अजीब सा परिवार था| संस्कारों, संस्कृति, साहित्य, संगीत, कला से किसी का कोई रिश्ता नहीं| पीना-पिलाना, रात को देर से घर लौटना, बात बात में गाली गलौज, मारपीट| नतीजतन मैं तीन महीने में ही मां के घर वापस लौट आयी|”
लखनऊ लौटकर माया जी ने बी.एड. के साथ साथ भातखंडे संगीत विद्यालय से 4 साल का संगीत का कोर्स किया| शम्भू महाराज से एक साल कत्थक सीखा| लखनऊ रेडियो की स्टाफ़ आर्टिस्ट के तौर पर कई रेडियो नाटक किये| ‘बाल विद्या मंदिर’ में पढ़ाने लगीं| साथ ही लखनऊ के मशहूर रंगकर्मी कुंवर कल्याण सिंह के नाटकों में भी काम करने लगीं| माया जी बताती हैं, “11-12 साल की उम्र से मैं कविताएं भी लिखने लगी थी| साल 1966 में हमारे स्कूल में अभिनेता भारत भूषण और उनके निर्माता-निर्देशक भाई आर.चंद्रा (रमेश चन्द्र) आए| आर.चंद्रा ने नीरज को अलीगढ़ से बुलाकर फ़िल्म ‘नयी उमर की नयी फ़सल’ के गीत लिखवाए थे| साल 1966 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म से नीरज ने डेब्यू किया था| आर.चंद्रा ने मेरी कविताएं सुनीं जो उन्हें बहुत पसंद आयीं| उन्होंने उसी वक़्त मुझे तीन फिल्मों ‘मेघ मल्हार’, ‘मुशायरा’ और ‘बाप बेटे’ के लिए साईन कर लिया|”
कुछ समय बाद आर.चंद्रा के बुलावे पर माया जी मुम्बई आयीं| उन्होंने फिल्म ‘मुशायरा’ के लिए 11 गाने लिखे और फिर वापस लखनऊ चली गयीं| इस फ़िल्म में खैयाम का संगीत था| माया जी के लखनऊ लौटने के बाद आशा भोंसले की आवाज़ में इस फ़िल्म के दो मुजरागीत रिकॉर्ड भी हुए| वो गीत थे, ‘सारी रतिया मचावे उत्पात सिपहिया सोने न दे, हाए अम्मा’ और ‘हमें हुक्म था ग़म उठाना पड़ेगा, इसी ज़िद पे हमने जवानी लुटा दी’| लेकिन तभी अचानक आर.चंद्रा गुज़र गए और तीनों ही फ़िल्में बंद हो गयीं| आगे चलकर आर.चंद्रा के निर्माता बेटे राकेश चंद्रा ने ये दोनों गीत साल 1975 में बनी फ़िल्म ‘मुट्ठी भर चावल’ में इस्तेमाल किये|
साल 1965-66 में माया जी राम गोविन्द जी के संपर्क में आयीं| समस्तीपुर बिहार के रहने वाले मशहूर लेखक-रंगकर्मी राम गोविन्द जी, जिनका असली नाम गोविन्द अरोड़ा है, अपने नाटकों की मुख्य भूमिका के लिए एक अभिनेत्री की तलाश में थे और इसी सिलसिले में वो लखनऊ आकर माया जी से मिले थे| माया जी ने समस्तीपुर जाकर नाटक में काम किया, राम गोविन्द जी के साथ उनकी दोस्ती हुई, नाटक के बाद राम गोविन्द जी उन्हें छोड़ने लखनऊ आए और फिर लखनऊ के ही होकर रह गए| 1967 में राम गोविन्द जी ने माया जी से शादी कर ली| उन दोनों ने मिलकर लखनऊ की ख्यातिप्राप्त नाट्यसंस्था ‘दर्पण’ की नींव रखी और 1968-69 में इस बैनर के तहत पहला नाटक ‘ख़ामोश अदालत जारी है’ किया| नाटकों से चूल्हा जलना मुश्किल था| रेडियो कार्यक्रमों से माया जी की जो थोड़ी बहुत आय होती थी उसी से गुज़ारा चलता था|
माया जी बताती हैं, “बतौर कवियित्री मेरी ख़ासी पहचान बन चुकी थी| प्रख्यात कवि रामरिख मनहर मुझे अक्सर कवि सम्मेलनों में भाग लेने के लिए आमंत्रित करते थे| 1972 में उन्होंने मुझे मुम्बई में होने वाले कवि सम्मलेन के लिए बुलाया जहां दर्शकों में रामानंद सागर भी शामिल थे| मैंने काव्यपाठ किया जो सबको बेहद पसंद आया| रामरिख मनहर ने मुझे ‘राजश्री प्रोडक्शंस‘ के मालिक ताराचंद बड़जात्या और उनके बेटे राजकुमार बड़जात्या से मिलवाया| उन्होंने प्राइवेट अल्बम के लिए मेरी तीन कविताएं रिकॉर्ड कीं| फिर उन्होंने कवियों और कविताओं पर ढाई घंटे की एक फ़िल्म ‘कवि सम्मेलन’ बनाई जिसमें मुझे भी शामिल किया गया| उसमें मैंने कविता पढ़ी थी, ‘तुम एक बार प्रिय आ जाओ तो आंचलभर सुहाग ओढूं’| उधर रामानंद सागर ने मुझसे फ़िल्म ‘जलते बदन’ में चारों गाने लिखवाए| ये फ़िल्म साल 1973 में रिलीज़ हुई थी|”
रामानंद सागर की फ़िल्म ‘गीत’ (1970) की सिल्वर जुबली पार्टी में माया जी और राम गोविन्द जी की मुलाक़ात गुरूदत्त के भाई आत्माराम से हुई| गुरूदत्त की मृत्यु के बाद ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स’ की कमान आत्माराम ने संभाल ली थी| उस बैनर में उन्होंने फ़िल्म ‘शिकार’ (1968) बनाई और फिर बैनर का नाम बदलकर ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स कम्बाईन’ कर दिया था| ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स कम्बाईन’ के बैनर में ‘चन्दा और बिजली’ (1969), ‘उमंग’ (1970), ‘मेमसाब’ (1972) और ‘ये गुलिस्तां हमारा’ (1972) जैसी कुछ फ़िल्में बनाने के बाद आत्माराम अब फ़िल्म ‘आरोप’ बनाने जा रहे थे| उन्होंने माया जी को इस फ़िल्म के गीत और राम गोविन्द जी को पटकथा लिखने के लिए साईन कर लिया| फ़िल्म ‘आरोप’ साल 1974 की कामयाब फ़िल्मों में से थी| भूपेन हज़ारिका द्वारा संगीतबद्ध इस फ़िल्म के तमाम गीत भी हिट हुए थे|
गोविन्द दंपत्ति ने शुरू के 5 महीने पाली हिल पर (स्व.) गुरूदत्त के फ्लैट में गुज़ारे जहां भूपेन हज़ारिका उनके बगल के कमरे में रहते थे| फिर उन्होंने पाली हिल छोड़कर रोड नम्बर 9 जुहू स्कीम पर किराये का मकान ले लिया| और फिर जल्द ही दोनों ने अपने अपने क्षेत्र में अपनी एक मज़बूत स्थिति बना ली| माया जी बताती हैं, “किराये के उस मकान में हम कुछ साल रहे| उस बीच रोड नम्बर 8 स्थित ‘लोखंडवाला बिल्डर्स’ की मोनालिसा बिल्डिंग में हमने 2 बेडरूम फ्लैट बुक करा लिया था| फ्लैट तैयार हुआ तो बिल्डर सिराज भाई ने वो फ्लैट देने से ये कहते हुए इनकार कर दिया कि मैं आपको 3 बेडरूम वाला फ्लैट दूंगा, बस शर्त ये है कि मेरे लिए आपको एक कवि सम्मेलन करना होगा| हमने सम्मेलन की तैयारी की| स्मारिका के लिए मिले विज्ञापनों से 1.25 लाख रूपये जमा हुए| सिराज भाई ने हमसे मात्र 90 हज़ार रूपये लिए और जुहू स्कीम के एन.एस. रोड नम्बर 10 पर 3 बेडरूम वाला ये फ्लैट हमारे नाम कर दिया| ये साल 1980 की बात है| तब से आज तक यही घर हमारा आशियाना बना हुआ है|”
तोहफ़ा मोहब्बत का’ के बाद माया जी और रामगोविंद जी ने गोविंदा, जीतेंद्र, जयाप्रदा को लेकर फ़िल्म ‘तांडव’ का निर्माण शुरू किया था| लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि 13 रील बन जाने के बावजूद वो फ़िल्म पूरी नहीं हो पायी| इससे हुए आर्थिक नुकसान की वजह से गोविन्द दम्पत्ति को अपना बैनर ‘बहार पिक्चर्स’ हमेशा के लिए बंद कर देना पड़ा| लेकिन बतौर गीतकार माया जी के करियर ने अपनी ऊंचाईयां बनाए रखीं| उनकी अभी तक की आख़िरी फ़िल्म ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ साल 2014 में रिलीज़ हुई थी| इस फिल्म के संगीतकार खैयाम थे| चार दशकों के अपने करियर में उन्होंने दर्जनों हिट गीत लिखे जैसे –
वादा भूल न जाना’ (जलते बदन), ‘नैनों में दर्पण है’ (आरोप), ‘यहां कौन है असली कौन है नक़ली, ये तो राम जाने’ (क़ैद), ‘तेरी मेरी प्रेम कहानी किताबों में भी न मिलेगी’ (पिघलता आसमान), ‘कजरे की बाती अंसुअन के तेल में’ (सावन को आने दो), ‘चार दिन की ज़िंदगी है’ (एक बार कहो), ‘लो हम आ गए हैं फिर तेरे दर पर’ (खंज़र’), ‘मोरे घर आए सजनवा’ (ईमानदार), ‘ठहरे हुए पानी में कंकर न मार सांवरे’ (दलाल), ‘दरवज्जा खुल्ला छोड़ आयी नींद के मारे’ (नाजायज़), ‘प्रेम का ग्रन्थ पढ़ाओ सजनवा’ (तोहफ़ा मोहब्बत का), ‘आंखों में बसे हो तुम तुम्हें दिल में छुपा लूंगा’ (टक्कर), ‘शुभ घड़ी आयी रे’ (रज़िया सुल्तान), ‘हम दोनों हैं अलग अलग हम दोनों हैं जुदा जुदा’ (मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी), ‘चन्दा देखे चन्दा तो चन्दा शरमाए’ (झूठी), ‘मेरी पायल बोले छम...छमछम’ (गजगामिनी), ‘मुझे ज़िन्दगी की दुआ न दे’ (गलियों का बादशाह), डैडी कूल कूल कूल’ (चाहत) और ‘देखो कान्हा नहीं मानत बतियां’ (पायल की झंकार)|
साल 1993 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘दलाल’ के गीत ‘गुटुर गुटुर अरे चढ़ गया ऊपर रे अटरिया पे लोटन कबूतर’ को लेकर माया जी पर अश्लील लेखन के आरोप लगे थे| इस विवाद ने लम्बे अरसे तक उनका पीछा नहीं छोड़ा था| क़रीब 15 साल पहले साप्ताहिक ‘सहारा समय’ (हिन्दी) के अपने कॉलम ‘बाकलम ख़ुद’ के लिए हुई बातचीत के दौरान जब मैंने माया जी से इस गीत के बारे में बात करनी चाही तो उन्होंने खीझे हुए स्वर में कहा था, “लोटन कबूतर तो तुम्हें याद रहा, ‘देखो कान्हा नहीं मानत बतियां’ के बारे में क्या कहोगे? वो भी मेरा ही लिखा हुआ है|” उनकी बात सुनकर मुझे ख़ामोश हो जाना पड़ा था| इस बार जब मैंने उन्हें ये वाकया याद दिलाया तो उन्होंने कहा, “उस गीत को लेकर हो रही आलोचनाओं से मैं बहुत तंग आ गयी थी| मेरे लिखे अच्छे और काव्यात्मक गीत कोई याद ही नहीं करना चाहता था| लोगों की प्रतिक्रिया सुनकर ऐसा लगने लगा था जैसे उस एक गीत ने मेरी तमाम स्तरीय रचनाओं पर पानी फेर दिया हो| जबकि उस गीत के बोलों में कुछ भी अश्लील नहीं था| रहा सवाल गीत के पिक्चराईज़ेशन का, तो क्या उसके लिए मैं ज़िम्मेदार हूं|”
माया जी की बात सौ फ़ीसदी सही थी| उत्तर भारत में तो शादीब्याह के अवसर पर मस्ती और छेड़छाड़भरे ऐसे लोकगीत गाये जाने का प्रचलन बेहद आम है| अगर हम ‘लोटन कबूतर’ के पिक्चराईज़ेशन को नज़रअंदाज़ करके सिर्फ़ इसके बोलों पर गौर करें तो ये भी एक मस्ती और छेड़छाड़भरा आम लोकगीत सा ही नज़र आएगा|
उनके 11 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं| साथ ही वो ‘फ़िल्म जर्नलिस्ट अवार्ड (उत्तर प्रदेश)’, राष्ट्रभाषा परिषद (मुम्बई) का ‘महादेवी वर्मा पुरस्कार’, सुरसिंगार परिषद का ‘स्वामी हरिदास पुरस्कार’, ‘उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान’, भारती प्रसार परिषद का ‘गौरव भारती पुरस्कार’, महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का ‘छत्रपति शिवाजी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार’ जैसे दर्जनों सम्मान भी हासिल कर चुकी हैं उनके परिवार में पति राम गोविन्द जी के अलावा इंजीनियर बेटा, बहू , एक पोता और एक पोती शामिल हैं|
06 अप्रैल 2022 को 82 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।