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गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

शिव गीता


शिव गीता जो कि गुप्त से भी अति गुप्त है हालांकि आज के समय में सोशल मीडिया का दौर है इसलिए अब कुछ भी गुप्त व अति गुप्त नहीं रहा हैं

प्रभु श्री राम और भगवान महेश्वर के बीच हुए संवाद को शिव गीता कहा जाता है सीता हरण के बाद जब प्रभु श्री राम निराश हो गए थे तो भगवान महेश्वर श्रीराम को रामगिरी पर्वत के तङकरण वन में गोदावरी नदी के किनारे जो उपदेश दिए थे उसे ही शिव गीता व ईश्वर गीता कहते हैं

शिव गीता में भगवान महेश्वर प्रभु श्री राम को ब्रह्म ज्ञान प्रदान किए थे जिस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद व्यक्ति शिवत्व प्राप्त करता है शिव गीता के सप्तम अध्याय में भगवान शिव अपने विराट विश्वरूप का दर्शन भी देते हैं शिव गीता पाठ की बात की जाए तो शिव गीता का पाठ करने या फिर शिव गीता का श्रवण करने का फल अनंत होता है शिव गीता पाठ के लगभग 1100 फायदे होते हैं शिव गीता पाठ के लाभ की बात की जाए तो इस विषय में विस्तार पूर्वक "शिव गीता फल श्रुति" में बताया गया है

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1. *शिव जी की महिमा*: पाठ में शिव जी की महिमा का वर्णन किया गया है, जिसमें उनकी शक्ति और उनकी कृपा का उल्लेख किया गया है।
2. *भक्ति का महत्व*: पाठ में भक्ति के महत्व को दर्शाया गया है, जिसमें कहा गया है कि शिव जी की भक्ति से मुक्ति प्राप्त होती है।
3. *शिव जी की कृपा*: पाठ में शिव जी की कृपा का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि शिव जी अपने भक्तों पर कृपा करते हैं।
4. *मुक्ति का मार्ग*: पाठ में मुक्ति के मार्ग का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि शिव जी की भक्ति से मुक्ति प्राप्त होती है।
5. *शिव जी के उपदेश*: पाठ में शिव जी के उपदेश का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि शिव जी ने अगस्त जी को उपदेश दिया था।

इन बिंदुओं से यह स्पष्ट होता है कि पाठ में शिव जी की महिमा और उनकी भक्ति के महत्व को दर्शाया गया है।

शिव गीता पहला अध्याय 
शौनक आदि ऋषियों ने शुद्ध और केवल मुक्ति दायर
के लोग छुड़ाने में और श्री शिव गीता रत्न को शिव जी के अनुग्रह से वर्णन करता हूं
न कर्मों के अनुसार नर्मदा नदी का अवस्थी मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है
किन्तु ज्ञान से ही प्राप्त होता है
शिवजी ने दंडक वन में जी को जो शिव गीता उपदेश ही है यह गुप्त से भी होते हैं जिसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है जो पूर्व काल में गंध जीनी सनत कुमार को वर्णन की थी
मुनिश्रेष्ठ अनंत कुमार ने व्यास जी को कहीं और व्यास जी ने कृपा करके वे हम से वर्धन की और साथ ही यह भी कहा कि है कि का तुम किसी को देना ही ही सूतपुत्र ऐसा वचन पालन न करने दें
शूरवीर हो श्राप देती थी
हे ब्राह्मण तब मैंने भगवान व्यास जी से पूछा हे भगवन कर देवता क्यों करती और क्यों श्राप देती हैं
उनकी में कहानी है जो भी देवता क्रोध करते हैं
यह सुनकर व्यास जी मुझसे बोली हे व्यवस्थित तो अपने प्रश्न का उत्तर हम हूं
जब हम मर मिटे अग्निहोत्र करते और गृहस्थाश्रम में रहती हैं वहीं सफल होकर देने वाले देवताओं को काम न ही भक्ष्य भोज्य पान करने योग्य के जो कुछ फर्मों में या के किया जाता है
अभी द्वारा अग्नि में आहुति दी गई है
वह स्वर्ग मिलती है
देवताओं को स्वर्ग में ईश लेने वाला और कुछ नहीं है
जैसे ग्रह पुरुषों की दूरी हुई गाय ले जाने से केवल दुखी होता है इसी प्रकार ज्ञानवान ब्राह्मण देवताओं को जाता है
कारण है कि वे गम नहीं करता इस कारण इसके विषय भाग या पुत्र आदि में प्रवेश कर करके डेटा विघ्न करते ही इससे किसी लिए धारें कि शिविर में मुक्ति नहीं होती है इस कारण मूर्खों को शिव का
साथ ही मिलता और जो कदाचित जानता भी है
न किसी कारण मध्य में ही खंडित हो जाता है
और किसी को ज्ञान हुआ भी तो विश्वास से नहीं बचता ऋषि ने जब इस प्रकार से देवता शरीर धारियों को विभिन्न कतई नहीं तो फिर इसमें किसका पराक्रम है
जो मुक्ति को प्राप्त होता है
हिंदू उतरी असत्य कहिए कि उनका उपाय है या नहीं है
सोच बदली करोड़ों जन्मों के पुण्य संचय होने से शिव भक्ति उत्पन्न होती है
उस व्यक्ति के होनी थी इस शोध आदि कर्मों की कामना छोड़कर मनुष्य शिव जी में अरबन बुद्धि भी यथाविधि कम करता है
शिवजी की कृपा से जो है प्राणी दृढ़ भक्ति मां होता है
था वीडियो छोड़कर भयभीत हो देवता जाते हैं
उस भक्ति के करनी थी शिव जी के चरित्र शिवा करने की अभिलाषा उत्पन्न होती है सुनने से ज्ञान और क्या से मुक्ति मिल जाती है
बहुत कहने से क्या लाभ जिसकी शिव जी में दृढ़ भक्ति है में करोड़ों पाठकों से देखा हो
को ही मुक्त हो जाता है अनादर हंसी मूर्खता से परिहास से कपट से भी जो मनुष्य शिव भक्ति में तत्पर है मैं अंत्यज था चाण्डाल भी हो तो मुक्त हो जाता है इस प्रकार के व्यक्ति सदा
सबके करने योग्य है
इस बस्ती के होते हुए भी जो मनुष्य संसार से अछूती उसकी संसार बंधन से न छूटने वाले किसी कमान दूसरा कोई भी मूर्ख नहीं है
कौशिक जी केवल भक्ति से प्रसन्न नहीं होते जो नियम भी केवल भक्ति या विद्रोही करते हैं उन पर वे प्रसन्न हो
वांछित फल प्रदान करते हैं भरे मूल कि वह तो कुछ लेकर या अनमोल की वस्तु अथवा केवल जल्द ही लेकर जो नियम से पर करते ही शिवजी प्रसन्न हो उसकी तुलना की गई थी
और यह भी ना हो सके तो नियम से नमक का यह केवल पर चढ़ा जो नित्य प्रति शिव जी की करता है उसके ऊपर भी शिवजी प्रसन्न होते ही पहुंचे प्रदक्षिणा में भी असमर्थ हो केवल मन में ही शिव जी का ध्यान करें
चलते बैठते में जोन का स्मरण करें
उसकी भी अभी उसकी भी आकांक्षा था
ही क्षण चंदन बेल कास्ट तरह वन में उत्पन्न हुए फल जिसके अधिक रीड करने नहीं पहुंचे शिव जी की सेवा करने में त्रिलोकी में कौन मन के उत्पन्न हुए फल मूल आदि में शिव जी जैसे बिक्री थे
जैसी ग्राम नगर के उत्पन्न हुए उत्तम उत्तम फल मूड में नहीं है जो ऐसे देवता को छोड़कर अन्य देवता का भजन सेवन करता है
वो मानो गंगा का त्याग करके मृगतृष्णा की इच्छा करता है परन्तु जी को करोड़ों जन्मों के पाप रहे हैं
उनका अज्ञान अंधकार से आच्छादित हो रहा है
उनको शिव जी की भक्ति प्रकाशित नहीं होती कहा देशी स्थल का कुछ नियम नहीं हैं जहां इसका चित्र हमें वहीं दिनांक भी शिव रूप से अपने आत्मा में ध्यान करने से शिव की मूर्ति को प्राप्त हो जाता है
जिसकी बहुत थोड़ी लक्ष्मी से विहीन हो वे शिव जी की कृपा से ही सारी पृथ्वी का राज्य प्राप्त कर लंबी आयु तक तो से लोग का मैं राजा हूँ ऐसा मानते कहने वाले को गूंज रही थी
जो सम्पूर्ण लोगों का कहना था तरह अक्षय ऐश्वर्यवान पुरुष भी अभिमान रहित हो जो शिवा शिवा हम इस प्रकार से कथन करता है उसको शेर आत्मस्वरूप थी तादात्म्य होगी तथा शीघ्र ही करती थी
है जिस व्रत के करने से प्राणी के धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों पदार्थ हस्तगत थे ही मैं है पर शपथ ग्रहण तुमसे वर्णन करता हूं
वीजा नामक दीक्षा को करके विभूति और रुद्राक्ष को धारण कर विस्तार नामक शिव सहस्त्रनाम का जप करते हुए
मानव शरीर को त्याग कर शेयर शरीर को प्राप्त होने पर लोक कल्याण करने वाले शंकर प्रसन्न होकर तुम को दर्शन देकर केवल मुक्ति
जब जी दंडकारण्य में वास करती थी
तब अगस्त जी ने उन्हें वे उपदेश दिया था
व्यस्तता मैं तुमसे कहता हूं
तुम भक्ति युक्त होकर श्रवण करो

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...