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शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

जसपाल भट्टी

जसपाल भट्टी हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली, लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए.
🎂जन्म: 03 मार्च 1955, अमृतसर
⚰️मृत्यु: 25 अक्तूबर 2012, शाहकोट
पत्नी: सविता भट्टी (विवा. 1985–2012)
बच्चे: जसराज भट्टी, राबिया भट्टी
माता-पिता: सरदार नरिंदर सिंह भट्टी, मंजित कौर कैलर

हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली  लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए. व्यंग-चित्रकार (कार्टूनिस्ट) जसपाल भट्टी, 80 के दशक के अंत में दूरदर्शन की नई प्रातःकालीन प्रसारण सेवा में उल्टा-पुल्टा कार्यक्रम के माध्यम से प्रसिद्ध हुए थे।उनके इस सबसे लोकप्रिय फ़्लॉप शो को उनकी उनकी पत्नी सविता भट्टी ने प्रोड्यूस किया साथ ही उसमें अभिनय भी किया| इस शो से इससे पहले जसपाल भट्टी चण्डीगढ़ में द ट्रिब्यून नामक अख़बार में व्यंग्य चित्रकार के रूप में कार्यरत थे। एक व्यंग्य चित्रकार होने के नाते इन्हे आम आदमी से जुड़ी समस्याओं और व्यवस्था पर व्यंग्य के माध्यम से चोट करने का पहले से अनुभव था। अपनी इसी प्रतिभा के चलते उल्टा-पुल्टा को जसपाल भट्टी बहुत रोचक बना पाए थे। 90के दशक के प्रारम्भ में जसपाल भट्टी दूरदर्शन के लिए एक और टेलीविज़न धारावाहिक, फ्लॉप शो लेकर आए जो बहुत प्रसिद्ध हुआ और इसके बाद जसपाल भट्टी को एक कार्टूनिस्ट की बजाय एक हास्य अभिनेता के रूप में जाना जाने लगा। 25 अक्टूबर 2012 को सुबह 3बजे जालंधर, पंजाब में एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
📽️
2006 फ़ना 
2005 कुछ मीठा हो जाये 
2003 कुछ ना कहो 
2003 तुझे मेरी कसम 
2002 जानी दुश्मन 
2002 कोई मेरे दिल से पूछे 
2002 शक्ति 
2002 ये है जलवा 
2000 हमारा दिल आपके पास है 
2000 खौफ़ 
1999 जानम समझा करो 
1999 काला साम्राज्य 
1999 आ अब लौट चलें 
1999 कारतूस

सोमवार, 28 अगस्त 2023

गुले नगमा फिराक गोरख पुरी

गुले नगमा फिराक गोरख पुरी
🎂28 अगस्त 1896
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत
मौत
⚰️03 मार्च 1982
नई दिल्‍ली, भारत
पेशा
कवि,लेखक, कवि, आलोचक, विद्‍वान
राष्ट्रीयता
भारतीय
उच्च शिक्षा
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
विधा
कविता, उर्दू शायरी, साहित्यिक आलोचक
उल्लेखनीय काम
गुल–ए–नग़मा
(1970 मे साहित्य अकादमी पुरस्कार)
खिताब
पद्म भूषण (1968)
ज्ञानपीठ पुरस्कार (1969)
साहित्य अकादमी पुरस्कार
(1970)
२९ जून, १९१४ को उनका विवाह प्रसिद्ध जमींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ। कला स्नातक में पूरे प्रदेश में चौथा स्थान पाने के बाद आई.सी.एस. में चुने गये। १९२० में नौकरी छोड़ दी तथा स्वराज्य आंदोलन में कूद पड़े तथा डेढ़ वर्ष की जेल की सजा भी काटी।। जेल से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ्तर में अवर सचिव की जगह दिला दी। बाद में नेहरू जी के यूरोप चले जाने के बाद अवर सचिव का पद छोड़ दिया। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में १९३० से लेकर १९५९ तक अंग्रेजी के अध्यापक रहे।१९७० में उनकी उर्दू काव्यकृति ‘गुले नग्‍़मा’ पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
फ़िराक़ गोरखपुरी की शायरी में गुल-ए-नगमा, मश्अल, रूह-ए-कायनात, नग्म-ए-साज, ग़ज़लिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट, गुलबाग, रम्ज व कायनात, चिरागां, शोअला व साज, हजार दास्तान, बज्मे जिन्दगी रंगे शायरी के साथ हिंडोला, जुगनू, नकूश, आधीरात, परछाइयाँ और तरान-ए-इश्क जैसी खूबसूरत नज्में और सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जैसी रुबाइयों की रचना फ़िराक़ साहब ने की है। उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया और कई कहानियाँ भी लिखी हैं। उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुई हैं।

फ़िराक़ ने अपने साहित्यिक जीवन का श्रीगणेश ग़ज़ल से किया था। अपने साहित्यिक जीवन में आरंभिक समय में ६ दिसंबर, १९२६ को ब्रिटिश सरकार के राजनैतिक बंदी बनाए गए। उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभर पाए हैं। नजीर अकबराबादी, इल्ताफ हुसैन हाली जैसे जिन कुछ शायरों ने इस रिवायत को तोड़ा है, उनमें एक प्रमुख नाम फ़िराक़ गोरखपुरी का भी है। फ़िराक़ ने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उनके यहाँ सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर शायरी में ढला है। दैनिक जीवन के कड़वे सच और आने वाले कल के प्रति उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर फ़िराक़ ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया। फारसी, हिंदी, ब्रजभाषा और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ के कारण उनकी शायरी में भारत की मूल पहचान रच-बस गई है।
उन्हें गुले-नग्मा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बाद में १९७० में इन्हें साहित्य अकादमी का सदस्य भी मनोनीत कर लिया गया था।फ़िराक़ गोरखपुरी को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन १९६८ में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया था।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...