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शनिवार, 27 जनवरी 2024

कमलेश्वर

#06jan
#27jan 
कमलेश्वर

🎂 06 जनवरी, 1932
⚰️27 जनवरी, 2007 को फ़रीदाबाद, हरियाणा

उपन्यास के लेखक उपन्यासकार, लेखक, आलोचक, फ़िल्म पटकथा लेखक 
इनाम: पद्म भूषण, फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ पटकथा
शिक्षा: इलाहाबाद विश्वविद्यालय
आंदोलन: नई कहानी

कमलेश्वर बीसवीं शती के सबसे सशक्त लेखकों में से एक हैं। कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फ़िल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। इन्होंने अनेक हिन्दी फ़िल्मों के लिए पटकथाएँ लिखीं तथा भारतीय दूरदर्शन शृंखलाओं के लिए दर्पण, चन्द्रकान्ता, बेताल पच्चीसी, विराट युग आदि लिखे। भारतीय स्वातंत्रता संग्राम पर आधारित पहली प्रामाणिक एवं इतिहासपरक जन-मंचीय मीडिया कथा ‘हिन्दुस्तां हमारा’ का भी लेखन किया।

पूरा नाम 'कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना' का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में 6 जनवरी, 1932 को हुआ था। प्रारम्भिक पढ़ाई के पश्चात् कमलेश्वर ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। कमलेश्वर बहुआयामी रचनाकार थे। उन्होंने सम्पादन क्षेत्र में भी एक प्रतिमान स्थापित किया। ‘नई कहानियों’ के अलावा ‘सारिका’, ‘कथा यात्रा’, ‘गंगा’ आदि पत्रिकाओं का सम्पादन तो किया ही ‘दैनिक भास्कर’ के राजस्थान अलंकरणों के प्रधान सम्पादक भी रहे। कश्मीर एवं अयोध्या आदि पर वृत्त चित्रों तथा दूरदर्शन के लिए ‘बन्द फ़ाइल’ एवं ‘जलता सवाल’ जैसे सामाजिक सरोकारों के वृत्त चित्रों का भी लेखन-निर्देशन और निर्माण किया।

'विहान' जैसी पत्रिका का 1954 में संपादन आरंभ कर कमलेश्वर ने कई पत्रिकाओं का सफल संपादन किया जिनमें 'नई कहानियाँ' (1963-66), 'सारिका' (1967-78), 'कथायात्रा' (1978-79), 'गंगा' (1984-88) आदि प्रमुख हैं। इनके द्वारा संपादित अन्य पत्रिकाएँ हैं- 'इंगित' (1961-63) 'श्रीवर्षा' (1979-80)। हिंदी दैनिक 'दैनिक जागरण'(1990-92) के भी वे संपादक रहे हैं। 'दैनिक भास्कर' से 1997 से वे लगातार जुड़े हैं। इस बीच जैन टीवी के समाचार प्रभाग का कार्य भार संभाला। सन 1980-82 तक कमलेश्वर दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक भी रहे। कमलेश्वर का नाम नई कहानी आंदोलन से जुड़े अगुआ कथाकारों में आता है। उनकी पहली कहानी 1948 में प्रकाशित हो चुकी थी परंतु 'राजा निरबंसिया' (1957) से वे रातों-रात एक बड़े कथाकार बन गए। कमलेश्वर ने तीन सौ से ऊपर कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियों में 'मांस का दरिया,' 'नीली झील', 'तलाश', 'बयान', 'नागमणि', 'अपना एकांत', 'आसक्ति', 'ज़िंदा मुर्दे', 'जॉर्ज पंचम की नाक', 'मुर्दों की दुनिया', 'क़सबे का आदमी' एवं 'स्मारक' आदि उल्लेखनीय हैं।

फ़िल्म और टेलीविजन के लिए लेखन के क्षेत्र में भी कमलेश्वर को काफ़ी सफलता मिली है। उन्होंने सारा आकाश, आँधी, अमानुष और मौसम जैसी फ़िल्मों के अलावा 'मि. नटवरलाल', 'द बर्निंग ट्रेन', 'राम बलराम' जैसी फ़िल्मों सहित 99 हिंदी फ़िल्मों का लेखन किया है। कमलेश्वर भारतीय दूरदर्शन के पहले स्क्रिप्ट लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने टेलीविजन के लिए कई सफल धारावाहिक लिखे हैं जिनमें 'चंद्रकांता', 'युग', 'बेताल पचीसी', 'आकाश गंगा', 'रेत पर लिखे नाम' आदि प्रमुख हैं। भारतीय कथाओं पर आधारित पहला साहित्यिक सीरियल 'दर्पण' भी उन्होंने ही लिखा। दूरदर्शन पर साहित्यिक कार्यक्रम 'पत्रिका' की शुरुआत इन्हीं के द्वारा हुई तथा पहली टेलीफ़िल्म 'पंद्रह अगस्त' के निर्माण का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। तकरीबन सात वर्षों तक दूरदर्शन पर चलने वाले 'परिक्रमा' में सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं पर खुली बहस चलाने की दिशा में साहसिक पहल भी कमलेश्वर जी की थी। वे स्वातंत्र्योत्तर भारत के सर्वाधिक क्रियाशील, विविधतापूर्ण और मेधावी हिंदी लेखक थे

उपन्यासकार के रूप में ‘कितने पाकिस्तान’ ने इन्हें सर्वाधिक ख्याति प्रदान की और इन्हें एक कालजयी साहित्यकार बना दिया। हिन्दी में यह प्रथम उपन्यास है, जिसके अब तक पाँच वर्षों में, 2002 से 2008 तक ग्यारह संस्करण हो चुके हैं। पहला संस्करण छ: महीने के अन्तर्गत समाप्त हो गया था। दूसरा संस्करण पाँच महीने के अन्तर्गत, तीसरा संस्करण चार महीने के अन्तर्गत। इस तरह हर कुछेक महीनों में इसके संस्करण होते रहे और समाप्त होते रहे।

कमलेश्वर को उनकी रचनाधर्मिता के फलस्वरूप पर्याप्त सम्मान एवं पुरस्कार मिले। 2005 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से राष्ट्रपति महोदय ने विभूषित किया। उनकी पुस्तक ‘कितने पाकिस्तान’ पर साहित्य अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया।

27 जनवरी, 2007 को फ़रीदाबाद, हरियाणा में कमलेश्वर का निधन हो गया।

उनकी कहानियाँ

कमलेश्वर ने तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियाँ हैं -

राजा निरबंसिया
मांस का दरिया
नीली झील
तलाश
बयान
नागमणि
अपना एकांत
आसक्ति
ज़िंदा मुर्दे
जॉर्ज पंचम की नाक
मुर्दों की दुनिया
कस्बे का आदमी
स्मारक
नाटक

उन्होंने तीन नाटक लिखे -

अधूरी आवाज़
रेत पर लिखे नाम
हिंदोस्ता हमारा

उपन्यास -

एक सड़क सत्तावन गलियाँ- 1957
तीसरा आदमी- 1976
डाक बंगला -1959
समुद्र में खोया हुआ आदमी-1967
काली आँधी-1974
आगामी अतीत -1976
सुबह...दोपहर...शाम-1982
रेगिस्तान-1988
लौटे हुए मुसाफ़िर-1961
वही बात-1980
एक और चंद्रकांता
कितने पाकिस्तान-2000
 अंतिम सफर
पटकथा एवं संवाद

कमलेश्वर ने ९९ फ़िल्मों के संवाद, कहानी या पटकथा लेखन का काम किया। कुछ प्रसिद्ध फ़िल्मों के नाम हैं-

१. सौतन की बेटी(१९८९)-संवाद
२. लैला(१९८४)- संवाद, पटकथा
३. यह देश (१९८४) -संवाद
४. रंग बिरंगी(१९८३) -कहानी
५. सौतन(१९८३)- संवाद
६. साजन की सहेली(१९८१)- संवाद, पटकथा
७. राम बलराम (१९८०)- संवाद, पटकथा
८. मौसम(१९७५)- कहानी
९. आंधी (१९७५)- उपन्यास
संपादन

अपने जीवनकाल में अलग-अलग समय पर उन्होंने सात पत्रिकाओं का संपादन किया -

विहान-पत्रिका (१९५४)
नई कहानियाँ-पत्रिका (१९५८-६६)
सारिका-पत्रिका (१९६७-७८)
कथायात्रा-पत्रिका (१९७८-७९)
गंगा-पत्रिका(१९८४-८८)
इंगित-पत्रिका (१९६१-६८)
श्रीवर्षा-पत्रिका (१९७९-८०)

भारत भूषण

indo-canadian mudar:
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भारत भूषण

🎂जन्म: 1920;
⚰️मृत्यु: 27 जनवरी, 1992

हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे। अपने अभिनय के रंगों से कालिदास, तानसेन, कबीर और मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे ऐतिहासिक चरित्रों को नया रूप देने वाले अभिनेता रहे।
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में 1920 में जन्मे भारत भूषण गायक बनने का ख्वाब लिए मुंबई की फ़िल्म नगरी में पहुंचे थे, लेकिन जब इस क्षेत्र में उन्हें मौका नहीं मिला तो उन्होंने निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की 1941 में निर्मित फ़िल्म 'चित्रलेखा' में एक छोटी भूमिका से अपने अभिनय की शुरुआत कर दी। 1951 तक अभिनेता के रूप में उनकी ख़ास पहचान नहीं बन पाई। इस दौरान उन्होंने भक्त कबीर (1942), भाईचारा (1943), सुहागरात (1948), उधार (1949), रंगीला राजस्थान (1949), एक थी लड़की (1949), राम दर्शन (1950), किसी की याद (1950), भाई-बहन (1950), आँखेंं (1950), सागर (1951), हमारी शान (1951), आनंदमठ और माँ (1952) फ़िल्मों में काम किया।

बैजू बावरा ने दी नई दिशा

भारत भूषण के अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की क्लासिक फ़िल्म बैजू बावरा से चमका। बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फ़िल्म की गोल्डन जुबली कामयाबी ने न सिर्फ विजय भट्ट के प्रकाश स्टूडियो को ही डूबने से बचाया, बल्कि भारत भूषण और फ़िल्म की नायिका मीना कुमारी को स्टार के रूप में स्थापित कर दिया। आज भी इस फ़िल्म के सदाबहार गीत दर्शकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ओ दुनिया के रखवाले.., मन तड़पत हरि दर्शन को आज.., तू गंगा की मौज में जमुना का धारा.., बचपन की मुहब्बत को.., इंसान बनो कर लो भलाई का कोई काम.., झूले में पवन के आई बहार.., और दूर कोई गाए.. धुन ये सुनाए जैसे फ़िल्म के इन मधुर गीतों की तासीर आज भी बरकरार है। इस फ़िल्म से जुडे़ कई रोचक पहलू हैं। निर्माता विजय भट्ट फ़िल्म के लिए दिलीप कुमार और नर्गिस के नाम पर विचार कर रहे थे, लेकिन संगीतकार नौशाद ने उन्हें अपेक्षाकृत नए अभिनेता-अभिनेत्री को फ़िल्म में लेने पर जोर दिया। इसी फ़िल्म के लिए नौशाद ने तानसेन और बैजू के बीच प्रतियोगिता का गाना शास्त्रीय गायन के धुरंधर उस्ताद आमिर खान और पंडि़त डी.वी. पलुस्कर से गवाया। फ़िल्म की एक और दिलचस्प बात यह थी कि इसके संगीतकार, गीतकार, शकील बदायूंनी और गायक मोहम्मद रफी तीनों ही मुसलमान थे और उन्होंने मिलकर भक्ति गीत 'मन तपड़त हरिदर्शन को आज..' जैसी उत्कृष्ट रचना का सृजन किया था। बैजू बावरा की सफलता से उत्साहित यही टीम एक बार फिर श्री चैतन्य महाप्रभु फ़िल्म के लिए जुड़ी और इसमें सशक्त अभिनय के लिए भारत भूषण को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। कलाकारों, साहित्यकारों, संगीतकारों, भक्तों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को अपने सहज स्वाभाविक अभिनय के रंगों से परदे पर जीवंत करने का भारत भूषण का यह सिलसिला आगे भी जारी रहा।

मिर्ज़ा ग़ालिब में शानदार अदाकारी

भारत भूषण के फ़िल्मी करियर में निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी की फ़िल्म मिर्ज़ा ग़ालिब का अहम स्थान है। इस फ़िल्म में भारत भूषण ने शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के किरदार को इतने सहज और असरदार ढंग से निभाया कि यह गुमां होने लगता है कि ग़ालिब ही परदे पर उतर आए हों। बेहतरीन गीत-संगीत, संवाद और अभिनय से सजी यह फ़िल्म बेहद कामयाब रही और इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ संगीत के राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। इस फ़िल्म के लिए गजलों के बादशाह तलत महमूद की मखमली और गायिका, अभिनेत्री सुरैया की मिठास भरी आवाजों में गाई गई गजलें और गीत 'बेहद मकबूल हुए .., आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक.., फिर मुझे दीदए तर याद आया.., दिले नादां तुझे हुआ क्या है.., मेरे बांके बलम कोतवाल.., कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयां कुछ और भारत भूषण ने लगभग 143 फ़िल्मों में अपने अभिनय की विविधरंगी छटा बिखेरी और अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजकपूर तथा देवानंद जैसे कलाकारों की मौजूदगी में अपना एक अलग मुकाम बनाया।

वर्ष 1967 में प्रदर्शित फ़िल्म 'तकदीर नायक' के रूप में भारत भूषण की अंतिम फ़िल्म थी। इसके बाद वह माहौल और फ़िल्मों के विषय की दिशा बदल जाने पर चरित्र अभिनेता के रूप में काम करने लगे, लेकिन नौबत यहां तक आ गई कि जो निर्माता-निर्देशक पहले उनको लेकर फ़िल्म बनाने के लिए लालायित रहते थे। उन्होंने भी उनसे मुंह मोड़ लिया। इस स्थिति में उन्होंने अपना गुजारा चलाने के लिए फ़िल्मों में छोटी-छोटी मामूली भूमिकाएँ करनी शुरू कर दीं। बाद में हालात ऐसे हो गए कि भारत भूषण को फ़िल्मों में काम मिलना लगभग बंद हो गया। तब मजबूरी में उन्होंने छोटे परदे की तरफ रुख़ किया और दिशा तथा बेचारे गुप्ताजी जैसे धारावाहिकों में अभिनय किया। हालात की मार और वक्त के सितम से बुरी तरह टूट चुके हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णिम युग के इस अभिनेता ने आखिरकार 27 जनवरी 1992 को 72 वर्ष की उम्र में

इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
📽️

चित्रलेखा (1941)
भक्त कबीर (1942)
भाईचारा (1943)
सावन (1945)
सुहाग रात (1948)
रंगीला राजस्थान (1949)
उधार (1949)
थेस (1949)
आंखें (1950)
भाई बहन (1950)
जन्माष्टमी (1950)
किसी की याद (1950)
राम दर्शन (1950)
हमारी शान (1951)
सागर (1951)
बैजू बावरा (1952)
माँ (1952)
आनंद मठ (1952)
पहेली शादी (1953)
दाना पानी (1953)
फरमाइश (1953)
लड़की (1953)
शुक रंभा (1953)
शबाब (1954)
मीनार (1954)
पूजा (1954)
श्री चैतन्य महाप्रभु (1954)
कवि (1954)
धूप छाँव (1954)
औरत तेरी यही कहानी (1954)
मिर्ज़ा ग़ालिब (1954)
अमानत (1955)
बसंत बहार (1956)
साक्षी गोपाल (1957)
मेरा सलाम (1957)
चम्पाकली (1957)
गेटवे ऑफ इंडिया (1957)
रानी रूपमती (1957)
सम्राट चंद्रगुप्त (1958)
फागुन (1958)
सोहनी महिवाल (1958)
सावन (1959)
कल हमारा है (1959)
अंगुलिमाल (1960) अहिंसाक उर्फ ​​अंगुलिमाल के रूप में
बरसात की रात (1960)
घूँघट (1960)
चाँदी की देवर (1960)
ग्यारा हज़ार लड़कियान (1962)
संगीत सम्राट तानसेन (1962)
जहाँ आरा (1964)
दूज का चाँद (1964)
नया कानून (1965)
तक़दीर (1967)
प्यार का मौसम (1969)
विश्वास (1969)
गोमती के किनारे (1972) भारत के रूप में
कहानी किस्मत की (1973) डॉक्टर के रूप में
रंगा ख़ुश (1975)
सोलह शुक्रवार (1977) भोला भगत के रूप में
हीरा और पत्थर (1977) तुलसीराम के रूप में
खून पसीना (1977) काका के रूप में
नवाब साहब (1978)
यूनीस-बीज़ (1980)
खारा खोटा (1981)
याराना (1981)
कमांडर (1981)
उमराव जान (1981) खान साहब (संगीत मास्टर) के रूप में
आदि शंकराचार्य (1983)
नास्तिक (1983) मंदिर के पुजारी के रूप में
जस्टिस चौधरी (1983)
हीरो (1983) जयकिशन के पिता रामू की भूमिका में
ज़ख्मी शेर (1984)
शराबी (1984) मास्टरजी के रूप में
फाँसी के बाद (1985)
मेरा साथी (1985)
मेरा धरम (1986)...बाबा
काला ढांडा गोरे लोग (1986)...महाराज
घर संसार (1986)...रहीम चाचा
हिम्मत और मेहनत (1987)... होटल में ग्राहक (विशेष उपस्थिति)
रामायण टीवी सीरियल (1987) में गोस्वामी तुलसीदास की भूमिका
प्यार का मंदिर (1988)
सोने पे सुहागा (1988)...काशीनाथ
मालामाल (1988) श्री मंगतराम के प्रबंधक के रूप में
अभी तो मैं जवान हूं (1989)
चांदनी (1989) डॉक्टर के रूप में
इलाका (1989) सूटकेस वाले आदमी के रूप में
घराना (1989) राधा के पिता के रूप में
तूफान (1989) हनुमान मंदिर में पुजारी के रूप में
जादूगर (1989) ज्ञानेश्वर के रूप में
जॉन के रूप में बाप नंबरी बेटा दस नंबरी (1990)।
मजबूर (1989 फ़िल्म) जज के रूप में
शेषनाग (1990)
Baaghi (1990) as Asha Father
Pyar Ka Devta (1991) as Doctor
Karz Chukana Hai (1991) as College Principal
Irada (1991)
Prem Qaidi (1991) as Suryanath
Swarg Yahan Narak Yahan (1991) as School Principal
Humshakal (1992) as The Judge
Aakhri Chetawani (1993)

बॉबी दियोल

#27jan

बॉबी दियोल
27 जनवरी 1969 (आयु 54 वर्ष), मुम्बई
पत्नी: तान्या देओल (विवा. 1996)
बच्चे: आर्यमन देओल, धरम देओल
भाई: सनी देओल, एशा देओल, अजीता देओल, विजेता देओल, अहाना देओल
माता-पिता: धर्मेन्द्र, प्रकाश कौर

विजय सिंह देओल, जिन्हें मुख्य रूप से बॉबी देओल के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय फिल्म अभिनेता हैं। ये मशहूर फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र के छोटे बेटे हैं। इनका जन्म 27 जनवरी 1969 को हुआ था। इन्होंने हिन्दी सिनेमा की कई मुख्य फिल्मों में मुख्य भूमिका निभाई है। और अपने फिल्मी करियर की शुरुआत धरम वीर मूवी से की।
देयोल का जन्म विजय सिंह देयोल के रूप में 27 जनवरी 1969 को बंबई में एक पंजाबी परिवार में हुआ था । वह बॉलीवुड स्टार धर्मेंद्र और प्रकाश कौर के दूसरे बेटे हैं । वह सनी देओल के छोटे भाई हैं और उनकी दो बहनें विजयता और अजीता भी हैं जो कैलिफोर्निया में रहती हैं। उनकी सौतेली माँ हेमा मालिनी हैं , जिनसे उनकी दो सौतेली बहनें, अभिनेत्री ईशा देयोल और अहाना देयोल हैं। उनके चचेरे भाई अभय देयोल भी एक अभिनेता हैं। वह करण देयोल और राजवीर देयोल के चाचा हैं 

उन्होंने 1996 में तान्या आहूजा से शादी की; दंपति के दो बेटे हैं। 
📽️
1977 धरम वीर
1995 बरसात 
1997 गुप्त: छिपा हुआ सच 
और प्यार हो गया
1998 करीब
1998सैनिक
1999 दिल्लगी
2000 बादल 
2000हम तो मोहब्बत करेगा 
2000बिच्छू
2001 आशिक
2001अजनबी
2001 क्रांति
200123मार्च1931शहीद
2002हमराज़
2002चोर मचाए शोर
2004किस्मत
2004बरदाश्त
2004 अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों
2005जुर्म अविनाश 
2005टैंगो चार्ली
2005बरसात
2005नालायक
2005दोस्ती: फ्रेंड्स फॉरएवर
2006 हमको तुमसे प्यार है
2007 शाकालाका बूम बूम
2007 झूम राबर झूम
2007 अपने
2007 नकाब
2007 शांति
2007नन्हें जैसलमेर
2008 चमकू
2008 नायको
2008 दोस्ताना
2009 एक: एक की शक्ति
2009 वादा रहा
2010 मदद विक 
2011 यमला पगला दीवाना 2017 पोस्टर बॉयज़
2018यमला पगला दीवाना:
2018 दौड़ 3 
 2019 हाउसफुल 4
2020 '83 की कक्षा
2022 लव हॉस्टल
2024 जानवर

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023

अजीत खान

अजीत
🎂जन्म 27 जनवरी, 1922
जन्म भूमि गोलकुंडा
⚰️मृत्यु 21 अक्टूबर, 1998
मृत्यु स्थान हैदराबाद, आंध्र प्रदेश
अभिभावक पिता- बशीर अली ख़ान
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'कालीचरण', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'जंजीर', 'यादों की बारात', 'समझौता', 'कहानी किस्मत की', 'जुगनू', 'शिकारी', 'हिमालय की गोद में' और 'सूरज', आदि।
प्रसिद्धि अभिनेता (विशेषत: खलनायक)
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्ध संवाद 'सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है', 'लिली डोंट बी सिली' और 'मोना डार्लिंग'।
अन्य जानकारी अजीत ने अपना मनपसंद और कभी भुलाया नहीं जा सकने वाला किरदार निर्माता-निर्देशक सुभाष घई कि फ़िल्म 'कालीचरण' में निभाया। फ़िल्म 'कालीचरण' में उनका निभाया किरदार 'लॉयन' तो उनके नाम का पर्याय ही बन गया था।

परिचय
हामिद अली ख़ान उर्फ अजीत का जन्म 27 जनवरी, सन 1922 को तत्कालीन हैदराबाद रियासत के गोलकुंडा में हुआ था। अजीत को बचपन से ही अभिनय करने का शौक था। उनके पिता बशीर अली ख़ान हैदराबाद में निज़ाम की सेना में काम करते थे। अजीत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा आंध्र प्रदेश के वारांगल ज़िले से पूरी की। चालीस के दशक में उन्होंने नायक बनने के लिए फ़िल्म इंडस्ट्री का रुख़किया और अपने अभिनय जीवन की शुरूआत वर्ष 1946 में प्रदर्शित फ़िल्म 'शाहे मिस्र' से की।

फ़िल्मी कॅरियर
सन 1946 से 1956 तक अजीत फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। 'शाहे मिस्र' के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली, वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने 'पतंगा', 'जिद', 'सरकार', 'सईयां', 'तरंग', 'मोती महल', 'सम्राट' और 'तीरंदाज' जैसी कई फ़िल्मों मे अभिनय किया; लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई। 1950 में फ़िल्म निर्देशक के. अमरनाथ ने उन्हें सलाह दी कि वह अपना फ़िल्मी नाम छोटा कर लें। इसके बाद उन्होंने अपना फ़िल्मी नाम हामिद अली ख़ान की जगह पर अजीत रखा और अमरनाथ के निर्देशन में बनी फ़िल्म 'बेकसूर' में बतौर नायक काम किया।

सन 1957 में बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्म 'नया दौर' में अजीत ग्रामीण युवक की भूमिका में दिखाई दिए। इस फ़िल्म में उनकी भूमिका ग्रे-शेड्स वाली थी। यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेता दिलीप कुमार पर केन्द्रित थी। फिर भी वह दिलीप कुमार जैसे अभिनेता की उपस्थिति में अपने अभिनय की छाप दर्शकों के बीच छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म के बाद अजीत ने यह निश्चय किया कि वह खलनायकी में ही अपने अभिनय का जलवा दिखाएंगे। इसके बाद वह बतौर खलनायक फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करने लगे। 1960 में प्रदर्शित फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' में एक बार फिर से उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत् के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, लेकिन अजीत ने अपनी छोटी सी भूमिका के जरिए दर्शकों की वाह-वाही लूट ली।

सफलता
'जिंदगी और ख्वाब', 'शिकारी', 'हिमालय की गोद में', 'सूरज', 'प्रिंस', 'आदमी और इंसान' जैसी फ़िल्मों से मिली कामयाबी के जरिए अजीत दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसे मुकाम पर पहुंच गए, जहां वह फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। 1973 अजीत के सिने कॅरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। उस वर्ष उनकी 'जंजीर', 'यादों की बारात', 'समझौता', 'कहानी किस्मत की' और 'जुगनू' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुईं, जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद अजीत ने उन ऊंचाइयों को छू लिया, जिसके लिए वह अपने सपनों के शहर मुंबई आए थे।

लोकप्रिय संवाद
अजीत के पसंद के किरदार की बात करें तो उन्होंने सबसे पहले अपना मनपसंद और कभी भुलाया नहीं जा सकने वाला किरदार निर्माता-निर्देशक सुभाष घई की 1976 मे प्रदशित फ़िल्म 'कालीचरण' में निभाया। फ़िल्म 'कालीचरण' में उनका निभाया किरदार 'लॉयन' तो उनके नाम का पर्याय ही बन गया था। फ़िल्म में उनका संवाद सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है आज भी बहुत लोकप्रिय है और गाहे-बगाहे लोग इसे बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा उनके लिली डोंट बी सिली और मोना डार्लिंग जैसे संवाद भी सिने प्रेमियों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुए।

खलनायकी के बादशाह
फ़िल्म 'कालीचरण' की कामयाबी के बाद अजीत के सिने कॅरियर में जबरदस्त बदलाव आया और वह खलनायकी की दुनिया के बेताज बादशाह बन गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने दमदार अभिनय से दर्शकों की वाह-वाही लूटते रहे। खलनायक की प्रतिभा के निखार में नायक की प्रतिभा बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसी कारण अभिनेता धर्मेन्द्र के साथ अजीत के निभाए किरदार अधिक प्रभावी रहे। उन्होंने धमेन्द्र के साथ 'यादों की बारात', 'जुगनू', 'प्रतिज्ञा', 'चरस', 'आजाद', 'राम बलराम', 'रजिया सुल्तान' और 'राजतिलक' जैसी अनेक कामयाब फ़िल्मों में काम किया।

यह बात जग जाहिर है कि जहां फ़िल्मी पर्दे पर खलनायक बहुत क्रूर हुआ करते हैं, वहीं वास्तविक जीवन में बहुत सज्जन होते हैं। निजी जीवन में अत्यंत कोमल हृदय अजीत ने इस बीच 'हम किसी से कम नहीं' (1977), 'कर्मयोगी', 'देस परदेस' (1978), 'राम बलराम', 'चोरनी' (1981), 'खुदा कसम' (1981), 'मंगल पांडेय' (1982), 'रजिया सुल्तान' (1983) और 'राजतिलक' (1984) जैसी कई सफल फ़िल्मों मे अपना एक अलग समां बांधे रखा।

मृत्यु
90 के दशक में अजीत ने स्वास्थ्य खराब रहने के कारण फ़िल्मों में काम करना कुछ कम कर दिया। इस दौरान उन्होंने 'जिगर' (1992), 'शक्तिमान' (1993), 'आदमी' (1993), 'आतिश', 'आ गले लग जा' और 'बेताज बादशाह' (1994) जैसी कई फ़िल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों का मनोरंजन किया। संवाद अदायगी के बेताज बादशाह अजीत ने करीब चार दशक के फ़िल्मी कॅरियर में लगभग 200 फ़िल्मों में अपने अभिनय का जौहर दिखाया और 21 अक्टूबर, 1998 को इस दुनिया से रूखसत हो गए।

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