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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

भीष्म साहनी

#11july 
#08aug 
भीष्म साहनी
🎂जन्म 8 अगस्त 1915
जन्म स्थान रावलपिण्डी, भारत
पिता का नाम  हरबंस लाल साहनी
माता का नाम लक्ष्मी देवी
राष्ट्रीयता भारतीय
धर्म हिन्दू
एक हिंदी लेखक, अभिनेता, शिक्षक, अनुवादक और बहुभाषी थे।
⚰️11 जुलाई 2003
उन्हें हिन्दी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है।

भीष्म साहनी ने कई प्रसिद्ध रचनाएँ की थीं, जिनमें से उनके उपन्यास ‘तमस’ पर वर्ष 1986 में एक फ़िल्म का निर्माण भी किया गया था।

1998 में भारत सरकार ने उन्हे ‘पद्म भूषण’ से नवाजा।
 जीवनी
भीष्म साहनी की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हिन्दी व संस्कृत में हुई। उन्होंने स्कूल में उर्दू व अंग्रेज़ी की शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1937 में ‘गवर्नमेंट कॉलेज’, लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया

इसके बाद उन्होने 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान समय में प्रगतिशील कथाकारों में साहनी जी का प्रमुख स्थान है। भीष्म साहनी हिन्दी और अंग्रेज़ी के अलावा उर्दू, संस्कृत, रूसी और पंजाबी भाषाओं के अच्छे जानकार थे।

करियर
देश के विभाजन से पहले Bhisham Sahniने व्यापार भी किया और इसके साथ ही वे अध्यापन का भी काम करते रहे। तदनन्तर उन्होंने पत्रकारिता एवं ‘इप्टा’ नामक मण्डली में अभिनय का कार्य किया।

साहनी जी फ़िल्म जगत् में भाग्य आजमाने के लिए बम्बई आ गये, जहाँ काम न मिलने के कारण उनको बेकारी का जीवन व्यतीत करना पड़ा।

इसके बाद उन्होंने वापस आकर दोबारा अम्बाला के एक कॉलेज में अध्यापन के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थायी रूप से कार्य किया। इस बीच उन्होंने लगभग 1957 से 1963 तक विदेशी भाषा प्रकाशन गृह मास्को में अनुवादक के रूप में बिताये। यहाँ भीष्म साहनी ने दो दर्जन के क़रीब रशियन भाषायी किताबों, टालस्टॉय, ऑस्ट्रोव्स्की, औतमाटोव की किताबों का हिन्दी में रूपांतर किया।

Bhisham Sahni ने 1965 से 1967 तक “नई कहानियाँ” का सम्पादन किया। साथ ही वे प्रगतिशील लेखक संघ तथा अफ़्रो एशियाई लेखक संघ से सम्बद्ध रहे। वे 1993 से 1997 तक ‘साहित्य अकादमी एक्जिक्यूटिव कमेटी’ के सदस्य भी रहे।

कृतियाँ
कहानी संग्रह
भाग्य रेखा
पहला पाठ
भटकती राख
पटरियाँ
‘वांङ चू’ शोभायात्रा
निशाचर
मेरी प्रिय कहानियाँ
अहं ब्रह्मास्मि
अमृतसर आ गया
चीफ़ की दावत
उपन्यास संग्रह
झरोखे
कड़ियाँ
तमस
बसन्ती
मायादास की माड़ी
कुन्तो
नीलू निलीमा निलोफर
नाटक संग्रह
हानूस
कबिरा खड़ा बाज़ार में
माधवी
गुलेल का खेल (बालोपयोगी कहानियाँ)।
मुआवज़े
अन्य प्रकाशन
पहला पथ
भटकती राख
पटरियाँ
शोभायात्रा
पाली
दया
कडियाँ
आज के अतीत
यशपाल तथा प्रेमचंद का प्रभाव
एक कथाकार के रूप में भीष्म साहनी पर यशपाल और प्रेमचंद की गहरी छाप है। उनकी कहानियों में अन्तर्विरोधों व जीवन के द्वन्द्वों, विसंगतियों से जकड़े मध्य वर्ग के साथ ही निम्न वर्ग की जिजीविषा और संघर्षशीलता को उद्घाटित किया गया है। जनवादी कथा आन्दोलन के दौरान भीष्म साहनी ने सामान्य जन की आशा, आकांक्षा, दु:ख, पीड़ा, अभाव, संघर्ष तथा विडम्बनाओं को अपने उपन्यासों से ओझल नहीं होने दिया।

नई कहानी में उन्होंने कथा साहित्य की जड़ता को तोड़कर उसे ठोस सामाजिक आधार दिया। एक भोक्ता की हैसियत से भीष्म जी ने देश के विभाजन के दुर्भाग्यपूर्ण खूनी इतिहास को भोगा है, जिसकी अभिव्यक्ति ‘तमस’ में हम बराबर देखते हैं। जहाँ तक नारी मुक्ति की समस्या का प्रश्न है, उन्होंने अपनी रचनाओं में नारी के व्यक्तित्व विकास, स्वातन्त्र्य, एकाधिकार, आर्थिक स्वतन्त्रता, स्त्री शिक्षा तथा सामाजिक उत्तरदायित्व आदि उसकी ‘सम्मानजनक स्थिति’ का समर्थन किया है। एक तरह से देखा जाए तो साहनी जी प्रेमचंद के पदचिन्हों पर चलते हुए उनसे भी कहीं आगे निकल गए हैं।

उनकी रचनाओं में सामाजिक अन्तर्विरोध पूरी तरह उभरकर आया है। राजनैतिक मतवाद अथवा दलीयता के आरोप से दूर भीष्म साहनी ने भारतीय राजनीति में निरन्तर बढ़ते भ्रष्टाचार, नेताओं की पाखण्डी प्रवृत्ति, चुनावों की भ्रष्ट प्रणाली, राजनीति में धार्मिक भावना, साम्प्रदायिकता, जातिवाद का दुरुपयोग, भाई-भतीजावाद, नैतिक मूल्यों का ह्रास, व्यापक स्तर पर आचरण भ्रष्टता, शोषण की षड़यन्त्रकारी प्रवृत्तियों व राजनैतिक आदर्शों के खोखलेपन आदि का चित्रण बड़ी प्रामाणिकता व तटस्थता के साथ किया है।

उनका सामाजिक बोध व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित था। उनके उपन्यासों में शोषणहीन, समतामूलक प्रगतिशील समाज की रचना, पारिवारिक स्तर, रूढ़ियों का विरोध तथा संयुक्त परिवार के पारस्परिक विघटन की स्थितियों के प्रति असन्तोष व्यक्त हुआ है।

पुरस्कार – भीष्म साहनी की जीवनी
भीष्म साहनी को उनकी “तमस” नामक कृति पर ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ (1975) से सम्मानित किया गया था।
उन्हें ‘शिरोमणि लेखक सम्मान’ (पंजाब सरकार) (1975)
‘लोटस पुरस्कार’ (अफ्रो-एशियन राइटर्स असोसिएशन की ओर से 1970)
‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ (1983)
1998 में भारत सरकार ने उन्हे पद्म भूषण से नवाजा।
शलाका सम्मान, नयी दिल्ली, 1999
मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, मध्य प्रदेश, 2000-01
संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, 2001
सर्वोत्तम हिंदी उपन्यासकार के लिए सर सैयद नेशनल अवार्ड, 2002
2002 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप से सम्मानित किया गया।
2004 में राशी बन्नी द्वारा किये गये नाटक के लिए इंटरनेशनल थिएटर फेस्टिवल, रशिया में उन्हें कॉलर ऑफ़ नेशन अवार्ड से सम्मानित किया गया।
31 मई 2017 को भारतीय डाक ने भीष्म साहनी के सम्मान में उनके नाम का एक पोस्टेज स्टेम्प भी जारी किया है।
मृत्यु
भीष्म साहनी की मृत्यु 11 जुलाई  2003 को दिल्ली में हुई थी।

सोमवार, 7 अगस्त 2023

अनुपम शाम अहूजा

अनुपम श्याम ओझा
🎂जन्म 20 सितम्बर, 1957
जन्म भूमि ज़िला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
⚰️मृत्यु 8 अगस्त, 2021
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय सिनेमा
मुख्य फ़िल्में दस्तक, दुश्मन, सत्या, दिल से, जख्म, संघर्ष, लगान, नायक, शक्ति, वॉन्टेड तथा मुन्ना माइकल आदि।
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अनुपम श्याम ने ‘शक्ति’, ‘हल्ला बोल’ और ‘रक्तचरित’ जैसी चर्चित फिल्में भी कीं। हल्ला बोल में उनके सह अभिनेताओं में प्रसिद्ध अभिनेता पंकज कपूर शामिल थे।
भारतीय फिल्म व टीवी कलाकार थे, जो कि मुख्य तौर से हिंदी सिनेमा और टीवी जगत में सक्रिय रहे। अनुपम श्याम ने वैसे तो कई फ़िल्मों और टीवी धारावाहिकों में अभिनय किया, लेकिन उन्हें असली सफलता मिली साल 2009 में आए टीवी सीरियल ‘मन की आवाज प्रतिज्ञा’ से। इस सीरियल में अनुपम श्याम ने ठाकुर सज्जन सिंह का किरदार निभाया था। यह टीवी सीरियल लोगों को खूब पसंद आया और खासकर अनुपम श्याम का किरदार। इसके बाद वह घर-घर में पहचाने जाने लगे थे।
अनुपम श्याम ओझा का जन्म 20 सितंबर 1957 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा प्रतापगढ़ से ही प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने अवध विश्वविद्यालय से कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। साथ ही उन्होंने भारतेन्दु नाट्य अकादमी से थियेटर की शिक्षा भी हासिल की। अनुपम श्याम ओझा के बॉलीवुड के पसंदीदा अभिनेता राज कपूर, दिलीप कुमार, नसीरुद्दीन शाह, बलराज साहनी और इरफ़ान ख़ान थे जबकि उनकी सबसे पसंदीदा फिल्म हाल के वर्षों में रिलीज हुई इरफ़ान ख़ान की ‘पान सिंह तोमर’ थी।

अनुपम श्याम जी की पत्नी का नाम सावित्री श्याम ओझा है। अनुपम जी और सावित्री की शादी तभी हो गई थी, जब अनुपम श्याम ने अभिनय की दुनिया में कदम भी नहीं रखा था। बहुत कम लोग जानते हैं कि अनुपम श्याम ओझा के माता-पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन वह बचपन से ही एक्टिंग करना चाहते थे और आगे जाकर उन्होंने अभिनय की दुनिया में ही काम किया।
थियेटर की शिक्षा लेने के बाद अनुपम श्याम श्रीराम सेन्टर रंगमंडल में काम करने लगे। कुछ दिन वहां काम करने के बाद एक्टर बनने का सपना लिए वह माया नगरी मुंबई आ गए। अनुपम श्याम ने सबसे पहले ‘लिटिल बुद्धा’ नाम की अंतर्राष्ट्रीय फिल्म से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्हें शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में काम करने का मौका मिला। अनुपम श्याम को फिल्मों में ज्यादातर गुंडे और बदमाशों का किरदार ही मिला। उन्होंने अपने करियर में दस्तक, हजार चौरासी की मां, दुश्मन, सत्या, दिल से, जख्म, संघर्ष, लगान, नायक, शक्ति, पाप, जिज्ञासा, राज, वेलडन, अब्बा, वॉन्टेड, कजरारे और मुन्ना माइकल जैसी कई फिल्मों में काम किया।

ठाकुर सज्जन सिंह

अनुपम श्याम को असली सफलता मिली साल 2009 में आए टीवी सीरियल ‘मन की आवाज प्रतिज्ञा’ से। इस सीरियल में अनुपम श्याम ने ठाकुर सज्जन सिंह का किरदार निभाया था। यह टीवी सीरियल लोगों को खूब पसंद आया और खासकर अनुपम श्याम का किरदार। इस धारावाहिक में भले ही अनुपम श्याम ने नेगेटिव किरदार निभाया था, लेकिन लोगों ने उनके किरदार को इतना प्यार दिया कि अनुपम श्याम का दूसरा नाम ठाकुर सज्जन सिंह ही पड़ गया था। अनुपम श्याम ने अपने करियर में प्रतिज्ञा के आलावा ‘कृष्णा चली लंदन’, ‘शपथ’ और ‘डोली अरमानों की’ सहित कई टीवी सीरियल में काम किया।

मृत्यु
8 अगस्त 2021 को किडनी की बीमारी से जूझ रहे अनुपम श्याम का निधन हो गया। उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...