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बुधवार, 21 फ़रवरी 2024

नूतन

#21feb
#04jun
नूतन
पूरा नाम नूतन समर्थ बहल
प्रसिद्ध नाम नूतन

🎂जन्म 04 जून, 1936
जन्म भूमि बम्बई (अब मुम्बई)
⚰️मृत्यु 21 फ़रवरी, 1991
मृत्यु स्थान भारत

अभिभावक श्री कुमारसेन समर्थ और श्रीमती शोभना समर्थ
कर्म भूमि भारत
मुख्य फ़िल्में सुजाता, बंदिनी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, सीमा, सरस्वती चंद्र, मिलन आदि।
पुरस्कार-उपाधि पद्म श्री, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्मफेयर पुरस्कार (पाँच बार)
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी फ़िल्म 'कर्मा' में नूतन ने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के साथ काम किया। इस फ़िल्म में नूतन पर फ़िल्माया यह गाना दिल दिया है जाँ भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए.. श्रोताओं के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ।
नूतन  सिनेमा की सबसे प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में से एक रही हैं। भारतीय सिनेमा जगत में नूतन को एक ऐसी अभिनेत्री के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने फ़िल्मों में अभिनेत्रियों के महज शोपीस के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की परंपरागत विचार धारा को बदलकर उन्हें अलग पहचान दिलाई। सुजाता, बंदिनी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, सीमा, सरस्वती चंद्र, और मिलन जैसी कई फ़िल्मों में अपने उत्कृष्ट अभिनय से नूतन ने यह साबित किया कि नायिकाओं में भी अभिनय क्षमता है और अपने अभिनय की बदौलत वे दर्शकों को सिनेमा हॉल तक लाने में सक्षम हैं।

इनकी माता का नाम श्रीमती शोभना समर्थ और पिता का नाम श्री कुमारसेन समर्थ था। घर में फ़िल्मी माहौल रहने के कारण नूतन अक्सर अपनी माँ के साथ शूटिंग देखने जाया करती थी। इस वजह से उनका भी रुझान फ़िल्मों की ओर हो गया और वह भी अभिनेत्री बनने के ख्वाब देखने लगी।

सिने कैरियर की शुरूआत
नूतन ने बतौर बाल कलाकार फ़िल्म 'नल दमयंती' से अपने सिने कैरियर की शुरूआत की। इस बीच नूतन ने अखिल भारतीय सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लिया जिसमें वह प्रथम चुनी गई लेकिन बॉलीवुड के किसी निर्माता का ध्यान उनकी ओर नहीं गया। बाद में अपनी माँ और उनके मित्र मोतीलाल की सिफारिश की वजह से नूतन को वर्ष 1950 में प्रदर्शित फ़िल्म 'हमारी बेटी' में अभिनय करने का मौका मिला। इस फ़िल्म का निर्देशन उनकी माँ शोभना समर्थ ने किया। इसके बाद नूतन ने 'हमलोग', 'शीशम', 'नगीना' और 'शवाब' जैसी कुछ फ़िल्मों में अभिनय किया लेकिन इन फ़िल्मों से वह कुछ ख़ास पहचान नहीं बना सकी।

'सीमा' से मिली पहचान
वर्ष 1955 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सीमा' से नूतन ने विद्रोहिणी नायिका के सशक्त किरदार को रूपहले पर्दे पर साकार किया। इस फ़िल्म में नूतन ने सुधार गृह में बंद कैदी की भूमिका निभायी जो चोरी के झूठे इल्जाम में जेल में अपने दिन काट रही थी। फ़िल्म 'सीमा' में बलराज साहनी सुधार गृह के अधिकारी की भूमिका में थे। बलराज साहनी जैसे दिग्गज कलाकार की उपस्थित में भी नूतन ने अपने सशक्त अभिनय से उन्हें कड़ी टक्कर दी। इसके साथ ही फ़िल्म में अपने दमदार अभिनय के लिये नूतन को अपने सिने कैरियर का सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म अभिनेत्री का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

बहुआयामी प्रतिभा
नूतन ने देवानंद के साथ 'पेइंग गेस्ट' और 'तेरे घर के सामने' में नूतन ने हल्के-फुल्के रोल कर अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया। वर्ष 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म सोने की चिडि़या के हिट होने के बाद फ़िल्म इंडस्ट्री में नूतन के नाम के डंके बजने लगे और बाद में एक के बाद एक कठिन भूमिकाओं को निभाकर वह फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गई। वर्ष 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दिल्ली का ठग' में नूतन ने स्विमिंग कॉस्टयूम पहनकर उस समय के समाज को चौंका दिया। फ़िल्म बारिश में नूतन काफ़ी बोल्ड दृश्य दिए जिसके लिए उनकी काफ़ी आलोचना भी हुई लेकिन बाद में विमल राय की फ़िल्म 'सुजाता' एवं 'बंदिनी' में नूतन ने अत्यंत मर्मस्पर्शी अभिनय कर अपनी बोल्ड अभिनेत्री की छवि को बदल दिया। सुजाता, बंदिनी और दिल ने फिर याद किया जैसी फ़िल्मों की कामयाबी के बाद नूतन ट्रेजडी क्वीन कही जाने लगी। अब उनपर यह आरोप लगने लगा कि वह केवल दर्द भरे अभिनय कर सकती हैं लेकिन छलिया और सूरत जैसी फ़िल्मों में अपने कॉमिक अभिनय कर नूतन ने अपने आलोचकों का मुंह एक बार फिर से बंद कर दिया। वर्ष 1965 से 1969 तक नूतन ने दक्षिण भारत के निर्माताओं की फ़िल्मों के लिए काम किया। इसमें ज्यादातर सामाजिक और पारिवारिक फ़िल्में थी। इनमें गौरी, मेहरबान, खानदान, मिलन और भाई बहन जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल है।

फ़िल्म 'सुजाता' और 'बंदिनी'
विमल राय की फ़िल्म 'सुजाता' एवं 'बंदिनी' नूतन की यादगार फ़िल्में रही। वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म सुजाता नूतन के सिने कैरियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई। फ़िल्म में नूतन ने अछूत कन्या के किरदार को रूपहले पर्दे पर साकार किया1 इसके साथ ही फ़िल्म में अपने दमदार अभिनय के लिये वह अपने सिने कैरियर में दूसरी बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गई। वर्ष 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म 'बंदिनी 'भारतीय सिनेमा जगत् में अपनी संपूर्णता के लिए सदा याद की जाएगी। फ़िल्म में नूतन के अभिनय को देखकर ऐसा लगा कि केवल उनका चेहरा ही नहीं बल्कि हाथ पैर की उंगलियां भी अभिनय कर सकती है। इस फ़िल्म में अपने जीवंत अभिनय के लिये नूतन को एक बार फिर से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। इस फ़िल्म से जुड़ा एक रोचक पहलू यह भी है फ़िल्म के निर्माण के पहले फ़िल्म अभिनेता अशोक कुमार की निर्माता विमल राय से अनबन हो गई थी और वह किसी भी कीमत पर उनके साथ काम नहीं करना चाहते थे लेकिन वह नूतन ही थी जो हर कीमत में अशोक कुमार को अपना नायक बनाना चाहती थी। नूतन के जोर देने पर अशोक कुमार ने फ़िल्म 'बंदिनी' में काम करना स्वीकार किया था।

नूतन और उनके नायक
नूतन ने अपने सिने कैरियर में उस दौर के सभी दिग्गज और नवोदित अभिनेताओं के साथ अभिनय किया। राजकपूर के साथ फ़िल्म 'अनाड़ी' में भोला-भाला प्यार हो या फिर अशोक कुमार के साथ फ़िल्म 'बंदिनी' में संजीदा अभिनय या फिर पेइंग गेस्ट में देवानंद के साथ छैल छबीला रोमांस हो नूतन हर अभिनेता के साथ उसी के रंग में रंग जाती थी। वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सरस्वती चंद्र' की अपार सफलता के बाद नूतन फ़िल्म इंडस्ट्री की नंबर वन नायिका के रूप मे स्थापित हो गई। वर्ष 1973 में फ़िल्म 'सौदागार' में अमिताभ बच्चन जैसे नवोदित अभिनेता के साथ काम करके नूतन ने एक बार फिर से अपना अविस्मरणीय अभिनय किया। अस्सी के दशक में नूतन ने चरित्र भूमिकाएँ निभानी शुरू कर दी और कई फ़िल्मों में माँ के किरदार को रुपहले पर्दे पर साकार किया। इन फ़िल्मों में 'मेरी जंग', 'नाम' और 'कर्मा' जैसी ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है। फ़िल्म 'मेरी जंग' के लिए अपने सशक्त अभिनय के लिए नूतन सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित की गई। फ़िल्म 'कर्मा' में नूतन ने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के साथ काम किया। इस फ़िल्म में नूतन पर फ़िल्माया यह गाना दिल दिया है जाँ भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए.. श्रोताओं के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ।

सम्मान और पुरस्कार
नूतन की प्रतिभा केवल अभिनय तक ही नहीं सीमित थी वह गीत और ग़ज़ल लिखने में भी काफ़ी दिलचस्पी लिया करती थीं। हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में बतौर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री सर्वाधिक फ़िल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त करने का कीर्तिमान नूतन के नाम दर्ज है। नूतन को अपने सिने कैरियर में पांच बार (सुजाता, बंदिनी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, सीमा, मिलन) फ़िल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नूतन को वर्ष 1974 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
नूतन पहली मिस इंडिया थी जिन्होंने फिल्मों में काम किया. ब्लैक एंड वाइट के दौर में नूतन ने ब्लैक बिकिनी पहनकर तहलका मचाया था.
निधन
लगभग चार दशक तक अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों के बीच ख़ास पहचान बनाने वाली यह महान् अभिनेत्री 21 फ़रवरी, 1991 को इस दुनिया से अलविदा कह गई।

बुधवार, 10 जनवरी 2024

बासु चटर्जी

#04jun
#10jan 
प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक पटकथा लेखक बासु चटर्जी 

🎂10 जनवरी 1927
⚰️04 जून 2020

बासु चटर्जी (1930-2020)हिन्दी फ़िल्मों के निर्देशक एवं पटकथा लेखक थे
1970 और 1980 के दशक के दौरान, वह मध्यम सिनेमा नाम से जाने जाने वाले सिनेमाकाल से जुड़े हुए थे, जहाँ वे हृषिकेश मुखर्जी और बासु भट्टाचार्य जैसे फिल्म निर्माता थे, जिनकी उन्होंने तीसरी कसम (1966) में सहायता भी की थी। उनकी फिल्मों की तरह, चटर्जी की फिल्में भी मध्यवर्गीय परिवारों की हल्की-फुल्की कहानियों के साथ अक्सर शहरी पृष्ठभूमि में होती हैं, जिसमें फ़िल्म की पटकथा वैवाहिक और प्रेम संबंधों पर केंद्रित रहती थी एक रुका हुआ फैसला (1986) और कमला की मौत (1989) जैसे अपवादों के साथ, जहां पटकथा सामाजिक और नैतिक मुद्दों में केन्द्रित थी। उन्हें उनकी फ़िल्मों उस पार, छोटी सी बात (1975), चितचोर (1976), रजनीगंधा (1974), पिया का घर (1972), खट्टा मीठा, चक्रव्यूह (1978 फ़िल्म), बातों बातों में (1979), प्रियतमा (1977), मन पसंद, हमारी बहू अलका, शौकीन (1982)और चमेली की शादी (1986 फ़िल्म) के लिए जाना जाता है।चमेली की शादी उनकी अंतिम व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म थी
उन्होंने बांग्लादेशी फिल्म एक कप चा के लिए पटकथा लिखी, जिसका निर्देशन नईमूल इम्तियाज नेमुल ने किया था।

बासु चटर्जी का जन्म 10 जनवरी 1927 को अजमेर, राजस्थान, भारत में हुआ था।

1950 के दशक में, चटर्जी बॉम्बे (अब मुंबई) पहुंचे और रज़ी करंजिया द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक टैब्लॉइड ब्लिट्ज़ के लिए एक इलस्ट्रेटर और कार्टूनिस्ट के रूप में अपना कैरियर शुरू किया।  उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में आने से पहले 18 साल तक वहां काम किया उन्होंने राज कपूर और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म तेरी कसम (1966) में बासु भट्टाचार्य की सहायता की, जिसने बाद में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता आखिरकार, उन्होंने 1969 में फ़िल्म सारा आकाश के साथ अपने निर्देशन की शुरुआत की, जिसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ पटकथा का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिलाया

उनकी कुछ यादगार फिल्में हैं सारा आकाश (1969), पिया का घर (1971), उस पार (1974), रजनीगंधा (1974), छोटे सी बात (1975), चितचोर (1976), स्वामी (1977), खट्टा  मीठा, प्रियतम, चक्रव्यूह (1978 फिल्म), जीना यहां (1979), बातों बातों में (1979), अपने पराये (1980), शौकीन और एक रूका हुआ फैसला

अन्य फिल्मों में रत्नदीप, सफद झूठ मन पसंद, हमारी बहू अलका, कमला की मौत और त्रियाचरित्र शामिल हैं।

उन्होंने कई बंगाली फिल्मों जैसे हॉटहाट ब्रिश्ती, होचेता की और गरमाहट शी दीन का निर्देशन भी किया है।

चटर्जी ने दूरदर्शन के लिए टेलीविजन श्रृंखला ब्योमकेश बख्शी और रजनी का निर्देशन किया।  वह 1977  में 10 वें मास्को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में निर्णायक मंडल के सदस्य और एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन के इंटरनेशनल फिल्म एंड टेलीविजन क्लब के सदस्य थे।  चटर्जी के काम का एक भूतल 2011 के फरवरी में कला घोड़ा कला महोत्सव मुंबई में आयोजित किया गया था।

नामांकन और पुरस्कार

2007: आइफा लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार
1992: परिवार कल्याण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार - दुर्गा
1991: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार - कमला की मौत
1980: सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स पुरस्कार - जीना यहाँ
1978: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार - स्वामी
1977: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार - चितचोर नामांकित
1976: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार - छोटी सी बात
1975: सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स पुरस्कार - रजनीगंधा
1972: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार - सारा आकाश

प्रमुख फिल्में 

बतौर निर्देशक 

2006 प्रतीक्षा 
1997 गुदगुदी 
1994 त्रियाचरित्र 
1989 कमला की मौत 
1987 ज़ेवर 
1986 भीम भवानी 
1986 किरायदार 
1986 चमेली की शादी 
1986 शीशा 
1984 लाखों की बात 
1983 पसन्द अपनी अपनी 
1982 हमारी बहू अलका 
1981 शौकीन 
1980 अपने पराये 
1980 मन पसन्द 
1979 जीना यहाँ 
1979 मंज़िल 
1979 दो लड़्के दो कड़्के 
1979 रत्नदीप 
1979 बातों बातों में 
1979 प्रेम विवाह 
1978 तुम्हारे लिये 
1978 खट्टा मीठा 
1978 दिल्लगी 
1977 सफेद झूठ 
1977 प्रियतमा 
1977 स्वामी 
1976 चितचोर 
1975 छोटी सी बात 
1974 रजनीगंधा 
1974 उस पार 
1972 पिया का घर 

निधन

चटर्जी का निधन 4 जून 2020 को मुंबई में उनके घर पर उम्र से संबंधित बीमारी के कारण हुआ था। वह 93 वर्ष के थे।

रविवार, 4 जून 2023

बासु चटर्जी

बासु चटर्जी

🎂10 जनवरी 1927
04 जून 2020
हिन्दी फ़िल्मों के एक निर्देशक और पटकथा लेखक थे।
बासु चटर्जी का जन्म अजमेर, राजस्थान, भारत में हुआ था।
1970 और 1980 के दशक के दौरान, वह मध्यम सिनेमा नाम से जाने जाने वाले सिनेमाकाल से जुड़े हुए थे, जहाँ वे हृषिकेश मुखर्जी और बासु भट्टाचार्य जैसे फिल्म निर्माता थे, जिनकी उन्होंने तीसरी कसम (1966) में सहायता भी की थी। उनकी फिल्मों की तरह, चटर्जी की फिल्में भी मध्यवर्गीय परिवारों की हल्की-फुल्की कहानियों के साथ अक्सर शहरी पृष्ठभूमि में होती हैं, जिसमें फ़िल्म की पटकथा वैवाहिक और प्रेम संबंधों पर केंद्रित रहती थी,एक रुका हुआ फैसला (1986) और कमला की मौत (1989) जैसे अपवादों के साथ, जहां पटकथा सामाजिक और नैतिक मुद्दों में केन्द्रित थी। उन्हें उनकी फ़िल्मों उस पार, छोटी सी बात (1975), चितचोर (1976), रजनीगंधा (1974), पिया का घर (1972), खट्टा मीठा, चक्रव्यूह (1978 फ़िल्म), बातों बातों में (1979), प्रियतमा (1977), मन पसंद, हमारी बहू अलका, शौकीन (1982),और चमेली की शादी के लिए जाना जाता है।चमेली की शादी उनकी अंतिम व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म थी।

उन्होंने बांग्लादेशी फिल्म एक कप चा के लिए पटकथा लिखी, जिसका निर्देशन नई इम्तियाज नेमुल ने किया था।

04 जून 2020 को बिमारी के कारण उनका निधन हो गया।

पुरुस्कार

2007: आइफा लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार
1992: परिवार कल्याण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार - दुर्गा
1991: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार - कमला की मौत
1980: सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स पुरस्कार - जीना यहाँ
1978: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार - स्वामी
1977: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार - चितचोर नामांकित
1976: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार - छोटी सी बात
1975: सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स पुरस्कार - रजनीगंधा
1972: फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पटकथा पुरस्कार - सारा आकाश

बतौर निर्देशक

वर्ष फ़िल्म टिप्पणी
2006 प्रतीक्षा
1997 गुदगुदी
1994 त्रियाचरित्र
1989 कमला की मौत
1987 ज़ेवर
1986 भीम भवानी
1986 किरायदार
1986 चमेली की शादी
1986 शीशा
1984 लाखों की बात
1983 पसन्द अपनी अपनी
1982 हमारी बहू अलका
1981 शौकीन
1980 अपने पराये
1980 मन पसन्द
1979 जीना यहाँ
1979 मंज़िल
1979 दो लड़्के दो कड़्के
1979 रत्नदीप
1979 बातों बातों में
1979 प्रेम विवाह
1978 तुम्हारे लिये
1978 खट्टा मीठा
1978 दिल्लगी
1977 सफेद झूठ
1977 प्रियतमा
1977 स्वामी
1976 चितचोर
1975 छोटी सी बात


1974 रजनीगंधा
1974 उस पार
1972 पिया का घर 



सुलभा देशपांडे

अभिनेत्री सुलभा देशपांडे के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

🎂 जन्म-21 फरवरी 1937; 
⚰️मृत्यु- 4 जून, 2016

भारतीय अभिनेत्री थीं। विजय तेंदुलकर जैसे प्रख्यात नाट्य लेखकों द्वारा लिखे नाटकों में अभियन करने वाली सुलभा देशपांडे ने कई मराठी और हिन्दी फिल्मों तथा टीवी सीरियलों में काम किया था। उन्होंने मराठी और हिंदी रंगमंच के अलावा मराठी और हिंदी की कई फिल्मों में काम किया। इनमें 'तमन्ना', 'विरासत', 'याराना', 'खून भरी मांग' और 'इंग्लिश विंग्लिश' जैसी कई सफल फिल्मों के नाम शामिल हैं।
सुलभा देशपांडे का जन्म 21 फरवरी सन 1937 में मुम्बई, महाराष्ट्र में हुआ था।
हिन्दी सिनेमा में उन्होंने 'भूमिका' (1977), अरविन्द देसाई की 'अजीब दास्तान' (1978)', 'गमन' (1978) में यादगार भूमिकाएं निभाई।
हाल के दिनों में वे गौरी शिन्दे निर्देशित फिल्म 'इंग्लिश विंग्लिश' में नजर आई थीं।
विजय तेंदुलकर, विजया मेहता और सत्यदेव दुबे के साथ प्रतिष्ठित मराठी थिएटर ग्रुप 'रंगायन' से भी सुलभा देशपांडे जुड़ी रहीं।
उन्होंने अपने पति अरविन्द देशपांडे के साथ 1971 में थिएटर ग्रुप 'आविष्कार' का गठन किया था। उनके पति का 1987 में देहांत हो चुका था।
थिएटर ग्रुप 'आविष्कार' ख़ास तौर से छोटे बच्चों के लिए संगीतमय नाटक बनाने और उन्हें सिखाने का काम करतीं थीं।
उन्हें वर्ष 1987 में हिंदी-मराठी थियेटर में अभिनय के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

फ़िल्म अभिनेत्री निर्मात्री,निर्देशिका नीना गुप्ता

फ़िल्म अभिनेत्री निर्मात्री,निर्देशिका नीना गुप्ता के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

नीना गुप्ता हिंदी सिनेमा जगत  की एक सफल अभिनेत्री, टीवी कलाकार और फिल्म निर्देशक और निर्माता है।
नीना गुप्ता का जन्म 4 जून 1959 दिल्ली में हुआ था। उनके पिता का नाम आर एन गुप्ता है। नीना गुप्ता ने अपनी आरम्भिक पढ़ाई सनावर लौरेंस स्कूल में शिक्षा ग्रहण की।  

नीना गुप्ता  वेस्ट इण्डीज के प्रसिद्द क्रिकेट खिलाडी विवियन रिचर्ड्स से सम्बन्ध थे, जिससे उन्हें एक बेटी भी है, जिसका नाम है मसाबा गुप्ता। वर्तमान में मसाबा गुप्ता जानी-मानी फैशन डिजायनर है। एक लम्बे अन्तराल के बाद नीना ने वर्ष2008 मे पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट विवेक मेहरा से शादी कर ली।

नीना गुप्ता को टीवी की दुनिया में  सबसे बड़ा ब्रेक वर्ष 1985 में टीवी शो "खानदान" से मिला था, जिसके बाद उन्होंने यात्रा(1986) गुलजार मिर्जा साहिब ग़ालिब(1987), टीवी मिनी सीरिज आदि की।  इसके अलावा उन्होंने दर्द (1994 डीडी मेट्रो), गुमराह (1 995 डीडी मेट्रो), सांस (स्टार प्लस), सात फेरे:सलोनी का सफार (2005),चिट्ठी(2003), मेरी बिवी का जवाब नहीं (2004), और कितनी मोहब्बत है (2009) में काम किया।  इसकेअलावा वह जस्सी जैसा कोई नहीं में भी नजर आयीं, इस शो में उनके किरदार को लोगो द्वारा काफी पसंद किया गया था। 

नीना ने अपने हिंदी फिल्मी करियर की शुरुआत वर्ष 1982 में फिल्म 'ये नजदीकियां' से की थी, इसके बाद वह कई अन्य हिंदी फिल्मों में नजर आयीं , जिनमे साथ-साथ ,जाने भी दो यारों, मंडी, त्रिकाल आदि शामिल हैं। इसके अलावा वह हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध गाने "चोली के पीछे क्या है"  के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने टेलीफिल्म्स लाजवंती और बाज़ार सीताराम (1993) निर्मित की हैं, जिसमे उन्हेंबेस्ट फर्स्ट गैर फीचर फिल्म के लिए 1993 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
नीना गुप्ता ने कई अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में काम किया है, जिनमे से गांधी(1982) हैं, इसमें उन्होंने महात्मा गांधी की भतीजी का किरदार निभाया था, इसके अलावा वह मर्चेंट आइवरी फिल्म द डीसीवर (1988), मिर्जा गालिब (1989) इन कस्टडी (1993), और कॉटन मैरी (1999) भी शामिल है।

एक गुमनाम कम जाने पहचाने गायक, अभिनेता कृष्णा गोयल

🎂जन्म 29 सितंबर 1927
⚰️4 जून, 2010
एक गुमनाम कम जाने पहचाने गायक, अभिनेता कृष्णा गोयल के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

आज एक अनजाने गुमनाम से गायक अभिनेता के बारे में जानकारी शेयर करना चाहता हूँ जिनके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नही है न ही उनकी कोई फ़ोटो उपलब्ध है उस गायक अभिनेता का नाम है कृष्णा गोयल

गायक कृष्ण गोयल का जन्म 29 सितंबर 1927 को हुआ था, और उन्होंने 4 जून, 2010 को इस दुनिया को छोड़ दिया। छह साल की उम्र में, उन्होंने जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह जी के दरबार में गाना शुरू किया, और राजकुमार करण सिंह के दोस्त थे  
बाद के वर्षों के दौरान, वह जगजीत सिंह के संगीत कार्यक्रमों में उनके साथ भी जाते थे।

कृष्ण गोयल ने बहुत कम गाने गाए हैं, और उनमें से ज्यादातर का पता लगाना काफी मुश्किल है।

उन्होंने 1945 में कृष्ण सुदामा,1948 में रईस,1950 में दहेज़,1951 में काले बादल,1952 में लंका दहन,1953 में धुआं,1956 में पासिंग शो, मालिक,खुल खुल जा सिम सिम,1957 में नाग पद्मिनी जैसी कुल 11 फिल्मों में  लगभग 20 गाने गाये

इंसान जो रोता है गीत


इंसान जो रोटा है तो रोटा ही रहेगा
भगवान तो आकाश
पे सोता ही रहेगा भगवान तो आकाश पे सोता ही रहेगा सोता
ही रहेगा इंसान
जो रोटा है तो रोटा ही रहेगा
भगवान तो आकाश पे सोता ही रहेगा
सोता ही रहेगा

छोटे भी बड़े भी सभी भगवान के बेटे
छोटे भी बड़े भी सब भगवान के बेटे
फिर किसान बनाए हैं ये लकादिर के हेते
फिर किसान बनाए हैं ये लकादिर के हेते
सेजो पे कहीं
सेजो पे कहीं फूल कहीं पांव में कांटे
भगवान ने किस रीत से इसान है बंटे
इसान है बंटे

दुनिया में ये अन्य तो रोटा ही रहेगा
दुनिया में ये अन्य तो
रोटा ही रहेगा भगवान तो आकाश पे सोता ही रहेगा सोता ही रहेगा इंसान जो रोटा है तो रोता ही रहेगा भगवान तो आकाश
पे सोता ही रहेगा सोता ही रहेगा।

एसपी बाला सुब्रामणीय

जन्म : 4 जून 1946, कोंटमपेट
निधन : 25 सितंबर 2020, एमजीएम हेल्थकेयर, चेन्नई

बच्चे : एसपी चरण , पल्लवी बालासुब्रह्मण्यम

माता-पिता : एसपी सांबमूर्ति , शकुंतलम्मा

श्रीपति पंडिताराधुला बालासुब्रह्मण्यम (जन्म 4 जून 1946) को ज्यादातर एस.
पी।
बी।
या बालू एक भारतीय पार्श्व गायक, संगीत निर्देशक, अभिनेता, डबिंग कलाकार और फिल्म निर्माता हैं जो मुख्य रूप से तेलुगु, तमिल, कन्नड़, हिंदी और मलयालम में काम करते हैं।
उन्होंने 16 भारतीय भाषाओं में 40,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए हैं।
उन्होंने चार अलग-अलग भाषाओं में अपने काम के लिए सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक के लिए छह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त किए हैं; कन्नड़, तेलुगु, तमि ऊल और हिंदी; पच्चीस आंध्र प्रदेश राज्य नंदी पुरस्कार तेलुगु सिनेमा की दिशा में उनके काम के लिए, कर्नाटक और तमिलनाडु के कई अन्य राज्य पुरस्कार।
इसके अलावा, उन्होंने बॉलीवुड फिल्मफेयर पुरस्कार, और छह फिल्मफेयर पुरस्कार दक्षिण में प्राप्त किए। उन्हें सबसे अधिक फिल्मी गीत गाने के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड से सम्मानित किया गया है।
2012 में, उन्हें भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए राज्य एनटीआर राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
2016 में, उन्हें रजत मयूर पदक से युक्त भारतीय फिल्म व्यक्तित्व से सम्मानित किया गया था।
वह भारत सरकार से पद्म श्री (2001) और पद्म भूषण (2011) जैसे नागरिक पुरस्कारों के प्राप्तकर्ता हैं।

एसपी बालासुब्रह्मण्यम का जन्म नेल्लोर में हुआ था , जो वर्तमान में आंध्र प्रदेश में एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था।  उनके पिता, एसपी सांबमूर्ति, एक हरिकथा कलाकार थे, जिन्होंने नाटकों में अभिनय भी किया था। उनकी मां सकुंतलम्मा थीं, जिनकी मृत्यु 4 फरवरी 2019 को हुई थी। उनके दो भाई और पांच बहनें थीं, जिनमें गायिका एसपी शैलजा भी शामिल थीं । उनके बेटे एसपी चरण भी एक लोकप्रिय दक्षिण भारतीय गायक, अभिनेता और निर्माता हैं। 

बालासुब्रह्मण्यम ने कम उम्र में ही संगीत में रुचि विकसित की, संगीत संकेतन का अध्ययन किया और संगीत सीखा। उन्होंने इंजीनियर बनने के इरादे से जेएनटीयू कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग अनंतपुर में दाखिला लिया । वह अक्सर कहा करते थे कि, उस समय उनका एकमात्र सपना अपने पिता की महत्वाकांक्षा को पूरा करना और इंजीनियर बनना और सरकारी नौकरी करना था। 

बालासुब्रमण्यम ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान संगीत जारी रखा और गायन प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीते। टाइफाइड के कारण उन्होंने अपनी पढ़ाई जल्दी छोड़ दी और इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स, चेन्नई के एक सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल हो गए ।  1964 में, उन्होंने मद्रास स्थित तेलुगु सांस्कृतिक संगठन द्वारा आयोजित शौकिया गायकों के लिए एक संगीत प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीता।

वह अनिरुत्त (हारमोनियम पर), इलैयाराजा (गिटार पर और बाद में हारमोनियम पर), बस्कर (टक्कर पर) और गंगई अमरन (गिटार पर) से बने एक हल्के संगीत मंडली के नेता थे। [38] उन्हें एक गायन प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ गायक के रूप में चुना गया था, जिसे एसपी कोदंडपाणि और घंटासला ने जज किया था । अवसरों की तलाश में अक्सर आने वाले संगीतकार, उनका पहला ऑडिशन गीत "निलवे एननिदम नेरुंगधे" था। इसे अनुभवी पार्श्व गायक पीबी श्रीनिवास द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जो उन्हें तेलुगु , तमिल , हिंदी में बहुभाषी छंद लिखते और देते थे ।कन्नड़ , मलयालम , संस्कृत , अंग्रेजी और उर्दू ।
पार्श्वगायक एस पी बालासुब्रमण्यम के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि

श्रीपति पण्डितराध्युल बालासुब्रमण्यम भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध पार्श्वगायकों में से एक थे। पार्श्वगायक होने के साथ-साथ वह एक अभिनेता, संगीत निर्देशक, गायक और फ़िल्म निर्माता भी थे। एस. पी. बालासुब्रमण्यम ने छह बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के लिए 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' और आन्ध्र प्रदेश सरकार द्वारा 25 बार तेलुगू सिनेमा में 'नन्दी पुरस्कार' जीता। जब अभिनेता सलमान ख़ान नए-नए फ़िल्मों में आए थे तो कई सालों तक एस.पी. बालासुब्रण्यम को सलमान ख़ान की आवाज़ समझा जाता था। फ़िल्म 'मैंने प्यार किया' के गाने हों या 'साजन' या फिर 'हम आपके हैं कौन'- इन सब फ़िल्मों में सलमान ख़ान को एस.पी. बालासुब्रमण्यम ने ही आवाज़ दी थी।

परिचय

एस. पी. बालासुब्रमण्यम को 'एसपीबी' या 'बालु' के नाम से भी जाना और पहचाना जाता है। उनका जन्म 4 जून सन 1946 को मद्रास के नेल्लोर (अब चित्तूर ज़िला, आंध्र प्रदेश) में हुआ था। सलमान ख़ान के साथ ही साथ उन्हें साउथ के सुपर स्टार कमल हासन की भी आवाज़ माना जाता था। एस. पी. बालासुब्रमण्यम ने इंजीनियंरिंग की पढ़ाई की। इसी दौरान उन्होंने संगीत की शिक्षा भी ली। एसपी ने 15 दिसंबर, 1966 को तेलुगु फिल्म 'श्री श्री मर्यादा रमन्ना' से गाने की शुरुआत की थी। उनकी पत्नी का नाम सावित्री है। उनके दो बच्चे हैं। एक बेटी पल्लवी और दूसरा बेटा चरण। उनका बेटा चरण भी प्लेबैक सिंगर और फिल्म प्रोड्यूसर है।

एस. पी. बालासुब्रमण्यम ने 'एक दूजे के लिए', 'मैंने प्यार किया', 'पत्थर के फूल', 'हम आपके हैं कौन' और 'रोजा' जैसी पॉपुलर फिल्मों के गाने गाए। करीब 15 साल तक हिंदी फिल्मों से दूर रहने के बाद 2013 में उन्होंने शाहरुख ख़ान की फिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' में गाना गाया था।

वॉइस ओवर आर्टिस्ट

वह बेहतरीन गायक, संगीतकार और प्रोड्यूसर होने के साथ ही साथ अच्छे वॉइस ओवर आर्टिस्ट भी थे। उन्होंने कमल हासन, रजनीकांत, सलमान ख़ान, शाहरुख ख़ान, अनिल कपूर, गिरीश कर्नाड और अर्जुन सरजा जैसे अभिनेताओं के लिए वॉइस ओवर किया। इतना ही नहीं फिल्म 'दशावतारम्' के तेलुगु वर्जन के लिए उन्होंने कमल हासन के सात किरदारों की आवाज़ का वॉइस ओवर भी किया। इसमें बूढ़ी औरत वाले किरदार की आवाज़ भी शामिल है।

पुरस्कार व सम्मान

एस. पी. बालासुब्रमण्यम को भारत सरकार ने 2001 में पद्मश्री और 2011 में पद्म भूषण से नवाजा था। पिछले 5 दशक में करीब 16 भाषाओं में 40 हजार से ज्यादा गाने वे गा चुके थे। येसुदास के बाद एस. पी. बालासुब्रमण्यम बेस्ट मेल सिंगर का नेशनल अवॉर्ड पाने वाले दूसरे सिंगर थे। येसुदास ने अपने कॅरियर के दौरान 8 नेशनल अवॉर्ड जीते थे, जबकि एस. पी. बालासुब्रमण्यम ने 6 नेशनल अवॉर्ड अपने नाम किए।

मृत्यु

कोरोना वायरस से संक्रमित हो जाने के कारण एस. पी. बालासुब्रमण्यम की मृत्यु 25 सितंबर, 2020 को चेन्नई में हुई। कोरोना संक्रमण की पुष्टि के बाद उन्हें 5 अगस्त, 2020 को एमजीएम हेल्थकेयर अस्पताल में इलाज के लिए लाया गया था। हालत बिगड़ने के बाद उन्हें जीवनरक्षक प्रणाली और ईसीएमओ (एक्स्ट्राकोर्पोरियल मेम्ब्रेन ऑक्सिडेशन सपोर्ट) पर रखा गया था।

अशोक सराफ

अशोक सराफ
जन्म
4 जून 1947 (आयु 75)
मुंबई 
1969 - वर्तमान
जीवनसाथी
निवेदिता जोशी-सराफ

बच्चे
1
1980 के दशक की शुरुआत से, सराफ को मराठी फिल्मों में प्रमुख नायक के रूप में कास्ट किया जाने लगा। अशोक सराफ, लक्ष्मीकांत बेर्डे , सचिन पिलगाँवकर और महेश कोठारे के संयोजन ने 1985 से मराठी सिनेमा में "कॉमेडी फिल्मों की लहर" पैदा की जो एक दशक से अधिक समय तक चली। मुख्य नायक के रूप में उनकी सफल मराठी फिल्मों में एक दावा भूतचा , धूम धड़ाका , गम्मत जमात , आशी ही बनवा बनवी और वज़ीर शामिल हैं । सराफ ने ये छोटी बड़ी बातें और हम पांच (आनंद माथुर के रूप में) जैसे टेलीविजन धारावाहिकों में भी अभिनय किया है ।

बॉलीवुड में , उन्हें राकेश रोशन की 1995 की एक्शन थ्रिलर करण अर्जुन में कॉमिक "मुंशीजी" के लिए , यस बॉस में शाहरुख खान के दोस्त के रूप में और अजय देवगन के सहयोगी के रूप में सिंघम में हेड कांस्टेबल के रूप में याद किया जाता है। मराठी फिल्म उद्योग में, उन्हें "मामा" (मामा) के नाम से जाना जाता है।



बॉलीवुड में , उन्हें राकेश रोशन की 1995 की एक्शन थ्रिलर करण अर्जुन में कॉमिक "मुंशीजी" के लिए , यस बॉस में शाहरुख खान के दोस्त के रूप में और अजय देवगन के सहयोगी के रूप में सिंघम में हेड कांस्टेबल के रूप में याद किया जाता है। मराठी फिल्म उद्योग में, उन्हें "मामा" (मामा) के नाम से जाना जाता है। 

अशोक सराफ ने मराठी सिनेमा के एक और कॉमेडियन लक्ष्मीकांत बेर्डे के साथ जोड़ी बनाने में सफलता हासिल की , जिन्होंने कई हिंदी फिल्मों में भी अभिनय किया है। सराफ, सचिन पिलगाँवकर और लक्ष्मीकांत बेर्डे के साथ , उन्होंने एक साथ कई मराठी फ़िल्मों में अभिनय किया और अधिकांश फ़िल्में सुपर-हिट रहीं। लक्ष्मीकांत और अशोक दोनों अभिनेता-निर्देशक सचिन पिलगाँवकर और अभिनेता-निर्माता-निर्देशक महेश कोठारे के अच्छे दोस्त माने जाते थे । उन्होंने मराठी सिनेमा के दो सुपरस्टार सचिन पिलगाँवकर और लक्ष्मीकांत बेर्डे के साथ मुख्य भूमिका में आशी ही बनवा बनवी (1988) में बड़ी सफलता का स्वाद चखा । फिल्म एक भगोड़ा हिट थी। 

हिंदी फिल्म कैरियर

सराफ ने बॉलीवुड में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। जिन भूमिकाओं को याद किया जाता है उनमें सिंघम , प्यार किया तो डरना क्या , गुप्त , कोयला , यस बॉस , जोरू का गुलाम और करण अर्जुन शामिल हैं । गोविंदा, जॉनी लीवर और कादर खान जैसे दमदार कॉमेडी अभिनेताओं के खिलाफ फिल्मों में उनके अभिनय की तारीफ हुई।

हिंदी टेलीविजन धारावाहिक

सराफ ने ये छोटी बड़ी बातें और हम पांच (आनंद माथुर के रूप में) जैसे टेलीविजन धारावाहिकों में भी अभिनय किया है , जिसने बड़ी सफलता का स्वाद चखा। [14] अशोक सराफ का कॉमेडी शो डोन्ट वरी हो जाएगा जो उस समय सहारा टीवी पर प्रसारित होता था 1990 के दशक में बहुत लोकप्रिय था। उस समय इस शो को देखने के लिए दर्शक काफी उत्साहित रहते थे।



नूतन

नूतन बहल (नूतन समर्थ के रूप में

🎂जन्म; 4 जून 1936 -

⚰️ 21 फरवरी 1991

जिन्हें नूतन के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री थीं।

जीवनसाथी
रजनीश बहल (1959-1991) (नूतन की मृत्यु तक)
पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री
1956 सीमा
1960 सुजाता
1964 बंदिनी
1968 मिलन
1979 मैं तुलसी तेरे आँगन की
सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री
1986 मेरी जंग(1959-1991
लगभग चार दशकों के करियर में, वह 70 से अधिक हिंदी फिल्मों में दिखाई दीं, जिनमें कई भूमिकाएँ थीं।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे बेहतरीन अभिनेत्रियों में से एक मानी जाने वाली नूतन को अपरंपरागत भूमिकाओं को निभाने के लिए जाना जाता था और उनके प्रदर्शन को अक्सर प्रशंसा और प्रशंसा मिली।
नूतन के पास फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार की पांच जीत का रिकॉर्ड है, जो कि 30 से अधिक वर्षों तक केवल उनके पास था, जब तक कि 2011 में उनकी भतीजी काजोल ने इसका मिलान नहीं किया।

सन् 74में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया।
1974 में, उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। फिल्म निर्माता कुमारसेन समर्थ और फिल्म अभिनेत्री शोभना समर्थ की बेटी, नूतन ने अपने करियर की शुरुआत 14 साल की उम्र में 1950 में अपनी मां द्वारा निर्देशित फिल्म हमारी बेटी से की थी।
बाद में उन्होंने नगीना और हमलोग (दोनों 1951) जैसी फिल्मों में अभिनय किया। सीमा (1955) में उनकी भूमिका ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
उन्होंने 1960 के दशक से 1970 के दशक के अंत तक प्रमुख भूमिकाएँ निभाना जारी रखा और सुजाता (1959), बंदिनी (1963), मिलन (1967) और मैं तुलसी तेरे आंगन की (1978) में अपनी भूमिकाओं के लिए चार अन्य अवसरों पर पुरस्कार जीता। .
इस अवधि की उनकी कुछ अन्य फिल्मों में अनाड़ी (1959), छलिया (1960), तेरे घर के सामने (1963), सरस्वतीचंद्र (1968), अनुराग (1972) और सौदागर (1973) शामिल हैं।
1980 के दशक में, नूतन ने चरित्र भूमिकाएँ निभानी शुरू कीं और अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले तक काम करना जारी रखा।
उन्होंने साजन की सहेली (1981), मेरी जंग (1985) और नाम (1986) जैसी फिल्मों में ज्यादातर मातृ भूमिकाएं निभाईं।
मेरी जंग में उनके प्रदर्शन ने उन्हें इस बार सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री श्रेणी में छठा और आखिरी फिल्मफेयर पुरस्कार अर्जित किया। नूतन की शादी नौसेना के लेफ्टिनेंट-कमांडर रजनीश बहल से 1959 से 1991 में स्तन कैंसर से उनकी मृत्यु तक हुई थी।
उनका बेटा मोहनीश बहल था, जो एक फिल्म और टेलीविजन अभिनेता है।

नोट:____  अमिताभ बच्चन दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे। एक दिन नूतन अपने पति रजनीश बहल के साथ सड़क क्रॉस कर रही थी। अमिताभ जी स्कूटर पर थे। उन्होंने नूतन को देखा और गिरते-गिरते बचे। उन्होंने इस बात का खुलासा खुद एक इंटरव्यू में किया है। उन्होंने कहा ‘नूतन अपने काम के प्रति बहुत संजीदा थीं। ‘सौदागर’ के सेट पर वे सुबह 6 बजे के शॉट के लिए सबसे पहले मेकअप लगाकर रेडी रहती थीं। उनके बातचीत करने का तरीका बेहद शानदार था। वह सिंगिंग भी करती थीं, एक बार जब मैं और नूतन दिल्ली में एक फंक्शन के दौरान मिले तब वे वहां परफॉर्म कर रही थीं। स्टेज पर जाने से पहले उन्होंने मुझसे कहा कि मैं भी उनके साथ स्टेज पर ऑडियंस के सामने चलूं, जो मेरे लिए गर्व की बात थी।’

फिल्म की हीरोइन थी फिर भी थिएटर में नहीं हुई एंट्री
‘नगीना’ फिल्म में नूतन सिर्फ 15 साल की थी, उसमें डरावने सीन थे। जो बच्चों को देखने मना था। वो फिल्म की प्रीमियर पर पहुंची। मगर उन्हें अंदर घुसने नहीं दिया गया। वॉचमैन ने थिएटर के गेट पर ही नूतन को रोक दिया।

राजेंद्र कुमार और शम्मी कपूर दोनों ही नूतन पर थे मरते
राजेंद्र कुमार और शम्मी कपूर दोनों नूतन के दीवाने थे। राजेंद्र कुमार ने तो उनकी मां से उनका हाथ भी माँगा था। मगर उन्होंने साफ इंकार कर दिया था। वहीं शम्मी कपूर भी उनपर फ़िदा थे। 



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भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...