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मंगलवार, 6 फ़रवरी 2024

तन्वीर नकवी

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तनवीर नकवी 

जन्म सैयद खुर्शीद अली विवादास्पद है कुछ लोग 🎂06 फरवरी 1919 को मना रहे है।
Imdb और rekhaa पर 06फरवरी अंकित है
🎂 16 फरवरी 1919 
⚰️01 नवंबर 1972)

 तनवीर नकवी

 एक पाकिस्तानी गीतकार और कवि थे। उन्होंने लॉलीवुड और बॉलीवुड सहित 200 अनिश्चित फिल्मों के लिए गीत लिखे । उन्होंने भारतीय सिनेमा में अपनी शुरुआत अब्दुल रशीद कारदार द्वारा निर्देशित स्वामी फिल्म से की , और बाद में पंद्रह वर्षों से अधिक समय तक पाकिस्तानी फिल्म उद्योग में सक्रिय रहे। उन्होंने अनमोल घड़ी फिल्म के लिए "आवाज़ दे कहा है" गीत और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को कवर करने वाला गीत "रंग लाएगा शहीदों का लहू" लिखने के बाद पहचान अर्जित की ।उनका जन्म लाहौर, ब्रिटिश भारत (आधुनिक लाहौर, पाकिस्तान) में हुआ था। वह मूल रूप से ईरान के फ़ारसी लेखकों के परिवार से थे , और उन्होंने नूरजहाँ की बहन, इदान बाई से शादी की।
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एक गीतकार के रूप में, उन्होंने अपना करियर 1946 के आसपास कम उम्र में ही शुरू कर दिया था, लेकिन पाकिस्तान जाने के बाद, उन्होंने उर्दू और पंजाबी भाषा की फिल्मों के लिए गीत लिखे, जिनमें पाकिस्तान की पहली फीचर फिल्म तेरी याद भी शामिल थी । उन्होंने सलमा (1960) के लिए भी लिखा , जो पार्श्व गायक के रूप में नूर की पहली फिल्म थी। 1933 में, वह बंबई गए जब एक फिल्म निर्देशक अब्दुर रशीद कारदार ने उन्हें वहां आमंत्रित किया। फिल्मों में डेब्यू से पहले वह गजलें लिखते थे , लेकिन बाद में हिंदी, उर्दू और पंजाबी फिल्मों के लिए गाने लिखते थे। उन्हें नूरजहाँ द्वारा गाए गए पाकिस्तान के देशभक्ति गीत "रंग लाए गा शहीदों का लहू" के लिए गीत लिखने का भी श्रेय दिया जाता है। यह गाना उन्होंने अपनी एक कविता से लिखा है. अपने करियर के दौरान, उन्होंने "शाह-ए-मदीना यसरब के वली" और "जो ना होता तेरा जमाल हाय" जैसी दो प्रमुख नात लिखीं। भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन से पहले , नकवी को 1950 और 1970 के दशक के बीच पंजाबी कविता और साहित्य में सबसे महान शास्त्रीय लेखकों में से एक माना जाता था ।

विभाजन के बाद, पाकिस्तान फिल्म उद्योग ने अधिक फिल्में नहीं बनाईं और 1952 के अंत तक, इसने केवल पांच फिल्में बनाईं। बाद में, पाकिस्तानी फिल्म निर्माता और संगीत निर्देशक ख्वाजा खुर्शीद अनवर ने गीतकार के रूप में तनवीर नकवी सहित कई अन्य लोगों के साथ मिलकर काम किया। टीम 1956 और 1959 के बीच कुछ फिल्में बनाने में सफल रही, जो कई सांस्कृतिक संघर्षों के कारण अभिनेताओं द्वारा अनुभव किए गए मनोवैज्ञानिक मुद्दों पर केंद्रित थीं । 
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अनमोल घड़ी 1946
जुगनू 1947
तेरी याद 1948 
4 नाता 1955 
1959 झूमर
नींद 1959 
1959 कोयल (फिल्म)
1960शाम ढले 
1960सलमा
1619 गुलफ़ाम 
1962घूँघट 
1962 अज़रा 
1963सीमा 
1967 हमराज़ 
 1969बहन भाई
1970अत्त खुदा दा वैर 
1971दोस्ती (पाकिस्तानी फ़िल्म)

भारत में संगीत निर्देशक के रूप में।

1. कुरमई (पंजाबी) (1941)
2. इशारा (1943)
3. परख (1944 फ़िल्म) (1944)
4. यतीम (1945)
5. परवाना (1947 फ़िल्म) (1947)
6. पगडंडी (1947)
7. आज और कल (1947)
8. सिंघार (1949)
9. निशाना (1950)
10. नीलम परी (1952)
बहन भाई 1969
अत ख़ुदा दा वैर 1970

पाकिस्तानी फ़िल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में

1. इंतेज़ार (1956) 
2. मिर्ज़ा साहिबान (1956)
3. ज़हर-ए-इश्क (1958) 
4. झूमर (1959)
5. कोयल (1959) 
6. अयाज़ (1960)
7. घूंघट (1962) 
8. चिंगारी (1964)
9. हवेली (1964)
10. सरहद (1966)
11. हमराज़ (1967)
12. गुड्डो (पंजाबी) (1970)
13. हीर रांझा (पंजाबी) (1970) 
14. पराई आग (1971)
15. सलाम-ए-मोहब्बत (1971)
16. शिरीन फरहाद (1975)
17. हैदर अली (1978)
18. मिर्ज़ा जाट (पंजाबी) (1982)

🌹उनके कुछ लोकप्रिय 🌹

पापी पपीहा रे पी पी ना बोल बैरी" सुरैया द्वारा गाया गया, डीएन मधोक के गीत , फिल्म परवाना 
"जब तुम ही नहीं अपनी दुनिया ही बेगानी है" सुरैया द्वारा गाया गया, डीएन मधोक के गीत , फिल्म परवाना 
"जिस दिन से पिया दिल ले गए, दुख दे गए, चैन नहीं आए" नूरजहाँ द्वारा गाया गया, कतील शिफाई के गीत , फ़िल्म इंतज़ार (1956) 
"चली रे चली रे, बैरी आस लगा काय चली रे" नाहिद नियाजी द्वारा गाया गया, तनवीर नकवी के गीत , फिल्म झूमर (1959) 
"रिम झिम रिम झिम पर्रे फुवार, तेरा मेरा नित का प्यार" नूरजहाँ और मुनीर हुसैन द्वारा गाया गया, तनवीर नकवी के गीत , फिल्म कोयल (1959) 
"सुनो अर्ज़ मेरी कमली वाले" जुबैदा खानम द्वारा गाया गया, कतील शिफाई के गीत , फिल्म ज़हर-ए-इश्क (1958) 
"सल्लू अलाही-ए-वा-अले-ही, जो ना होता तेरा जमाल ही" जुबैदा खानम , कौसर परवीन द्वारा गाया गया, तनवीर नकवी के गीत, फिल्म अयाज़ (1960) 
ए रोशनियों के शहर बता मेहदी हसन द्वारा गाया गया , तनवीर नकवी के गीत, फिल्म चिंगारी (1964) 

01 नवंबर 1972 को लाहौर, पाकिस्तान में उनका निधन हो गया।
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#01nov

⚰️1 नवंबर 1972 को लाहौर, पाकिस्तान में उनका निधन हो गया।

शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

ऋत्विक घटक

ऋत्विक घटक

🎂जन्म 04 नवम्बर, 1925
जन्म भूमि ढाका, बांग्लादेश
⚰️मृत्यु 6 फ़रवरी, 1976
मृत्यु स्थान कोलकाता, पश्चिम बंगाल

पति/पत्नी सुरमा घटक
संतान रिताबन घटक (पुत्र), संहिता घटक, सुचिस्मिता घटक (पुत्री)
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, नाट्य निर्देशक और पटकथा लेखक
मुख्य फ़िल्में 'नागोरिक' (1952), 'अजांत्रिक' (1958), 'मेघे ढाका तारा' (1960), 'कोमल गंधार' (1961) और 'सुबर्णरिखा' (1962) आदि।
पुरस्कार-उपाधि पद्म श्री, राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी नाटकों का लेखन, निर्देशन और अभिनय के अलावा उन्होंने बेर्टेल्ट ब्रोश्ट और गोगोल को बांग्ला में अनुवाद भी किया। 1957 में उन्होंने अपना अंतिम नाटक ज्वाला (द बर्निंग) लिखा और निर्देशित किया।

जीवन परिचय
ऋत्विक घटक का जन्म 4 नवंबर, 1925 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के ढाका में हुआ। बाद में उनका परिवार कोलकाता आ गया। यही वह काल था जब कोलकाता शरणार्थियों का शरणस्थली बना हुआ था। चाहे 1943 में बंगाल का अकाल, चाहे 1947 में बंगाल के विभाजन हो या फिर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध, इस दौर का विस्थापन ने ऋत्विक घटक के जीवन को काफ़ी प्रभावित किया। यही कारण है कि सांस्कृतिक विच्छेदन और निर्वासन उनकी फ़िल्मों में बखूबी दिखता है। 1948 में ऋत्विक घटक ने अपना पहला नाटक 'कालो सायार' (द डार्क लेक) लिखा और ऐतिहासिक नाटक ‘नाबन्ना के पुनरुद्धार” में हिस्सा लिया। 1951 में वे इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन के साथ जुड़ गए। नाटकों का लेखन, निर्देशन और अभिनय के अलावा उन्होंने बेर्टेल्ट ब्रोश्ट और गोगोल को बंगला में अनुवाद भी किया। 1957 में, उन्होंने अपना अंतिम नाटक ज्वाला (द बर्निंग) लिखा और निर्देशित किया। निमाई घोष के चिन्नामूल (1950) में बतौर अभिनेता और सहायक निर्देशक के रूप में ऋत्विक घटक ने फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश किया। उनकी पहली पूर्ण फ़िल्म नागरिक (1952) आई, दोनों ही फ़िल्में भारतीय सिनेमा के लिए मील का पत्थर थीं। अजांत्रिक (1958) ऋत्विक घटक की पहली व्यावसायिक फ़िल्म थी। फ़िल्म मधुमती (1958) के पटकथा लेखक के रूप में ऋत्विक घटक की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलता थी, जिसकी कहानी के लिए फ़िल्मफेयर पुरस्कार में नामांकित हुए। ऋत्विक घटक ने क़रीब आठ फ़िल्मों का निर्देशन किया। उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्में, मेघे ढाका तारा (1960), कोमल गंधार (1961) और सुबर्णरिखा (1962) थीं। 1966 में ऋत्विक घटक पुणे चले गए जहां वे भारतीय फ़िल्म और टेलीविजन संस्थान में अध्यापन करने लगे। 1970 के दशक में ऋत्विक घटक फ़िल्म निर्माण में फिर वापस लौटे। लेकिन तब तक वे खुद को अत्यधिक शराब के सेवन में डुबो चुके थे। उनका स्वास्थ्य खराब हो चुका था। उनकी आख़िरी फ़िल्म आत्मकथात्मक थी जिसका नाम था ‘जुक्ति तोक्को आर गोप्पो” (1974) थी। 6 फ़रवरी 1976 को उनका निधन हो गया।

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आदिवासी जीवन पर पहली बार ऋत्विक घटक ने डाक्यूमेंट्री बनायी थी। बिहार सरकार का यह प्रयास था। ऋत्विक की उम्र तब यही कोई 25 के आस-पास थी। इप्टा से जुड़ चुके थे और नाटक लिखना भी शुरू कर दिया था। झारखंड से उनका परिचय हो चुका था। उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत ‘बेदिनी’ फ़िल्म से की थी। 1952 में फ़िल्म यूनिट को लेकर घाटशिला आये और स्वर्णरेखा नदी के किनारे 20 दिनों तक रहे और शूटिंग की। हालांकि यह फ़िल्म रिलीज नहीं हो सकी। ऋत्विक घटक आदिवासी समाज को सत्यजीत राय की तरह नहीं देखते थे। उन्होंने ‘आदिवासी जीवन के स्रोत’ एवं ‘उरांव’ बनायी, तो आदिवासी समाज को, उनकी संस्कृति को निकट से देखने की कोशिश की। फ़िल्मकार मेघनाथ के शब्दों में, “वे आई-लेवल से देख रहे थे।” यानी, यह दृष्टि समानता की थी, संवेदना की थी। दोनों डाक्यूमेंट्री की शूटिंग रांची और आस-पास और नेतरहाट क्षेत्र में की गयी थी। ‘आदिवासी जीवन के स्रोत’ की जब शूटिंग कर रहे थे, तो बीच में अपनी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा समय निकालकर अपनी पत्‍नी को पत्र लिखते। एक पत्र 22 फ़रवरी 1955 का है। लिखा है, “उरांव-मुंडा के साथ सारा दिन बीत रहा है। इनके साथ रहकर मिट्टी की गंध मिल रही है। इनका अपूर्व गान हमें मदहोश कर दे रहा है।” आदिवासियों के सामाजिक जीवन की विसंगतियों की ओर भी ध्यान दिलाते हैं। लिखते हैं, “आदिवासियों में बचने की इच्छा है। यहां की सुंदरता भी इतनी अपार है कि इसका बूंद मात्र ही कैमरे में कैद कर पा रहा हूं।” वे उरांव नृत्य पर भी मोहित होते हैं।

इस अपूर्व सौंदर्य को कैद करने के लिए ऋत्विक घटक फिर रांची आये और अपनी ‘अजांत्रिक’ फ़िल्म की शूटिंग रांची, रामगढ़ रोड आदि क्षेत्रों में की। यह फ़िल्म बांग्ला में है, लेकिन पहली बार उरांव यानी कुड़ुख भाषा में संवाद और नृत्य को इस फीचर फ़िल्म में दिखाया गया है। उनके नृत्य से ऋत्विक घटक काफ़ी भाव-विभोर थे। इसलिए इसमें सरना झंडे भी लहरा रहे थे। आदिवासी जीवन की सरलता, लावण्यता का अनुभव किया। फ़िल्मकार मेघनाथ कहते हैं कि अजांत्रिक मानुष और मशीन के बीच संबंधों की कहानी हैं। हास्य का पुट है। लेकिन यह हंसी हूक भी पैदा करती है। बहरहाल, ऋत्विक घटक को झारखंड काफ़ी पसंद था। इसे वे कभी भूले नहीं। जब 1962 में सुबर्णरिखा बनायी, तब भी नहीं।
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भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...