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शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

एस मोहिंदर

#06sep
#24feb 
एस मोहिंदर

🎂जन्म24 फरवरी 1925
सरगोधा जिला , पंजाब , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत06 सितंबर 2020 (आयु 95 वर्ष)

पेशा फ़िल्म संगीतकार
पुरस्कार
वर्ष के 'सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक' के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (1969)

उनका जन्म 1925 में सरगोधा जिले के सिलानवाली तहसील में हुआ था । मोहिंदर के पिता बख्शी सुजान सिंह पुलिस बल में सब-इंस्पेक्टर थे। बाद में उनके पिता ने भी साहीवाल (पुराना नाम मोंटगोमरी क्षेत्र) में सेवा की। वह साहीवाल में उस समय के एक प्रसिद्ध संगीतकार पंडित रतन मूर्ति के छात्र थे, जो बाबे वाला चौक पर रहते थे।

उनके पिता बख्शी सुजान सिंह का स्थानांतरण हो गया और परिवार तुलनात्मक रूप से बड़े शहर लायलपुर , ब्रिटिश भारत अब फैसलाबाद , पाकिस्तान में चला गया, जहां 1930 के दशक में युवा मोहिंदर ने एक कुशल सिख धार्मिक गायक संत सुजान सिंह के साथ प्रशिक्षुता शुरू की।

उन्होंने संत सुजान सिंह के संरक्षण में कई वर्षों तक शास्त्रीय संगीत के अनुरूप अपने कौशल को निखारा। प्रारंभ में, उन्होंने गायक बनने का प्रयास किया। बाद में, उनका परिवार सिख धर्म के संस्थापक ( गुरु नानक ) के जन्मस्थान ननकाना साहिब के करीब, शेखूपुरा (अब पाकिस्तान में) चला गया।

बाद में उन्होंने सिख धार्मिक संगीतकार भाई समुंद सिंह से शास्त्रीय संगीत में आगे का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनके पिता के बार-बार स्थानांतरण से परिवार चलता रहा। चूंकि मोहिंदर की शिक्षा प्रभावित हुई, इसलिए उनके पिता ने उन्हें 1940 के दशक में अमृतसर के कैरों गांव में खालसा हाई स्कूल में दाखिला दिलाया । एस. मोहिंदर उर्दू और पंजाबी दोनों भाषाओं में पारंगत थे। उन्हें हिंदी भाषा सीखने में कुछ समय लगा। 

1947 में, उनका बाकी परिवार भारत में पूर्वी पंजाब चला गया । शास्त्रीय संगीत के प्रति प्रेम एस. मोहिंदर को भारतीय शास्त्रीय संगीत के मक्का कहे जाने वाले बनारस ले आया। कुछ वर्षों की तैयारी के बाद, एस. मोहिंदर फिल्म उद्योग के केंद्र मुंबई चले गए। उनकी पहली सफल फिल्म नीली (1950) थी, जो म्यूजिकल हिट थी लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही।

मोहिंदर सिंह अंततः फिल्मिस्तान स्टूडियो में संगीत निर्देशक बनने में कामयाब रहे , जो उस समय फिल्में बना रहा था। उन्होंने लगभग आधे दशक तक उनके लिए संगीत तैयार किया। 1980 के दशक की शुरुआत में, वह अमेरिका चले गए और 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत में अपनी अंतर्दृष्टि प्रदान करने के लिए अक्सर स्थानीय संगीत प्रेमियों के साथ बैठकों में भाग लेते थे। वह 2013 में मुंबई, भारत लौट आए।

उनकी बेटी नरेन चोपड़ा के अनुसार, उनके करियर के विकास में सुरैया , फिल्म निर्माता और निर्देशक के. आसिफ , एस. मुखर्जी और मधुबाला ने मदद की थी । उनकी बेटी ने यह भी कहा कि वह मधुबाला के परिवार और पृथ्वीराज कपूर के करीबी थे ।

06 सितंबर, 2020 को 95 वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया
📽️
अप्रकाशित फ़िल्में - गीत और आँसू (1940), दो दोस्त (1950), माँ दी गोध (पंजाबी), 1970

सेहरा (1948)
जीवन साथी (1949)
नीली (1950)
श्रीमती जी (1952) - संगीत और पृष्ठभूमि संगीत भी
वीर अर्जुन (1952)
बहादुर (1953)
पापी (1953)
नाता (1955) 
अलादीन का बेटा (1955)
सौ का नोट (1955)
शहजादा (1955)
सुल्तान-ए-आलम (1956)
शिरीन फरहाद (1956)
कारवां (1956)
पाताल परी (1957)
सुन तो ले हसीना (1958)
नया पैसा (1958)
ख़ूबसूरत धोखा (1959)
परदेसी ढोला (1959) (निर्माता और संगीत निर्देशक के रूप में पंजाबी फिल्म)
भगवान और शैतान (1959)
दो दोस्त (1960)
एक लड़की सात लड़के (1961  विनोद के साथ )
ज़मीन के तारे (1960)
महलों के ख्वाब (1960)
जय भवानी (1961)
बांके सांवरिया (1962)
रिपोर्टर राजू (1962)
ज़राक खान (1963)
कैप्टन शेरू (1963)
सरफरोश (1964)
बेखबर (1965)
सुनहरे कदम (1966)
प्रोफेसर-एक्स (1966)
पिकनिक (1966) 
नानक नाम जहाज है (1969) (उन्होंने इस पंजाबी भाषा की फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता ) 
मन जीते जग जीत (1973) (पंजाबी फिल्म) 
दुख भंजन तेरा नाम (1974) पंजाबी फिल्म
गुरु तेग बहादुर सिंह जी के शबद और श्लोक खंड 1
एल्बम में विभिन्न कलाकारों को 10 ट्रैक मिले (1975)

शबद गुरबानी (1975) गायक कंवल सिद्धू का निजी एल्बम
सीस गंज (1975) गुरु तेग बहादुर - हिंद दी चादर) महेंद्र कपूर, मन्ना डे, एस. मोहिंदर, रागी तिरलोचन ग्रेवाल के साथ निजी एल्बम
तेरी मेरी इक जिंदरी (1975)
पापी तारे अनेक (1976) पंजाबी फिल्म
सैंटो बंटो (1976) पंजाबी फिल्म
लाडली (1978) पंजाबी फिल्म
सुखी परिवार (1979) पंजाबी फिल्म
फौजी चाचा (1980) पंजाबी फिल्म
दहेज (1981) पंजाबी फिल्म 
गुरु तेग बहादुर सिंह जी के शबद और श्लोक खंड। मोहम्मद रफ़ी , नीलम साहनी के साथ 2 निजी एल्बम
सारेगामा पर लेबल 06 जनवरी, (1985) को रिलीज़ हो रहा है

संदली (1985)
मौला जट्ट (1990) (पंजाबी फिल्म)

टीना देसाई

#24feb 
टीना देसाई 

🎂जन्म की तारीख और समय: 24 फ़रवरी 1987  बेंगलुरु

एक भारतीय अभिनेत्री है। इन्होने अपने अभिनय की शुरुआत 2011 में बनी फ़िल्म ये फ़ासले से किया। इन्होने 2012 में एक अंग्रेजी फ़िल्म द बेस्ट एक्सोटिक मेरीगोल्ड होटल में भी कार्य किया। 
देसाई ने एक मॉडल के रूप में अपना करियर शुरू किया और 150 से अधिक विज्ञापनों और प्रिंट अभियानों में काम किया। उन्होंने रियलिटी शो प्रतियोगिता गेट गॉर्जियस में भाग लिया जिसके माध्यम से उन्हें एलीट मॉडल इंडिया मैनेजमेंट के साथ एक अनुबंध की पेशकश की गई ।

उन्होंने 2011 में ये फास्ले से अभिनय की शुरुआत की और कुछ ही समय बाद उन्होंने फिल्म द बेस्ट एक्सोटिक मैरीगोल्ड होटल से हॉलीवुड में डेब्यू किया ।

उन्होंने 2012 किंगफिशर स्विमसूट कैलेंडर के लिए पोज़ दिया और राजीव खंडेलवाल के साथ बॉलीवुड एक्शन थ्रिलर फिल्म टेबल नंबर 21 में अभिनय किया । वह सिंगर केके के साथ रोमांटिक गाने 'ये कहां मिल गए हम' में नजर आईं ।

2015 में, देसाई ने दो हाई-प्रोफाइल अंग्रेजी भाषा प्रोजेक्ट, द सेकेंड बेस्ट एक्सोटिक मैरीगोल्ड होटल , 2012 की हिट  की अगली कड़ी और द वाचोव्स्की और जे. माइकल स्ट्रैज़िंस्की द्वारा नेटफ्लिक्स ड्रामा सेंस8 बुक किया, जिसमें वह भूमिका निभाती हैं। कला दांडेकर.

2016 में, उन्होंने थॉमस एंड फ्रेंड्स फिल्म द ग्रेट रेस में आशिमा के किरदार को आवाज दी , और 2 साल बाद 2018 में, देसाई ने थॉमस एंड फ्रेंड्स के सीजन 22, 23 और 24 के कुछ एपिसोड में आशिमा को आवाज दी। अप्रैल 2018 में, टीना ने सुजॉय घोष द्वारा निर्देशित हॉटस्टार के लिए 'गुड लक' नामक लघु फिल्म में जेनी की भूमिका निभाई ।

2021 में, देसाई ने अमेज़ॅन प्राइम वेब श्रृंखला मुंबई डायरीज़ 26/11 में अभिनय किया । निखिल आडवाणी द्वारा निर्देशित और एम्मे एंटरटेनमेंट द्वारा निर्मित , इसमें मोहित रैना और कोंकणा सेन शर्मा भी हैं । इसके बाद देसाई दीया अन्नपूर्णा घोष द्वारा निर्देशित और रेड चिलीज एंटरटेनमेंट द्वारा निर्मित क्राइम थ्रिलर फिल्म बॉब बिस्वास  में दिखाई दिए ।

📽️
2011 ये फ़ासले
2011 सही धंदे गलत बन्दे
2012 कॉकटेल
2012 द बेस्ट एक्सोटिक मेरीगोल्ड होटल
2013 टेबल नम्बर 21
2014 दशहरा 
2015 शराफ़त गई तेल लेने

नक्श लायल पूरी

#24feb
#22jan 
महान गीतकार शायर नक़्श लायलपुरी

🎂24 फरवरी, 1928
⚰️22 जनवरी 2017

पंजाब के लायलपुर अब पाकिस्तान का हिस्सा में 24 फरवरी, 1928 को जन्मे लायलपुरी के वालिद मोहतरम जगन्नाथ ने उनका नाम जसवंत राय शर्मा रखा था। शायर बनने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया और बन गए नक्श लायलपुरी। साहित्य में उनकी दिलचस्पी उनके स्कूल के दिनों में ही दिख गई, जब उनकी स्कूल टीचर साल के अंत में उनकी कॉपी इसलिए खरीदती थीं, क्योंकि उनमें उनकी कविताएं लिखी होती थीं। साल 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद उनका परिवार शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में लखनऊ आ गया। पान खाने और मुस्कराने की आदत उनको लखनऊ से ही मिली। उनकी शख़्सियत में वही नफ़ासत और तहज़ीब है जो लखनऊ वालों में होती है। लखनऊ की अदा और तवस्सुम उनकी इल्मी और फ़िल्मी शायरी में मौजूद है-

कई बार चाँद चमके तेरी नर्म आहटों के
कई बार जगमगाए दरो-बाम बेख़ुदी में

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दर्द को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था और बंटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था और यह उनकी शायरी में बखूबी नजर आया-

हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर
क्यूं न इंसा से मोहब्बत करें इंसा होकर

नक्श लायलपुरी के ग़ज़ल का चेहरा दर्द के शोले में लिपटे हुए शबनमी एहसास की लज़्ज़त से तरबतर है। शायरी के इस समंदर में एक तरफ़ फ़िक्र की ऊँची-ऊँची लहरें हैं तो दूसरी तरफ़ इंसानी जज़्बात की ऐसी गहराई है जिसमें डूब जाने को मन करता है। कहते हैं नाम भले भूल जाए, लफ्ज बचे रहते हैं, और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते, हर दिल का राग बन जाते हैं। नक़्श साहब की शायरी में पंजाब की मिट्टी की महक, लखनऊ की नफ़ासत और मुंबई के समंदर का धीमा-धीमा संगीत है-

मेरी पहचान है शेरो-सुख़न से
मैं अपनी क़द्रो क़ीमत जानता हूं

ज़िंदगी के तजुरबात ने उनके लफ़्ज़ों को निखारा संवारा और शायरी के धागे में इस सलीक़े से पिरो दिया कि उनके शेर ग़ज़ल की आबरू बन गए। फ़िल्मी नग़मों में भी जब उनके लफ़्ज़ गुनगुनाए गए तो उनमें भी अदब बोलता और रस घोलता दिखाई दिया–

ये मुलाक़ात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है
धड़कने धड़कनों में खो जायें
दिल को दिल के क़रीब लाना है
ख़्वाब तो कांच से भी नाज़ुक है
टूटने से इन्हें बचाना है
मन मेरा प्यार का शिवाला है
आप को देवता बनाना है
मैं हूँ अपने सनम के बाहों में
मेरे क़दमों तले ज़माना है

नक़्श लायलपुरी 1951 में रोज़गार की तलाश में मुंबई आए और यहीं के होकर रह गए। लाहौर में तरक़्क़ीपसंद तहरीक का जो जज़्बा पैदा हुआ था उसे मुंबई में एक माहौल मिला-

ये अंजुमन, ये क़हक़हे, ये महवशों की भीड़
फिर भी उदास, फिर भी अकेली है ज़िंदगी 

गीतकार के रूप में उन्हें पहला मौका 1952 में मिला था, लेकिन 1970 के दशक के प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई। बाद में उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रूमानी और भावनात्मक गीत लिखे, जो लाखों दिलों को छू गया। लायलपुरी के लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में 'मैं तो हर मोड़ पर', 'ना जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया', 'उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा' और 'दो दीवाने शहर में' शामिल हैं। नौशाद के साथ 'ताजमहल' और खय्याम के साथ 'यात्रा' जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे। नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बी.आर. इशारा की फिल्म 'चेतना' से मिली और उसमें उनकी नज्म 'मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा' को अधिक सराहा गया। नक्श लायलपुरी के फिल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही। उन्होंने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन के साथ खूब काम किया, लेकिन मदन मोहन से काफी प्रभावित थे। उनका कहना था कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था। सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार नक्श जी उन्हें एक गीत लिखकर दिया-
 
आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें।।

इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पड़े और नक्श को गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखड़ा है। इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें। गायकी की हर विधा में नक्श यह बेजोड़ हैं. उनके गीतों को सभी ने सराहा- 

माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें के तेरे तलबगार हम नहीं
सींचा था जिस को ख़ूने तमन्ना से रात दिन
गुलशन में उस बहार के हक़दार हम नहीं
हमने तो अपने नक़्शे क़दम भी मिटा दिए
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं

हिंदी फिल्मों में कितने ही कालजयी गीत लिखने वाले नक्श लायलपुरी साहब का 22 जनवरी 2017 को मुंबई में 89 वर्ष की उम्र में इंतकाल हो गया। ये फ़नकार अपनी उम्र के अंतिम दिनों में लगभग गुमनामी की ज़िंदगी जीता रहा-

बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे
कुछ प्रसिद्ध गीत
  • धानी चुनर मोरी हाए रे
  • मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
  • कई सदियों से कई जन्मों से
  • उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
  • तुम्हें देखती हूं तो लगता है ऐसे
  • ये मुलाक़ात इक बहाना है
  • क़दर तूने ना जानी
  • चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है
  • चिट्ठिए
  • तुम्हें हो न हो मुझको तो
  • प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा
  • सीने में भी तूफ़ां है
  • न जाने क्या हुआ,जो तूने छू दिया
  • तुझ संग प्रीत लगाई सजना
  • नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं
  • जिंदगी की न टूटे लड़ी,प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी
  • मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती

गीतकार समीर

#24feb 
गीतकार समीर

🎂24 फ़रवरी 1958 , वाराणसी , ओदार गाँव।
पत्नी: अनीता पांडे
माता-पिता: अनजान, इंदिरा पांडे
बच्चे: सुचिता पांडे, सिद्धेश पांडे, संचिता पांडे

उनके पिता अंजान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रसिद्ध गीतकार थे
समीर हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार हैं। 

इनके ज्यादातर गीत हिट हुए और इनके द्वारा लिखें गए गीत आज भी लोगोंं की जुबानोंं पर हैं। उनके पिता अनजान भी गीतकार रहे थे। उनके पास सबसे अधिक गीत लिखने का गिनीज़ विश्व कीर्तिमान है। उन्होंने लगभग 650 फिल्मों में 4000 से अधिक गाने लिखे हैं। उन्हें यश भारती पुरस्कार भी मिला है।

पहले वह पढ़ाई कर बैंक में नौकरी करते थे। उनके पिता नहीं चाहते कि वो फिल्मी उद्योग में आए क्योंकि उन्होंने खूब संघर्ष किया था। लेकिन समीर का ध्यान उसी तरफ था और 1980 में वो बम्बई पलायन कर गए। उन्हें सबसे पहले 1983 की फिल्म बेखबर में गीत लिखने का अवसर मिला था इसके बाद उन्होंने कई बड़ी फिल्मों में गीत लिखें जिसमें इंसाफ कौन करेगा (1984),
 जवाब हम देंगे (1987), 
दो कैदी (1989), 
रखवाला (1989),
 महासंग्राम (1990) 
और बाप नम्बरी बेटा दस नम्बरी (1990) शामिल हैं। 
लेकिन उनको प्रसिद्धि और पहचान 1990 की दो फ़िल्मों दिल और आशिकी से मिली उन्होंने इन फिल्मों के संगीतकार आनंद-मिलिंद और नदीम-श्रवण के साथ कई प्रशंसित और लोकप्रिय गीतों की रचना की  विशेषकर नदीम-श्रवण के साथ उनका विशेष रिश्ता था। कुछेक फिल्मों को छोड़कर उन्होंने हर फिल्म में गीतकार के रूप में समीर को ही लिया और तीनों फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार उन्हें नदीम-श्रवण के संगीतबद्ध गीतों के लिये ही मिले। समीर मजरुह सुल्तानपुरी और आनन्द बक्शी से प्रभावित हैं और उन्हें अपने पिता सहित प्रेरणा स्त्रोत मानते हैं।

इनके ज्यादातर गीत हिट हुए और इनके द्वारा लिखें गए गीत आज भी लोगोंं की जुबानोंं पर हैं। उनके पिता अनजान भी गीतकार रहे थे। उनके पास सबसे अधिक गीत लिखने का गिनीज़ विश्व कीर्तिमान है। उन्होंने लगभग 650 फिल्मों में 4000 से अधिक गाने लिखे हैं।उन्हें यश भारती पुरस्कार भी मिला है।

✍️उन्हों ने बताया
एम. कॉम करने के बाद मेरे दादा शिवनाथ प्रसाद जी की इच्छा थी कि मैं बैंक में काम करूं। दादा जी सेंट्रल बैंक ऑफ इण्डिया में काम करते थे। घर से कोई दूसरा बैंक नौकरी में गया नहीं और, चूंकि मैं एमकॉम कर रहा था तो सबकी टकटकी मेरे ही ऊपर थी और मैंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ज्वाइन कर लिया। लेकिन इसी बीच गीत लिखने का शौक बलवान हो गया, लोग मेरी कवि सम्मेलनों और मुशायरों में खूब तारीफ करते थे। बैक ज्वाइन करने के बाद मुझे लगा कि यह जगह मेरे लायक  नहीं है। मैं गलत कर रहा हूं। दिल कुछ और बोल रहा है और मैं मजबूरी में कुछ और कर रहा हूं। दो दिन सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी करने के बाद नौकरी छोड़ दी 
बैंक की नौकरी छोड़ने के बाद मां से 500 रुपये लेकर 5 अप्रैल 1980  को काशी एक्सप्रेस पकड़कर 6 अप्रैल को मुंबई की सरजमीं पर आ गया। पिता जी की मंशा थी कि मैं कुछ भी बनूं लेकिन गीतकार ना बनूं। वह कहते थे कि शौकिया तुम लिखते हो लिखते रहो, उसमे मुझे कोई ऐतराज नहीं है मगर कभी इस तरफ रुख मत करना। इसलिए उन्होंने मुझे साहित्य न पढ़ाकर कॉमर्स पढ़ाया। जब मुंबई में आया तो पिता जी से मिलने की हिम्मत नहीं हुई। गीतकार बनने का फैसला मेरा था, इसलिए मुझे अपनी अलग लड़ाई लड़नी थी।

मुंबई आने के बाद शुरुआती दिनों में बहुत संघर्ष किया। उन दिनों मलाड मालवानी चाल में रहता था। शुरुआती एक साल का जो संघर्ष था। आज भी याद करता हूं तो मेरी रूह कांप जाती है कि मैं कैसे रहा? न तो सही तरीके से खाना नसीब होता था और न ही रहने की सही व्यवस्था थी। शौच के लिए भी एक घंटे लाइन लगानी पड़ती थी। लेकिन इसके सिवा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। तकरीबन नौ साल की लड़ाई के बाद सफलता फिल्म 'दिल' से मिली और इसके बाद मेरी दुनिया बदल गई।
पिताजी ने एक बार मुझे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से मिलवाया। लक्ष्मीकांत जी बोले, 'अनजान जी मुझसे तो कह दिया। किसी और से मत कहिएगा। एक बात याद रखिए बाप की दुकान बाप की होती है और बेटे की दुकान बेटे की होती है। अगर इसके अंदर माद्दा है तो मुझे खुद मुखड़ा सुना कर प्रभावित  करे। मैं चार साल तक लगातार चक्कर लगाता रहा। चार साल बाद फिल्म 'लव 86' में एक गाना लिखने का मौका दिया। मेरा मानना है कि जीवन की लड़ाइयां तो खुद ही लड़नी पड़ती है। 
संगीतकार ऊषा खन्ना के घर पहुंचा। उनको सिर्फ चार गाने सुनाए और उन्होंने उसमें से दो गाने तुरंत फाइनल कर दिए। इस तरह से मुझे पहली फिल्म 'बेखबर' में 'गोरी परेशान है,काली परेशान है' लिखने का मौका मिला।

ललिता पवार

#18april
#24feb 

ललिता पवार 

🎂18 अप्रैल , 1916
⚰️24 फरवरी ,1998

पति: राज कुमार गुप्ता (विवा. ?–1998), गणपतराव पवार
बच्चे: जय पवार
माता-पिता: लक्ष्मण राव शगुन
टीवी शो: रामायण, Sasural
हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। जिन्होंने अभिनय की यात्रा का सात दशक लंबा सफर तय किया। 
1942 में फिल्म 'जंग-ए-आजादी' के एक सीन में अभिनेता भगवान दादा को उन्हें जोरदार थप्पड़ मारना था. एक नए अभिनेता होने के नाते, उन्होंने गलती से ललिता को बहुत जोर से थप्पड़ मार दिया था, जिसकी वजह से ललिता के चेहरे के एक साइड लकवा मार दिया और उनकी बाईं आंख की नस फट गई.

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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
उन्होंने साल 1932 में आई एक मूक फिल्म 'कैलाश' में सह-निर्माण और अभिनय किया था. 1942 में फिल्म 'जंग-ए-आजादी' के एक सीन में अभिनेता भगवान दादा को उन्हें जोरदार थप्पड़ मारना था. एक नए अभिनेता होने के नाते, उन्होंने गलती से ललिता को बहुत जोर से थप्पड़ मार दिया था, जिसकी वजह से ललिता के चेहरे के एक साइड लकवा मार गया मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो तीन साल के इलाज के बाद, ललिता की बाईं आंख खराब हो गई थी. इस प्रकार उन्हें मुख्य भूमिकाएं छोड़नी पड़ीं, और साइड रोल में काम करना पड़ा, जिससे वह बाद में काफी मशहूर हो गई. बता दें, इस घटना से पहले वह फिल्मों में लीड एक्ट्रेस की भूमिका में नजर आया करती थीं, लेकिन बाद में फिल्म मेकर्स और डायरेक्टर उन्हें लीड रोल में लेने से इनकार कर दिया.कहा तो ये भी जाता है कि इलाज के कारण ललिता पवार को 3 सालों तक घर पर खाली बैठना पड़ा था और जब वह पर्दे पर वापसी कीं, तो उन्हें सिर्फ मां-बहन और सास के रोल ही मिलने लगे और फिर ललिता पवार सिर्फ कैरेक्टर रोल्स तक ही सिमट कर रह गईं, लेकिन कला एक ऐसी चीज है, जो आपको अपने मुकाम तक पहुंचा ही देती है. ललिता ने कैरेक्टर रोल करके जो स्टारडम हासिल की, वो शायद आज की लीड को भी बहुत मुश्किल से नसीब हो पाए.लेकिन, जिंदगी से ललिता की जंग यहीं नहीं खत्म हुई, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ललिता पवार की जिंदगी में दुखों का पहाड़ फिर टूटा और उनकी शादीशुदा जिंदगी तब तबाह हो गई जब उनकी पति फिल्ममेकर गणपत राव की अफेयर उनकी छोटी बहन के साथ शुरू हुई, फिर ललिता ने अपने पति से अलग हो गईं और बाद में, उन्हें कैंसर हो गया और कैंसर से जंग लड़ते-लड़ते उनकी सेहत धीरे-धीरे खराब होती चली गई और आखिरकार वह यह जंग हार गईं. 24 फरवरी 1998 को ललिता का निधन हो गया था.
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भारतीय नारी का जीवन जीते हुए
एक संजीदा कलाकार जिन्होंने सिनेमा को कई यादगार फ़िल्में दीं। ‘जंगली’ की सख्त मां, ‘श्री 420’ की केला बेचने वाली, ‘ आनंद’ की संवेदनशील मातृछवि और ‘अनाड़ी’ की मिसेज डिसूजा सहित अनेक चरित्रों की जीवंत छवियों को कैसे भूला जा सकता है। रामानन्द सागर द्वारा निर्मित 'रामायण' धारावाहिक में मंथरा की भूमिका को सजीव भी ललिता पवार ने ही बनाया था।

ललिता पवार (वास्तविक नाम: 'अंबा लक्ष्मण राव शागुन') ने नासिक के नाम से निकट येवले में 18 अप्रैल , 1916 को जन्म लिया। उन्होंने भारतीय सिनेमा में एक लंबा सफर तय किया। वे सिनेमा के आरंभिक दौर से लेकर आधुनिक समय
तक की दृष्टा और साक्षी थीं। मूक फ़िल्मों की मौन भाषा से लेकर बोलती फ़िल्मों के
वाचाल जादू के दौर को उन्होंने देखा। भारतीय सिनेमा को परवान चढ़ते देखा। इस विकास-क्रम का एक हिस्सा बनीं। स्त्री-जीवन के विविध आयामों को पर्दे पर निभाया। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक विभिन्न स्त्री-छवियों में ललिता घुल-मिल गईं। भारतीय नारी के हर एक चरित्र में ढल गईं। ललिता पवार हिंदी सिनेमा
में भारतीय नारी जीवन की एक महान
कलाकार थीं। इस क्रम में एक परंपरागत सास की छवि को उन्होंने इतना बखूबी निभाया कि यह उनकी पहचान ही बन गई

ललिता ने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल-कलाकार की तरह आर्यन फ़िल्म कंपनी के साथ की। मूक प्रोडक्शन वाली फ़िल्मों की मुख्य भूमिका वाले नारी-चरित्रों की भूमिकायें निभाता उनका फ़िल्मी सफर जारी रहा। उस समय फ़िल्मों में उनका स्क्रीन नाम 'अंबू' था।
मूक स्टंट फ़िल्म ‘दिलेर जिगर’ उनकी प्रारंभिक सफलतम फ़िल्मों में शुमार है, जिसे ललिता के पति जी.पी. पवार ने निर्देशित किया था। अवाक फ़िल्मों से बोलती फ़िल्मों की यात्रा में सहभागी रहीं ललिता ने टॉकी फ़िल्मों में भी कई मुख्य भूमिकायें निभाईं, जिनमें शामिल
हैं- ‘राजकुमारी’ (1938), ‘हिम्मत-ए-मर्द’ (1935) और ‘दुनिया क्या है’ (1937)। ‘दुनिया क्या है’ ललिता की ही निर्माण की हुई फ़िल्म थी

मुख्य भूमिकायें निभातीं ललिता पवार की किस्मत ने पलटा खाया और एक दुर्घटना ने उनका चेहरा बिगाड़ दिया और उनकी आंखों की रोशनी भी खराब हो गई। लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अभिनय का साथ नहीं छोड़ते हुये चरित्र-प्रधान रोल करने लगीं। फ़िल्म ‘रामशास्त्री’(1944) में अपनी खराब हो चुकी बायीं आंख का कलात्मक प्रयोग क्रूर और परंपरागत सास की भूमिका में किया। उनकी यह भूमिका उनका सर्वाधिक मशहूर स्क्रीन इमेज बन गई। 1960 और 1970 के दशकों में ललिता
बहुधा इस छवि में मिल जाती हैं

ललिता पवार बहुआयामी प्रतिभा संपन्न
अभिनेत्री थीं जो ऐतिहासिक फ़िल्मों के
इतिहास में शामिल हो गईं, पौराणिक फ़िल्मों संग देवी-देवताओं की मायावी छवियां रच गईं, हास्य फ़िल्मों की गुदगुदी बन गईं, थ्रिलर फ़िल्मों की सनसनी और सामाजिक फ़िल्मों की सामाजिक छवि बन गईं। ललिता ने हिंदी सिनेमा को अपनी कई यादगार छवियां दीं। ‘जंगली’ में शम्मी कपूर की माँ, ‘श्री 420’ में केला बेचने वाली, ‘ आनंद’ की संवेदनशील
मातृछवि और ‘अनाड़ी’ की गौरव-गुरूर मिसेज डिसूजा को जिसने देखा है वह ललिता पवार को कभी भुला नहीं सकता। ललिता पवार महज एक अभिनेत्री ही नहीं हिंदी सिनेमा के अपने
सात दशक लंबे सफर की गाथा का एक हिस्सा थीं। मुख्य भूमिकायें निभातीं सुंदर अभिनेत्री ही नहीं नारी की तमाम अभिव्यक्तियों को अभिनीत करतीं सह-अभिनेत्री थीं

फ़िल्म ‘अनाड़ी’ (1959) में मिसेज डिसूजा की भूमिका में ललिता ने हिंदी सिनेमा की ईसाई मां की रूपरेखा गढ़ डाली। इस भूमिका ने उन्हें 1959 का सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार भी दिलाया। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1961) भी मिला।

ललिता पवार की मृत्यु 24 फरवरी , 1998 को पुणे में हुई। ललिता पवार ने लगभग 600 फ़िल्मों में काम किया और 'शो मस्ट गो ऑन' की भावना को जिया। फ़िल्म उद्योग ने उन्हें ज्यादा पुरस्कार नहीं दिए और विस्मृत भी कर दिया है, परंतु उनकी जन्मभूमि में उनकी स्मृति में कुछ किया जाना चाहिए।

संजय लीला भंसाली

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संजय लीला भंसाली

 🎂जन्मः 24 फ़रवरी 1964

भांजियां या भतीजियां: शर्मिन सेगल, सिमरन सेगल, शर्मिन सहगल
प्रोडक्शन कंपनी: भंसाली प्रोडक्शंस
इस संगठन की स्थापना की: भंसाली प्रोडक्शंस
माता-पिता: नवीन भंसाली, लीला भंसाली
बहन: बेला सेगल

 हिन्दी फिल्म उद्योग बॉलीवुड के एक निर्देशक हैं। वह भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान के छात्र रह चुके हैं।
शानदार सेट, शाही किरदार, गानों में गहराई और दमदार कहानी..., संजय लीला भंसाली (Sanjay Leela Bhansali) की फिल्मों की खासियत यहीं खत्म नहीं होती है। एडिटर और असिस्टेंट बनकर अपना करियर शुरू करने वाले भंसाली आज सिनेमा के मंझे हुए निर्देशक हैं। उन्होंने सिनेमा को हम दिल दे चुके सनम, देवदास, पद्मावत, राम-लीला और ब्लैक जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में बनाकर इतिहास रच दिया।

पिता थे प्रोड्यूसर, फिर भी हालत थी मंदी
24 फरवरी 1963 को मुंबई में जन्मे भंसाली के पिता नवीन भंसाली भी प्रोड्यूसर हुआ करते थे, जिन्होंने जहाजी लुटेरा (1958) जैसी फिल्मों का निर्माण किया था। पिता भले ही ग्लैमर वर्ल्ड से जुड़े रहे, लेकिन हालत मंदी रही। बचपन से ही छोटा और बेरंग मकान देखा, गरीबी में गुजारा किया। 
संजय लीला भंसाली का बचपन गरीबी में बीता। वह और उनकी बहन अपने माता-पिता के साथ चॉल में रहा करते थे। मां कपड़े सिलकर गुजारा करती थीं।


 1942: ए लव स्टोरी फिल्म से उन्होने, अपनी मां को श्रद्धांजली देने के लिये, अपने नाम मे "लीला" लिखना शुरू किया इन्होंने 2018 में प्रदर्शित हुई पद्मावत का भी निर्देशन किया जिस पर बहुत विवाद हुआ था।

भंसाली ने अपना कैरियर विधु विनोद चोपड़ा के साथ बतौर सहायक निर्देशक शुरू किया। विधु के साथ भंसाली ने परिन्दा और 1942: ए लव स्टोरी जैसी फिल्मे की सन 2002 मे आयी भंसाली निर्देशित फिल्म देवदास उस समय की सबसे महंगी फिल्म थी। इस फिल्म को के निर्माण में 50 करोड रुपये लगे थे और इसने करीब 100 करोड रूपये का व्यवसाय किया था। उस साल इस फिल्म ने 5 राष्ट्रीय पुरस्कार और 10 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते थे। टाइम पत्रिका ने नई सदी के अब तक के सालों में बनी सर्वश्रेष्ठ दस फिल्मों में देवदास को आठ्वीं जगह दी है 2005 मे प्रदर्शित उनकी फिल्म ब्लैक के लिये उन्हे एक बार फिर से हिन्दी सिनेमा का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

फिल्में बतौर निर्माता 

2007 साँवरिया 
2005 ब्लैक 
1999 हम दिल दे चुके सनम 
2010 गुज़ारिश 

फिल्में बतौर निर्देशक 

2018 पद्मावत
2015 बाजीराव मस्तानी
2013 गोलियों की रासलीला रामलीला
2007 साँवरिया 
2005 ब्लैक 
2002 देवदास 
1999 हम दिल दे चुके सनम 
1996 खामोशी

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

नक्श लायलपुरी

महान गीतकार शायर नक़्श लायलपुरी
#24feb 
#22jan 
🎂24 फरवरी, 1928
⚰️22 जनवरी 2017अंधेरी
 लायलपुरी के वालिद मोहतरम जगन्नाथ ने उनका नाम जसवंत राय शर्मा रखा था। शायर बनने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया और बन गए नक्श लायलपुरी। साहित्य में उनकी दिलचस्पी उनके स्कूल के दिनों में ही दिख गई, जब उनकी स्कूल टीचर साल के अंत में उनकी कॉपी इसलिए खरीदती थीं, क्योंकि उनमें उनकी कविताएं लिखी होती थीं। साल 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद उनका परिवार शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में लखनऊ आ गया। पान खाने और मुस्कराने की आदत उनको लखनऊ से ही मिली। उनकी शख़्सियत में वही नफ़ासत और तहज़ीब है जो लखनऊ वालों में होती है। लखनऊ की अदा और तवस्सुम उनकी इल्मी और फ़िल्मी शायरी में मौजूद है-

कई बार चाँद चमके तेरी नर्म आहटों के
कई बार जगमगाए दरो-बाम बेख़ुदी में

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दर्द को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था और बंटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था और यह उनकी शायरी में बखूबी नजर आया-

हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर
क्यूं न इंसा से मोहब्बत करें इंसा होकर

नक्श लायलपुरी के ग़ज़ल का चेहरा दर्द के शोले में लिपटे हुए शबनमी एहसास की लज़्ज़त से तरबतर है। शायरी के इस समंदर में एक तरफ़ फ़िक्र की ऊँची-ऊँची लहरें हैं तो दूसरी तरफ़ इंसानी जज़्बात की ऐसी गहराई है जिसमें डूब जाने को मन करता है। कहते हैं नाम भले भूल जाए, लफ्ज बचे रहते हैं, और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते, हर दिल का राग बन जाते हैं। नक़्श साहब की शायरी में पंजाब की मिट्टी की महक, लखनऊ की नफ़ासत और मुंबई के समंदर का धीमा-धीमा संगीत है-

मेरी पहचान है शेरो-सुख़न से
मैं अपनी क़द्रो क़ीमत जानता हूं

ज़िंदगी के तजुरबात ने उनके लफ़्ज़ों को निखारा संवारा और शायरी के धागे में इस सलीक़े से पिरो दिया कि उनके शेर ग़ज़ल की आबरू बन गए। फ़िल्मी नग़मों में भी जब उनके लफ़्ज़ गुनगुनाए गए तो उनमें भी अदब बोलता और रस घोलता दिखाई दिया–

ये मुलाक़ात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है
धड़कने धड़कनों में खो जायें
दिल को दिल के क़रीब लाना है
ख़्वाब तो कांच से भी नाज़ुक है
टूटने से इन्हें बचाना है
मन मेरा प्यार का शिवाला है
आप को देवता बनाना है
मैं हूँ अपने सनम के बाहों में
मेरे क़दमों तले ज़माना है

नक़्श लायलपुरी 1951 में रोज़गार की तलाश में मुंबई आए और यहीं के होकर रह गए। लाहौर में तरक़्क़ीपसंद तहरीक का जो जज़्बा पैदा हुआ था उसे मुंबई में एक माहौल मिला-

ये अंजुमन, ये क़हक़हे, ये महवशों की भीड़
फिर भी उदास, फिर भी अकेली है ज़िंदगी 

गीतकार के रूप में उन्हें पहला मौका 1952 में मिला था, लेकिन 1970 के दशक के प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई। बाद में उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रूमानी और भावनात्मक गीत लिखे, जो लाखों दिलों को छू गया। लायलपुरी के लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में 'मैं तो हर मोड़ पर', 'ना जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया', 'उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा' और 'दो दीवाने शहर में' शामिल हैं। नौशाद के साथ 'ताजमहल' और खय्याम के साथ 'यात्रा' जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे। नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बी.आर. इशारा की फिल्म 'चेतना' से मिली और उसमें उनकी नज्म 'मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा' को अधिक सराहा गया। नक्श लायलपुरी के फिल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही। उन्होंने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन के साथ खूब काम किया, लेकिन मदन मोहन से काफी प्रभावित थे। उनका कहना था कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था। सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार नक्श जी उन्हें एक गीत लिखकर दिया-
 
आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें।।

इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पड़े और नक्श को गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखड़ा है। इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें। गायकी की हर विधा में नक्श यह बेजोड़ हैं. उनके गीतों को सभी ने सराहा- 

माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें के तेरे तलबगार हम नहीं
सींचा था जिस को ख़ूने तमन्ना से रात दिन
गुलशन में उस बहार के हक़दार हम नहीं
हमने तो अपने नक़्शे क़दम भी मिटा दिए
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं

हिंदी फिल्मों में कितने ही कालजयी गीत लिखने वाले नक्श लायलपुरी साहब का 22 जनवरी 2017 को मुंबई में 89 वर्ष की उम्र में इंतकाल हो गया। ये फ़नकार अपनी उम्र के अंतिम दिनों में लगभग गुमनामी की ज़िंदगी जीता रहा-

बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे

उनकी गजल
शाख़ों को तुम क्या छू आए
काँटों से भी ख़ुशबू आए

देखें और दीवाना कर दें
गोया उनको जादू आए

कोई तो हमदर्द है मेरा
आप न आए आँसू आए

इश्क़ है यारो उनके बस का
जिन को दिल पर काबू आए

उन कदमों की आहट पाकर
फूल ही फूल लबे –जू आए

गूँज सुनी तेरे चरख़े की
पर्बत छोड़ के साधू आए

‘नक्श़’ घने जंगल में दिल के
फ़िर यादों के जुगनू आए

आंखो पर उनका अंदाज
तुझको सोचा तो खो गईं आँखें
दिल का आईना हो गईं आँखें
 
ख़त का पढ़ना भी हो गया मुश्किल
सारा काग़ज़ भिगो गईं आँखें
 
कितना गहरा है इश्क़ का दरिया
उसकी तह में डुबो गईं आँखें
 
कोई जुगनू नहीं तसव्वुर का
कितनी वीरान हो गईं आँखें
 
दो दिलों को नज़र के धागे से
इक लड़ी में पिरो गईं आँखें
 
रात कितनी उदास बैठी है
चाँद निकला तो सो गईं आँखें
 
'नक़्श' आबाद क्या हुए सपने
और बरबाद हो गईं आँखें


सोमवार, 15 जनवरी 2024

सरदुल सिकंदर


#15jan
#24feb 
सरदूल सिकंदर
🎂जन्म 15 जनवरी, 1961
जन्म भूमि गांव खेड़ी नौद, पंजाब
⚰️मृत्यु 24 फ़रवरी, 2021
मृत्यु स्थान चंडीगढ़, पंजाब
अभिभावक पिता- सागर मस्ताना
पति/पत्नी अमर नूरी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गायिकी
मुख्य फ़िल्में 'जग्गा डाकू', 'पुलिस इन पॉलीवुड' आदि।
प्रसिद्धि पंजाबी गायक व अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी सरदूल सिकंदर ने सिंगिंग कॅरियर में 25 से ज़्यादा अल्बम रिकॉर्ड किए। गायकी में अपने कदम जमाने के बाद उन्होंने दूसरी पारी की शुरुआत सन 1991 में आई फ़िल्म ‘जग्गा डाकू’ से की थी।
पंजाबी भाषा के लोक और पॉप संगीत से जुड़े प्रसिद्ध गायक तथा अभिनेता थे। सन 1980 के दशक में सरदूल सिकंदर ने अपनी पहली अलबम "रोडवेज दी लारी" निकाली थी। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने कई हिट गाने दिए। इसके अलावा फ़िल्मों में भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया। सरदूल सिकंदर ने पंजाबी फ़िल्म 'जग्गा डाकू' में शानदार अभिनय से अपनी अभिनय कला से सबका दिल जीत लिया था।

परिचय
पंजाब का फतेहगढ़ ज़िला। उसी का छोटा सा गांव खेड़ी नौद सिंह। 15 जनवरी, 1961 में सागर मस्ताना के घर एक लड़के का जन्म हुआ। नाम रखा गया सरदूल सिकंदर। सरदूल के अलावा सागर मस्ताना के दो बड़े बेटे भी थे। गम्दूर अमन और भरपूर। गम्दूर एक सूफी सिंगर थे। वहीं, भरपूर का वास्ता रहता था तबले से। पेशे से एक तबला वादक थे। खुद इनके पिता सागर मस्ताना अपने समय के महान तबला वादकों में गिने जाते हैं। संगीत से जुड़ी क्रिएटिविटी को सिर्फ सुरों में ही नहीं उतारते थे। बल्कि, नए-नए तबले बनाने की कोशिश में भी लगे रहते थे। इसी कोशिश में एक अलग किस्म का तबला भी ईजाद किया। जिसे बारीक बांस की लड़की से भी बजाया जा सकता था।
30 जनवरी, 1993 को सरदूल सिकंदर की शादी गायिका अमर नूरी से हुई। दोनों लंबे वक्त से साथ गा रहे थे। इसी दौरान प्यार हुआ। सरदूल की तरह अमर ने भी छोटी उम्र से म्यूज़िक सीखना शुरू कर दिया था। नौ साल की उम्र में गाना शुरू किया और 13 साल की उम्र में पहली रिकॉर्डिंग की। आगे चलकर सिंगिंग की दुनिया में खूब नाम कमाया। दोनों पति-पत्नी ने साथ मिलकर कई इंटरनेशनल म्यूज़िक टूर किए। जुगलबंदी ऐसी कि दोनों के सुर लय में दौड़ते। लेकिन इनकी ये केमिस्ट्री सिर्फ स्टेज तक ही नहीं थी। रियल लाइफ में भी उतनी ही मज़बूत थी।

कुछ साल पहले ही इसका नमूना भी देखने को मिला। दरअसल, सरदूल की किडनी में खराबी की वजह से ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ी। यानि किसी को अपनी किडनी उन्हें डोनेट करनी पड़ेगी। दोस्तों, रिश्तेदारों की तरफ देखा। लेकिन सब ने चुपचाप दूरी बना ली। ऐसे मुश्किल वक्त पर करीबियों का ऐसा बर्ताव देखकर सरदूल तनाव में आ गए। चिंता होने लगी कि अब पता नहीं क्या होगा। अमर नूरी ने उन्हें हिम्मत दी। वादा किया कि जब तक मैं हूं, आपको कुछ नहीं होने दूंगी। और फिर अपनी बात साबित करके दिखाई। सरदूल का ब्लड ग्रुप ए पॉज़िटिव था। वहीं, अमर का ब्लड ग्रुप ओ पॉज़िटिव था। ओ पॉज़िटिव को यूनिवर्सल डोनर कहा जाता है। यानि कि वो ब्लड ग्रुप जो किसी को भी डोनेट कर सकता है। अमर को विश्वास था कि जहां दिल मिल सकते हैं, तो क्या किडनियां नहीं मिलेंगी। सुनने में शायद फ़िल्मी लगे। लेकिन उनका ये विश्वास सही साबित हुआ और सरदूल के लिए उन्होंने अपनी किडनी डोनेट की।
कहना गलत नहीं होगा कि सरदूल सिकंदर को संगीत विरासत में मिला। उनकी कई पुश्तें खुद को संगीत के प्रति समर्पित कर चुकी थीं। लेकिन सागर मस्ताना नहीं चाहते थे कि छोटा बेटा भी अपनी पूरी ज़िंदगी संगीत के नाम कर दे। कारण था उस समय में शास्त्रीय संगीत का सिकुड़ा हुआ स्कोप। आज के समय की तरह ना ही इतने संसाधन थे, और ना ही इतना पैसा। उधर, सरदूल का म्यूज़िक से सिर्फ प्यार था। उसकी ओर रुझान नहीं। चाहते थे कि बड़े होकर पायलट बनें। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। सरदूल के पिता बच्चों को संगीत सिखाते थे। सरदूल को इजाज़त नहीं थी कि वो भी साथ बैठकर सीख सकें। लेकिन मन में संगीत सीखने की इच्छा भी थी। फिर उसे तृप्त करने का जुगाड़ निकाला। जब पिता बच्चों को संगीत सिखा रहे होते, तो उस समय दीवार की आड़ लेकर खुद भी चुपचाप सुनते रहते। ये सिलसिला कई दिनों तक चला।

एक दिन पिता ने बच्चों को नई सरगम सिखाई। सब से उसे दोहराने को कहा। लेकिन एक भी बच्चा सही से नहीं दोहराया पाया। सब के जाने के बाद सरदूल उस सरगम को दोहराने की कोशिश करने लगे। तभी उनके पिता की नज़र पड़ी। सरदूल को लगा कि अब तो जमकर पिटाई होगी। पर ऐसा हुआ नहीं। पिता ने सरदूल से वही सरगम गाने को कहा। डरते-डरते सरदूल ने कोशिश की। इसके बाद पिता ने नन्हें सरदूल को गोद में उठा लिया। क्यूंकि सरदूल ने बिना किसी प्रैक्टिस के सही गाया था। पिता को बेटे का हुनर नज़र आ गया। जिसके बाद सरदूल को संगीत सीखने की इजाज़त दे दी।

संघर्ष का समय

एचएमवी उस दौर की बहुत बड़ी म्यूज़िक कंपनी थी। यानि जिस सिंगर को एचएमवी ने साइन कर लिया, उसके तो दिन फिर गए। सरदूल भी ऐसे ही सिंगर्स की लिस्ट में अपना नाम देखना चाहते थे। सरदूल सिकंदर के परिवार की आर्थिक स्थिति ज़्यादा मज़बूत नहीं थी एचएमवी का ऑफिस था दिल्ली में। जाने लायक किराये का जुगाड़ करना भी मुश्किल। थोड़ा बहुत पैसा दोस्तों से उधार ले लेते। फिर भी पूरा नहीं हो पाता। न्यूज़ पेपर वाली वैन दिल्ली तक जाती थी। सोचा कि क्यूं ना उसी से सफर किया जाए। बस के मुकाबले तो कम ही पैसे देने पड़ेंगे। लेकिन न्यूज़ पेपर वैन के साथ एक समस्या थी कि ये सुबह 4:30 बजे दिल्ली पहुंच जाती थी और एचएमवी का ऑफिस खुलता था 10 बजे के बाद। इस बीच सरदूल किसी पार्क में जाकर सो जाया करते। अक्सर गश्त पर निकली पुलिस पार्क में सोए लोगों को उठा देती। डंडे मारती। कहती कि रात को यहां सोते हो और दिन में चोरियां करते हो। पार्क में सोने से सरदूल सिकंदर को एक और नुकसान होता। कपड़े गंदे हो जाते और इन गंदे कपड़ों के साथ जब भी HMV के दफ्तर पहुंचते, तो वापस ही लौटा दिए जाते।

सफलता
सरदूल सिकंदर सिर्फ बेहतरीन गले के ही धनी नहीं थे। बल्कि, वे तुम्बी भी बड़ी अच्छी बजाते थे। अक्सर तुम्बी की रिकॉर्डिंग पर भी जाया करते थे। एक ऐसे ही मौके पर करतार रमला के स्टूडियो में रिकॉर्ड कर रहे थे। रिकॉर्डिंग खत्म कर बाहर निकले और कुछ ऐसे ही गुनगुनाने लगे। उनकी आवाज़ अंदर बैठे म्यूज़िशियन के कानों में पड़ी। जो उठकर बाहर आए। सरदूल सिकंदर से पूछा कि क्या अभी तुम गा रहे थे। सरदूल को लगा कि अंदर रिकॉर्डिंग चल रही थी और उनके गाने से उसमें भंग पड़ गया। म्यूज़िशियन उन्हें सीधा चरणजीत आहूजा के पास ले गए। सरदूल के बारे में उन्हें बताया। चरणजीत ने HMV के मैनेजर को बुलाया। कहा कि इस लड़के को मौका दीजिए। मैनेजर ने साफ इनकार कर दिया। कहा कि नए लड़के के साथ रिस्क नहीं ले सकते।

इसके बाद चरणजीत आहूजा ने खुद सरदूल का पहला अल्बम रिकॉर्ड करवाया जिसका नाम था ‘रोडवेज़ दी लारी’। अल्बम रिलीज़ होते ही लोगों की ज़बान पर इसके गाने चढ़ गए। अल्बम हिट साबित हुआ। इसके लिए सरदूल को 10 हज़ार रुपए मिले। अल्बम हिट होने के बावजूद लोग सरदूल सिकंदर को नहीं पहचानते थे। वजह थी उनकी आवाज़ में वेरिएशन। ज़्यादातर लोगों को लगता था कि ये गाने किसी जमे हुए सिंगर ने गाए हैं। किसी नए सिंगर ने नहीं। लोगों का ये भ्रम भी टूटा। जब सरदूल सिकंदर दूरदर्शन जालंधर के एक प्रोग्राम में परफॉर्म करने पहुंचे। लोग अब जान गए कि ये गाने किसके हैं। उसके बाद कभी सरदूल को पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी।

24 फ़रवरी, 2021 को सरदूल सिकंदर की मृत्यु हुई। वह मोहाली के फोर्टिस हॉस्पिटल में भर्ती थे। कोरोना विषाणु से पॉज़िटिव पाए जाने के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। उससे पहले किडनी ट्रांसप्लांट भी हुआ था। सरदूल सिकंदर को जानने वाले लोग यही कहते हैं कि वो एक ज़िंदादिल इंसान थे। हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे। शायद यही कारण था कि जनता के दिलों में ऐसी जगह बना पाए। अपने जाने के बाद ऐसा रिक्त स्थान छोड़ गए, जिसे भरना असंभव है।

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सरदूल सिकंदर के निधन पर गहरा दु:ख जताया। अमरिंदर सिंह ने ट्वीट करते हुए लिखा, "महान पंजाबी गायक सरदूल सिकंदर के निधन के बारे में जानकर बहुत दु:ख हुआ। हाल ही में उनकी कोरोना वायरस की जांच की गई थी और उनका इलाज चल रहा था। उनके परिवार और प्रशंसकों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना"।




मंगलवार, 5 दिसंबर 2023

जय ललिता

जयललिता जयराम
       #24feb
       #05dic 
🎂जन्म 24 फ़रवरी, 1948
जन्म भूमि मैसूर
⚰️मृत्यु 5 दिसम्बर, 2016
मृत्यु स्थान चेन्नई, तमिलनाडु

अभिभावक पिता- जयराम वेदवल्ली, माता- वेदावती
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि तमिल अभिनेत्री तथा राजनीतिज्ञ
पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम
पद तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री
कार्य काल 24 जून 1991 – 12 मई 1996, 14 मई 2001 – 21 सितम्बर 2001, 2 मार्च 2002 – 12 मई 2006, 16 मई 2011 से 27 सितम्बर, 2014 तक।
भाषा तमिल, तेलुगु, कन्नड़, अंग्रेज़ी, हिंदी
विशेष तमिलनाडु में जयललिता की लोकप्रियता ज़्यादा है, क्योंकि उनकी योजनाएं सीधे जनता से जुड़ती हैं। उनकी योजनाएं ग़रीबों के हित में हैं; और खास बात ये है कि उनकी योजनाओं को अम्मा ब्रांड कहा जाता है।
अन्य जानकारी जयललिता तमिल फ़िल्मों की अभिनेत्री भी थीं। उन्होंने तमिल के अलावा तेलुगु, कन्नड़ और हिन्दी भाषा की लगभग 300 फ़िल्मों में काम किया था।
परिचय
जयललिता का जन्म 24 फ़रवरी सन 1948 को मैसूर में मांडया ज़िले के पांडवपुर नामक तालुके के मेलुरकोट गाँव में एक 'अय्यर परिवार' में हुआ था। इनके पिता का नाम जयराम वेदवल्ली था तथा माता वेदावती थीं। जयललिता ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा चर्च पार्क कॉन्वेंट स्कूल और बिशप कॉटन गर्ल्स स्कूल में पाई। उन्होंने उच्च शिक्षा चेन्नई के चर्च पार्क प्रेजेंटेशन कान्वेंट और स्टेला मारिस कॉलेज से प्राप्त की थी। महज 2 साल की उम्र में ही जयललिता के पिता जयराम, उन्हें माँ के साथ अकेला छोड़ चल बसे थे। इसके बाद शुरू हुआ ग़रीबी और अभाव का वह दौर, जिसने जयललिता को इतना मज़बूत बना दिया कि वे विषम परिस्थितियों में भी खुद को सहज बनाए रखने में पूरी तरह से सफल रहीं। विपक्ष के लिये ख़तरा और अपने चाहने वालों के बीच 'अम्मा' के नाम से मशहूर जयललिता ने अपनी राह अपने आप तय की।

फ़िल्मी कॅरियर
जयललिता ने सिर्फ़ 15 साल की उम्र में परिवार को चलाने के लिए फ़िल्मों का रुख़ कर लिया। उन्होंने बाल कलाकार के रूप में फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत की थी। 1964 में जयललिता को कन्नड़ फ़िल्म 'चिन्नाड़ा गोम्बे' में लीड रोल मिला। जयललिता ने हिंदी, कन्नड़ और इंग्लिश फ़िल्मों में भी काम किया। उन्होंने जानेमाने निर्देशक श्रीधर की फ़िल्म 'वेन्नीरादई' से अपना फ़िल्मी कॅरियर शुरू किया और लगभग 300 फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने तमिल के अलावा तेलुगु, कन्नड़ और हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया।

एम. जी. रामचंद्रन के साथ जोड़ी
सन 1965 में जयललिता ने तमिल फ़िल्म में काम किया, जो बहुत बड़ी हिट साबित हुई। इसी साल उन्होंने एम. जी. रामचंद्रन के साथ भी काम किया। एम. जी. रामचंद्रन तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और जयललिता के पॉलिटिकल मेंटर भी बनें। 1965 से 1972 के दौर में उन्होंने अधिकतर फ़िल्में एम. जी. रामचंद्रन के साथ कीं। 1970 में पार्टी के लोगों के दबाव में एम.जी. आर ने दूसरी अभिनेत्रियों के साथ भी काम करना शुरू कर दिया। वहीं जयललिता भी दूसरे अभिनेताओं के साथ फ़िल्में करने लगीं। करीब 10 सालों तक इन दोनों ने एक साथ कोई फ़िल्म नहीं की। 1973 में जयललिता और एम. जी. आर की जोड़ी आखिरी बार नजर आई थी। इन दोनों ने कुल मिलाकर 28 फ़िल्मों में साथ काम किया। 1980 में उन्होंने अपनी आखिरी तमिल फ़िल्म में काम किया।

राजनीतिक जीवन
राजनीतिक जीवन
पार्टी के अंदर और सरकार में रहते हुए मुश्किल और कठोर फ़ैसलों के लिए मशहूर जयललिता को तमिलनाडु में 'आयरन लेडी' और तमिलनाडु की 'मारग्रेट थैचर' भी कहा जाता है। कम उम्र में पिता के गुजर जाने के बाद जयललिता को पूर्व अभिनेता और नेता एम. जी. रामचंद्रन 1982 में राजनीति में लाए। उसी साल वह ए.आई.ए.डी.एम.के. के टिकट पर राज्यसभा के लिए मनोनीत की गईं और उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

ब्राह्मण विरोधी मंच पर द्रविड़ आंदोलन के नेता अपने चिर प्रतिद्वंद्वी एम. करुणानिधि से जयललिता की लंबी भिड़ंत हुई। राजनीति में 1982 में आने के बाद औपचारिक तौर पर उनकी शुरूआत तब हुई, जब वह अन्नाद्रमुक में शामिल हुईं। वर्ष 1987 में एम. जी. रामचंद्रन के निधन के बाद पार्टी को चलाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गयी और उन्होंने व्यापक राजनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया। भ्रष्टाचार के मामलों में 68 वर्षीय जयललिता को दो बार पद छोड़ना भी पड़ा, लेकिन दोनों मौके पर वह नाटकीय तौर पर वापसी करने में सफल रहीं। राजनीति में उनकी शुरुआत 1982 में हुई, जिसके बाद एमजीआर ने उन्हें अगले साल प्रचार सचिव बना दिया। रामचंद्रन ने करिश्माई छवि की अदाकारा-राजनेता को 1984 में राज्यसभा सदस्य बनाया, जिनके साथ उन्होंने 28 फ़िल्में की थीं। जयललिता ने 1984 के विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रभार का तब नेतृत्व किया, जब रामचंद्रन अस्वस्थता के कारण प्रचार नहीं कर सके थे।

मुख्यमंत्री का पद

वर्ष 1987 में रामचंद्रन के निधन के बाद राजनीति में वह खुलकर सामने आयीं, लेकिन अन्नाद्रमुक में फूट पड़ गयी। ऐतिहासिक राजाजी हॉल में एमजीआर का शव पड़ा हुआ था और द्रमुक के एक नेता ने उन्हें मंच से हटाने की कोशिश की। बाद में अन्नाद्रमुक दल दो धड़े में बंट गया, जिसे जयललिता और रामचंद्रन की पत्नी जानकी के नाम पर 'अन्नाद्रमुक जे' और 'अन्नाद्रमुक जा' कहा गया। एमजीआर कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री आर. एम. वीरप्पन जैसे नेताओं के खेमे की वजह से अन्नाद्रमुक की निर्विवाद प्रमुख बनने की राह में अड़चन आयी और उन्हें भीषण संघर्ष का सामना करना पड़ा। रामचंद्रन की मौत के बाद बंट चुकी अन्नाद्रमुक को उन्होंने 1990 में एकजुट कर 1991 में जबरदस्त बहुमत दिलायी। 1991 में ही प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हुई थी और इसके बाद ही चुनाव में जयललिता ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया था, जिसका उन्हें फ़ायदा पहुँचा था। लोगों में डी.एम.के. के प्रति ज़बरदस्त गुस्सा था, क्योंकि लोग उसे लिट्टे का समर्थक समझते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद जयललिता ने लिट्टे पर पाबंदी लगाने का अनुरोध किया था, जिसे केंद्र सरकार ने मान लिया था।

जयललिता ने बोदिनायाकन्नूर से 1989 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और सदन में पहली महिला प्रतिपक्ष नेता बनीं। इस दौरान राजनीतिक और निजी जीवन में कुछ बदलाव आया, जब जयललिता ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ द्रमुक ने उन पर हमला किया और उनको परेशान किया। अलबत्ता, पांच साल के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों, अपने दत्तक पुत्र के विवाह में जमकर दिखावा और उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं करने के चलते उन्हें 1996 में अपने चिर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी। इसके बाद उनके खिलाफ आय के ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति सहित कई मामले दायर किये गए। अदालती मामलों के बाद उन्हें दो बार पद छोड़ना पड़ा- पहली बार 2001 में दूसरी बार 2014 में।

कार्यक्षमता

जयललिता 2001 में जब दोबारा सत्ता में आईं, तब उन्होंने लॉटरी टिकट पर पाबंदी लगा दी। हड़ताल पर जाने की वजह से दो लाख कर्मचारियों को एक साथ नौकरी से निकाल दिया, किसानों की मुफ़्त बिजली पर रोक लगा दी, राशन की दुकानों में चावल की क़ीमत बढ़ा दी, 5000 रुपये से ज़्यादा कमाने वालों के राशन कार्ड खारिज कर दिए, बस किराया बढ़ा दिया और मंदिरों में जानवरों की बलि पर रोक लगा दी। लेकिन 2004 के लोक सभा चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद उन्होंने पशुबलि की अनुमति दे दी और किसानों की मुफ़्त बिजली भी बहाल हो गई। उन्हें अपनी आलोचना बिल्कुल पसंद नहीं थी और इस वजह से उन्होंने कई समाचार पत्रों के ख़िलाफ़ मानहानि के मुक़दमे किये।

जयललिता तथा एमजीआर

तमिलनाडु की राजनीति के दो नायक एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) और जयललिता के आपसी संबंध हमेशा चर्चा का विषय रहे। एमजीआर फिल्मी दुनिया में जयललिता के मेंटर थे तो राजनीति में उनके गुरु। एमजीआर जयललिता से बेहद लगाव रखते थे और वो उनका हर दम ख्याल भी रखते थे। एक बार एक फिल्म की शूटिंग के दौरान जयललिता नंगे पांव थीं और तेज धूप के कारण उनके पैर जलने लगे तो एमजीआर ने उन्हें तकलीफ से बचाने के लिए गोद में उठाकर कार तक पहुंचाया।

बाद में अपने एक इंटरव्यू में इस घटना का जिक्र करते हुए जयललिता ने कहा था कि- "एमजीआर कई बार असल जिंदगी में भी हीरो की भूमिका निभाते थे।"

वाकया उस समय का है जब जयललिता एमजीआर के साथ 'आदिमयप्पन' फिल्म की थार रेगिस्तान में शूटिंग कर रही थीं। फिल्म में वो गुलाम लड़की का रोल निभा रही थीं, इसलिए उन्हें नंगे पांव शूटिंग करनी थी। चूंकि फिल्म सेट पर बाकी लोगों ने जूते पहन रखे थे, इसलिए किसी को इस बात का अंदाजा नहीं हुआ कि धूप बढ़ने के साथ रेत तपने लगी है। कुछ ही घंटे बाद रेत इतनी गरम हो गई कि जयललिता के पांव बुरी तरह जलने लगे। फिल्म यूनिट के किसी सदस्य ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन एमजीआर ने भांप लिया कि रेत से जयललिता के पांव जल रहे हैं। उन्होंने तत्काल फिल्म की शूटिंग पैक अप करने के लिए कह दिया। जयललिता की जीवनी "अम्माः जयललिताज जर्नी फ्रॉम मूवीज स्टार टू पोलिटिकल क्वीन" लिखने वाली वासंती ने अपनी किताब में इस वाकये का जिक्र किया है। जयललिता की मुश्किल यहीं नहीं खत्म हुई। उनकी गाड़ी शूटिंग स्थल से थोड़ी दूरी पर खड़ी थी। वे तपती रेत पर नंगे पांव रखते हुए कार तक जाने लगीं, लेकिन धीरे-धीरे जलन उनकी सहनशक्ति से बाहर होने लगी और उन्हें लगने लगा कि वे चक्कर खाकर गिर पड़ेंगी। जयललिता ने बाद में एक इंटरव्यू के दौरान उस घटना को याद करते हुए कहा था- "वो नरक से गुजरने जैसा था।" इस बार भी जयललिता की हालत एमजीआर ने समझी और उन्होंने एक शब्द कहे-सुने बिना गोद में उठा लिया और कार तक ले गए। जयललिता ने अपने इंटरव्यू में कहा था- "मैं एक कदम नहीं बढ़ा पा रही थी। मैं गिरने ही वाली थी। मैंने एक शब्द भी नहीं कहा, लेकिन एमजीआर ने मेरा दर्ज समझ लिया होगा। वे पीछे से अचानक आए और मुझे अपनी बांहों में उठा लिया। वे कई बार असल जिंदगी में भी हीरो की भूमिका निभाते थे।"

क्रिकेट से रिश्ता

ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम' की मुखिया जयललिता ने बॉलीवुड से अपना सफर शुरू किया था, लेकिन उनका एक खास रिश्ता क्रिकेट से भी रहा। जयललिता ने एक चैट शो के दौरान बताया था कि उनका पहला क्रश नरी कॉन्ट्रैक्टर थे, जबकि वे शम्मी कपूर की भी बहुत बड़ी फैन रहीं। नरी कॉन्ट्रैक्टर का पूरा नाम नरीमन जमशेदजी कॉन्ट्रैक्टर था। उन्होंने 1955 से 1962 के बीच भारत के लिए 31 टेस्ट मैच खेले। इस दौरान उनके बल्ले से एक शतक और 11 अर्द्ध शतक निकले थे। कॉन्ट्रैक्टर का जन्म 7 मार्च, 1934 को गुजरात के गोधरा में हुआ था। उन्होंने 52 टेस्ट पारियों में 31.58 की औसत से 1611 रन बनाए थे। दिल्ली में वेस्टइंडीज के खिलाफ 1958-1959 में 92 रनों की पारी खेलकर उन्होंने सनसनी मचा दी थी। 1960-1961 में उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय टीम की कमान संभाली थी। उस समय उनकी उम्र 26 साल की थी और वे उस समय भारत के सबसे कम उम्र में बने टेस्ट कप्तान थे। उन्होंने अपनी कप्तानी में भारत को इंग्लैंड के खिलाफ जीत दिलाई थी। बल्लेबाज और कप्तान के तौर पर वे अपने कॅरियर के चरम पर थे। 1962 में इंडियन टूरिस्ट कॉलोनी और बारबाडोस के बीच खेले गए मैच में उन्हें चार्ली ग्रिफिथ की गेंद सिर में जा लगी। कुछ समय तक उनकी जिंदगी खतरे में थी। उनकी कई सर्जरी करनी पड़ी, जिसके बाद वे खतरे से बाहर निकले। इसके बाद उनका अंतरराष्ट्रीय कॅरियर खत्म हो गया। दो साल बाद उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में वापसी तो की, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी नहीं कर सके। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उनके बल्ले से 138 मैचों में 39.86 की औसत से 8611 रन निकले थे।

हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री रहीं शर्मिला टैगोर ने जयललिता को श्रद्धंजलि देते हुए बताया था कि उन्हें पटौदी को बल्लेबाज़ी करते देखना बहुत पसंद था और वे सिर्फ नवाब पटौदी को देखने के लिए मैदान पर जाती थीं। शर्मिला टेगौर का कहना था कि उन्होंने ये भी सुना था कि जयललिता मैदान पर दूरबीन लेकर जाती थीं ताकि वे पटौदी को पास से देख सके। वैसे यह भी उल्लेखनीय है कि जयललिता ने एक इंटरव्यू के दौरान ये भी कहा था कि उन्हें भारत के पूर्व कप्तान नरी कॉन्ट्रैक्टर भी बहुत पसंद थे।

जनता की भगवान 'अम्मा'

जयललिता (अम्मा) को जनता भगवान की तरह पूजती है। 2014 में जब जयललिता को जेल भेजा गया तो उनके कई समर्थकों ने आत्महत्या कर ली। दरअसल जयललिता की लोकप्रियता इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि उनकी योजनाएं सीधे जनता से जुड़ती हैं। उनकी योजनाएं ग़रीबों के हित में हैं; और खास बात ये है कि जयललिता की योजनाओं को अम्मा ब्रांड कहा जाता है।

अम्मा कैंटीन
अम्मा कैंटीन में 1 रुपये में इडली सांभर और 5 रुपये में चावल मिलता है। राज्य के सभी बड़े शहरों में अम्मा कैंटीन खुली हुई हैं।

अम्मा मिनरल वाटर
10 रुपये में मिनरल वाटर की बोतल मिलती है। चेन्नई समेत सभी प्रमुख शहरों तथा रेलवे स्टेशन-बस स्टैंड के आसपास ये बिकती है।

अम्मा फार्मेसी
तमिलनाडु के प्रमुख अस्पतालों के पास खुले फार्मेसी में सस्ती दरों पर दवाएं उपलब्ध हैं।

अम्मा सीमेंट
गरीबों को घर बनाने के लिए सस्ते में सीमेंट बेचने की योजना को लोगों ने पसंद किया है।

बेबी केयर किट
अम्मा बेबी केयर किट में मच्छरदानी, मैट्रेस, साबुन, कपड़े, नैपकीन, बेबी शैंपू 16 सामान मुफ़्त में दिये जाते हैं।

अम्मा मोबाइल
इस योजना में तमिलनाडु के स्वयं सहायता समूहों को फ्री में स्मार्टफोन मिलता है। इसके अलावा अम्मा सॉल्ट, अम्मा सीड्स आदि बांड भी हैं।

काफ़ी कुछ मुफ़्त में
गरीब औरतों को मिक्सर ग्राइंडर, लड़कियों को साइकिलें, छात्रों को स्कूल बैग, किताबें, यूनिफाॅर्म तथा मुफ़्त में मास्टर हेल्थ चेकअप की सुविधा भी मिलती है।

निधन
जयललिता का निधन 5 दिसम्बर, 2016 को चेन्नई में हुआ। उन्होंने सोमवार के दिन रात 11: 30 बजे आखिरी सांस ली। जयललिता को कार्डियक अरेस्ट (हृदय की गति रुकना) आने के बाद से उनकी हालत गंभीर थी। वे करीब दो माह से अस्पताल में भर्ती थीं और उनका इलाज चल रहा था।

अन्य द्रविड़ नेताओं के उलट जयललिता की पूरी आस्था भगवान में थी। वह नियमित रूप से प्रार्थना करती थीं और माथे पर आयंगर समुदाय के लोगों की तरह तिलक भी लगाती थीं। बावजूद इसके तमिलनाडु सरकार और शशिकला परिवार ने हिंदू रीति रिवाज के हिसाब से दाह संस्कार करने की बजाय उनके शव को दफनाने का फैसला किया। जयललिता के शव को एम. जी. रामचंद्रन की समाधि के साथ ही दफनाया गया। राज्य सरकार के एक अधिकारी के अनुसार- "जयललिता हमारे लिए आयंगर नहीं थीं। वह किसी भी जाति या धर्म से ऊपर थीं। उनसे पहले पेरियार, अन्नादुराई और एम. जी. रामचंद्रन सहित अधिकतर द्रविड़ नेताओं को दफनाया गया है। हम मौत के बाद भी किसी को आग की लपटों के हवाले नहीं कर सकते। हम उन्हें स्मारक के रूप में याद रखना चाहते हैं। इसलिए चंदन और गुलाब जल के साथ उनके पार्थिव शरीर को दफनाने का फैसला लिया गया।"

शनिवार, 12 अगस्त 2023

श्री देवी

श्री देवी
🎂जन्म की तारीख और समय: 13 अगस्त 1963, मीनाम्पत्ति
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 24 फ़रवरी 2018, Jumeirah Emirates Towers, दुबई, संयुक्त अरब अमीरात
पति: बोनी कपूर (विवा. 1996–2018)
माता-पिता: अय्यपन यंगर, राजेस्वरी यंगर
बच्चे: जहान्वी कपूर, ख़ुशी कपूर

↔️१९७५ की फिल्म जूली से उन्होंने हिन्दी सिनेमा में बाल अभिनेत्री के रूप में प्रवेश किया था। अपनी पहली फिल्म मून्द्र्हु मुदिछु नामक तमिल में थी। श्रीदेवी का बॉलीवुड में प्रवेश १९७८ की फिल्म सोलहवाँ सावन से हुआ। लेकिन उन्हे सबसे अधिक पहचान १९८३ की फिल्म हिम्मतवाला से मिली। एक के बाद एक सुपरहिट महिला प्रधान फिल्मो की वजह से उन्हें भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी अभिनेत्री के तौर पर भी जाना जाता है। सदमा, नागिन,निगाहें, मिस्टर इन्डिया, चालबाज़, लम्हे, ख़ुदागवाह और जुदाई उनकी प्रसिद्ध फ़िल्में हैं। २४ फरवरी २०१८ को दुबई में उनका निधन हुआ।अपने फिल्मी करियर में श्रीदेवी ने 63 हिंदी, 62 तेलुगु, 58 तमिल, 21 मलयालम तथा कुछ कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया।
📽️जैसे को तैसा (1973)
जूली (1975)
सोलहवां सावन (1978)
हिम्मतवाला (1983)
जस्टिस चौधरी (1983)
जानी दोस्त (1983)
कलाकार (1983)
सदमा (1983)
अक्लमंद (1984)
इन्कलाब (1984)
जाग उठा इंसान (1984)
नया कदम (1984)
मकसद (1984)
तोहफा (1984)
बलिदान (1985)
मास्टर जी (1985)
सरफ़रोश (1985)
आखिरी रास्ता (1986)
भगवान दादा (1986)
धर्म अधिकारी (1986)
घर संसार (1986)
नगीना (1986)
कर्मा (1986)
सुहागन (1986)
सल्तनत (1986)
औलाद (1987)
हिम्मत और मेहनत (1987)
नज़राना (1987)
मजाल (1987)
जोशीले (1987)
जवाब हम देंगे (1987)
मिस्टर इंडिया (1987)
शेरनी (1988)
राम अवतार (1988)
वक़्त की आवाज़ (1988)
सोने पे सुहागा (1988)
चालबाज़ (1989)
चांदनी (1989)
गुरु (1989)
गैर कानूनी (1989)
निगाहें (1989)
बंजारन (1991)
फ़रिश्ते (1991)
पत्थर के इंसान (1991)
लम्हे (1991)
खुदा गवाह (1992)
हीर राँझा (1992)
चन्द्रमुखी (1993)
गुमराह (1993)
गुरुदेव (1993)
रूप की रानी चोरों का राजा (1993)
चाँद का टुकड़ा (1994)
लाडला (1994)
आर्मी (1996)
मि. बेचारा (1996)
कौन सच्चा कौन झूठा (1997)
जुदाई (1997)
मेरी बीबी का जवाब नहीं (2004)
मि. इंडिया 2 (2007)
⚰️श्रीदेवी का निधन २४ फरवरी २०१८ को१९:00 GMT में दुबई में हुआ। हालांकि यह पहले घोषित किया गया था कि मौत का कारण दिल का दौरा है, लेकिन बाद में दुबई पुलिस द्वारा जारी की गयी फोरेंसिक रिपोर्ट में संकेत मिले है कि इनकी मृत्यु होटल में बाथटब में दुर्घटनाग्रस्त रूप से डूबने से हुई है।
उस समय, वह अपने पति बोनी कपूर और बेटी खुशी के साथ अपने भतीजे मोहित मारवा के संयुक्त अरब अमीरात में विवाह समारोह में थी। पहले अफवाहें फैली थी कि इनकी मृत्यु हो गयी और इसे इंटरनेट पर एक झूठी खबर माना था लेकिन इसके बाद इनके देवर संजय कपूर ने पुष्टि की कि यह सच है। उसके बाद प्रशंसकों, सह-सितारों और बॉलीवुड के सितारों ने मृत्यु पर ट्विटर पर शोक संवेदना व्यक्त की।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...