उमा देवी खत्री
उर्फ
टुनटुन
*🎂जन्म की तारीख और समय: 11 जुलाई 1923, उत्तर प्रदेश*
*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 24 नवंबर 2003, अँधेरी*
बच्चे: पूनम खत्री
पति: अख्तर अब्बास काज़ी (विवा. 1947–2003)
Actress Tun Tun: मां-बाप-भाई की हत्या के बाद भी भारत की पहली महिला कॉमेडियन ‘टुन टुन’ ने छुआ आसमान
Actress Tun Tun: भारत की पहली महिला कॉमेडियन टुन टुन को कहा जाता है। (Entertainment News) टुन टुन एक अभिनेत्री और गायिका भी थीं। उन्होंने हिंदी सिनेमा में ढेरों फिल्मों में काम किया। बॉलीवुड (Entertainment News) में उनका पांच दशक का लंबा कॅरियर रहा और हर किसी के दिल पर उन्होंने राज किया। टुन टुन का असली नाम उमा देवी खत्री था। उन्हें यह नाम दिवंगत अभिनेता दिलीप कुमार ने दिया था।
उमा देवी खत्री यानी कि टुन टुन का जन्म 11 जुलाई, 1923 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ था। टुन टुन बॉलीवुड का कभी न भूलने वाला नाम है। क्योंकि जो लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरता है उसे भला कोई कैसे भूल सकता है। (Entertainment News) टुन टुन ने अपनी कॉमेडी से लोगों को खूब हंसाने काम काम किया, लेकिन असल जिंदगी में उन्होंने खूब दुःख-दर्द भी झेले हैं।
टुन टुन जब बहुत छोटी थी तब ही वे अपने माता-पिता को खो चुकी थी। (Entertainment News) छोटी सी उम्र में टुन टुन के माता-पिता की जमीनी विवाद में हत्या कर दी गई थी। छोटी सी टुन टुन अनाथ हो चुकी थीं। इतना ही नहीं इसी विवाद में उनके भाई को भी मार दिया गया था। अपना पूरा परिवार खोकर बुरी तरह से टूट चुकी टुन टुन ने हिम्मत नहीं हारी और आगे चलकर वे हिंदी सिनेमा एवं भारत की पहली कॉमेडियन कहलाईं।
बताया जाता है कि बचपन से टुन टुन गाने की शौकीन थीं। उस दौर में वे रेडियो पर गाने सुनकर अभ्यास करती थीं। टुन टुन जब 23 साल की थीं, तो वे घर छोड़कर मुंबई आ गई। क्योंकि वे मुंबई में नाम कमाना चाहती थीं। मुंबई आकर उनका पहुंचना सीधा संगीतकार नौशाद अली के बंगले पर हुआ। (Entertainment News) नौशाद से टुन टुन काम की जिद करने लगीं। टुन टुन ने तो नौशाद को धमकी तक दे दी कि अगर उन्हें काम नहीं मिला तो वे उनके बंगले से समुद्र में कूदकर जान दे देंगी। नौशाद ने टुन टुन की धमकी के बाद उनका ऑडीशन ले लिया। फिर उन्हें काम भी मिल गया। पहली बार टुन टुन ने वामिक अजरा फिल्म में गाया।
ऐसे बनी गायिका :
उसके बाद उमा देवी काम की तलाश करने लगी। उन्हें कहीं से पता चला कि डायरेक्टर अब्दुल रशीद करदार फि़ल्म दर्द बना रहे हैं. वे उनके स्टूडियो पहुंचकर उनके सामने खड़े हो गई। उन्होंने पहले कभी करदार साहब को नहीं देखा था। बेबाक तो वो बचपन से ही थी, उनसे ही सीधे पूछ बैठी, करदार साहब कहां मिलेंगे? मुझे उनकी फि़ल्म में गाना गाना है।
शायद उनका ये बेबाक अंदाज़ करदार साहब को पसंद आ गया, इसलिए बिना देर किये उन्होंने संगीतकार नौशाद के सहायक गुलाम मोहम्मद को बुलाकर उमा देवी का टेस्ट लेने को कह दिया। उस टेस्ट में उमादेवी ने फिल्म जीनत में नूरजहां द्वारा गाया गीत ‘आँधियां गम की यूं चली’ गाया। हालांकि उमा देवी एक प्रशिक्षित गायिका नहीं थी, लेकिन रेडियो पर गाने सुनकर और उन्हें दोहराकर वे अच्छा गाने लगी थी। बरहलाल, उनका गया गाना सबको पसंद आया और वो 500 रुपये की पगार पर नौकरी पर रख ली गई।जब उमा देवी की मुलाक़ात नौशाद से हुई, तो उनसे भी बेबकीपूर्ण अंदाज़ में उन्होंने कह दिया कि उन्हें अपनी फि़ल्म में गाना गाने का मौका दें, नहीं तो वे उनके घर के सामने समुद्र में डूबकर अपनी जान दे देंगी। नौशाद साहब भी उनकी बेबाकी पर हैरान थे। खैर, उन्होंने उमा देवी को गाने मौका दिया और दर्द फिल्म का गीत अफ़साना लिख रही हूं …उनसे गवाया। यह गीत बहुत हिट हुआ और आज तक लोगों की ज़ेहन में बसा हुआ है। उस फि़ल्म के अन्य गीत आज मची है धूम, ये कौन चला, बेताब है दिल .. भी लोगों को बहुत पसंद आये।
फिर क्या था , उमा देवी की गायिका के रूप में गाड़ी चल पड़ी। कई फि़ल्मी गीतों को उन्होंने अपनी सुरीली आवाज़ से सजाया। 1947 में ही बनी फि़ल्म नाटक में उन्हें गाने का मौका मिला और उन्होंने गीत दिलवाले जल कर मर ही जाना गाया। फिर 1948 की फि़ल्म अनोखी अदा में दो सोलो गीत काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाए, दिल को लगा के हमने कुछ भी न पाया और फि़ल्म चांदनी रात में शीर्षक गीत’चांदनी रात है, हाय क्या बात है, में भी उन्होंने अपनी आवाज़ दी। उमादेवी को गाने के मौके मिलते रहे और वो गाती रहीं। उन्होंने कई फि़ल्मों में गाने गए। उनके द्वारा गाये गए गीत लगभग 45 के आस-पास हैं।
↔️गायिका से अभिनेत्री का सफ़र :
बच्चों के जन्म के साथ उनकी पारिवारिक जि़म्मेदारियां बढ़ रही थी। साथ ही लता मंगेशकर , आशा भोंसले जैसी संगीत की विधिवत् शिक्षा प्राप्त गायिकाओं का भी बॉलीवुड फि़ल्म इंडस्ट्रीज में पदार्पण हो चुका था। उमादेवी ने गायन का प्रशिक्षण नहीं लिया था। इसलिए धीरे-धीरे उनका गायन का काम सिमटता गया और एक दिन वह अपना गायन करिअर छोड़कर पूरी तरह अपने परिवार में रम गई। परिवार चलाना मुश्किल हुआ तो उमादेवी ने फिर से फि़ल्मों में काम करने का मन बनाया।
वे अपने गुरू नौशाद साहब से मिली। उमादेवी फिर से फि़ल्मों में गाना चाहती थीं, लेकिन समय आगे निकल चुका था। स्थिति को देखते हुए नौशाद साहब ने उन्हें कहा, तुम अभिनय में हाथ क्यों नहीं आजमाती? उमादेवी ने अपने बेबाक अंदाज़ में उन्होंने कह दिया, मैं एक्टिंग करूंगी, लेकिन दिलीप कुमार के साथ। दिलीप कुमार उस समय के सुपरस्टार थे। इसलिए उमादेवी की बात सुनकर नौशाद साहब हंस पड़े, लेकिन इसे किस्मत ही कहा जाए कि अपने अभिनय करिअर की शुरूआत उमादेवी ने दिलीप कुमार के साथ ही की। फिल्म थी ‘बाबुल’ जिसमें हिरोइन थीं – नर्गिस।
⚰️24 नवंबर 2003 में उन्होंने इस दुनिया से विदा ली, लेकिन आज भी वे हिन्दी फिल्मों की पहली और सबसे सफ़ल महिला कॉमेडियन के रूप में याद की जाती हैं।