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बुधवार, 7 जून 2023

ख्वाजा अहमद अब्बास


*🎂जन्म की तारीख और समय: 7 जून 1914, पानीपत*
*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 1 जून 1987, मुम्बई*
महान फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और उर्दू लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि

ख़्वाजा अहमद अब्बास प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और उर्दू लेखक थे। वे उन कुछ गिने चुने लेखकों में से एक हैं जिन्होंने मुहब्बत, शांति और मानवता का पैगाम दिया। पत्रकार के रूप में उन्होंने 'अलीगढ़ ओपिनियन' शुरू किया। 'बॉम्बे क्रॉनिकल' में ये लंबे समय तक बतौर संवाददाता और फ़िल्म समीक्षक रहे। इनका स्तंभ 'द लास्ट पेज' सबसे लंबा चलने वाले स्तंभों में गिना जाता है। यह 1941 से 1986 तक चला अब्बास इप्टा के संस्थापक सदस्य थे।

ख़्वाजा अहमद अब्बास साहब का जन्म 7 जून 1914 को हरियाणा राज्य के पानीपत में हुआ।वे 'ख़्वाजा ग़ुलाम अब्बास' के पोते थे जो 1857 के विद्रोह के शहीदों में से एक थे। उनके पिता 'ग़ुलाम-उस-सिबतैन' थे जो उन्हें पवित्र क़ुरान पढ़ने के लिए प्रेरित करते, जबकि 'मसरूर ख़ातून' उनकी माँ थीं। उनके ख़ानदान का बखान अयूब अंसारी तक जाता है जो पैगंबर मुहम्मद के साथी थे।अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए, अब्बास साहब 'हाली मुस्लिम हाई स्कूल' गये जिसे उनके परदादा यानी प्रसिद्ध उर्दू शायर ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन हाली और मिर्ज़ा ग़ालिब के शागिर्द; द्वारा स्थापित किया गया था।पानीपत में उन्होंने 7वीं कक्षा तक अध्ययन किया, 15 वर्ष की आयु होने पर मैट्रिक समाप्त की और बाद में, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में बी.ए (1933) और एल.एल.बी (1935) पूरी की। वह अपने जीवन में अधिकांश कार्यों में सफल रहे थे। उनके सुकोमल प्रेमप्रसंग के परिणामस्वरूप मुज़्तबी बेगम के साथ विवाह का अति सुंदर वर्णन उनकी आत्मकथा 'आई एम नॉट आइलैंड' में किया गयाहै। यह एक सफल प्रेम विवाह था। कहा जाता है कि उनकी समस्त उल्लेखनीय उपलब्धियों के पीछे उनकी पत्नी का बड़ा था। सन 1958 में पत्नी की मृत्यु के उपरांत अकेले रह गये।

अब्बास साहब ने जल्द ही एक पत्रकार के रूप में अपना कैरियर शुरू कर दिया। उन्होंने 'अलीगढ़ ओपिनियन' नाम की देश की पहली छात्र-प्रकाशित पत्रिका शुरू की। इससे पहले उन्होंने,तुरंत अपने बीए के बाद, नेशनल कॉल नाम के अख़बार में भी काम किया था। सन् 1935 में,अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बाहर आने के बाद, वे बॉम्बे क्रॉनिकल में शामिल हो गए जहां उन्हें जल्द ही फ़िल्म विभाग के संपादक के रूप में पदोन्नत कर दिया गया। वहां वे 1947 तक काम करते रहे। 1936 में, वे बॉम्बे टॉकीज़ के पार्ट-टाईम पब्लिसिस्ट के रूप में फ़िल्मों में आ गएं जो हिमांशु राय और देविका रानी की
प्रॉडक्शन कम्पनी थी। उन्होंने 1941 में अपनी पहली पटकथा 'नया संसार' भी इसी कंपनी को बेची।

1945 में ख़्वाजा साहब का एक निर्देशक के रूप में कैरियर शुरु हुआ जब उन्होंने इप्टा ( इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन) के लिए 'धरती के लाल' नाम की एक फ़िल्म बनाई। यह 1943 के बंगाल में पड़े अकाल पर आधारित थी। 1951 में,उन्होंने 'नया संसार' नाम की अपनी ख़ुद की कंपनी खोल ली जो 'अनहोनी' ( 1952 ) जैसी सामाजिक प्रासंगिकता की फ़िल्मों का निर्माण करने लगी। अब्बास साहब की फ़िल्म 'राही' (1953), मुल्क राज आनंद की एक कहानी पर आधारित थी जिसमें चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा को दर्शाया गया था। चेतन आनंद के लिए 'नीचा नगर' ( 1946 ) लिखने से पहले, अब्बास साहब वी.शांताराम के लिए 'डॉ. कोटनीस की अमर कहानी' ( 1946 ) भी लिख चुके थे। यह फ़िल्म ख़्वाजा साहब की एक कहानी 'एंड वन डिड नॉट कम बैक' पर आधारित थी जिसे उन्होंने,डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस के जीवन पर लिखा था।

ख़्वाजा साहब ने अतिसफल फ़िल्म निर्माता-निर्देशक राजकपूर के साथ एक लम्बा साथ निभाया और 'आवारा' (1951), 'श्री 420' (1955), ' जागते रहो ' (1956), 'मेरा नाम जोकर' (1972) और बॉबी' (1973) जैसी उनकी कई सफल फ़िल्में लिखी। आर. के. बैनर की फ़िल्म'हिना' (1991) जिसे रणधीर कपूर द्वारा निर्देशित किया गया था; भी अब्बास साहब की एक कहानी पर आधारित थी। अब्बास साहब ने राज कपूर की फ़िल्म 'राम तेरी गंगा मैली', की शुरुआत और अन्त भी लिखा था। यह एक ऐसी बात है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।राजकपूर ख़्वाजा साहब के क़रीबी थे और उन्हें 'मेरी आवाज़' बुलाया करते थे। उनके अपने जीवन पर बनी फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' के बॉक्स ऑफ़िस पर फ्लॉप हो जाने के बाद, राजकपूर वित्तीय संकट में फंस गये थे। अब्बास साहब ने,सिर्फ़ इस असाधारण निर्देशक की मदद करने के लिए, अपने सिद्धांतों से समझौता किया। उन्होंने एक मसालेदार किशोरावस्था के
रोमांस की फ़िल्म 'बॉबी', लिखी। यह एक सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई और राज कपूर फिर से सफ़लता की लहर पर सवार हो गये। लेकिन 'बॉबी' में भी, अब्बास साहब अपने समाजवादी दृष्टिकोण और अपने प्रगतिशील विचारों को स्थापित करने में सफल रहे। उन्होंने इसे फ़िल्म की विषय-वस्तु में रोपित कर दिया। अपनी चमकदार सतह से नीचे यह अमीर और ग़रीब के संघर्ष की कहानी कहती है। यह सामाजिक वर्गभेद और अंतरजातीय विवाह की बात करती है। हालांकि अब्बास साहब भी मानते थे कि उनके और राजकपूर के काम करने के अंदाज़ में कुछ फ़र्क ज़रूर था। वे कहा करते, "अगर मैं राज कपूर के लिए लिखी हुई अपनी फ़िल्मों को ख़ुद निर्देशित करता, तो वे सभी असफल रहती।" राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी व्यावसायिक रूप से सफल साबित होती थीं। राज कपूर का दृष्टिकोण चीज़ों को लार्जर-दैन-लाइफ़ दिखाने का रहा है। अब्बास साहब की यथार्थवाद में गहरी जड़ें थीं, लेकिन फिर भी राज कपूर के लिए उन्होंने जितनी भी फ़िल्में लिखी, उन सभी में एक मजबूत सामाजिक मुद्दा था, चाहे यह 'आवारा' हो या 'श्री 420'। उनके लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ फ़िल्म ही महत्वपूर्ण थीं ना कि उससे जुड़े आर्थिक लाभ।

सिनेमा की ताकत का एहसास कराने की क्षमता रचनात्मक और ठोस इरादे वाले निर्माता निर्देशकों में ही होती है। ख़्वाजा अहमद अब्बास के लिए सिनेमा समाज के प्रति एक कटिबद्धता थी। अब्बास ने इस प्रतिबद्धता को पूरा किया। वे सिनेमा को बहुविधा कला मानते थे जो मनोवैज्ञानिक और सामाजिक वास्तविकता के सहारे लोगों में वास्तविक बदलाव की आकांक्षा को जन्म दे सकती है।राजकपूर के फ़िल्मी कैरियर में अब्बास का प्रमुख योगदान है। अब्बास ने सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थितियों के संबंध में अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए लोकप्रिय माध्यम सिनेमा का बखूबी उपयोग किया। अब्बास सिनेमा को एक उद्देश्यपरक माध्यम मानते थे। समकालीन समस्याओं जैसे गरीबी, अकाल, अस्पृश्यता, सांप्रदायिक विभाजन पर उन्होंने करारा प्रहार किया।शहर और सपना' (1963) फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले लोगों की समस्याओं का वर्णन है और 'दो बूँद पानी' (1971) राजस्थान के मरुस्थल में पानी की विकराल समस्या और उसके मूल्य का वर्णन करता है। 'सात हिंदुस्तानी' में सांप्रदायिकता और विभाजन के दंश को व्यक्त किया गया है। गौरतलब है कि सात हिंदुस्तानी सिने स्टार अमिताभ बच्चन की पहली फ़िल्म थी। 'द नक्सलाइट' नक्सल समस्या को उकेरती है। पैंतीस वर्षों के फ़िल्मी करियर में उन्होंने 13 फ़िल्मों का निर्माण किया। उन्होंने लगभग चालीस फ़िल्मों की कहानी और पटकथाएँ लिखीं जिनमें अधिकतर राजकपूर के लिए हैं। वे सिनेमा को मनोवैज्ञानिक और सामाजिक वास्तविकता का वर्णन करते हुए लोगों में वास्तविक स्थिति को बदलने के लिए आकांक्षा उत्पन्न करने का बड़ा साधन मानते थे। अब्बास कई मायनों में अद्वितीय थे। 'शहर और सपना', 'सात हिंदुस्तानी', 'जागते रहो ' या 'आवारा' उनकी प्रतिबद्धता के अनुपम उदाहरण
थे। एक बार अब्बास ने कहा भी था कि उन्होंने सिनेमा के साथ हर रूप में प्रयोग किया। अब्बास ने मल्टीस्टार, रंगीन, गीतयुक्त, वाइड स्क्रीन फ़िल्म, बिना गीत की फ़िल्म और सह निर्माता के रूप में एक विदेशी फ़िल्म का निर्माण किया। जब कभी उन्हें अवसर मिलता वे नियो रिएलिज्म (नव यथार्थवाद) को मजबूत करने से चूकते नहीं थे। वे लोगों में आकांक्षा उत्पन्न करने का फार्मूला जानते थे। उनके बिना फ़िल्मों में नेहरू युग और रूसी लाल टोपी की कल्पना नहीं की जा सकती। 'परदेसी' रूस के सहयोग से बनी फ़िल्म थी।

ख़्वाजा अहमद अब्बास जो ना सिर्फ़ फ़िल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी भारत के लिए एक अनमोल रत्न थे। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व उन्हें एक फ़िल्म निर्देशक, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और उर्दू, हिंदी एवं अंग्रेज़ी का पत्रकार होने की इजाज़त देता था। उनका कॉलम 'लास्ट पेज' (उर्दू संस्करण - 'आज़ाद कलम') बॉम्बे क्रॉनिकल में 1935 में शुरू हुआ और 1947 के बाद से ब्लिट्ज़ में छपने लगा। जहां वह उनकी मृत्यु तक जारी रहा। अब्बास साहब कोई साधारण आदमी नहीं थे। वे एक ज्वालामुखी थे। उनके क़रीबी और प्रियजनों के कानों में आज भी उनकी दमदार आवाज़ गूंजती है और उनके दिलों में उनकी यादों की टीस चला देती है। अली पीटर जॉन कहते हैं "जब मैं उनसे पहली बार मिला तो वे मुझे एक शेर की तरह लगे!"। इसके अलावा दुनिया उनकी जिस बात से थर्राती थी वह था उनका गुस्सा। टीनू आनंद कहते हैं "जब वे चिल्लाते थे तो दीवारे कांपने लगती थीं।" पत्रकारिता में भी उनका करियर 25 वर्षों से अधिक का रहा। उनके लेखों का संकलन दो किताबों 'आई राइट एस आई फील' और 'बेड ब्यूटी एंड रिवोल्यूशन' के रूप में किया गया है।

"स्वछन्द, स्पष्ट और भयमुक्त (फ़्री, फ़्रैंक और फीयरलैस)" - "मुझे जो लगता है वह मैं लिखता हूँ। -ख़्वाजा अहमद अब्बास

ख़्वाजा अहमद अब्बास तथा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू छात्र जीवन के समय से मित्र थे। सन 1947 में देश विभाजन के समय उनकी माँ सहित सभी निकट संबंधी पाकिस्तान चले गये (पिता की मृत्यु 1942 में हो चुकी थी), लेकिन वह पाकिस्तान नहीं गये तथा उन्हें दंगाग्रस्त पानीपत से बाहर सुरक्षित निकालने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया था।इनकी फ़िल्म 'मुन्ना' (1954) को देखने के लिए नेहरूजी इतने उत्सुक थे कि उन्होंने इसका एक प्रिंट दिल्ली भेजने के लिए विशेष आदेश दे डाला। इसके बाद पंडित जी इस फ़िल्म से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इसके बाल-कलाकार मास्टर रोमी से मिलने की मंशा भी ज़ाहिर की।

ख़्वाजा अहमद अब्बास जब अपने जीवन के अंतिम दिनों में गंभीर रूप से बीमार थे और अर्थाभाव से जूझ रहे थे तब उन्होंने अपनी फ़िल्म 'सात हिन्दुस्तानी' के अधिकार उतनी ही राशि में बेचे थे जितनी राशि उनके इलाज के लिए ज़रूरी थी। हिंदी सिनेमा के मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लाग में अब्बास से जुड़ी यादों को ताजा करते हुए बताया कि अब्बास सिद्धांतों पर विश्वास करने वाले ऐसे ईमानदार व्यक्ति थे जिनके मन में व्यवसायिकता अपनी जड़ नहीं जमा सकी। वह दूसरों के लिए जीने में विश्वास करते थे। लेकिन किसी से अपेक्षा नहीं करते थे। उनका दिल बहुत बड़ा था। उन्होंने लिखा है कि अब्बास इतने स्वाभिमानी व्यक्ति थे कि जीवन के अंतिम समय में भी उन्हें किसी की सहायता लेना मंजूर नहीं था। उनसे भी नहीं, जिन्हें अब्बास ने ही खोजा था और एक पहचान दी थी। बिग बी के अनुसार, गंभीर रूप से बीमार और अर्थाभाव से जूझ रहे अब्बास ने तब सात हिन्दुस्तानी के अधिकार सिर्फ उतनी ही राशि में बेचे थे जो उनके इलाज के लिए ज़रूरी थी। जबकि उन्हें अच्छी रकम मिल सकती थी। अमिताभ ने लिखा कि यह बात अब्बास ने किसी को नहीं बताई थी क्योंकि उन्हें डर था कि यह सुन कर लोग उनकी मदद करने के लिए आगे आएंगे। यह उनके सिद्धांतों के ख़िलाफ़ होता। वह केवल अपनी मेहनत की कमाई पर विश्वास करते थे। बिग बी पहली बार ख़्वाजा अहमद अब्बास से तब मिले थे जब उन्हें अब्बास ने अपनी फ़िल्म सात हिन्दुस्तानी में एक रोल के लिए बुलाया था। यह फ़िल्म पुर्तग़ालियों के कब्जे से गोवा को मुक्त कराने पर बनी थी। उन दिनों अमिताभ बच्चन फ़िल्म जगत् में पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। ब्लाग में अमिताभ ने लिखा है कि तब अब्बास का कार्यालय जुहू में एक इमारत की चौथी मंजिल पर था। उन्होंने लिखा है कि सात हिन्दुस्तानी के बारे में तो बहुत कुछ लिखा गया लेकिन उस व्यक्ति के बारे में कम ही लिखा गया जो साथ काम करते करते हमारा मामूजान बन गया। बिग बी ने लिखा है कि फ़िल्म में मैं बिल्कुल नया कलाकार था लेकिन अब्बास का व्यवहार सबके लिए एक समान था। उनके लिए कोई नया या कोई जाना माना नहीं था। फ़िल्म की शूटिंग के लिए पूरी यूनिट ट्रेन के तीसरे दर्जे के डिब्बे में बैठ कर मुंबई से गोवा गई थी। अब्बास भी यूनिट के साथ इसी डिब्बे में थे। उनके लिए समाजवाद केवल किताबों और अध्ययन तक ही सीमित नहीं था बल्कि वह उस पर अमल भी करते थे। गोवा में पूरी यूनिट एक छोटे से सरकारी अतिथिगृह में रूकी जहां सुविधाएं नहीं के बराबर थीं। रात को लालटेन का इस्तेमाल होता था क्योंकि वहां बिजली नहीं थी। लालटेन की रोशनी में ही अब्बास हाथों में काग़ज़ क़लम ले कर रात भर पटकथा और सीन की तैयारी करते, अगले दिन शूटिंग होती थी।

अब्बास साहब ने पांच दशकों की अवधि में 73 से अधिक अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू में पुस्तकें भीलिखीं। उन्हें आज भी उर्दू साहित्य की एक विलक्षण प्रतिभा माना जाता है। उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब 'इंकलाब' रही है, जो सांप्रदायिक हिंसा के मुद्दे पर चोट करती है।इंकलाब सहित उनकी कई पुस्तकों का अनुवाद कई भारतीय और विदेशी भाषाओं जैसे रूसी, जर्मन, इतालवी, फ्रेंच और अरबी में किया गया है। उनकी आत्मकथा 'आई एम नॉट ऍन आयलैंड: ऍन एक्सपैरीमेंट इन ऑटो बायोग्राफ़ी' पहली बार 1977 में प्रकाशित हुयी और फिर 2010 में इसे पुनः प्रकाशित किया गया

'शहर और सपना' के अलावा, अब्बास साहब की दो फ़िल्मों, 'सात हिंदुस्तानी' (1969) और 'दो बूंद पानी' (1972), ने राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म के लिए नरगिस दत्त पुरस्कार जीते। 'नीचा नगर' (1946) अंतरराष्ट्रीय ख्याति जुटाने में कामयाब रही और इसने कान्स फ़िल्म समारोह में पाल्मे डी'ओर पुरस्कार जीता। दूसरी ओर 'परदेसी' (1957) भी इसी पुरस्कार के लिए नामित होने में सफल रही। इन सब पदकों और पुरस्कारों के अलावा, उन्हें 1969 में भार सरकार द्वारा पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। उनको मिलें कुछ अन्य पुरस्कार थें:

साहित्यिक उपलब्धियों के लिए हरियाणा
स्टेट रोब ऑफ़ ऑनर (1969), उर्दू साहित्य में उनके योगदान के लिए ग़ालिब पुरस्कार (1983),उर्दू अकादमी दिल्ली का विशेष पुरस्कार (1984) और महाराष्ट्र राज्य का उर्दू अकादमी पुरस्कार (1985)। 
अंतिम दिनों में, दो-दो दिल के आघातों (हार्ट- अटैक) के बावजूद, अब्बास साहब अपनी फ़िल्म 'एक आदमी' (1988) की डबिंग को जारी रखे हुए थे। यह फ़िल्म उनकी मृत्यु के बाद प्रदर्शित हुई। वे कहा करते थे, "फ़िल्म किसी भी कीमत पर रुकनी नहीं चाहिए।" यह एक स्मृति है जो आज भी अली पीटर जॉन के दिल को कुरेदती है।

ख़्वाजा अहमद अब्बास साहब का मुंबई में 72 वर्ष की आयु में 1 जून , 1987 को निधन हुआ। वे अपने अंतिम दिनों तक ब्लिट्ज के लिए लिख रहे थे।अब्बास साहब को भारत में समानांतर (पैरेलल) या नव यथार्थवादी (नियो-रियलिस्टिक) सिनेमा के रहनुमाओं में गिना जाता है। एक पटकथा लेखक और निर्देशक के रूप में, भारतीय सिनेमा में उनका योगदान वृहद् है औरप्रेरणादायक भी। एक पत्रकार के रूप में उनकी
राष्ट्रवादी विचारक की एक भूमिका और दूरदर्शिता का कोई सानी नहीं है। साहित्य में, उर्दू के एक प्रमुख लेखक के रूप में उनकी छाप अमिट रहेगी। अब्बास साहब अपने आप में एक संस्थान थे और जो जगह उन्होंने हमारे दिलों में बनायीं है वह शब्दों के परे है। वे अपने पीछे जो रचनाएँ छोड़ कर गये हैं, चाहे फ़िल्में हो या पुस्तकें या उनका कॉलम; वह सब कुछ हमारी राष्ट्रीय धरोहर है


ख्वाजा अहमद अब्बास


नया संसार (1941) - पटकथा, कहानी
धरती के लाल (1946) - पटकथा लेखक, निर्देशक, निर्माता
डॉ कोटनिस की अमर कहानी (1946) - पटकथा लेखक, कहानी
नीचा नगर (1946) - पटकथा लेखक
आज और कल (1947) - निर्देशक
आवारा (1951) - पटकथा लेखक, संवाद
अनहोनी (1952) - पटकथा लेखक, संवाद, कहानी, निर्देशक, निर्माता
राही 1953 - निर्देशक
मुन्ना (1954) - पटकथा लेखक, निर्देशक, निर्माता
श्री 420 (1955) - पटकथा लेखक, संवाद, कहानी
जगते रहो (1956) - पटकथा लेखक
परदेसी (1957) - पटकथा लेखक, निर्देशक
चार दिल चार राहें (1959) - पटकथा लेखक, संवाद, निर्देशक
ईद मुबारक (1960) वृत्तचित्र / लघु - निर्देशक
गिर खेल अभयारण्य (1961) वृत्तचित्र - निर्देशक
असम के लिए उड़ान (1961) - निदेशक
ग्यारा हज़ार लडकियान (1962) - निर्देशक
तीन घराने (1963) - निर्देशक
शहर और सपना (1964) - निर्देशक, पटकथा लेखक
हमारा घर (1964) - निर्देशक
टुमॉरो शाल बी बेटर (1965) वृत्तचित्र  निर्देशक
आसमान महल (1965) - निर्देशक
बंबई रात की बहनों में (1967) - लेखक, निर्देशक, निर्माता [28]
धरती की पुकार (1967) लघु फिल्म - निर्देशक
चार शहर एक कहानी (1968) वृत्तचित्र - निर्देशक
सात हिंदुस्तानी (1969) - निर्देशक, निर्माता
मेरा नाम जोकर (1970) - पटकथा लेखक, कहानी
दो बूंद पानी (1971) - निर्देशक 
भारत दर्शन (1972) वृत्तचित्र - निर्देशक
लव कुश (1972) लघु फिल्म - निर्देशक 
बॉबी (1973) - पटकथा लेखक, कहानी
कल की बात (1973) लघु फिल्म - निर्देशक
कॉल गर्ल (1973) - कहानी और पटकथा
अचानक (1973) - पटकथा लेखक
जुहू (1973) (टीवी) - निर्देशक
फ़सलाह (1974) - निर्देशक, निर्माता
अलीगढ़ के पापा मिया (1975) वृत्तचित्र - निर्देशक
फिर बोलो आए संत कबीर (1976) वृत्तचित्र - निर्देशक
डॉ इकबाल (1978) - वृत्तचित्र - निर्देशक
नक्सली (1980) - पटकथा लेखक, निर्देशक
हिंदुस्तान हमारा (1983) वृत्तचित्र/लघु-निर्देशक
लव इन गोवा (1983) - पटकथा लेखक
नंगा फकीर (1984) (टीवी) - निर्देशक
एक आदमी (1988) - निर्देशक
आकांक्षा (1989) (टीवी) - संवाद, पटकथा
मेंहदी (1991) - कहानी

पुस्तकें

अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी में उनकी पुस्तकों में शामिल हैं: जिनमें शामिल हैं:

भारत के बाहर: द एडवेंचर्स ऑफ़ ए रोविंग रिपोर्टर , हाली पब। हाउस, दिल्ली, 1939।
एक भारतीय अमेरिका को देखता है (द रैम्पर्ट लाइब्रेरी ऑफ गुड रीडिंग), 1943।
एक भारतीय अमेरिका को देखता है , ठाकर, बॉम्बे, 1943।
कल हमारा है! आज के भारत का एक उपन्यास ; बॉम्बे, पॉपुलर बुक डिपो, 1943।
"लेट इंडिया फाइट फॉर फ्रीडम", बॉम्बे, साउंड पत्रिका (प्रकाशन विभाग), 1943।
मौत के लिए हार: नाम के बिना एक कहानी , पद्मजा प्रकाशन 1944।
"...और एक वापस नहीं आया!", ध्वनि पत्रिका, 1944
गांधीजी को एक रिपोर्ट: गांधीजी की क़ैद के 21 महीनों के दौरान भारतीय और विश्व की घटनाओं का एक सर्वेक्षण , 1944
अमरता के लिए निमंत्रण : एक-अभिनय नाटक, बॉम्बे: पद्मा पब।, 1944।
सभी झूठ नहीं । दिल्ली: राजकमल पब।, 1945।
रक्त और पत्थर और अन्य कहानियाँ । बॉम्बे: हिंद किताब, 1947
राइस एंड अदर स्टोरीज , कुतुब, 1947
कश्मीर आज़ादी की लड़ाई , 1948
आई राइट एज आई फील , हिंद किताब, बॉम्बे, 1948
केज ऑफ फ्रीडम एंड अदर स्टोरीज , बॉम्बे, हिंद किताब लिमिटेड, 1952।
चीन इसे बना सकता है: नए चीन , 1952 में अद्भुत औद्योगिक प्रगति का चश्मदीद गवाह ।
माओ त्से-तुंग की छवि में , पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, 1953
इंकलाब। भारतीय क्रांति का पहला महान उपन्यास , जैको पब्लिशिंग हाउस , 1958
ख्रुश्चोव , राजपाल एंड संस, 1960 के साथ आमने-सामने
जब तक हम सितारों तक नहीं पहुंच जाते। यूरी गगारिन की कहानी , एशिया पब। हाउस, 1961
द ब्लैक सन एंड अदर स्टोरीज , जैको पब्लिशिंग हाउस , 1963।
रात की बहनों में , हिंदी, राधाकृष्ण प्रकाशन, 1965।
इंदिरा गांधी; लाल गुलाब की वापसी , हिंद पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, 1966।
विभाजित दिल , स्वर्ग प्रकाशन, 1968
जब रात गिरती है , 1968।
छबीली , हिंदी, इलाहाबाद, मित्र प्रकाशन, 1968।
दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला , पैराडाइज पब्लिकेशन, 1968
सलमा और समुंदर , उर्दू/हिंदी, नई दिल्ली, कोमला पॉकेट बुक्स, 1969।
मेरा नाम जोकर , 1970
मारिया , दिल्ली, हिंद पॉकेट बुक्स, 1971।
तीन पहिए , उर्दू/हिंदी, दिल्ली, राजपाल एंड संस, 1971।
बॉबी , उर्दू/हिंदी, 1973
बॉय मीट गर्ल , स्टर्लिंग पब्लिशर्स, 1973
वह महिला: उसके सात साल सत्ता में ; नई दिल्ली, इंडियन बुक कंपनी, 1973
जवाहरलाल नेहरू: एक एकीकृत भारतीय का चित्र ; नई दिल्ली, एनसीईआरटी, 1974।
फसिलाह", उरुद/हिंदी, हिंद पॉकेट बुक्स, दिल्ली, 1974
डिस्टेंट ड्रीम, नई दिल्ली , स्टर्लिंग पब, 1975।
कांच की दीवारें : एक उपन्यास, 1977
बैरिस्टर-एट-लॉ: महात्मा गांधी के प्रारंभिक जीवन के बारे में एक नाटक , नई दिल्ली, ओरिएंट पेपरबैक, 1977।
पुरुष और महिला: विशेष रूप से चयनित लंबी और छोटी कहानियाँ , 1977
मैड, मैड, मैड वर्ल्ड ऑफ इंडियन फिल्म्स , 1977
आई एम नॉट ए आइलैंड: एन एक्सपेरिमेंट इन ऑटोबायोग्राफी , नई दिल्ली, 1977।
फोर फ्रेंड्स , अर्नोल्ड-हेनीमैन, नई दिल्ली, 1977।
20 मार्च 1977: किसी अन्य दिन की तरह एक दिन , विकास पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1978।
जनता जाम में? , 1978।
नक्सली , लोक प्रकाशन, 1979।
ब्रेड, ब्यूटी एंड रेवोल्यूशन: बीइंग ए कालानुक्रमिक चयन से अंतिम पृष्ठ, 1947 से 1981 , मारवाह प्रकाशन, नई दिल्ली, 1982।
नीली सारी और दूसरी कहानियां , उर्दू, मकतब-ए-जामिया, नई दिल्ली, 1982।
द गन एंड अदर स्टोरीज , अर्नोल्ड-हेनीमैन, नई दिल्ली, 1985।
तेरहवां शिकार, अमर प्रकाशन, 1986।
द वर्ल्ड इज़ माई विलेज: ए नॉवेल विद एन इंडेक्स, अजंता, 1984। आईएसबीएन  978-81-202-0104-0
बॉम्बे माय बॉम्बे: ए लव स्टोरी ऑफ द सिटी , अजंता प्रकाशन/अजंता बुक्स इंटरनेशनल, 1987. आईएसबीएन 978-81-202-0174-3 
इंदिरा गांधी: द लास्ट पोस्ट ; बंबई, रामदास जी. भटकल, 1989
मौत के लिए हार: नाम के बिना एक कहानी । बड़ौदा: पद्मजा प्रकाशन, 1994
हाउ फिल्म्स आर मेड , नेशनल बुक ट्रस्ट, 1999, आईएसबीएन 978-81-237-1103-4 
सोनी चंडी के बट , उर्दू, अलहमरा, 2001, आईएसबीएन 978-969-516-074-9 
ख्वाजा अहमद अब्बास; वसंत साठे; सुहैल अख्तर (2010)। आवारा का संवाद: राज कपूर का अमर क्लासिक । विजय जानी, नसरीन मुन्नी कबीर। नियोगी पुस्तकें।

श्यामा


*🎂जन्म की तारीख और समय: 7 जून 1935, लाहौर, पाकिस्तान*

*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 14 नवंबर 2017, मुम्बई*

पति: फाली मिस्त्री

बच्चे: शिरीन मिस्त्री, फारूक़ मिस्त्री, रोहिन मिस्त्री
इनाम: फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री (1958)

*🎂श्यामा का जन्म 7 जून 1935*
को ब्रिटिश भारत (अब वर्तमान पाकिस्तान में) के लाहौर में हुआ था। जन्म के समय, उसे उसके माता-पिता द्वारा एक अलग नाम दिया गया था। बाद में, उन्होंने मंच नाम श्यामा को अपनाया। उसने पाँचवीं कक्षा के बाद अपना स्कूल छोड़ दिया, क्योंकि वह अपने अभिनय करियर पर ध्यान देना चाहती थी।

श्यामा के अलावा उन्हें शमा, शमा दुलारी और श्यामा जुत्शी के नाम से भी जाना जाता है। वह फली मिस्त्री की पत्नी हैं, जो भारतीय फिल्म उद्योग में फोटोग्राफी और सिनेमैटोग्राफर के प्रसिद्ध निर्देशक थे। साल 1953 में दोनों ने शादी कर ली।

फली और श्यामा फारूक, रोहिन और शिरीन मिस्त्री के माता-पिता हैं। वह प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना की छात्रा थीं।बद्री प्रसाद. यही कारण है कि वह एक असाधारण कथक नृत्यांगना हैं। उन्होंने अपने 70 साल के करियर में लगभग दो सौ फिल्मों में अभिनय किया है। श्यामा ने बॉलीवुड फिल्मों में साल 1945 में फिल्म ज़ीनत से डेब्यू किया था। यह एक मेलोड्रामैटिक फिल्म थी, जिसका निर्देशन हुसैन रिजवी ने किया था। उसने सहायक भूमिका निभाई। उनके किरदार का नाम खुर्शीद (बेबी) था। श्यामा के पिता ने उनके करियर विकल्प का समर्थन नहीं किया।

जब उन्हें उनकी फिल्म ज़ीनत के बारे में पता चला तो उनके बीच एक बड़ा झगड़ा हुआ। उनकी दूसरी फिल्म शायर नाम की 1949 की रोमांटिक ड्रामा थी। इस फिल्म में उन्होंने फिर से शमा दुलारी की सहायक भूमिका निभाई। 1949 में एचएस रावली द्वारा श्यामा की पांचवीं फिल्म पतंगा को द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में सेट किया गया था। फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत में, उन्हें ज्यादातर सहायक भूमिका निभाते हुए देखा गया था। मुख्य अभिनेता के रूप में अभिनेता की पहली प्रमुख फिल्म वर्ष 1950 में निशाना थी। उन्हें मधुबाला और अशोक कुमार के साथ कास्ट किया गया था।

1951 में, उन्होंने अभिनेत्री मधुबाला के साथ फिर से तराना फिल्म की। फिल्म एक विदेश से लौटे डॉक्टर के बारे में है जो एक गांव में फंस जाता है और गांव की एक लड़की से प्यार करता है। श्यामा ने फिल्म में शीला की भूमिका निभाई थी। वह फिल्म शारदा के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री की श्रेणी के तहत फिल्मफेयर अवार्ड 1958 की प्राप्तकर्ता थीं।

श्यामा को विभिन्न गानों में उनके प्रदर्शन के लिए भी जाना जाता है। उनका सबसे यादगार डांस परफॉर्मेंस फिल्म भाभी का गाना चली चली रे पतंग है। उन्होंने 1954 में रिलीज हुई फिल्म आर पार में जा जा जा जा बेवफा नाम का एक गाना भी किया था। यह गाना बॉलीवुड एक्ट्रेस पर उनकी फिल्म में भी फिल्माया गया है,तनु वेड्स मनु2015 में वापसी। 1970 में, उन्होंने फिल्म सावन भादों में सन सन सन ओ गुलाबी काली गाने पर प्रस्तुति दी, जो रेखा और नवीन निश्चल की पहली फिल्म थी।


प्रमुख फिल्में

वर्ष    फ़िल्म 
1989 हथियार 
1977 खेल खिलाड़ी का 
1975 सेवक 
1975 चैताली 
1974 अजनबी 
1973 प्रभात चम्पा बाई 
1973 हनीमून लक्ष्मी चौधरी 
1973 सूरज और चंदा 
1972 शादी के बाद 
1972 ज़िन्दगी ज़िन्दगी 
1971 कंगन चंपाकली 
1970 मस्ताना 
1967 मिलन 
1967 मेहरबाँ 
1963 घर बसा के देखो 
1960 दुनिया झुकती है 
1960 अपना घर 
1960 बरसात की रात शमा 
1958 पंचायत 
1957 शारदा चंचल 
1957 भाभी तारा 
1957 बंदी 
1956 मक्खी चूस 
1956 भाई भाई संगीता 
1955 मुसाफ़िरख़ाना 
1955 भगवत महिमा 
1954 आर-पार निक्की 
1954 दरवाज़ा 
1952 आसमान 
1951 सज़ा कामिनी 
1951 तराना शीला 
1950 निली 
1950 निशाना 
1950 जान पहचान 
1949 नाच 
1949 शाइर

मंगलवार, 6 जून 2023

अभय सपोरी

अभय रुस्तम सोपोरी 

*🎂जन्म 7 जून 1979*

*एक भारतीय संतूर वादक, संगीतकार और कंडक्टर हैं। वह संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी के पुत्र हैं , जिन्हें उनकी बहुमुखी प्रतिभा, नवाचारों और प्रयोग के लिए जाना जाता है। सोपोरी को संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, और 'भारत शिरोमणि पुरस्कार' और 'उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार' जैसे पुरस्कारों के सबसे कम उम्र के प्राप्तकर्ताओं में से एक हैं। अभय को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन TEDx में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था ।*

सगे-संबंधी
भजन सोपोरी (पिता)
संगीत कैरियर
मूल
कश्मीरी
शैलियां
फ्यूजन संगीत, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत
साधन
संतूर
उपलब्धता
अभय रुस्तम सोपोरी के नवीनतम संगीत एल्बम देखें, Youtube Music , Spotify और अन्य चैनलों
पर उपलब्ध 

अभय रुस्तम सोपोरी का जन्म 7 जून 1979 को भारत के जम्मू और कश्मीर की कश्मीर घाटी में स्थित श्रीनगर शहर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता संगीतकार भजन सोपोरी और अपर्णा सोपोरी थे, जो अंग्रेजी साहित्य की प्रोफेसर थीं। उन्होंने अपने रहस्यवादी शैव-सूफी परंपरा के पारंपरिक गुरु-शिष्य परम्परा के तहत संतूर को अपने दादा शंभू नाथ सोपोरी से सीखा, जम्मू और कश्मीर में "शास्त्रीय संगीत के पिता" और उनके पिता भजन सोपोरी के रूप में प्रसिद्ध हुए। 

अभय कश्मीर के सूफियाना घराने का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पारंपरिक संतूर वादकों के परिवार से आते हैं, जिनकी नौ पीढ़ियां 300 से अधिक वर्षों में फैली हुई हैं। 

सोपोरी के पास प्राचीन कला केंद्र, चंडीगढ़, भारत से संगीत में स्नातक और मास्टर डिग्री है और दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य में स्नातक और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कंप्यूटर हैं ।

आजीविका

सोपोरी बचपन से ही भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ पश्चिमी और सूफियाना संगीत में भी प्रशिक्षित थे। संतूर के अलावा, उन्होंने गायन, भारतीय शास्त्रीय सितार, सूफियाना सितार और पियानो भी सीखा। उन्होंने अपने पिता द्वारा रचित ऑल इंडिया रेडियो के लिए एक संगीत सुविधा के लिए 3 साल की उम्र में अपना पहला गीत रिकॉर्ड किया और 1985 में श्रीनगर कश्मीर में 8000 से अधिक आवाजों की विशेषता वाले अपने पिता की भव्य कोरल प्रस्तुति का भी हिस्सा थे । 

उन्होंने सोपोरी एकेडमी ऑफ म्यूजिक एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स (सामापा) द्वारा आयोजित कश्मीर में अक्टूबर 2005 में 100 से अधिक गायकों की अपनी पहली कोरल प्रस्तुति प्रस्तुत की। अभय का जम्मू और कश्मीर लोक संगीत पहनावा (सोज़-ओ-साज़) भी कई अन्य त्योहारों और सम्मेलनों में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें नई दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में प्रस्तुत 'जम्मू और कश्मीर महोत्सव' शामिल है। 2009 और 2010 में पुणे में गणेश कला क्रीड़ा रंगमंच, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध और मंत्रमुग्ध कर दिया। अभय के क्लासिकल फ्यूजन को भी शानदार समीक्षाएं मिली हैं। 

2000 में, अभय ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए घाटी भर के युवाओं के लिए प्रदर्शन करते हुए कश्मीर में अपना संगीत कार्य शुरू किया और उन्हें संगीत के माध्यम से युवाओं को एक साथ लाने के लिए जम्मू और कश्मीर के पूरे सांस्कृतिक परिदृश्य को बदलने का श्रेय दिया जाता है। जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों में उनके संगीत कार्यक्रमों में 20,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया है। 

1990 के दशक के मध्य में एक शास्त्रीय संतूर वादक के रूप में अपनी शुरुआत के बाद से, अभय ने संयुक्त राज्य अमेरिका , रूस , ब्राजील , मॉरीशस , जापान , दक्षिण कोरिया , सिंगापुर , जर्मनी , फ्रांस , इटली जैसे देशों में भारत और दुनिया भर के प्रतिष्ठित समारोहों में प्रदर्शन किया है । स्लोवाकिया , चेक गणराज्य , हंगरी , स्वीडन , स्विट्जरलैंड , स्पेन , स्लोवेनिया , यूक्रेन ,थाईलैंड , मलेशिया , वियतनाम , मोरक्को , ईरान , इज़राइल , बहरीन , दुबई , आदि।

सोपोरी ने 2011 में 'सूफी किंशिप शीर्षक से 'सूफी म्यूजिक एनसेंबल' की अवधारणा पेश की, जिसमें 35 संगीतकार शामिल थे और संतूर ने 2014 में एक भारतीय शास्त्रीय संगीत एनसेंबल का नेतृत्व किया जिसमें 25 संगीतकार शामिल थे और पूरे भारत में विभिन्न संगीत कार्यक्रमों में प्रदर्शन किया।

उन्होंने 2013 में जर्मनी के बवेरियन स्टेट ऑर्केस्ट्रा द्वारा प्रदर्शित हफ्तरंग (कश्मीरी में सात रंग) नामक फ्यूजन रचना के लिए संगीत तैयार किया , साथ में उनके कश्मीरी लोक संगीत कलाकारों की टुकड़ी सोज़-ओ-साज़ के साथ, कश्मीरी संगीत को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई। कॉन्सर्ट का 100 से अधिक देशों में सीधा प्रसारण किया गया था। ऑर्केस्ट्रा में लगभग 100 संगीतकार शामिल थे। 

सोपोरी ने ऑस्ट्रियाई विएना बॉयज़ क्वायर , मोरक्कन लुटिस्ट हज यूनुस, ईरानी संतूर खिलाड़ी डेरियस सघाफी, अमेरिकी डुलसीमर खिलाड़ी मैल्कम दलगिश, फ्रांसीसी शहनाई वादक लॉरेंट क्लॉएट और अन्य के साथ प्रस्तुतियों सहित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग भी किया है। 

उन्होंने विभिन्न सांस्कृतिक पदों पर कार्य किया है जैसे:

महासचिव, सामापा (सोपोरी संगीत और प्रदर्शन कला अकादमी) (सामापा), भारत की सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठित संगीत अकादमियों और संगठनों में से एक (2005 के बाद) 
केंद्रीय समिति के सदस्य, जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति और भाषा अकादमी, सरकार। जम्मू और कश्मीर (2016 के बाद) 
जनरल काउंसिल के सदस्य, जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति और भाषा अकादमी, सरकार। जम्मू और कश्मीर (2016 के बाद) 
सदस्य, संपादकीय बोर्ड, जेके संगीत पहल, उच्च शिक्षा विभाग, सरकार द्वारा संगीत पत्रिका। जम्मू और कश्मीर (2018 के बाद) 
विजिटिंग फैकल्टी, मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय, एमहर्स्ट यूएसए (2004)

एकता कपूर

*🎂जन्म 7 जून 1975*
एकता कपूर; भारतीय टीवी और फिल्म उद्योग में एक प्रसिद्ध निर्माता का जन्म 7 जून 1975 को भारत में हुआ था। वह मूल रूप से अपनी प्रोडक्शन कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स की रचनात्मक निदेशक और संयुक्त प्रबंध निदेशक हैं। की बेटी हैशोभा कपूरऔर अभिनेता जितेंद्र। तुषार कपूर, उनके भाई भी बॉलीवुड फिल्मों में काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल माहिम से पूरी की और मीठीबाई कॉलेज गईं।

सुश्री कपूर ने कई शानदार सोप ओपेरा, अविस्मरणीय फिल्में और लंबे समय से याद की जाने वाली टीवी श्रृंखला का निर्माण किया है। कस्तूरी, कभी सौतन कभी सहेली, हम पांच, कसौटी जिंदगी की, कहीं तो होगा, मिया फौज में बीवी मौज में, काव्यांजलि, क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कुसुम, कितनी मोहब्बत है, कुटुंब,तेरे लिए, बंदिनी, किस देश में है मेरा दिल, जिंदगी के सपनों का और क्या हुआ तेरा वादा उनके कुछ पसंदीदा सोप ओपेरा हैं। वर्तमान में, वह बड़े अच्छे लगते हैं, पवित्र बंध, में काम कर रही हैं।पवित्र रिश्तातथा ये है मोहब्बतें।

एकता ने 2001 में निर्माता के रूप में अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत क्यो की मैं झूठ नहीं बोलता और कुछ तो है से की थी। उनकी बहुत प्रसिद्ध फिल्म में से एक हैकृष्णा कुटीरकई रिकॉर्ड तोड़े और अभी भी सबसे पसंदीदा बने हुए हैं। वह अपनी ब्लॉक बस्टर फिल्मों वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई, डर्टी पिक्चर, शूटआउट एट वडाला, वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा, इक विलन, सी कोम्पनी और के लिए भी जानी जाती हैं।एक थी डायन.

केसियस खान


कैसियस खान
 🎂जन्म 7 जून 1974

,🇨🇦एक कनाडाई भारतीय शास्त्रीय संगीतकार हैं, जिन्हें गाते समय तबला बजाने के लिए जाना जाता है।

↔️खान का जन्म 1974 में लोटोका , फिजी में हुआ था।

वैंकूवर , कनाडा में एक युवा किशोर के रूप में , खान मुश्तरी बेगम, एक ग़ज़ल गायिका, शेख मोहयुदीन, एक हारमोनियम और कव्वाली गायक, और उस्ताद रुखसार अली, एक तबला वादक से मिले। उन्होंने ग़ज़ल गाना और तबला बजाना एक साथ सीखा। खान के प्रदर्शनों की सूची में तबला बजाते हुए तरन्नुम अंग गायकी भी शामिल है, और यह उनकी ट्रेडमार्क शैली बन गई। प्रदर्शन की इस दुर्लभ शैली में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में, उन्हें 2016 में ब्रिटिश कोलंबिया के न्यू वेस्टमिंस्टर में भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य के 5 वें वार्षिक मुश्तरी बेगम महोत्सव के दौरान पंडित सलिल भट्ट द्वारा "उस्ताद" या उस्ताद का नाम दिया गया था ।

खान के शुरुआती करियर को उनके पहले एल्बम, कैसियस खान-द यंग तबला/ग़ज़ल विज़ार्ड की रिकॉर्डिंग और अंतर्राष्ट्रीय दौरे के बाद सीमित सफलता मिली । कॉलेज और विश्वविद्यालय में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने अपने संगीत करियर की शुरुआत की, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण प्रशांत, यूरोप और दक्षिण अमेरिका में लोक उत्सव के दृश्य का दौरा करके, एकल प्रदर्शन और अन्य कलाकारों के साथ मिलकर तबला वादक और गायक दोनों के रूप में शुरुआत की। .

☑️2001 में, विभिन्न बैंडों में एक सिपाहियों के रूप में प्रदर्शन करने के बाद, खान ने संगीतकार जान रान्डेल के मार्गदर्शन में एथलेटिक्स में IAAF विश्व चैंपियनशिप के लिए "एशिया संगीत" की रचना की । उसी वर्ष, उन्हें बीबीसी रेडियो 2 की "शीर्ष 25 विश्व कलाकारों को देखने के लिए" की सूची में शामिल किया गया था।

2005 में, खान ने अल्बर्टा सीन फेस्टिवल के हिस्से के रूप में ओटावा में नेशनल आर्ट्स सेंटर में ग़ज़ल और एक तबला एकल गायन किया , और 2006 में सैल्मन आर्म रूट्स एंड ब्लूज़ फेस्टिवल में एक कनाडाई लोक उत्सव में अपना पहला शास्त्रीय ग़ज़ल और तबला गायन प्रस्तुत किया। 2008 में ऑस्टिन , टेक्सास में साउथवेस्ट द्वारा दक्षिण पश्चिम में ग़ज़ल/तबला का प्रदर्शन करने के लिए 8,000 आवेदकों में से उनका चयन किया गया था। उसी वर्ष एलेन मैकलवाइन और खान को कैलगरी में जूनो अवार्ड्स में जूनो फेस्ट के लिए प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया गया था। अगले वर्ष खान कनाडाई संगीत सप्ताह के लिए एक विशेष रुप से प्रदर्शित कलाकार थे. खान की रिकॉर्डिंग को 2009 में जापान ट्रेड मिशन के लिए भी चुना गया था। खान 23 नवंबर 2013 को नई दिल्ली में सा मा पा संगीत समारोह में प्रदर्शन करने वाले पहले कनाडाई भी थे।

खान को 2008 में यारलो कलाकार समूह द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था। उन्होंने 2009 में अपने प्रबंधन को निकाल दिया और चार महीने बाद उनकी सेवा समाप्त करने से पहले 2016 में रीबूट प्रबंधन को काम पर रखा।

खान की ग़ज़ल एल्बम मुश्तरी, एक लाइव संगीत कार्यक्रम , 2011 में रिलीज़ हुई, जिसे वेस्टर्न कैनेडियन म्यूज़िक अवार्ड्स (WCMA) द्वारा "वर्ल्ड एल्बम ऑफ़ द ईयर" के लिए नामांकित किया गया था और शास्त्रीय संगीत के चयन के साथ खान के गुरु और शिक्षक मुश्तरी बेगम को श्रद्धांजलि थी। ग़ज़ल और एक तबला एकल गायन। यह एक कलाकार द्वारा एक साथ ग़ज़ल और तबला के साथ रिकॉर्ड किया गया पहला एल्बम था। उन्होंने 2011 में एक तबला सोलो सिंगल, "स्पार्क्स ऑफ एनर्जी" भी जारी किया। इन दोनों एल्बमों में खान की पत्नी अमिका कुशवाहा को हारमोनियम एकल कलाकार के रूप में दिखाया गया है।

खान के अन्य सहयोगों में शामिल हैं: महाविष्णु ऑर्केस्ट्रा के जैज़ पियानोवादक स्टु गोल्डबर्ग के साथ डार्क क्लाउड्स (2006) ; मिस्टिक ब्रिज नामक स्लाइड गिटारवादक एलेन मैकलवाइन के साथ एक सहयोग , एक ब्लूज़ / भारतीय संगीत एल्बम जिसे 2008 में रूट्स एंड ट्रेडिशनल एल्बम ऑफ़ द ईयर के लिए जूनो अवार्ड के लिए चुना गया था; आई फील लव अगेन (2002) भूमध्य गिटारवादक पावलो के साथ ; हेवी मेटल/श्रेड गिटारवादक डैन मनी के साथ मनी लिक्स (2002); ए डेमन्स ड्रीम (2002) और द अल्केमिस्ट्स (2002) ध्वनिक/विद्युत गिटारवादक डेव मार्टोन के साथ; और एंजेल ऑफ सेविला (1990) स्पेनिश गिटारवादक डी'आर्सी ग्रीव्स के साथ ।

खान ने मोहन वीणा के आविष्कारक , कलाकार पंडित विश्व मोहन भट्ट , सात्विक वीणा वादक पंडित सलिल भट्ट, कथक कलाकार/हारमोनियम एकल वादक और भारतीय शास्त्रीय संगीत और ग़ज़ल गायकों की कई अन्य हस्तियों के साथ भी सहयोग किया है। 

🇨🇦खान को भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान के लिए 2005 में सिटी ऑफ़ एडमॉन्टन द्वारा "सेल्यूट टू एक्सीलेंस अवार्ड" और 2019 में सिटी ऑफ़ न्यू वेस्टमिंस्टर चैंबर ऑफ़ कॉमर्स द्वारा "बर्नी लेग आर्टिस्ट ऑफ़ द ईयर" से सम्मानित किया गया। (एलेन मैकलवाइन के साथ) 2008 में उनके एल्बम मिस्टिक ब्रिज के लिए जूनो अवार्ड के लिए , और उनके एल्बम मुश्तरी-एक लाइव कॉन्सर्ट के लिए WCMA अवार्ड के लिए नामांकन । उन्होंने संयुक्त राष्ट्र , विश्व बौद्धिक संपदा संगठन और नमस्ते जिनेवा के लिए भारत के स्थायी मिशन के लिए जिनेवा , स्विट्जरलैंड में भी प्रदर्शन किया है, संयुक्त राष्ट्र में भारतीय राजदूत राजीव चंदर द्वारा बनाई गई एक पहल, 2017/2018 में।

अपनी पत्नी, अमिका कुशवाहा के साथ, खान ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य के मुश्तरी बेगम महोत्सव की स्थापना की, जो पहली बार 25 अगस्त 2012 को ब्रिटिश कोलंबिया के न्यू वेस्टमिंस्टर में मैसी थिएटर में हुआ। वह न्यू वेस्टमिंस्टर शहर के मानद सांस्कृतिक राजदूत हैं।

खान तबला निर्माता उस्ताद कासिम खान नियाज़ी एंड संस के लक्ष्मीनगर, नई दिल्ली, भारत के आधिकारिक प्रवक्ता भी हैं , और सिडनी , ऑस्ट्रेलिया में स्थित अमन कल्याण के लेहरा स्टूडियो ऐप द्वारा इसका समर्थन किया जाता है। वह न्यू वेस्टमिंस्टर में मैसी थिएटर में मैसी अनलिमिटेड ग्लोबल टी सीरीज़ के क्यूरेटर भी हैं ,  और उसी शहर में एनविल सेंटर में 2021 के कलाकार निवासी थे। खान अंतरराष्ट्रीय निजी मुलग्रेव स्कूल में अतिथि संगीत प्रशिक्षक भी हैं , जहां वे युवा छात्रों को भारतीय शास्त्रीय संगीत सिखाते हैं।

खान न्यू वेस्टमिंस्टर, ब्रिटिश कोलंबिया में रहते हैं । उन्होंने 2006 में कथक नृत्यांगना अमिका कुशवाहा से शादी की , और वे उनके एकल कथक नृत्य संगीत और उनके ग़ज़ल और तबला संगीत कार्यक्रमों में एक दूसरे के प्रमुख सहयोगी हैं।

फ़िलिस्तीनियों के इलाज के विरोध में खान ने 2009 में इज़राइल में प्रदर्शन करने से इनकार कर दिया। वह विश्व संगीत शब्द और कनाडाई संगीत परिदृश्य में गैर-पश्चिमी विषयों के प्रतिनिधित्व की कमी के आलोचक रहे हैं ।

"कैसियस खान कनाडाई विश्व संगीत में हमारे समय का एक चमकता सितारा है।"

गुरुवार, 1 जून 2023

ख़्वाजा अहमद अब्बास मुल्क़

महान फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक, निर्माता एवं पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
*🎂जन्म 07जून*
*⚰️01जून*
ख़्वाजा अहमद अब्बास मुल्क़ के उन गिने चुने लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने अपने लेखन से पूरी दुनिया को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैग़ाम दिया। अब्बास ने न सिर्फ फ़िल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी नए मुक़ाम कायम किए। तरक्क़ीपसंद तहरीक से जुड़े हुए कलमकारों और कलाकारों की फ़ेहरिस्त में ख़्वाज़ा अहमद अब्बास का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें खिराज़-ऐ-अक़ीदत ~ 🌷

ख्वाज़ा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ था। उनके दादा ख़्वाजा ग़ुलाम अब्बास 1857 स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में से एक थे और वह पानीपत के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्हें तत्कालीन अंग्रेज़ हुक़ूमत ने तोप के मुँह से बाँधकर शहीद किया था। इस बात का भी शायद ही बहुत कम लोगों को इल्म हो कि ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, मशहूर और मारूफ़ शायर मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली के परनवासे थे। यानी वतन के लिए कुछ करने का जज्बा और जोश उनके ख़ून में ही था। अदब से मुहब्बत की तालीम उन्हें विरासत में मिली थी।

ख़्वाज़ा अहमद अब्बास की शुरूआती तालीम हाली मुस्लिम हाई स्कूल में और आला तालीम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। उनके अंदर एक रचनात्मक बैचेनी नौजवानी से ही थी। 
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अब्बास जिस सबसे पहले अख़बार से जुड़े, वह ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ था। इस अखबार में बतौर संवाददाता और फ़िल्म समीक्षक उन्होंने साल 1947 तक काम किया। अपने दौर के मशहूर साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ से उनका नाता लंबे समय तक रहा। इस अखबार में प्रकाशित उनके कॉलम ‘लास्ट पेज’ ने उन्हें देश भर में काफी शोहरत प्रदान की।
तेज़ी से काम करना, लफ्फाजी और औपचारिकता से परहेज, नियमितता और साफ़गोई ख़्वाजा अहमद अब्बास के स्वभाव का हिस्सा थे। विनम्रता उनकी शख्सियत को संवारती थी। 

कथाकार राजिंदर सिंह बेदी ने अब्बास की शख्सियत के बारे में लिखा है ~

"एक चीज जिसने अब्बास साहब के सिलसिले में मुझे हमेशा विर्त-ए-हैरत (अचंभे का भंवर) में डाला है, वह है उनके काम की हैरतअंगेज ताकतो-कूव्वत। कहानी लिख रहे हैं और उपन्यास भी। कौमी या बैनुल-अकवामी (अंतरराष्ट्रीय) सतह पर फिल्म भी बना रहे हैं और सहाफत को भी संभाले हुए हैं। आगे लिखते हैं, फिर पैंतीस लाख कमेटियों का मेंबर होना सामाजिक जिम्मेदारियों का सबूत है और यह बात मेंबरशिप तक ही महदूद नहीं। हर जगह पहुंचेंगे भी, तकरीर भी करेंगे। पूरे हिंदुस्तान में मुझे इस किस्म के तीन आदमी दिखाई देते हैं-एक पंडित जवाहर लाल नेहरू, दूसरे बंबई के डॉक्टर बालिगा और तीसरे ख्वाजा अहमद अब्बास। जिनकी यह कूव्वत और योग्यता एक आदमी की नही।"

अपनी स्थापना के कुछ ही दिन बाद, इप्टा का सांस्कृतिक आंदोलन जिस तरह से पूरे मुल्क़ में फैला, उसमें ख़्वाजा अहमद अब्बास का अहम हाथ है। अब्बास ने इप्टा के लिए खूब नाटक भी लिखे, कई नाटकों का निर्देशन भी किया। ‘यह अमृता है’, ‘बारह बजकर पांच मिनिट’, ‘जुबैदा’ और ‘चौदह गोलियां’ उनके मक़बूल नाटक हैं।

इप्टा द्वारा साल 1946 में बनाई गई पहली फिल्म ‘धरती के लाल’ ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही निर्देशित की थी। कहने को यह फिल्म इप्टा की थी, लेकिन इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका अब्बास ने ही निभाई थी। बंगाल के अकाल पर बनी यह फिल्म कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में समीक्षकों द्वारा सराही गई। इस फिल्म में जो प्रमाणिकता दिखलाई देती है, वह अब्बास की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है। बंगाल के अकाल की वास्तविक जानकारी इक्कट्ठा करने के लिए उन्होंने उस वक़्त बाकायदा अकालग्रस्त इलाक़ों का दौरा भी किया। इस फ़िल्म की कहानी और संवाद ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही लिखे थे। 

‘धरती के लाल’ ऐसी फ़िल्म थी जिसमें देश की मेहनतकश अवाम को पहली बार केन्द्रीय हैसियत में पेश किया गया है। पूरे सोवियत यूनियन में यह फिल्म दिखाई गई और कई देशों ने अपनी फ़िल्म लाइब्रेरियों में इसे स्थान दिया है। इंग्लैंड की प्रसिद्ध ग्रंथमाला पेंग्विन ने अपने एक अंक में उसे फिल्म-इतिहास में एक महत्वपूर्ण फिल्म कहा। सच बात तो यह है ‘धरती के लाल’ फिल्म से प्रेरणा लेकर ही विमल राय ने अपनी फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ और सत्यजीत रॉय ने ‘पाथेर पांचाली’ में यथार्थवाद का रास्ता अपनाया।  

इसके बाद साल 1951 में उन्होंने ‘नया संसार’ नाम से अपनी खुद की फ़िल्म कंपनी खोल ली। ‘नया संसार’ के बैनर पर उन्होंने कई उद्देश्यपूर्ण और सार्थक फ़िल्में बनाईं। मसलन ‘राही’ (1953), मशहूर अंग्रेजी लेखक मुल्क राज आनंद की एक कहानी पर आधारित थी, जिसमें चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा को दर्शाया गया था। मशहूर निर्देशक वी. शांताराम की चर्चित फिल्म ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’ अब्बास के अंग्रेजी उपन्यास ‘एंड वन डिड नॉट कम बैक’ पर आधारित है।
‘अनहोनी’ (1952) सामाजिक विषय पर एक विचारोत्तेजक फिल्म थी। फिल्म ‘शहर और सपना’ (1963) में फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले लोगों की समस्याओं का वर्णन है, तो ‘दो बूँद पानी’ (1971) में राजस्थान के रेगिस्थान में पानी की विकराल समस्या को दर्शाया गया है।

गोवा की आजादी पर आधारित ‘सात हिंदुस्तानी’ भी उनकी एक उल्लेखनीय फिल्म है। मशहूर निर्माता-निर्देशक राज कपूर के लिए ख्वाजा अहमद अब्बास ने जितनी भी फिल्में लिखी, उन सभी में हमें एक मजबूत सामाजिक मुद्दा मिलता है। चाहे वो ‘आवारा’ हो, ‘जागते रहो’ या फिर ‘श्री 420’। पैंतीस वर्षों के अपने फ़िल्मी करियर में अब्बास ने तेरह फिल्मों का निर्माण किया। लगभग चालीस फिल्मों की कहानी और पटकथाएँ लिखीं, जिनमें ज़्यादातर राज कपूर की फ़िल्में हैं। अब्बास को भले ही फ़िल्मकार के रुप में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली हो लेकिन बुनियादी तौर पर वे एक अफ़सानानिगार थे। अब्बास एक बेहतरीन अदीब थे। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज में जमकर लिखा। अब्बास की कहानियों की तादाद कोई एक सैंकड़े से ऊपर है। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी तीनों भाषाओं में जमकर लिखा।  

अब्बास की कहानियां अपने दौर के उर्दू के चर्चित रचनाकारों कृष्ण चंदर, इस्मत चुगताई, राजेन्द्र सिंह बेदी और सआदत हसन मंटो के साथ छपतीं थीं। हालांकि उनकी कहानियों में कहानीपन से ज्यादा पत्रकारिता हावी होती थी, लेकिन फिर भी पाठक उन्हें बड़े शौक से पढ़ा करते थे। अब्बास का अफ़साना ‘जिंदगी’ पढ़ने के बाद पाठक बखूबी उनकी सोच के दायरे और नज़रिए तक पहुंच सकते हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास के कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। जिनमें ‘एक लड़की’, ‘जाफरान के फूल’, ‘पांव में फूल’, ‘मैं कौन हूं’, ‘गेंहू और गुलाब’, ‘अंधेरा-उजाला’, ‘कहते हैं जिसको इश्क’, ‘नई धरती नए इंसान’, ‘अजंता की ओर’, ‘बीसवीं सदी के लैला मजनू’, ‘आधा इंसान’, ‘सलमा और समुद्र’, और ‘नई साड़ी’ प्रमुख कहानी संग्रह हैं। ‘इंकलाब’, ‘चार दिन चार राहें’, ‘सात हिंदुस्तानी’, ‘बंबई रात की बांहों में’ और ‘दिया जले सारी रात’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास के समस्त लेखन को यदि देखें, तो यह लेखन स्वछन्द, स्पष्ट और भयमुक्त दिखलाई देता है। 

उनकी कहानियों का दायरा पांच दशक तक फैला हुआ है। अब्बास की पहली कहानी ‘अबाबील’ साल 1935 में छपी और उसके बाद यह सिलसिला बीसवीं सदी के आठवें दशक तक चला। जब अब्बास ने अपनी पहली कहानी लिखी, तो उस वक्त उनकी उम्र महज उन्नीस साल थी। उन्नीस साल कोई अधिक उम्र नहीं होती लेकिन जो कोई भी इस कहानी को एक बार पढ़ लेगा, वह अब्बास के जेहन और उनके कहन का दीवाना हुए बिना नहीं रहेगा। इस एक अकेली कहानी से अब्बास रातों-रात देश-दुनिया में मशहूर हो गए।
कई जबानों में इस कहानी के अनुवाद हुए। अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्वीडिश, अरबी, चीनी वगैरह-वगैरह। जर्मन ज़ुबान में दुनिया की बेहतरीन कहानियों का जब एक संकलन निकला, तो उसमें ‘अबाबील’ को शामिल किया गया।

कहानी में अब्बास ने किसान की जिंदगी का जिस तरह से खाका खींचा है, वह बिना गांव और किसानों की जिंदगी को जिये बिना मुमकिन नहीं। ताज्जुब की बात यह है कि अब्बास को गांव और किसान की जिंदगी का कोई जाती तजुर्बा नहीं था। कहानी लिखते समय किसानों के बारे में उनका इल्म न के बराबर था। एक इंटरव्यू में जब कृष्ण चंदर ने इसके मुतआल्लिक उनसे पूछा, तो अब्बास का बेबाक जवाब था ~

'कोई ज़रूरी नहीं कि हर कहानी अनुभव पर आधारित हो। जिस प्रकार क़ातिल के विषय में लिखने से पहले क़त्ल करना ज़रूरी नहीं। या एक वेश्या के जीवन का वर्णन करने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि लेखक स्वयं भी किसी वेश्या के साथ सो चुका हो।'

शहर और महानगरों का कड़वा यथार्थ अब्बास की कई कहानियों में सामने आया है। ‘अलिफ लैला' और ‘सुहागरात’ ऐसी ही संघर्षों और उसके बीच चल रही जिंदगी की कहानियां हैं। इन्हीं कहानियां का विस्तार उनकी फिल्म ‘शहर और सपना’ है। जो उस वक्त कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही गई थी।  

अब्बास एक सच्चे वतनपरस्त और सेक्युलर इंसान थे। उनके सबसे करीबी दोस्तों में शामिल थे, इन्दर राज आनन्द, मुनीष नारायण सक्सेना, वी.पी. साठे, आर. के. करंजिया, राज कपूर, कृष्ण चंदर, अली सरदार जाफ़री आदि। अपनी वसीयत में उन्होंने लिखा था ~

‘मेरा जनाजा यारों के कंधों पर जुहू बीच स्थित गांधी के स्मारक तक ले जाएं, लेजिम बैंड के साथ। अगर कोई खिराज-ए-अकीदत पेश करना चाहे और तकरीर करे तो उनमें सरदार जाफ़री जैसा धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हो, पारसी करंजिया हों या कोई रौशनख्याल पादरी हो वगैरह, यानी हर मजहब के प्रतिनिधि हों।’  

ख़्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी आखिरी सांस माया नगरी मुंबई में ली। 1 जून 1987 को वे इस दुनिया से जिस्मानी तौर पर दूर चले गए। उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा, ‘जब मैं मर जाऊंगा तब भी मैं आपके बीच में रहूंगा। अगर मुझसे मुलाक़ात करनी है तो मेरी किताबें पढ़ें और मुझे मेरे ‘आखिरी पन्नों’, ‘लास्ट पेज’ में ढूंढे, मेरी फिल्मों में खोजें। मैं और मेरी आत्मा इनमें है। इनके माध्यम से मैं आपके बीच, आपके पास रहूँगा, आप मुझे इनमें पायेंगे।’

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