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गुरुवार, 25 जनवरी 2024

अनिल गांगुली

#15jan
#26jan 
अनिल गांगुली

🎂जन्म26 जनवरी, 1933
कलकत्ता , बंगाल प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत (अब पश्चिम बंगाल , भारत )
⚰️मृत15 जनवरी 2016 (आयु 82 वर्ष)
मुंबई, महाराष्ट्र , भारत

भारतीय
व्यवसायों,निदेशक पटकथा,लेखक

उल्लेखनीय कार्य
कोरा कागज़
तपस्या (1976 फ़िल्म)
रिश्तेदार
रूपाली गांगुली (बेटी) विजय गांगुली (बेटा)
 एक भारतीय फिल्म निर्देशक और पटकथा लेखक थे, जिन्होंने 1970 से 2001 तक हिंदी सिनेमा में काम किया । उन्हें जया भादुड़ी अभिनीत फिल्म कोरा कागज (1974) और राखी अभिनीत फिल्म तपस्या (1975) के लिए जाना जाता है। ), जिनमें से दोनों ने संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता । उन्हें राखी के साथ तृष्णा , आंचल , साहेब (1985) जैसी फिल्मों के लिए भी जाना जाता है। बाद में अपने करियर में, 1986 के बाद उन्होंने सात फ़िल्में बनाईं जिनमें से कोई भी सफल नहीं हुई।

गांगुली ने अपने करियर की शुरुआत सशक्त महिला भूमिकाओं और वैवाहिक कलह के विषयों के साथ साहित्यिक रूपांतरण करते हुए की। अपनी दूसरी फिल्म कोरा कागज के लिए उन्होंने आशुतोष मुखोपाध्याय की कहानी "सात पाके बंधा" को रूपांतरित किया , जिसे पहले इसी नाम से एक बंगाली फिल्म में रूपांतरित किया गया था। फ़िल्मों की मुख्य अभिनेत्री जया भादुड़ी ने अपनी भूमिका के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता ।उनकी अगली फिल्म, तपस्या (1975) जिसमें राखी मुख्य भूमिका में थीं, का निर्माण राजश्री प्रोडक्शंस द्वारा किया गया था , और यह आशापूर्णा देवी की कहानी पर आधारित थी । राखी ने अपनी भूमिका के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता बाद में उन्होंने शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास परिणीता को संकोच (1976) के रूप में रूपांतरित किया, जिसमें सुलक्षणा पंडित और जीतेंद्र मुख्य भूमिका में थे।  1980 में बनी राखी अभिनीत हमकदम सत्यजीत रे की महानगर का रूपांतरण थी ।

उन्होंने राजेश खन्ना को मुख्य नायक के रूप में लेकर आंचल बनाई और फिल्म प्लैटिनम जुबली हिट साबित हुई। उनकी आखिरी बड़ी फिल्म अनिल कपूर और अमृता सिंह स्टारर साहेब (1985) थी। बाद में अपने करियर में, उन्होंने एक्शन और थ्रिलर फिल्में बनाना शुरू कर दिया, लेकिन 1986 से उनकी बनाई गई 9 में से नौ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं। उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म तापस पॉल और देबाश्री रॉय के साथ बंगाली फिल्म ' किये पारा किये नजारा' (1998) थी । 15 जनवरी 2016 को 82 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। 
📽️
हाफ टिकट (1962) सहायक निदेशक
भीगी रात (1965) सहायक निर्देशक
कोरा कागज़ (1974)
तपस्या (1975)
संकोच (1976)
तृष्णा (1978)
खानदान (1979)
समझौता (1980)
नियत (1980)
आँचल (1980)
हमकदम (1980)
करवट (1982)
कौन? कैसी? (1983)
साहेब (1985)
मेरा यार मेरा दुश्मन (1987)
प्यार के काबिल (1987)
सड़क छाप (1987)
बालिदान (बोलिदान) (1990, बंगाली)
दुश्मन देवता (1991)
दिल की बाजी (1993)
अंगारा (1996)
किये पारा किये निजारा (1998, उड़िया)

सोमवार, 15 जनवरी 2024

जगदीश सेठी

#15jan
#12jun 
जगदीश सेठी

🎂जन्म 15 जनवरी 1903, पंजाबी गली, बम्बई, महाराष्ट्र
⚰️मृत 12,जून,1969 बम्बई

भारतीय अभिनेता , निदेशक थे
माना जाता है कि जगदीश एक ज्योतिषी भी थे।

उनका ओमेश नाम का एक बेटा था। वह इंडियन मर्चेंट नेवी में डेक मास्टर मेरिनर थे, 1993 में कार्डियक अरेस्ट से उनकी मृत्यु हो गई; मृत्यु के समय वह मुश्किल से पचास वर्ष के थे।

जदीश ने करीब 66 फिल्मों में एक्टर, डायरेक्टर, राइटर के तौर पर काम किया है। बतौर निर्देशक उन्होंने पांच फिल्मों दो दिल (1947), रात की रानी (1948), इंसान (1952), जग्गू (1952), पेंशनर (1954) में काम किया है।

उन्होंने लगभग 60 फिल्मों में अभिनेता के रूप में काम किया है; उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ हैं आलम आरा (1931), शेर-ए-अरब (1930), प्रेसिडेंट (1937), कन्हान है मंजिल तेरी (1939)।

उन्होंने फिल्म रात की रानी (1948) में पटकथा लेखक, कहानी लेखक और निर्माता के रूप में भी काम किया है, जो उस समय एक बड़ी सफलता थी। जगदीश एक प्रसिद्ध गीतकार भी थे और उनकी रचनाएँ प्यार की राह दिखा दुनिया को, प्यारी सुरतो मोह भरी मुर्तो, सितम द हज़ारों शुक्र के आज भी वृद्ध लोगों के बीच प्रसिद्ध हैं।

12 जून 1969 को 63 वर्ष की आयु में जदीश सेठी का बुढ़ापे की बीमारी के कारण उनके घर पर निधन हो गया।
📽️
1931 आलम आरा
1931 द्रौपदी
1931 अनंगसेना
1932 शिकारी
1934 अनोखा प्रेम
1935 जोश-ए-इंतेक़ाम
1935 जहाँआरा
1936 भोले भाले   
1936/आई करोदपति 
1936 माया 
1936 पुजारिन
1939 बड़ी दीदी 
1939 जवानी की रीत 
1945 नीलम
1943 आबरू 
1943 इनकार 
1943 नमस्ते 
1943 बिचार 
1942 कीर्ति 
1942 तूफ़ान मेल की वापसी 
1942 स्टेशन मास्टर 
1942 तमन्ना 
1941 घर की लाज 
1941 कुरमई 
1941 सज्जन 
1940 चंबे दी काली 
1940 नर्तकी
1939 कपाल कुंडला 
1938 अधिकार 
1938 धरती माता 
1938 दुश्मन 
1938/आई स्ट्रीट सिंगर
1944 चल चल रे नौजवान 
1944 कादम्बरी 
1944 माँ बाप
1945 नीलम
1950 परदेस 
1949 रात की रानी 
1948 आज़ादी की राह पर 
1947 ज़ंजीर 
1946 फिर भी अपना है 
1946 रंगभूमि 
1945 आम्रपाली 
1945 चाँद तारा
1954 पेंशनभोगी 
1954 वारिस 
1954 इल्ज़ाम 
1952 दो राहा 
1952 जग्गू 
1952 नौ बहार
निर्देशक
1952 इंसान
1952 जग्गू
1947 दो दिल

सरदुल सिकंदर


#15jan
#24feb 
सरदूल सिकंदर
🎂जन्म 15 जनवरी, 1961
जन्म भूमि गांव खेड़ी नौद, पंजाब
⚰️मृत्यु 24 फ़रवरी, 2021
मृत्यु स्थान चंडीगढ़, पंजाब
अभिभावक पिता- सागर मस्ताना
पति/पत्नी अमर नूरी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गायिकी
मुख्य फ़िल्में 'जग्गा डाकू', 'पुलिस इन पॉलीवुड' आदि।
प्रसिद्धि पंजाबी गायक व अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी सरदूल सिकंदर ने सिंगिंग कॅरियर में 25 से ज़्यादा अल्बम रिकॉर्ड किए। गायकी में अपने कदम जमाने के बाद उन्होंने दूसरी पारी की शुरुआत सन 1991 में आई फ़िल्म ‘जग्गा डाकू’ से की थी।
पंजाबी भाषा के लोक और पॉप संगीत से जुड़े प्रसिद्ध गायक तथा अभिनेता थे। सन 1980 के दशक में सरदूल सिकंदर ने अपनी पहली अलबम "रोडवेज दी लारी" निकाली थी। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने कई हिट गाने दिए। इसके अलावा फ़िल्मों में भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया। सरदूल सिकंदर ने पंजाबी फ़िल्म 'जग्गा डाकू' में शानदार अभिनय से अपनी अभिनय कला से सबका दिल जीत लिया था।

परिचय
पंजाब का फतेहगढ़ ज़िला। उसी का छोटा सा गांव खेड़ी नौद सिंह। 15 जनवरी, 1961 में सागर मस्ताना के घर एक लड़के का जन्म हुआ। नाम रखा गया सरदूल सिकंदर। सरदूल के अलावा सागर मस्ताना के दो बड़े बेटे भी थे। गम्दूर अमन और भरपूर। गम्दूर एक सूफी सिंगर थे। वहीं, भरपूर का वास्ता रहता था तबले से। पेशे से एक तबला वादक थे। खुद इनके पिता सागर मस्ताना अपने समय के महान तबला वादकों में गिने जाते हैं। संगीत से जुड़ी क्रिएटिविटी को सिर्फ सुरों में ही नहीं उतारते थे। बल्कि, नए-नए तबले बनाने की कोशिश में भी लगे रहते थे। इसी कोशिश में एक अलग किस्म का तबला भी ईजाद किया। जिसे बारीक बांस की लड़की से भी बजाया जा सकता था।
30 जनवरी, 1993 को सरदूल सिकंदर की शादी गायिका अमर नूरी से हुई। दोनों लंबे वक्त से साथ गा रहे थे। इसी दौरान प्यार हुआ। सरदूल की तरह अमर ने भी छोटी उम्र से म्यूज़िक सीखना शुरू कर दिया था। नौ साल की उम्र में गाना शुरू किया और 13 साल की उम्र में पहली रिकॉर्डिंग की। आगे चलकर सिंगिंग की दुनिया में खूब नाम कमाया। दोनों पति-पत्नी ने साथ मिलकर कई इंटरनेशनल म्यूज़िक टूर किए। जुगलबंदी ऐसी कि दोनों के सुर लय में दौड़ते। लेकिन इनकी ये केमिस्ट्री सिर्फ स्टेज तक ही नहीं थी। रियल लाइफ में भी उतनी ही मज़बूत थी।

कुछ साल पहले ही इसका नमूना भी देखने को मिला। दरअसल, सरदूल की किडनी में खराबी की वजह से ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ी। यानि किसी को अपनी किडनी उन्हें डोनेट करनी पड़ेगी। दोस्तों, रिश्तेदारों की तरफ देखा। लेकिन सब ने चुपचाप दूरी बना ली। ऐसे मुश्किल वक्त पर करीबियों का ऐसा बर्ताव देखकर सरदूल तनाव में आ गए। चिंता होने लगी कि अब पता नहीं क्या होगा। अमर नूरी ने उन्हें हिम्मत दी। वादा किया कि जब तक मैं हूं, आपको कुछ नहीं होने दूंगी। और फिर अपनी बात साबित करके दिखाई। सरदूल का ब्लड ग्रुप ए पॉज़िटिव था। वहीं, अमर का ब्लड ग्रुप ओ पॉज़िटिव था। ओ पॉज़िटिव को यूनिवर्सल डोनर कहा जाता है। यानि कि वो ब्लड ग्रुप जो किसी को भी डोनेट कर सकता है। अमर को विश्वास था कि जहां दिल मिल सकते हैं, तो क्या किडनियां नहीं मिलेंगी। सुनने में शायद फ़िल्मी लगे। लेकिन उनका ये विश्वास सही साबित हुआ और सरदूल के लिए उन्होंने अपनी किडनी डोनेट की।
कहना गलत नहीं होगा कि सरदूल सिकंदर को संगीत विरासत में मिला। उनकी कई पुश्तें खुद को संगीत के प्रति समर्पित कर चुकी थीं। लेकिन सागर मस्ताना नहीं चाहते थे कि छोटा बेटा भी अपनी पूरी ज़िंदगी संगीत के नाम कर दे। कारण था उस समय में शास्त्रीय संगीत का सिकुड़ा हुआ स्कोप। आज के समय की तरह ना ही इतने संसाधन थे, और ना ही इतना पैसा। उधर, सरदूल का म्यूज़िक से सिर्फ प्यार था। उसकी ओर रुझान नहीं। चाहते थे कि बड़े होकर पायलट बनें। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। सरदूल के पिता बच्चों को संगीत सिखाते थे। सरदूल को इजाज़त नहीं थी कि वो भी साथ बैठकर सीख सकें। लेकिन मन में संगीत सीखने की इच्छा भी थी। फिर उसे तृप्त करने का जुगाड़ निकाला। जब पिता बच्चों को संगीत सिखा रहे होते, तो उस समय दीवार की आड़ लेकर खुद भी चुपचाप सुनते रहते। ये सिलसिला कई दिनों तक चला।

एक दिन पिता ने बच्चों को नई सरगम सिखाई। सब से उसे दोहराने को कहा। लेकिन एक भी बच्चा सही से नहीं दोहराया पाया। सब के जाने के बाद सरदूल उस सरगम को दोहराने की कोशिश करने लगे। तभी उनके पिता की नज़र पड़ी। सरदूल को लगा कि अब तो जमकर पिटाई होगी। पर ऐसा हुआ नहीं। पिता ने सरदूल से वही सरगम गाने को कहा। डरते-डरते सरदूल ने कोशिश की। इसके बाद पिता ने नन्हें सरदूल को गोद में उठा लिया। क्यूंकि सरदूल ने बिना किसी प्रैक्टिस के सही गाया था। पिता को बेटे का हुनर नज़र आ गया। जिसके बाद सरदूल को संगीत सीखने की इजाज़त दे दी।

संघर्ष का समय

एचएमवी उस दौर की बहुत बड़ी म्यूज़िक कंपनी थी। यानि जिस सिंगर को एचएमवी ने साइन कर लिया, उसके तो दिन फिर गए। सरदूल भी ऐसे ही सिंगर्स की लिस्ट में अपना नाम देखना चाहते थे। सरदूल सिकंदर के परिवार की आर्थिक स्थिति ज़्यादा मज़बूत नहीं थी एचएमवी का ऑफिस था दिल्ली में। जाने लायक किराये का जुगाड़ करना भी मुश्किल। थोड़ा बहुत पैसा दोस्तों से उधार ले लेते। फिर भी पूरा नहीं हो पाता। न्यूज़ पेपर वाली वैन दिल्ली तक जाती थी। सोचा कि क्यूं ना उसी से सफर किया जाए। बस के मुकाबले तो कम ही पैसे देने पड़ेंगे। लेकिन न्यूज़ पेपर वैन के साथ एक समस्या थी कि ये सुबह 4:30 बजे दिल्ली पहुंच जाती थी और एचएमवी का ऑफिस खुलता था 10 बजे के बाद। इस बीच सरदूल किसी पार्क में जाकर सो जाया करते। अक्सर गश्त पर निकली पुलिस पार्क में सोए लोगों को उठा देती। डंडे मारती। कहती कि रात को यहां सोते हो और दिन में चोरियां करते हो। पार्क में सोने से सरदूल सिकंदर को एक और नुकसान होता। कपड़े गंदे हो जाते और इन गंदे कपड़ों के साथ जब भी HMV के दफ्तर पहुंचते, तो वापस ही लौटा दिए जाते।

सफलता
सरदूल सिकंदर सिर्फ बेहतरीन गले के ही धनी नहीं थे। बल्कि, वे तुम्बी भी बड़ी अच्छी बजाते थे। अक्सर तुम्बी की रिकॉर्डिंग पर भी जाया करते थे। एक ऐसे ही मौके पर करतार रमला के स्टूडियो में रिकॉर्ड कर रहे थे। रिकॉर्डिंग खत्म कर बाहर निकले और कुछ ऐसे ही गुनगुनाने लगे। उनकी आवाज़ अंदर बैठे म्यूज़िशियन के कानों में पड़ी। जो उठकर बाहर आए। सरदूल सिकंदर से पूछा कि क्या अभी तुम गा रहे थे। सरदूल को लगा कि अंदर रिकॉर्डिंग चल रही थी और उनके गाने से उसमें भंग पड़ गया। म्यूज़िशियन उन्हें सीधा चरणजीत आहूजा के पास ले गए। सरदूल के बारे में उन्हें बताया। चरणजीत ने HMV के मैनेजर को बुलाया। कहा कि इस लड़के को मौका दीजिए। मैनेजर ने साफ इनकार कर दिया। कहा कि नए लड़के के साथ रिस्क नहीं ले सकते।

इसके बाद चरणजीत आहूजा ने खुद सरदूल का पहला अल्बम रिकॉर्ड करवाया जिसका नाम था ‘रोडवेज़ दी लारी’। अल्बम रिलीज़ होते ही लोगों की ज़बान पर इसके गाने चढ़ गए। अल्बम हिट साबित हुआ। इसके लिए सरदूल को 10 हज़ार रुपए मिले। अल्बम हिट होने के बावजूद लोग सरदूल सिकंदर को नहीं पहचानते थे। वजह थी उनकी आवाज़ में वेरिएशन। ज़्यादातर लोगों को लगता था कि ये गाने किसी जमे हुए सिंगर ने गाए हैं। किसी नए सिंगर ने नहीं। लोगों का ये भ्रम भी टूटा। जब सरदूल सिकंदर दूरदर्शन जालंधर के एक प्रोग्राम में परफॉर्म करने पहुंचे। लोग अब जान गए कि ये गाने किसके हैं। उसके बाद कभी सरदूल को पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी।

24 फ़रवरी, 2021 को सरदूल सिकंदर की मृत्यु हुई। वह मोहाली के फोर्टिस हॉस्पिटल में भर्ती थे। कोरोना विषाणु से पॉज़िटिव पाए जाने के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। उससे पहले किडनी ट्रांसप्लांट भी हुआ था। सरदूल सिकंदर को जानने वाले लोग यही कहते हैं कि वो एक ज़िंदादिल इंसान थे। हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे। शायद यही कारण था कि जनता के दिलों में ऐसी जगह बना पाए। अपने जाने के बाद ऐसा रिक्त स्थान छोड़ गए, जिसे भरना असंभव है।

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सरदूल सिकंदर के निधन पर गहरा दु:ख जताया। अमरिंदर सिंह ने ट्वीट करते हुए लिखा, "महान पंजाबी गायक सरदूल सिकंदर के निधन के बारे में जानकर बहुत दु:ख हुआ। हाल ही में उनकी कोरोना वायरस की जांच की गई थी और उनका इलाज चल रहा था। उनके परिवार और प्रशंसकों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना"।




नील नितिन मुकेश

#15jan 

नील नितिन मुकेश
नील नितिन मुकेश चंद माथुर
प्रसिद्ध नाम 
नील नितिन मुकेश

🎂जन्म 15 जनवरी, 1982
जन्म भूमि मुंबई, महाराष्ट्र

अभिभावक माता - निशि मुकेश माथुर
पिता- नितिन मुकेश माथुर

पति/पत्नी रुक्मिणी सहाय
संतान एक
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अभिनय
मुख्य फ़िल्में ‘जॉनी गद्दार’, ‘7 खून माफ’, ‘साहो’, 'आ देखे जरा', 'लफंगे परिंदे' और 'तेरा क्या होगा जॉनी' आदि।
शिक्षा कॉमर्स से स्नातक
विद्यालय ग्रीनलान हाईस्कूल, मुंबई
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी नील नितिन मुकेश ने अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत वर्ष 2007 में बतौर अभिनेता श्रीराम राघवन की एक्शन-थ्रिलर फिल्म 'जॉनी गद्दार' से की थी।

भारतीय अभिनेता हैं। वह मुख्यतः हिंदी फिल्मों में नजर आते हैं। एक अभिनेता होने के साथ-साथ वह लेखक और प्रोड्यूसर भी हैं। नील नितिन मुकेश के पिता नितिन मुकेश थे जो हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध गायक हैं। यही नहीं नील नितिन मुकेश अपने समय के ख्यातिप्राप्त गायक मुकेश के पोते हैं। इन्होंने ‘जॉनी गद्दार’, ‘7 खून माफ’, ‘साहो’ जैसी फिल्में की हैं। ‘बाईपास रोड’ नाम की एक फिल्म को नील नितिन मुकेश ने प्रोड्यूस किया था।वह बॉलीवुड के मशहूर गायक मुकेश के पोते हैं। उनके पिता का नाम नितिन मुकेश माथुर हैं, जो हिंदी सिनेमा में पार्श्वगायक हैं। उनकी माँ का नाम निशि मुकेश माथुर है।

नील नितिन मुकेश ने अपनी शुरुआती पढ़ाई ग्रीनलान हाईस्कूल मुंबई से पूर्ण की। वह कॉमर्स से ग्रेजुएट हैं। उनका पूरा परिवार संगीत से ताल्लुकात रखता है, उसके बाद भी उन्होंने एक्टिंग में अपना कॅरियर चुना। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि संगीत मेरा शौक है, लेकिन एक्टिंग मेरा पैशन है। एक अच्छा अभिनेता बनने के लिए नील ने नमित कपूर के एक्टिंग स्कूल से अभिनय में चार महीने प्रशिक्षण भी प्राप्त किया है। इसके अलावा उन्होंने बॉलीवुड के मंझे हुए अभिनेता अनुपम खेर से भी एक्टिंग के गुर सीखे हैं।

नील नितिन मुकेश ने अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत वर्ष 2007 में बतौर अभिनेता श्रीराम राघवन की एक्शन-थ्रिलर फिल्म 'जॉनी गद्दार' से की थी। इस फिल्म में उनके अभिनय को आलोचकों द्वारा काफी सराहा गया था। साथ ही वह इस फिल्म के फिल्मफेयर अवार्ड्स के लिए सर्वश्रेष्ठ नवोदित कलाकार के लिए नामंकित भी हुए थे। साल 2009 में वह फिल्म 'आ देखे जरा' में नजर आये। इस फिल्म में उनके अपोजिट बिपाशा बासु नजर आयीं थीं। फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर औसत व्यापार किया था। इस फिल्म के लिए नील को आलोचकों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली थी।

इसके बाद वह निर्देशक कबीर खान की फिल्म न्यूयॉर्क में नजर आये। इस फिल्म में उनके अलावा कैटरीना कैफ और जॉन अब्राहम भी दिखाई दिए थे। फिल्म की पृष्ठकथा आंतकवादी गतिविधियों पर आधारित थी। इस फिल्म में नील सहायक अभिनेता के तौर पर नजर आये थे, जिसे दर्शकों और आलोचकों द्वारा बेहद सराहा गया था। इस फिल्म के लिए नील को उनका दूसरा सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के तौर फिल्मफेयर अवार्ड्स में नामंकन मिला था। फिर मधुर भंडारकर निर्देशित फिल्म 'जेल' में नील नितिन मुकेश नजर आये। इस फिल्म में वह न्यूड नजर आये थे। जो काफी विवादित भी रहा था। हालांकि यह फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर बुरी तरह असफल साबित हुई थी, लेकिन नील को आलोचकों द्वारा उनकी बेहतरीन भूमिका के लिए काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली।
साल 2010 में नील नितिन मुकेश फिल्म 'लफंगे परिंदे' और 'तेरा क्या होगा जॉनी' में नजर आये थे। दोनों ही फ़िल्में बॉक्स-ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी थीं। साल 2011 तक उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन कोई भी फिल्म उन्हें हिंदी सिनेमा में कोई खास मुकाम हासिल नहीं करा सकी। साल 2015 में नील नितिन मुकेश सूरज बड़जात्या की फिल्म 'प्रेम रत्न धन पायो' में सलमान ख़ान के संग नजर आये। इस फिल्म में वह सौतेले भाई की भूमिका में थे।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...