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बुधवार, 19 जुलाई 2023

जुबली कुमार यानी राजिंद्र कुमार

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महान अभिनेता, निर्माता निर्देशक राजेंद्र कुमार की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म की तारीख और समय: 20 जुलाई 1929, सियालकोट, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 12 जुलाई 1999, मुम्बई
पत्नी: शुक्ला कुमार (विवा. ?–1999)
नातिन या पोतियां: साची कुमारसिया कुमार
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राजेंद्र कुमार एक फ़िल्म अभिनेता थे। राजेन्द्र कुमार 1960 और 1970 के दशक में फ़िल्मों में सक्रिय थे। राजेंद्र कुमार ने फ़िल्मों में अभिनय करने के अलावा कई फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया था। हिन्दी फ़िल्मों में अपने सफल अभिनय और बेमिसाल अदाकारी की वजह से राजेन्द्र कुमार ने जो स्थान बनाया है वहां तक पहुंचना हर अभिनेता का सपना होता है। राजेन्द्र
कुमार की हर फ़िल्म इतनी हिट होती थी कि वह कई सालों तक बेहतरीन बिजनेस किया करती थी और यही वजह थी कि लोग उन्हें ‘जुबली कुमार’ के नाम से पुकारते थे। अपने रोमांटिक व्यक्तित्व की उन्होंने सिनेमा जगत में ऐसी छटा बिखेरी की उनकी फ़िल्में एक यादगार बन गईं। फ़िल्म 'आरजू' हो या 'आई मिलन की बेला'हर फ़िल्म में राजेन्द्र कुमार का एक अलग ही स्वरूप दर्शकों ने देखा।

पश्चिम पंजाब के सियालकोट में 20 जुलाई , 1929 को जन्मे राजेन्द्र कुमार बचपन से ही अभिनेता बनने की चाह रखते थे। एक मध्यम वर्गीय परिवार से होने के बावजूद उन्होंने उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ा। मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने के लिए उन्होंने पिता द्वारा दी गई घड़ी को बेचा था पर मुंबई आकर अपनी किस्मत बदलने का हौसला उन्होंने किसी से नहीं लिया था।राजेन्द्र कुमार सुंदर होने के साथ साथ मानसिक रुप से भी बहुत ही दृढ़ अभिनेता थे। 21 साल की उम्र में ही उन्हें फ़िल्मों में काम करने का पहला मौका मिला। एक अभिनेता के तौर पर पहली बार उन्हें दिलीप कुमार अभिनीत फ़िल्म "जोगन" में एक छोटा-सा किरदार निभाने को मिला था। यहीं से वह लगातार सफलता प्राप्त करते गए। पहली बार फ़िल्म ‘जोगन’ में उन्होंने अभिनय किया और उसके बाद अपने हर रोल में वह खुद ब खुद फिट होते चले गए। इसके बाद ‘गूंज उठी शहनाई’ में पहली बार वह एक अभिनेता के तौर पर दिखे। वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब खान की फ़िल्म ‘ मदर इंडिया’ में राजेंद्र कुमार ने जो अभिनय किया उसे देख आज भी लोग प्रफुल्लित हो उठते हैं। मदर इंडिया के बाद राजेन्द्र कुमार ने‘धूल का फूल’, ‘मेरे महबूब’, ‘आई मिलन की बेला’, ’संगम’, ‘आरजू’ , ‘सूरज’ आदि जैसे सफल फ़िल्मों में काम किया।

राजेन्द्र कुमार बचपन से ही अभिनेता बनने का सपना देखा करते थे। अपने इसी सपने को साकार करने के लिये पचास के दशक में वह मुंबई आ गये। मुंबई पहुंचने पर उनकी मुलाकात सेठी नाम के एक व्यक्ति से हुयी जिन्होंने उनका परिचय सुनील दत्त से कराया। जो उन दिनों स्वयं अभिनेता बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस बीच राजेन्द्र कुमार की मुलाकात जाने माने गीतकार राजेन्द्र कृष्ण से हुई जिनकी मदद से वह 150 रपए मासिक वेतन पर निर्माता, निर्देशक एच.एस. रवेल के सहायक निर्देशक बन
गए। बतौर सहायक निर्देशक राजेन्द्र कुमार ने रवेल के साथ प्रेमनाथ और मधुबाला अभिनीत 'साकी' तथा प्रेमनाथ और सुरैया अभिनीत 'शोखियां' के लिए काम किया। वर्ष 1950 में प्रदर्शित फ़िल्म 'जोगन' बतौर अभिनेता राजेन्द्र कुमार के सिने कैरियर की पहली फ़िल्म साबित हुयी। इस फ़िल्म में उन्हें दिलीप कुमार के साथ अभिनय करने का मौका मिला। इसके बावजूद राजेन्द्र कुमार दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे। 

दर्शकों के मध्य राजेन्द्र कुमार का स्थान महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया (1957) से बना। फ़िल्म मदर इंडिया में राजेन्द्र कुमार ने नरगिस के बेटे का रोल किया था। मदर इंडिया के बाद राजेन्द्र कुमार ने धूल का फूल (1959), मेरे महबूब (1963), आई मिलन की बेला (1964), संगम (1964), आरजू (1965), सूरज (1966) आदि जैसे सफल फ़िल्मों में काम किया।

यद्यपि राजेन्द्र कुमार 1960 के दशक में भारतीय रजत पट पर छाये रहे,इनकी अनेक फ़िल्मों ने लगातार रजत
जयंती (सिल्वर जुबली) की इसलिए उन्हें जुबली कुमार कहा जाने लगा। (1970 का दशक उनके लिये प्रतिकूल रहा क्योंकि उस दशक में राजेन्द्र कुमार की गंवार
(1970), तांगेवाला (1972), ललकार (1972), गाँव हमारा शहर तुम्हारा (1972), आन बान (1972) आदि फ़िल्में बॉक्स आफिस पर पिट गईं और उनकी मांग घटने लग गई। सन् 1970 से 1977 तक का समय उनके लिये अत्यंत दुष्कर रहा। सन् 1978 में बनी फ़िल्म साजन बिना सुहागन, जिसमें उनके साथ नूतन ने काम किया था, ने फिर से एक बार राजेन्द्र कुमार का समय पलट दिया और वे फिर से दर्शकों के चहेते बन गये। राज कपूर ने अपनी फ़िल्में संगम (1964) और मेरा नाम जोकर (1970) में बतौर सहायक हीरो के उन्हें रोल दिया था। राज कपूर के साथ उन्होंने फ़िल्म दो जासूस (1975) में भी काम किया और उन्हें दर्शकों की सराहना मिली। उनके दौर की फ़िल्मों के शौकीन लोगों के लिए राजेन्द्र कुमार भी उतने ही बड़े ट्रैजेडी किंग थे, जितने बड़े ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार को माना जाता है।

भारतीय फ़िल्म इतिहास में सत्तर के दशक में राजेन्द्र कुमार सबसे सफल अभिनेता साबित हुए। गायक मोहम्मद रफ़ी राजेन्द्र कुमार की पर्दे पर आवाज़ बन गये थे। यह एक ऐसा वक्त था जब एक साथ उनकी छः से ज्यादा फ़िल्में सिल्वर जुबली सप्ताह की सफलता मना
रही थीं। यह एक ऐसी सफलता थी जिसने उन्हें हिंदी फ़िल्मों का 'जुबली कुमार' बना दिया। फ़िल्म 'गूंज उठी शहनाई' के बाद 1959 में यश चोपड़ा निर्देशित 'धूल का फूल' भी बहुत पसंद की गयी। यह यश चोपड़ा के निर्देशन पारी की शुरुआत थी। 1963 में 'मेरे महबूब' के बाद राज कपूर द्वारा निर्देशित और अभिनीत फ़िल्म 'संगम' में भी राजेन्द्र कुमार के अभिनय को पसंद किया गया। इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया। इसके बाद फ़िल्म 'आरजू', 'सूरज', 'गंवार' जैसी फ़िल्म भी उनके कैरियर में अहम् भूमिका निभाई। 

1970 के शुरूआती दशक में आई फ़िल्मों ने अच्छा व्यवसाय नहीं किया। यह वह समय था जब हिंदी फ़िल्मों में राजेश खन्ना का आगमन हुआ था। राजेन्द्र कुमार के कैरियर का यह कठिन समय था जिसमें 'गंवार' (1970), 'तांगेवाला' (1972), 'गांव हमारा शहर तुम्हारा' (1972), 'आन बान' (1972) आदि फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गयी। इस असफल और मुश्किल भरे वक्त को एक बार राजेन्द्र कुमार ने इंटरव्यू में स्वीकार किया था। यह मुश्किल भरा समय भी बीत गया था। 1978 में उनकी फ़िल्म 'साजन बिना सुहागन' ने बड़ी सफलता हासिल की। इस फ़िल्म में उनकी नायिका नूतन थी। यह फ़िल्म बहुत ही सफल रही। इसके बाद राजेन्द्र कुमार ने मुख्य किरदार के साथ ही चरित्र किरदार भी निभाने लगे। उन्होंने कुछ पंजाबी फ़िल्मों में भी काम किया,जिसमें 'तेरी मेरी एक ज़िंदगी' काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्म है। आखिरी बार दीपा मेहता की फ़िल्म 'अर्थ' (1998) में राजेंद्र कुमार नजर आए थे। 

राजेन्द्र कुमार और सुनील दत्त में काफ़ी गहरी दोस्ती थी। इसी दोस्ती को निभाते हुए और अपने बेटे कुमार गौरव के कैरियर को संवारने के लिए उन्होंने सन 1987 में फ़िल्म 'नाम' का निर्माण किया। फ़िल्म बहुत ही सफल रही लेकिन इस फ़िल्म में संजय दत्त के कैरियर को फायदा मिला। राजेन्द्र कुमार के बारे में एक बार सुनील दत्त जी ने इंटरव्यू में कहा कि आज तक राजेन्द्र कुमार को भले ही किसी फ़िल्म के लिए पुरस्कार नहीं मिला है लेकिन वह एक मानवतावादी व्यक्ति हैं। उन दिनों जब संजय दत्त को गिरफ्तार किया गया था और प्रतिदिन हमारे घर की तलाशी होती थी। तब राजेन्द्र कुमार हमारे घर पर आकर रहते थे और इस बात की सांत्वना देते थे कि यह सिर्फ जांच का हिस्सा है। उनको दुनिया की अच्छी समझदारी थी।अपने फ़िल्म स्टार्स के साथ उदारता से पेश आते थे।अपनी इसी विशेष दोस्ती को रिश्ते में बदलते हुए उन्होंने कुमार गौरव का विवाह सुनील दत्त की बेटी नम्रता के साथ किया था। 

बतौर निर्माता-निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म थी- लव स्टोरी, जो अपने समय की बड़ी हिट मानी जाती है, इसमें उन्होंने अपने सुपुत्र कुमार गौरव को लिया था। साथ ही उन्होंने फूल, जुर्रत, नाम,लवर्स आदि फ़िल्मों का निर्माण भी किया। उन्होंने मानद मजिस्ट्रेट के तौर पर भी अपनी सेवाएं दीं।

राजेंद्र कुमार ने (1950 और (1960 के दशक में कई कामयाब फ़िल्में दी। इनमें धूल का फूल, मेरे महबूब, संगम और आरजू प्रमुख रहीं। राजेंद्र कुमार को फ़िल्मफेयर पुरस्कार के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में तीन बार नामांकन मिला, हालांकि उन्हें कभी यह पुरस्कार नहीं मिल पाया क्योंकि वह दौर कई महान अभिनेताओं का था, जो कुछ मामलों में उनसे बीस नजर आए। 1969 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। हिन्दी फ़िल्म 'क़ानून' और गुजराती फ़िल्म 'मेंहदी रंग लाग्यो' के लिए उन्हें पं. जवाहरलाल नेहरू के कर-कमलों द्वारा
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

12 जुलाई 1999 को कैंसर के कारण मुम्बई में राजेंद्र कुमार का निधन हो गया। राजेंद्र कुमार बहुत ही अनुशासित और आरोग्य दिनचर्या के लिए जाने जाते हैं। उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि उन्होंने कभी भी जीवन में दवाइयां नहीं लीं।

बुधवार, 12 जुलाई 2023

प्राण

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महान खलनायक एवम् चरित्र अभिनेता प्राण की पुण्यतिथि पर हार्दिक 
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प्राण कृष्ण सिकंद हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने नायक, खलनायक और चरित्र अभिनेता थे। प्राण ऐसे अभिनेता
थे जिनके चेहरे पर हमेशा मेकअप रहता है और भावनाओं का तूफ़ान नज़र आता है जो अपने हर किरदार में जान डालते हुए यह अहसास करा जाता है कि उनके बिना यह किरदार बेकार हो जाता। उनकी संवाद अदायगी की शैली को आज भी लोग भूले नहीं हैं।

प्राण का जन्म 12 फ़रवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में बसे एक रईस परिवार में हुआ था। बचपन में उनका नाम 'प्राण कृष्ण सिकंद' था। उनका परिवार बेहद समृद्ध था। प्राण बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थे। बड़े होकर उनका फोटोग्राफर बनने का इरादा था। 1940 में जब मोहम्मद वली ने पहली बार पान की दुकान पर प्राण को देखा तो उन्हें फ़िल्मों में उतारने की सोची और एक पंजाबी फ़िल्म “यमला जट” बनाई, जो बेहद सफल रही। फिर क्या था, इसके बाद प्राण ने कभी मुड़कर देखा ही नहीं। 1947 तक वह 20 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके थे और एक हीरो की इमेज के साथ इंड्रस्ट्री में काम कर रहे थे।हालांकि लोग उन्हें विलेन के रुप में देखना ज़्यादा पसंद करते थे।

अभिनेता प्राण को दशकों तक बुरे आदमी (खलनायक) के तौर पर जाना जाता रहा और ऐसा हो भी क्यों ना, पर्दे पर उनकी विकरालता इतनी जीवंत थी कि लोग उसे ही उसकी वास्तविक छवि मानते रहे, लेकिन फ़िल्मी पर्दे से इतर प्राण असल ज़िंदगी में वे बेहद सरल, ईमानदार और दयालु व्यक्ति थे। समाज सेवा और सबसे अच्छा व्यवहार करना उनका गुण था। 

प्राण की शुरुआती फ़िल्में हों या बाद की फ़िल्में उन्होंने अपने आप को कभी दोहराया नहीं। उन्होंने अपने
हर किरदार के साथ पूरी ईमानदारी से न्याय किया। फिर चाहे भूमिका छोटी हो या बड़ी, उन्होंने समानता ही रखी। प्राण को सबसे बड़ी सफलता 1956 में 'हलाकू' फ़िल्म से मिली जिसमें उन्होंने डकैत हलाकू का सशक्त किरदार निभाया था। प्राण ने राज कपूर निर्मित-निर्देशित 'जिस देश में गंगा बहती है' में राका डाकू की भूमिका निभाई थी जिसमें उन्होंने केवल अपनी आँखों से ही क्रूरता ज़ाहिर कर दी थी। कभी ऐसा वक़्त भी था जब हर फ़िल्म में प्राण नज़र आते थे खलनायक के रूप में। उनके इस रूप को परिवर्तित किया था भारत कुमार यानी मनोज कुमार ने, जिन्होंने अपनी निर्मित-निर्देशित पहली फ़िल्म 'उपकार' में उन्हें मलंग बाबा का रोल दिया। जिसमें वे अपाहिज की भूमिका में थे, भूमिका कुछ छोटी ज़रूर थी लेकिन थी बहुत दमदार। इस फ़िल्म के लिए उनको पुरस्कृत भी किया गया था। उन पर फ़िल्माया गया कस्में वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में छाया हुआ है। भूले भटके जब कभी यह गीत बजता हुआ कानों को सुनाई देता है तो तुरन्त याद आते हैं प्राण। ऐसा ही कुछ अमिताभ बच्चन अभिनीत ज़ंजीर में भी हुआ था। नायक के पठान दोस्त
की भूमिका में उन्होंने अपने चेहरे के हाव भावों और संवाद अदायगी से जबरदस्त प्रभाव छो़डा था। इस फ़िल्म का गीत यारी है ईमान मेरा, यार मेरी ज़िन्दगी सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके नृत्य की वजह से याद किया जाता है

प्राण 1942 में बनी ‘ख़ानदान’ में नायक बन कर आए और नायिका थीं नूरजहाँ। 1947 में भारत आज़ाद हुआ और विभाजित भी। प्राण लाहौर से मुंबई आ गए। यहाँ क़रीब एक साल के संघर्ष के बाद उन्हें 'बॉम्बे टॉकीज' की
फ़िल्म ‘जिद्दी’ मिली। अभिनय का सफर फिर चलने लगा। पत्थर के सनम, तुम सा नहीं देखा, बड़ी बहन, मुनीम जी, गंवार, गोपी, हमजोली, दस नंबरी, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना, कर्ज, अंधा क़ानून , पाप की दुनिया, मत्युदाता क़रीब 350 से अधिक फ़िल्मों में प्राण साहब ने अपने अभिनय के अलग- अलग रंग बिखेरे। इसके अतिरिक्त प्राण कई सामाजिक संगठनों से जुड़े रहे और उनकी अपनी एक फुटबॉल टीम बॉम्बे डायनेमस फुटबॉल क्लब भी रही है।

हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है... यह संवाद प्राण ने ही अपने एक फ़िल्म में कहा था, जो आज उनके अभिनय जीवन के सार पर भी सटीक बैठ रहा है।जीवंत अभिनय तथा बेहतरीन संवाद अदायगी के बलबूते दर्शकों के दिलों में खलनायक का भयावह रुप उकेरने वाले प्राण की अदाकारी को भी शब्दों में नहीं ढ़ाला जा सकता। ऐसे में उन्हें लेकर जितने भी शब्दजाल बिने जाये वो कमतर ही होंगे। तभी उनका डॉयलाग 'हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है' का ज़िक्र है, जो दर्शाता है कि प्राण ने अपने संवादों को रुपहले पर्दे पर ही नहीं बल्कि जीवन में भी उतारा। प्राण को दादा साहब फाल्के पुरस्कार की घोषणा शायद इस वजह से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि यह पहली बार परदे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले एक अभिनेता को मिल रहा है। प्राण सिनेमा के परदे पर खलनायकी के पर्याय हैं। प्राण ने अपने कैरियर की शुरुआत पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' से 1940 में की थी। 1942 वाली हिंदी फ़िल्म 'खानदान' से उनकी छवि रोमांटिक हीरो की बनी। लाहौर से मुंबई आने के बाद 'जिद्दी' से उनके बॉलीवुड कैरियर की शुरुआत हुई। इसके बाद तो वह हिंदी फ़िल्मों के चहेते विलेन ही बन गए। प्राण ने हिंदी सिनेमा की कई पीढ़ियों के साथ अभिनय किया। दिलीप कुमार, देव आनंद और राजकपूर के साथ पचास के दशक में, साठ और सत्तर के दशक में शम्मी कपूर , राजेंद्र कुमार और धर्मेंद्र के साथ उनकी कई फ़िल्में यादगार रहीं। वह जो रोल करते, उसकी आत्मा में उतर जाते। लोग उन्हें विलेन और साधु, दोनों रूपों में सराहने लगे। 'पूजा के फूल' और'कश्मीर की कली' जैसी फ़िल्मों से प्राण ने अपना नाता कॉमेडी से भी जोड़ लिया।
अस्सी के दशक में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के साथ उनकी कई यादगार फ़िल्में आईं।उनकी खलनायकी के विविध रूप 'आजाद', 'मधुमती', देवदास , 'दिल दिया दर्द लिया', 'मुनीम जी' और 'जब प्यार किसी से होता है' में देखे जा सकते हैं। उनकी हिट फ़िल्मों की फेहरिस्त भी बड़ी लंबी है। अपने समय की लगभग सभी प्रमुख
अभिनेत्रियों के साथ उनकी फ़िल्में आईं। पंजाब , उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में शिक्षित प्राण किसी भी ज़बान और लहजे को अपना बना लेते थे। उनकी अदा और डायलॉग डिलीवरी रील रोल को रियल बना देती थी। उनका डायलॉग -तुमने ठीक सुना है बरखुरदार, चोरों के
ही उसूल होते हैं खूब चर्चित हुआ। सबसे बड़ी बात यह कि चार सौ से अधिक फ़िल्में करने वाले प्राण ने खुद को कभी दोहराया नहीं। 'पत्थर के सनम' हो या 'जिस देश में गंगा बहती है', 'मजबूर' हो या 'हाफ टिकट' या फिर 'धर्मा', प्राण ने हर फ़िल्म में अपनी मौजूदगी का पूरा अहसास कराया

प्राण के प्रसिद्ध संवाद (डायलॉग) 

(डायलॉग) फ़िल्म 1. इस इलाक़े में नए आए हो बरखुरदार, वरना यहां शेर खान को कौन नहीं जानता! ज़ंजीर 
2. राम ने हर युग में जन्म लिया लेकिन लक्ष्मण फिर पैदा नहीं हुआ उपकार 
3. ये पाप की नगरी है, यहां कंस और दुर्योधन का ठिकाना है उपकार 
4. ज़िंदगी में चढ़ते की पूजा मत करना, डूबते की भी सोचना उपकार 
5. ये फूलों के साथ साथ दिल कब से बेचना शुरू कर दिया है कश्मीर की कली
 6. एक डाकू की लड़की पुलिस वाले से शादी करेगी, गोली मारिए सरदार जिस देश में गंगा बहती है 
7. शेर और बकरी जिस घाट पर एक साथ पानी पीते हों, वो घाट, न हमने देखा है और न देखना चाहते हैं आन बान
 8. पहचाना इस इकन्नी को, यह वही इकन्नी है जिसे बरसों पहले उछालकर तुमने मेरा मज़ाक उड़ाया था। रॉबर्ट सेठ तुम्हारे ही सोने से तुम्हारे ही आदमियों को ख़रीद कर आज मैं तुम्हारी जगह पहुंच गया हूं और तुम मेरे क़दमों में। अमर अकबर एंथनी 
9. क्योंकि मैं रिवॉल्वर हमेशा ख़ाली रखता हूं मजबूर 
10. लेकिन मैं उस क़िस्म का जेलर नहीं हूं। मैं न तो छुट्टी पर जाऊंगा और न तबादले की दरख़्वास्त करूंगा। तुम्हारा वो रिकॉर्ड है, तो हमारा भी एक रिकॉर्ड है। हमारी जेल से संगीन से संगीन क़ैदी जो बाहर गया है उसने तुम्हारे उस दरबार में दुआ मांगी है तो यही दुआ मांगी है कि अगर दोबारा जेल जाए तो रघुवीर सिंह की जेल में न जाए कालिया 
11. समझते हो कि सब समझता हूं इससे बढ़कर इंसान की नासमझी और क्या हो सकती है क्रोधी
 12. शायद तू यह भूल गया कि इस ज़मीन पर फ़तह ख़ां अकेला पैदा नहीं हुआ है, उसके साथ उसकी बला की ज़िद भी पैदा हुई है। कहीं मेरी ज़िद किसी ज़िद पर आ गई तो अपनी बेटी के रास्ते में पड़े हुए बेशुमार कांटों को तो मैं अपने दामन में समेट लूंगा लेकिन तेरे रास्ते दहकते हुए अंगारों से भर दूंगा। सनम बेवफ़ा
 13. आवाज़ तो तेरी एक दिन मैं नीची करूंगा, शेर की तरह गरजने वाला बिल्ली की ज़बान बोलेगा। सनम बेवफ़ा

रोचक तथ्य

पहली फ़िल्म के मिले 50 रुपये प्राण जब मात्र 19 वर्ष के थे तो उन्होंने 'दलसुख पंचोली' के निर्देशन में बनी पंजाबी फ़िल्म ‘यमला जट’ मे हीरो की भूमिका अदा की थी। उन्हें यह फ़िल्म लेखक 'वली मुहम्मद वली' ने उस समय ऑफ़र की थी जब वह 1939 में लाहौर में एक पान की दुकान के बाहर खड़े हुए थे। उन्हें इस भूमिका के लिए 50 रुपये दिए गये

प्राण को शायरी व फ़ोटोग्राफ़ी से बहुत अधिक लगाव था। एक समय में उनका घर उनकी तस्वीरों से भरा हुआ था जो विभिन्न रूपों में खींची गई थीं। प्राण को कबीर , ग़ालिब व फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का लगभग पूरा कलाम याद था और वह सेट पर भी इनकी शायरी पढ़ते थे।ताश खेलना व स्पोर्टस भी उनको पसंद थे। वह और उनकी पत्नी मुंबई के 'क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया' में नियमित जाया करते थे। उन्होंने अनेक सेलीब्रिटी मैचों को स्वर्गीय पी. जयराज के साथ मिलकर आयोजित किया। वह मुंबई की फुटबॉल टीम 'डायनामो' के प्रायोजक भी थे।
सह-अभिनेत्रियाँ प्राण ने अपने ज़माने की लगभग सभी अभिनेत्रियों के साथ काम किया। 'खानदान' (1942) में 13 वर्षीय नूरजहां तो क़द में इतनी छोटी थीं कि उन्हें प्राण के साथ अभिनय करते समय ईटों पर खड़ा होना पड़ता था। वैजयंतीमाला (बहार, 1951) व हेलन
(हलाकू, 1956) ने अपनी पहली फ़िल्म प्राण के साथ ही की थीं। हिन्दी फ़िल्मों के पर्दे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले प्राण फ़िल्मोद्योग में भद्र व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। वह अपने में मस्त रहते थे और आज तक किसी हीरोइन के साथ उनका स्कैंडल नहीं हुआ। सेट पर वह लतीफ़े सुनाते,शायरी सुनाते, लेकिन जब दृश्य पूरा हो जाता तो वह अपने कमरे में जा कर अपने आप तक सीमित हो जाते।प्रभावी खलनायकी प्राण ने पर्दे पर अक्सर बुरे व्यक्ति की भूमिका की, इसलिए यह अंदाजा लगाना कठिन हो जाता है कि वास्तव में वह कितने अच्छे व्यक्ति हैं। उनकी खलनायकी इतनी प्रभावी थी कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया था। उनके तीनों बच्चों पिंकी, अरविंद व सुनील को बहुत शर्मिंदगी होती थी, जब दूसरे बच्चे प्राण को खलनायक कहते थे। उनकी बेटी पिंकी ने एक बार उनसे पूछा था कि वह फ़िल्मों में अच्छी भूमिकाएं क्यों नहीं करते हैं? इसलिए जब 1967 में उन्हें मनोज कुमार ने ‘उपकार’ ऑफ़र की तो उन्होंने उसे फ़ौरन स्वीकार कर लिया। यह हिन्दी सिनेमा में उनकी पहली सकारात्मक भूमिका वाली फ़िल्म थी। 

मुमताज़ की त्वचा बहुत कोमल थी और उस पर आसानी से निशान पड़ जाते थे। चूंकि प्राण के साथ उनकी फ़िल्मों में उन्हें अक्सर पर्दे पर संघर्ष करते हुए दिखाया जाता था तो मुमताज के बदन पर काले व नीले निशान पड़ जाते थे। दृश्य पूरा होने के बाद प्राण को बहुत शर्मिंदगी होती थी और वह मुमताज से माफ़ी मांगा करते थे। हास्य के लिए प्राण का नृत्य प्राण की एक कमज़ोरी यह रही कि वह नृत्य करना नहीं जानते थे। इसलिए जब फ़िल्म में हास्य की स्थिति उत्पन्न करनी होती तो प्राण से नृत्य कराया जाता जैसा कि ‘मुनीम जी’, ‘बल्फ मास्टर’ आदि। नृत्य न करने की वजह से ही उन्होंने 6-7 फ़िल्मों के बाद हीरो की भूमिका करना बंद कर दिया था। फिर भी पर्दे पर गाए उनके गीत बहुत मशहूर हुए जैसे ‘यारी
है ईमान मेरा’ ( ज़ंजीर 1973), ‘राज को राज ही रहने दो’ (धर्मा 1973) या ‘क़समे, वादे, प्यार, वफा सब’ (उपकार 1967)घर के बाहर प्रशंसकों की भीड़ प्राण ने 1950 के दशक में अपना बंगला बांद्रा के यूनियन पार्क में बनवाया। इस जगह को फ़िल्मी दुनिया के लोग मनहूस जगह समझते थे क्योंकि इसमें रहने वाले अनेक कलाकार जैसे कॉमेडियन गोप, निर्माता राम कमलानी व संगीतकार अनिल विश्वास को जबरदस्त प्रोफेशनल घाटा उठाना पड़ा था। लेकिन प्राण ने ऐसे किसी अंधविश्वास को मानने से इंकार कर दिया। उन्हें जगह पसंद आई और उन्होंने अपने बंगले का नाम अपनी बेटी के नाम पर ‘पिंकी’ रख दिया। पालीहिल पर वह पहला मशहूर घर था। प्राण के घर के आगे उनके प्रशंसकों की भीड़ लगी रहती थी। बच्चे भी वहां जमा हो जाते थे। प्राण को बच्चे बहुत पसंद थे और वह उन्हें अपने घर में आमंत्रित करते व उन्हें मिठाई, बिस्किट आदि खिलाते।

देश के विभाजन के समय प्राण सिकंद मुंबई आए और इतने आत्मविश्वास से भरे थे कि उन्होंने भव्य ताजमहल होटल में कमरा लिया। उन्हें लगा कि कुछ ही दिनों में काम मिलने के बाद अपना फ्लैट ख़रीदेंगे, परंतु उन्हें नए सिरे से संघर्ष करना पड़ा और लाहौर में सफल नायक रहे प्राण को मजबूर होकर ‘गृहस्थी’ (1948) में खलनायक की भूमिका करनी पड़ी, परंतु मीना कुमारी के साथ ‘हलाकू’ नामक फ़िल्म में एक बर्बर, सनकी और वहशी तानाशाह की भूमिका में उन्होंने ऐसा खौफ पैदा किया कि हर बड़ी फ़िल्म में उन्हें खलनायक की भूमिका मिलने लगी। ‘हलाकू’ में प्राण सिकंद ने यह सीखा कि उन्हें अपनी भूमिकाओं के लिए विशेष पोशाक, विग इत्यादि का उपयोग करना चाहिए। उनकी पोशाकें और विग उनके अभिनय का हिस्सा बन गए।प्राण ने लगभग 350 से ज्यादा फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन वह अपनी फ़िल्मों सहित बमुश्किल ही कोई फ़िल्म देखते थे। प्राण को ‘परिचय’ (1972) में अपनी भूमिका सबसे कठिन प्रतीत हुई, जिसमें उन्होंने एक ज़िद्दी, अनुशासित व्यक्ति की भूमिका अदा की थी। उनकी सबसे पसंदीदा फ़िल्म ‘विक्टोरिया नम्बर 203′ (1972) है जिसका निर्देशन ब्रिज ने किया था। शम्मी कपूर की लगभग सभी फ़िल्मों में प्राण ने खलनायक की भूमिका निभाई। पर्दे की इस दुश्मनी के बावजूद दोनों आपस में गहरे दोस्त थे। दोनों को ही मांसाहारी भोजन व शराब बहुत पसंद थी। प्राण के अन्य अच्छे दोस्तों में दिलीप कुमार व राज कपूर शामिल थे और यह तिकड़ी अक्सर उनके बंगले पर महफिलें जमाती थीं

मशहूर फ़िल्म अदाकार 'प्राण' का निधन हिंदी फ़िल्मों के मशहूर विलेन और चरित्र अभिनेताप्राण की शुक्रवार 12 जुलाई , 2013 को देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में मौत हो गई। वो 93 साल के थे। उनके बेटे सुनील ने बीबीसी संवाददाता मधू पाल को बताया कि वो लीलावती अस्पताल में भर्ती थे जहां उनकी मौत देर शाम हुई। समाचार एजेंसी पीटीआई ने प्राण की बेटी पिंकी के हवाले से कहा है, "उनकी मौत लंबी बीमारी के बाद हुई।" उन्हें इस साल दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया था लेकिन वो इस क़दर बीमार थे कि इसे ख़ुद
स्वीकार करने दिल्ली नहीं आ पाए थे। बाद में सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने उनके घर जाकर उन्हें यह पुरस्कार दिया। उनके निधन पर दुख जताते हुए बॉलीवुड ने उन्हें भारतीय सिनेमा का बड़ा स्तंभ बताया, जिनका कई सितारों का जीवन बनाने में अहम योगदान था। फ़िल्म इंडस्ट्री के पुराने और युवा अभिनेताओं ने प्राण के निधन पर अपनी संवेदना जताई। सुपरस्टार दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने बॉलीवुड के लीजेंड के साथ
जुड़ी अपनी यादें साझा कीं। प्राण के साथ कई फ़िल्मों में काम कर चुके अमिताभ बच्चन ने कहा कि उनके जैसे कद्दावर अभिनेता अब नहीं आते। उन्होंने कहा, 'वह एक बेहतरीन व्यक्ति, प्रशंसनीय सहयोगी, संपूर्ण पेशेवर, निभाये जाने वाले पात्रों को अपने में आत्मसाथ करने वाले, काम के बाद एक दिलचस्प साथी और एक विचारशील मनुष्य थे।' दिलीप साहब ने कहा, 'मैं कभी नहीं भूल सकता कि प्राण कैसे मेरे निकाह में पहुंचे थे। श्रीनगर के खराब मौसम से जूझते हुए, वह वहां शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने दिल्ली की फ्लाइट ली, वहां से फिर शाम में मुंबई पहुंचे, बस मेरे निकाह से ठीक पहले मुझे गले लगाने के लिए।'

मंगलवार, 11 जुलाई 2023

बिमल रॉय

*बिमल राय*

जन्म
🎂12 जुलाई 1909
सुआपुर , पूर्वी बंगाल और असम , ब्रिटिश भारत
(वर्तमान बांग्लादेश )
मृत
⚰️07 जनवरी 1966 (आयु 56 वर्ष)
बम्बई , महाराष्ट्र , भारत
व्यवसाय
निर्माता और निर्देशक
उल्लेखनीय कार्य
दो बीघा जमीन (1953)
परिणीता (1953)
बिराज बहू (1954)
देवदास (1955)
मधुमती (1958)
याहुदी (1958)
सुजाता (1959)
परख (1960)
बंदिनी (1963)
जीवनसाथी
मनोबीना रॉय
बच्चे
रिंकी भट्टाचार्य समेत 4
पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए 4 फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए 7 फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
बिमल रॉय (बंगाली: ???? ????; 12 जुलाई 1909 - 8 जनवरी 1966) एक बंगाली भारतीय फिल्म निर्देशक थे।
वह अपनी यथार्थवादी और समाजवादी फिल्मों जैसे दो बीघा जमीन, परिणीता, बिराज बहू, मधुमती, सुजाता, परख और बंदिनी के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं, जो उन्हें हिंदी सिनेमा का एक महत्वपूर्ण निर्देशक बनाती है।
इतालवी नव-यथार्थवादी सिनेमा से प्रेरित होकर, उन्होंने विटोरियो डी सिका की साइकिल थीव्स (1948) देखने के बाद दो बीघा जमीन बनाई।
उनका काम विशेष रूप से उनके मिस एन सीन के लिए जाना जाता है जिसका उपयोग उन्होंने यथार्थवाद को चित्रित करने के लिए किया था।
उन्होंने अपने पूरे करियर में कई पुरस्कार जीते, जिनमें ग्यारह फिल्मफेयर पुरस्कार, दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और कान्स फिल्म महोत्सव का अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार शामिल हैं।
मधुमती ने 1958 में 9 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते, जो 37 वर्षों तक एक रिकॉर्ड था।
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बिमल रॉय का जन्म 12 जुलाई 1909 को सुआपुर, ढाका में एक बंगाली बैद्य परिवार में हुआ था , जो उस समय ब्रिटिश भारत के पूर्वी बंगाल और असम प्रांत का हिस्सा था और अब बांग्लादेश का हिस्सा है । उन्होंने बांग्ला और हिंदी में कई फिल्मों का निर्माण किया ।

बिमल रॉय आमतौर पर संगीत निर्देशकों सलिल चौधरी और एसडी बर्मन के बीच काम करते थे । उनकी फिल्मों में खूबसूरत और यादगार गाने होते थे, जो उस समय के सभी शीर्ष पार्श्व गायकों द्वारा प्रस्तुत किए जाते थे। रॉय की फ़िल्मों के कुछ उल्लेखनीय गीतों में शामिल हैं:

सुजाता (1959) का गाना "जलते हैं जिसके लिए" , तलत महमूद द्वारा गाया गया
परिणीता (1953) का "चली राधे रानी" , मन्ना डे द्वारा गाया गया
दो बीघा ज़मीन (1953) का "आ री आ निंदिया" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर का गाया
देवदास (1955) का "अब आगे तेरी मर्जी" , एसडी बर्मन का संगीत, लता मंगेशकर का गाया
देवदास (1955) का "आन मिलो आन मिलो श्याम सबेरे" , संगीत एसडी बर्मन का, मन्ना डे और गीता दत्त का गाया हुआ गीत
मधुमती (1958) का "दिल तड़प तड़प के कह रहा" , सलिल चौधरी का संगीत, मुकेश और लता मंगेशकर का गाया हुआ गीत
मधुमती (1958) का "सुहाना सफर और ये मौसम हसीन" , सलिल चौधरी का संगीत, मुकेश का गाया
मधुमती (1958) का "आजा रे परदेसी" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर का गाया
मधुमती (1958) का "घड़ी घड़ी मोरा दिल धड़के" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर द्वारा गाया गया
मधुमती (1958) का "जुल्मी संग आंख लड़ी" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर का गाया
परख (1960) का "ओ सजना बरखा बहार" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर द्वारा गाया गया
बंदिनी (1963) का "मोरा गोरा अंग लाई ले" , एसडी बर्मन का संगीत, लता मंगेशकर द्वारा गाया गया

सोमवार, 12 जून 2023

दारासिंह


*दारासिंह*
*जन्म की तारीख और समय: 19 नवंबर 1928, अमृतसर*
*मृत्यु की जगह और तारीख: 12 जुलाई 2012, मुम्बई*
*बच्चे: विन्दु दारा सिंह, अमरिक सिंह रंधावा, परदुमन रंधावा, लवलीन सिंह,*
*पत्नी: सुरजीत कौर रंधावा (विवा. 1961–2012),* *बचनो कौर (विवा. 1942–1952)*
उन्नीस सौ साठ के दशक में पूरे भारत में उनकी फ्री स्टाइल कुश्तियों का बोलबाला रहा। बाद में उन्होंने अपने समय की मशहूर अदाकारा मुमताज के साथ हिन्दी की स्टंट फ़िल्मों में प्रवेश किया। दारा सिंह ने कई फ़िल्मों में अभिनय के अतिरिक्त निर्देशन व लेखन भी किया। उन्हें टी० वी० धारावाहिक रामायण में हनुमान के अभिनय से अपार लोकप्रियता मिली। उन्होंने अपनी आत्मकथा मूलत: पंजाबी में लिखी थी जो 1993 में हिन्दी में भी प्रकाशित हुई। उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने राज्य सभा का सदस्य मनोनीत किया। वे अगस्त 2003 से अगस्त 2009 तक पूरे छ: वर्ष राज्य सभा के सांसद रहे।

7 जुलाई 2012 को दिल का दौरा पड़ने के बाद उन्हें कोकिलाबेन धीरूभाई अम्बानी अस्पताल मुम्बई में भर्ती कराया गया किन्तु पाँच दिनों तक कोई लाभ न होता देख उन्हें उनके मुम्बई स्थित निवास पर वापस ले आया गया जहाँ उन्होंने 12 जुलाई 2012 को सुबह साढ़े सात बजे दम तोड़ दिया।

1947 में दारा सिंह सिंगापुर आ गये। वहाँ रहते हुए उन्होंने भारतीय स्टाइल की कुश्ती में मलेशियाई चैम्पियन तरलोक सिंह को पराजित कर कुआला लंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप जीती। उसके बाद उनका विजय रथ अन्य देशों की चल पड़ा और एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी धाक जमाकर वे 1952 में अपने वतन भारत लौट आये। भारत आकर 1954 में वे भारतीय कुश्ती चैम्पियन बने।
इसके बाद उन्होंने कामनवेल्थ देशों का दौरा किया और ओरिएंटल चैम्पियन किंग काँग को भी परास्त कर दिया। किंग कांग के बारे मे ये भी कहा जाता है की दारा सिंह ने किंगकांग के मुछ के बाल उखाड़ दिए थे। बाद में उन्हें कनाडा और न्यूजीलैण्ड के पहलवानों से खुली चुनौती मिली। अन्ततः उन्होंने.कलकत्ता में हुई कामनवेल्थ कुश्ती चैम्पियनशिप में कनाडा के चैम्पियन जार्ज गारडियान्का एवं न्यूजीलैण्ड के जान डिसिल्वा को धूल चटाकर यह चैम्पियनशिप भी अपने नाम कर ली। यह 1959.की घटना है।

दारा सिंह ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहाँ फ्रीस्टाइल कुश्तियाँ लड़ी जाती थीं। आखिरकार अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को 29 मई 1968 को पराजित कर वे फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गये। उन्होंने पचपन वर्ष तक पहलवानी की और पाँच सौ मुकाबलों में किसी एक में भी पराजय का मुँह नहीं देखा। 1983 में उन्होंने अपने जीवन का अन्तिम मुकाबला जीता और भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के हाथों अपराजेय पहलवान का खिताब अपने पास बरकरार रखते हुए कुश्ती से सम्मानपूर्वक संन्यास ले लिया।

।☑️यूँ तो दारा सिंह ने पचपन वर्ष के फ़िल्मी कैरियर में कुल मिलाकर एक सौ दस से अधिक फ़िल्मों में बतौर अभिनेता, लेखक एवं निर्देशक के रूप में काम किया किन्तु उनकी कुछ उल्लेखनीय फ़िल्मों का विवरण इस प्रकार है:

↔️2012 अता पता लापता अतिथि
2007 जब वी मैट दादा जी
2006 दिल अपना पंजाबी हरदम सिंह
2006 क्या होगा निम्मो का अमरदीप सहगल (दादाजी)
2004 पारिवारिक व्यवसाय 
2003 सीमा हिन्दुस्तान की जालिम सिंह
2003 कल हो न हो चढा चाचा
2002 शरारत श्री गुजराल
2001 फ़र्ज़ तायाजी
2000 दुल्हन हम ले जायेंगे 
1999 दुर नही ननकाना बख्तावर सिंह
1999 ज़ुल्मी बाबा ठाकुर
1999 दिल्लगी वीर सिंह
1998 ऑटो चालक 
1998 गुरू गोबिंद सिंह 
1997 लव कुश हनुमान
1995 राम शस्त्र पुलिस कमिश्नर
1994 करन 
1993 अनमोल दादा शमसेर
1993 बैचेन 
1992 प्रेम दीवाने लोहा लिंह
1991 मौत की सजा प्यारा सिंह
1991 धर्म संकट दारा
1991 अज़ूबा महाराजा कर्ण सिंह
1990 प्रतिग्या दिलावर सिंह
1990 नाकाबंदी धरम सिंह
1989 घराना विजय सिंह पहलवान
1988 पाँच फौलादी उस्ताद जी
1988 महावीरा दिलेर सिंह
1986 कृष्णा-कृष्णा बलराम
1986 कर्मा धर्म
1985 मर्द राजा आज़ाद सिंह
1981 खेल मुकद्दर का 
1978 भक्ति में शक्ति दयानु
1978 नालायक पहलवान
1976 जय बजरंग बली हनुमानजी
1975 वारण्ट प्यारा सिंह
1975 धरम करम भीम सिंह
1974 दुख भंजन तेरा नाम डाकू दौले सिंह
1974 कुँवारा बाप 
1973 मेरा दोस्त मेरा धर्म 
1970 मेरा नाम जोकर रिंग मास्टर
1970 आनन्द पहलवान
1965 सिकन्दर-ए-आज़म सिकन्दर
1965 लुटेरा 
1962 किंग कौंग जिंगु/किंग कॉग
1955 पहली झलक पहलवान दारा सिंह
1952 संगदिल

दारा सिंह  की रियल स्टोरी और स्टूडियो


दारा सिंह 6'2'' की लंबाई में लहराती मांसपेशियों के साथ खड़ा है, यह पहलवान कई वर्षों से सिनेमा का हिस्सा रहा है और रामायण में हनुमान के चित्रण के लिए जाना जाता है। दारा सिंह पर मूल बातें। दारा सिंह रंधावा का जन्म 19 नवंबर 1928 को हुआ था। अमृतसर, पंजाब, भारत। उन्हें पहलवानी नामक एक प्रकार की कुश्ती में प्रशिक्षित किया गया था और उन्होंने लू थेज़ और स्टैनिस्लास ज़बिसको जैसे पहलवानों को लिया था। दारा सिंह की मूवी। दारा सिंह ने रामायण के टेलीविज़न संस्करण में अनुमन की भूमिका निभाई। उन्होंने संगदिल (1952), शेर दिल (1965), तूफान (1969), दुल्हन हम ले जाएंगे (2000) और जब वी मेट जैसी कई फिल्मों में काम किया।

पिता का नाम :श्री सूरत सिंह
मां का नाम :शरीमती बलवंत कौर
जन्म की तारीख :19 - 11 - 1928
जन्म स्थान :ग्राम धरमूचक, जिला। अमृतसर - पंजाब)
वैवाहिक स्थिति :11 मई 1961 को शादी की
जीवनसाथी का नाम :श्रीमती सुरजीत कौर रंधावा
बच्चों की संख्या :तीन बेटियां और दो बेटे
पेशा :कृषि, कुश्ती, सिने कलाकार (निर्माता और निर्देशक)
संभाले गए पद :
  • अगस्त 2003 राज्य सभा के लिए मनोनीत सितंबर 2003 फरवरी 2004 सदस्य
  • मानव संसाधन विकास समिति फरवरी 2004 - 2006 सदस्य
  • अगस्त 2004 के बाद से युवा मामलों और खेल मंत्रालय के लिए सलाहकार समिति सदस्य
  • सूचना प्रौद्योगिकी समिति 2006 के बाद से सदस्य
  • सूचना और प्रसारण मंत्रालय के लिए सलाहकार समिति
प्रकाशित पुस्तकें :मेरी आत्मकथा (पंजाबी), 1989
देखे गए देश:चीन को छोड़कर पूरी दुनिया में कुश्ती टूर्नामेंट के सिलसिले में
अन्य सूचना :अध्यक्ष
  • 1997 से अखिल भारतीय जाट समाज
  • 1987 से बॉम्बे जाट समाज
  • 2005 से सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन

सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां, साहित्यिक, कलात्मक और वैज्ञानिक उपलब्धियां और अन्य विशेष रुचियों ने
दस अन्य पंजाबी और हिंदी फिल्मों के साथ एक हिंदी फिल्म मेरा देश मेरा धरम और एक पंजाबी फिल्म सवा लाख से एक लड़ाई (ऐतिहासिक) लिखी, निर्देशित और निर्मित की है।
  • 1953 में पेशेवर भारतीय कुश्ती चैंपियनशिप जीती
  • 1959 में कॉमनवेल्थ रेसलिंग चैंपियनशिप में कनाडा के चैम्पियन जार्ज गोडियांको को हराकर
  • 1968 में अमेरिका के लू थेजे को हराकर वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप
  • भारत सरकार द्वारा फिल्म जग्गा के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जो स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा प्रस्तुत किया गया था
↔️दारा फिल्म स्टूडियो की स्थापना 1978 में श्री दारा सिंह रंधावा (विश्व प्रसिद्ध पहलवान और फिल्म अभिनेता) द्वारा की गई थी। स्टूडियो 1980 से फिल्म स्टूडियो के रूप में चालू है। दारा स्टूडियो परिसर के भीतर हर सुविधा के साथ एक स्व-निहित छोटा शहर है।

चंडीगढ़-अमृतसर राजमार्ग की शुरुआत में स्थित, दारा स्टूडियो पंजाब के मोहाली में एक मील का पत्थर है। आसान पहुँच के साथ एक प्रमुख स्थान पर 5 एकड़ से अधिक भूमि में फैला हुआ; यह चंडीगढ़ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से सिर्फ 17 किमी दूर है, चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन से केवल 16 किमी और मोहाली रेलवे स्टेशन से 10.4 किमी दूर है।

स्टूडियो 1980 से शूटिंग के लिए काम कर रहा है और उत्तरी भारत में पहला फिल्म स्टूडियो है । फिल्म की शूटिंग के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं परिसर में उपलब्ध हैं।

स्टूडियो फीचर फिल्मों से लेकर संगीत वीडियो तक सब कुछ शूट करने के लिए सभी आधुनिक सुविधाओं से लैस है। हमारी सुविधाओं में शामिल हैं:

  • एक विशाल हॉल – 110 फीट x 65 फीट x 40 फीट (ऊंचाई)।
  • बाहरी सेटों को खड़ा करने के लिए पर्याप्त जगह के साथ बड़ा मैदान
  • ढाबा, पुलिस स्टेशन, कोर्ट रूम और ऑफिस के लिए रेडीमेड सेट।
  • बाहरी शूटिंग के लिए परिसर के भीतर एक आम का बाग
  • फोटो शूट के लिए पूरी तरह सुसज्जित क्रोमा कमरा
  • संलग्न बाथरूम के साथ कमरे, पूरी तरह से सुसज्जित विश्राम कक्ष तैयार है।

 दारा स्टूडियो

फेज 6, एनएच 21
वेरका मिल्क प्लांट के पास
एसएएस नगर (मोहाली)
पंजाब 160055

दारा फिल्म स्टूडियो की स्थापना 1978 में श्री दारा सिंह रंधावा (विश्व प्रसिद्ध पहलवान और फिल्म अभिनेता) द्वारा की गई थी। स्टूडियो 1980 से फिल्म स्टूडियो के रूप में चालू है। दारा स्टूडियो परिसर के भीतर हर सुविधा के साथ एक स्व-निहित छोटा शहर है।

चंडीगढ़-अमृतसर राजमार्ग की शुरुआत में स्थित, दारा स्टूडियो पंजाब के मोहाली में एक मील का पत्थर है। आसान पहुँच के साथ एक प्रमुख स्थान पर 5 एकड़ से अधिक भूमि में फैला हुआ; यह चंडीगढ़ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से सिर्फ 17 किलोमीटर दूर है, चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन से केवल 16 किलोमीटर और मोहाली रेलवे स्टेशन से 10.4 किलोमीटर दूर है।

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भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...