19 अगस्त लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
19 अगस्त लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 18 फ़रवरी 2024

ख्याम

#18feb
#19aug 
"खय्याम"
(मोहम्मद ज़हूर)

🎂जन्म की तारीख और समय: 18 फ़रवरी 1927, 
राहों, नवांशहर जिला, पंजाब
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 19 अगस्त 2019, सुजय हॉस्पिटल, मुम्बई

पत्नी: जगजीत कौर (विवा. 1954–2019)
मोहम्मद ज़हूर "खय्याम" हाशमी, जिन्हें "खय्याम" नाम से जाना जाता था, भारतीय फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार थे। अविभाजित पंजाब के राहों नगर में जन्मे खय्याम छोटी उम्र में ही घर से भागकर दिल्ली चले आये, जहाँ उन्होंने पण्डित अमरनाथ से संगीत की दीक्षा ली।
1927 में जन्में ख़य्याम 10 साल की उम्र में ही घर छोड़कर दिल्ली आ गए थे.अभिनेता बनने का सपना उन्हें दिल्ली ले आया था. लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था. दिल्ली में 5 साल रहते हुए उन्होंने संगीत सीखा और अपनी किस्मत आजमाने के लिए बम्बई (आज के मुंबई) चले गए. खय्याम ने बताया कि वो कैसे बचपन में छिप–छिपाकर फ़िल्में देखा करते थे जिसकी वजह से उनके परिवार वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया था.

खय्याम अपने करियर की शुरुआत अभिनेता के तौर पर करना चाहते थे पर धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी फ़िल्मी संगीत में बढ़ती गई और वह संगीत के मुरीद हो गए.

उन्होंने पहली बार फ़िल्म 'हीर रांझा' में संगीत दिया लेकिन मोहम्मद रफ़ी के गीत 'अकेले में वह घबराते तो होंगे' से उन्हें पहचान मिली.

फ़िल्म 'शोला और शबनम' ने उन्हें संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया.

खय्याम ने बताया कि 'पाकीज़ा' की जबर्दस्त कामयाबी के बाद 'उमराव जान' का संगीत बनाते समय उन्हें बहुत डर लग रहा था.

उन्होंने कहा, "पाकीज़ा और उमराव जान की पृष्ठभूमि एक जैसी थी. 'पाकीज़ा' कमाल अमरोही साहब ने बनाई थी जिसमें मीना कुमारी, अशोक कुमार, राज कुमार थे. इसका संगीत गुलाम मोहम्मद ने दिया था और यह बड़ी हिट फ़िल्म थी. ऐसे में 'उमराव जान' का संगीत बनाते समय मैं बहुत डरा हुआ था और वो मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती थी."

खय्याम ने आगे कहा, "लोग 'पाकीज़ा' में सब कुछ देख सुन चुके थे. ऐसे में उमराव जान के संगीत को खास बनाने के लिए मैंने इतिहास पढ़ना शुरू किया."

आखिरकार खय्याम की मेहनत रंग लाई और 1982 में रिलीज हुई मुज़फ़्फ़र अली की 'उमराव जान' ने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए.

ख़य्याम कहते हैं, "रेखा ने मेरे संगीत में जान दाल दी. उनके अभिनय को देखकर लगता है कि रेखा पिछले जन्म में उमराव जान ही थी."
खय्याम ने 04 दशकों तक बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए संगीत रचना की। वर्ष 1982 में आयी फ़िल्म उमराव जान के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। इसी फ़िल्म के लिए, और 1977की कभी कभी लिए उन्होंने दो बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी जीता। वर्ष 2007में खय्याम को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2010 में फ़िल्मफ़ेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार और 2018 में हृदयनाथ मंगेशकर पुरस्कार प्राप्त हुआ। कला क्षेत्र में उनके योगदान के लिए खय्याम को वर्ष 2011 में भारत सरकार द्वारा पदम् भूषण पुरस्कार प्रदान किया गया था।
खय्याम ने जगजीत कौर से 1954 में भारतीय फिल्म उद्योग में पहली अंतर-सांप्रदायिक शादियों में से एक से शादी की।उनका एक बेटा था, प्रदीप, जिसकी 2012 में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई। अपने बेटे की मदद करने की प्रकृति से प्रेरित होकर, उन्होंने कलाकारों और तकनीशियनों की ज़रूरत में मदद करने के लिए "खय्याम जगजीत कौर चैरिटेबल ट्रस्ट" ट्रस्ट शुरू किया।

अपने अंतिम दिनों में, खय्याम विभिन्न आयु संबंधी बीमारियों से पीड़ित थे। 28 जुलाई 2019 को खय्याम को फेफड़ों में संक्रमण के कारण जुहू, मुंबई के सुजय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 19 अगस्त 2019 को 92 वर्ष की आयु में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया।अगले दिन पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

पुरस्कार

1977- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : कभी कभी
1982- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : उमराव जान
2007- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2011- पद्म भूषण

नामांकन

1980- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : नूरी
1981- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : थोडी़ सी बवफाई
1982- फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : बाजा़र
1984 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार : रज़िया सुल्तान

गुरुवार, 18 जनवरी 2024

मास्टर विनायक

#19aug
#19jan 
मास्टर विनायक
🎂 19 जनवरी 1906, कोल्हापुर
⚰️ 19 अगस्त 1947, मुम्बई
भाई: बाबूराव पेंधारकर, भालजी पेंधारकर, वासुदेव कर्नाटकी
बच्चे: नन्दा, जयप्रकाश कर्नाटकी
पत्नी: मीनाक्सी
पोता या नाती: स्वास्तिक जे कर्नाटकी

मास्टर विनायक का जन्म कोल्हापुर , महाराष्ट्र , भारत में हुआ था । उन्होंने सुशीला से विवाह किया। इस जोड़े के बच्चे दिवंगत अभिनेत्री नंदा और फिल्म निर्माता और निर्देशक, जयप्रकाश कर्नाटकी हैं, जिन्होंने अभिनेत्री जयश्री टी से शादी की है।

मास्टर विनायक का भारतीय फिल्म उद्योग की कई हस्तियों से संबंध था। उनके भाई वासुदेव कर्नाटकी एक छायाकार बन गए , जबकि प्रसिद्ध फिल्मी हस्तियां बाबूराव पेंढारकर (1896-1967) और भालजी पेंढारकर (1897-1994) उनके सौतेले भाई थे। वह महान फिल्म निर्देशक वी. शांताराम के चचेरे भाई भी थे ।मास्टर विनायक मंगेशकर परिवार के अच्छे दोस्त थे और उन्होंने अपनी फिल्म पहिली मंगलागौर से लता मंगेशकर को फिल्म उद्योग में पेश किया था 

उन्होंने 1936 में हन्स पिक्चर की सह-स्थापना की। उनके काम के बीच, उन्हें 1938 की मराठी फिल्म ब्रह्मचारी के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है । उस समय दर्शकों द्वारा मुख्य महिला ( मीनाक्षी शिरोडकर द्वारा अभिनीत ) के स्नान सूट में होने को विवादास्पद माना गया था।

विनायक की 1947 में मुंबई में मृत्यु हो गई । उनके परिवार में उनकी बेटी दिवंगत अभिनेत्री नंदा, उनके पोते स्वास्तिक कर्नाटकी और उनके परपोते करण गुरबक्सानी हैं, जो दोनों मुंबई में निदेशक हैं।
📽️
डॉ. कोटनिस की अमर कहानी (1946)
माझे बाल (1943)
अमृत ​​(1941)
संगम (1941)
अर्धांगी (1940)
घर की रानी (1940)
लपांडव (1940)
ब्रांडी की बोतल (1939)
ब्रह्मचारी (1938) (मराठी और हिंदी) (पुराना)
ज्वाला (1938)
धर्मवीर (1937)
छाया (1936)
भीखरन (1935)
निगाह-ए-नफ़रत (1935)
विलासी ईश्वर (1935)
आकाशवाणी (1934)
सैरंध्री (1933)
सिंहगढ़ (1933)
अग्निकंकन: ब्रांडेड शपथ (1932)
अयोध्याचे राजा (1932)
माया मचिन्द्रा (1932)
📽️निदेशक के रूप में📽️

मंदिर (1948)
जीवन यात्रा (1946)
सुभद्रा (1946)
बड़ी माँ (1945)
माझे बाल (1943)
सरकारी पाहुने (1942)
अमृत ​​(1941)
अर्धांगी (1940)
घर की रानी (1940)
लग्न पहावे करुण (1940)
ब्रैंडिची बटली (1939)
ब्रांडी की बोतल (1939)
देवता (1939)
ब्रह्मचारी (1938)
ज्वाला (1938)
धर्मवीर (1937)
छाया (1936)
निगाह-ए-नफ़रत (1935)
विलासी ईश्वर (1935)

रविवार, 20 अगस्त 2023

जां निसार

🎂18 फ़रवरी 1914
⚰️19 अगस्त 1976
••••••••••••••••••••••
जां निसार 
कहा जाता है दीपक बुझने से पहले  तेज़  रोशनी बिखरता है.ऐसा ही कुछ मशहूर शायर जां निसार अख़्तर के साथ भी हुआ. बतौर गीतकार उनकी सबसे अंतिम फिल्म 'रज़िया सुल्तान' में उनकी शायरी चरम पर थी.कमाल अमरोही की इस फिल्म 'रज़िया सुल्तान' का लाजवाब संगीत दिया था ख़य्याम ने.उन्होंने इसमें दो जबरदस्त शायरों निदा फ़ाज़ली और जां निसार अख़्तर से गीत लिखवाए. अख़्तर साहब ने जो गीत लिखा था उसको क़ब्बन मिर्ज़ा ने अपनी अनूठी आवाज़ में गाकर हमेशा के लिए अमर कर दिया.
"आई ज़ंजीर की झनकार ख़ुदा ख़ैर करे,
दिल हुआ किसका ग़िरफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे।
इसी  फ़िल्म का एक और गीत बेहद मशहूर हुआ था जो जां निसार अख़्तर का ही लिखा हुआ था. इसे लता मंगेशकर ने अपनी मिठी आवाज में लाजवाब ढंग से गाया है.. "ऐ दिल-ए-नादान…"

18 फरवरी 1914 को  जन्मे जां निसार को ऊर्दू शायरी विरासत में मिली थी. इनके परदादा ’फ़ज़्ले हक़ खैराबादी’ ने मिर्ज़ा गालिब के कहने पर उनके दीवान का संपादन किया था. बाद में 1857 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ ज़िहाद का फ़तवा ज़ारी करने के कारण उन्हें ’कालापानी’ की सजा हुई थी. जाँ निसार अख्तर के पिता ’मुज़्तर  खैराबादी’ भी मशहूर शायर थे.

जाँ निसार अख़्तर ने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एम.ए. गोल्ड मैडल के साथ पास किया था. बंटवारे से पहले ग्वालियर के 'विक्टोरिया कॉलेज' में उन्हें उर्दू पढ़ाने का काम मिला पर दंगों की वजह से वे भोपाल चले आये. सन् 1943 में जाँ निसार की शादी मशहूर शायर ’मज़ाज लखनवी’ की बहन ’साफ़िया सिराज़ुल हक़’ से हुई. उन्हीं से आज के दौर के लोकप्रिय संवाद लेखक और गीतकार जावेद अख़्तरका जन्म हुआ था.भोपाल के हमीदिया कालेज में जांनिसार और साफ़िया, दोनो अध्यापन करने लगे.ये उनके संघर्ष के दिन थे. ये नौकरी रास नहीं आई और 1949 में जांनिसार बंबई चले गए. बीवी साफ़िया अख्तर,बच्चे जावेद अख्तर और सलमान अख्तर को खुदा के हवाले छोड़कर.बम्बई में कृष्णचंदर, इस्मत चुगताई, मुल्कराज आनंद, साहिर लुधियानवी से दोस्ती हुई. जब वे बंबई में संघर्ष कर रहे थे भोपाल में 1953 में कैंसर से सफ़िया की मौत हो गई. कुछ सालउ बाद 1956 में जां निसार ने ख़दीजा तलत से शादी रचा ली.

एक फिल्म गीतकार के रूप में उन्हें सफलता काफी देर से मिली.फ़िल्म थी; यास्मीन (1955)  संगीत था- सी. रामचंद्र द्वारा का. इसके साथ ही उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक से एक लाजवाब गीत दिए.अपने चार दशक के करियर में उन्होंने सी.रामचंद्र,ओपी नय्यर, एन दत्ता, जयदेव और खय्याम के जैसे नामी-गिरामी संगीतकारों के साथ काम किया और उनके लिये तक़रीबन 151 गाने लिखे. उनके गानों से सजी कुछ  मशहूर फिल्में आज भी संगीतप्रेमियों के ज़हन में  तरोताज़ा हैं-यास्मीन (1955) बाप रे बाप (1955) सी.आई.डी. (1956) नया अंदाज़ 19656) ब्लैक कैट(1956) छूमन्तर (1957) रुस्तम सोहराब (1963) प्रेम पर्बत (1974) शंकर हुसैन (1977) नूरी (1979) रज़िया सुल्तान (1983)

संगीतकार ख़य्याम के अनुसार जाँ निसार अख़्तर में अल्फ़ाज़ और इल्म का खज़ाना था.एक-एक गीत के लिए चुटकियों में वह कई-कई मुखड़े लिखते थे. दरअसल फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तरह वह  भी।मुशायरे के शायर नहीं थे.अपनी मृत्यु के चार साल की अवधि के दौरान उन्होंने अपनी रचनाओं के तीन संग्रह प्रकाशित किए, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण, ख़ाक़-ए-दिल (दिल की राख) है, जिसमें 1935 से 1970 तक उनकी प्रतिनिधि कविताएँ हैं.1976 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

अख्तर साहब न सिर्फ़ गज़लें लिखते थे, बल्कि नज़्में, रूबाइयाँ और फिल्मी गीत भी उसी जोश-ओ-जुनून के साथ लिखा करते थे.उनमें वतनपरस्ती कूट-कूट कर भरी थी. वह जिंदगी भर देश के जवानों को जिंदगी की सही राह दिखाते, जगाते, आगाह करते रहे.उसका एक बेहतरीन नमूना देखिये:
"एक है अपना जहाँ,
एक है अपना वतन,
अपने सभी सुख एक हैं,
अपने सभी ग़म एक हैं
आवाज़ दो हम एक हैं'."

जां निसार अख़्तर के साथ यह दुर्भाग्य और सौभाग्य दोनों रहा कि वो उस दौर के सबसे बड़े शायर और हिंदी सिनेमा के सबसे ज़्यादा पैसे पाने वाले गीतकार साहिर लुधियानवी के सबसे क़रीबी दोस्तों में से एक थे.कहा जाता है कि अपनी ज़िन्दगी के सबसे हसीन साल साहिर लुधियानवी के साथ दोस्ती में ग़र्क़ कर दिए.वो साहिर के साए में ही रहे और साहिर ने उन्हें उभरने का मौका नहीं दिया लेकिन जैसे ही वो साहिर की दोस्ती से आज़ाद हुए, उनमें और उनकी शायरी में 'क्रांतिकारी परिवर्तन: हुआ.
उसके बाद उन्होंने जो भी लिखा उससे  शायरी धनवान हुई. 

जां निसार को भारत के पहले प्रधान- मंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पिछले 300 वर्षों की सर्वश्रेष्ठ हिंदुस्तानी कविता को समेटने के लिए कमीशन किया गया था, और बाद में दो खंडों में 'हिंदुस्तान हमारा' नामक पुस्तक का पहला संस्करण इंदिरा गांधी द्वारा जारी किया गया था. इसमें भारत और उसके इतिहास के लिए प्यार और प्रशंसा से लेकर होली और दिवाली जैसे त्योहारों तक, गंगा, यमुना और हिमालय जैसी भारतीय नदियों पर उर्दू छंद शामिल थे.

उन्होंने प्रदीप कुमार और मीना कुमारी अभिनीत एक फिल्म, बहू बेगम (1967) का लेखन और निर्माण किया. पर  गीत उन्होंने साहिर साहब से लिखवाए.फ़िल्म चल न सकी.19 अगस्त 1976 को बॉम्बे में उनका निधन हो गया.उन्हें मरणोपरांत 1980 के फिल्म नूरी के "आजा रे मेरे दिलबर" के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था.

उनके बारे में मशहूर शायर निदा फ़ाजली लिखते  हैं- "जां निसार आख़िरी दम तक जवान रहे.बुढ़ापे में जवानी का यह जोश उर्दू इतिहास में एक चमत्कार है जो उनकी याद को शेरो-अदब की महफ़िल में हमेशा जवान रखेगा."
"आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो 
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो".

महान शायर और गीतकार जां निसार अख़्तर की 47 वीं पुण्यतिथी पर हम उन्हें हार्दिक श्रद्धा- सुमन अर्पित करते हैं.
🙏🙏

शास्त्रीय संगीत गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर

प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂19 अगस्त 1872
 ⚰️21 अगस्त 1931
विष्णु दिगम्बर पलुस्कर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में एक विशिष्ट प्रतिभा थे, जिन्होंने भारतीय संगीत में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। वे भारतीय समाज में संगीत और संगीतकार की उच्च प्रतिष्ठा के पुनरुद्धारक, समर्थ संगीतगुरु, अप्रतिम कंठस्वर एवं गायनकौशल के घनी भक्त हृदय गायक थे। विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में महात्मा गांधी की सभाओं सहित विभिन्न मंचों पर रामधुन गाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाया। पलुस्कर ने लाहौर में 'गंधर्व महाविद्यालय' की स्थापना कर भारतीय संगीत को एक विशिष्ट स्थान दिया। इसके अलावा उन्होंने अपने समय की तमाम धुनों की स्वरलिपियों को संग्रहित कर आधुनिक पीढ़ी के लिए एक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

जीवन परिचय

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर का जन्म 18 अगस्त, 1872 को अंग्रेज़ी शासन वाले बंबई प्रेसीडेंसी के कुरूंदवाड़ (बेलगाँव) में हुआ था। पलुस्कर को घर में संगीत का माहौल मिला था। क्योंकि उनके पिता दिगम्बर गोपाल पलुस्कर धार्मिक भजन और कीर्तन गाते थे। विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को बचपन में एक भीषण त्रासदी से गुजरना पड़ा। समीपवर्ती एक कस्बे में दत्तात्रेय जयंती के दौरान उनकी आंख के समीप पटाखा फटने के कारण उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई थी। आंखों की रोशनी जाने के बाद उपचार के लिए वह समीप के मिरज राज्य चले गए।

संगीत की शिक्षा

ग्वालियर घराने में शिक्षित पं. बालकृष्ण बुवा इचलकरंजीकर से मिरज में संगीत की शिक्षा आरंभ की। बारह वर्ष तक संगीत की विधिवत तालीम हासिल करने के बाद पलुस्कर के अपने गुरु से संबंध खराब हो गए। बारह वर्ष कठोर तप:साधना से संगीत शिक्षाक्रम पूर्ण करके सन्‌ 1896 में समाज की कुत्या और अवहेलना एवं संगीत गुरुओं की संकीर्णता से भारतीय संगीत के उद्धार के लिए दृढ़ संकल्प सहित यात्रा आरंभ की। इस दौरान उन्होंने बड़ौदा और ग्वालियर की यात्रा की। गिरनार में दत्तशिखर पर एक अलौकिक पुरुष के संकेतानुसार लाहौर को सर्वप्रथम कार्यक्षेत्र चुना।

ब्रजभूमि भ्रमण

धनार्जन के लिए उन्होंने संगीत के सार्वजनिक कार्यक्रम भी किए। पलुस्कर संभवत: पहले ऐसे शास्त्रीय गायक हैं, जिन्होंने संगीत के सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए। बाद में विष्णु दिगम्बर पलुस्कर मथुरा आए और उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बंदिशें समझने के लिए ब्रज भाषा सीखी। बंदिशें अधिकतर ब्रजभाषा में ही लिखी गई हैं। इसके अलावा उन्होंने मथुरा में ध्रुपद शैली का गायन भी सीखा।

गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर मथुरा के बाद पंजाब घूमते हुए लाहौर पहुंचे और 1901 में उन्होंने गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना की। इस स्कूल के जरिए उन्होंने कई संगीत विभूतियों को तैयार किया। हालांकि स्कूल चलाने के लिए उन्हें बाज़ार से कर्ज़ लेना पड़ा। बाद में उन्होंने मुंबई में अपना स्कूल स्थापित किया। कुछ वर्ष बाद आर्थिक कारणों से यह स्कूल नहीं चल पाया और इसके कारण विष्णु दिगम्बर पलुस्कर की संपत्ति भी जब्त हो गई।

पलुस्कर के शिष्य

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के शिष्यों में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित विनायकराव पटवर्धन, पंडित नारायण राव और उनके पुत्र डी. वी. पलुस्कर जैसे दिग्गज गायक शामिल थे।

रचनाएँ

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने तीन खंडों में 'संगीत बाल-बोध' नामक पुस्तक लिखी और 18 खंडों में रागों की स्वरलिपियों को संग्रहित किया। इसके अतिरिक्त पं. पलुस्कर ने 'स्वल्पालाप-गायन', 'संगीत-तत्त्वदर्शक', 'राग-प्रवेश' तथा 'भजनामृत लहरी' इत्यादि नामक पुस्तकों की रचना की।

निधन

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इस पुरोधा गायक और महान् साधक का निधन 21 अगस्त, 1931 को हो गया।

शनिवार, 19 अगस्त 2023

विनोद दामोदर

प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेत्री नंदा के पिता फ़िल्म अभिनेता एवं निर्देशक विनायक दामोदर कर्नाटकी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

विनायक दामोदर कर्नाटकी 
🎂19 जनवरी 1906 - 
⚰️19 अगस्त 1947
जिन्हें आमतौर पर मास्टर विनायक के रूप में जाना जाता है, 1930 और 1940 के दशक के एक भारतीय अभिनेता और फिल्म निर्देशक थे।

मास्टर विनायक का जन्म 19 जनवरी 1906 कोल्हापुर, महाराष्ट्र, भारत में हुआ था।  उन्होंने सुशीला से शादी की।  दंपति के बच्चे दिवंगत अभिनेत्री नंदा और फिल्म निर्माता और निर्देशक, जयप्रकाश कर्नाटकी हैं, जिन्होंने अभिनेत्री जयश्री टी से शादी की है।

 मास्टर विनायक भारतीय फिल्म उद्योग में कई व्यक्तित्वों से संबंधित थे।  उनके भाई वासुदेव कर्नाटक एक छायाकार बन गए, जबकि प्रसिद्ध फिल्मी हस्तियां बाबूराव पेंढारकर (1896-1967) और भालजी पेंढारकर (1897-1994) उनके सौतेले भाई थे।  वह महान फिल्म निर्देशक वी शांताराम के मामा भी थे। मास्टर विनायक मंगेशकर परिवार के अच्छे दोस्त थे और उन्होंने लता मंगेशकर को फिल्म उद्योग से परिचित कराया उनकी फिल्म पहिली मंगलागौर में।

 उन्होंने 1936 में हंस पिक्चर की सह-स्थापना की। उनके काम के बीच, उन्हें 1938 की मराठी फिल्म ब्रह्मचारी के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है।  इस फ़िल्म की प्रमुख नायिका मीनाक्षी शिरोडकर को स्विमिंग सूट में दिखाने पर काफी विवाद पैदा हो गया था।

19 अगस्त 1947 में विनायक का मुंबई में निधन हो गया।

अब्दुल राशिद खान

अब्दुल राशिद ख़ान 
प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक अब्दुल राशिद खान की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

अब्दुल राशिद ख़ान 
🎂 जन्म: 19 अगस्त 1908 
⚰️मृत्यु: 18 फ़रवरी 2016
 प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक थे। ये ग्वालियर घराने से थे। इन्हें पद्मभूषण (2013), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2009) आदि से नवाजा जा चुका है।

अब्दुल राशिद ख़ान का जन्म 19 अगस्त, 1908 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था।
उन्हें वर्ष 2013 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था।
उस्ताद अब्दुल राशिद ख़ान ग्वालियर घराने से जुड़े थे।
अब्दुल राशिद ख़ान लगभग 20 वर्ष तक आईटीसी संगीत अनुसंधान अकादमी से जुड़े रहे।
वे 105 वर्ष की उम्र में पद्मभूषण (2013) पाने वाले सबसे उम्रदराज व्यक्ति थे।

निधन

करीब 107 वर्ष की अवस्था में 18 फ़रवरी 2016 को उनका निधन हो गया था। उम्र और बीमारियां उनके लिए कभी भी बाधक साबित नहीं हुईं। उनके एक छात्र के अनुसार राशिद ख़ान ने मरने से एक दिन पहले तक संगीत की शिक्षा दी। अब्दुल राशिद ख़ान के निधन पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शोक व्यक्त किया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि दिग्गज गायक के निधन पर मैं दुखी हूं। देश ने इनके निधन के साथ संगीत की दुनिया में एक महान मणि को खो दिया है।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

अमर्त्य सेन नवनीता देव सेन

अमर्त्य सेन नवनीता देव सेन
जन्म
🎂19 अगस्त 1967
कोलकाता
नागरिकता
संयुक्त राज्य अमेरिका
पेशा
अभिनेता,पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्माता,कवि, निबंधकार
संगठन
यूनिसेफ
माता-पिता
अमर्त्य सेन नवनीता देव सेन

नंदना सेन "नोबेल पुरस्कार विजेता" अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन तथा समकालीन बंगला साहित्य की एक सर्वप्रमुख लेखिका पद्मश्री नबनिता देव सेन की बेटी हैं।

उनका जन्म १९ अगस्त १९६७ को पूर्वी भारतीय शहर कोलकाता में हुआ था। वह यूरोप, भारत व अमेरिका के विभिन्न शहरों में पलीं-बढीं। सेन ने "द डॉल" नाम की एक मूवी से अपने कॅरियर की शुरुआत की। बॉलीवुड की फिल्मों में नंदना पहली बार ब्लैक नाम की एक मूवी में रानी मुखर्जी की 17 वर्षीय बहन के रूप में दिखाई दीं। 2008 में वह ब्रिटिश टेलीविजन श्रृंखला शार्प के एक एपिसोड शार्प्स पेरिल में दिखाई दीं।उनका विवाह होर्स्ट यॉर्गन रूच से हुआ।

उत्तपाल दत

उत्पल दत्त
अन्य नाम उत्पल दा
🎂जन्म 29 मार्च, 1929
जन्म भूमि बारीसाल, पूर्वी बंगाल
⚰️मृत्यु 19 अगस्त, 1993
अभिभावक गिरिजारंजन दत्त
पति/पत्नी शोभा सेन
संतान बिष्णुप्रिया (पुत्री)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी तथा बांग्ला सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'गोलमाल', 'सात हिन्दुस्तानी', 'रंग बिरंगी', 'अंगूर', 'कर्तव्य', 'ईमान धर्म', 'शुभ लग्न' आदि।
शिक्षा अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक
विद्यालय 'सेंट जेवियर कॉलेज', कोलकाता
पुरस्कार-उपाधि 'फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट कॉमेडियन अवार्ड', 'नेशनल फ़िल्म अवार्ड'।
प्रसिद्धि अभिनेता तथा फ़िल्म निर्देशक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी 1940 में उत्पल दत्त अंग्रेज़ी थिएटर से जुड़े और अभिनय की शुरूआत कर दी। इस दौरान उन्होंने थिएटर कंपनी के साथ भारत और पाकिस्तान में कई नाटक मंचित किए। नाटक 'ओथेलो' से उन्हें काफ़ी वाहवाही मिली थी।
उत्पल दत्त (अंग्रेज़ी: Utpal Dutt ; जन्म- 29 मार्च, 1929, बारीसाल, पूर्वी बंगाल; मृत्यु- 19 अगस्त, 1993) भारतीय सिनेमा के ऐसे प्रसिद्ध अभिनेता थे, जिन्होंने हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। एक अभिनेता के रूप में उत्पल दत्त ने लगभग हर किरदार को निभाया। हिन्दी पर्दे पर कभी पिता तो कभी चाचा, कहीं डॉक्टर तो कहीं सेठ, कभी बुरे तो बहुधा अच्छे बने 'उत्पल दा' को दर्शक किसी भी रूप में नहीं भूल सकेंगे। उत्पल दत्त को अधिकतर एक हास्य अभिनेता के रूप में याद किया जाता है। वर्ष 1979 की सुपरहिट फ़िल्म 'गोलमाल' में उनके द्वारा निभाया गया 'भवानी शंकर' का शानदार हास्य अभिनय आज भी याद किया जाता है। उत्पल दत्त एक उच्च दर्जे के अभिनेता ही नहीं, एक कुशल निर्देशक और नाटककार भी थे। सीरियल से लेकर कॉमेडी तक के हर रोल को उन्होंने बड़ी संजीदगी से निभाया था।

अताउल्लाह खान (एसाखेलवी)

#punjabi #पंजाबी

अताउल्लाह खान (एसाखेलवी)
*🎂जन्म की तारीख और समय: 19 अगस्त 1951 मियांवाली, पाकिस्तान
पत्नी: बाजीघा (विवा. 1985)
बच्चे: लारैब अता, सांवल इसाखेलवी, Bilawal Atta, संवल अट्टा
भाई: सनाउल्लाह खान
माता-पिता: अहमद खान नियाज़ी
एसाखेल्वी का जन्म 19 अगस्त 1951 को एसा खील, मियांवाली , पंजाब प्रांत, पाकिस्तान में अताउल्लाह खान नियाज़ी के रूप में हुआ था। नियाजी पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम पंजाब प्रांत और अफगानिस्तान के पूर्वी क्षेत्रों में स्थित एक आबादी वाला पश्तून जनजाति है । अताउल्लाह को बचपन में ही संगीत में रुचि हो गई थी, लेकिन उनके घर में संगीत की सख्त मनाही थी।अपने घर में संगीत पर प्रतिबंध के बावजूद, अताउल्लाह ने गुप्त रूप से संगीत के बारे में अधिक जानने की कोशिश की।उनके स्कूल के शिक्षक ने उन्हें मोहम्मद रफ़ी और मुकेश को पढ़ायागाने गाए और उससे कहा कि वह कभी भी गाना बंद न करे। अताउल्लाह ने अपने माता-पिता को संगीत के प्रति अपने जुनून को समझाने की कोशिश की और उन्हें गाने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने उन्हें गाना जारी रखने से मना किया। निराश होकर, अताउल्लाह ने घर छोड़ दिया जब वह 18 साल का था। उन्होंने पाकिस्तान के भीतर बड़े पैमाने पर यात्रा की और मियांवाली से काम करके खुद का समर्थन किया । वह पाकिस्तान के ग्रामीण इलाकों और दुनिया के कई अन्य देशों में सबसे लोकप्रिय हैं।
अताउल्लाह खान मियांवाली जिले से हैं और उनका गृहनगर एसाखेल है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा एसाखेल से प्राप्त की। उन्हें पारंपरिक रूप से सरायकी माना जाता है जो पंजाबी भाषा के गायक की एक बोली है। 

सरैकी , उर्दू और अंग्रेजी में प्रदर्शन करने वाले एक पेशेवर संगीतकार बनने के बाद अताउल्लाह लाहौर चले गए । उनकी चार बार शादी हो चुकी है और उनके चार बच्चे हैं। उनकी दूसरी पत्नी बाज़घा एक प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं और उनकी बेटी लारिब अट्टा एक पेशेवर वीएफएक्स कलाकार हैं, जिन्होंने कई हॉलीवुड फिल्मों के लिए काम किया है।उनके बेटे सांवल एसाखेलवी भी संगीत में अपना करियर बना रहे हैं, 
उन्हें पाकिस्तान में एक लोक आइकन माना जाता है और व्यापक रूप से पाकिस्तान में सबसे लोकप्रिय लोक गायकों में से एक माना जाता है। पाकिस्तानी ट्रक चालकों का निरंतर साथी अताउल्लाह खान एसाखेलवी की मधुर धुन है। मियांवाली में जन्मा यह गायक अपनी तेज मूंछों, कमीज सलवार और एक कंधे पर शॉल के साथ पारंपरिक पाकिस्तानी संगीत का पोस्टर बॉय बन गया।

सरायकी में गायन, जो पश्चिमी और दक्षिणी पंजाब पर हावी है, उनके दिलकश भावपूर्ण गाने जंगल की आग की तरह पकड़े गए, लगभग उस समय से जब उन्होंने 1970 के दशक के मध्य में रेडियो पाकिस्तान , बहावलपुर के लिए अपना पहला सत्र रिकॉर्ड किया था। वर्षों तक एसाखेलवी ने एक ब्रह्मांड में सर्वोच्च और निर्विवाद रूप से शासन किया, जो अभिजात वर्ग के सुसंस्कृत संगीत सैलून के समानांतर मौजूद था।

उन्होंने सात भाषाओं में 50,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए हैं।उन्होंने ग्रेट ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय से लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्राप्त किया है , और 1994 में जारी किए गए ऑडियो एल्बमों की उच्चतम संख्या के लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया था।
1991 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें प्राइड ऑफ़ परफॉरमेंस अवार्ड से सम्मानित किया ।
सितारा ए इम्तियाज (उत्कृष्टता का सितारा) 23 मार्च 2019 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा ।

"खय्याम"

"खय्याम"
🎂जन्म की तारीख और समय: 18 फ़रवरी 1927, राहोन
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 19 अगस्त 2019, सुजय हॉस्पिटल, मुम्बई
पत्नी: जगजीत कौर (विवा. 1954–2019)

मोहम्मद ज़हूर "खय्याम" हाशमी, जिन्हें "खय्याम" नाम से जाना जाता था, भारतीय फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार थे। अविभाजित पंजाब के राहों नगर में जन्मे खय्याम छोटी उम्र में ही घर से भागकर दिल्ली चले आये, जहाँ उन्होंने पण्डित अमरनाथ से संगीत की दीक्षा ली।
1927 में जन्में ख़य्याम 10 साल की उम्र में ही घर छोड़कर दिल्ली आ गए थे.अभिनेता बनने का सपना उन्हें दिल्ली ले आया था. लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था. दिल्ली में 5 साल रहते हुए उन्होंने संगीत सीखा और अपनी किस्मत आजमाने के लिए बम्बई (आज के मुंबई) चले गए. खय्याम ने बताया कि वो कैसे बचपन में छिप–छिपाकर फ़िल्में देखा करते थे जिसकी वजह से उनके परिवार वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया था.

खय्याम अपने करियर की शुरुआत अभिनेता के तौर पर करना चाहते थे पर धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी फ़िल्मी संगीत में बढ़ती गई और वह संगीत के मुरीद हो गए.

उन्होंने पहली बार फ़िल्म 'हीर रांझा' में संगीत दिया लेकिन मोहम्मद रफ़ी के गीत 'अकेले में वह घबराते तो होंगे' से उन्हें पहचान मिली.

फ़िल्म 'शोला और शबनम' ने उन्हें संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया.

खय्याम ने बताया कि 'पाकीज़ा' की जबर्दस्त कामयाबी के बाद 'उमराव जान' का संगीत बनाते समय उन्हें बहुत डर लग रहा था.

उन्होंने कहा, "पाकीज़ा और उमराव जान की पृष्ठभूमि एक जैसी थी. 'पाकीज़ा' कमाल अमरोही साहब ने बनाई थी जिसमें मीना कुमारी, अशोक कुमार, राज कुमार थे. इसका संगीत गुलाम मोहम्मद ने दिया था और यह बड़ी हिट फ़िल्म थी. ऐसे में 'उमराव जान' का संगीत बनाते समय मैं बहुत डरा हुआ था और वो मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती थी."

खय्याम ने आगे कहा, "लोग 'पाकीज़ा' में सब कुछ देख सुन चुके थे. ऐसे में उमराव जान के संगीत को खास बनाने के लिए मैंने इतिहास पढ़ना शुरू किया."

आखिरकार खय्याम की मेहनत रंग लाई और 1982 में रिलीज हुई मुज़फ़्फ़र अली की 'उमराव जान' ने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए.

ख़य्याम कहते हैं, "रेखा ने मेरे संगीत में जान दाल दी. उनके अभिनय को देखकर लगता है कि रेखा पिछले जन्म में उमराव जान ही थी."
अपने अंतिम दिनों में, खय्याम विभिन्न आयु संबंधी बीमारियों से पीड़ित थे। 28 जुलाई 2019 को खय्याम को फेफड़ों में संक्रमण के कारण जुहू, मुंबई के सुजय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 19 अगस्त 2019 को 92 वर्ष की आयु में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। अगले दिन पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...