🎂18 फ़रवरी 1914
⚰️19 अगस्त 1976
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जां निसार
कहा जाता है दीपक बुझने से पहले तेज़ रोशनी बिखरता है.ऐसा ही कुछ मशहूर शायर जां निसार अख़्तर के साथ भी हुआ. बतौर गीतकार उनकी सबसे अंतिम फिल्म 'रज़िया सुल्तान' में उनकी शायरी चरम पर थी.कमाल अमरोही की इस फिल्म 'रज़िया सुल्तान' का लाजवाब संगीत दिया था ख़य्याम ने.उन्होंने इसमें दो जबरदस्त शायरों निदा फ़ाज़ली और जां निसार अख़्तर से गीत लिखवाए. अख़्तर साहब ने जो गीत लिखा था उसको क़ब्बन मिर्ज़ा ने अपनी अनूठी आवाज़ में गाकर हमेशा के लिए अमर कर दिया.
"आई ज़ंजीर की झनकार ख़ुदा ख़ैर करे,
दिल हुआ किसका ग़िरफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे।
इसी फ़िल्म का एक और गीत बेहद मशहूर हुआ था जो जां निसार अख़्तर का ही लिखा हुआ था. इसे लता मंगेशकर ने अपनी मिठी आवाज में लाजवाब ढंग से गाया है.. "ऐ दिल-ए-नादान…"
18 फरवरी 1914 को जन्मे जां निसार को ऊर्दू शायरी विरासत में मिली थी. इनके परदादा ’फ़ज़्ले हक़ खैराबादी’ ने मिर्ज़ा गालिब के कहने पर उनके दीवान का संपादन किया था. बाद में 1857 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ ज़िहाद का फ़तवा ज़ारी करने के कारण उन्हें ’कालापानी’ की सजा हुई थी. जाँ निसार अख्तर के पिता ’मुज़्तर खैराबादी’ भी मशहूर शायर थे.
जाँ निसार अख़्तर ने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एम.ए. गोल्ड मैडल के साथ पास किया था. बंटवारे से पहले ग्वालियर के 'विक्टोरिया कॉलेज' में उन्हें उर्दू पढ़ाने का काम मिला पर दंगों की वजह से वे भोपाल चले आये. सन् 1943 में जाँ निसार की शादी मशहूर शायर ’मज़ाज लखनवी’ की बहन ’साफ़िया सिराज़ुल हक़’ से हुई. उन्हीं से आज के दौर के लोकप्रिय संवाद लेखक और गीतकार जावेद अख़्तरका जन्म हुआ था.भोपाल के हमीदिया कालेज में जांनिसार और साफ़िया, दोनो अध्यापन करने लगे.ये उनके संघर्ष के दिन थे. ये नौकरी रास नहीं आई और 1949 में जांनिसार बंबई चले गए. बीवी साफ़िया अख्तर,बच्चे जावेद अख्तर और सलमान अख्तर को खुदा के हवाले छोड़कर.बम्बई में कृष्णचंदर, इस्मत चुगताई, मुल्कराज आनंद, साहिर लुधियानवी से दोस्ती हुई. जब वे बंबई में संघर्ष कर रहे थे भोपाल में 1953 में कैंसर से सफ़िया की मौत हो गई. कुछ सालउ बाद 1956 में जां निसार ने ख़दीजा तलत से शादी रचा ली.
एक फिल्म गीतकार के रूप में उन्हें सफलता काफी देर से मिली.फ़िल्म थी; यास्मीन (1955) संगीत था- सी. रामचंद्र द्वारा का. इसके साथ ही उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक से एक लाजवाब गीत दिए.अपने चार दशक के करियर में उन्होंने सी.रामचंद्र,ओपी नय्यर, एन दत्ता, जयदेव और खय्याम के जैसे नामी-गिरामी संगीतकारों के साथ काम किया और उनके लिये तक़रीबन 151 गाने लिखे. उनके गानों से सजी कुछ मशहूर फिल्में आज भी संगीतप्रेमियों के ज़हन में तरोताज़ा हैं-यास्मीन (1955) बाप रे बाप (1955) सी.आई.डी. (1956) नया अंदाज़ 19656) ब्लैक कैट(1956) छूमन्तर (1957) रुस्तम सोहराब (1963) प्रेम पर्बत (1974) शंकर हुसैन (1977) नूरी (1979) रज़िया सुल्तान (1983)
संगीतकार ख़य्याम के अनुसार जाँ निसार अख़्तर में अल्फ़ाज़ और इल्म का खज़ाना था.एक-एक गीत के लिए चुटकियों में वह कई-कई मुखड़े लिखते थे. दरअसल फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तरह वह भी।मुशायरे के शायर नहीं थे.अपनी मृत्यु के चार साल की अवधि के दौरान उन्होंने अपनी रचनाओं के तीन संग्रह प्रकाशित किए, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण, ख़ाक़-ए-दिल (दिल की राख) है, जिसमें 1935 से 1970 तक उनकी प्रतिनिधि कविताएँ हैं.1976 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
अख्तर साहब न सिर्फ़ गज़लें लिखते थे, बल्कि नज़्में, रूबाइयाँ और फिल्मी गीत भी उसी जोश-ओ-जुनून के साथ लिखा करते थे.उनमें वतनपरस्ती कूट-कूट कर भरी थी. वह जिंदगी भर देश के जवानों को जिंदगी की सही राह दिखाते, जगाते, आगाह करते रहे.उसका एक बेहतरीन नमूना देखिये:
"एक है अपना जहाँ,
एक है अपना वतन,
अपने सभी सुख एक हैं,
अपने सभी ग़म एक हैं
आवाज़ दो हम एक हैं'."
जां निसार अख़्तर के साथ यह दुर्भाग्य और सौभाग्य दोनों रहा कि वो उस दौर के सबसे बड़े शायर और हिंदी सिनेमा के सबसे ज़्यादा पैसे पाने वाले गीतकार साहिर लुधियानवी के सबसे क़रीबी दोस्तों में से एक थे.कहा जाता है कि अपनी ज़िन्दगी के सबसे हसीन साल साहिर लुधियानवी के साथ दोस्ती में ग़र्क़ कर दिए.वो साहिर के साए में ही रहे और साहिर ने उन्हें उभरने का मौका नहीं दिया लेकिन जैसे ही वो साहिर की दोस्ती से आज़ाद हुए, उनमें और उनकी शायरी में 'क्रांतिकारी परिवर्तन: हुआ.
उसके बाद उन्होंने जो भी लिखा उससे शायरी धनवान हुई.
जां निसार को भारत के पहले प्रधान- मंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पिछले 300 वर्षों की सर्वश्रेष्ठ हिंदुस्तानी कविता को समेटने के लिए कमीशन किया गया था, और बाद में दो खंडों में 'हिंदुस्तान हमारा' नामक पुस्तक का पहला संस्करण इंदिरा गांधी द्वारा जारी किया गया था. इसमें भारत और उसके इतिहास के लिए प्यार और प्रशंसा से लेकर होली और दिवाली जैसे त्योहारों तक, गंगा, यमुना और हिमालय जैसी भारतीय नदियों पर उर्दू छंद शामिल थे.
उन्होंने प्रदीप कुमार और मीना कुमारी अभिनीत एक फिल्म, बहू बेगम (1967) का लेखन और निर्माण किया. पर गीत उन्होंने साहिर साहब से लिखवाए.फ़िल्म चल न सकी.19 अगस्त 1976 को बॉम्बे में उनका निधन हो गया.उन्हें मरणोपरांत 1980 के फिल्म नूरी के "आजा रे मेरे दिलबर" के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था.
उनके बारे में मशहूर शायर निदा फ़ाजली लिखते हैं- "जां निसार आख़िरी दम तक जवान रहे.बुढ़ापे में जवानी का यह जोश उर्दू इतिहास में एक चमत्कार है जो उनकी याद को शेरो-अदब की महफ़िल में हमेशा जवान रखेगा."
"आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो".
महान शायर और गीतकार जां निसार अख़्तर की 47 वीं पुण्यतिथी पर हम उन्हें हार्दिक श्रद्धा- सुमन अर्पित करते हैं.
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