अध्याय 17
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 1
श्लोक:
(श्रद्धा का और शास्त्रविपरीत घोर तप करने वालों का विषय) अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी?
अर्जुन के इस प्रश्न में शास्त्रों की विधियों के प्रति आदर और श्रद्धा की महत्वपूर्णता को समझाया गया है। वे जानना चाहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति शास्त्रों की विधि को न मानकर अपनी निजी श्रद्धा के आधार पर पूजा करता है, तो उसकी पूजा की स्थिति कैसी होती है? क्या उसकी श्रद्धा उच्चतम स्तर की है या फिर वह किसी अन्य गुण का प्रतिनिधित्व करती है?
आज की परिस्थित को देखते हुए मानो अर्जुन ने तब यह प्रश्न पूछ लिया हो। अर्जुन तो प्रश्न पूछते है,ताकि भगवान उत्तर दे। क्यों कि भगवान ही है जो सही बता सकते हैं। जैसे किसी गाड़ी में क्या कमी नुक्स हुआ क्यों हुआ।मैकेनिक ही बता सकता है।की वकील,या लेखक नहीं बता सकता , मैकेनिक जिसको बताता है कि क्या नुक्स है सुनने वाले से हम भी जान पाते है,ठीक उसी प्रकार अर्जुन दुनिया बनाने वाले से पूछता है और क्या जवाब मिला हम तक अर्जुन के माध्यम से ही पहुंच पाता है।
जैसा कि अध्याय सोलह के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि काम, क्रोध और लोभ के त्यागने पर ही कर्म आरम्भ होता है, नियत कर्म को बिना किये न सुख, न सिद्धि और न परमगति ही मिलती है। इसलिये अब तुम्हारे लिये कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में कि क्या करूँ, क्या न करूँ ?
इस सम्बन्ध में शास्त्र ही प्रमाण है। कोई अन्य शास्त्र नहीं; बल्कि ‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदम्।' (१५/२० ) गीता स्वयं शास्त्र है। अन्य शास्त्र भी हैं; किन्तु यहाँ इसी गीताशास्त्र पर दृष्टि रखें, दूसरा न ढूँढ़ने लगें। दूसरी जगह ढूँढ़ेंगे तो यह क्रमबद्धता नहीं मिलेगी, अतः भटक जायेंगे। इस लिए अन्य धर्मो की गवाही तो ले ही सकते हैं?
यहां अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवन्! जो लोग शास्त्रविधि को त्यागकर पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर 'यजन्ते'- यजन करते हैं, उनकी गति कैसी है? सात्त्विकी है, राजसी अथवा तामसी है? क्योंकि पीछे अर्जुन ने सुना था कि सात्त्विक, राजस अथवा तामस, जब तक गुण विद्यमान हैं, किसी-न- किसी योनि के ही कारण होते हैं। इसलिये प्रस्तुत अध्याय के आरम्भ में ही उसने पहला प्रश्न रखा है
अर्जुन ने कहा- हे कृष्ण! जो लोग शास्त्र के नियमों का पालन न करके अपनी कल्पना के अनुसार पूजा करते हैं, उनकी स्थिति कौन सी है? वे सतोगुणी हैं, रजोगुणी हैं या तमोगुणी?
तात्पर्य : चतुर्थ अध्याय के उन्तालीसवें श्लोक में कहा गया है कि किसी विशेष प्रकार की पूजा में निष्ठावान् व्यक्ति क्रमशः ज्ञान की अवस्था को प्राप्त होता है और शान्ति तथा सम्पन्नता की सर्वोच्च सिद्धावस्था तक पहुँचता है। सोलहवें अध्याय में यह निष्कर्ष निकलता है कि जो शास्त्रों के नियमों का पालन नहीं करता, वह असुर है और जो निष्ठापूर्वक इन नियमों का पालन करता है, वह देव है। अब यदि कोई ऐसा निष्ठावान व्यक्ति हो, जो ऐसे कतिपय नियमों का पालन करता हो, जिनका शास्त्रों में उल्लेख न हो, तो उसकी स्थिति क्या होगी? अर्जुन के इस सन्देह का स्पष्टीकरण कृष्ण द्वारा होना है। क्या वे लोग, जो किसी व्यक्ति को चुनकर उस पर किसी भगवान् के रूप में श्रद्धा दिखाते हैं, सतो, रजो या तमोगुण में पूजा करते हैं? क्या ऐसे व्यक्तियों को जीवन की सिद्धावस्था प्राप्त हो पाती है? क्या वे वास्तविक ज्ञान प्राप्त करके उच्चतम सिद्ध अवस्था को प्राप्त हो पाते हैं? जो लोग शास्त्रों के विधि-विधानों का पालन नहीं करते, किन्तु जिनकी किसी पर श्रद्धा होती है और जो देवी, देवताओं तथा मनुष्यों की पूजा करते हैं, क्या उन्हें सफलता प्राप्त होती है? अर्जुन इन प्रश्नों को श्रीकृष्ण से पूछ रहा है।
17॥1॥
अन्य धर्मों में भी इसी प्रकार के विचार पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए:
- इस्लाम में कहा गया है कि अल्लाह की इबादत करने के लिए, एक व्यक्ति को अपने दिल में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए। (कुरान, 22:37)
- सिख धर्म में कहा गया है कि एक व्यक्ति को अपने जीवन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए, और भगवान की सेवा करनी चाहिए। (गुरु ग्रंथ साहिब, पृष्ठ 4)
- ईसाई धर्म में कहा गया है कि एक व्यक्ति को अपने दिल में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए, और भगवान की सेवा करनी चाहिए। (बाइबिल, मत्ती 22:37)
- यहूदी धर्म में कहा गया है कि एक व्यक्ति को अपने जीवन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए, और भगवान की सेवा करनी चाहिए। (तोराह, देवारिम 6:5)
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न धर्मों में भी सच्ची श्रद्धा और विश्वास की महत्वपूर्णता पर जोर दिया जाता है।
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 1
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 2
श्लोक:
श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु॥
भावार्थ:
श्री भगवान् बोले- मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा (अनन्त जन्मों में किए हुए कर्मों के सञ्चित संस्कार से उत्पन्न हुई श्रद्धा ''स्वभावजा'' श्रद्धा कही जाती है।)
सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी- ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है। उसको तू मुझसे सुन
श्लोक 2 में श्रीभगवान् ने श्रद्धा के तीन प्रमुख प्रकारों का वर्णन किया है, जो प्रत्येक व्यक्ति की स्वभाव और प्रवृत्ति के अनुसार अलग-अलग होती है। यहाँ श्रद्धा की तीन प्रमुख श्रेणियाँ हैं:
👉सात्त्विकी, से ज्ञान प्रकट होता है। जब हमारे अंदर सतोगुण प्रबल होता है, तो हमें ज्ञान और समझ की प्राप्ति होती है। हमारे मन में शांति और संतुष्टि की भावना उत्पन्न होती है, और हम अपने जीवन में सही निर्णय लेने में सक्षम होते हैं।
यह श्रद्धा शुद्ध, निष्कलंक और परमात्मा के प्रति भक्ति से परिपूर्ण होती है। यह व्यक्ति की आत्मा की शुद्धता और आत्मज्ञान की ओर संकेत करती है। सात्त्विकी श्रद्धा वाले व्यक्ति सदैव सत्य, अहिंसा, और धर्म के मार्ग पर चलते हैं।
👉राजसी से लोभ प्रकट होता है। जब हमारे अंदर रजोगुण प्रबल होता है, तो हमें लोभ और आसक्ति की भावना उत्पन्न होती है। हम अपने जीवन में अधिक से अधिक सुख और सुविधा प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, और हमारे मन में असंतुष्टि और अशांति की भावना उत्पन्न होती है।यह श्रद्धा व्यक्ति के इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और सांसारिक सुखों पर आधारित होती है। राजसी श्रद्धा से प्रेरित व्यक्ति बाहरी संसार की गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं और अपनी उपलब्धियों और शक्ति को महत्व देते हैं।
👉तामसी। प्रमाद प्रकट होता है। जब हमारे अंदर तमोगुण प्रबल होता है, तो हमें प्रमाद और आलस्य की भावना उत्पन्न होती है। हम अपने जीवन में उदासीनता और निराशा की भावना महसूस करते हैं, और हमारे मन में अशांति और असंतुष्टि की भावना उत्पन्न होती है।यह श्रद्धा अज्ञानता, अंधविश्वास, और नकारात्मक भावनाओं से जुड़ी होती है। तामसी श्रद्धा वाले व्यक्ति अक्सर आत्म-परिहार और नकारात्मक गतिविधियों में लगे रहते हैं, और उनके कार्यों में अव्यवस्था और अराजकता होती है।
श्रीभगवान् इस श्लोक के माध्यम से यह समझाना चाहते हैं कि श्रद्धा केवल व्यक्ति की स्वभाविक प्रवृत्ति के अनुसार होती है और इन तीनों प्रकार की श्रद्धाएँ उनके कर्म और संस्कारों का परिणाम हैं।
अब अन्य धर्मो की गवाही लेते है।
अन्य धर्मों में भी सात्विक, राजस और तामस की अवधारणा पाई जाती है, हालांकि उनके नाम और विवरण अलग-अलग हो सकते हैं। यहाँ कुछ उदाहरण दिए गए हैं:
इस्लाम में:
सात्विक: इस्लाम में सात्विक को "तकवा" कहा जाता है, जो अल्लाह के प्रति डर और सम्मान की भावना को दर्शाता है।
राजस: इस्लाम में राजस को "हवा" कहा जाता है, जो व्यक्ति की इच्छाओं और वासनाओं को दर्शाता है।
तामस: इस्लाम में तामस को "जाहिलियत" कहा जाता है, जो अज्ञानता और अंधविश्वास की भावना को दर्शाता है।
सिख धर्म में:
सात्विक: सिख धर्म में सात्विक को "संतोख" कहा जाता है, जो अकाल पुरख के प्रति श्रद्धा और विश्वास की भावना को दर्शाता है।
राजस: सिख धर्म में राजस को "काम" कहा जाता है, जो व्यक्ति की इच्छाओं और वासनाओं को दर्शाता है।
तामस: सिख धर्म में तामस को "मोह" कहा जाता है, जो अज्ञानता और अंधविश्वास की भावना को दर्शाता है।
ईसाई धर्म में:
सात्विक: ईसाई धर्म में सात्विक को "आत्म-नियंत्रण" कहा जाता है, जो ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास की भावना को दर्शाता है।
राजस: ईसाई धर्म में राजस को "वासना" कहा जाता है, जो व्यक्ति की इच्छाओं और वासनाओं को दर्शाता है।
तामस: ईसाई धर्म में तामस को "अंधकार" कहा जाता है, जो अज्ञानता और अंधविश्वास की भावना को दर्शाता है।
यहूदी धर्म में:
सात्विक: यहूदी धर्म में सात्विक को "त्सदकाह" कहा जाता है, जो ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास की भावना को दर्शाता है।
राजस: यहूदी धर्म में राजस को "येत्सर हारा" कहा जाता है, जो व्यक्ति की इच्छाओं और वासनाओं को दर्शाता है।
तामस: यहूदी धर्म में तामस को "तहारा" कहा जाता है, जो अज्ञानता और अंधविश्वास की भावना को दर्शाता है।
17॥2॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 3
श्लोक:
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥
भावार्थ:
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है
✍️हे भरतपुत्र! विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने-अपने अस्तित्व के अनुसार मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है। अपने द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार ही जीव को विशेष श्रद्धा से युक्त भी कहा जाता है।
तात्पर्य : प्रत्येक व्यक्ति में चाहे वह जैसा भी हो, एक विशेष प्रकार की श्रद्धा पाई जाती है। लेकिन उसके द्वारा अर्जित स्वभाव के अनुसार उसकी श्रद्धा उत्तम ( सतोगुणी), राजस ( रजोगुणी) अथवा तामसी कहलाती है। इस प्रकार अपनी विशेष प्रकार की श्रद्धा के अनुसार ही वह कतिपय लोगों से संगति करता है। अब वास्तविक तथ्य तो यह है कि, जैसा पंद्रहवें अध्याय में कहा गया है, प्रत्येक जीव परमेश्वर का अंश है, अतएव वह मूलतः इन समस्त गुणों से परे होता है। लेकिन जब वह भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाता है और बद्ध जीवन में भौतिक प्रकृति के संसर्ग में आता है, तो वह विभिन्न प्रकार की प्रकृति के साथ संगति करके अपना अलग ही स्थान बनाता है। इस प्रकार से प्राप्त कृत्रिम श्रद्धा तथा अस्तित्व मात्र भौतिक होते हैं। भले ही कोई किसी धारणा या देहात्मबोध द्वारा प्रेरित हो, लेकिन मूलतः वह निर्गुण या दिव्य होता है। अतएव भगवान् के साथ अपना सम्बन्ध फिर से प्राप्त करने के लिए उसे भौतिक कल्मष से शुद्ध होना पड़ता है। यही एकमात्र मार्ग है, निर्भय होकर कृष्णभावनामृत में लौटने का । यदि कोई कृष्णभावनामृत में स्थित हो, तो उसका सिद्धि प्राप्त करने के लिए वह मार्ग प्रशस्त हो जाता है। यदि वह आत्म-साक्षात्कार के इस पथ को ग्रहण नहीं करता, तो वह निश्चित रूप से प्रकृति गुणों के साथ बह जाता है।
इस श्लोक में श्रद्धा शब्द अत्यन्त सार्थक है। श्रद्धा मूलतः सतोगुण से उत्पन्न होती है। मनुष्य की श्रद्धा किसी देवता, किसी कृत्रिम ईश्वर या मनोधर्म में हो सकती है, लेकिन प्रबल श्रद्धा सात्त्विक कार्यों से उत्पन्न होती है। किन्तु भौतिक बद्धजीवन में कोई भी कार्य पूर्णतया शुद्ध नहीं होता। वे सब मिश्रित होते हैं। वे शुद्ध सात्त्विक नहीं होते। शुद्ध सत्त्व दिव्य होता है, शुद्ध सत्त्व में रहकर मनुष्य भगवान् के वास्तविक स्वभाव को समझ सकता है। जब तक श्रद्धा पूर्णतया सात्त्विक नभगवाहीं होती, तब तक वह प्रकृति के किसी भी गुण से दूषित हो सकती है।
जैसे श्रद्धा तो भगवान में हे पर जब किसी कष्ट का आना हो जाता है तो यही श्रद्धा यंत्र, मंत्र, तंत्र,की ओर ट्रांसफर भी हो जाती है।
जिस से प्रकृति के दूषित गुण हृदय तक फैल जाते हैं, अतएव किसी विशेष गुण के सम्पर्क में रहकर हृदय जिस स्थिति में होता है, उसी के अनुसार श्रद्धा भी उस में स्थापित होजाती है। यह समझना चाहिए कि यदि किसी का हृदय सतोगुण में स्थित है, तो उसकी श्रद्धा भी सतोगुणी है। यदि हृदय रजोगुण में स्थित है, तो उसकी श्रद्धा रजोगुणी है और यदि हृदय तमोगुण में स्थित है तो उसकी श्रद्धा तमोगुणी होती है। इस प्रकार हमें संसार में विभिन्न प्रकार की श्रद्धाएँ मिलती हैं और विभिन्न प्रकार की श्रद्धाओं के अनुसार विभिन्न प्रकार के धर्म होते हैं। धार्मिक श्रद्धा का असली सिद्धान्त सतोगुण में स्थित होता है। लेकिन चूँकि हृदय कलुषित रहता है, अतएव विभिन्न प्रकार के धार्मिक सिद्धान्त पाये जाते हैं। श्रद्धा की विभिन्नता के कारण ही पूजा भी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है।
दूसरे धर्म भी इस बात की गवाही देते हैं कि सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यहाँ कुछ उदाहरण दिए गए हैं:
इस्लाम में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके दिल की गहराइयों में बसी होती है।" (कुरान, 49:7)
सिख धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।" (गुरु ग्रंथ साहिब, पृष्ठ 4)
ईसाई धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके हृदय की गहराइयों में बसी होती है।" (बाइबिल, मत्ती 22:37)
यहूदी धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।" (तोराह, देवारिम 6:5)
बौद्ध धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।" (धम्मपद, 1:1)
हिंदू धर्म में कहा गया है कि "मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।" (भगवद गीता, 17:3)
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि सभी धर्मों में यह विश्वास है कि मनुष्य की श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है।
17॥3॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 4
श्लोक:
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः॥
भावार्थ:
सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।
सतोगुणी व्यक्ति देवताओं को पूजते हैं, रजोगुणी यक्षों व राक्षसों की पूजा करते हैं और तमोगुणी व्यक्ति भूत-प्रेतों को पूजते हैं।
तात्पर्य : इस श्लोक में भगवान् विभिन्न बाह्य कर्मों के अनुसार पूजा करने वालों के प्रकार बता रहे हैं। शास्त्रों के आदेशानुसार केवल भगवान् ही पूजनीय हैं। लेकिन जो शास्त्रों के आदेशों से अभिज्ञ नहीं, या उन पर श्रद्धा नहीं रखते, वे अपनी गुण- स्थिति के अनुसार विभिन्न वस्तुओं की पूजा करते हैं। जो लोग सतोगुणी हैं, वे सामान्यतया देवताओं की पूजा करते हैं। इन देवताओं में ब्रह्मा, शिव तथा अन्य देवता, यथा इन्द्र, चन्द्र तथा सूर्य सम्मिलित हैं। देवता तो कई हैं। सतोगुणी लोग किसी विशेष अभिप्राय से किसी विशेष देवता की पूजा करते हैं। इसी प्रकार जो रजोगुणी हैं, वे यक्ष-राक्षसों की पूजा करते हैं। हमें स्मरण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय कलकत्ता का एक व्यक्ति हिटलर की पूजा करता था, क्योंकि, भला हो उस युद्ध का, उसने उसमें काले धन्धे से प्रचुर धन संचित कर लिया था। इसी प्रकार जो रजोगुणी तथा तमोगुणी होते हैं, वे सामान्यतया किसी प्रबल मनुष्य को ईश्वर के रूप में चुन लेते हैं। वे सोचते हैं कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर की तरह पूजा जा सकता है और फल एकसा होगा।
यहाँ पर इसका स्पष्ट वर्णन है कि रजोगुणी लोग ऐसे देवताओं की सृष्टि करके उन्हें पूजते हैं और जो तमोगुणी हैं- अंधकार में हैं - वे प्रेतों की पूजा करते हैं। कभी- कभी लोग किसी मृत प्राणी की कब्र पर पूजा करते हैं। मैथुन सेवा भी तमोगुणी मानी जाती है। इसी प्रकार भारत के सुदूर ग्रामों में भूतों की पूजा करने वाले हैं। हमने देखा है कि भारत के निम्नजाति के लोग कभी-कभी जंगल में जाते हैं और यदि उन्हें इसका पता चलता है कि कोई भूत किसी वृक्ष पर रहता है, तो वे उस वृक्ष की पूजा करते हैं और बलि चढ़ाते हैं। ये पूजा के विभिन्न प्रकार वास्तव में ईश्वर-पूजा नहीं हैं। ईश्वर-पूजा तो सात्त्विक पुरुषों के लिए है। श्रीमद्भागवत में (४.३.२३) कहा गया है सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव- शब्दितम् - जब
(श्रीमद्भागवत में (४.३.२३) में कहा गया है:
"वासुदेवः सर्वम् इति स महात्मा सुदुर्लभः"
अर्थात:
"जो व्यक्ति जानता है कि वासुदेव (भगवान) ही सब कुछ है, वह महात्मा है और ऐसा व्यक्ति बहुत ही दुर्लभ है।"
यह श्लोक भगवान की सर्वव्यापकता को दर्शाता है और यह बताता है कि जो व्यक्ति इस बात को समझता है, वह महात्मा है।)
सात्त्विक श्रद्धा (सात्त्विक व्यक्तियों):
ऐसा व्यक्ति सतोगुणी होता है, तो वह वासुदेव की पूजा करता है। तात्पर्य यह है कि जो लोग गुणों से पूर्णतया शुद्ध हो चुके हैं और दिव्य पद को प्राप्त हैं, वे ही भगवान् की पूजा कर सकते हैं।
निर्विशेषवादी सतोगुण में स्थित माने जाते हैं और वे पंचदेवताओं की पूजा करते हैं। वे भौतिक जगत में निराकार विष्णु को पूजते हैं, जो सिद्धान्तीकृत विष्णु कहलाता है। विष्णु भगवान् के विस्तार भी हैं, लेकिन निर्विशेषवादी अन्ततः भगवान् में विश्वास न करने के कारण सोचते हैं कि विष्णु का स्वरूप निराकार ब्रह्म का दूसरा पक्ष है। इसी प्रकार वे यह मानते हैं कि ब्रह्माजी रजोगुण के निराकार रूप हैं। अतः वे कभी- कभी पाँच देवताओं का वर्णन करते हैं, जो पूज्य हैं। लेकिन चूँकि वे लोग निराकार ब्रह्म को ही वास्तविक सत्य मानते हैं, इसलिए वे अन्ततः समस्त पूज्य वस्तुओं को त्याग देते हैं। निष्कर्ष यह निकलता है कि प्रकृति के विभिन्न गुणों को दिव्य प्रकृति वाले व्यक्तियों की संगति से शुद्ध किया जा सकता है।
राजस श्रद्धा (राजस व्यक्तियों):
जो लोग राजस प्रवृत्तियों से युक्त होते हैं, वे यक्ष और राक्षसों की पूजा करते हैं। यह पूजा अधिकतर शक्ति, ऐश्वर्य और भौतिक लाभ प्राप्ति के उद्देश्य से की जाती है। राजस व्यक्तियों का ध्यान अक्सर बाहरी दिखावे और संपत्ति पर केंद्रित होता है।
तामस श्रद्धा (तामस व्यक्तियों):
तामस प्रवृत्तियों वाले लोग प्रेत, भूत और अन्य अशुभ शक्तियों की पूजा करते हैं। उनकी पूजा आमतौर पर अज्ञानता, अंधविश्वास और नकारात्मक शक्तियों के प्रति एक आकर्षण की वजह से होती है। इस तरह की पूजा प्रायः अंधकार और आत्ममुग्धता को बढ़ावा देती है।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि श्रद्धा और पूजा का प्रकार व्यक्ति की आंतरिक प्रवृत्तियों और मानसिक अवस्था पर निर्भर करता है। हर व्यक्ति की पूजा की शैली उसके स्वभाव और मानसिक स्थिति का प्रतिबिंब होती है।
17॥4॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 5
श्लोक:
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥
भावार्थ:
जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं
जो लोग दम्भ तथा अहंकार से अभिभूत होकर शास्त्रविरुद्ध कठोर तपस्या और व्रत करते हैं, जो काम तथा आसक्ति द्वारा प्रेरित होते हैं, जो मूर्ख हैं तथा जो शरीर के भौतिक तत्त्वों को तथा शरीर के भीतर स्थित परमात्मा को कष्ट पहुँचाते हैं, वे असुर कहे जाते हैं।
तात्पर्य : कुछ पुरुष ऐसे हैं जो ऐसी तपस्या की विधियों का खुद ही निर्माण कर लेते हैं, जिनका वर्णन शास्त्रों में नहीं है। उदाहरणार्थ, किसी स्वार्थ के प्रयोजन से, यथा राजनीतिक कारणों से उपवास करना शास्त्रों में वर्णित नहीं है। शास्त्रों में तो आध्यात्मिक उन्नति के लिए उपवास करने की संस्तुति है, किसी राजनीतिक या सामाजिक उद्देश्य के लिए नहीं। भगवद्गीता के अनुसार जो लोग ऐसी तपस्याएँ करते हैं, वे निश्चित रूप से आसुरी हैं।
उनके कार्य शास्त्रविरुद्ध हैं और सामान्य जनता के हित में भी नहीं हैं। वास्तव में वे लोग गर्व, अहंकार, काम तथा भौतिक भोग के प्रति आसक्ति के कारण ऐसा करते हैं। ऐसे कार्यों से न केवल शरीर के उन 5 तत्त्वों को विक्षोभ होता है, जिनसे शरीर बना है, अपितु शरीर के भीतर निवास कर रहे परमात्मा को भी कष्ट पहुँचता है। ऐसे अवैध उपवास से या किसी राजनीतिक उद्देश्य से की गई तपस्या आदि से निश्चय ही अन्य लोगों की शान्ति भंग होती है। उनका उल्लेख वैदिक साहित्य में नहीं है। (भूख हड़ताल)
आसुरी व्यक्ति सोचता है कि इस विधि से वह अपने शत्रु या विपक्षियों को अपनी इच्छा पूरी करने के लिए बाध्य कर सकता है, लेकिन कभी-कभी ऐसे उपवास से व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाती है। ऐसे कार्य की भगवान् द्वारा अनुमत नहीं है, वे कहते हैं कि जो इन कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, वे असुर हैं। ऐसे प्रदर्शन भगवान् के अपमान स्वरूप हैं, क्यों कि इन्हें वैदिक शास्त्रों के आदेशों का उल्लंघन करके किया जाता है। इस प्रसंग में अचेतसः शब्द महत्त्वपूर्ण है। सामान्य मानसिक स्थिति वाले पुरुषों को शास्त्रों के आदेशों का पालन करना चाहिए। जो ऐसी स्थिति में नहीं हैं, वे शास्त्रों की उपेक्षा तथा अवज्ञा करते हैं और तपस्या की अपनी विधि निर्मित कर लेते हैं। मनुष्य को सदैव आसुरी लोगों की चरम परिणति को स्मरण करना चाहिए, जैसा कि पिछले अध्याय में वर्णन किया गया है। भगवान् ऐसे लोगों को आसुरी व्यक्तियों के यहाँ जन्म लेने के लिए बाध्य करते हैं। फलस्वरूप वे भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को जाने बिना जन्म जन्मान्तर आसुरी जीवन में रहते हैं। किन्तु यदि ऐसे व्यक्ति इतने भाग्यशाली हुए कि कोई गुरु उनका मार्गदर्शन करके उन्हें वैदिक ज्ञान के मार्ग पर ले जा सके, तो वे इस भवबन्धन से छूट कर अन्ततोगत्वा परमगति को प्राप्त होते हैं।
भाव :
श्रीकृष्ण ने उन लोगों के तप की आलोचना की है, जो शास्त्रों के निर्देशों की अवहेलना करते हुए, केवल अपनी मनोवृत्तियों के अनुसार कठोर तपस्या करते हैं।
अशास्त्रविहितं: इसका मतलब है कि वे लोग शास्त्रों के निर्देशों और नियमों का पालन नहीं करते। शास्त्रों में तपस्या के लिए विशिष्ट मार्गदर्शन और विधियाँ दी गई हैं, लेकिन ये लोग उन निर्देशों की अनदेखी करते हैं।
घोरं तप्यन्ते: ये लोग कठोर और अत्यंत कठिन तपस्या करते हैं, जो सामान्यतः सामान्य मानव के लिए असहनीय हो सकती है।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः: इन लोगों के तप में दम्भ (अहंकार) और अहंकार (स्वयं की श्रेष्ठता का भाव) होता है। वे अपनी तपस्या को दूसरों के सामने दिखाने और अपनी महानता का प्रदर्शन करने के लिए करते हैं, न कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए।
कामरागबलान्विताः: ये लोग अपनी तपस्या में कामना (इच्छाएँ), राग (आसक्ति) और बल (शक्ति का अहंकार) को शामिल करते हैं। इनकी तपस्या आत्मा की शुद्धि के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लाभ और इच्छाओं की पूर्ति के लिए होती है।
संक्षेप में, यह श्लोक यह दर्शाता है कि तपस्या केवल शास्त्रों के निर्देशों का पालन करके और बिना किसी दिखावे या अहंकार के साथ करनी चाहिए। तपस्या का वास्तविक उद्देश्य आत्मा की उन्नति और ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत लाभ या मान्यता प्राप्त करने के लिए।
17॥5॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 6
श्लोक:
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥
भावार्थ:
जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं
(शास्त्र से विरुद्ध उपवासादि घोर आचरणों द्वारा शरीर को सुखाना एवं भगवान् के अंशस्वरूप जीवात्मा को क्लेश देना, भूत समुदाय को और अन्तर्यामी परमात्मा को ''कृश करना'' है।),
उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान
17॥6॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 7
श्लोक:
(आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद) आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु॥
भावार्थ:
भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक्-पृथक् भेद को तू मुझ से सुन।
प्रकृति: प्रकृति के भिन्न-भिन्न गुणों के अनुसार भोजन, यज्ञ, तपस्या और दान में भेद होते हैं। वे सब एक से नहीं होते। जो लोग यह समझ सकते हैं कि किस गुण में क्या-क्या करना चाहिए, वे वास्तव में बुद्धिमान हैं। जो लोग सभी प्रकार के यज्ञ, भोजन या दान को एक सा ही मान लेते हैं, वे अंत तक नहीं जान पाते, वे अज्ञानी हैं।
(विवाह के मंत्रों की जगह दुर्गा शप्तशती के मंत्रों सही विवाह सम्पन्न करवाने वाले।)
ऐसे भी प्रचारक लोग हैं, जो कहते हैं कि जो मनुष्य इच्छा कर सकता है, वह सिद्धि प्राप्त कर सकता है। लेकिन ये मूर्ख मार्गदर्शक शास्त्र के आदेश अधिकारी कार्य नहीं करते। ये अपनी विधियां तोड़ते हैं और आम जनता को धोखा देते रहते हैं।(ऐसा कुछ मिशन संप्रदाय के लोग अपने आश्रमों में करते है)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने आहार (भोजन), यज्ञ (धार्मिक अनुष्ठान), तप (आध्यात्मिक साधना) और दान (दान-पुण्य) के भेद को तीन प्रकार में विभाजित किया है।
आहार का त्रैविध्य: भोजन (आहार) सभी के लिए तीन प्रकार का होता है, जो उनकी मानसिकता और स्वभाव के अनुसार भिन्न होता है। यही बात अन्य धार्मिक क्रियाओं पर भी लागू होती है।
यज्ञ, तप और दान: यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। इनकी प्रवृत्ति और गुणवत्ता भिन्न-भिन्न होती है, और यह इस पर निर्भर करता है कि ये किस श्रद्धा और मनोवृत्ति से किए जाते हैं।
सार यह है कि
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में समझाते हैं कि आहार, यज्ञ, तप और दान सभी में तीन प्रकार की विभाजन की जाती है। इसका मतलब है कि ये सभी गतिविधियाँ और उनके परिणाम व्यक्ति की स्वभाविक प्रकृति और श्रद्धा के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि धार्मिक और आध्यात्मिक क्रियाएँ केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी गहराई और प्रभाव व्यक्ति की आंतरिक श्रद्धा और स्वभाव पर निर्भर करते हैं।
17॥7॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 8
श्लोक:
आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥
भावार्थ:
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले (जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं।) तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय- ऐसे आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।
इस श्लोक में सात्त्विक आहार के गुणों का वर्णन किया गया है। यहाँ 'सात्त्विक' शब्द का तात्पर्य उन आहारों से है जो सत्त्वगुण से युक्त होते हैं।
आयुः, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति: सात्त्विक आहार उन चीज़ों से भरा होता है जो जीवनकाल (आयु), मानसिक शांति (सत्त्व), शारीरिक बल (बल), स्वस्थता (आरोग्य), सुख, और आनंद (प्रीति) को बढ़ाते हैं।
रस्याः: ये आहार स्वादिष्ट होते हैं, जिससे खाने वाला आनंदित महसूस करता है।
स्थिरा: ये आहार शरीर में लंबे समय तक रहते हैं और जल्दी पचते नहीं हैं, जिससे स्थिरता और निरंतरता मिलती है।
हृद्या: इनका सेवन मन और दिल को अच्छा लगता है, जिससे मानसिक शांति और खुशी प्राप्त होती है।
इस श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि सात्त्विक लोग उन आहारों को पसंद करते हैं जो उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ, आनंदित, और संतुष्ट रखते हैं। ये आहार न केवल शरीर की जरूरतों को पूरा करते हैं बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी बढ़ाते हैं।
17॥8॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं
कड़वे, खट्टे, नमकीन, अत्यंत गर्म, तीखे, सूखे, और दाहकारक (जलन पैदा करने वाले) आहार राजसी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन के सेवन से शरीर और मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है; यह दुःख, चिंता, और रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है।
राजसी आहार आमतौर पर अधिक तामसिक गुणों से भरपूर होते हैं और इनके सेवन से मन में अशांति और असंतोष पैदा होता है। इस प्रकार का आहार व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक अस्वस्थता की ओर ले जाता है, और इसके परिणामस्वरूप जीवन में कठिनाइयाँ और दुख बढ़ जाते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से यह संकेत मिलता है कि हमारे आहार का हमारी मानसिक और शारीरिक स्थिति पर बड़ा प्रभाव होता है। इसलिए, एक सजग व्यक्ति को इस प्रकार के आहार से दूर रहना चाहिए और ऐसा आहार लेना चाहिए जो स्वास्थ्य और संतुलन को बनाए रखने में सहायक हो।
17।।9।।
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 10
श्लोक:
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥
भावार्थ:
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने तामस गुण के अंतर्गत आने वाले भोजन की विशेषताओं का वर्णन किया है।
यातयामं - इसका अर्थ है जो भोजन अधपका या अध्यधिक गरम हो, अर्थात् जो सही से पकाया न गया हो।
गतरसं - इसका अर्थ है जो भोजन स्वादहीन हो गया हो।
पूति - इसका मतलब है जो भोजन दुर्गंधयुक्त या बदबूदार हो गया हो।
पर्युषितं - इस शब्द का तात्पर्य है जो भोजन बासी हो, यानि जो समय के साथ खराब हो गया हो।
उच्छिष्टमपि - इसका अर्थ है जो भोजन उच्छिष्ट हो, यानी जिसे पहले खा लिया गया हो और अब वह बचे हुए टुकड़े या अवशेष हों।
चामेध्यं - इसका मतलब है जो भोजन अपवित्र या अशुद्ध हो।
इन सभी गुणों वाले भोजन को तामसिक माना जाता है। इस प्रकार का भोजन तामसिक प्रकृति वाले व्यक्तियों को प्रिय होता है, जो जीवन में नकारात्मकता और आलस्य को पसंद करते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से, श्री कृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि तामसिक भोजन शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है और इसे त्यागने की सलाह दी गई है।
17॥10॥
अध्याय 17श्लोक 11
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदिष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात्त्विक:
*अनुवाद:*
यज्ञों में वही यज्ञ सात्त्विक होता है, जो शास्त्र के निर्देशानुसार कर्तव्य समझ कर उन लोगों के द्वारा किया जाता है, जो फल की इच्छा नहीं करते।
*तात्पर्य:*
सामान्यतया यज्ञ किसी प्रयोजन से किया जाता है। लेकिन यहाँ पर बताया गया है कि यज्ञ बिना किसी इच्छा के सम्पन्न किया जाना चाहिए। इसे कर्तव्य समझ कर किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ, मन्दिरों या गिरजाघरों में मनाये जाने वाले अनुष्ठान सामान्यतया भौतिक लाभ को दृष्टि में रख कर किये जाते हैं, लेकिन यह सतोगुण में नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि वह कर्तव्य मानकर मन्दिर या गिरजाघर में जाए, भगवान् को नमस्कार करे और फूल तथा प्रसाद चढ़ाए। प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि केवल ईश्वर की पूजा करने के लिए मन्दिर जाना व्यर्थ है। लेकिन शास्त्रों में आर्थिक लाभ के लिए पूजा करने का आदेश नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि केवल अर्चाविग्रह को नमस्कार करने जाए। इससे मनुष्य सतोगुण को प्राप्त होगा। प्रत्येक सभ्य नागरिक का कर्तव्य है कि वह शास्त्रों के आदेशों का पालन करे और भगवान् को नमस्कार करे।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि सात्त्विक यज्ञ वह है, जो शास्त्रों के अनुसार विधिपूर्वक किया जाता है, और इसमें फल की इच्छा नहीं होती।
श्लोक के अनुसार, जो यज्ञ शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट विधि से किया जाता है, और जिसके करने वाले व्यक्ति को कोई फल या पुरस्कार की कामना नहीं होती, वह यज्ञ सात्त्विक (शुद्ध और पुण्यकारी) होता है। ऐसे यज्ञ में मन को पूरी तरह से शांत करके, केवल कर्तव्य समझकर और निष्काम भाव से किया जाता है। यहाँ "अफलाकाङ्क्षी" का मतलब है, "फल की इच्छा न रखने वाला", और "विधिदृष्टो" का मतलब है, "शास्त्रों के अनुसार किया गया"।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि सात्त्विक यज्ञ के लिए न तो किसी प्रकार की स्वार्थ की भावना होनी चाहिए, और न ही इसका उद्देश्य किसी लाभ या पुरस्कार को प्राप्त करना होना चाहिए। यह यज्ञ केवल कर्तव्य और धार्मिकता के भाव से किया जाता है, जिससे आत्मा की पवित्रता और शुद्धता बढ़ती है।
यज्ञों में वही यज्ञ सात्त्विक होता है, जो शास्त्र के निर्देशानुसार कर्तव्य समझ कर उन लोगों के द्वारा किया जाता है, जो फल की इच्छा नहीं करते।
सामान्यतया ऐसा यज्ञ किसी प्रयोजन से किया जाता है। लेकिन यहाँ पर बताया गया है कि यज्ञ बिना किसी इच्छा के सम्पन्न किया जाना चाहिए। इसे कर्तव्य समझ कर किया जाना चाहिए।
उदाहरणार्थ, मन्दिरों या गिरजाघरों में मनाये जाने वाले अनुष्ठान सामान्यतया भौतिक लाभ को दृष्टि में रख कर किये जाते हैं, लेकिन यह सतोगुण में नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि वह कर्तव्य मानकर मन्दिर या गिरजाघर में जाए, भगवान् को नमस्कार करे और फूल तथा प्रसादं चढ़ाए। प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि केवल ईश्वर की पूजा करने के लिए मन्दिर जाना व्यर्थ है। लेकिन शास्त्रों में आर्थिक लाभ के लिए पूजा करने का आदेश नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि केवल अर्चाविग्रह को नमस्कार करने जाए। इससे मनुष्य सतोगुण को प्राप्त होगा। प्रत्येक सभ्य नागरिक का कर्तव्य है कि वह शास्त्रों के आदेशों का पालन करे और भगवान् को नमस्कार करे।
17॥ 11 ॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 12
श्लोक:
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥
भावार्थ:
परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान
ऐसे यज्ञ स्वर्ग प्राप्ति हेतु किए जाते है:
कभी-कभी स्वर्गलोक पहुँचने या किसी भौतिक लाभ के लिए जिस यज्ञ या अनुष्ठान को किया जाता है। ऐसे यज्ञ या अनुष्ठान को राजसी माना जाता है ।
17॥12॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 13
श्लोक:
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥
भावार्थ:
शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।
जो यज्ञ शास्त्र के निर्देशों की अवहेलना करके, प्रसाद वितरण किये बिना, वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किये बिना, पुरोहितों को दक्षिणा दिये बिना तथा श्रद्धा के बिना सम्पन्न किया जाता है, वह तामसी माना जाता है।
तमोगुण में श्रद्धा वास्तव में अश्रद्धा है। कभी-कभी लोग किसी देवता की पूजा धन अर्जित करने के लिए करते हैं और फिर वे इस धन को शास्त्र के निर्देशों की अवहेलना करके मनोरंजन में व्यय करते हैं। ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों को सात्त्विक नहीं माना जाता। ये तामसी होते हैं। इनसे तामसी प्रवृत्ति उत्पन्न होती है और मानव समाज को कोई लाभ नहीं पहुँचता।
17॥13॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 14
श्लोक:
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
भावार्थ:
देवता, ब्राह्मण, गुरु
(यहाँ 'गुरु' शब्द से माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिए।)
और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा- यह शरीर- सम्बन्धी तप कहा जाता है,
जैसे किसी बुजुर्ग को नहलाना पीठ जहां उस का हाथ ना पहुंच पाए ,साबुन लगा देना,किसी को बोझा उठाने में मदद करना,गाड़ी खराब हो जाने पर धक्का लगवाना।ऐसी क्रियाओं को ही शरीर- सम्बन्धी तप कहा जाता है,
और यहाँ पर भगवान् तपस्या के भेद बताते हैं। सर्वप्रथम वे शारीरिक तपस्या का वर्णन करते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह ईश्वर या देवों, योग्य ब्राह्मणों, गुरु तथा माता-पिता जैसे गुरुजनों या वैदिक ज्ञान में पारंगत व्यक्ति को प्रणाम करे या प्रणाम करना सीखे। इन सबका समुचित आदर करना चाहिए। उसे चाहिए कि आंतरिक तथा बाह्य रूप में अपने को शुद्ध करने का अभ्यास करे और आचरण में सरल बनना सीखे। वह कोई ऐसा कार्य न करे, जो शास्त्र सम्मत न हो। वह वैवाहिक जीवन के अतिरिक्त मैथुन में रत न हो, क्योंकि शास्त्रों में केवल विवाह में ही मैथुन की अनुमति है, अन्यथा नहीं। यह ब्रह्मचर्य कहलाता है। ये सब शारीरिक तपस्याएँ हैं।
17॥14॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 15
श्लोक:
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
भावार्थ:
जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है
(मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम 'यथार्थ भाषण' है।)
तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है।
वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
वाणी ऐसी बोलिए मन का आपा ना खोए, "भगत कबीर"
यह एक प्रसिद्ध हिंदी दोहा है जो हमें यह सिखाता है कि हमें अपनी वाणी का तप रूपी उपयोग कैसे करना चाहिए?
इस दोहे का अर्थ यह है कि हमें ऐसी बातें बोलनी चाहिए जो दूसरों को अच्छी लगें और जो सच्ची भी हो और हमारे और दूसरे के मन को भी शांत रखें। हमें अपनी बातों में भाव, अर्थ और व्याख्या का ध्यान रखना चाहिए ताकि हम दूसरों को सही तरीके से समझा सकें और हमारे शब्दों का प्रभाव भी अच्छा ही हो।
यह दोहा हमें यह भी सिखाता है कि हमें अपनि वाणी के शब्दों का चयन सावधानी से करना चाहिए ताकि हम दूसरों को ठेस न पहुँचाएं और हमारे शब्दों से किसी को भी दुख न पहुंचे।
इस को वाणी का तप कहते है।
अर्थात: सच्चे, भाने वाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करने वाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित पारायण करना यही वाणी की तपस्या है।
तात्पर्य : मनुष्य को ऐसा नहीं बोलना चाहिए कि दूसरों के मन क्षुब्ध हो जाएँ। निस्सन्देह जब शिक्षक बोले तो वह अपने विद्यार्थियों को उपदेश देने के लिए सत्य बोल सकता है, लेकिन उसी शिक्षक को चाहिए कि यदि वह उनसे बोले जो उसके विद्यार्थी नहीं हैं, तो उनके मन को क्षुब्ध करने वाला सत्य न बोले। यही वाणी की तपस्या है। इसके अतिरिक्त प्रलाप (व्यर्थ की वार्ता) नहीं करना चाहिए। आध्यात्मिक क्षेत्रों में बोलने की विधि यह है कि जो भी कहा जाय, वह शास्त्र सम्मत हो। उसे तुरन्त ही अपने कथन की पुष्टि के लिए शास्त्रों का प्रमाण देना चाहिए। इसके साथ- साथ वह बात सुनने में अति प्रिय लगनी चाहिए। ऐसी विवेचना से मनुष्य को सर्वोच्च लाभ और मानव समाज का उत्थान हो सकता है। वैदिक साहित्य का विपुल भण्डार है और इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। यही वाणी की तपस्या कही जाती है।
17॥15॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 16
श्लोक:
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
भावार्थ:
मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भली भाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है
मन सम्बन्धी तप को "मानसिक तप" या "मानसिक तपस्या" कहा जाता है। यह एक प्रकार की आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने मन को शुद्ध, मजबूत और एकाग्र करने का प्रयास करता है।
मानसिक तप के कुछ उदाहरण हैं:
- ध्यान और ज्ञान
- आत्म-विचार और आत्म-मूल्यांकन
- मन की शुद्धि और एकाग्रता के लिए प्रयास करना
- अपने विचारों और भावनाओं को नियंत्रित करना
- आध्यात्मिक पुस्तकों और शास्त्रों का अध्ययन करना
मानसिक तप का उद्देश्य है अपने मन को शुद्ध और मजबूत बनाना, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में अधिक स्थिरता, शांति और आनंद प्राप्त कर सके।
भगवद गीता के 17वें अध्याय के 16वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने मन सम्बन्धी तप के बारे में बताया है।
इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भली भाँति पवित्रता ही मन सम्बन्धी तप है।
यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं:
- मन की प्रसन्नता: मन को प्रसन्न और शांत रखना ही मन सम्बन्धी तप का पहला चरण है।
- शान्तभाव: शान्तभाव से मन को शांत और एकाग्र रखना होता है।
- भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव: भगवान के बारे में सोचते रहना और उनकी शरण में रहना ही मन सम्बन्धी तप का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- मन का निग्रह: मन को नियंत्रित करना और उसके विचारों को एकाग्र रखना ही मन सम्बन्धी तप का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- अन्तःकरण के भावों की पवित्रता: अन्तःकरण के भावों को पवित्र और शुद्ध रखना ही मन सम्बन्धी तप का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि मन सम्बन्धी तप क्या है और इसके महत्वपूर्ण पहलू क्या हैं।
तथा संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि-ये मन की तपस्याएँ हैं।
❤️यह भगवद गीता के 17वें अध्याय का एक अन्य महत्वपूर्ण श्लोक है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने मन की तपस्याओं के बारे में बताया है।
इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम और जीवन की शुद्धि ये सभी मन की तपस्याएँ हैं।
यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं:
- संतोष: संतोष का अर्थ है अपने जीवन में जो कुछ भी है, उसमें संतुष्ट रहना।
- सरलता: सरलता का अर्थ है अपने जीवन में सच्चाई और ईमानदारी का पालन करना।
- गम्भीरता: गम्भीरता का अर्थ है अपने जीवन में गहराई और स्थिरता का पालन करना।
- आत्म-संयम: आत्म-संयम का अर्थ है अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करना।
- जीवन की शुद्धि: जीवन की शुद्धि का अर्थ है अपने जीवन में पवित्रता और शुद्धता का पालन करना।
मन को संयमित बनाने का अर्थ है, उसे इन्द्रियतृप्ति से विलग करना। उसे इस तरह प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जिससे वह सदैव परोपकार के विषय में सोचे। मन के लिए सर्वोत्तम प्रशिक्षण विचारों की श्रेष्ठता है। मनुष्य को कृष्णभावनामृत से विचलित नहीं होना चाहिए और इन्द्रियभोग से सदैव बचना चाहिए। अपने स्वभाव को शुद्ध बनाना कृष्ण भावना भावित होना है। इन्द्रियभोग के विचारों से मन को अलग रख करके ही मन की तुष्टि प्राप्त की जा सकती है। हम इन्द्रियभोग के बारे में जितना सोचते हैं, उतना ही मन अतृप्त होता जाता है। इस वर्तमान युग में हम मन को व्यर्थ ही अनेक प्रकार के इन्द्रियतृप्ति के साधनों में लगाये रखते हैं, जिससे मन संतुष्ट नहीं हो पाता। अतएव सर्वश्रेष्ठ विधि यही है कि मन को वैदिक साहित्य की ओर मोड़ा जाय, क्योंकि यह संतोष प्रदान करने वाली कहानियों से भरा है - यथा पुराण तथा महाभारत। कोई भी इस ज्ञान का लाभ उठा कर शुद्ध हो सकता है। मन को छल-कपट से मुक्त होना चाहिए और मनुष्य को सबके कल्याण (हित) के विषय में सोचना चाहिए। मौन (गम्भीरता) का अर्थ है कि मनुष्य निरन्तर आत्मसाक्षात्कार के विषय में सोचता रहे। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पूर्ण मौन इस दृष्टि से धारण किये रहता है। मन निग्रह का अर्थ है-मन को इन्द्रियभोग से पृथक् करना। मनुष्य को अपने व्यवहार में निष्कपट होना चाहिए और इस तरह उसे अपने जीवन (भाव) को शुद्ध बनाना चाहिए। ये सब गुण मन की तपस्या के अन्तर्गत आते हैं।
17॥16॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 17
श्लोक:
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥
भावार्थ:
फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण तपस्या के विभिन्न प्रकारों पर प्रकाश डालते हैं। यहाँ पर बताया गया है कि जो तप पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा और भक्ति से किया जाता है, और जिसमें फल की इच्छा नहीं होती, वही तप सात्त्विक होता है।
श्रद्धया परया तप्तं: यहाँ 'श्रद्धया परया' का मतलब है परम श्रद्धा और भक्ति के साथ। जब तप को पूर्ण निष्ठा और ईश्वर की आराधना से किया जाता है, तब वह सात्त्विक तप कहलाता है।
सात्त्विक तप के तीन मुख्य पहलू हैं:
1. श्रद्धा: परम श्रद्धा और भक्ति के साथ तप करना।
2. निष्ठा: पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ तप करना।
3. आराधना: ईश्वर की आराधना और पूजा करना।
इन तीनों पहलुओं को मिलाकर सात्त्विक तप किया जा सकता है, जो व्यक्ति को आत्म-साक्षरता और आत्म-नियंत्रण की ओर ले जाता है।
'अफलाकाङ्क्षिभिः' का मतलब है जो लोग तप करते समय किसी प्रकार के परिणाम या फल की आकांक्षा नहीं रखते, वे लोग इस तप को करते हैं। यहाँ 'अफलाकाङ्क्षी' का मतलब है फल की इच्छा न रखने वाला।
सात्त्विकं परिचक्षते: अंत में, यह स्पष्ट किया गया है कि ऐसा तप, जिसमें परम श्रद्धा और भक्ति के साथ फल की इच्छा नहीं होती, वह तप सात्त्विक होता है।
यह श्लोक बताता है कि तप की गुणवत्ता उसकी श्रद्धा और भक्ति पर निर्भर करती है। जब तप को शुद्ध भाव से, बिना किसी स्वार्थ या फल की इच्छा के किया जाता है, तब वह सात्त्विक तप कहलाता है।
इस प्रकार, श्रीकृष्ण ने तपस्या के महत्व और उसकी वास्तविकता को स्पष्ट किया है, जो कि भक्तिपूर्वक और निःस्वार्थ भाव से की जाती है।
17॥17॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 18
श्लोक:
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥
भावार्थ:
जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित
(अनिश्चित फलवाला' उसको कहते हैं कि जिसका फल होने न होने में शंका हो।)
एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है
जो तपस्या दंभपूर्वक तथा सम्मान, सत्कार एवं पूजा कराने के लिए सम्पन्न की जाती है, वह राजसी (रजोगुणी) कहलाती है। यह न तो स्थायी होती है न शाश्वत।
तात्पर्य : कभी-कभी तपस्या इसलिए की जाती है कि लोग आकर्षित हों तथा उनसे सत्कार, सम्मान तथा पूजा मिल सके। रजोगुणी लोग अपने अधीनस्थों से पूजा करवाते हैं और उनसे चरण धुलवाकर धन चढ़वाते हैं। तपस्या करने के बहाने ऐसे कृत्रिम आयोजन राजसी माने जाते हैं। इनके फल क्षणिक होते हैं, वे कुछ समय तक रहते हैं। वे कभी स्थायी नहीं होते।
17॥18॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 19
श्लोक:
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥
भावार्थ:
जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है
(सिद्धि ,तंत्र ,मंत्र,यंत्र आदि से आज बहुत से विज्ञापन भी आते है ,वश्वीकरण करवालों , शत्रु का नाश करवालों सब तामस स्वरूप हैं )
जो तपस्या दंभपूर्वक तथा सम्मान, सत्कार एवं पूजा कराने के लिए सम्पन्न की जाती है, वह राजसी (रजोगुणी) कहलाती है। यह न तो स्थायी होती है न शाश्वत।
तात्पर्य : कभी-कभी तपस्या इसलिए की जाती है कि लोग आकर्षित हों तथा उनसे सत्कार, सम्मान तथा पूजा मिल सके। रजोगुणी लोग अपने अधीनस्थों से पूजा करवाते हैं और उनसे चरण धुलवाकर धन चढ़वाते हैं। तपस्या करने के बहाने ऐसे कृत्रिम आयोजन राजसी माने जाते हैं। इनके फल क्षणिक होते हैं, वे कुछ समय तक रहते हैं। वे कभी स्थायी नहीं होते।
और जो मूर्खतावश आत्म-उत्पीड़न के लिए या अन्यों को विनष्ट करने या हानि पहुँचाने के लिए जो तपस्या की जाती है, वह तामसी कहलाती है।
तात्पर्य : मूर्खतापूर्ण तपस्या के ऐसे अनेक दृष्टान्त हैं, जैसे कि हिरण्यकशिपु जैसे असुरों ने अमर बनने तथा देवताओं का वध करने के लिए कठिन तप किए। उसने ब्रह्मा से ऐसी ही वस्तुएँ माँगी थीं, लेकिन अन्त में वह भगवान् द्वारा मारा गया। किसी असम्भव वस्तु के लिए तपस्या करना निश्चय ही तामसी तपस्या है।
17॥19॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 20
श्लोक:
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
भावार्थ:
दान देना ही कर्तव्य है- ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल
(जिसप्रकार देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो, वही देश-काल, उस वस्तु द्वारा प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य समझा जाता है।)
और पात्र के
(भूखे, अनाथ, दुःखी, रोगी और असमर्थ तथा भिक्षुक आदि तो अन्न, वस्त्र और ओषधि एवं जिस वस्तु का जिसके पास अभाव हो, उस वस्तु द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं और श्रेष्ठ आचरणों वाले विद्वान् ब्राह्मणजन धनादि सब प्रकार के पदार्थों द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं।)
प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।
वैदिक साहित्य में ऐसे व्यक्ति को दान देने की संस्तुति है, जो आध्यात्मिक कार्यों में लगा हो। अविचारपूर्ण ढंग से दान देने की संस्तुति नहीं है। आध्यात्मिक सिद्धि को सदैव ध्यान में रखा जाता है। अतएव किसी तीर्थ स्थान में, सूर्य या चन्द्रग्रहण के समय, मासान्त में या योग्य ब्राह्मण अथवा वैष्णव (भक्त) को, या मन्दिर में दान देने की संस्तुति है। बदले में किसी प्रकार की प्राप्ति की अभिलाषा न रखते हुए ऐसे दान किये जाने चाहिए। कभी-कभी निर्धन को दान करुणावश दिया जाता है। लेकिन यदि निर्धन दान देने योग्य (पात्र) नहीं होता, तो उससे आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती। दूसरे शब्दों में, वैदिक साहित्य में अविचारपूर्ण दान की संस्तुति नहीं है।
(प्रायः देखा जाता है कुछ लोग दान लेते हुए मीन मेख़ बहुत निकालते हैं।ऐसा अक्सर हम अपने आस पास और तीर्थ यात्रा पर देखने को मिलजाता है जो दान की संस्तुति नहीं है )
दान देने और लेने में किसी भी प्रकार का घमंड नहीं आना चाहिये।
यदि ऐसा कोई ब्राह्मण करे तो उसे 500₹ के दान को ना देते हुए ब्राह्मण के या किसी और के बच्चे को 50₹ दान में दे और देखे वह कैसे प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करता है।
नोट:
दान चाहे लाखों का करे जब तक दक्षिणा नहीं देते तब तक दान नहीं लगता।
अनुपकारिणे दान: दान करने का उद्देश्य केवल दूसरों की सेवा करना और उन्हें लाभ पहुँचाना होना चाहिए, न कि किसी प्रकार के बदले की आशा करना।
इस प्रकार, दान की सात्त्विकता उस समय, स्थान और पात्र के अनुसार तय की जाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दान सही मायने में प्रभावशाली और उपयोगी हो सके।
अब अगले श्लोक में
किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक
(जैसे प्रायः वर्तमान समय के चन्दे-चिट्ठे आदि में धन दिया जाता है।)
तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में
(अर्थात् मान बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए अथवा रोगादि की निवृत्ति के लिए।)
रखकर फिर दिया जाता है, वह दान क्या कहा जाता है।
17॥20॥
अध्याय 17श्लोक: 21
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुन: ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्
17॥ 21 ॥
किन्तु जो दान प्रत्युपकार की भावना से या कर्म फल की इच्छा से या अनिच्छापूर्वक किया जाता है, वह रजोगुणी (राजस) कहलाता है।
*तात्पर्य:*
दान कभी स्वर्ग जाने के लिए दिया जाता है, तो कभी अत्यन्त कष्ट से तथा कभी इस पश्चात्ताप के साथ कि “मैंने इतना व्यय इस तरह क्यों किया?” कभी-कभी अपने वरिष्ठजनों के दबाव में आकर भी दान दिया जाता है। ऐसे दान रजोगुण में दिये गये माने जाते हैं।
ऐसे अनेक दातव्य न्यास हैं, जो उन संस्थाओं को दान देते हैं, जहाँ इन्द्रियभोग का बाजार गर्म रहता है। वैदिक शास्त्र ऐसे दान की संस्तुति नहीं करते। केवल सात्त्विक दान की संस्तुति की गई है।
किन्तु जो दान प्रत्युपकार की भावना से या कर्म फल की इच्छा से या अनिच्छापूर्वक किया जाता है, वह रजोगुणी (राजस) कहलाता है।
तात्पर्य : दान कभी स्वर्ग जाने के लिए दिया जाता है, तो कभी अत्यन्त कष्ट से तथा कभी इस पश्चात्ताप के साथ कि "मैंने इतना व्यय इस तरह क्यों किया?" कभी-कभी अपने वरिष्ठजनों के दबाव में आकर भी दान दिया जाता है। ऐसे दान रजोगुण में दिये गये माने जाते हैं।
ऐसे अनेक दातव्य न्यास हैं, जो उन संस्थाओं को दान देते हैं, जहाँ इन्द्रियभोग का बाजार गर्म रहता है। वैदिक शास्त्र ऐसे दान की संस्तुति नहीं करते। केवल सात्त्विक दान की संस्तुति(recommendation)
की गई है।
17॥ 21 ॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 22
श्लोक:
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥
भावार्थ:
जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है
17॥22॥
तथा जो दान किसी अपवित्र स्थान में, अनुचित समय में, किसी अयोग्य व्यक्ति को या बिना समुचित ध्यान तथा आदर से दिया जाता है, वह तामसी कहलाता है।
तात्पर्य : यहाँ पर मद्यपान तथा द्यूतक्रीड़ा में व्यसनी के लिए दान देने को प्रोत्साहन नहीं दिया गया। ऐसा दान तामसी है। ऐसा दान लाभदायक नहीं होता, वरन् इससे पापी पुरुषों को प्रोत्साहन मिलता है। इसी प्रकार, यदि बिना सम्मान तथा ध्यान दिये किसी उपयुक्त व्यक्ति को दान दिया जाय, तो वह भी तामसी है।
नोट:✍️जुआ खाने, शराब के,ठेके, वैश्या के कोठे पर मनुष्य जब श्री विष्णु पत्नी लक्ष्मी जी को के कर चला जाता है।तो अपनी लक्ष्मी (पत्नी) को क्यों नहीं लेके जाता ऐसी जगह?
17॥22॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 23
श्लोक:
(ॐ तत्सत् के प्रयोग की व्याख्या) ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥
भावार्थ:
ॐ, तत्, सत्-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गए
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने ‘ॐ तत्सत्’ के प्रयोग की व्याख्या की है। यहां पर 'ॐ', 'तत्' और 'सत्' तीन प्रमुख शब्दों के रूप में ब्रह्मा, सच्चिदानंद और अस्तित्व की विशिष्टता को दर्शाया गया है।
(✍️नोट हर मंत्र ॐ से शुरू होता है।जिस के प्रयोग के नियम होते है।राम नाम ही ऐसा मंत्र हे जिस को आप बिना किसी नियम के जप सकते है।उल्टा सीधा जैसे भी जो लाभ कारी ही होता है।)
ॐ - यह ब्रह्मा के सर्वसमर्थ और आदिपरमात्मा स्वरूप को सूचित करता है। यह उच्चतम ब्रह्म का प्रतीक है, जो अनंत और अपरिवर्तनीय है।
तत् - यह ब्रह्मा के अद्वितीयता और एकात्मकता को दर्शाता है, अर्थात् यह संपूर्ण ब्रह्म के संदर्भ में होता है।
सत् - यह ब्रह्मा के सत्यता और अस्तित्व का प्रमाण है। यह ब्रह्म के स्थिर और शाश्वत स्वरूप को इंगित करता है।
पहले के वेदों और यज्ञों के प्रयोग में इसी ‘ॐ तत्सत्’ का प्राय: प्रयोग किया जाता था। इसका तात्पर्य यह है कि वेद और यज्ञों के संकल्प और कार्य वही सच्चिदानंदघन ब्रह्म के प्रति समर्पित होते हैं। जब इन कार्यों में ‘ॐ तत्सत्’ का प्रयोग होता है, तो यह संकेत करता है कि वे कार्य ब्रह्म के प्रति पूर्ण श्रद्धा और आदर से किए जा रहे हैं।
यह बताया जा चुका है कि तपस्या, यज्ञ, दान तथा भोजन के तीन-तीन भेद हैं- सात्त्विक, राजस तथा तामस । लेकिन चाहे ये उत्तम हों, मध्यम हों या निम्न हों, ये सभी बद्ध तथा भौतिक गुणों से कलुषित हैं। किन्तु जब ये ब्रह्म - ॐ तत् सत् को लक्ष्य करके किये जाते हैं तो आध्यात्मिक उन्नति के साधन बन जाते हैं। शास्त्रों में ऐसे लक्ष्य का संकेत हुआ है। ॐ तत् सत् ये तीन शब्द विशेष रूप में परम सत्य भगवान् के सूचक हैं। वैदिक मन्त्रों में ॐ शब्द सदैव रहता है।
जो व्यक्ति शास्त्रों के विधानों के अनुसार कर्म नहीं करता, उसे परब्रह्म की प्राप्ति नहीं होती। भले ही उसे क्षणिक फल प्राप्त हो जाये, लेकिन उसे चरमगति प्राप्त नहीं हो पाती । तात्पर्य यह है कि दान, यज्ञ तथा तप को सतोगुण में रहकर करना चाहिए। रजो या तमोगुण में सम्पन्न करने पर ये निश्चित रूप से निम्न कोटि के होते हैं। ॐ तत् सत् शब्दों का उच्चारण परमेश्वर के पवित्र नाम के साथ किया जाता है, उदाहरणार्थ, ॐ तद्विष्णोः। जब भी किसी वैदिक मंत्र का या परमेश्वर का नाम लिया जाता है, तो उसके साथ ॐ जोड़ दिया जाता है। यह वैदिक साहित्य का सूचक है। ये तीन शब्द वैदिक मंत्रों से लिए जाते हैं। ॐ इत्येतद्ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम (ऋग्वेद) प्रथम लक्ष्य का सूचक है। फिर तत् त्वमसि (छान्दोग्य उपनिषद ६.८.७) दूसरे लक्ष्य का सूचक है। तथा सद् एव सौम्य (छान्दोग्य उपनिषद ६.२.१) तृतीय लक्ष्य का सूचक है। ये तीनों मिलकर ॐ तत् सत् हो जाते हैं। आदिकाल में जब प्रथम जीवात्मा ब्रह्मा ने यज्ञ किये, तो उन्होंने इन तीनों शब्दों के द्वारा भगवान् को लक्षित किया था। अतएव गुरु परम्परा द्वारा उसी सिद्धान्त का पालन किया जाता रहा है। अतः इस मन्त्र का अत्यधिक महत्त्व है। अतएव भगवद्गीता के अनुसार कोई भी कार्य ॐ तत् सत् के लिए, अर्थात् भगवान् के लिए किया जाना चाहिए। जब कोई इन तीनों शब्दों के द्वारा तप, दान तथा यज्ञ सम्पन्न करता है, तो वह कृष्णभावनामृत में कार्य करता है। कृष्णभावनामृत दिव्य कार्यों का वैज्ञानिक कार्यान्वयन है, जिससे मनुष्य भगवद्धाम वापस जा सके। ऐसी दिव्य विधि से कर्म करने में शक्ति का क्षय नहीं होता।अतः इस श्लोक का तात्पर्य है कि वेदों, यज्ञों और अन्य धार्मिक क्रियाओं में ‘ॐ तत्सत्’ का प्रयोग ब्रह्मा के तत्त्व की पुष्टि करता है और यह सभी कार्य ब्रह्म के प्रति समर्पित और आदरपूर्ण होते हैं।
17॥23॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 24
श्लोक:
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥
भावार्थ:
इसलिए वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं
✍️नोट यहां ध्यान रहे गीता खुद ही शास्त्र है
17॥24॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 25
श्लोक:
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥
भावार्थ:
तत् अर्थात् 'तत्' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है- इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं
ॐ तद् विष्णोः परमं पदम् (ऋग्वेद १.२२.२०)। विष्णु के चरणकमल परम भक्ति के आश्रय हैं। भगवान् के लिए सम्पन्न हर एक क्रिया सारे कार्यक्षेत्र की सिद्धि निश्चित कर देती है।
आध्यात्मिक पद तक उठने के लिए मनुष्य को चाहिए कि किसी लाभ के निमित्त कर्म न करे। सारे कार्य भगवान् के परम धाम वापस जाने के उद्देश्य से किये जायँ, जो चरम उपलब्धि है।
17॥25॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 26
श्लोक:
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥
भावार्थ:
'सत्'- इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्म में भी 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है
परम सत्य भक्तिमय यज्ञ का लक्ष्य है और उसे सत् शब्द से अभिहित किया जाता है। हे पृथापुत्र! ऐसे यज्ञ का सम्पन्नकर्ता भी 'सत्' कहलाता है, जिस प्रकार यज्ञ, तप तथा दान के सारे कर्म भी, जो परमपुरुष को प्रसन्न करने के लिए सम्पन्न किये जाते हैं, 'सत्' हैं।
प्रशस्ते कर्मणि अर्थात् "नियत कर्तव्य" सूचित करते हैं कि वैदिक साहित्य में ऐसी कई क्रियाएँ निर्धारित हैं, जो गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक संस्कार के रूप में हैं। ऐसे संस्कार जीव की चरम मुक्ति के लिए होते हैं। ऐसी सारी क्रियाओं के समय ॐ तत् सत् उच्चारण करने की संस्तुति की जाती है। सद्भाव तथा साधुभाव आध्यात्मिक स्थिति के सूचक हैं। कृष्णभावनामृत में कर्म करना सत् है और जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत के कार्यों के प्रति सचेष्ट रहता है, वह साधु कहलाता है।
श्रीमद्भागवत में (३.२५.२५) कहा गया है कि भक्तों की संगति से आध्यात्मिक विषय स्पष्ट हो जाता है। इसके लिए सतां प्रसङ्गात् शब्द व्यवहृत हुए हैं। बिना सत्संग के दिव्य ज्ञान उपलब्ध नहीं हो पाता। किसी को दीक्षित करते समय या यज्ञोपवीत धारण कराते समय ॐ तत् सत् शब्दों का उच्चारण किया जाता है। इसी प्रकार सभी प्रकार के यज्ञ करते समय ॐ तत् सत् या ब्रह्म ही चरम लक्ष्य होता है। तदर्थीयम् शब्द ब्रह्म का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी भी कार्य में सेवा करने का सूचक है, जिसमें भगवान् के मन्दिर में भोजन पकाना तथा सहायता करने जैसी सेवाएँ या भगवान् के यश का प्रसार करने वाला अन्य कोई भी कार्य सम्मिलित है। इस तरह ॐ तत् सत् शब्द समस्त कार्यों को पूरा करने के लिए कई प्रकार से प्रयुक्त किये जाते हैं।
17॥26॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 27
श्लोक:
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते॥
भावार्थ:
तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्' इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्-ऐसे कहा जाता है
17॥27॥
भगवद गीता अध्याय: 17
श्लोक 28
श्लोक:
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है- वह समस्त 'असत्'- इस प्रकार कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही
चाहे यज्ञ हो, दान हो या तप हो, बिना आध्यात्मिक लक्ष्य के व्यर्थ रहता है। अतएव इस श्लोक में यह घोषित किया गया है कि ऐसे कार्य कुत्सित हैं। प्रत्येक कार्य कृष्णभावनामृत में रहकर ब्रह्म के लिए किया जाना चाहिए। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में भगवान् में श्रद्धा की संस्तुति की गई है। ऐसी श्रद्धा तथा समुचित मार्गदर्शन के बिना कोई फल नहीं मिल सकता। समस्त वैदिक आदेशों के पालन का चरम लक्ष्य कृष्ण को जानना है। इस सिद्धान्त का पालन किये बिना कोई सफल नहीं हो सकता। इसीलिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग यही है कि मनुष्य प्रारम्भ से ही किसी प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन में कृष्णभावनामृत में कार्य करे। सब प्रकार से सफल होने का यही मार्ग है।
बद्ध अवस्था में लोग देवताओं, भूतों या कुबेर जैसे यक्षों की पूजा के प्रति आकृष्ट होते हैं। यद्यपि सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण से श्रेष्ठ है, लेकिन जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है, वह प्रकृति के इन तीनों गुणों को पार कर जाता है । यद्यपि क्रमिक उन्नति की विधि है, किन्तु शुद्ध भक्तों की संगति से यदि कोई कृष्णभावनामृत ग्रहण करता है, तो यह सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। इस अध्याय में इसी की संस्तुति की गई है। इस प्रकार से सफलता पाने के लिए उपयुक्त गुरु प्राप्त करके उसके निर्देशन में प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। तभी ब्रह्म में श्रद्धा हो सकती है। जब कालक्रम से यह श्रद्धा परिपक्व होती है, तो इसे ईश्वरप्रेम कहते हैं। यही प्रेम समस्त जीवों का चरम लक्ष्य है। अतएव मनुष्य को चाहिए कि सीधे कृष्णभावनामृत ग्रहण करे। इस सत्रहवें अध्याय का यही संदेश है। जैसा मैने समझा वैसा ही बता दिया।
17॥28॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय :
॥17॥