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बुधवार, 17 जनवरी 2024

दुलारी

#18april
#18jan 
दुलारी
अन्य नाम अम्बिका 

🎂जन्म 18 अप्रॅल, 1928
जन्म भूमि नागपुर, महाराष्ट्र
⚰️मृत्यु 18 जनवरी, 2013
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

अभिभावक विट्ठलराव गौतम डाकतार
पति/पत्नी जगन्नाथ भीखाजी जगताप
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में ‘रोटी’, 'शहनाई', ‘अलबेला’, 'पापी, ‘जीवन ज्योति’, देवदास, ‘आए दिन बहार के’, ‘पड़ोसन’, ‘आराधना’, ‘आया सावन झूम के’, ‘आन मिलो सजना’, ‘कारवां’, ‘सीता और गीता’, ‘हाथ की सफ़ाई’, ‘दीवार’, ‘प्रेम रोग’, ‘अगर तुम न होते’ आदि।
प्रसिद्धि अभिनेत्री
नागरिकता भारतीय
भारतीय सिनेमा की जानीमानी अभिनेत्री थीं। हिंदी सिनेमा में मां का ज़िक़्र होते ही दुर्गा खोटे, ललिता पवार, लीला चिटनिस, निरुपा रॉय, कामिनी कौशल और सुलोचना जैसी अभिनेत्रियों के चेहरे ज़हन में घूमने लगते हैं। इन तमाम अभिनेत्रियों की छवि भले ही फ़िल्मी मां की हो लेकिन हिंदी सिनेमा के सुनहरी दौर के दर्शक इस बात से वाक़िफ़ हैं कि इन सभी ने अपने कॅरियर की शुरुआत बतौर हिरोईन की थी और इनमें से कुछ का शुमार तो अपने दौर की कामयाब हिरोईनों में किया जाता था। इसी सूची में एक नाम है दुलारी का, जिन्हें आमतौर पर दर्शक एक सीधी-सादी और ग़रीब फ़िल्मी मां के तौर पर जानते हैं। दुलारी ने भी शुरुआती कुछ फ़िल्में बतौर हिरोईन और साईड हिरोईन की थीं और ‘आना मेरी जान मेरी जान संडे के संडे’ और ‘जवानी की रेल चली जाए’ जैसे ज़बर्दस्त हिट गीत भी दुलारी पर ही फ़िल्माए गए थे।
दुलारी जी के अनुसार, उनके पूर्वज पीढ़ियों पहले उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र से आकर नागपुर में बस गए थे। अपने माता-पिता की दुलारी जी पहली संतान थीं और घर में उनसे छोटे दो भाई थे। यूँ तो दुलारी जी का नाम अम्बिका रखा गया था, लेकिन घर में उन्हें सब राजदुलारी कहकर पुकारते थे जो आगे चलकर सिर्फ़ ‘दुलारी’ रह गया। उनके पिता विट्ठलराव गौतम डाकतार विभाग में नौकरी करते थे, लेकिन अभिनय का उन्हें इतना शौक़ था कि अभिनेत्री अरुणा ईरानी के नाना की नाटक कंपनी जब नागपुर आई तो नौकरी छोड़कर वे उस कंपनी के साथ मुंबई आ गए। ये सन 1930 के दशक के शुरू का समय था।नेशनल स्टूडियो’ को सोहराब मोदी की कंपनी ‘मिनर्वा मूवीटोन’ ने ख़रीदा तो उन्होंने दुलारी जी को 7 साल के लिए नौकरी पर रखना चाहा। लेकिन कांट्रेक्ट की कुछ शर्तें मंज़ूर न होने की वजह से दुलारी जी ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘हमारी बात’ में उन्होंने हीरो जयराज की छोटी बहन की भूमिका की तो ‘अमर पिक्चर्स’ की ‘आदाब अर्ज़’ में वे बतौर सहनायिका नज़र आयीं, जिसमें उनके हीरो गायक मुकेश थे। ये दोनों ही फ़िल्में साल 1943 में बनी थीं।
अगले क़रीब 35 सालों में दुलारी जी ‘जब प्यार किसी से होता है’, ‘मुझे जीने दो’ ‘अपने हुए पराए’ ‘आए दिन बहार के’, ‘अनुपमा’, ‘तीसरी क़सम’, ‘पड़ोसन’, ‘आराधना’, ‘आया सावन झूम के’, ‘चिराग़’, ‘इंतक़ाम’, ‘आन मिलो सजना’, ‘हीर रांझा’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘कारवां’, ‘लाल पत्थर’, ‘बेईमान’, ‘सीता और गीता’, ‘राजा रानी’, ‘अमीर ग़रीब’, ‘हाथ की सफ़ाई’, ‘दीवार’, ‘दो जासूस’, ‘आहुती’, ‘गंगा की सौगंध’, ‘बीवी ओ बीवी’, ‘नसीब’, ‘रॉकी’, ‘प्रेम रोग’, ‘अगर तुम न होते’ और धर्माधिकारी जैसी क़रीब 135 फ़िल्मों में छोटी-बड़ी चरित्र भूमिकाओं में नज़र आयीं। और फिर एक रोज़ उन्होंने ख़ामोशी से फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया।

दुलारी जी का कहना था, "बढ़ती उम्र के साथ बिगड़ती सेहत का असर मेरे काम पर भी पड़ने लगा था। साल 1989 में बनी फ़िल्म ‘सूर्या’ के एक सीन में मुझे 200 जूनियर आर्टिस्टों की भीड़ के साथ दौड़ना था। निर्देशक इस्माईल श्रॉफ़ के एक्शन कहते ही मैंने दौड़ना शुरू किया। लेकिन गठिया की बीमारी की वजह से मैं कुछ ही दूर जाकर गिर पड़ी। जूनियर आर्टिस्टों की भीड़ मेरे पीछे दौड़ी चली आ रही थी। अभिनेता सलीम ग़ौस ने, जो मेरे बेटे की भूमिका में थे, बहुत मुश्किल से मुझे कुचले जाने से बचाया, और इस प्रयास में उन्हें भी हल्की चोटें आयीं। ऐसे में मैंने रिटायरमेंट ले लेना ही बेहतर समझा। फिर कई साल बाद निर्देशक गुड्डू धनोवा के आग्रह पर उनकी फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ में एक भूमिका की। इस तरह साल 1997 में रिलीज़ हुई ‘ज़िद्दी’ मेरी आख़िरी फ़िल्म साबित हुई।"
दुलारी जी के पति का निधन साल 1972 में हुआ। उनकी इकलौती बेटी की शादी हो चुकी थी। अभिनय से सन्यास लेने के बाद कुछ समय तो वे मुंबई में अकेली रहीं। फिर साल 2002 में अपनी बेटी के पास इंदौर चली गयीं। उनके ससुराल पक्ष के कई क़रीबी रिश्तेदार और उनकी सबसे अच्छी सहेली अभिनेत्री पूर्णिमा मुंबई में रहते हैं, इसलिए अक्सर उनका मुंबई आना-जाना होता रहता था। दुलारी जी पिछले काफ़ी समय से अल्ज़ाईमर की बीमारी से पीड़ित थीं और महाराष्ट्र के ही किसी शहर में वृद्धाश्रम में रह रही थीं। 85 साल की दुलारी जी को दिसंबर 2012 के आख़िरी सप्ताह में पूना के एक अस्पताल में आई.सी.यू. में दाख़िल कराया गया था, जहां 18 जनवरी, 2013 की सुबह क़रीब 10 बजे उनका देहांत हो गया।

शनिवार, 17 जून 2023

कांति लाल अभिनेता और गायक

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  ꧁ *कांतिलाल छगनलाल पच्चीगर*
*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
*🎂जन्म18 अप्रैल*
*⚰️मृत्यु 17 जून*
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  ꧁।  *कांतिलाल छगनलाल पच्चीगर*


पुराने जमाने के गायक अभिनेता भाई कांतिलाल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

पुराने जमाने के गायक अभिनेता कांतिलाल का जन्म 18 अप्रैल 1907 में सूरत गुजरात मे हुआ था उनका असली नाम कांतिलाल छगनलाल पच्चीगर था उनके परिवार में सुनार का काम होता था कांतिलाल का झुकाव बचपन से ही संगीत की तरफ था जब वह स्कूल में पढ़ते थे तभी उन्होंने ओंकारनाथ से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी वह स्कूल में थिएटर में भाग लेते थे कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने बाद वह बम्बई गायक बनने के लिए आये

उनको पहला ब्रेक  1934 में फ़िल्म बुलबुल-ए-परिस्तान में अभिनेता के रूप में मिला इस फ़िल्म का निर्देशन धीरूभाई देसाई ने विष्णु सिनेटोन बैनर तले किया था इस फ़िल्म में कांतिलाल ने अभिनय के साथ साथ दो गाने भी गाये थे दुनिया एक मुसाफिरखाना है ऐ ख़ुदावंदे तल्लाह इन गानो के लिए संगीत दिया था किकुभाई याग्निक ने

1935 में रिलीज फ़िल्म प्रीत की रीत में उन्होंने अभिनय के साथ साथ 6 गाने भी गाये  
फ़िल्म प्रीत की रीत (1935) फ़िल्म पंजाब का सिंह (1936) फ़िल्म गुलबदन (1937)में उन्होंने संगीत भी दिया था

1937 में उन्होंने रंजीत मूवीटोन जॉइन कर लिया वहाँ उन्होंने 1941 तक काम किया इन चार वर्षों में उन्होंने रंजीत मूवीटोन के 16 फिल्मों में अभिनय किया एवं गाना गाया
जैसे फ़िल्म तूफानी टोली (1937) फ़िल्म बन की चिड़िया (1938) फ़िल्म बिल्ली (1938) फ़िल्म गोरख आया (1938) फ़िल्म नदी किनारे (1939) फ़िल्म आज का हिंदुस्तान (1940) फ़िल्म दीवाली (1940) फ़िल्म होली (1940) फ़िल्म मुसाफिर (1940) फ़िल्म परदेसी (1941) फ़िल्म ससुराल (1941) फ़िल्म उम्मीद (1941) इन सभी फिल्मों में उन्होंने जयंत देसाई ,ए आर कारदार ,चतुर्भुज देसाई जैसे लोगो के साथ काम किया इन 16 फिल्मों में से 6 फ़िल्म में खेमचंद प्रकाश ने बाकी 10 फिल्मों में ज्ञान दत्त ने संगीत दिया था कांतिलाल ने इन दोनों संगीतकारों के लिए 40 गाने गाये
उन्होंने सुप्रीम पिक्चर्स के लिए  गाज़ी सलाहुद्दीन (1939) हॉलिडे इन बॉम्बे (1941) और कंचन (1941) जैसी फिल्मों में काम किया बॉम्बे टाकीज़ के लिए 1939 में कंगन फ़िल्म में काम किया 
फ़िल्म गाज़ी सलाहुद्दीन में वह मुझको जाम दूर से दिखला के पी गया गाना काफी हिट हुआ
फ़िल्म गाज़ी सलाहुद्दीन संगीतकार खेमचन्द प्रकाश की डेब्यू फिल्म थी
फ़िल्म कंगन में उन्होंने मरण रे तू ही मेरो श्याम समान गाना गाया यह गाना रविन्द्र नाथ टैगोर के बंगला गाने पर आधारित था इस गीत में संगीत रामचन्द्र पाल ने दिया था

कांतिलाल ने 5 संगीतकारो के लिए 24 फिल्मों में लगभग 60 गाने गाये
कांतिलाल के सी डे से बहुत ज़्यादा प्रभावित थे यह उनके गीतों में भी झलकता है जैसे
मूरख क्या करता मनमानी फ़िल्म तूफानी टोली मन भाये री मोरे मन भाए फ़िल्म बन की चिड़िया
आराम कहाँ जो दिल लड़ा गैरों के पाले फ़िल्म नदी किनारे

1943 में उन्होंने उषा बेन से विवाह किया
इसके बाद उन्होंने खुद को थिएटर तक सीमित कर लिया उन्होने कुछ गुजराती फिल्मों में भी काम किया

17 जून 1971 में उनका निधन हो गया

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...