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गुरुवार, 6 जुलाई 2023

रणबीर

रणवीर सिंह भवनानी 
🎂जन्म 6 जुलाई 1985
 एक भारतीय अभिनेता हैं जो हिंदी फिल्मों में दिखाई देते हैं।
तीन फिल्मफेयर पुरस्कारों सहित कई पुरस्कारों के प्राप्तकर्ता, सिंह देश में सबसे अधिक भुगतान पाने वाले अभिनेताओं में से एक हैं और 2012 से फोर्ब्स इंडिया की सेलिब्रिटी 100 सूची में शामिल हैं। इंडियाना यूनिवर्सिटी ब्लूमिंगटन से स्नातक की डिग्री पूरी करने के बाद, सिंह आगे बढ़ने के लिए भारत लौट आए। फिल्म में करियर.
उन्होंने थोड़े समय के लिए विज्ञापन में काम किया और 2010 में यशराज फिल्म्स की रोमांटिक कॉमेडी बैंड बाजा बारात में एक प्रमुख भूमिका के साथ अपने अभिनय करियर की शुरुआत की।
यह फिल्म आलोचनात्मक और व्यावसायिक रूप से सफल रही, जिससे उन्हें सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
उन्होंने नाटक लुटेरा (2013) में एक उदास चोर की भूमिका निभाई, और संजय लीला भंसाली के साथ रोमांस गोलियों की रासलीला राम-लीला (2013) से शुरुआत करके खुद को हिंदी सिनेमा में स्थापित किया। सिंह को भंसाली के पीरियड ड्रामा बाजीराव मस्तानी (2015) और पद्मावत (2018) में क्रमशः बाजीराव प्रथम और अलाउद्दीन खिलजी को चित्रित करने के लिए आलोचनात्मक प्रशंसा मिली।
उन्होंने पहली फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार और बाद की फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड जीता।
ये एक्शन फिल्म सिम्बा (2018) के साथ, जिसमें उन्होंने शीर्षक चरित्र निभाया, अब तक की सबसे अधिक कमाई करने वाली भारतीय फिल्मों में शुमार है।
उन्हें जोया अख्तर की म्यूजिकल ड्रामा गली बॉय (2019) में रैपर की भूमिका निभाने के लिए भी प्रशंसा मिली।
सिंह ने भंसाली फिल्मों में अपनी सह-कलाकार दीपिका पादुकोण से शादी की है।
↔️रणवीर सिंह भवनानी का जन्म 6 जुलाई 1985 को बॉम्बे , महाराष्ट्र , भारत (अब मुंबई) में एक सिंधी हिंदू परिवार में अंजू और जगजीत सिंह भवनानी के घर हुआ था। उनके दादा-दादी भारत के विभाजन के दौरान कराची , सिंध (वर्तमान पाकिस्तान में) से बॉम्बे चले गए । उनकी एक बड़ी बहन रितिका भावनानी हैं। सिंह चरित्र-अभिनेत्री चांद बर्क के पोते हैं और अभिनेता अनिल कपूर से संबंधित हैं।उनकी पत्नी सुनीता कपूर (नी भवनानी) के माध्यम से उनका परिवार। सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपना उपनाम भवनानी हटा दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि नाम "बहुत लंबा, बहुत अधिक शब्दांश" होगा, इस प्रकार उनके ब्रांड को "बिक्री योग्य वस्तु" के रूप में कम महत्व दिया गया।

सिंह हमेशा एक अभिनेता बनने की इच्छा रखते थे, उन्होंने कई स्कूल नाटकों और बहसों में भाग लिया।हालांकि, मुंबई में एचआर कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स में शामिल होने के बाद , सिंह को एहसास हुआ कि फिल्म उद्योग में ब्रेक पाना आसान नहीं था। यह महसूस करते हुए कि अभिनय का विचार "बहुत दूर की कौड़ी" था, सिंह ने रचनात्मक लेखन पर ध्यान केंद्रित किया। वह संयुक्त राज्य अमेरिका गए जहां उन्होंने 2008 में इंडियाना यूनिवर्सिटी ब्लूमिंगटन से दूरसंचार में कला स्नातक की डिग्री प्राप्त की । विश्वविद्यालय में, उन्होंने अभिनय की कक्षाएं लेने का फैसला किया और थिएटर को अपने छोटे छात्र के रूप में चुना ।

अपनी पढ़ाई पूरी करने और 2007 में मुंबई लौटने के बाद, सिंह ने कुछ वर्षों तक ओ एंड एम और जे. वाल्टर थॉम्पसन जैसी एजेंसियों के साथ कॉपीराइटर के रूप में विज्ञापन में काम किया ।उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया, लेकिन अभिनय के लिए इसे छोड़ दिया। फिर उन्होंने अपना पोर्टफोलियो निदेशकों को भेजने का फैसला किया।वह सभी प्रकार के ऑडिशन के लिए जाते थे, लेकिन उन्हें कोई अच्छा अवसर नहीं मिलता था, जबकि केवल छोटी भूमिकाओं के लिए कॉल आते थे: "सब कुछ बहुत निराशाजनक था। यह बहुत निराशाजनक था। कई बार मैं सोचता था कि क्या मैं यह कर रहा हूं सही बात है या नहीं।”

मानी कोल

मणि कौल कश्मीरी पंडित एवं भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे। वे समानान्तर सिनेमा के प्रभावी निर्देशक थे। उन्होंने भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान से स्नातक की शिक्षा पूर्ण की जहाँ वे ऋत्विक घटक के विद्यार्थी थे और बाद में वहाँ शिक्षक भी बने।
जन्म की तारीख और समय: 25 दिसंबर 1944, जोधपुर
मृत्यु की जगह और तारीख: 6 जुलाई 2011, गुरुग्राम
लीक से हटकर फ़िल्में बनाने वाले प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक मणि कौल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

मणि कौल एक प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक थे। उसकी रोटी,आषाढ़ का एक दिन और सतह से उठता आदमी जैसी यथार्थ की पृष्ठभूमि से जुड़ी लीक से हटकर फ़िल्में बनाने वाले प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक मणि कौल को नए भारतीय सिनेमा के पुरोधाओं में से एक माना जाता है। जल्दी ही दुनिया में उन्होंने बड़े फ़िल्मकारों के रूप में अपनी छवि बना ली। संसार के सभी श्रेष्ठ फ़िल्मकारों की फ़िल्में वे देखते थे और उन पर घंटों बात कर सकते थे। उन्होंने बर्कले विश्वविद्यालय में सिनेमा के छात्रों को पढ़ाया भी था।

मणि कौल का जन्म 25 दिसम्बर 1944 को राजस्थान राज्य के जोधपुर शहर में हुआ था। मणि कौल पुणे के फ़िल्म संस्थान में ऋत्विक घटक के छात्र थे। उन्होंने पहले अभिनय और फिर निर्देशन का कोर्स किया और निर्देशन को ही अपना रचनात्मक जुनून बनाया। मुंबइया फ़िल्मों से जुड़े लोग प्रायः उनके काम को उसी तरह कभी सराह नहीं पाए। ऋत्विक घटक के साथ-साथ रूसी फ़िल्मकार
तारकोव्स्की की फ़िल्मों से भी मणि कौल प्रभावित रहे। उन्होंने सिनेमा का नया व्याकरण गढ़ा, जबकि उनके यहाँ तकनीक और नैरेटिव (आख्यान) का इस्तेमाल भी नए तरीके से होता है। उनके सिनेमा में डॉक्यूमेंटरी (वृत्तचित्र) और फीचर फ़िल्म के बीच की रेखा धुँधली हो जाती है, मगर यह उनकी फ़िल्म की ताकत है, कमज़ोरी नहीं।

जिस तरह अच्छा साहित्य आपको नए यथार्थबोध और सौंदर्यबोध से संपन्न करता है, उसी तरह मणि कौल का सिनेमा भी यही काम करता है, मगर इसका मतलब यह नहीं कि उनकी फ़िल्में साहित्य के उस बोध को रूपांतरित
भर करती हैं। सिनेमा का अपना स्वायत्त संसार है, इसलिए यहाँ आकर साहित्य का यथार्थबोध और सौंदर्यबोध एक बिल्कुल नई दीप्ति से जगमगा उठता है। यह दीप्ति ही आभासी संसार का अतिक्रमण करती है। लेकिन मणि कौल कला-फ़िल्मों के फ़िल्मकार ही नहीं हैं, उनका सिनेमा भारतीय सिनेमा की नई धारा का सिनेमा है, जिसे समांतर सिनेमा या न्यू वेव सिनेमा के रूप में भी जाना जाता है। भूत दांपत्य जीवन के आधार पर बनाई 'दुविधा' नामक फ़िल्म जिसमें भूत व्यापारी के पिता को रोजाना सोने की एक मोहर देता है। लेकिन फ़िल्म नहीं
चली। मगर भारत में गंभीर सिनेमा के प्रेमियों और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में इस फ़िल्म को काफ़ी सराहा गया। मणि कौल की लगभग सभी फ़िल्मों के साथ आमतौर पर ऐसा ही हुआ है, चाहे वह "उसकी रोटी" हो , "आषाढ़ का एक दिन" हो, "सतह से उठता आदमी" हो, "इडियट" हो या "नौकर की कमीज" हो। यह बात सिर्फ उन पर ही लागू नहीं होती।
सत्यजीत राय , ऋत्विक घटक और " मृणाल सेन" जैसे महान भारतीय फ़िल्मकारों पर भी लागू होती है जिनको
अंतरराष्ट्रीय ख्याति तो खूब मिली,मगर गुरुदत्त या राजकपूर की फ़िल्मों की तरह वे भारत में ज्यादा चल
नहीं पाईं

मणि कौल उत्कृष्ट साहित्य को अपनी फ़िल्मों के लिए चुनते हैं, चाहे वह "नौकर की कमीज" (विनोद कुमार शुक्ल), "सतह से उठता आदमी" ( मुक्तिबोध ), "आषाढ़ का एक दिन" ( मोहन राकेश ) हो या फिर "इडियट" (फ्योदोर दोस्तोव्स्की)। यहाँ आकर साहित्य के परिचित पात्र नया रूप, नया अर्थ और नई दीप्ति पाते हैं,
मगर उसी सीमा तक जिसमें मणि कौल का सौंदर्य बोध क़ायम रहे। मणि कौल संगीत प्रेमी भी थे। ध्रुपद पर उन्होंने एक वृत्तचित्र भी बनाया था। उनकी फ़िल्म "सिद्धेश्वरी" को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। "उसकी रोटी" एकदम नई तरह की फ़िल्म थी, जिसके जरिए उन्होंने पहली बार फ़िल्म के प्रचलित फॉर्म या रूप को तोड़ा था। इस फ़िल्म को फ़िल्मफेयर क्रिटिक अवॉर्ड मिला था।

प्रमुख_फ़िल्में

उसकी रोटी (1969)
*Uski Roti - A Mani Kaul Film(480P).mp4*एक झलक
आषाढ़ का एक दिन (1971)
दुविधा (1973)
घाशीराम कोतवाल (1979)
सतह से उठता आदमी (1980)
ध्रुपद (1982)
मति मानस (1984)
सिद्धेश्वरी (1989)
इडियट (1992)
द क्लाउड डोर (1995)
नौकर की कमीज़ (1999)
बोझ (2000)

1974- सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (फ़िल्म- दुविधा)
1989- सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र (फ़िल्म- :
सिद्धेश्वरी)
फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए)
1971- उसकी रोटी (1970)
1972: आषाढ़ का एक दिन (1971)
1974: दुविधा (1973)
1993: इडियट (1992)

मणि कौल का 6 जुलाई 2011 को गुड़गाँव , हरियाणा में निधन हो गया। कई साल तक वे नीदरलैंड्स में भी रहे, जहाँ उन्होंने कुछ फ़िल्में और वृत्तचित्र भी बनाए। उनके निधन से सचमुच एक बड़ा फ़िल्मकार हमारे बीच से चला गया है। मगर भारतीय फ़िल्म विधा के विकास में उनका बिलकुल अलग तरह का योगदान है जिसे गंभीर सिनेमा के प्रेमी हमेशा याद रखेंगे।

चेतन आनंद

चेतन आनंद

जन्म की तारीख और समय: 3 जनवरी 1921, लाहौर, पाकिस्तान
मृत्यु की जगह और तारीख: 6 जुलाई 1997, मुम्बई
पत्नी: उमा आनंद (विवा. 1943–1997)
बच्चे: केतन आनंदविवेक आनंद
माता-पिता: पिशोरी लाल आनंद
भाई: विजय आनंददेव आनन्दमनमोहन आनंदशीला कांता कपुर
आज चेतन आनंद की पुण्यतिथि है, इस खास मौके पर हम आपको उनसे जुड़ी कुछ खास बातें बताने जा रहे हैं-
चेतन आनंद का जन्म 3 जनवरी 1915 को हुआ था, वह प्रसिद्ध हिंदी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक थे। बॉलीवुड फ़िल्मों को इस स्तर पर पहली बार पहचान दिलाने का श्रेय चेतन आनंद को जाता है। चेतन आनंद सदाबहार अभिनेता देव आनंद के बड़े भाई थे। देव आनंद चेतन आनंद की बदौलत ही फ़िल्म इंडस्ट्री में आ सके। चेतन आनंद पंजाब के गुरदासपुर में जन्मे और लाहौर से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद राजनीति में कदम रखा और वह वर्ष 1930 के दशक में कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने दून स्कूल में शिक्षक के रूप में भी कार्य किया, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। प्रिया राजवंश चेतन आनंद की सहयात्री थीं। दोनों ज़िंदगी भर साथ-साथ रहे। शादी नहीं की और उसकी जरूरत भी नहीं समझी। बाहरी दुनिया के लोग उन्हें पति-पत्नी मानते रहे।
इतिहास के शिक्षक रहे चेतन ने वर्ष 1940 के दशक के शुरू में सम्राट अशोक पर एक फ़िल्म की पटकथा लिखी थी। उनका फ़िल्मी सफर वर्ष 1944 में आई फणी मजूमदार की फ़िल्म 'राजकुमार' से शुरू हुआ। उस फ़िल्म में वह मुख्य भूमिका में थे। चेतन ने अभिनय छोड़कर निर्देशन के क्षेत्र में किस्मत आजमाई और जल्द ही उन्होंने इतिहास रच दिया। वर्ष 1946 में बतौर निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म 'नीचा नगर' ने कान फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार हासिल किया। अपने जमाने के सुपरस्टार देवानंद और निर्माता-निर्देशक विजय आनंद के बड़े भाई चेतन की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म 'नीचा नगर' ने वर्ष 1946 में पहले कान फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का अवार्ड जीता था। वह फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली पहली फ़िल्म थी। ख़्वाजा अहमद अब्बास द्वारा लिखित और उमा आनंद, कामिनी कौशल तथा रफ़ीक अहमद के अभिनय से सजी यह फ़िल्म समाज के अमीर और ग़रीब वर्ग के बीच की खाई में झांकती और मानवीय संवेदनाओं को टटोलती है। फ़िल्म समीक्षक ज्योति वेंकटेश ने बताया कि बेहतरीन निर्देशन कौशल की वजह से 'नीचा नगर' का शुमार भारतीय सिनेमा की बेहतरीन फ़िल्मों में किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस फ़िल्म ने भारतीय सिनेमा में सामाजिक यथार्थवाद के चित्रण की परम्परा शुरू की और समानांतर सिनेमा की फ़िल्मों के अन्य निर्देशकों के लिए सृजन का एक नया रास्ता खोला।1950 के दशक के शुरू में उन्होंने अपने छोटे भाई और उस जमाने के मशहूर अभिनेता देवानंद के साथ नवकेतन प्रोडक्शंस के नाम से एक फ़िल्म कम्पनी की स्थापना की। इस बैनर ने बॉलीवुड को अफसर, टैक्सी ड्राइवर और आंधियां जैसी फ़िल्में दीं। बाद में, चेतन ने हिमालय फ़िल्म्स नाम से अपनी अलग कम्पनी शुरू की। इस बैनर ने हिन्दी सिनेमा को हक़ीक़त, हीर रांझा, हंसते जख्म और हिन्दुस्तान की कसम जैसी अच्छी फ़िल्में दीं। इसके अलावा कालाबाज़ार, किनारे-किनारे, आखिरी खत, कुदरत हाथों की लकीरें फ़िल्मों में चेतन ने विभिन्न भूमिकाओं को अंजाम दिया। उन्होंने वर्ष 1988 में 'परमवीर चक्र' नाम से एक धारावाहिक भी बनाया था। उनकी प्रमुख फिल्में बतौर निर्देशक नीचा नगर (1946), आँधियाँ (1952), टॅक्सी ड्राइवर (1954), फ़ंटूश (1956), किनारे किनारे (1963), हक़ीक़त (1964), आखिरी खत (1966), हीर रांझा (1970), हंसते ज़ख्म (1973), हिंदुस्तान की कसम (1973), जानेमन (1976 ), साहब बहादुर (1977), कुदरत (1981), हाथों की लकीरें (1986) आदि. उन्होंने काला बाज़ार (1960) में बतौर अभिनेता के रूप में काम किया था। चेतन आनंद की फ़िल्म हीर रांझा के संवाद कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे। शबाना आज़मी कहती हैं, 'मुझे बड़ी हैरत होती थी कि अब्बा इतना कम बोलते हैं आखिर संवाद लिखते समय उनके और चेतन साहब के बीच बातें क्या होती हैं। चेतन आनंद रोज़ाना सुबह 10 बजे हमारे घर आ जाते थे। वो कमरे के एक कोने में बैठ जाते थे और अब्बा दूसरी तरफ बैठे रहते थे। दोनों के बीच कोई बात नहीं होती थी। और फिर चेतन साहब घर लौट जाते।' लेकिन हीर रांझा के शायराना तरीके से लिखे संवाद बेहद लोकप्रिय साबित हुए।बहुत कम लोगों को शायद यह पता होगा कि चेतन आनंद की पहली फ़िल्म “नीचा नगर” को पाम दी’ओरे (सर्वोत्तम फ़िल्म) पुरस्कार सबसे पहले कान फ़िल्म फेस्टिवल में 1946 में मिला था। चेतन आनंद पहले निर्देशक थे, जिन्होंने राजेश खन्ना को अपनी फ़िल्म ‘आखरी खत’ के लिए चुना था। उसके बाद राजेश खन्ना कामयाबी के शिखर तक पहुंचे। अपनी पत्नी मोना (कल्पना कार्तिक) से देव आनंद की मुलाकात 'बाजी' (1951) के सेट पर हुई थी। चेतन आनंद उन्हें शिमला के सेंट पीटर्स कॉलेज से हीरोइन बनाने के लिए लाए थे। वास्तव में वे चेतन की पहली पत्नी उमा बैनर्जी की छोटी बहन थीं। उमा से चेतन ने लाहौर में कॉलेज की पढ़ाई के समय ही शादी कर ली थी। चेतन आनंद से राज कुमार की गहरी दोस्ती थी और इसी वजह से चेतन के
साथ उन्होंने कई फ़िल्मों 'हिंदुस्तान की कसम', 'कुदरत', 'हीर रांझा' आदि में काम भी किया। राजकुमार को स्टार बनाने में चेतन आनंद का महत्त्वपूर्ण योगदान था। उन्हें 1946 में पाम दी’ओरे (सर्वोत्तम फ़िल्म), कान फ़िल्म फेस्टिवल (नीचा नगर), 1965 में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ दूसरी फ़ीचर फ़िल्म (हक़ीक़त), 1982 फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ कहानी (कुदरत)बहुत कम लोगों को शायद यह पता होगा कि चेतन आनंद की पहली फ़िल्म “नीचा नगर” को पाम दी’ओरे (सर्वोत्तम फ़िल्म) पुरस्कार सबसे पहले कान फ़िल्म फेस्टिवल में 1946 में मिला था। चेतन आनंद पहले निर्देशक थे, जिन्होंने राजेश खन्ना को अपनी फ़िल्म ‘आखरी खत’ के लिए चुना था। उसके बाद राजेश खन्ना कामयाबी के शिखर तक पहुंचे। अपनी पत्नी मोना (कल्पना कार्तिक) से देव आनंद की मुलाकात 'बाजी' (1951) के सेट पर हुई थी। चेतन आनंद उन्हें शिमला के सेंट पीटर्स कॉलेज से हीरोइन बनाने के लिए लाए थे। वास्तव में वे चेतन की पहली पत्नी उमा बैनर्जी की छोटी बहन थीं। उमा से चेतन ने लाहौर में कॉलेज की पढ़ाई के समय ही शादी कर ली थी। चेतन आनंद से राज कुमार की गहरी दोस्ती थी और इसी वजह से चेतन के साथ उन्होंने कई फ़िल्मों 'हिंदुस्तान की कसम', 'कुदरत', 'हीर रांझा' आदि में काम भी किया। राजकुमार को स्टार बनाने में चेतन आनंद का महत्त्वपूर्ण योगदान था। उन्हें 1946 में पाम दी’ओरे (सर्वोत्तम फ़िल्म), कान फ़िल्म फेस्टिवल (नीचा नगर), 1965 में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ दूसरी फ़ीचर फ़िल्म (हक़ीक़त), 1982 फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ कहानी (कुदरत)कुदरत)हिन्दी फ़िल्म जगत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की शुरुआत करने वाले इस कलाकार ने 6 जुलाई 1997 आज ही के दिन को 82 वर्ष की उम्र में इस दुनिया से विदा ले ली। लेकिन आज भी उन्हें और उनकी फिल्मों को याद और पसंद किया जाता है।

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