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शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

नक्श लायल पूरी

#24feb
#22jan 
महान गीतकार शायर नक़्श लायलपुरी

🎂24 फरवरी, 1928
⚰️22 जनवरी 2017

पंजाब के लायलपुर अब पाकिस्तान का हिस्सा में 24 फरवरी, 1928 को जन्मे लायलपुरी के वालिद मोहतरम जगन्नाथ ने उनका नाम जसवंत राय शर्मा रखा था। शायर बनने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया और बन गए नक्श लायलपुरी। साहित्य में उनकी दिलचस्पी उनके स्कूल के दिनों में ही दिख गई, जब उनकी स्कूल टीचर साल के अंत में उनकी कॉपी इसलिए खरीदती थीं, क्योंकि उनमें उनकी कविताएं लिखी होती थीं। साल 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद उनका परिवार शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में लखनऊ आ गया। पान खाने और मुस्कराने की आदत उनको लखनऊ से ही मिली। उनकी शख़्सियत में वही नफ़ासत और तहज़ीब है जो लखनऊ वालों में होती है। लखनऊ की अदा और तवस्सुम उनकी इल्मी और फ़िल्मी शायरी में मौजूद है-

कई बार चाँद चमके तेरी नर्म आहटों के
कई बार जगमगाए दरो-बाम बेख़ुदी में

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दर्द को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था और बंटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था और यह उनकी शायरी में बखूबी नजर आया-

हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर
क्यूं न इंसा से मोहब्बत करें इंसा होकर

नक्श लायलपुरी के ग़ज़ल का चेहरा दर्द के शोले में लिपटे हुए शबनमी एहसास की लज़्ज़त से तरबतर है। शायरी के इस समंदर में एक तरफ़ फ़िक्र की ऊँची-ऊँची लहरें हैं तो दूसरी तरफ़ इंसानी जज़्बात की ऐसी गहराई है जिसमें डूब जाने को मन करता है। कहते हैं नाम भले भूल जाए, लफ्ज बचे रहते हैं, और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते, हर दिल का राग बन जाते हैं। नक़्श साहब की शायरी में पंजाब की मिट्टी की महक, लखनऊ की नफ़ासत और मुंबई के समंदर का धीमा-धीमा संगीत है-

मेरी पहचान है शेरो-सुख़न से
मैं अपनी क़द्रो क़ीमत जानता हूं

ज़िंदगी के तजुरबात ने उनके लफ़्ज़ों को निखारा संवारा और शायरी के धागे में इस सलीक़े से पिरो दिया कि उनके शेर ग़ज़ल की आबरू बन गए। फ़िल्मी नग़मों में भी जब उनके लफ़्ज़ गुनगुनाए गए तो उनमें भी अदब बोलता और रस घोलता दिखाई दिया–

ये मुलाक़ात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है
धड़कने धड़कनों में खो जायें
दिल को दिल के क़रीब लाना है
ख़्वाब तो कांच से भी नाज़ुक है
टूटने से इन्हें बचाना है
मन मेरा प्यार का शिवाला है
आप को देवता बनाना है
मैं हूँ अपने सनम के बाहों में
मेरे क़दमों तले ज़माना है

नक़्श लायलपुरी 1951 में रोज़गार की तलाश में मुंबई आए और यहीं के होकर रह गए। लाहौर में तरक़्क़ीपसंद तहरीक का जो जज़्बा पैदा हुआ था उसे मुंबई में एक माहौल मिला-

ये अंजुमन, ये क़हक़हे, ये महवशों की भीड़
फिर भी उदास, फिर भी अकेली है ज़िंदगी 

गीतकार के रूप में उन्हें पहला मौका 1952 में मिला था, लेकिन 1970 के दशक के प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई। बाद में उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रूमानी और भावनात्मक गीत लिखे, जो लाखों दिलों को छू गया। लायलपुरी के लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में 'मैं तो हर मोड़ पर', 'ना जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया', 'उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा' और 'दो दीवाने शहर में' शामिल हैं। नौशाद के साथ 'ताजमहल' और खय्याम के साथ 'यात्रा' जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे। नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बी.आर. इशारा की फिल्म 'चेतना' से मिली और उसमें उनकी नज्म 'मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा' को अधिक सराहा गया। नक्श लायलपुरी के फिल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही। उन्होंने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन के साथ खूब काम किया, लेकिन मदन मोहन से काफी प्रभावित थे। उनका कहना था कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था। सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार नक्श जी उन्हें एक गीत लिखकर दिया-
 
आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें।।

इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पड़े और नक्श को गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखड़ा है। इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें। गायकी की हर विधा में नक्श यह बेजोड़ हैं. उनके गीतों को सभी ने सराहा- 

माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें के तेरे तलबगार हम नहीं
सींचा था जिस को ख़ूने तमन्ना से रात दिन
गुलशन में उस बहार के हक़दार हम नहीं
हमने तो अपने नक़्शे क़दम भी मिटा दिए
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं

हिंदी फिल्मों में कितने ही कालजयी गीत लिखने वाले नक्श लायलपुरी साहब का 22 जनवरी 2017 को मुंबई में 89 वर्ष की उम्र में इंतकाल हो गया। ये फ़नकार अपनी उम्र के अंतिम दिनों में लगभग गुमनामी की ज़िंदगी जीता रहा-

बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे
कुछ प्रसिद्ध गीत
  • धानी चुनर मोरी हाए रे
  • मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा
  • कई सदियों से कई जन्मों से
  • उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ
  • तुम्हें देखती हूं तो लगता है ऐसे
  • ये मुलाक़ात इक बहाना है
  • क़दर तूने ना जानी
  • चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है
  • चिट्ठिए
  • तुम्हें हो न हो मुझको तो
  • प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा
  • सीने में भी तूफ़ां है
  • न जाने क्या हुआ,जो तूने छू दिया
  • तुझ संग प्रीत लगाई सजना
  • नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं
  • जिंदगी की न टूटे लड़ी,प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी
  • मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

नक्श लायलपुरी

महान गीतकार शायर नक़्श लायलपुरी
#24feb 
#22jan 
🎂24 फरवरी, 1928
⚰️22 जनवरी 2017अंधेरी
 लायलपुरी के वालिद मोहतरम जगन्नाथ ने उनका नाम जसवंत राय शर्मा रखा था। शायर बनने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया और बन गए नक्श लायलपुरी। साहित्य में उनकी दिलचस्पी उनके स्कूल के दिनों में ही दिख गई, जब उनकी स्कूल टीचर साल के अंत में उनकी कॉपी इसलिए खरीदती थीं, क्योंकि उनमें उनकी कविताएं लिखी होती थीं। साल 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद उनका परिवार शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में लखनऊ आ गया। पान खाने और मुस्कराने की आदत उनको लखनऊ से ही मिली। उनकी शख़्सियत में वही नफ़ासत और तहज़ीब है जो लखनऊ वालों में होती है। लखनऊ की अदा और तवस्सुम उनकी इल्मी और फ़िल्मी शायरी में मौजूद है-

कई बार चाँद चमके तेरी नर्म आहटों के
कई बार जगमगाए दरो-बाम बेख़ुदी में

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दर्द को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था और बंटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था और यह उनकी शायरी में बखूबी नजर आया-

हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर
क्यूं न इंसा से मोहब्बत करें इंसा होकर

नक्श लायलपुरी के ग़ज़ल का चेहरा दर्द के शोले में लिपटे हुए शबनमी एहसास की लज़्ज़त से तरबतर है। शायरी के इस समंदर में एक तरफ़ फ़िक्र की ऊँची-ऊँची लहरें हैं तो दूसरी तरफ़ इंसानी जज़्बात की ऐसी गहराई है जिसमें डूब जाने को मन करता है। कहते हैं नाम भले भूल जाए, लफ्ज बचे रहते हैं, और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते, हर दिल का राग बन जाते हैं। नक़्श साहब की शायरी में पंजाब की मिट्टी की महक, लखनऊ की नफ़ासत और मुंबई के समंदर का धीमा-धीमा संगीत है-

मेरी पहचान है शेरो-सुख़न से
मैं अपनी क़द्रो क़ीमत जानता हूं

ज़िंदगी के तजुरबात ने उनके लफ़्ज़ों को निखारा संवारा और शायरी के धागे में इस सलीक़े से पिरो दिया कि उनके शेर ग़ज़ल की आबरू बन गए। फ़िल्मी नग़मों में भी जब उनके लफ़्ज़ गुनगुनाए गए तो उनमें भी अदब बोलता और रस घोलता दिखाई दिया–

ये मुलाक़ात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है
धड़कने धड़कनों में खो जायें
दिल को दिल के क़रीब लाना है
ख़्वाब तो कांच से भी नाज़ुक है
टूटने से इन्हें बचाना है
मन मेरा प्यार का शिवाला है
आप को देवता बनाना है
मैं हूँ अपने सनम के बाहों में
मेरे क़दमों तले ज़माना है

नक़्श लायलपुरी 1951 में रोज़गार की तलाश में मुंबई आए और यहीं के होकर रह गए। लाहौर में तरक़्क़ीपसंद तहरीक का जो जज़्बा पैदा हुआ था उसे मुंबई में एक माहौल मिला-

ये अंजुमन, ये क़हक़हे, ये महवशों की भीड़
फिर भी उदास, फिर भी अकेली है ज़िंदगी 

गीतकार के रूप में उन्हें पहला मौका 1952 में मिला था, लेकिन 1970 के दशक के प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई। बाद में उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रूमानी और भावनात्मक गीत लिखे, जो लाखों दिलों को छू गया। लायलपुरी के लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में 'मैं तो हर मोड़ पर', 'ना जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया', 'उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा' और 'दो दीवाने शहर में' शामिल हैं। नौशाद के साथ 'ताजमहल' और खय्याम के साथ 'यात्रा' जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे। नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बी.आर. इशारा की फिल्म 'चेतना' से मिली और उसमें उनकी नज्म 'मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा' को अधिक सराहा गया। नक्श लायलपुरी के फिल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही। उन्होंने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन के साथ खूब काम किया, लेकिन मदन मोहन से काफी प्रभावित थे। उनका कहना था कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था। सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार नक्श जी उन्हें एक गीत लिखकर दिया-
 
आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें।।

इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पड़े और नक्श को गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखड़ा है। इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें। गायकी की हर विधा में नक्श यह बेजोड़ हैं. उनके गीतों को सभी ने सराहा- 

माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें के तेरे तलबगार हम नहीं
सींचा था जिस को ख़ूने तमन्ना से रात दिन
गुलशन में उस बहार के हक़दार हम नहीं
हमने तो अपने नक़्शे क़दम भी मिटा दिए
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं

हिंदी फिल्मों में कितने ही कालजयी गीत लिखने वाले नक्श लायलपुरी साहब का 22 जनवरी 2017 को मुंबई में 89 वर्ष की उम्र में इंतकाल हो गया। ये फ़नकार अपनी उम्र के अंतिम दिनों में लगभग गुमनामी की ज़िंदगी जीता रहा-

बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे

उनकी गजल
शाख़ों को तुम क्या छू आए
काँटों से भी ख़ुशबू आए

देखें और दीवाना कर दें
गोया उनको जादू आए

कोई तो हमदर्द है मेरा
आप न आए आँसू आए

इश्क़ है यारो उनके बस का
जिन को दिल पर काबू आए

उन कदमों की आहट पाकर
फूल ही फूल लबे –जू आए

गूँज सुनी तेरे चरख़े की
पर्बत छोड़ के साधू आए

‘नक्श़’ घने जंगल में दिल के
फ़िर यादों के जुगनू आए

आंखो पर उनका अंदाज
तुझको सोचा तो खो गईं आँखें
दिल का आईना हो गईं आँखें
 
ख़त का पढ़ना भी हो गया मुश्किल
सारा काग़ज़ भिगो गईं आँखें
 
कितना गहरा है इश्क़ का दरिया
उसकी तह में डुबो गईं आँखें
 
कोई जुगनू नहीं तसव्वुर का
कितनी वीरान हो गईं आँखें
 
दो दिलों को नज़र के धागे से
इक लड़ी में पिरो गईं आँखें
 
रात कितनी उदास बैठी है
चाँद निकला तो सो गईं आँखें
 
'नक़्श' आबाद क्या हुए सपने
और बरबाद हो गईं आँखें


नरेंद्र चंचल

नरेन्द्र चंचल
#16oct
#22jan 
🎂16 अक्टूबर 1940
⚰️22 जनवरी 2021

एक भारतीय गायक थे, जो धार्मिक गीतों और भजनों में माहिर थे।नरेंद्र चंचल का जन्म 16 अक्टूबर, 1940 को नामक मंडी, अमृतसर में एक धार्मिक पंजाबी परिवार में हुआ था और 22 जनवरी, 2021 को उनका निधन हो गया। वह एक धार्मिक माहौल में बड़े हुए, जिसने उन्हें भजन और आरती गाना शुरू करने के लिए प्रेरित किया।  वह लंबे समय से बीमार थे और अपोलो अस्पताल दिल्ली में दोपहर 12:15 बजे उनका निधन हो गया सालों के संघर्ष के बाद, चंचल ने 1973 की फिल्म बॉबी के लिए बॉलीवुड गीत बेशक मंदिर मस्जिद गाया और फिल्मफेयर बेस्ट मेल प्लेबैक अवार्ड जीता  उन्होंने अमेरिकी राज्य जॉर्जिया की मानद नागरिकता भी अर्जित की।चंचल ने मिडनाइट सिंगर नामक एक आत्मकथा जारी की है जो उनके जीवन, संघर्षों और कठिनाइयों को बताती है।  वह 29 दिसंबर को हर साल कटरा वैष्णो देवी का दौरा करते थे और अंतिम दिन अपने प्रोग्राम का प्रदर्शन करते थे मस्तिष्क की जटिलताओं के कारण 22 जनवरी 2021 को दोपहर 12:15 बजे नई दिल्ली में उनका निधन हो गया

विजय आनंद

प्रसिद्ध अभिनेता,निर्माता,पटकथा लेखक, निर्देशक, संपादक विजय आनंद
#22jan
#23feb 
विजय आनंद 
🎂22 जनवरी 1934 
⚰️23 फरवरी 2004

जिन्हें गोल्डी आनंद के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय फ़िल्म निर्माता, निर्माता, पटकथा लेखक, संपादक और अभिनेता थे,जिन्हें गाइड (1965), तीसरी मंज़िल (1966) ज्वेल थीफ (1967) और जॉनी मेरा नाम (1970) जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है  उन्होंने अपनी अधिकांश फिल्में इन-हाउस बैनर नवकेतन फिल्म्स के लिए बनाईं और वे आनंद परिवार का हिस्सा थे।

विजय आनंद का जन्म गुरदासपुर, पंजाब, भारत में हुआ था, वह एक सफल और समृद्ध अधिवक्ता पिशोरी लाल आनंद के पुत्र थे।  वह नौ भाई-बहनों में सबसे छोटे थे।  निर्माता और निर्देशक चेतन आनंद और प्रसिद्ध अभिनेता देव आनंद उनके भाई थे, और उनकी बहन फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां शील कांता कपूर थीं

 विजय ने अपनी तथाकथित बड़ी बहन की बेटी सुषमा कोहली से शादी की जो उम्र में उनसे बहुत छोटी थीं यह मामा-भांजी की जोड़ी भारतीय समाज में प्रतिबंधित है और जब यह हुआ तो यह एक बहुत बड़ा बवाल का कारण बना  इस जोड़े ने समाज के बहुत प्रतिरोध का सामना करते हुए शादी की, मगर उनके परिवारों में इसका विरोध नही हुआ उनका एक खुशहाल विवाह था जो उनके पूरे जीवन तक चला

हालांकि विजय आनंद का एक अभिनेता, पटकथा लेखक, संपादक और निर्माता के रूप में करियर रहा है, लेकिन उन्हें मुख्य रूप से एक निर्देशक के रूप में याद किया जाएगा।  उन्होंने अपने निर्देशन की शुरुआत 1957 की सुपरहिट नौ दो ग्यारह से की फिल्म, जिसमें विजय के भाई देव आनंद ने प्रमुख भूमिका निभाई थी, को केवल 40 दिनों में शूट किया गया था।

निर्देशक के रूप में विजय की अन्य सफल फिल्मों में काला बाज़ार (1960), गाइड (1965), तीसरी मंज़िल (1966), ज्वेल थीफ़ (1967), जॉनी मेरा नाम (1970), तेरे मेरे सपने (1971), राम बलराम (1980) और राजपूत (1982) शामिल है  इनमें से लगभग सभी फ़िल्में नवकेतन फ़िल्म्स द्वारा बनाई गई थीं, जिसकी निर्माण कंपनी स्वयं आनंद बंधुओं ने शुरू की थी।  उल्लेखनीय अपवाद थे तीसरी मंजिल, जिसे नासिर हुसैन द्वारा निर्मित किया गया था, टोनी जुनेजा द्वारा निर्मित "राम-बलराम" और मुशीर-रियाज़ द्वारा निर्मित "राजपूत" 1957-1970 की अवधि को विजय आनंद के करियर का हाई नॉट माना जाना चाहिए, जैसा कि स्पष्ट है  ऊपर सूचीबद्ध फिल्मों से  देव आनंद और वहीदा रहमान अभिनीत विजय की 1965 की फ़िल्म गाइड, जो आर. के. नारायण के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी, विजय आनंद के करियर की चरम सीमा थी।  यह न केवल उनकी सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर थी, बल्कि उनकी सबसे समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्म भी थी, जिसे जनता, वर्ग और संगीत-प्रेमियों द्वारा समान रूप से सराहा गया था।  नवकेतन ने गाइड के अंग्रेजी भाषा के रीमेक को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज़ करने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली।

विजय आनंद अपने स्टाइलिश गीत चित्रांकन के लिए जाने जाते हैं, जैसे संख्याएँ;  "ओ हसीना जुल्फोंवाली" (तीसरी मंजिल), "आज फिर जीने की तमन्ना है" (गाइड) और "होंठो में ऐसी बात" (ज्वेल थीफ)

उन्होंने एक अभिनेता के रूप में फिल्म आगरा रोड (1957) से शुरुआत की।  एक अभिनेता के रूप में, उनकी सबसे यादगार भूमिकाएँ काला बाज़ार (1960), हकीकत (1964), कोरा कागज़ (1974), (जिसमें उन्होंने जया बच्चन के साथ अभिनय किया था) और मैं तुलसी तेरे आंगन की (1978) जैसी फ़िल्मों में भूमिका निभाई थीं।  गीत रहित थ्रिलर फिल्म चोर चोर (1974), जिसमें लीना चंदावरकर उनकी नायिका थीं।  उन्होंने रेखा के साथ घुंघरू की आवाज़ (1981) और डबल क्रॉस (1972) और साथ ही साथ देव आनंद, हेमा मालिनी और मुमताज़ के साथ छुपा रुस्तम एवं तेरे मेरे सपने में अभिनय किया।

1990 के दशक की युवा पीढ़ी के लिए उन्हें टेलीविजन श्रृंखला तहकीकात (1994) में जासूस सैम की भूमिका निभाने के लिए भी जाना जाता है।

उन्होंने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, भारत के सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में एक छोटे से कार्यकाल में सेवा की, जिस पद से उन्होंने 2002 में इस्तीफा दे दिया था, जब उन्होंने वयस्क फिल्मों के लिए रेटिंग की शुरुआत को लेकर सरकार के साथ वैचारिक मतभेद हो गए थे। 

गोल्डी, जैसा कि उन्हें प्यार से बुलाया जाता था, का दिल का दौरा पड़ने से 23 फरवरी 2004 को निधन हो गया।  वह 70 वर्ष के थे।

पुरस्कार एवं सम्मान 

फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक: गाइड (1965)
फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ डायलॉग: गाइड (1965)
फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संपादन: जॉनी मेरा नाम (1970)
फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले : जॉनी मेरा नाम (1970)
बी एफ जे ए अवार्ड सर्वश्रेष्ठ संपादक: जॉनी मेरा नाम (1970)
बी एफ जे ए अवार्ड सर्वश्रेष्ठ संपादक: डबल क्रॉस(1973)
फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार 
1967 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार - गाइड

सुधीर मिश्रा

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक सुधीर मिश्रा के जन्मदिन पर
#22jan

🎂 22 जनवरी 1959

सुधीर मिश्रा एक भारतीय फिल्म पटकथा लेख और निर्देशक हैं।'जाने भी दो यारो' से लेकर इस 'रात की सुबह नहीं' और 'धारावी' से लेकर 'हज़ारों ख्वाइशें ऐसी' , 'चमेली' , 'खोया खोया चांद जैसी फिल्मो के लिए जाना जाता है। 

सुधीर मिश्रा का जन्म लखनऊ उत्तर प्रदेश में हुआ था।  वह मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद के पौते हैं।  उनके पिता का नाम देवेन्द्र मिश्रा है, जो लखनऊ फिल्म सोसाइटी के अध्य्क्ष हैं।  

सुधीर मिश्रा ने  पढ़ाई लखनऊ से ही सम्पन्न की है।  उसके बाद स्नातक की पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी से पूरी की।  कॉलेज के दिनों के दौरान ही उंनकी मुलाकात बादल सरकार से हुई, और उन्होंने अपना एक थिएटर ग्रूप बना लिया। उसके बाद वह दोनों दिल्ली छोड़ पुणे चले गए।  पुणे के फिल्म टेलीविजन इंस्टीयूट ऑफ़ इंडिया में उनके छोटे भाई सुधांशु मिश्रा छात्र थे।  उन्होंने फिल्म की बारीकियां खुद अपने भाई से सीखी लेकिन कभी खुद वहाँ दाखिला नहीं लिया।  

वह सन 1980 में पुणे से मुंबई आ गए, और यहाँ आकर वह बटुर सहायक निर्देशक बड़े-बड़े निर्देशकों के साथ काम करने लगे।  उन्होंने सईद अख्तर मिर्जा, विधु विनोद चोपड़ा जैसे लोगो के साथ रहकर अभिनय और निर्देशन की बारीकियां सीखी।  

उन्होंने बटुर निर्देशक फिल्म जाने भी दो यारो निर्देशित की।  जिसे दर्शकों के साथ आलोचकों ने बेहद सराहा।  साथ ही उन्हें उशे इस फिल्म राष्ट्रिय पुरुस्कार से भी सम्मानित किया गया।  इसके बाद उन्होंने धारावी' से लेकर 'हज़ारों ख्वाइशें ऐसी' , 'चमेली' , 'खोया खोया चांद जैसी फ़िल्में निर्देशित की।  

 उनकी फिल्म देवदास जो राजनिति को अलग ढंग से पेश करती हुई नजर आई।

मंगलवार, 2 जनवरी 2024

नीरज वोहरा

#22jan
#14dic 
नीरज वोरा,
 🎂जन्म: 22 जनवरी 1963, 
⚰️मृत्यु: 14 दिसंबर 2017
एक भारतीय फिल्म निर्देशक, लेखक अभिनेता और संगीतकार थे। उन्होंने बॉलीवुड में आमिर खान की फिल्म रंगीला के लिए एक लेखक के रूप में अपना काम किया था। 2000 में उनकी पहली निर्देशित फिल्म खिलाड़ी 420 आई थी। बाद में 2006 में उन्होंने "फिर हेरा फेरी" फिल्म की पट्कथा और निर्देशन दोनो किया था।
🎂जन्म: 22 जनवरी 1963, भुज
⚰️मृत्यु: 14 दिसंबर 2017, CritiCare एशिया मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल - 24 / 7 एमर्जेंसी कैशलेस हॉस्पिटल इन जुहू | जॉइंट रिप्लेसमेंट & हार्ट स्पेशलिस्ट, मुम्बई
टीवी शो: सर्कस, नय नुक्कद्
भाई: उत्तंक वोरा
माता-पिता: विनायक वोरा, प्रेमिला वोरा

वोरा का जन्म 1963 में भुज के एक गुजराती परिवार में हुआ था। लेकिन वे मुंबई के उपनगर सांताक्रूज़ में बड़े हुए। उनके पिता, पंडित विनायक राय ननलाल वोरा एक शास्त्रीय संगीतकार थे, और एक प्रशिध्द तारा-शहनाई वादक थे। उनके पिता ने शास्त्रीय संगीत के लिए तारा-शहनाई को एकमात्र यंत्र के रूप में लोकप्रिय बनाया। एक बच्चे के रूप में, वोरा की बॉलीवुड की फिल्मों तक पहुंच नहीं थी। जैसा कि वे एक शास्त्रीय संगीतकार परिवार से थे, उन्है फिल्म संगीत को सुनने और फिल्में देखने की अनुमति नहीं थी। उनकी मां प्रेमिला बेन को फिल्मों के लिए जबरदस्त आकर्षण था, और वे अपने बेटे नीरज को फिल्म देखने के लिए चुपके से ले जाया करती थी। वोरा ने खार, मुंबई से अपने स्कूली शिक्षा प्राप्त की। उनके विद्यालय के बहुत सारे छात्र उनके पिता से संगीत सिखने जाया करते थे, जोकि शास्त्रीय भारतीय संगीत सिखाने पर जोर दिया करते थे, जबकि नीरज उन्हें चुपके से हार्मोनियम पर बॉलीवुड गाने सिखाया करते थे। जिसके कारण नीरज अपने स्कूल में बहुत लोकप्रिय बन गये।

सौभाग्य से, बहुत सारे गुजराती नाटक के लोग उनके पिता के साथ काम करते और उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे, इस प्रकार बाद में उनका झुकाव गुजराती थिएटर की ओर हो गया। थिएटर के लिए उनका प्यार 6 साल की उम्र में शुरू हुआ, और जब 13 वर्ष की उम्र में उनके पिता को यह पता चला तो उन्हों ने वोरा का समर्थन किया और आगे बढ़ने के लिए कहा।

अभिनय

अपने कॉलेज के दिनों के दौरान, उन्होंने एक पेशेवर अभिनेता के रूप में काम करना शुरू किया और नाटक के लिए कई इंटरकॉलेजे पुरस्कार भी प्राप्त किये। 1984 में उन्होंने केतन मेहता कि एक फिल्म होली में काम किया और बाद में टीवी धारावाहिक "छोटी बड़ी बातें" और सर्कस में भी काम किया। बाद में उन्होंने रंगीला में भी एक अभिनेता के रूप में काम किया। उनके अभिनय देखने के बाद, अनिल कपूर और प्रियदर्शन ने उन्हें "विरासत" में अभिनय हेतु आमंत्रित किया, इसके बाद आमिर के साथ "मन" में और आगे कई अन्य परियोजनाएं में भी काम किया।

नाटक

उनके 1992 गुजराती नाटक अफलातून जोकि बहुत प्रशिध्द हुई, से प्रेरित हो रोहित शेट्टी ने गोलमाल फिल्म बनाया था। यह नाटक नीरज वोरा द्वारा लिखित और निर्देशित था। जोकि हर्ष शिवशरण के मूल मराठी नाटक घर-घर से लिया गया था।

पुरस्कार
मनोनीत

2000: सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए स्क्रीन अवार्ड- खिलाडी 420
2000: सर्वश्रेष्ठ संवाद के लिए स्क्रीन अवार्ड - खिलाडी 420

प्राप्त

2000: सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए स्क्रीन अवार्ड - हेरा फेरी
2000: सर्वश्रेष्ठ संवादों के लिए स्क्रीन अवार्ड - हेरा फेरी
लायंस गोल्ड पुरस्कार
मोती रत्न पुरस्कार

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निर्देशन

रन भोला रन (2016)
हेरा फेरी 3
शॉर्टकट: द कॉन इज़ ऑन (2009)
फैमिलीवाला (2009)
फिर हेरा फेरी (2006)
खिलाड़ी 420

लेखक

दौड (1997)
हेरा फेरी (2000)
ये तेरा घर ये मेरा घर (2000)
गोलमाल (2006)
अभिनेता
संपादित करें
वेलकम बैक (2015)
बोल बच्चन (2012)
कामाल धमाल मालमाल (2012)
विभाग (2012)
तेज़ (2012)
खट्टा मीठा (2010)
ना घर के ना घाट के (2010)
फैमिलीवाला (2009)
मेने दिल तूझको दीया (2002)
तुम से अच्छा कौन है (2002)
कंपनी (2002)
ये तेरा घर ये मेरा घर (2001)
धड़कन (2000)
हर दिल जो प्यार करेगा (2000)
जंग (2000)
पुकार (2000)
मस्त (1999)
हैलो ब्रदर (1999)
बादशाह (1999)
मन (1999)
सत्या (1998)
दौड: फ़न ऑन द रन (1997)
विरासत (1997)
अकेले हम अकेले तुम (1995)
रंगीला (1995)
राजू बन गया जेंटलमैन (1992)
होली (1984)

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...