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मंगलवार, 12 मार्च 2024

फिल्मीस्तान: स्नेहल भटकर

#17july
#29may 
 
स्नेहल भटकर असली नाम वासुदेव गंगाराम भटकर, बी वासुदेव; 
🎂17जुलाई 1919-29 मई 2007
⚰️29 मई 2007  मुंबई 

स्नेहल भटकर का जन्म 17 जुलाई 1919 को मुंबई में एक मराठी भाषी परिवार में हुआ था। वह 18 महीने के थे जब उनके पिता का निधन हो गया। उनकी माँ एक गायिका और शिक्षिका दोनों थीं और उन्होंने उनसे संगीत की बुनियादी बातें सीखीं। मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने दादर के एक संगीत संस्थान में संगीत की शिक्षा ली। 87 साल की उम्र में 29 मई 2007 को मुंबई में उनके घर पर उनका निधन हो गया। उनके तीन बच्चे स्नेहलता भटकर, अविनाश भटकर और हैं रमेश भटकर, एक प्रसिद्ध मराठी अभिनेता (अब रामकृष्ण बर्डे से विवाहित)। वासुदेव गंगाराम भटकर, बी., जिन्हें स्नेहल भटकर के नाम से जाना जाता है, मुंबई, भारत के एक प्रसिद्ध हिंदी और मराठी फिल्म संगीतकार थे। उन्हें 2004 में लता मंगेशकर पुरस्कार दिया गया, जिसकी स्थापना महाराष्ट्र सरकार ने की थी।

अनुबंध के उल्लंघन से बचने के लिए एचएमवी संगीतकार के रूप में औपचारिक रूप से काम करते समय उन्होंने कई छद्म शब्दों का इस्तेमाल किया। बी. वासुदेव और "स्नेहल" उनमें से थे, लेकिन "स्नेहल भटकर" ही एकमात्र विकल्प रह गए। यह नाम उनकी बेटी स्नेहलता के नाम पर रखा गया था, जो उस समय पैदा हुई थी। 1947 में, उन्होंने नील कमल की रिलीज़ के साथ अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की। भटकर और गीतकार किदार नाथ शर्मा ने मिलकर कभी तन्हाइयों में (हमारी याद आएगी) जैसे लोकप्रिय गीत का निर्माण किया, जिसे अक्सर भटकर के करियर के शिखर के रूप में उद्धृत किया जाता है। उन्होंने फरियाद (1964), दीपक (1981), पहला कदम (1963) और हमारी याद आएगी (1961) सहित फिल्मों के लिए संगीत निर्देशक के रूप में काम किया।

गुरुवार, 2 नवंबर 2023

पृथ्वीराज कपूर

पृथ्वीराज कपूर

🎂जन्म 03 नवंबर, 1906
जन्म भूमि पंजाब, (पाकिस्तान)
⚰️मृत्यु 29 मई, 1972
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

अभिभावक दीवान बशेस्वरनाथ कपूर (पिता)
पति/पत्नी राम सरनी देवी
संतान राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेता
मुख्य फ़िल्में 'मुग़ले आज़म' (1960), 'आवारा' (1951), 'सिंकदरा' (1941), 'आलम आरा' (1931) आदि।
पुरस्कार-उपाधि दादा साहब फाल्के पुरस्कार, पद्म भूषण
हिंदी फ़िल्म और रंगमंच अभिनय के इतिहास पुरुष, जिन्होंने बंबई में पृथ्वी थिएटर स्थापित किया। 'भारतीय सिनेमा जगत् के युगपुरुष' पृथ्वीराज कपूर का नाम एक ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, रोबदार भाव भंगिमाओं और दमदार अभिनय के बल पर लगभग चार दशकों तक सिने दर्शकों के दिलों पर राज किया।

जीवन परिचय
शिक्षा
पृथ्वीराज ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लायलपुर और लाहौर (पाकिस्तान) में रहकर पूरी की। पृथ्वीराज के पिता दीवान बशेस्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत थे। बाद में उनके पिता का तबादला पेशावर में हो गया। पृथ्वीराज ने अपनी आगे की पढ़ाई पेशावर के एडवर्ड कॉलेज से की। साथ ही उन्होंने एक वर्ष तक क़ानून की पढ़ाई भी की लेकिन बीच में ही उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, क्योंकि उस समय तक उनका रुझान थिएटर की ओर हो गया था।

विवाह

पृथ्वीराज कपूर का महज 18 वर्ष की उम्र में ही विवाह हो गया और वर्ष 1928 में अपनी चाची से आर्थिक सहायता लेकर पृथ्वीराज कपूर अपने सपनों के शहर मुंबई पहुंचे।

कैरियर की शुरुआत

पृथ्वीराज कपूर 1928 में मुंबई में इंपीरियल फ़िल्म कंपनी से जुडे़ थे। वर्ष 1930 में बीपी मिश्रा की फ़िल्म 'सिनेमा गर्ल' में उन्होंने अभिनय किया। इसके कुछ समय पश्चात् एंडरसन की थिएटर कंपनी के नाटक शेक्सपियर में भी उन्होंने अभिनय किया। लगभग दो वर्ष तक फ़िल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करने के बाद पृथ्वीराज को वर्ष 1931 में प्रदर्शित फ़िल्म आलम आरा में सहायक अभिनेता के रूप में काम करने का मौक़ा मिला।

वर्ष 1933 में पृथ्वीराज कपूर कोलकाता के मशहूर न्यू थिएटर के साथ जुड़े। वर्ष 1933 में प्रदर्शित फ़िल्म 'राज रानी' और वर्ष 1934 में देवकी बोस की फ़िल्म 'सीता' की कामयाबी के बाद बतौर अभिनेता पृथ्वीराज अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इसके बाद पृथ्वीराज ने न्यू थिएटर की निर्मित कई फ़िल्मों में अभिनय किया। इन फ़िल्मों में 'मंजिल' 1936 और 'प्रेसिडेंट' 1937 जैसी फ़िल्में शामिल हैं। वर्ष 1937 में प्रदर्शित फ़िल्म विद्यापति में पृथ्वीराज के अभिनय को दर्शकों ने काफ़ी सराहा। वर्ष 1938 में चंदूलाल शाह के रंजीत मूवीटोन के लिए पृथ्वीराज अनुबंधित किए गए। रंजीत मूवी के बैनर तले वर्ष 1940 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पागल' में पृथ्वीराज कपूर अपने सिने कैरियर में पहली बार एंटी हीरो की भूमिका निभाई। इसके बाद वर्ष 1941 में सोहराब मोदी की फ़िल्म सिकंदर की सफलता के बाद पृथ्वीराज कामयाबी के शिखर पर जा पहुंचे। 

पृथ्वी थिएटर की स्थापना
वर्ष 1944 में पृथ्वीराज कपूर ने अपनी खुद की थियेटर कंपनी पृथ्वी थिएटर शुरू की। पृथ्वी थिएटर में उन्होंने आधुनिक और शहरी विचारधारा का इस्तेमाल किया, जो उस समय के फारसी और परंपरागत थिएटरों से काफ़ी अलग था। धीरे-धीरे दर्शकों का ध्यान थिएटर की ओर से हट गया, क्योंकि उन दिनों दर्शकों के ऊपर रुपहले पर्दे का क्रेज कुछ ज़्यादा ही हावी हो चला था। सोलह वर्ष में पृथ्वी थिएटर के 2662 शो हुए जिनमें पृथ्वीराज ने लगभग सभी शो में मुख्य किरदार निभाया। पृथ्वी थिएटर के प्रति पृथ्वीराज इस क़दर समर्पित थे कि तबीयत ख़राब होने के बावजूद भी वह हर शो में हिस्सा लिया करते थे। वह शो एक दिन के अंतराल पर नियमित रूप से होता था। एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनसे विदेश में जा रहे सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का प्रतिनिधित्व करने की पेशकश की, लेकिन पृथ्वीराज ने नेहरू जी से यह कह उनकी पेशकश नामंजूर कर दी कि वह थिएटर के काम को छोड़कर वह विदेश नहीं जा सकते। पृथ्वी थिएटर के बहुचर्चित कुछ प्रमुख नाटकों में दीवार, पठान, 1947, गद्दार, 1948 और पैसा 1954 शामिल है। पृथ्वीराज ने अपने थिएटर के जरिए कई छुपी हुई प्रतिभा को आगे बढ़ने का मौक़ा दिया, जिनमें रामानंद सागर और शंकर जयकिशन जैसे बड़े नाम शामिल है।

रंगमंच के पुरोधा
आकर्षक व्यक्तित्व व शानदार आवाज़ के स्वामी पृथ्वीराज कपूर ने सिनेमा और रंगमंच दोनों माध्यमों में अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया हालांकि उनका पहला प्यार थिएटर ही था। उनके पृथ्वी थिएटर ने क़रीब 16 वर्षों में दो हज़ार से अधिक नाट्य प्रस्तुतियां कीं। पृथ्वी राज कपूर ने अपनी अधिकतर नाट्य प्रस्तुतियों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। थिएटर के प्रति उनकी दीवानगी स्पष्ट थी। पृथ्वी थिएटर की नाट्य प्रस्तुतियों में सामाजिक जागरूकता के साथ ही देशभक्ति और मानवीयता को प्रश्रय दिया गया। वर्ष 1944 में स्थापित पृथ्वी थिएटर के नाटकों में यथार्थवाद और आदर्शवाद पर भी पर्याप्त ज़ोर दिया गया।

📽️प्रमुख फ़िल्में📽️

इसी दौरान पृथ्वीराज कपूर की मुग़ले आजम, हरिश्चंद्र तारामती, सिकंदरे आजम, आसमान, महल जैसी कुछ सफल फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। वर्ष 1960 में प्रदर्शित के. आसिफ की मुग़ले आज़म में उनके सामने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, इसके बावजूद पृथ्वीराज कपूर अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म आसमान महल में पृथ्वीराज ने अपने सिने कैरियर की एक और न भूलने वाली भूमिका निभाई। इसके बाद वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म तीन बहुरानियां में पृथ्वीराज ने परिवार के मुखिया की भूमिका निभाई, जो अपनी बहुरानियों को सच्चाई की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता है। इसके साथ ही अपने पुत्र रणधीर कपूर की फ़िल्म कल आज और कल में भी पृथ्वीराज कपूर ने यादगार भूमिका निभाई। वर्ष 1969 में पृथ्वीराज कपूर ने एक पंजाबी फ़िल्म नानक नाम जहां है में भी अभिनय किया। फ़िल्म की सफलता ने लगभग गुमनामी में आ चुके पंजाबी फ़िल्म इंडस्ट्री को एक नया जीवन दिया।

पुत्र राज कपूर के साथ अभिनय
पचास के दशक में पृथ्वीराज कपूर की जो फ़िल्में प्रदर्शित हुईं उनमें शांताराम की दहेज 1950 के साथ ही उनके पुत्र राज कपूर की निर्मित फ़िल्म आवारा प्रमुख है। फ़िल्म आवारा में पृथ्वीराज कपूर ने अपने पुत्र राजकपूर के साथ अभिनय किया। साठ का दशक आते-आते पृथ्वीराज कपूर ने फ़िल्मों में काम करना काफ़ी कम कर दिया।

सम्मान और पुरस्कार
पृथ्वीराज को देश के सर्वोच्च फ़िल्म सम्मान दादा साहब फाल्के के अलावा पद्म भूषण तथा कई अन्य पुरस्कारों से भी नवाजा गया। उन्हें राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया था।

अंतिम समय
उनकी अंतिम फ़िल्मों में राज कपूर की आवारा (1951), कल आज और कल, जिसमें कपूर परिवार की तीन पीढ़ियों ने अभिनय किया था और ख़्वाजा अहमद अब्बास की 'आसमान महल' भी थी। एक अभिनेता और प्रतिभा पारखी के रूप में उनकी दुर्जेय प्रतिष्ठा मूल रूप से उनके शानदार फ़िल्मी जीवन के पूर्वार्द्ध पर आधारित है। फ़िल्मों में अपने अभिनय से सम्मोहित करने वाले और रंगमंच को नई दिशा देने वाली यह महान् हस्ती 29 मई, 1972 को इस दुनिया से रुखसत हो गए। उन्हें मरणोपरांत दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

सोमवार, 17 जुलाई 2023

स्नेहल भटकर असली नाम वासुदेव गंगाराम भटकर, बी वासुदेव;

स्नेहल भटकर असली नाम वासुदेव गंगाराम भटकर, बी वासुदेव; 
🎂17जुलाई 1919
⚰️29 मई 2007
29 मई 2007 को 87 वर्ष की आयु में उनके मुंबई आवास पर उनका निधन हो गया।

प्रसिद्ध संगीतकार स्नेहल भटकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
स्नेहल भटकर वीडियो

सनेहल भटकर
स्नेहल भटकर (असली नाम वासुदेव गंगाराम भटकर, बी वासुदेव; 17जुलाई 1919-29 मई 2007), मुंबई, भारत के एक प्रसिद्ध हिंदी और मराठी फिल्म संगीतकार थे।  वह वर्ष 2004 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्थापित लता मंगेशकर पुरस्कार के प्राप्तकर्ता हैं। 

स्नेहल भटकर का जन्म 17 जुलाई 1919 को मुंबई में एक मराठी भाषी परिवार में हुआ था।  जब वे 18 महीने के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया था।  उनकी माँ एक शिक्षिका थीं और एक गायिका भी थीं उन्होंने संगीत की मूल बातें अपनी माँ से सीखीं।  मैट्रिक पूरा करने के बाद उन्होंने दादर के एक संगीत विद्यालय में संगीत सीखा।  29 मई 2007 को 87 वर्ष की आयु में उनके मुंबई स्थित आवास पर उनका निधन हो गया।

आधिकारिक तौर पर एचएमवी के लिए काम करते हुए अनुबंध में किसी भी उल्लंघन से बचने के लिए, उन्होंने संगीतकार के रूप में विभिन्न छद्म नामों को अपनाया।  इनमें "बी. वासुदेव" और "स्नेहल" शामिल थे, लेकिन एक और विकल्प, "स्नेहल भटकर" तय हो गया।  यह नाम उनकी तत्कालीन नवजात बेटी स्नेहलता से लिया गया था। 

उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत वर्ष 1947 में फिल्म नील कमल से की थी। भटकर और गीतकार केदार नाथ शर्मा ने कभी तन्हाईयों में हमारी याद आयेगी (हमारी याद आएगी) जैसे हिट गानों के लिए टीम बनाकर एक दूसरे के साथ काम किया  

उनके तीन बच्चों में प्रसिद्ध मराठी अभिनेता रमेश भटकर, अविनाश भटकर और बेटी स्नेहलता भटकर (अब रामकृष्ण बर्दे से शादी हुई) शामिल हैं।

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