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विज्ञान सहित ज्ञान का विषय गीता अध्याय 7
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विज्ञान शब्द वि + ज्ञान शब्द से मिलकर बना है, जिसका मतलब है विशिष्ट ज्ञान. विज्ञान का मतलब है वस्तुओं की जानकारी हासिल करना, जबकि ज्ञान का मतलब है मानवीय मूल्यों के अनुरूप सोचना और चरित्र के लिए आस्थावान होना.
👉जिसमें ज्ञान, अनुभव, शिक्षा, और अध्ययन के ज़रिए हासिल होता है. इसमें किसी वस्तु, घटना, या सिद्धांत के बारे में वास्तविक और तर्कसंगत जानकारी शामिल होती है।
👉विज्ञान, प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन और उनमें आपस में संबंध जानना होता है।
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भगवद गीता अध्याय: 7
जिस में कुल 30 श्लोक हैं
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भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 1
श्लोक:
( विज्ञान सहित ज्ञान का विषय )
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥
भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन
॥1॥
व्याख्या:
ध्यानाभ्यास का आरंभ करने के पूर्व साधक जब तक केवल न्यूनतम स्तर पर ही वेदांत का विचार नहीं आता।
तब तक ध्यानाभ्यास के आरंभ करने के पूर्व साधक का विचार वैसा ही होता है जैसा कि ध्यानाभ्यास के आरंभ करने के पूर्व साधक में होता है।
यह प्रश्न सभी जिज्ञासुओं के मन में आता है और वेदांतशास्त्र इस विषय का विस्तार से वर्णन करता है कि किस प्रकार ध्यान की प्रक्रिया से मन अपने ही परिच्छिन्न अभ्यास से ऊपर अपने अनंत स्वरूप का अनुभव करता है। विवेच्य विषय की प्रस्तावना करते हुए
श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे आत्मसाक्षात्कार के सिद्धांत उपायों का समग्र वर्णन करेंगे जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि किस प्रकार सुसंगठित मन के द्वारा आत्मस्वरूप का ध्यान करने से आत्मा की अपरोक्षानुभूति होती है। ध्यान के सन्दर्भ में मन शब्द का प्रयोग शुद्ध एवं एकाग्र मन का ही होता है न कि अशक्त तथा विखंडित मन। अनुशासित और असंगठित मन जब अपने प्रारूप में सम्मिलित होता है तब साधक का विकास गति गति से होता है। इस प्रकरण का विषय है आन्त्रिक विकास का युक्तियुक्त विवेचन।श्रीभगवान् कहते हैं। चलिए इसे तरतीब से सजाने का एक छोटा सा प्रयास करते है।
मेरे में ही जिसका मन असक्त हो गया है अर्थात अधिक स्नेहके कारण जिसका मन स्वाभाविक ही लग गया है, चिपक गया है, इसलिए मेरी याददाश्त नहीं सामान्य, प्रत्युत स्वाभाविक मेरी याद आती है और विस्मृति कभी होती है ऐसा नहीं है--ऐसा तू मेरे में मनवाला हो।जिसका उत्पत्ति-विनाशकारी वस्तुका और शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधका आकर्षण मिलते हैं, जिसका यह लोकमें शरीरके आराम, आदर-साकार और नामकी है बधाइमें तथा स्वर्गादि परके लोक भोगोंमें किञ्चिन्मात्रा भी है, असक्ति या प्रियता नहीं है, प्रत्युत् केवल मेरी तरफ ही है, ऐसे पुरुषका नाम 'मायासक्तमनाः' है। अर्थात मायासक्तमनाः का सरल भाव यह है कि जिसका मन माया यानी धन, पद, प्रतिष्ठा आदि में आसक्त हो।
साधक भगवान में मन कैसे स्थान पर ही की, जिससे उसके मन माया यानी धन, पद, प्रतिष्ठा आदि का सरलता से उपाय हो जाए--
इनके लिए दो तरीके बताए जा रहे हैं--
जैसे सूर्य के उदाहरण से इसे प्रत्यक्ष जानना सरल हो जाता है
(1) भक्त जब सच्चे सत्य से भगवान के लिए ही जप-ध्यान करने लगते हैं, तब भगवान उनके भजन मन (स्वीकार कर)लेते हैं।
शंका और समाधान:
(यहाँ पर भक्ति की दो अलग-अलग अवस्थाओं का वर्णन किया गया है:
पहली अवस्था: जब भक्त सच्चे सत्य से भगवान के लिए ही जप-ध्यान करने लगते हैं, तब भगवान उनके भजन मन (स्वीकार कर) लेते हैं। यहाँ पर भक्त अपने जप-ध्यान के माध्यम से भगवान के साथ जुड़ने का प्रयास करता है, और भगवान उसकी भक्ति को स्वीकार करते हैं।
दूसरी अवस्था: जब भगवान कहते हैं कि जप, तप, यंत्र, मंत्र आदि छोड़ मेरी शरण ग्रहण कर, तो यहाँ पर भगवान भक्त को अपनी शरण में आने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। यहाँ पर भक्त को अपने जप-ध्यान, तप आदि को छोड़कर सीधे भगवान की शरण में आने के लिए कहा जा रहा है। यह भगवान की ओर से एक आमंत्रण है, जिसमें भगवान भक्त को अपनी शरण में आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।)
जैसे, मालिक जैसे एक अमीर आदमी अपने नौकर को कोई काम नहीं देता है, लेकिन नौकर को उसकी सेवा के लिए पैसे देता है, वैसे ही भगवान भी अपने भक्त की भक्ति को स्वीकार करते हैं और उन्हें अपनी कृपा से आशीर्वाद देते हैं।
भगवान की कृपा से भक्त का मन भगवान में स्थिर हो जाता है और वह भगवान के साथ एकत्व का अनुभव करता है।
भगवान के प्रति सच्चे भक्त की भक्ति को भगवान स्वीकार करते हैं।
(2)भगवान् सब जगह हैं तो यहाँ भी हैं; क्योंकि अगर यहां नहीं हैं तो भगवान सब जगह हैं--यह कहना तो नहीं बनता ना। भगवान सब समय में हैं तो इस समय भी हैं; क्योंकि अगर यह समय नहीं है तो भगवान सब समय में हैं--यह कहना भी नहीं बनता।
भगवान अगर सबमें हैं तो मेरे में भी हैं; क्योंकि अगर मेरे में नहीं हैं तो भगवान सबमें हैं-- यह कहा भी नहीं बनता।
भगवान सर्वशक्तिमान हैं तो मेरे भी हैं; क्योंकि अगर मेरे नहीं हैं तो भगवान साक्षात हैं--यह कहना नहीं बनते इसलिए भगवान यहां हैं, अभी हैं, अपने में हैं और अपने हैं। कोई भी देश, काल, वस्तु, परिस्थिति, घटना और क्रिया अनुपयोगी नहीं है, अनुपयोगी होना सम्भव नहीं है। इस बात को सिद्धसे मानते हैं, भगवन्नाममें, प्राणमें, मनमें, बुद्धिमें, शरीर, शरीरके कण-कणमें परमात्मा हैं--इस भावकी जागृति धारण किए हुए नाम-जप करे तो बहुत जल्दी भगवान में मन लगाने वाला हो सकता है।
सरल भाव:
हर जीव का स्वभाव है कि वह किसी-न-किसी का आश्रय लेता है। लेकिन जब तक उसका लक्ष्य परमात्मा नहीं होता, तब तक वह शरीर और संसार के प्रति आसक्त रहता है।
लेकिन जब वह भगवान को ही सर्वोपरि मान लेता है, तब वह भगवान में आसक्त हो जाता है और भगवान ही उसका आश्रय बन जाता है।
भगवान का आश्रय ही एकमात्र स्थिर और अविनाशी आश्रय है। इसलिए, हमें भगवान का ही आश्रय लेना चाहिए और अपने मन को भगवान में आसक्त करना चाहिए।
इसको इस तरह प्रत्यक्ष में समझ सकते है। हॉस्पिटल प्रसव करवाने को बने हैं जहां सहारा डॉक्टर बनता है। पर कभी कभी रोड बनाने वाली मजदूर महिला कार्य स्थल पर ही बच्चे को जन्म दे देती है।किसके सहारे? बाद में उसे बेशक हस्पताल ले जाते है।
ऐसे ही भगवान के साथ जो संबंध है, वह स्वाभाविक और अखंड है। जो साधक भगवान के साथ जुड़ जाता है, वह जप, ध्यान, कीर्तन आदि में सम हो जाता है और भगवान की लीला और स्वरूप का चिंतन करता है।
उसका व्यवहार स्वाभाविक रूप से भगवान के अनुकूल हो जाता है। यही इस योग का अभ्यास है। जब साधक का मन भगवान में आसक्त हो जाता है और वह भगवान के आश्रय में रहता है, तो वह कोई भी कार्य करता है, वह इसी योग का अभ्यास ही होता है।वह खुद वह काम नहीं कर रहा होता है।
प्रत्यक्ष में सांस लेना और छोड़ना स्वाभाविक रूप में अपने आप ही होता रहता है।
सरल भाव:
जिसका मन भगवान में आसक्त हो गया है और जो भगवान का सहायक नोकर हो गया है, वह पुरुष भगवान के समग्र रूप को जान लेता है। वह भगवान के सभी रूपों को जान सकता है, चाहे वह सगुण या निर्गुण, साकार या निराकार, अवतार या अवतारी हो। वह भगवान के सभी रूपों को जान सकता है और उनका दर्शन भी कर सकता है। (वह सहायक निराकार को भी साकार कर लेता है)
सरल भाव:
भगवान विष्णु का उद्बोधन है कि यदि मनुष्य की आसक्ति भोगों में है और आश्रय रुपये-पैसे, कुटुंब आदि का है, तो कोई भी योगाभ्यास नहीं किया जा सकता।
भगवान के समग्र रूप को जानने के लिए, मनुष्य को भगवान में ही प्रेम होना चाहिए और भगवान का ही आश्रय लेना चाहिए।
*👉(प्रत्यक्ष ज्ञान में देखते है आज कल लोग भगवान को पाने के लिए गुरु की शरण में जाते है पर भगवान कहते है। कि भगवान का ही आश्रय लेना चाहिए।.......जो सत्य है।
रोटी पकाने को चूल्हे में दो लकड़ी से काम हो जाता है।परंतु अगर इसी काम के लिए तंदूर का सहारा लें तो लकड़ी की मात्रा बढ़ानी ही पड़ती है)*
मनुष्य को भगवान से किसी भी कलाकार की इच्छा नहीं करनी चाहिए।
भगवान अर्जुन को कहते हैं कि तू भगवान में आसक्त हो जा और भगवान का ही आश्रय ले।
👉परमात्माके साथ वास्तविक संबंधका नाम 'योगम्' है और उस संबंधको अखण्डभावसे का नाम 'युञ्जन' है। कलाकार यह है कि मन, बुद्धि, इंद्रियों के आदि के साथ मिलकर काम करता है अपने में 'मैं'-रूपसे जो एक व्यक्तित्व वाला व्यक्ति है, उसे नहीं मिला परमात्माके साथ जो अपना वास्तविक आदर्श है, उसका अनुभव करता रहता है।
वास्तव में 'योगं युञ्जन्' की इतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी आवश्यकता है संसारकी आशक्ति और आश्रय की। संसार की अशक्ति और शरण से परमात्मा का चिंतन स्वत:-स्वाभाविक होगा और संपूर्ण क्रियाएं निष्काम-भाव बेकार होने लगेंगी। फिर भगवान्को इनवेस्टकेस कोई अभ्यास नहीं करना। इसका मतलब यह है कि जिसका संसार की ओर से महत्व है और अंतःकरण में उत्पत्ति-विनाशकारी वस्तु का महत्व निहित है, वह परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं जान सकता। क्योंकि उसकी आस्तिकता, कामना, महत्ता संसार में है, जिससे संसार में परमात्मा के गुण रहते हैं वह भी वहां नहीं जान सकता। मनुष्यका जब समाजके किसी बड़े व्यक्ति से अपनापन हो जाता है, तबसे एक समानता होती है। ऐसे ही जब हमारे सदाके हितैषी और हमारे खास अंशी भगवान में आत्मीयता जाग्रत हो जाती है, तब हरदम की महिमा एक अलौकिक, अलौकिक प्रेम प्रकट होती है। फिर भगवान में भगवान ही मनवाला और भगवान के देवता होते हैं।
👉इस का सरल भाव:
परमात्मा के साथ वास्तविक संबंध को 'योग' कहा जाता है और उस संबंध को अखंड भाव से जीने को 'युञ्जन' कहा जाता है।
जो व्यक्ति संसार की आशक्ति और आश्रय को त्यागकर परमात्मा के चिंतन में लीन रहता है, वह परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को जान सकता है।
जब हमारे और परमात्मा के बीच आत्मीयता जाग्रत हो जाती है, तब हमें एक अलौकिक प्रेम का अनुभव होता है और हम परमात्मा में ही मनवाले और भगवान के देवता होते हैं।
(जब हमको भगवान अपना देवता मान लेते है तब जैसे हम उनको भजते है वैसे ही भगवान भी हम को भजते भजते है)
👉शरणागतिके पर्याय
आश्रय, अवलंबन, अधीनता, प्राप्ति और सहारा--ये सभी शब्द 'शरणगति' के पर्यायवाचक होते हैं और उनका भी अपना अलग अर्थ होता है; जैसे--
(1) 'आश्रय' जैसे हम पृथ्वी के आधार के बिना उठना-बैठना आदि कुछ भी नहीं कर सकते, ऐसे ही प्रभु के आधार के बिना हम सिर्फ जी ही सकते और कुछ भी नहीं कर सकते। जीना और कुछ भी करना प्रभुके आधार से ही होता है। इसीको 'आश्रय' कहते हैं।
👉 'एवलंबन' जैसे किसी के हाथ की हड्डी के टुकड़े पर से डॉक्टर उस पर पट्टी को बाएं हाथ से सहला तक देते हैं तो वह हाथ का अवलंबन हो जाता हैं,
नाहि कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम *अवलंबन* एकू” यह पंक्ति तुलसीदास जी की है.
इसका अर्थ है कि कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है.
राम नाम की महिमा के बारे में कुछ और बातें:
👉राम नाम को कल्पतरु कहा गया है.
👉राम नाम को कल्याण का निवास और मुक्ति का घर कहा गया है.
👉राम नाम के बारे में कहा जाता है कि यह नाम सबको सुलभ है.
राम नाम की महिमा इस वजह से भी है कि भगवान राम के जन्म से पहले इस नाम का इस्तेमाल ईश्वर के लिए होता था.
राम शब्द संस्कृत के रम् और घम से मिलकर बना है. रम् का अर्थ है रमना या समा जाना और घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान.
कलियुग में राम का नाम कल्पतरु (मन चाहा पदार्थ देने वाला) और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर) है, जिसको स्मरण करने से भाँग सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसी के समान (पवित्र) हो गया॥
ऐसे ही संसार से निराश एवलंबन का अर्थ है "एकमात्र आश्रय" या "केवल एक ही पर निर्भर रहना"। इसका भाव यह है कि किसी एक व्यक्ति, वस्तु या शक्ति पर ही पूर्ण रूप से निर्भर रहना और उसी पर अपना विश्वास रखना।
👉 'अधिनता' अधीनस्थता दो तरह से होती है--
1-कोई हमें स्वामित्व कर ले या पकड़ ले या है खुद अपनी तरफ से किसीके अधीन हो जायें या उसके दास बन जायें। ऐसे ही अपना कुछ भी प्रस्तावना नहीं, अर्थात् केवल भगवान्को लेकर ही अनन्यभाव से सर्वथा भगवान्का दास बन जाना और केवल भगवानको अपना ही स्वामी मान लेना 'अधिनता' है।
👉'प्रपत्ति' प्रपत्ति का अर्थ है कि जब कोई व्यक्ति दुनिया की तरफ से पूरी तरह से निराश हो जाता है और भगवान की शरण में जाता है, तो यही 'प्रपत्ति' या 'प्रपन्नता' कहलाती है।
सरल शब्दों में, जब कोई व्यक्ति दुनिया से निराश होकर भगवान की शरण में आता है, तो यह 'प्रपत्ति' है।
इस को द्रोपदी के चीर हरण से जोड़ कर भी देख सकते है।
दरबार में जब द्रोपदी का चीर हरण होता है। द्रोपदी खुद को बचाने को कभी साड़ी खींचती, कभी ढकती, कभी मुंह में दबा लेती है।अपने सभी प्रयत्नों से हार कर श्री कृष्ण को पुकारती है। तो श्री कृष्ण लाखों साड़ियों का ढेर लगा देते है।'प्रपत्ति' (प्रपन्नता) है।
👉 सहारा-- जैसे जल में सूर्योदय वाले को कोई वृक्ष, लता, रस्से आदि का आधार मिल जाता है, ऐसे ही संसार में बार-बार जन्म-मरण में सूर्योदय भय से भगवान का आधार लिया जाना 'सहारा' है।
इस प्रकार के सभी शब्दों में केवल शरणागतिका भाव प्रकट करने को ही होता है।
और शरणागति तब होती है, जब भगवान में ही आशक्ति हो और भगवान में ही आश्रय हो अर्थात् भगवान में ही मन लगे और भगवान में ही बुद्धि लगे। यदि मनुष्य मन-बौद्धिसहित स्वयं भगवानके (समर्पित) हो जाता है, तो शरणागतिके ही सर्वस्व भाव एक जैसा हो जाता है। वस्तुमात्र प्रतिक्षण प्रलय की ओर जा रही है और किसी भी वस्तु से अपना नित्य सम्बन्ध है ही नहीं--
यह तो हर किसी को अनुभव होता है। अगर इस अनुभव को महत्व दिया जाए अर्थात् मिटने वाले संबंध को अपना न माना जाए तो अपने कल्याण का उद्देश्य होने से भगवान की शरणागति स्वतः आ जाएगी। कारण कि यह स्वतः ही भगवान का है। संसारके साथ केवल विमुखता हुई है।
(वास्तविकता में विमुखता नहीं है)।
इसलिए माना जाता है कि भगवान के साथ जो स्वतःसिद्ध संबंध है, वह प्रकट होता है।
अभी तक सातवें अध्याय के पहले श्लोक में ही उलझे हुए थे।
संबंध-- पहले श्लोक में भगवान ने अर्जुन से कहा गया था कि तू मेरे समग्र रूप को जैसा जानेगा, वह सुन। अब भगवान आगे के श्लोक में उन्हें सुनाने की प्रतिज्ञा करते हैं।
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 2
श्लोक:
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
भावार्थ:
मैं तेरे लिए इस विज्ञान सहित तत्व ज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता
॥2॥
श्री पुरातत्त्व के अनुसार शास्त्र से ज्ञात तत्त्व का वास्तविक रूप स्वानुभव होना विज्ञान है।
जहां भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे न केवल शास्त्रीय सिद्धांतों का वर्णन करेंगे, वरन् प्रवचनकाल में ही वे आत्मानुभव के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचेंगे।
उनका यह वर्णन कुछ अनोखा हो सकता है क्योंकि योग साधना और भारतीय दर्शन के अन्य साधकों को लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनकी प्राप्ति के लिए विशेष साधना करना पड़ती है।
ग्रंथ वेदांत शास्त्र का स्वरूप भिन्न है क्योंकि साधक को उसके नित्य सिद्ध स्वरूप का ही बोध हुआ है न कि स्वयं से भिन्न किसी वस्तु का। अत: एक सुयोग्य शिष्य को उपदेश ग्रहण के लिए भावनानुभव के लिए कहीं भी किसी भी जंगल में जाने की आवश्यकता नहीं होती है। किसी भी शिष्य को ज्ञान के लिए सिद्धांतों की आवश्यकता होती है और गुरु के बताए गए तर्कों को समझने में सक्षम होता है तो उसे अध्ययन काल में ही सिखाया जाता है। आत्मानुभव हो सकता है। यही कारण है कि वेदांत केवल सुयोग्य विद्यार्थियों को ही पढ़ाया जाता है।
उत्तम शिष्य के लिए आत्मानुभूति तत्काल प्राप्य है। उसे कालान्तर या देशान्तर की स्थिति नहीं है। यदि वेदांत एक पूर्ण शास्त्र है और उपदेश काल में ही आत्मानुभव सिद्ध हो सकता है तो क्या कारण है कि विश्वभर में ऐसे ज्ञानी पुरुष विरले ही होते हैं, ऐसा भगवान कहते हैं।
👉सरल भाव:
भगवान कहते हैं कि वे विज्ञान और ज्ञान को समग्रतासे समझाएंगे, जिससे कुछ भी पता नहीं चलता।
👉जैसे किसान खेतों में कीट नाशक का छिड़काव करता है।तो उसके डिब्बे,बोतल,आदि पर कुछ नियम लिखे होते है।दस्ताने,आंखों को ढकना, शरीर का कोई अंग खुला ना हो इत्यादि, इत्यादि।
पर उस रास्ते से गुजरने वाले के लिए कुछ नहीं होता ।
लेकिन जब भगवान को जानने के लिए कुछ भी पता नहीं चलता, तो फिर सभी लोग उस तत्व को ही क्यों नहीं जान लेते?
जिसको जानना है(भगवान)
इसका उत्तर यह है कि भगवान को जानने के लिए मन, बुद्धि और इंद्रियों की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ये प्राकृतिक हैं और परमात्मा को जानने में असमर्थ हैं।
भगवान को स्वयं से ही स्वयं में ही जाना जा सकता है, मन-बुद्धि आदि से नहीं।
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 3
श्लोक:
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥
भावार्थ:
हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है
7॥3॥
व्याख्या:
भारतीय शास्त्रीय साहित्य में विभिन्न भिन्न-भिन्न आचार्यों ने अलग-अलग बारम्बर से इस विचार को खोजा है कि आत्मज्ञान और उनके अपरोक्ष अनुभव प्राप्त करने वाले साधक विरले ही होते हैं। इसके पहले भी हमें बताया गया था कि वेदांत के सिद्धांतों को भी एक आश्चर्य के समान सुना और समझा जाता है। उपनिषदों में भी इसीथ्य का ऋषियों द्वारा वर्णन किया गया है। यहां भगवान श्रीकृष्ण के आत्मज्ञान की प्राप्ति का उत्तरदायित्व साधक पर ही प्रतिबंध है। यदि किसी साधक को यह अनुभव प्राप्त नहीं हो पाता है तो उसका मुख्य कारण पुरुषार्थ की कमी है। वेदांत आध्यात्म विषयक विज्ञान होने के कारण हमारे लिए हमारे अपने अवगुणों का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना आवश्यक है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि किसी विरले पुरुष में ही आत्मोन्नति की गति अभिलाषा होती है, जिसके लिए वह सर्व अर्पण करने के लिए तत्पर रहता है। उनमें भी कोई पुरुष ऐसे ही होते हैं जो आध्यात्मिक जीवन पद्धति को पूर्णताया अपनाते हैं ऐसे प्रयास करने वाले साधकों में से कोई एक साधक मुझे तत्त्व से परिचित कराता है। इनके अनेक कारण हैं। जब शिष्य उत्साहपूर्वक एकाग्रचित्त को सद्गुरु के उपदेश का श्रवण करता है तब वह स्वयं किसी भी सीमा तक ऊँचा उठ सकता है। लेकिन हो सकता है कि सत्य के द्वार तक पहुंच कर वह किसी सूक्ष्म एवं अज्ञात अभिलाषा या अभिलाषा के कारण अपनी प्रगति के मार्ग को अवरूद्ध कर ले और इस प्रकार सत्य के दर्शन से उत्पत्ति ही रह जाए। इस दृष्टि से ईसामसीह की यह घोषणा अर्थपूर्ण है कि एक धनवान व्यक्ति के स्वर्ग द्वार में प्रवेश करने की क्षमता एक उंगली के छिद्र से सरलता से प्रवेश करके बाहर निकल सकती है। यहां पर धन शब्द से अभिप्राय मन में रिकॉर्ड किए गए लाइसेंसों से है ना कि लोकतान्त्रिक विनाश से। जब तक मन पूर्णतया फिल्मांकन से शुद्ध नहीं हो सकता तब तक वह सत्य के आनंद का अनुभव नहीं कर सकता। करके उनके सिद्धांत को यथार्थ रूप में समझा जाता है। उनमें भी ऐसे साधकों की संख्या बहुत कम है जिनमें सत्य एवं शुद्धि का जीवन जीने के लक्ष्य के लिए ज्ञान, मन की दृढ़ता, शारीरिक सहनशक्ति और प्रयास की आवश्यकता होती है। तथापि गीता के जिज्ञासु लोग ऐसे ही विरले पुरुष हैं जो आत्मज्ञान के अधिकारी अर्जुन हैं। उन्हें भगवान श्रीकृष्ण विज्ञान सहित ज्ञान के उपदेश देते हैं जिससे आत्मा का साक्षात अनुभव हो सकता है। इस प्रकार के श्रोतों में इस ज्ञान के प्रति रुचि उत्पन्न होती है, वास्तव भगवान का कहने का भाव है। कि हजारों में से कोई एक ही मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है। इसका कारण यह है कि लोग भोगों में ही रहते हैं और परमात्मा की प्राप्ति के लिए यत्न करने वाले बहुत ही कम होते हैं।
भगवान कहते हैं कि जो मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है, वह मुझे तत्त्व से तो जानता है। अर्थात वह मेरी वास्तविक प्रकृति को समझता है और मेरी अनुभूति में कोई सन्देह भी नहीं करता।फिर भी मेरी प्राप्ति कठिन नहीं है, लेकिन उत्कट अभिलाषा होना और परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति कठिन है। इसका अर्थ है कि मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करना आसान नहीं है, लेकिन जो करता है, वह मुझे तत्त्व से जानता है।जान पहचान तक ही सीमित रह जाता है।(जैसे मालिक का सेवक या प्रहलाद)
7॥3॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 4-5
श्लोक:
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥
भावार्थ:
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी- इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है।
यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो अपरा अर्थात मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो! इससे दूसरी को, जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात चेतन प्रकृति जान
जैसे अपरा आपके शिशु के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरुरी है। यह: आपके शरीर से शिशु तक ऑक्सीजन और पोषक तत्वों (जैसे कि विटामिन, ग्लूकोज़ और पानी आदि) को पहुंचाता है शिशु से अपशिष्ट पदार्थों जैसे कि कार्बन डाइऑक्साइड आदि को आपके शरीर तक पहुंचाता है। ऐसे भगवान से हम सभी जुड़े हुए है
7॥4-5॥
व्याख्या:
वैदिक काल के महानुभावों ने जगत की उत्पत्ति पर सूक्ष्म विचार करते हुए बताया कि जगत् जड़ पदार्थ (प्रकृति) और चेतनतत्त्व (पुरुष) का संयोग से उत्पन्न होता है। उनके अनुसार पुरुष के नाम में जड़वत प्रकृति से निर्मित शरीर आदि आत्माएं चैतन्ययुक्त सभी व्यवहार करने में सक्षम हैं। एक आधुनिक दृष्टान्त से इस सिद्धांत को स्पष्ट किया जा सकता है। लोहे के बने पदार्थ में स्वंय कोई गति नहीं होती। परन्तु जब उसका सम्बन्ध उच्च दबाब की छुट्टी से होता है तब वह गतिमान हो जाता है। केवल वेव भी किसी भी यंत्र की सहायता के बिना अपनी शक्ति को व्यक्त नहीं कर सकते हैं, दोनों के संबंध से ही यह कार्य सम्पादित किया जाता है। डिग्रीयों के संयोग से यह नानाविध सृष्टि के रूप में प्रकट हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में प्रकृति का वर्णन करते हैं और अगले श्लोक में चेतन तत्व का वर्णन करते हैं। यदि एक बार मनुष्य प्रकृति और पुरुष जड़ और चेतन भेद का स्पष्ट रूप से समझ ले तो वह यह भी सरलता से समझ सकता है कि जड़ता की डिग्री के साथ आत्मा का तादात्म्य ही उसके सभी दुखों का कारण है। स्वाभाविक ही इस मिथ्या तादात्म्य की निवृत्ति होने पर वह स्वयं अपने स्वरूप को पहचान सकता है जो पूर्ण आनंदस्वरूप है। आत्मा और अनात्मा के सम्बन्ध से तादात्म्य से जीव उत्पन्न होता है। यही संसारी दुखी जीव आत्मानात्मविवेक से यह समझ में आता है कि वह तो वास्तव में जड़ प्रकृति का अधिष्ठान चैतन्य पुरुष है जीव नहीं। अर्जुन को जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण प्रथम प्रकृति के आठ भगवान को दर्शन देते हैं जो यहां अष्टधा प्रकृति कहा गया है. इस विवेक से प्रत्येक व्यक्ति अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप को पहचान सकता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी वे पंचभूत और मन बुद्धि और यह महाअष्टधा प्रकृति है जो परम सत्य की अज्ञानता का कारण है जो उस पर आद्यस्त (कल्पित) है। वैश्य (एक जीव) में स्थूल पंचमहाभूत का रूप है स्थूल शरीर और उनके सूक्ष्म भाव का रूप पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जो मनुष्य द्वारा बाह्य जगत् का अनुभव करती हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ ही वे कारण हैं जिनके द्वारा विषयों की संवेदनाएँ मन तक समाप्त हो जाती हैं। इनमें प्राप्त संवेदनाओं का रहस्य और उनका ज्ञान और कथन बुद्धि का कार्य है। इंद्रियों द्वारा विषय ग्रहण मन के द्वारा उनकी समग्रता और बुद्धि के द्वारा उनकी स्थिति इन त्रिमूर्ति पर एक अहं वृत्ति सदा बनी रहती है जिसे व्यवहार कहते हैं। ये जड़वत डिग्रीयाँ हैं जो चैतन्य का स्पर्श पवित्र चेतनवत व्यवहार करने में सहायक होती हैं।
👉 पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और व्यवहार - ये आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।अष्टधा प्रकृति अपरा जड़ है। उन्हें प्रदर्शित की गई कलाकृतियाँ अलग-अलग अपनी परा प्रकृति के देवता हैं। वह परा प्रकृति जीवरूप अर्थात् चेतन रूप है जिसके कारण ही शरीर, मन और बुद्धि अपने-अपने कार्य करते हैं। चैतन्य के बिना हमें न बाह्य सूक्ष्म जगत् का और न आन्त्रिक सूक्ष्म सूक्ष्म विचार रूप जगत् का ही अनुभव और ज्ञान हो सकता है। किस जगत को धारण किया हुआ है। उनकी कमी में समान हमारी दशा एक पाषाण के होरिया जिसमें न चेननता है और न ही प्रतिभा है। भगवान के इस कथन को देखें कि प्रकृति जगत का आधार भौतिक विज्ञान की दृष्टि से विचार करके भी सिद्ध किया जा सकता है। हम अपने घर में रहते हैं जिसका आधार भूमि है। वह भूमि भाग का आधार है शहर शहर का राष्ट्र और राष्ट्र का आधार विश्व है समुद्र के जल से स्थिति वायुमण्डल पर निर्भर है। यह वायुमंडल तो सौरमंडल या ग्रहमंडल का एक भाग है। संपूर्ण विश्व में आकाश स्थित है और मन में आकाश स्थित है। मन का आधार बुद्धि का निर्णय है। और क्योंकि बुद्धिवृत्तियों का ज्ञान चैतन्य ही संभव है इसलिए यह चैतन्य ही संपूर्ण जगत का आधार सिद्ध होता है। वही जगत् का अधिष्ठान है।दर्शनशास्त्र में जगत् का अर्थ केवल इंद्रियगोचर जगत् ही नहीं वर्ण मन तथा बुद्धि के द्वारा अनुभूयमान जगत् भी उस शब्द की परिभाषा में समाविष्ट है। इस प्रकार के आकर्षक विषय-वस्तु और विचार ये सब जगत् ही हैं। यह संपूर्ण जगत् चेतनस्वरूप प्रकृति द्वारा धारण किया जाता है। महाबाहो ! यह अपरा प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी जीवरूपी पराकृति को जानो, जिससे यह जगत् कायम रहता है।
👉सरल भाव:
भगवान कहते हैं कि मेरी प्रकृति आठ प्रकार से विभक्त हुई है - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और व्यवहार। यह अपरा प्रकृति जड़ है और इसके देवता अलग-अलग हैं।
लेकिन इसके अलावा, मेरी एक और प्रकृति है जो जीवरूप अर्थात् चेतन रूप है। यह परा प्रकृति ही शरीर, मन और बुद्धि को कार्य करने की शक्ति देती है।
चेतन्य के बिना, हमें न बाह्य सूक्ष्म जगत् का और न ही आन्त्रिक सूक्ष्म विचार रूप जगत् का ही अनुभव और ज्ञान हो सकता है। चेतन्य ही जगत् को धारण किया हुआ है।
भगवान कहते हैं कि यह परा प्रकृति ही संपूर्ण जगत् का आधार है। यही जगत् का अधिष्ठान है।
7॥4-5॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 6
श्लोक:
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत का मूल कारण हूँ
7॥6॥
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप दोनों परा और अपरा प्रकृति ही प्राकृतिक रूप के कारण ही उत्पन्न होते हैं। क्योंकि मेरी तीनों प्रकृतियाँ ही समस्त भूतोंकी योनियों का वास्तविक कारण हैं।
व्याख्या:
फ़्लोरिडा अपरा एवं परा प्रकृतियों के पारस्परिक संबंध से यह नानाविध वैचित्र्यपूर्ण सृजनात्मकता है। जड़ प्रकृति के बिना चैतन्य की सार्मथ्य अभिव्यक्ति नहीं हो सकती और न ही उसके बिना जड़वत डिग्रीयों में चेनवत् व्यवहार की संभावना ही रहती है। बल्ब में स्थित तार में स्वयं विद्युत् ही प्रकाश के रूप में व्यक्तित्व होता है। लाइट की अभिव्यक्ति के लिए इलेक्ट्रिकल और पिज्जा दोनों का संबंध होना आवश्यक है। इसी प्रकार सृष्टि के लिए परा और अपरा जड़त्व और चेतन के संबंध की आवश्यकता होती है। इसी दृष्टि से भगवान कहते हैं ये दोनों प्रकृतियां भूतमात्र की वजह हैं। एक मेधावी शिष्यों को इस कथन का अभिप्राय लोड करना कठिन नहीं है। वस्तुनिष्ठ विषय अवलोकन और विचारधारा के जगत की न केवल उत्पत्ति और स्थिति बल्कि लय भी चेतन पुरुष में ही होती है। इस प्रकार अपरा प्रकृति पारमार्थिक स्वरूप में पारलौकिक से भिन्न नहीं है। आत्मा मनो अपने स्वरूप को भूलकर अपरा प्रकृति के साथ तादात्म्य बनाकर जीवभाव के दुखों को प्राप्त करती है। लेकिन ये उसका दुख मिथ्या असली नहीं है. स्वस्वरूप की पहचान ही अनात्मन से मुक्ति का एकमात्र उपाय है। परा से अपरा की उत्पत्ति एक ही प्रकार की होती है जैसे मिट्टी के बने घाटों की मिट्टी से। सभी घाटों में एक मिट्टी ही सत्य है, वही विषय प्रकार इंद्रियां मन और बुद्धि अपरा प्रकृति के कार्यों का वास्तविक स्वरूप चेतन तत्व ही है।
विद्युत ही पंखा ,फ्रिज ,ऐसी ,टीवी आदि को चलाती है।सप्लाई बंद होते ही सब चलना बंद हो जाता है।
भगवान कहते हैं कि अपरा और परा प्रकृतियों के बीच एक गहरा संबंध है। अपरा प्रकृति जड़ है, जबकि परा प्रकृति चेतन है।
भगवान का कहना है कि अपरा प्रकृति के बिना चेतन्य की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है, और चेतन्य के बिना अपरा प्रकृति जड़वत और निष्क्रिय हो जाती है।
भगवान का उदाहरण है कि जैसे बल्ब में स्थित तार में विद्युत् ही प्रकाश के रूप में व्यक्त होता है, वैसे ही अपरा और परा प्रकृतियों के बीच का संबंध है।
भगवान कहते हैं कि अपरा और परा प्रकृतियों के बीच का संबंध ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण है।
भगवान का कहना है कि अपरा प्रकृति पारमार्थिक स्वरूप में पारलौकिक से भिन्न नहीं है, और आत्मा को अपने स्वरूप को भूलकर अपरा प्रकृति के साथ तादात्म्य बनाकर जीवभाव के दुखों को प्राप्त करना पड़ता है।
भगवान का कहना है कि स्वस्वरूप की पहचान ही अनात्मन से मुक्ति का एकमात्र उपाय है।
7॥6॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 7
श्लोक:
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
भावार्थ:
हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ है
7॥7॥
व्याख्या:
जैसे माला में भांति भांति के मोती एक धागे में गूंधें होते है ऐसे ही सारा संसार भगवान रूपी धागे में बंधा हुआ है अगर धागे का संबंध टूट जाए तो सब बिखर जाता है।
❤️इसके पूर्व के श्लोकों में कथित सिद्धान्त को स्वीकार करने पर हमें जगत् की ओर देखने के दो दृष्टिकोण मिलते हैं। एक है अपर अर्थात् कार्यरूप जगत् की दृष्टि से तथा दूसरा इससे भिन्न है पर अर्थात् कारण की दृष्टि से। जैसे मिट्टी की दृष्टि से उसमें विभिन्न रूप रंग वाले घटों का सर्वथा अभाव होता है वैसे ही चैतन्यस्वरूप पुरुष में न विषयों का स्थूल जगत् है और न विचारों का सूक्ष्म जगत्। मुझसे अन्य किञ्चिन्मात्र वस्तु नहीं है।स्वप्न से जागने पर जाग्रत् पुरुष के लिये स्वप्न जगत् की कोई वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होती। समुद्र में असंख्य लहरें उठती हुई दिखाई देती हैं परन्तु वास्तव में वहाँ समुद्र के अतिरिक्त किसी का कोई अस्तित्व नहीं होता। उनकी उत्पत्ति स्थिति और लय स्थान समुद्र ही होता है। संक्षेप में कोई भी वस्तु अपने मूल स्वरूप का त्याग करके कदापि नहीं रह सकती है।पहले हमें बताया गया है कि प्रत्येक प्राणी में एक भाग अपरा प्रकृतिरूप है जिसका संयोग आत्मतत्त्व से हुआ है। यहाँ जिज्ञासु मन में शंका उठ सकती है कि क्या मुझमें स्थित आत्मा अन्य प्राणी की आत्मा से भिन्न है यह विचार हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचायेगा कि विभिन्न शरीरों में भिन्नभिन्न आत्मायें हैं अर्थात् आत्मा की अनेकता के सिद्धान्त पर हम पहुँच जायेंगे। .समस्त नामरूपों में आत्मा के एकत्व को दर्शाने के लिये यहाँ भगवान् कहते हैं कि वे ही इस जगत् के अधिष्ठान हैं। वे सभी रूपों को इस प्रकार धारण करते हैं जैसे कण्ठाभरण में एक ही सूत्र सभी मणियों को पिरोये रहता है। यह दृष्टांत अत्यन्त सारगर्भित है। काव्य के सौन्दर्य के साथसाथ उसमें दर्शनशास्त्र का गम्भीर लाक्षणिक अर्थ भी निहित है। कण्ठाभरण में समस्त मणियाँ एक समान होते हुये दर्शनीय भी होती हैं परन्तु वे समस्त छोटीबड़ी मणियाँ जिस एक सूत्र में पिरोयी होती हैं वह सूत्र धागा हमें दृष्टिगोचर नहीं होता तथापि उसके कारण ही वह माला शोभायमान होती है।इसी प्रकार मणिमोती जिस पदार्थ से बने होते हैं वह उससे भिन्न होता है जिस पदार्थ से सूत्र बना होता है। वैसे ही यह जगत् असंख्य नामरूपों की एक वैचित्र्यपूर्ण सृष्टि है जिसे इस पूर्णरूप में एक पारमार्थिक सत्य आत्मतत्त्व धारण किये रहता है। एक व्यक्ति विशेष में भी शरीर मन और बुद्धि परस्पर भिन्न होते हुये भी एक साथ कार्य करते हैं और समवेत रूप में जीवन का संगीत निसृत करते हैं। केवल यह आत्मतत्त्व ही इसका मूल कारण है।यह श्लोक ऐसा उदाहरण है जिसमें हमें महर्षि व्यास की काव्य एवं दर्शन की अपूर्व प्रतिभा के दर्शन होते हैं। यहाँ काव्य एवं दर्शन का सुन्दर समन्वय हुआ है।किस प्रकार मुझ में यह जगत् पिरोया हुआ है वह सुनो
7॥7॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 8
श्लोक:
( संपूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान की व्यापकता का कथन )
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ
7॥8॥
यह सारा जगत् किस किस धर्म से युक्त मुझ में पिरोया हुआ है इस पर कहते हैं जल अर्थात तरल में मैं रस हूं अर्थात् जलका जो सार है उसका नाम रस है वह रसरूप मुझ परमात्मा में सब जल पिरोया हुआ है। ऐसे ही और सब में भी निकोलस स्मारक। जैसे जल में मैं रस हूँ वैसे ही चन्द्रमा और सूर्य में मैं प्रकाश हूँ। समस्त वेदों में मैं ओंकार हूं अर्थात् ओंकाररूप मुझ परमात्मा में सब वेद पिरोये हुए हैं। आकाश में उनका सारभूत शब्द है अर्थात वह शब्दरूप मुझ ईश्वर में आकाश पिरोया हुआ है। तथा पुरुषों में मैं पौरुष हूं अर्थात् पुरुषों में जो पुरुषत्व है जिससे एक पुरुष का अर्थ है वह मैं हूं वह पौरुषरूप मुझे ईश्वर में पुरुष पिरोये हुए हैं।
7॥8॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 9
श्लोक:
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥
भावार्थ:
मैं पृथ्वी में पवित्र (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध से इस प्रसंग में इनके कारण रूप तन्मात्राओं का ग्रहण है, इस बात को स्पष्ट करने के लिए उनके साथ पवित्र शब्द जोड़ा गया है।) गंध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में उनका तप हूँ
7॥9॥
व्याख्या:
अग्नि की जीभ ताप होता है। हम भगवान को भोग लगवाए या ना लगवाए अग्नि देव अपने ताप रूपी जीभ से भोग लगा ही लेते हैं यह सब भी उसी ईश्वर रूपी धागे में ही पिरोए हुए है।
7॥9॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 10
श्लोक:
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ
7॥10॥
व्याख्या:
वयोवृद्ध बुद्धि के जिज्ञासाओं के लिए पूर्व के दो श्लोकों में उदाहरण तत्व को समझने के लिए दिया गया है। अत: यहां भगवान श्रीकृष्ण के कुछ और उदाहरण दिये गये हैं। सभी भूतों का सनातन कारण मैं हूं। जैसे एक चित्रकार अपने चित्रों को अधिक से अधिक स्पष्ट और सुंदर बनाने के लिए नए नए रंग का प्रयोग करता है, वैसे ही मानो आपके रूप-रंग का वर्णन करता है, जैसे कि न तो भगवान श्रीकृष्ण और न ही कई दृष्टांत, जहां हम दृश्य जड़ जगत और अदृश्य चेतन आत्मतत्त्व के संबंध रखते हैं। को समझना।बुद्धिमानों की बुद्धि मैं एक बुद्धिजीवी व्यक्ति हूं जो अपने आदर्शों और विचारों के माध्यम से अपने दिव्य स्वरूप को व्यक्त कर पाता है। उस बुद्धि पुरुष के बुद्धि का वास्तविक सार्मथ्य आत्मा का कारण ही संभव है। इसी प्रकार तेजस्वियों का तेज भी आत्मा ही है। अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि आत्मा ही बुद्धि की डिग्री के अनुसार बुद्धि व्यक्ति के रूप में प्रकट होती है। जैसे इलेक्ट्रोनिक ही बिजली के गोले में उष्णता और रेडियो में संगीत के रूप में अभिव्यक्ति होती है।आगे कहते हैं।
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 11
श्लोक:
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥
भावार्थ:
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात शास्त्र के अनुकूल काम हूँ
7॥11॥
व्याख्या:
सामान्य सिद्धि के और मंदबुद्धि के लोगों को कई उदाहरण दिए गए हैं, यहां इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण के बारे में बताया गया है कि अत्यंत मेधावी पुरुषों के लिए तत्त्व का निर्देश दिया गया है, जिसमें यह क्षमता हो सकती है कि वह इस बताए गए निर्देश पर सूक्ष्म विचार कर सकें। मैं केवल यही कहता हूं कि पूर्व कथित दृष्टांतों की आवश्यकताएं कोई अधिक सुविधा नहीं देती हैं। लेकिन बल शब्द को दिए गए विशेष महत्व से विशेष महत्व प्राप्त होता है। सामान्य मनुष्य में जब इच्छा होती है तब वह कठिन परिश्रम करता है और अपनी इच्छित वस्तु को प्राप्त करने के लिए पूरी शक्ति देता है। कामना और भक्ति में दो प्रेरक वृत्तियों के बिना किसी बल की हमने कल्पना भी नहीं की है। हालाँकि सतही दृष्टि से काम और राग में हमें भेद दिखाई नहीं देता है तथापि विभिन्न अपने भाष्य में उसे स्पष्ट करते हैं कहते हैं। प्राप्त वस्तु की इच्छा काम है और प्राप्त वस्तु में आशक्ति राग कहलाती है। मन की मित्रता दो वृत्तियों के कारण व्यक्ति या परिवार समाज या राष्ट्र में अपना सामथ्र्य प्रकट करना होता है। हड़ताल और दंगे उपद्रवियों और युद्धों में स्पष्ट दृष्टांत वृत्तियाँ काम और राग हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं मैं बलवानों का काम और राग से कुंठा बल हूं। स्पष्ट है कि यहाँ सामान्य बल की कोई बात नहीं कही गयी है। जिस कारण से वस्तु की प्रतीति होती है वह उसका धर्म प्रचारक है। मनुष्य का प्रमाण चैतन्य आत्मा के बिना उसका वास्तविक धर्म या स्वरूप नहीं हो सकता। व्यवहार में जो विचार भावना और कर्म उसके दिव्य स्वरूप के विपरीत हैं वे धर्म के दायरे में नहीं आते हैं। जिन दर्शन एवं कर्मों से आपके आत्मसमुदाय को धर्म की सहायता मिलती है उन्हें धर्म कहा जाता है और इसके विपरीत कर्म अधर्म कहलाते हैं क्योंकि वे उसकी आत्मविस्मृति को दृढ़ करते हैं। उनका पशु वशीभूत मानव पतित व्यवहार करना प्रतीत होता है। धर्म की परिभाषा को ध्यान में रखते हुए इस श्लोक के अध्ययन से उनका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। धर्म की अविरुद्ध इच्छा से लेकर महान साधक की वह इच्छा और क्षमता है जिसके द्वारा वह अपने दुर्बल शिष्यों को समझकर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है और आत्मोन्नति की सीढ़ी को ऊपर चढ़ा देता है। ईश्वर के कथनों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि मैं साधक वर्ण में स्थित आत्मज्ञान की प्रखर जिज्ञासा नहीं रखता। परिच्छिन्न डिग्री अपरिच्छिन्न आत्मा को कितना सीमित किया जा सकता है इसके उत्तर में भगवान कहते हैं
7॥11॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 12
श्लोक:
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥
भावार्थ:
और भी जो सत्त्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजो गुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू 'मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जान, परन्तु वास्तव में (गीता अ. 9 श्लोक 4-5 में देखना चाहिए) उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं
7॥12॥
तत्त्वरूप से मैं भगवान हूं। मूलतः मैं वे और वे मेरे में नहीं अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ।
जैसे, समुंदर में चादर को डाला जाए तो चादर समुंदर में है समुंदर का पानी तो चादर मैं हर तो क्या चादर कह सकती हे समुंदर मेरे में है? सागर से ही चादर समुंदर है सागर में चादर भी सागर ही है। पर सागर सागर ही रहता है चादर नहीं हो जाता।
वैसे ही बादल आकाश से ही उत्पन्न होते हैं, आकाश में ही रहते हैं और आकाश में ही लीन होते हैं; परंतु आकाश ज्यों-का-त्यों निर्विकार रहता है। न आकाश में बादल रहते हैं और न आकाश में आकाश रहते हैं। ऐसे ही क्लासिक श्लोक से लेकर यहां तक (सत्रह) विभूतियां बताई गई हैं, वे सब मेरे से पैदा ही होते हैं, मेरे में ही रहते हैं और मेरे में ही लीन हो जाते हैं। लेकिन वे मेरे में नहीं हैं और मैं वे नहीं हूं। मेरे सिद्धांत उनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इस दृष्टि से सब कुछ मैं ही हूँ।बात यह हुई कि भगवान के देवता सात्विक, राजस और तामस भाव अर्थात् प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ दिखाने वाले उद्यम हैं, उनकी सत्ता की भावनाएँ और महत्ता के कर्ता ये मनुष्य उन्हें खोखला कर रहे हैं। मूल रूप से भगवान उनवाची और कायदे-कानूनी ढांचे हैं कि इन सभी सहयोगियों और श्रमिकों में सत्य महत्ता मेरी ही है।
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होने वाले तरह-तरह के भाव (प्राकृत पदार्थ और क्रियाएँ) हैं, वे सब-के-सब भगवान्की शक्ति प्रकृतिसे ही उत्पन्न होती हैं।
जैसे सुराही,घड़े,गिलास में पानी अलग अलग आकृति में होता है।होता तो पानी ही है।
इसी तरह इस प्रकृति में भगवान से ही सब होते हैं'--ऐसा कहा गया है । प्रकृति यह है कि प्रकृति से जुड़े भगवान से ये सभी भाव भगवान से उत्पन्न होते हैं और भगवान में ही लीन हो जाते हैं, पर प्रकृति (जीवात्मा-) ने इन दोनों के साथ संबंध जोड़ा अर्थात् अपना और अपने लिए मान लिया--यही परा प्रकृति देव जगत्को धारण करना है। इसी से वह जन्मता-मरता रहता है। जैसे सोने से जेवर, जेवर से सोना,चाहे रत्न मंडित हो या टांके के जेवर में कुछ मिलावट सोना अपनी कीमत नहीं खोता, एक तोला स्क्रैप में लोह चूर्ण और एक तोला स्वर्ण चूर्ण हो तो लोहे की कीमत कम हो जाती है सोने की कीमत कम नहीं होती इसी बंधन का इलाज करने के लिए यहां कहा गया है कि सात्विक, राजस और तमस ये सभी भाव मेरे से ही होते हैं।
सब कुछ परमात्मा से ही उत्पन्न होता है, तब मनुष्य के साथ उन गुणों का कोई सम्बन्ध नहीं होता। अपने साथ गुणधर्म का संबंध न रसायन से यह मनुष्य बंधता नहीं अर्थात् वे गुण उसके लिए जन्म-मर्यादा कारण नहीं बनता।
गीता में जहां भक्ति का वर्णन है, वहां भगवान कहते हैं कि सब कुछ मैं ही हूं।भगवान ने पहले बारहवें श्लोक में कहा था कि ये सात्विक, राजस और तमस भाव मेरे से ही होते हैं पर मैं और वे मेरे में नहीं हैं। इस विवेचन से यह सिद्ध हुआ कि भगवान प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा निर्लिप्त हैं। ऐसे ही भगवान्का शुद्ध अंश यह जीव भी निर्लिप्त है। इसपर यह प्रश्न होता है कि जीव निर्लिप्तता कैसे होती है? इसके विवेचन अब आगे के श्लोक हैं।
7॥12॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 13
श्लोक:
( आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा )
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥
भावार्थ:
गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस- इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार- प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता।
7॥13॥
व्याख्या: सत्त्व रज और तम--तीनों गुणों की वृत्तियाँ उत्पन्न और लीन होती रहती हैं।
उनका साथ तादात्म्य एक वस्तु मे मिल कर दूसरा हो जाता है जिससे मनुष्य अपने आप को सात्विक, राजस और तामस मान लेता है। अर्थात उनका अपने में आरोप है कि 'मैं सात्विक, राजस और तामस हो गया हूं।' इस प्रकार विशेषता से मोहित मनुष्य ऐसा मान ही नहीं सकता कि वह परमात्मा का अंश है। (हम परमात्मा के अंश हैं कोई टुकड़ा नहीं है)
वह अपने अंशी ईश्वर की ओर से न देखकर उत्पन्न और नष्ट होने वाली वृत्तांतों के साथ अपना संबंध मान लेता है--यही उसका मोहित होना है। इस प्रकार होने वाले सम्मोहन के वशीभूत होने के कारण वह 'मेरा परमात्मा के साथ नित्य-सम्बन्ध है'--इसको समझ ही नहीं सकता।
जब कि भगवान तो यह कहते हैं कि मैं इन गुणों से परिपूर्ण हूं अर्थात इन गुणों से सर्वथा घटक, असंबद्ध, निर्लिप्त हूं। मैं न कभी किसी गुण से बंधा हुआ हूं और न ही किसी गुणवत्ता के बदलाव से मेरे में कोई बदलाव होता है। ऐसे मेरे वास्तविक स्वरूप को, विशेष रूप से, मोहित व्यक्ति को नहीं जानना शक बन जाता है।
शरीर के जन्मने में अपना जन्मना, शरीर के बीमार होने में अपना बीमार होना और शरीर के स्वस्थ होने में अपना स्वस्थ होना मान लेता है, जब कि सुख दुख तो शरीर का है
इसी से यह 'जगत' नाम से कहा जाता है। जबतक यह शरीर के साथ अपना तादात्म्य मानेगा, तब तक यह जगत् ही रहेगा अर्थात् जन्मता-मरता ही रहेगा, कहीं भी स्थिर नहीं रहेगा। गुणकोंकी भगवान्के दृढ़ सत्य विश्मृतसे ही जीवित मोहित होते हैं। यदि वे गुणधर्मों को भगवत्स्वरूप कहते हैं तो कभी मोहित हो ही नहीं सकते। शरीर को 'ममता' हुई और आपके शरीर को 'अहंता' हुई। शरीर के साथ अहंता-ममता करना ही मोहित होना है। मोहित हो जाने से गुण से सर्वथा अतीत जो भगवत्तत्त्व है, उसका उपयोग नहीं किया जा सकता। यह भगवत्तत्त्वको तभी जान सकता है जब त्रिगुणात्मक शरीर के साथ इसकी अहंतामता मिट जाती है। यह सिद्धांत है कि मनुष्य संसार से सर्वथा अलग होने पर ही संसार को जान सकता है और परमात्मा से सर्वथा सिद्धांत पर भी परमात्मा को जान सकता है। कारण यह है कि त्रिगुणात्मक शरीर से यह स्वयं सर्वथा भिन्न है और परमात्मा के साथ यह स्वयं सर्वथा स्थापित है।
अस्वाभाविक में स्वाभाविक भाव होना ही मोहित होना है। जो लक्षण नष्टवाले गुणधर्मों से परे हैं, अत्यधिक निर्लिप्त हैं और नित्य-निरंतर एकरूप बने हुए हैं, ऐसे परमात्मा 'स्वाभाविक' हैं। परमात्मा की यह स्वाभाविकता स्वाभाविक नहीं है, कृत्रिम नहीं है, अभ्यास साध्य नहीं है, प्रत्युत् स्वतः-स्वाभाविक है। परंतु शरीर और संसार में अहंता-ममता अर्थात 'मैं' और 'मेरा'-भाव उत्पन्न हुआ है और नष्ट हुआ है, यह केवल माना गया है, इसलिए यह 'अस्वाभाविक' है। इस अस्वाभाविक स्वभाव को ही मोहित किया जा सकता है, जिस कारण मानवीय स्वभाव को समझा नहीं जा सकता।
जीव पहले परमात्मा से विमुख हुआ या पहले संसारके सम्मुख (गुणोंसे मोहित) हुआ? मूलतः ये पहले या पीछे की बात नहीं कही जा सकती। परन्तु मनुष्य यदि मिल गया स्वतन्त्रताका आदर्श न करे, तो उसे केवल भगवान में ही ले जाना शुरू कर दे तो यह संसार से ऊपर उठ जाता है अर्थात इसका जन्म-मरण मिट जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य ने प्रभु की दी हुई स्वतन्त्रताका मिथ्या को धारण करके ही बंधन में बाँध दिया है। अपनी स्वतन्त्रताका क्षमता को नष्ट करके नष्ट होने वाले विद्वतजनों से यह परमात्मतत्त्वको जान नहीं सकता।
✍️सरल उपाय :(❤️जैसे यह शरीर आपका मंदिर है इस में आत्मा रूप में आप परमात्मा हो।बुद्धि सरस्वती माता आप हो।आप के साथ चलने वाले आप के नोकर है। और विषयों के अधीन हो जो खाता,पिता,देखता,सुनता,बोलता,स्पर्श करता हूं आप की पूजा है।निद्रा आप की समाधि,चलना फिरना आप की प्रदक्षिणा है मेरे वचन आप की स्तुति है ऐसे आराधना करते हुए कर्म में लीन होना❤️)
7॥13॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 14
श्लोक:
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
भावार्थ:
क्योंकि यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं
7॥14॥
व्याख्या:
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि मेरे द्वारा किए गए दुर्व्यवहार से युक्त आत्मकेन्द्रित पुरुष के लिए मेरी माया से उत्पन्न मोह को पार कर पाना अत्यंत कठिन है असंभव नहीं। यदि किसी चिकित्सक रोगी के रोग की पहचान कर सके कि इस रोग के निवारण के लिए कोई दवा नहीं है तो किसी भी रोगी को सावधानी और श्रद्धा के साथ चिकित्सक की सलाह के अनुसार उपचार नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार यदि भावरोगियों के चिकित्सक भगवान श्रीकृष्ण के रोग का कारण माया को बताया जाए तो किस व्यक्ति की श्रद्धा के साथ उनके धार्मिक उपदेश का संबंध है, भगवान श्रीकृष्ण के मित्र इस अशुभ या दोष को जानते हैं और इसलिए वास्तविक ही साधक के मन की बात को दूर करते हैं करते हैं। यादा कदा रोगियों द्वारा इस रोग की भयंकरता का भान कराने के लिए चिकित्सक को कठोर भाषा का प्रयोग करना ठीक होता है उसी प्रकार है जैसे यहाँ श्रीकृष्ण अनेक विशेषज्ञों द्वारा हमें इस रोग की भयंकरता का भान कराने का प्रयास किया जाता है जिससे हम अपने परमात्म स्वरूप को भूलकर सांसारिक जीवभाव को प्राप्त हो गए हैं रोग और उपचार के लिए भगवान श्रीकृष्ण को पूर्ण स्वास्थ्य का संरक्षण भी दिया जाता है। जो साधक मेरी शरण में आते हैं वे माया को तर जाते हैं। शरण से भगवान के स्वरूप को पहचानकर तत्स्वरूप बनना जाना जाता है। इसका सम्पादन कैसे किया जा सकता है इसका विवेचन पूर्व ध्यानयोग नामक अध्याय में किया जा सकता है। एकाग्र चित्त चित्त आत्मस्वरूप का ध्यान करने के लिए यह साक्षात साधन और ध्यान का उपाय है फिर आवश्यक योग्यता प्राप्त करने के लिए भी पहले बताएं। यदि आपके शरण में आने से माया पार हो जाती है तो सभी लोग आपके शरण में क्यों नहीं आते हैं ये पर कहा गया है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरी माया से उत्पन्न मोह को पार कर पाना बहुत कठिन है। यह माया इतनी शक्तिशाली है कि इससे मुक्ति पाना असंभव है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो लोग मेरी शरण में आते हैं, वे माया को तर जाते हैं। इसका मतलब है कि वे माया के प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि माया से मुक्ति पाने के लिए एकाग्र चित्त की आवश्यकता होती है। इसका मतलब है कि हमें अपने चित्त को एकाग्र करना होता है और आत्मस्वरूप का ध्यान करना होता है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि आप मेरी शरण में आते हैं और एकाग्र चित्त के साथ आत्मस्वरूप का ध्यान करते हैं, तो आप माया से मुक्त हो सकते हैं।
✍️सरल उपाय :(❤️जैसे यह शरीर आपका मंदिर है इस में आत्मा रूप में आप परमात्मा हो।बुद्धि सरस्वती माता आप हो।आप के साथ चलने वाले आप के नोकर है। और विषयों के अधीन हो जो खाता,पिता,देखता,सुनता,बोलता,स्पर्श करता हूं आप की पूजा है।निद्रा आप की समाधि,चलना फिरना आप की प्रदक्षिणा है मेरे वचन आप की स्तुति है ऐसे आराधना करते हुए कर्म में लीन होना❤️)
7॥14॥
सरल भाव:
यह सरल उपाय है कि आप अपने जीवन में परमात्मा को पूजने के लिए एक नया दृष्टिकोण अपनाएं। आप अपने शरीर को एक मंदिर के रूप में देखें और अपने आप को परमात्मा के रूप में देखें।
आप अपनी बुद्धि को सरस्वती माता के रूप में देखें और अपने इंद्रियों को अपने नौकरों के रूप में देखें। आप अपने दैनिक कार्यों को परमात्मा की पूजा के रूप में देखें, जैसे कि खाना, पीना, देखना, सुनना, बोलना, और स्पर्श करना।
आप अपनी निद्रा को परमात्मा की समाधि के रूप में देखें और अपने चलने और फिरने को परमात्मा की प्रदक्षिणा के रूप में देखें। आप अपने वचनों को परमात्मा की स्तुति के रूप में देखें और इस तरह से अपने जीवन में परमात्मा की आराधना करें।
7॥14॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 15
श्लोक:
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥
भावार्थ:
माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते
7॥15॥
व्याख्या:पहले श्लोक में कहा गया है कि मेरे भक्त माया को तर जाते हैं तो इस श्लोक में बता रहे हैं कि कौन से लोग हैं जो मेरी भक्ति नहीं करते हैं।
1 जो शास्त्र आज्ञा का पालन नहीं करते
2 जो हर कार्य को भगवान से जोड़ कर नहीं करते
इन दो प्रकार के लोगों का भेद स्पष्ट रूप से बिना जिज्ञासु साधक सम्यक् प्रकार से यह नहीं जान सकता कि मन की कौन सी प्रवृत्तियाँ मोह के लक्षण हैं। दुष्कृत्य करने वाले मूढ़ नराधम लोग ईश्वर की भक्ति नहीं करते हैं क्योंकि यह उनके विवेक का है माया हरण कर लेती है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि मनुष्य के उच्च विकास का लक्षण विवेकवती बुद्धि है। इस बुद्धि के द्वारा वह अच्छाबुरा उच्चनीच नैतिक-अनैतिक का विवेक प्राप्त करता है। बुद्धि ही वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अज्ञानजनित जीवभाव के स्वप्न से जागकर अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का साक्षात अनुभव कर सकता है। मनुष्य में देहात्मभाव थोड़ा और अधिक दृढ़ होगा, वही अधिक विषयाभिमुखी उसकी प्रवृत्ति होगी। अत: विषयभोग की इच्छा को पूर्ण करने के लिए वह निन्द्य कर्म में भी प्रवृत्त होगा। इस दृष्टि से पाप कर्म का अर्थ मनुष्यत्व की उच्च स्थिति को भी दर्शाता है। स्थूल देह को अपना स्वरूप समझकर मोहित हुए पुरुष ही पापकर्म करते हैं। ऐसे लोगों को यहां मूढ़ और आसुरी भाव का इंसान बताया गया है। गीता के श्लोक अध्याय में दैवी और असुरीभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि चार प्रकार के लोग हैं जो उनकी भक्ति नहीं करते हैं:
1. *दुष्कृतिनः* (दुर्जन): जो लोग दुर्जन हैं और दुराचारी हैं।
2. *मूढाः* (मूर्ख): जो लोग मूर्ख हैं और ज्ञान से रहित हैं।
3. *नराधमाः* (नीच): जो लोग नीच हैं और अपने कर्मों से नीचता को प्राप्त करते हैं।
4. *आसुरं भावमाश्रिताः* (आसुरी प्रकृति वाले): जो लोग आसुरी प्रकृति वाले हैं और जिनका स्वभाव दुर्जन और दुराचारी है।
परन्तु जो पुण्य कर्मी लोग हैं वे चार प्रकार से मेरी भक्ति करते हैं। भगवान कहते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो पुण्य कर्मी लोग हैं वे चार प्रकार से मेरी भक्ति करते हैं:
चतुर्विधा भजंते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।
इन चार प्रकार के लोग हैं:
1. _आर्तः_ (दुखी): जो लोग दुखी हैं और अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए भगवान की भक्ति करते हैं।
2. _जिज्ञासुः_ (जिज्ञासु): जो लोग ज्ञान की तलाश में हैं और भगवान की भक्ति करते हैं ताकि वे ज्ञान प्राप्त कर सकें।
3. _अर्थार्थी_ (धनवान): जो लोग धन और समृद्धि की तलाश में हैं और भगवान की भक्ति करते हैं ताकि वे अपने लक्ष्य प्राप्त कर सकें।
4. _ज्ञानी_ (ज्ञानी): जो लोग ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की तलाश में हैं और भगवान की भक्ति करते हैं ताकि वे अपने आत्मा को समझ सकें।
7॥15॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 16
श्लोक:
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥
भावार्थ:
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले अर्थार्थी (सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला), आर्त (संकटनिवारण के लिए भजने वाला) जिज्ञासु (मेरे को यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला) और ज्ञानी- ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझको भजते हैं
7॥16॥
खास बात भरी व्याख्या:
चार लड़के खेल रहे थे। तीनमें उनके विचित्र चार आम लेकर आये। देखते ही देखते एक लड़का आम मांगने लग गया और एक लड़का आम लेने के लिए चला गया। फैंसले उन दोनों को एक-एक आम दे दिया। तीसारा बॉय न तो रोता है और न मांगता है, केवल एक आम की तरफ देखा जाता है और चौथा लड़का एक आम की तरफ न देखा जाता है जैसे पहले खेल रहा था, वैसे ही मजेदार खेल आ रहा है। उन दोनों को भी दिलचस्प एक-एक आम दे दिया। इस प्रकार चारो ही वैज्ञानिको आम है। यहां आम मांग वाला लड़का अर्थार्थी है, रोने वाला लड़का कलाकार है, सिर्फ आम की तरफ देखने वाला जिज्ञासु है और आम की पहचान न करके गेम में लगे रहने वाला लड़का ज्ञानी है। ऐसे ही अर्थार्थी भक्त भगवानसे उपयुक्तता मांगता है, आर्त भक्त भगवानसे विपरीत दूर रखना चाहता है, जिज्ञासु भक्त भगवानसे जानना चाहता है और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त भगवान से कुछ भी नहीं चाहता है।
अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी--ये चारों ही भक्त भगवान हैं। मूलतः योगभ्रष्ट पुरुष (गीता 6. 41 42) में नहीं लिया जा सकता। ऐसे ही अर्थार्थी और कला--ये दोनों सकाम मेंसे भिन्न हैं; क्योंकि इन दोनों भक्तों में भगवान्का आश्रय मुख्य है। सकाम पुरूष इच्छा वास्तुमें ही लगे रहनेके कारण 'हृतज्ञान:' हैं (गीता 7.20), इसलिए असुरी अस्तुवाले पुरुषोंमें लिया गया है। तथापि अर्थार्थी आदि भक्तों में जो कुछ नवीनता है, वह कामना करता है, परन्तु कामना घटित होती है वह भी 'हृतज्ञानः' नहीं है। भगवान तो भगवान द्वारा कहा गया है।
जो भगवानके शरण होते हैं, उनमें सकामभाव भी हो सकता है; परन्तु उनमें मुख्यता भगवान्निष्ठा ही है। इसलिए उनके भगवान के साथ-साथ इतनी-जितनी रातें होती हैं,उत्पाद-उतना ही उनमें सकामभाव मिटता है और विलुप्ति आती है। इसलिए भगवानने 'उदाराः' कहा गया है और ज्ञानी भक्तों को अपना स्वरूप बताया गया है-- 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्'
(2)भगवान के साथ अपनापन, एक समान दूसरा कोई साधन नहीं है, कोई योग्यता नहीं है, कोई बल नहीं है, कोई अधिकार नहीं है। भगवान्का जन्मतिथिपर अपनापन सदासे है और सदा ही रहेगा। वह अपनेपनको केवल जीव ही भूला है और वह भूलसे दुनियाके साथ अपनापन मन ले लिया है। मूल रूप से इस भूल से शुरू हुआ अपनापन पाना है और प्रभु के साथ जो स्वतः सिद्ध है अपनापन है, महसूस करना है। भगवानके साथ अपनापन होनेपर अर्थात 'मैं केवल भगवान ही हूं और केवल भगवान ही मेरे हैं'--ऐसा विश्वाससे मान लेने वाला साधक भक्तों को अपने कहलानेवाले अंतःकरण में भावोंकी, गुणवत्ता की कमी भी दिख सकती है, पर भगवानके साथ अपनापन होनेसे वह टिकेगी नहीं। दूसरी बात, साधक भक्त में कुछ गुणवत्ता की कमी रहती हैपर भी भगवानकी दृष्टि केवल अपनेपनपर ही होती है, गुणवत्ताकी कमीपर नहीं। क्योंकि भगवान के साथ हमारा जो अपनापन है, वह असली है। भगवान का अपनापन तो दुष्ट-से-दुष्ट इंसान पर भी दिखता है। इसलिए सेलवें अध्याय में आसुरी प्रकृति का वर्णन करते हुए भगवान कहते हैं कि 'क्रूर, द्वेष करनेवाले, नराधम दुष्टोंको मैं आसुरी योनियों में गिराता हूं।' इस प्रकार भगवान आसुरी योनियों में गिरकर शुद्ध करते हैं। जैसे माता अपने बच्चे को नहलाती है तो उसकी सम्मति नहीं लेती, वैसे ही शुद्ध करनेके लिए भगवान को उसकी सम्मति नहीं देती; क्योंकि भगवान् से अपनापन है।
भगवान के साथ अपनापनका संबंध पहले से ही है। फिर भी कोई मनोकामना उत्पन्न होती है तो भक्तका भगवान के साथ आपका संपर्क मुख्य होता है और कामना उत्पन्न होती है। इस दृष्टि से ये भक्त प्रथम श्रेणी के हैं। भगवान्का संपर्क तो पहले से ही है, समयसमय पर इच्छा उत्पन्न होती है, सूचीबद्ध सूची से चाहते हैं। जबसे वस्तुएँकी आवश्यकता नहीं होती, तब अन्तमें भगवानसेचाहते हैं। इस तरह की अनोखीताकी होने वाली कमी के कारण ये भक्तके दूसरे वर्ग के हैं। जहां केवल इच्छा थी- आर्टिस्टके लिए ही भगवानके साथ अपनेपनका से संबंधित जाय, वहां कामना मुख्य होती है और भगवानका से संबंध गौण होता है। इस दृष्टि से ये भक्त तीसरी श्रेणी के हैं।
👉मार्मिक बात
कामना दो तरह की होती है--पारमार्थिक और लौकिक ।
जो मुक्ति की कामना है, जिसमें तत्त्वको दर्शन की इच्छा होती है, जिसे जिज्ञासा कहते हैं। यह जिज्ञासा समाहित है, वह जिज्ञासु होती है। गहन विचार किया जाय तो जिज्ञासा की इच्छा नहीं है; क्योंकि वह अपने स्वरूप को अर्थात् तत्त्वको जानना चाहता है, जो वास्तव में आवश्यक है। आवश्यकताएँ कहते हैं, जो निश्चित रूप से पूरी तरह से है और पूरी तरह से होना जरूरी है, दूसरी पैदा होना नहीं है। यह आवश्यक है सत्-विषयकी।
दूसरी इच्छा प्रभु-प्रेम-प्राप्ति की है। प्राप्त तो कहते हैं, वास्तव में वह अपने लिए प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत् प्रभुके लिए ही होता है। इसमें अपना किंचिन्मात्रा प्रोफ़ेसर शामिल नहीं है; प्रभुके समर्पित होने का ही प्रस्ताव रहता है। प्रेमी तो अपने- प्रभुके समर्पित कर देता है, जो उसका अंश है उपर्युक्त दोनों ही पारमार्थिक कामनाएँ वास्तव में 'कामना' नहीं हैं।
(2) लौकिक कामना-- लौकिक कामना भी दो तरह की होती है--सुख प्राप्त करना और दुःख दूर करना। शरीर को आराम मिले; जीत-जी मेरा आदर-सत्कार होता रहा और देर रात मेरा नाम अमर हो गया, मेरा स्मारक बन गया; कोई भी किताब बना दे, सभी लोग देखते रहें, देखें और यह जान लें कि ऐसा कोई विलुप्त पुरुष हुआ है; मृत्यु के बाद स्वर्ग आदिमें भोग भोगते रहें आदि-आदि लोक सुख-प्राप्तिकी कामनाएँ होती हैं। ऐसी इच्छाएं तो लक्ष्य ही है, जिससे बंधन और पतन होता है, नहीं होता। यह कामना आसुरी मुक्ति है, इसलिए यह त्याग है।दूसरी कामना दुःख दूर करना है। दुःख तीन प्रकार के होते हैं--आधिदैविक आधिभौतिक और आध्यात्मिक। अतिवृष्टि,
आपके द्वारा प्रदान किए गए श्लोक की व्याख्या करने के लिए मैं तैयार हूं। यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहा गया है और इसमें चार प्रकार के भक्तों का वर्णन किया गया है जो भगवान की भक्ति करते हैं।
इन चार प्रकार के भक्तों में से पहले तीन प्रकार के भक्तों की व्याख्या इस प्रकार है:
1. आर्तः (दुखी): जो लोग दुखी हैं और अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए भगवान की भक्ति करते हैं।
2. अर्थार्थी (धनवान): जो लोग धन और समृद्धि की तलाश में हैं और भगवान की भक्ति करते हैं ताकि वे अपने लक्ष्य प्राप्त कर सकें।
3. जिज्ञासुः (जिज्ञासु): जो लोग ज्ञान की तलाश में हैं और भगवान की भक्ति करते हैं ताकि वे ज्ञान प्राप्त कर सकें।
4. ज्ञानी (ज्ञानी): जो लोग ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की तलाश में हैं और भगवान की भक्ति करते हैं ताकि वे अपने आत्मा को समझ सकें।
इन चार प्रकार के भक्तों में से ज्ञानी भक्त सबसे उच्च स्तर के होते हैं क्योंकि वे भगवान की भक्ति को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाते हैं और भगवान के साथ अपनापन महसूस करते हैं।
क्यों कि ज्ञान ही सबसे उत्तम योग कहा है
कर्म,भगति आदि ज्ञान से जुड़ कर ही मोक्ष तक ले जाती है
ज्ञान दूध से मधानी द्वारा मथ कर निकाला मखन होता है।जिससे दुबारा दूध नहीं बनता है।
न कर्मणामनुष्ठानैर्न दानैस्तपसपि वा।। कैवल्यं लभते मर्त्यः साक्षात् ज्ञानेन केवलम् ॥2॥
न कर्मों के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है किंतु ज्ञान से ही प्राप्त होता है।
अर्थात:
ज्ञान ही सबसे उत्तम योग है, जो मोक्ष तक ले जाता है। कर्म, भक्ति आदि ज्ञान से जुड़कर ही मोक्ष तक ले जाते हैं।
ज्ञान को दूध से मधानी द्वारा मथकर निकाला गया मखन के रूप में समझा जा सकता है। जैसे मखन एक बार निकाल लेने के बाद दूध में नहीं मिल सकता, वैसे ही ज्ञान एक बार प्राप्त हो जाने के बाद अज्ञान में नहीं मिल सकता।
यहां यही कहा गया है कि कर्म, दान, तप आदि से मुक्ति नहीं मिलती, किंतु ज्ञान से ही मुक्ति मिलती है।
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 17
श्लोक:
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥
भावार्थ:
उनमें से नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है
7॥17॥
व्याख्या:
ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त का आकर्षण केवल भगवान में होता है। और किसी में नहीं,उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं रहती। इसलिए वह श्रेष्ठ है। अर्थार्थी आदि भक्तों में पूर्वसंस्कारों के कारण जबतक व्यक्तिगत इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं, तब तक उनकी एकभक्ति अर्थात् केवल भगवान में प्रेम नहीं होता। लेकिन उन भक्तों में सभी भक्त भगवान के प्रेमी और भगवान के प्रेमास्पद हो जाते हैं। वहाँ भक्त और भगवान में द्वैतका भाव न रहता है (प्रेममें अद्वैत) हो जाता है। ऐसे तो चारों ओर भक्त भगवान में नित्य-निरन्तर लगे रहते हैं; तीनों अनुयायियों के अंदर कुछ-न-कुछ व्यक्तिगत इच्छाएँ रहती हैं; जैसे--अर्थार्थी भक्त अनुकूलताकी इच्छा करते हैं, कलाभक्त भक्त अनुकूलताकी इच्छा करते हैं और जिज्ञासु भक्त अपने स्वरूप को या भगवत्तत्त्वको अप्राप्त की इच्छा करते हैं। ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त में अपनी कोई इच्छा नहीं रहती; मूलतः वह एकभक्ति है।
जैसे तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी को भी भगवान से ही जोड़ लेना।
क्यों कि ऐसे ज्ञानी प्रेमी भक्तोंको मैं अत्यंत प्यारा हूं। अपनी किञ्चिन्मात्रा में भी इच्छा नहीं है, केवल मेरे में प्रेम है। इसलिए वह मेरे को अत्यंत प्यारे हैं। वास्तव में तो भगवान्का अंश से सभी जीव स्वभाव ही भगवानको प्रिय हैं। भगवान के प्यार में कोई निजी नौकर नहीं है। जैसे माता अपने बच्चों का पालन-पोषण करती है, ऐसे ही भगवान बिना किसी कारण के सभी का पालन-पोषण और प्रबंधन करते हैं। परन्तु जो मनुष्य किसी कारण से भगवान के सम्मुख हो जाते हैं, उनके उस सम्मुखताके कारण से भगवान में उनकी एक विशेष प्रियता हो जाती है। है. पूर्णरूपसे जाग्रत् होनेका अर्थ है कि प्रेममें किञ्चिन्मात्रा भी कम नहीं रहता। प्रेम कभी ख़त्म भी नहीं होता; क्योंकि वह अनंत और प्रतिक्षण वर्धमान हैं। प्रतिक्षण वर्धमानका पृथ्वी है कि प्रेम में प्रतिक्षण अलौकिक चमत्कार का अनुभव होता है जैसेइधर पहले देखा ही नहीं, जहां हमारा ख़याल गया ही नहीं, अभी देखा गया--इस तरह का प्रतिक्षण भाव और अनुभव होता ही रहता है। इसलिए प्रेम को अनंत बताया गया है।
👉चतुर्विध भक्तों की तुलना तुलना करके भगवान कहते हैं कि जो ज्ञानी भक्त नित्ययुक्त है और आत्मस्वरूप के साथ अनन्य भक्ति करता है, वह सर्व श्रेष्ठ है
अब सवाल है वह सर्वश्रेष्ठ कैसे है?
क्योंकि आत्मतत्व से भिन्न किसी अन्य विषय में उसका मन विचरण ही नहीं करता है। जब तक साधक को अपने ध्येय का स्वरूप निश्चित रूप से ज्ञात नहीं होता तब तक मन की एकाग्रता भी प्राप्त नहीं हो पाती।
भक्ति का अर्थ होता है साधक के मन में आत्मसाक्षात्कार की ही एक वृत्ति बनी रहै। एक भक्ति को प्राप्त करने के लिए साधक को अपने मन की विषय-वस्तु से निवृत्त होना भी आवश्यक होता है। ज्ञानी व्यक्ति किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए अपने मन की उन प्रवृत्तियों को नष्ट करने के लिए ईश्वर की आराधना नहीं करता है, जिसके कारण उसके मन की शक्ति का जगत् के मिथ्या आकर्षणों में अपरिवर्तन हो जाती है।
जब कि परम स्वभाव यह है कि आत्मस्वरूप में स्थित भगवान श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञानी पुरुष को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जिससे मन में आत्मानुभूति के अलावा अन्य कोई इच्छा ही नहीं रहती।
ऐसे ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूं। प्रेम का मापदण्ड है प्रियतम के साथ हुआ तादात्म्य। असल में समर्पण की धुन पर ही प्रेम का गीत बनजाता है। निस्वार्थता प्रेम का आधार है। प्रेम की मांग है पूरे कालों में बिना किसी प्रतिदान की आशा के सर्वस्व दान। प्रेम के इस स्वरूप को देखकर ही पता चलेगा कि ज्ञानी भक्त का प्रेम ही वास्तविक, शुद्ध और पूर्ण प्रेम होता है। यहां भगवान स्पष्ट कहते हैं ऐसे ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूं और मुझे वह अत्यंत प्रिय है।
👉इस कथन में एक मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा हुआ है।
पुनः देखे
*भगवद गीता अध्याय: 7श्लोक 17*
श्लोक:
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥
*भावार्थ:*
*उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है*
7॥17॥
👉चतुर्विध भक्तों की तुलना तुलना करके भगवान कहते हैं कि जो ज्ञानी भक्त नित्ययुक्त है और आत्मस्वरूप के साथ अनन्य भक्ति करता है, वह सर्व श्रेष्ठ है
अब सवाल है वह सर्वश्रेष्ठ कैसे है?
क्योंकि आत्मतत्व से भिन्न किसी अन्य विषय में उसका मन विचरण ही नहीं करता है। जब तक साधक को अपने ध्येय का स्वरूप निश्चित रूप से ज्ञात नहीं होता तब तक मन की एकाग्रता भी प्राप्त नहीं हो पाती।
भक्ति का अर्थ होता है साधक के मन में आत्मसाक्षात्कार की ही एक वृत्ति बनी रहै। एक भक्ति को प्राप्त करने के लिए साधक को अपने मन की विषय-वस्तु से निवृत्त होना भी आवश्यक होता है। ज्ञानी व्यक्ति किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए अपने मन की उन प्रवृत्तियों को नष्ट करने के लिए ईश्वर की आराधना नहीं करता है, जिसके कारण उसके मन की शक्ति का जगत् के मिथ्या आकर्षणों में अपरिवर्तन हो जाती है।
जब कि परम स्वभाव यह है कि आत्मस्वरूप में स्थित भगवान श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञानी पुरुष को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जिससे मन में आत्मानुभूति के अलावा अन्य कोई इच्छा ही नहीं रहती।
ऐसे ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूं। प्रेम का मापदण्ड है प्रियतम के साथ हुआ तादात्म्य। असल में समर्पण की धुन पर ही प्रेम का गीत बनजाता है। निस्वार्थता प्रेम का आधार है। प्रेम की मांग है पूरे कालों में बिना किसी प्रतिदान की आशा के सर्वस्व दान। प्रेम के इस स्वरूप को देखकर ही पता चलेगा कि ज्ञानी भक्त का प्रेम ही वास्तविक, शुद्ध और पूर्ण प्रेम होता है। यहां भगवान स्पष्ट कहते हैं ऐसे ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूं और मुझे वह अत्यंत प्रिय है।
👉इस कथन में एक मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा हुआ है।
प्रेम का यह सनातन नियम है कि निष्काम होने पर न केवल पूर्णता प्राप्त होती है, वरन् एक दुष्ट को भी आदर्श बनाने की विचित्र सामर्थ्य होती है। यह एक सुविचारित एवं सुविदित तथ्य है कि यदि किसी व्यक्ति के मन में किसी विशेष भावना जैसी दुःख, द्वेष ,मात्सर करुणा से भर जाता है तो उसके निकटवर्ती लोगों के मन पर भी उस गति की भावना का प्रभाव पड़ता है।
अत: यदि हम किसी को निस्वार्थ शुद्ध प्रेम दे सकते हैं तो हमारे शत्रु का हृदय भी परिवर्तित हो सकता है।
👉नियम तो यही है।जब सभी आत्माएं उसी परमात्मा की है तो *तू मेरा चांद में तेरी चांदनी।*
*तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो*
*तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो*
पति पत्नी एक दूसरे के साथ भी पूजा स्तुति के रूप में प्रयोग क्यों नहीं कर सकते? क्या घर एक मंदिर नहीं है?
इस शास्त्रीय सत्य भगवान के इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि ऐसा ज्ञानी मुझे और मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
7॥17॥
प्रेम का यह सनातन नियम है कि निष्काम होने पर न केवल पूर्णता प्राप्त होती है, वरन् एक दुष्ट को भी आदर्श बनाने की विचित्र सामर्थ्य होती है। यह एक सुविचारित एवं सुविदित तथ्य है कि यदि किसी व्यक्ति के मन में किसी विशेष भावना जैसी दुःख, द्वेष ,मात्सर करुणा से भर जाता है तो उसके निकटवर्ती लोगों के मन पर भी उस गति की भावना का प्रभाव पड़ता है।
अत: यदि हम किसी को निस्वार्थ शुद्ध प्रेम दे सकते हैं तो हमारे शत्रु का हृदय भी परिवर्तित हो सकता है।
इस शास्त्रीय सत्य भगवान के इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि ऐसा ज्ञानी मुझे और मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
7॥17॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 18
श्लोक:
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥
भावार्थ:
ये सभी उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है- ऐसा मेरा मत है क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है
7॥18॥
व्याख्या:
जैसे--
👉 चतुर्थ अध्यायके पंद्रहवें श्लोक में भगवान ने कहा है कि 'जिस प्रकार के भक्त मेरे शरण में होते हैं, उसी प्रकार मैं उनका भजन करता हूं।' भक्त भगवानको चाहते हैं और भगवान अपने भक्त को चाहते हैं। लेकिन इन दोनों में पहले भक्त ने ही संबंध से जुड़ना है और जो पहले जुड़ता है, वह उदार होता है। त्राहिमाम यह है कि भगवान ने संबंध स्थापित किया या नहीं, इसका भक्त परवाह नहीं करता। वह तो अपनी तरफ से पहले संबंध जोड़ता है और अपने को समर्पित करता है। इसलिए वह उदार है।
👉 देवताओं की विधि से भक्त सकामभाव से निषेध यज्ञ दान, तप आदि कर्म करते हैं तो देवताओं को उनकी इच्छा के अनुसार वह वस्तु ही छोड़ दी जाती है; क्योंकि देवता लोग उनके हित-अहित नहीं देखते। लेकिन भगवान के भक्त अगर भगवान से कोई चीज मांगते हैं तो वह चीज दे देते हैं। अर्थात भगवान से उनकी भक्ति भोली हो, तो दे देते हैं और भक्ति न भोली हो दुनिया में पैदावत होती है तो नहीं देते। क्योंकि भगवान परम पिता हैं और परम हितैषी हैं। ऐसा हुआ कि आपकी इच्छा की प्रस्तुति हो या न हो, तो भी वे भगवान का ही भजन करते हैं, भगवान के भजन को नहीं कहते--यह उनकी उदारता ही है।
✍️संसारके भोग और रुपये-पैसे प्रत्यक्ष सुख देते हैं और भगवान के भजन में प्रत्यक्ष जल्दी सुख नहीं दिखता, फिर भी संसारके प्रत्यक्ष सुख को ठीक करते हैं अर्थात भोग भोगने और संग्रह करने की लालसा को ठीक कर उसकी रक्षा भी भगवान ही करते है ।का भाव यह है कि भगवान का प्रेमभजन करने वाले पर , यह भगवान की उदारता है।
पिछले श्लोक में पति पत्नी के आत्मा रूप परमात्मा के संदर्भ की व्याख्या में हम पढ़ चुके है।
7॥18॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 19
श्लोक:
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
भावार्थ:
बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है
7॥19॥
व्याख्या:
सम्पूर्ण जन्मोंका अन्तिम जन्म(मनुष्य योनि) है। ईश्वरने जीवको मनुष्यशरीर उसे जन्म माँ के प्रवाहसे अलग-अलग जीव प्राप्त करता है (मां सब की एक पर संताने अनेक) जो उनको उस का पूर्ण अधिकार देता है। लेकिन यह मानव भगवान को प्रेम न करके राग , द्वेष,के कारण फिर से पुराने प्रवाह को प्राप्त करता है, जिसका अर्थ है जन्म मरान के चक्कर में चला जाना इसलिए भगवान कहते हैं।यहां आसुरी योनियों को देखे।
✍️भगवद गीता और अन्य वैदिक ग्रंथों में अहंकार, राग (आसक्ति), और द्वेष (घृणा) के प्रभावों का विस्तार से वर्णन किया गया है। ऐसे भावों से प्रभावित मनुष्य की प्रवृत्तियाँ उसे निम्न योनियों (गुणों के अनुसार तय जन्म) की ओर ले जाती हैं। यह विवरण इस प्रकार है:
👉तामसिक गुण और नीच योनि का संबंध
अहंकार, राग, और द्वेष को तामसिक गुणों का परिणाम माना गया है। जब कोई व्यक्ति इन गुणों से प्रभावित होता है, तो उसका पुनर्जन्म निम्न योनियों में भी हो सकता है।
👉गीता अध्याय 14, श्लोक 15:
तमसि प्रेत्य कालेऽस्ति मूढयोनिषु जायते।
भावार्थ:
जो तामसिक गुणों में प्रवृत्त होते हैं, वे मूढ़ (अज्ञानियों या नीच) योनियों में जन्म लेते हैं।
👉अहंकार और पशु-योनि
अहंकार से ग्रस्त मनुष्य अपने कर्मों में दंभ और असत्य का सहारा लेता है। इसके परिणामस्वरूप वह पशु-योनि, जैसे हिंसक जीव, या अविकसित प्राणियों में जन्म ले सकता है।
👉गीता अध्याय 16, श्लोक 19:
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥
भावार्थ:
जो द्वेषपूर्ण और क्रूर हैं, उन्हें भगवान बार-बार असुर योनि में जन्म देते हैं।
👉यह सब राग (आसक्ति) और पुनर्जन्म का प्रभाव होते है।
राग या आसक्ति भी व्यक्ति को मोह में बांधती है और वह अपने कर्मों के आधार पर लोभी या अत्यधिक इच्छाश्रित योनियों, जैसे कीड़े, पक्षी, या अन्य लोभ-प्रवृत्ति वाले जीवों में जन्म ले सकता है।
👉गीता अध्याय 3, श्लोक 37:
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
भावार्थ:
काम (आसक्ति) और क्रोध (द्वेष) रजोगुण से उत्पन्न होते हैं। ये मनुष्य के पाप और विनाश का कारण बनते हैं।
👉द्वेष और असुर योनि
द्वेष करने वाले और घृणा से भरे मनुष्य अपने नकारात्मक कर्मों के कारण असुरों या दानवों की योनियों में जन्म लेते हैं। ये योनि विशेषतः हिंसा, क्रूरता, और अज्ञानता से संबंधित मानी जाती हैं।
👉गीता अध्याय 16, श्लोक 6:
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु॥
भावार्थ:
मनुष्य दो प्रकार के होते हैं - दैवी और आसुरी। आसुरी प्रवृत्तियों से युक्त लोग अहंकार और द्वेष के कारण अधर्म के मार्ग पर जाते हैं।
👉सतोगुण, रजोगुण, और तमोगुण का प्रभाव
गीता के अनुसार, मनुष्य के कर्म तीन गुणों (सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण) के अनुसार फलित होते हैं।
सतोगुण: ऊर्ध्व योनि (श्रेष्ठ और पुण्यकारी जन्म)
रजोगुण: मानव योनि या सुख-दुःख मिश्रित जीवन
तमोगुण: अधोगति या निम्न योनियाँ
👉अध्याय 14, श्लोक 18:
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥
निष्कर्ष:
अहंकार: व्यक्ति को अधर्मी बनाकर उसे क्रूर और अहंकारी योनियों, जैसे असुर योनि, में ले जाता है।
राग (आसक्ति): इच्छाओं के जाल में फंसाकर उसे लोभ और वासनाओं से संबंधित योनियों में डालता है।
द्वेष (घृणा): व्यक्ति को हिंसक और दुष्ट योनियों में पुनर्जन्म के लिए बाध्य करता है।
अतः भगवद गीता यह स्पष्ट करती है कि मनुष्य को इन नकारात्मक गुणों का त्याग कर दैवी गुणों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए। तभी वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
*कितना मुश्किल है*
*मुश्किल नहीं भी है*
⬤≛⃝❈❃════❖*
7॥19॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 20
श्लोक:
( अन्य देवताओं की उपासना का विषय )
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥
भावार्थ:
उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित हो कर उस-उस नियम को धारण(अपना ) कर के अन्य देवताओं (जय हो गुरुदेव)को भजते हैं अर्थात पूजते हैं
7॥20॥
इस लोक के और परलोक के भोगों की कामनाओं से ज्ञान प्राप्त हो गया है, आच्छादित हो गया है। प्रकृति है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए जो विवेकयुक्त मनुष्य शरीर मिला हुआ है, उस शरीर में ज्ञान परमात्मा की प्राप्ति न करके वे अपनी इच्छाऔ की योजना बनाने में ही लगे रहते हैं।संयोग जन्य सुख की इच्छाओं को कहते हैं। कामना दो तरह की होती है--यहाँ के भोग भोगने के के लिए धन-संग्रहकी कामना और स्वर्गादि परलोक के भोग भोगने के लिए पुण्य-संग्रहकी कामना।धन-संग्रहकी कामना दो तरह की होती है--पहली, यहाँ कामना (अपना कमाना अपना खाना, अपना कमाना और अपनी ख्याति के लिए धन डोनेशन में देना दोनों ही निम्न श्रेणी के काम हैं)
जैसे भोग भोगें; कायर जब, कायर जहां और कड़वे धन खर्च करें, सुख-आराम से दिन आखें आदि के लिए अर्थात संयोग जन्य सुखके लिए धन-संग्रहकी कामना होती है और दूसरी ओर, मैं अमीर हो जाऊं, धनसे मैं बड़ा बन जाऊं आदि के लिए अर्थात अभिमान जन्य सुखके लिए धन- संग्रहकी इच्छा भी होती है।
👉ऐसे ही पुण्य-संग्रह की कामना भी दो तरह की होती है--
पहली, यहां मैं पुण्यात्मा कहलाऊं और दूसरी, परलोक में मेरेको भोग मिलें।
इन सभी कामनाओं से सत्-असत्, नित्य-अनित्य, सार-असर, बंध-मोक्ष आदिका विवेक आच्छादित हो जाता है।
विवेक ज्ञान ने कहा कि उन्हें यह समझ में नहीं आया कि जिन मसालों की हम इच्छा कर रहे हैं, वे पदार्थ हमारे साथ कब तक रहेंगे और हम उन मसालों के साथ क्या कबाड़ में नहीं रहेंगे?
कामनाओं के कारण विवेक (ज्ञान) को बढ़ाया जाने से वे अपनी प्रकृति से नियन्त्रित रहते हैं अर्थात अपने स्वभावके परवश रहते हैं। यहां 'प्रकृति' शब्द वैयक्तिक प्रकृतिका वाचक है, समष्टि प्रकृतिका वाचक नहीं। यह वैयक्तिक स्वभाव सबमें मुख्य होता है।
मूलतः वैयक्तिक प्रकृति को तो कोई नहीं छोड़ सकता पर लेकिन इस स्वभाव में जो दोष हैं, उन्हें तो मनुष्य छोड़ ही सकता है,
👉यदि उन दोषों को भी मनुष्य नहीं छोड़ सकता, तो फिर मनुष्य-जन्म की महिमा ही क्या ओर क्यों होगी?
मनुष्य अपने स्वभाव से असंगत, शुद्ध बनाने में सर्वथा स्वतन्त्रता है। लेकिन जब तक मनुष्य के भीतर इच्छा का उद्देश्य रहता है, तब तक वह अपनी प्रकृति में सुधार ही नहीं कर पाता, और तब तक प्रकृति की प्रबलता और अपने में निर्बलता में ही जीता है। परन्तु इसका उद्देश्य यह है कि वह अपनी प्रकृति-(स्व-) का सुधार कर सकता है अर्थात प्रकृति की अभिव्यक्ति नहीं रहती है।
👉 इन्हीं कामनाओं के कारण अपनी प्रकृति के परवश होनेपर मानव कामनाओं के अनेक उपाय को और नियमों को (नियमों-) को खोजना चालू रखता है। अमुक यज्ञ करने से इच्छा पूरी होती है कि अमुक तप से क्या करें? अमुक दान देने से पूरी इच्छा पूरी होगी कि अमुक मंत्र का जप कैसे करें? आदि-आदि उपाय खोज ता ही रहता है। उन उपायों के अर्थ नियम अलग-अलग होते हैं। जैसे--अमुक इच्छित कलाकार के लिए अमुक विधि से यज्ञ आदि करना, कलाकारों का अमुक स्थान पर होना आदि। इस तरह इंसान अपनी इच्छानुसार वास्तुशिल्प के लिए कई उपाय और स्थापत्यको कायम रखता है।इच्छुक प्राणियों के लिए अनेक उपाय और नक्षत्रों को धारण करके मनुष्य
👉अन्य देवताओं की शरण लेते हैं, भगवानकी शरण नहीं लेते।
यहां 'अन्यदेवताः' द्वैत का प्रतीक है कि वे देवताओं को भगवत्स्वरूप नहीं मानते हैं, प्रत्युत उनके अलग-अलग फल सत्य मानते हैं, इसीसे अन्य अंतवाला (नाशवां) फल का अर्थ है-- 'अंतवत्तुं तेषाम्' (गीता 7. 23)।
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 23
श्लोक:
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥
भावार्थ:
परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं
॥23॥
यदि वे देवताओं की अलग सत्ता न चाहते हुए भी भगवत्स्वरूप ही चाहते हैं तो फिर अंतवाला फल नहीं मिलेगा, प्रत्युत् अज्ञानी फल मिलेगा।
7॥20॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 21
श्लोक:
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥
भावार्थ:
जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ।
॥21॥
इस अध्याय के अलौकिक भाग में ही आत्मानात्म विवेक (जदचेतन का विभाजन) करके भगवान श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है कि किस प्रकार उन सभी के नाम रूप पिरोये गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार त्रिगुणात्मिका मायाजनित विलायक से मोहित अभिमान मनुष्य अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को नहीं पहचान पाता। आत्मचैतन्य के बिना शरीर मन और बुद्धि की जड़ता से स्वयं कार्य नहीं हो सकता। प्रत्येक भक्त अपने इष्ट देवता की पूजा सत्य तक करने का प्रयास करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि कोई भी भक्त किसी भी स्थान पर मंदिर मस्जिद या गिरजाघर किसी डेरे आश्रम गुरु के एकांत में या सार्वजनिक स्थान पर किसी भी रूप में ईश्वर की पूजा के साथ उस की श्रद्धा को उसी के अपने इष्ट देवता में स्थिर कर देता हूं। खुद में नहीं क्यों कि श्रद्धा और विश्वास ही दो प्रमुख कारण होते हैं।
👉गीता के मर्म का साक्षात्कार करने वाला सच्चा मित्र कदापि जातीय अलगाववादी या असिष्णु नहीं हो सकता।
यदि उसमें उसके स्वाभाविक अवगुणों का लेश मात्र भी मिश्रण ना हो।
ईश्वर के सभी सगुण सिद्धांतों का अधिष्ठान एक परम सत्य है जहां से भक्त के हृदय में भक्तिरूपी पौधा पल्वित पुष्पित और फलित होने के लिए श्रद्धारूपी जल प्राप्त होता है क्योंकि भगवान स्वयं कहते हैं कि मैं उस श्रद्धा को स्थिर करता हूं। इस श्लोक का और अधिक गहन अर्थ भी स्पष्ट हो जाता है। मनुष्य जिस विषय का सामुद्रिक चिंतन करता है वह दृढ़ता से आसक्त और स्थित हो जाता है। अखण्ड चिंतन से मन में उस विषय के संस्कार दृढ़ हो जाते हैं और फिर उसके अनुसार ही मनुष्य की इच्छाएँ और कर्म होते हैं। इसी नियम के अनुसार सतत आत्मचिन्तन करने से भी मनुष्य अपने शुद्ध स्वरूप का साक्षात अनुभव कर सकता है।
सारांश भगवान का कथन है कि जैसा हम विचार करते हैं वैसा ही हम बनाते हैं।
यदि कोई व्यक्ति दुर्गुणों का शिकार हो या अन्य व्यक्ति दैवी गुणवत्ता से युक्त हो तो यह दोनों के अलग-अलग विचारों का ही परिणाम होना चाहिए।
प्रकृति का अंग है विचारधारा के वैज्ञानिक जगत् का नियम होता है जिसका एक अधिष्ठान है सर्वसम्बन्ध आत्मतत्त्व। सतत समृद्ध हो रही श्रद्धा के द्वारा मनुष्य को उसी प्रकार इष्ट फल प्राप्त होता है।
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 22
श्लोक:
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥
भावार्थ:
वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है
7॥22॥
व्याख्या:
यहां भी बिचौलिए का काम आरम्भ होता है रोटी पकाने को दो लकड़ी बिचौलिए तंदूर के लिए 5 केजी लकड़ी प्राप्ति वही दो रोटी।
जैसे सरकारी कर्मचारियों को एक सीमित अधिकार दिया जाता है कि आप लोग अमुक विभाग में अमुक अवसर पर इतना खर्च कर सकते हैं, इतनी आपूर्ति दे सकते हैं। ऐसे ही देवताओं में एक सीमा तक ही उनकी शक्ति होती है; मूलतः वे आकार ही दे सकते हैं, अधिक नहीं। देवताओं में
अधिक-से-अधिक इतनी शक्ति तो होती ही है कि वेअपने-अपने उपासकों को अपने-अपने लोकों में ले जा सकते हैं। परन्तु अपनी उपासना का फल भोगने पर वहां से उनको लौटकर पुनः संसार में ही आना होता है।
अर्थात यह सभी मिल कर भी मोक्ष नहीं दिला सकते। ऐसा में नहीं भगवान ने ही कहा है।
असल में जिस किसी को जो कुछ है, वह सब मेरे द्वारा निर्धारित ही किया हुआ है। कारण कि मेरे निर्धारण करने वाला दूसरा कोई है ही नहीं । अगर कोई इंसान इस रहस्य को समझ ले, तो फिर वह सिर्फ मेरी तरफ ही अपनी वृति करेगा मुझ में ही टीके गा।
7॥22॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 23
श्लोक:
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥
भावार्थ:
परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं
7॥23॥
इस की व्याख्या की आवश्यकता ही नहीं। आगे बढ़ते है।
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 24
श्लोक:
( भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा और जानने वालों की महिमा )
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥
भावार्थ:
बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्म कर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं।
7॥24॥
वैसे तो इसकी व्याख्या जरूरी नहीं:
इस लिए टिप्पणी कर आगे बढ़ता हूं अविनाशी जो हर कल्प में विराजमान होता है उसका नाश नहीं होता जिसका इसी धरती पर नाश ओर संस्कार हो जाए वह अविनाशी नहीं ।क्योंकि देवी देवताओं को भी धरती पर आना होता है।
अविनाशी धर्म की स्थापना के लिए ही अवतरित होते है।
चलो आगे बढ़ते है।
7॥24॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 25
श्लोक:
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
भावार्थ:
अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने-मरने वाला ही समझता है
7॥25॥
व्याख्या:
भगवान तो अज और अविनाशी है अर्थात् जन्ममरण से रहित है। ऐसा होनेपर भी भगवान प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करते हैअर्थात् जब भी भगवान अवतार लेते है, तब अज (अजन्मा) रहते हुआ ही अवतार लेते है और अव्ययात्मा रहता हुए ही अन्तर्धान हो जाते है। जैसे सूर्य भगवान् उदय होते हैं तो हमारे सामने आ जाते हैं और अस्त होते हैं तो हमारे नेत्रोंसे ओझल हो जाते हैं, छिप जाते हैं, ऐसे ही मैं केवल प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करते हैं। जो भगवान को इस प्रकार जब जान जाता है तब तब ही उस का योग पूर्ण होता है जन्म-मरणसे रहित मानते हैं, वे तो असम्मूढ़ हैं
(असम्मूढ़ का अर्थ है जो मोह से मुक्त है, जो अज्ञान से मुक्त है, जो अपने असली स्वरूप को समझता है, जो अपने लक्ष्य को जानता है और जो अपने जीवन को सही दिशा में ले जा रहा है।
असम्मूढ़ का भाव यह है कि व्यक्ति अपने जीवन में स्पष्टता और समझ के साथ आगे बढ़ रहा है, और वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सही निर्णय ले रहा है।)
7॥25॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 26
श्लोक:
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्धा से बिना विश्वास-भक्ति रहित पुरुष नहीं जानता।
7॥26॥
व्याख्या:
यहां भगवान विष्णु के लिए तो भूत, वर्तमान और भविष्य के तीन विशेषण दिए गए हैं;
परन्तु अपने लिये 'अहं वेद' का केवल वर्तमानकालका ही प्रयोग किया गया है। इसमें कहा गया है कि भगवान की दृष्टि में भूत, भविष्य और वर्तमान--ये त्रिकाल वर्तमान ही हैं। मूल रूप से भूत के जीव होने के नाते, भविष्य के जीव होने के नाते या वर्तमान के जीव होने के नाते--सभी देव की दृष्टि में वर्तमान से भगवान को सभी जानते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान--ये त्रिकाल तो उनकी दिव्य दृष्टि में ही हैं, । जैसे सिनेमा देखनेवालों के लिए भूत, वर्तमान और भविष्य-कालका भेद रहता है, वैसे ही सिनेमा देखने वालों में सब कुछ वर्तमान है, ऐसे ही सिनेमा देखने वालों के लिए भूत, वर्तमान और भविष्य काल का भेद रहता है, भगवान की दृष्टि दर्शन में सब कुछ वर्तमान ही रहता है। कारण कि समस्त जीव कालके भंडार हैं और भगवान काल से अतीत हैं। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि अलग-अलग रहते हैं और भगवान हर दम ही वैसे-के-वैसे रहते हैं। *काल के मॅयट आए हुए मॅास्टिका ज्ञान सीमित होता है* (इसको टिप्पणी में देखे) और भगवान्का ज्ञान स्टॉक है। उन गोलियों में भी कोई योगाभ्यास करके ज्ञान बढ़ाया जाए तो वे 'युञ्जन योगी' होंगे और जिस समय जिस वस्तु को सीखेंगे, उसी समय वस्तु को वेंगे। भगवान तो 'युक्त योगी हैं' अर्थात बिना योगाभ्यास के ही वे तीन वर्षों और भौतिक संसार को सब समय स्वतः जानते हैं। भगवान में भी ये ताकत नहीं है कि वे पवित्र से अलग हो जाएं! मूल रूप से आप कहीं भी रह सकते हैं, वे कभी भी भगवान के दर्शन नहीं कर सकते।
*टिप्पणी*
*"काल के मॅयट आए हुए मॅास्टिका ज्ञान सीमित होता है"* का भावार्थ है कि जो ज्ञान समय के प्रभाव में आता है, वह स्वाभाविक रूप से सीमित और अस्थायी होता है।
*विस्तार से भाव:*
👉काल की सीमा:
समय हर चीज को प्रभावित करता है। ज्ञान भी समय के अनुसार विकसित या सीमित हो सकता है। यह दर्शाता है कि मस्तिष्क में जो ज्ञान संग्रहित होता है, वह किसी विशेष समय, परिस्थिति, या आवश्यकता पर निर्भर करता है।
👉सीमितता का संकेत:
"मॅास्टिका ज्ञान सीमित होता है" से तात्पर्य है कि मनुष्य का भौतिक ज्ञान समय और परिस्थितियों की सीमाओं में बंधा होता है। जो जानकारी या ज्ञान मस्तिष्क में है, वह पूर्ण नहीं होता, क्योंकि यह काल और मानव सीमाओं से प्रभावित है।
👉आध्यात्मिक दृष्टिकोण:
भगवद गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कालातीत सत्य (सनातन सत्य) ही स्थायी होता है। मस्तिष्क का ज्ञान भले ही सीमित हो, पर आत्मा का ज्ञान अनंत है।
👉व्यावहारिक संदर्भ:
यह विचार यह भी प्रेरणा देता है कि मनुष्य को अहंकार में नहीं आना चाहिए, क्योंकि उसका ज्ञान सीमित है। उसे अपनी सीमाओं को स्वीकारते हुए अधिक सीखने और आत्मज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।
निष्कर्ष:
यह कथन हमें यह सिखाता है कि समय और मस्तिष्क दोनों की सीमाएँ होती हैं। मनुष्य को अपने ज्ञान का उपयोग विनम्रता के साथ करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि केवल शाश्वत सत्य ही असीमित और कालातीत है।
7॥26॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 27
श्लोक:
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥
भावार्थ:
हे भरतवंशी अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुःखादि द्वंद्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं
7॥27॥
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 28
श्लोक:
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥
भावार्थ:
परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषजनित द्वन्द्व रूप मोह से मुक्त दृढ़निश्चयी भक्त मुझको सब प्रकार से भजते हैं
7॥28॥
आशा है इस की व्याख्या की भी जरूरत नहीं है।क्योंकि यह भगवान की गारंटी है।
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 29
श्लोक:
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥
भावार्थ:
जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं
7॥29॥
व्याख्या:
यहां जरा (वृद्धावस्था) और मरणसे मुक्ति मोक्षधारा यह नहीं है कि ब्रह्म अध्यात्म और कर्मका ज्ञान पर वृद्धावस्था नहीं होगी, शरीर की मृत्यु नहीं होगी। इसका अर्थ यह है कि बोध होने के बाद शरीर में वृद्धावस्था और मृत्यु तो आएगी ही पर ये दोनों अवस्थाएँ दुःखी नहीं कर सकतीं।द्रव्य भूत और प्रकृति के कार्य और कारण से संबंधितविच्छेदित होने में है । मृत्यु मूलतः वह जरारामणसे अभी मुक्त है। लेकिन असल में वह जरामरण से मुक्त नहीं है क्योंकि जरामरण के कारण शरीर के साथ जबतक संबंध होता है तब तक जरामरण से अनुपयोगी होता है फिर भी वह जरामरान से मुक्त नहीं होता है। परन्तु जो जीवनमुक्त महापुरुष हैं उनके शरीर में जरा और मरणपर भी वे निष्क्रिय मुक्त हैं। मूलतः जरामरणसे मुक्त होनेका पदार्थ होते हैं जिनमें जरा और मरण होते हैं ऐसे प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ सर्वथा संपर्कविच्छेद होते हैं। जब मनुष्य शरीर के साथ तादात्म्य (मैं यही हूं) मान लेता है तब शरीर के वृद्ध होने पर मैं बूढ़ा हो जाता हूं और शरीर के मृत को लेकर मैं मर जाऊंगा ऐसा लक्षण है। यह प्रमाणित शरीर मैं हूं और शरीर मेरा इसी पर टिकी हुई है।
अर्थात् जन्म मृत्यु जरा और व्याधिमें दुःखरूप दोषोंको दर्शन माध्य है कि शरीरके साथ मैं और मेरापन का सम्बन्ध नहीं रहे। जब मनुष्य मैं और मेरापन से मुक्त हो जाएगा तब वह जरा मरण आदि से भी मुक्त हो जाएगा क्योंकि शरीरके साथ माना गया संबंध ही वास्तव में जन्म का कारण है--
वास्तव में इसका शरीर के साथ संबंध नहीं है, बल्कि इसका संबंध है। मिटता वही है जो वास्तव में नहीं होता।
चित्तशुद्धि और ध्यानसाधना का प्रकट रूप है जरा और मरण से मुक्ति। आधुनिक काल में भी मनुष्य ऐसे आंदोलनों को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है, जिसके द्वारा जरा और मरण से मुक्ति मिल सके। उसकी अमृतत्व की कल्पना यह है कि इस भौतिक देह का प्रमाण सदा बनाया गया है, अध्यात्म शास्त्र में इसे अमृतत्व नहीं कहा गया है और न देह के नित्य अस्तित्व को जीवन का लक्ष्य बताया गया है। प्राणिमात्र के लिए जन्म वृद्धि व्याधि क्षय और मरण ये विकार संभावित हैं। ।। ये सभी विकार या परिवर्तन मनुष्य को असाध्य पीड़ा देते हैं। इनमें से एक कमी में मनुष्य का जीवन अखंड आनंदमय होता है। ध्यानाभ्यास में साधक का ध्यान अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप का साक्षात्कार लेकर करता है, जिससे तादात्म्य से ऊपर की ओर कालत्रयातीत मुक्त आत्मस्वरूप में स्थिति प्राप्त होती है। यह आत्मा ही परम सत्य है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड का अधिष्ठान है जिसे वेदांत में ब्रह्म की संज्ञा दी गयी है। आत्मसाक्षात्कार का अर्थ ही ब्रह्मस्वरूप है क्योंकि व्यक्ति की आत्मा ही भूतमात्र की आत्मा है। सत्य के इस अद्वैत को यहाँ इस प्रकार बताया गया है कि जो मुझे आत्मस्वरूप पर ध्यान देता है वह ब्रह्म को जानता है। मनोवैज्ञानिक शक्तियों को भी जाना जाता है और वह सभी कर्मों में कुशल होती है। इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि आत्मानुभवी पुरुष जगत् व्यवहार में अकुशल और मूढ़ नहीं होता है। अनुभवी पुरुषों का मत है कि केवल वही पुरुष वास्तविक अर्थ में जगत् की सेवा कर सकता है जो लोगों के विचारों का पूर्ण ज्ञान है और अपने मन पर पूर्ण संयम है। सत्य का गीत के लिए ऐसा पूर्णत्व प्राप्त व्यक्ति ही उपयुक्त माध्यम है और उस व्यक्ति का सुसंगठित और संपूर्ण कार्य में कुशल होना आवश्यक है। ज्ञानी पुरुषों के विषय में ही आगे कहा गया है।
भगवद गीता अध्याय: 7
श्लोक 30
श्लोक:
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥
भावार्थ:
जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव सहित तथा अधियज्ञ सहित (सबका आत्मरूप) मुझे अन्तकाल में भी जानते हैं, वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात प्राप्त हो जाते हैं
॥30॥
अंत में चलते चलते
*भगवद गीता अध्याय: 7*
*उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है*
7॥17॥
👉चतुर्विध भक्तों की तुलना तुलना करके भगवान कहते हैं कि जो ज्ञानी भक्त नित्ययुक्त है और आत्मस्वरूप के साथ अनन्य भक्ति करता है, वह सर्व श्रेष्ठ है
अब सवाल है वह सर्वश्रेष्ठ कैसे है?
क्योंकि आत्मतत्व से भिन्न किसी अन्य विषय में उसका मन विचरण ही नहीं करता है। जब तक साधक को अपने ध्येय का स्वरूप निश्चित रूप से ज्ञात नहीं होता तब तक मन की एकाग्रता भी प्राप्त नहीं हो पाती।
भक्ति का अर्थ होता है साधक के मन में आत्मसाक्षात्कार की ही एक वृत्ति बनी रहै। एक भक्ति को प्राप्त करने के लिए साधक को अपने मन की विषय-वस्तु से निवृत्त होना भी आवश्यक होता है। ज्ञानी व्यक्ति किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए अपने मन की उन प्रवृत्तियों को नष्ट करने के लिए ईश्वर की आराधना नहीं करता है, जिसके कारण उसके मन की शक्ति का जगत् के मिथ्या आकर्षणों में अपरिवर्तन हो जाती है।
जब कि परम स्वभाव यह है कि आत्मस्वरूप में स्थित भगवान श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञानी पुरुष को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जिससे मन में आत्मानुभूति के अलावा अन्य कोई इच्छा ही नहीं रहती।
ऐसे ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूं। प्रेम का मापदण्ड है प्रियतम के साथ हुआ तादात्म्य। असल में समर्पण की धुन पर ही प्रेम का गीत बनजाता है। निस्वार्थता प्रेम का आधार है। प्रेम की मांग है पूरे कालों में बिना किसी प्रतिदान की आशा के सर्वस्व दान। प्रेम के इस स्वरूप को देखकर ही पता चलेगा कि ज्ञानी भक्त का प्रेम ही वास्तविक, शुद्ध और पूर्ण प्रेम होता है। यहां भगवान स्पष्ट कहते हैं ऐसे ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूं और मुझे वह अत्यंत प्रिय है।
👉इस कथन में एक मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा हुआ है।
प्रेम का यह सनातन नियम है कि निष्काम होने पर न केवल पूर्णता प्राप्त होती है, वरन् एक दुष्ट को भी आदर्श बनाने की विचित्र सामर्थ्य होती है। यह एक सुविचारित एवं सुविदित तथ्य है कि यदि किसी व्यक्ति के मन में किसी विशेष भावना जैसी दुःख, द्वेष ,मात्सर करुणा से भर जाता है तो उसके निकटवर्ती लोगों के मन पर भी उस गति की भावना का प्रभाव पड़ता है।
अत: यदि हम किसी को निस्वार्थ शुद्ध प्रेम दे सकते हैं तो हमारे शत्रु का हृदय भी परिवर्तित हो सकता है।
👉नियम तो यही है।जब सभी आत्माएं उसी परमात्मा की है तो *तू मेरा चांद में तेरी चांदनी।*
*तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो*
*तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो*
पति पत्नी एक दूसरे के साथ भी पूजा स्तुति के रूप में प्रयोग क्यों नहीं कर सकते? क्या घर एक मंदिर नहीं है?
इस शास्त्रीय सत्य भगवान के इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि ऐसा ज्ञानी मुझे और मुझे अत्यंत प्रिय हैं।
7॥17॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः
॥7॥