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बुधवार, 10 जनवरी 2024

यशुदास

#10jan
पार्श्वगायक येशुदास 
🎂10 जनवरी 1940 किला कोच्चि, कोची
पत्नी: प्रभा येसुदास (विवा. 1970)
बच्चे: विजय येसुदास, विनोद येसुदास, विशाल येसुदास
माता-पिता: ऑग्सटाईन जोसफ, एलिसकुट्टी
पोते या नाती: अम्मेया, अव्यान येशुदास

कट्टासेरी जोसेफ़ येसुदास कर्नाटक संगीत' के प्रसिद्ध शास्त्रीय तथा फ़िल्मों के पार्श्वगायक हैं। उनकी सुरीली
आवाज़ सुनने वालों के ऊपर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ती है। येसुदास ने हिन्दी के अतिरिक्त मलयालम , तमिल, कन्नड़, तेलुगू , बंगाली, गुजराती, उड़िया, मराठी , पंजाबी, संस्कृत , रूसी तथा अरबी भाषाओं में भी गीतों को अपनी सुरीली आवाज़ दी है। उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत वर्ष 1961 में की थी। उनके गाए गीत 'गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा', 'सुरमई अखियों में', 'दिल के टुकड़े-टुकड़े करके', 'जानेमन-जानेमन तेरे दो नयन',
'चाँद जैसे मुखड़े पे' सबकी जुबां पर चढ़ गए। दक्षिण भारतीय भाषाओं में उन्होंने कई सफ़ल फिल्में भी बनाईं, जैसे- 'वडाक्कुम नाथम', 'मधुचंद्रलेखा' और 'पट्टनाथिल सुंदरन'। सर्वश्रेष्ठ गायन के क्षेत्र में सात राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले वे देश के एकमात्र गायक हैं। वर्ष 2002 में येसुदास को भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए ' पद्म भूषण ' से सम्मानित किया गया था।

येसुदास का जन्म 10 जनवरी, 1940 ई. में कोचीन ( केरल) में हुआ था। इनके पिता का नाम ऑगस्टाइन जोसेफ़ तथा माता एलिसकुट्टी थीं। पिता ऑगस्टाइन जोसेफ़ एक मंझे हुए मंचीय कलाकार एवं गायक थे, जो हर हाल में अपने बड़े बेटे येसुदास को पार्श्वगायक बनाना चाहते थे। येसुदास के पिता, जब वे अपने रचनात्मक कैरियर के शीर्ष पर थे, तब कोच्चि स्थित उनके घर पर दिन रात दोस्तों और प्रशंसकों का जमावड़ा लगा रहता था; किंतु जब बुरे दिन आए, तब बहुत कम ही लोग ऐसे थे, जो मदद को आगे आए। येसुदास का बचपन गरीबी में बीता, पर उन्होंने उस छोटी-सी उम्र से अपने लक्ष्य निर्धारित कर लिए थे और ठान लिया था कि अपने पिता का सपना पूरा करना ही उनके जीवन का उद्देश्य है। उन्हें ताने सुनने पड़े, जब एक ईसाई होकर वे कर्नाटक संगीत की दीक्षा लेने लगे। एक समय ऐसा भी आया कि वे अपने 'आर.एल.वी. संगीत अकादमी' की फ़ीस भी बमुश्किल भर पाते थे। ऐसा भी दौर था, जब चेन्नई के संगीत निर्देशक उनकी आवाज़ में दम नहीं पाते थे और ए.आई.आर. त्रिवेन्द्रम ने उनकी आवाज़ को प्रसारण के लायक नही समझा। लेकिन जिद के पक्के उस कलाकार ने सब कुछ धैर्य के साथ सहा।

"एक जात, एक धर्म, एक ईश्वर" आदि नारायण गुरु के इस कथन को अपने जीवन का मन्त्र मानने वाले येसुदास को पहला मौका मिला 1961 में बनी फ़िल्म 'कलापदुक्कल' से। प्रारम्भ में उनकी शास्त्रीय अंदाज़ की सरल गायकी को बहुत सी नकारात्मक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा, लेकिन येसुदास ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। संगीत प्रेमियों ने उन्हें सर आँखों पे बिठाया। भाषा उनकी राह में कभी दीवार नहीं बन सकी।

दक्षिण के सिनेमा में अपनी सुरीली आवाज़ का जादू बिखेरने के बाद येसुदास ने बॉलीवुड की ओर रूख किया। फ़िल्म 'जय जवान जय किसान' के लिए पहला हिन्दी गीत गया, लेकिन पहले रिलीज हुई फ़िल्म 'छोटी सी बात'। उन्होंने 70 के दशक के सबसे मशहूर अभिनेताओं के लिए अपनी आवाज़ दी। इनमें अमिताभ बच्चन, अमोल पालेकर और जितेन्द्र शामिल हैं। इस दौरान उन्होंने कई गाने गाए।

मलयालम फ़िल्म संगीत तो येसुदास के ज़िक्र के बिना अधूरा है ही, पर गौरतलब बात ये है कि उन्होंने हिन्दी में भी जितना काम किया, कमाल का किया। सलिल दा ने उन्हें सबसे पहले फ़िल्म 'आनंद महल' में काम दिया। ये फ़िल्म नहीं चली, पर गीत मशहूर हुए, जैसे- "आ आ रे
मितवा ...।" फिर मशहूर संगीतकार तथा गीतकार रविन्द्र जैन के निर्देशन में उन्होंने 1976 में आई सुपरहिट हिन्दी फ़िल्म 'चितचोर' के गीत गाये। इस फ़िल्म के संगीत ने लोगों के दिलों में येसुदास के लिए एक ख़ास जगह बना दी। 'चितचोर' का गीत "गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा" जिसने भी सुना, वह येसुदास का दीवाना हो गया। इस गीत की रचना करने वाले रविन्द्र जैन भी येसुदास की आवाज़ के मुरीद हो गए। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि "अगर उन्हें आँखें मिलेंगी तो वे सबसे पहले येसुदास को देखना चाहेंगे

येसुदास द्वारा गाये हुए कुछ प्रसिद्ध गीत
निम्नलिखित हैं-

जानेमन-जानेमन तेरे दो नयन - छोटी सी बात ( 1975 )
गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा - चितचोर ( 1976)
जब दीप जले आना - चितचोर (1976)
तू जो मेरे सुर में - चितचोर ( 1976)
का करूँ सजनी - स्वामी ( 1977 )
मधुबन खुशबू देता है - साजन बिना सुहागन ( 1978)
इन नजारों को तुम देखो - सुनैना ( 1979 )
दिल के टुकड़े-टुकड़े करके - दादा (1979)
चाँद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा -सावन को आने दो
कहाँ से आए बदरा - चश्मेबद्दूर ( 1981)
सुरमई अखियों में - सदमा ( 198

मंगलवार, 9 जनवरी 2024

सलीम गोंस

#10jan 
#28april 
सलीम गौस
🎂10 जनवरी 1952
मद्रास , मद्रास राज्य , भारत
मृत
⚰️28 अप्रैल 2022  
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
व्यवसायों
अभिनेताथिएटर निर्देशकयुद्ध कलाकार
जीवनसाथी
अनिता सलीम
सलीम गौस का जन्म चेन्नई में एक मुस्लिम पिता और एक ईसाई माँ के यहाँ हुआ था।  उन्होंने चेन्नई के क्राइस्टचर्च स्कूल और प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की। वह भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान , पुणे से स्नातक भी थे ।
सलीम गौस को टीवी श्रृंखला सुबह में उनकी भूमिका और श्याम बेनेगल की टीवी श्रृंखला भारत एक खोज में राम , कृष्ण और टीपू सुल्तान की भूमिका के लिए जाना जाता है । उन्होंने टीवी सीरियल वागले की दुनिया में भी काम किया है ।

1989 में, उन्होंने प्रताप पोथेन द्वारा निर्देशित तमिल फिल्म वेट्री विजहा में कमल हासन के प्रतिद्वंद्वी के रूप में खलनायक की भूमिका निभाई । उन्होंने भारतन द्वारा निर्देशित क्लासिक मलयालम फिल्म थाज़्वारम में मोहनलाल के साथ अभिनय किया । 1993 में उन्होंने मणिरत्नम की फिल्म थिरुदा थिरुदा में खलनायक की भूमिका निभाई । उन्होंने 1997 की फिल्म कोयला में माधुरी दीक्षित और शाहरुख खान के साथ अभिनय किया ।
सलीम गौस का गुरुवार 28 अप्रैल 2022 को 70 वर्ष की आयु में हृदय गति रुकने से मुंबई में निधन हो गया। गुरुवार सुबह उनका अंतिम संस्कार किया गया।
📽️
1978 स्वर्ग नरक
1981 चक्र
1981सारांश
1984 मोहनजोशी हाजिर हों
1985 त्रिकाल 
1985 अघाट
1986 अम्मा
1989 मुजरिम
1989 सूर्या एक जागृति
1990 ज़ुल्म की हुकुमत
1993आकांक्षा
1996 सरदारी बेगम
1997 कोयला 
1997शपथ
1998 महाराजा 
1998सैनिक
2000 बादल
2001 अक्स
2005 मिस काल
2010 शाबाश अब्बा

मंगलवार, 15 अगस्त 2023

गुरदयाल सिंह

गुरदयाल सिंह
जन्म
🎂10 जनवरी 1933
मौत
⚰️16 अगस्त 2016 (उम्र 83)
भाषा
पंजाबी
राष्ट्रीयता
भारतीय
विधा
उपन्यास
उल्लेखनीय काम
मढ़ी दा दीवा
एक पंजाबी साहित्यकार थे जो उपन्यास और कहानी लेखक थे। इन्हें 1999 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपनी प्रथम कहानी भागों वाले प्रो.मोहन सिंह के साहित्य मैगजीन पंज दरिया में प्रकाशित की थी।  उनके पंजाबी साहित्य में आने से पंजाबी उपन्यास में बुनियादी तबदीली आई थी।उनके उपन्यास मढ़ी दा दीवा , अंधे घोड़े का दान का सभी पंजाबी भाषाओँ में अनुवाद हो चुक्का है और इन की कहाँनीयों पर अधारत फ़िल्में भी बनी हैं।
श्री गुरदयाल सिंह का जन्म 10 जनवरी 1933 को उनके नानका गाँव भैनी फत्ता जिला बरनाला में हुआ।उनके पिता का नाम श्री जगत सिंह और माता का नाम निहाल कौर था।वो पंजाब के जैतो गाँव के रहने वाले थे।उनके तीन भाई और एक बहन थी।घरेलू कारणों की वजह के कारण उन्होंने बचपन में अपनी पढ़ाई छोड़ अपना पुश्तैनी बढई काम करना शुरू कर दिया।बाद में उन्होंने कड़ी मेहनत करके उच्च विद्या हासिल करके युनिवर्सटी में प्राध्यापक की पदवी प्राप्त की।उनका बलवंत कौर के साथ विवाह हुआ और उनके घर एक बेटा और एक बेटी हुई।ज्ञानपीठ पुरस्कारविजेता श्री गुरदयाल सिंह का 16 अगस्त 2016 को निधन हो गया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...