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शनिवार, 13 जनवरी 2024

कैफ आजमी

#10may
#14jan 
कैफ आजमी
अख्तर हुसैन रिजवी
🎂14 जनवरी 1919
मज़वां, आजमगढ़ जिला, उत्तर प्रदेश, भारत
मौत⚰️10 मई 2002 (उम्र 83)

पेशा कवि
राष्ट्रीयता भारतीय
विधा
गज़ल, नज़्म
उल्लेखनीय काम
आवारा सज़दे, इंकार, आख़िरे-शब
खिताब
फिल्मफेयर अवार्ड
जीवनसाथी शौकत
बच्चे,शबाना आज़मी, बाबा आज़मी
किशोर होते-होते मुशायरे में शामिल होने लगे। वर्ष 1936 में साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और सदस्यता ग्रहण कर ली। धार्मिक रूढ़िवादिता से परेशान कैफी को इस विचारधारा में जैसे सारी समस्याओं का हल मिल गया। उन्होंने निश्चय किया कि सामाजिक संदेश के लिए ही लेखनी का उपयोग करेंगे।

1943 में साम्यवादी दल ने मुंबई कार्यालय शुरू किया और ‍उन्हें जिम्मेदारी देकर भेजा। यहां आकर कैफी ने उर्दू जर्नल ‘मजदूर मोहल्ला’ का संपादन किया।

जीवनसंगिनी शौकत से मुलाकात हुई। आर्थिक रूप से संपन्न और साहित्यिक संस्कारों वाली शौकत को कैफी के लेखन ने प्रभावित किया। मई 1947 में दो संवेदनशील कलाकार विवाह बंधन में बंध गए। शादी के बाद शौकत ने रिश्ते की गरिमा इस हद तक निभाई कि खेतवाड़ी में पति के साथ ऐसी जगह रहीं जहां टॉयलेट/बाथरूम कॉमन थे। यहीं पर शबाना और बाबा का जन्म हुआ।

बाद में जुहू स्थित बंगले में आए। फिल्मों में मौका बुजदिल (1951) से मिला। स्वतंत्र रूप से लेखन चलता रहा 
और प्रभावी लेखनी से प्रगति के रास्ते खुलते गए और वे सिर्फ गीतकार ही नहीं बल्कि पटकथाकार के रूप में भी स्थापित हो गए। ‘हीर-रांझा’ कैफी की सिनेमाई कविता कही जा सकती है। सादगीपूर्ण व्यक्तित्व वाले कैफी बेहद हंसमुख थे, यह बहुत कम लोग जानते हैं।

वर्ष 1973 में ब्रेनहैमरेज से लड़ते हुए जीवन को एक नया दर्शन मिला - बस दूसरों के लिए जीना है। अपने गांव मिजवान में कैफी ने स्कूल, अस्पताल, पोस्ट ऑफिस और सड़क बनवाने में मदद की।

उत्तरप्रदेश सरकार ने सुल्तानपुर से फूलपुर सड़क को कैफी मार्ग घोषित किया है। दस मई 2002 को कैफी यह गुनगुनाते हुए इस दुनिया से चल दिए : ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं। ..।
मई 1947 में इनका विवाह शौकत से हुआ। आर्थिक रूप से संपन्न और साहित्यिक संस्कारों वाली शौकत को कैफी के लेखन ने प्रभावित थीं। उनके यहां एक बेटी और एक बेटे का जन्म हुआ, जिनका नाम शबाना और बाबा है। शबाना आज़मी हिंदी फिल्मों की एक अज़ीम अदाकारा बनीं।

📻कैफ के मशहूर गीत

मैं ये सोच के उसके दर से उठा था।..(हकीकत)
है कली-कली के रुख पर तेरे हुस्न का फसाना...(लालारूख)
वक्त ने किया क्या हसीं सितम... (कागज के फूल)
इक जुर्म करके हमने चाहा था मुस्कुराना... (शमा)
जीत ही लेंगे बाजी हम तुम... (शोला और शबनम)
तुम पूछते हो इश्क भला है कि नहीं है।.. (नकली नवाब)
राह बनी खुद मंजिल... (कोहरा)
सारा मोरा कजरा चुराया तूने... (दो दिल)
बहारों...मेरा जीवन भी संवारो... (आखिरी ख़त)
धीरे-धीरे मचल ए दिल-ए-बेकरार... (अनुपमा)
या दिल की सुनो दुनिया वालों... (अनुपमा)
मिलो न तुम तो हम घबराए... (हीर-रांझा)
ये दुनिया ये महफिल... (हीर-रांझा)
जरा सी आहट होती है तो दिल पूछता है।.. (हकीकत)

पंडित शिव कुमार शर्मा

#10may
#13jan 
पंडित शिवकुमार शर्मा 

 🎂13जनवरी, 1938 जम्मू, 
⚰️10 मई 2022
भारत प्रख्यात भारतीय संतूर वादक हैं।संतूर एक कश्मीरी लोक वाद्य होता है।इनका जन्म जम्मू में गायक पंडित उमा दत्त शर्मा के घर हुआ था।1999में रीडिफ.कॉम को दिये एक साक्षातकार में उन्होंने बताया कि इनके पिता ने इन्हें तबला और गायन की शिक्षा तब से आरंभ कर दी थी, जब ये मात्र पाँच वर्ष के थे।इनके पिता ने संतूर वाद्य पर अत्यधिक शोध किया और यह दृढ़ निश्चय किया कि शिवकुमार प्रथम भारतीय बनें जो भारतीय शास्त्रीय संगीत को संतूर पर बजायें। तब इन्होंने 13 वर्ष की आयु से ही संतूर बजाना आरंभ कियाऔर आगे चलकर इनके पिता का स्वप्न पूरा हुआ। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम बंबई में 1955 में किया था।

शर्मा जी को कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार मिल चुके हैं। इन्हें १९८५ में बाल्टीमोर, संयुक्त राज्य की मानद नागरिकता भी मिल चुकी है।इसके अलावा इन्हें 1986 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1999 में पद्मश्री, एवं 2001 में पद्म विभूषण से भी अलंकृत किया गया था।
शिवकुमार शर्मा का निधन 84 वर्ष के थे। शिवकुमार पिछले छह महीने से किडनी संबंधी समस्याओं से पीड़ित थे और डायलिसिस पर थे। कार्डियक अरेस्ट के कारण उनका निधन हो गया।

शनिवार, 10 जून 2023

जीवन

*🎂जन्म 24अक्तूबर*
*⚰️10जून*

लगभग 60 फिल्मों में नारद की भूमिका निभाने वाले महान खल अभिनेता जीवन की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

जीवन हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता थे। उनका पूरा नाम 'ओंकार नाथ धर' था। उन्होंने फ़िल्मी पर्दे पर अपनी भूमिकाओं को बड़ी ही संजीदगी से निभाया। वैसे तो अभिनेता जीवन ने अधिकांश फ़िल्मों में खलनायक की भूमिका निभाई थी, लेकिन फिर भी एक भूमिका ऐसी थी जिसमें दर्शकों ने उन्हें देखना हमेशा पसंद किया। देवर्षि नारद के रूप में उनके द्वारा निभाई गई भूमिका को दर्शक कभी नहीं भूल पायेंगे। नारद मुनि के पौराणिक पात्र को अभिनेता जीवन ने 60 से भी अधिक फ़िल्मों में पर्दे पर जीवंत किया।

अभिनेता जीवन का जन्म 24 अक्टूबर, 1915 को श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर में हुआ था। उनका वास्तविक नाम ओंकार नाथ धर था। जीवन को बचपन से ही अभिनेता बनने का मन था। उनके पुत्र और खुद भी एक जाने माने अभिनेता किरण कुमार ने एक पुराने साक्षात्कार में बताया था कि जीवन के पिता जी पाकिस्तान में स्थित गिलगिट के गवर्नर थे। जीवन की माताजी का देहांत सन 1915 में जीवन साहब के जन्म के समय ही हो गया था। उनकी उम्र तीन साल की होते-होते जीवन के पिताजी भी चल बसे थे। किन्तु गवर्नर साहब के खानदान के पुत्र को सिनेमा में अभिनय जैसे उस समय के निम्न व्यवसाय से नाता जोड़ने की इजाजत परिवार वाले कैसे देते? लिहाजा 18 साल की उम्र में जेब में मात्र 26 रुपये लेकर ओंकार नाथ धर बम्बई (वर्तमान मुम्बई) जाने के लिए घर से भाग गए।

जीवन का घर का नाम ‘जीवन किरण’ था और लोग समझते थे कि उन्होंने अपने साथ बेटे का भी नाम जोड़ा था, परंतु हकीकत ये थी कि उनकी पत्नी का नाम ‘किरण’ था। वे लाहौर की थीं। पर्दे पर अधिकतर खलनायक की भूमिका करने वाले जीवन साहब निजी ज़िन्दगी में इतने भले थे कि पैसों के मामले में कोई अगर उन्हें दगा दे जाये तो वे कहते थे- "उस व्यक्ति को ज्यादा जरुरत होगी"।

मुंबई में फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश के लिए स्टुडियो में जो भी काम मिला, वह स्वीकार कर लिया। जीवन साहब और बाद में ‘शोले’ जैसी अनेक फ़िल्मों के अदभूत कैमेरा मेन द्वारका दिवेचा दोनों दोस्त मिलकर, शूटिंग के दौरान स्टार्स के चेहरे चमकाने के लिए उन पर प्रकाश फेंकने वाले यानि रिफ्लैकटर्स को संभालने वाले मज़दूर बन गए। एक दिन स्टुडियो में निर्माता मोहन सिन्हा यानि ‘रजनी गंधा’ की हीरोइन अभिनेत्री विद्या सिन्हा के दादाजी अपनी नई फ़िल्म के लिए नये कलाकारों के स्क्रीन टेस्ट कर रहे थे। सिन्हा जी ने कम्पाउन्ड में उन दोनों दोस्तों को देखा और अच्छी कद-काठी के नौजवान ओंकार नाथ धर को पूछा- "क्या तुम अभिनय करना चाहते हो?" ना कहने का सवाल ही कहाँ था? उनका स्क्रीन टेस्ट हुआ और स्वाभाविक था कि परिणाम अच्छा था। सिन्हा जी ने पूछा- "क्या करते हो?" और युवा ने बताया कि वह उनके स्टुडियो में रिफ्लैक्टर संभालता है।

दूसरा सवाल आया- "क्या कुछ गा सकते हो?" जवाब में ओंकार जी ने पंजाब की अमर प्रेम कथा ‘हीर रांझा’ की कुछ पंक्तियां सुनाई और एक मज़दूरी करने वाले व्यक्ति की अभिनय की यात्रा का आरंभ ‘फैशनेबल इन्डिया’ फ़िल्म से हुआ। जब ओंकार नाथ धर यानि ने विजय भट्ट की फ़िल्म में काम करना शुरू किया, तब उन्होंने नया नाम ‘जीवन’ दिया, जो जीवन भर उनका नाम रहा। उनके अभिनय की एक खासियत ये थी कि खलनायकी में वे कॉमेडी भी डाल देते थे। उन्हें दिलीप कुमार के ख़िलाफ़ खलनायक के रूप में फ़िल्म ‘कोहिनूर’ में देखें या ‘नया दौर’ में, अभिनेता जीवन की टक्कर एक अलग ही माहौल खड़ा करती थी। उनका काम ‘अमर अकबर एथॉनी’ में भी काफ़ी सराहा गया था। सन 1964 की फ़िल्म ‘महाभारत’ में उनकी भूमिका ‘शकुनि मामा’ की थी।

नारद मुनि की भूमिका

अभिनेता जीवन को दर्शकों ने नारद मुनि की भूमिका में काफ़ी पसंद किया। "नारायण.... नारायण..." बोलते जीवन ने देवर्षि नारद के उस पौराणिक पात्र को 60 से अधिक फ़िल्मों में पर्दे पर जीवंत किया था, जो शायद अपने आप में एक विक्रम और एक कलाकार के लिए बड़ी उपलब्धि थी। उनको मुख्य भूमिका में लेकर ‘नारद लीला’ फ़िल्म भी आई थी। फ़िल्म 'जॉनी मेरा नाम' के एक दृश्य में 80 लाख के हीरे छुपाने वाले स्मगलर ‘हीरा’ (जीवन) से जब पुलिस पुछताछ करती है तो वे सिगरेट का धुंआ निकालते हुए कहते हैं- "कमिश्नर साहब, आपको जो चार्ज लगाना हो लगाकर छुट्टी कीजिए.... फालतु अफवाहों पे बहस करने से क्या फायदा?" ऐसे तो जाने कितने ही दृश्य याद आ जाते हैं, जब भी जीवन साहब की स्मृति ताजा होती है। लेकिन दर्शकों ने जीवन को सबसे ज़्यादा नारद मुनि के रूप में ही अपनी यादों में बनाये रखा।

प्रमुख फ़िल्में

जीवन साहब की फ़िल्मों में प्रमुख हैं- ‘दिल ने फिर याद किया’, ‘आबरु’, ‘हमराज़’, ‘बंधन’, ‘भाई हो तो ऐसा’, ‘तलाश’, ‘धरम वीर’, ‘चाचा भतीजा’, ‘सुहाग’, ‘नसीब’, ‘टक्कर’, ‘मेरे हमसफ़र’, ‘डार्लिंग डार्लिंग’, ‘फूल और पत्थर’, ‘इन्तकाम’, ‘हीर रांझा’, ‘रोटी’, ‘शरीफ़ बदमाश’, ‘सबसे बड़ा रुपैया’, ‘गेम्बलर’, ‘याराना’, ‘प्रोफेसर प्यारेलाल’, ‘बुलंदी’, ‘सनम तेरी कसम’, ‘देशप्रेमी’, ‘सुरक्षा’ और ‘लावारिस’ इत्यादि।

जीवन एक ऐसे खलनायक थे, जो हीरो से मार खाने में कभी भी कंजूसी नहीं करते थे। उनका मानना था कि एक फ़िल्म तभी हिट होती है, जब हीरो खलनायक को पीटता है। वह अपने पुत्र किरण कुमार को भी सलाह देते थे कि कोई पात्र तभी हीरो कहलाता है, जब वह खलनायक को बराबर मारता है। इसलिए अपने से कद में छोटे हीरो से भी मार खाने में कसर मत छोड़ो। जीवन से कभी भी निर्माताओं को कोई शिकायत नहीं होती थी, क्योंकि उनके परिवार के किसी सदस्य को सेट पर आना तो दूर की बात थी, फोन भी लंच के समय के अलावा नहीं कर सकते थे। वे अपने अभिनय के प्रति पूरी तरह से समर्पित रहते थे। इसलिए बी. आर. चोपड़ा और मनमोहन देसाई जैसे बड़े निर्माताओं की फ़िल्मों में जीवन साहब नियमित रूप से लिये जाते थे। अभिनेता जीवन के पुत्र किरण कुमार ने एक साक्षात्कार में बताया था कि जीवन साहब धार्मिक स्थानों पर गरीबों को खाना खिलाने में और योग्य विद्यार्थीओं को पढ़ाने में आर्थिक सहायता करते रहते थे। वक्त के पाबंद जीवन साहब कभी भी सेट पर देर से नहीं पहुंचे। जब भी वे शूटींग के लिए हाजिर होते थे, सबसे पहले स्टेज को छू कर नमन करने के बाद ही अपना दिन प्रारंभ करते थे।

अपने काम को पूजा-इबादत जैसा मानने वाले अभिनेता जीवन का 72 साल की उम्र में 10 जून, 1987 को निधन हुआ। नारद मुनि की अपनी अनेक भूमिकाओं और कितनी सारी फ़िल्मों के एक से एक यादगार पात्रों से जीवन साहब हिन्दी सिनेमा के दर्शकों के जीवन में अपना अलग स्थान रखते हुए आज भी ज़िन्दा ही हैं।

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भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...