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शनिवार, 27 जनवरी 2024

विक्रम भट्ट

#27jan 
विक्रम भट्ट 

🎂27 जनवरी 1968

एक भारतीय निर्देशक हैं।  

विक्रम भट्ट 27 जनवरी 1968 में मुंबई में हुआ था।  उनके पिता का नाम प्रवीण भट्ट हैं।  

शादी 
भट्ट की शादी उनकी बचपन की दोस्त अदिति भट्ट से हुई है।  उनकी एक बेटी भी है-कृष्णा भट्ट।  साल 1998 में किन्ही कारणों से इस जड़ी ने एक दूसरे से तलाक ले लिया।  इसके बाद उनका अफेयर मिस यूनिवर्स और अभिनेत्री सुष्मिता सेन से रहा। फिर वह उनसे भी अलग हो गए।  उसके बाद उन्होंने अभिनेत्री अमीषा पटेल को पांच साल तक डेट किया।  किन्ही कारणों  से अमीषा और भट्ट का ब्रेकअप हो गया। भट्ट का उनकी बेटी की तरफ झुकाव हैं।  उनकी बेटी उन्हें फिल्म के दौरान सेट पर बतौर सहायक निर्देशक के काम करतीं हैं।  

करियर 
विक्रम भट्ट ने अपने करियर की शुरुआत महज चौदह साल की उम्र में कर दी थी।  उनकी पहली फिल्म थी कानून क्या करेगा।  इसके बाद उन्होंने मुकुल आनंद के साथ बतौर सहायक निर्देशक फिल्म अग्निपथ में उनके साथ काम किया।  फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर काफी अच्छा व्यापार किया था।  

इस फिल्म के बाद भट्ट ने निर्देशक शेखर कपूर और महेश भट्ट के साथ दो-दो साल बतौर निर्देशक काम किया।  उन्होंने अपने सहायक फिल्म निर्देशन के दौर में कई हिट फ़िल्में जिनमे से एक हम हैं राही प्यार के फिल्म भी थी।  

उन्होंने अपने करियर की बतौर निर्देशक शुरुआत फिल्म जन्म से की।  इस फिल्म को मुकेश भट्ट ने प्रोड्यूस किया था।  उनकी शुरुआत की चार फ़िल्में बॉक्स-ऑफिस पर औंधेमुंह गिरी, जिसने विक्रम की हिम्मत को पूरी ठ तोड़ कर रख दिया था।  उसके बाद उन्होंने लगातार हिट फ़िल्में निर्देशित की, जिनमे कसूर, राज, आवारा पागल दीवाना जैसी फ़िल्में शामिल थीं।  हालंकि इस फिल्म के बाद फिर उनका करियर ख़राब दौर से गुजरने लगा।  

साल 2008 में भट्ट ने हॉरर फिल्म 1920 और शापित जैसी फिल्मों से अपनी हिंदी सिनेमा में वापसी की।  भट्ट ने पहली हिंदी सिनेमा में हॉन्टेड फिल्म 3डी में पेश की थी।  उनकी यह हांटेड फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर खूब कमाई की थी।  

साल 2012 में उन्होंने फिर से हॉन्टेड फिल्म राज निर्देशित की।   बॉक्सऑफिस  अच्छी कमाई की।  भट्ट ने इसके बाद बिपाशा के साथ मिलकर भुतहा फिल्म राज 3 का निर्माण किया।  हालांकि या फिल्म उनकी और हॉन्टेड फिल्मों की तरह दर्शकों रिझा नहीं पायी।  इसके बाद उन्होंने भुतहा फिल्म 1920 ईविल रिटर्न्स बनाई, इस फिल्म ने बॉक्सऑफिस पर ठीकठाक कमाई की।  

साल 2014 में उनकी एक और फिल्म क्रिएचर 3डी।  यह फिल्म दर्शकों को अपनी और आकर्षित करने में पूरी तरह नाकाम रही और बॉक्सऑफिस पर फिल्म को मुंह की खानी पड़ी।  

टीवी करियर 
विक्रम भट्ट नई हॉरर फ़िल्में बनाने के एक एक हॉरर शोर इश्क किल्स निर्देशित किया।  जोकि एक रियल लाइफ बेस्ड शो था।  हालंकि शो को उतनी टीआरपी नहीं जिंतनी उनकी फिल्मों को मिलती है।  

प्रसिद्ध फ़िल्में 
जन्म ,मदहोश। गुनेहगार, फरेब, बंबई का बाबू, ग़ुलाम, कसूर,राज, आप मुझे अच्छे लगने लगे ,आवारा पागल दीवाना, आँखे, फियर, स्पीड, 1920 ऐतबार,शापित, हॉन्टेड, राज 3 डी, डेंजरस इश्क , मिस्टर एक्स।

शनिवार, 13 जनवरी 2024

सरदार मालिक

#13jan
#27jan 

सरदार मालिक
🎂जन्म की तारीख और समय: 13 जनवरी 1930, कपूरथला
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 27 जनवरी 2006, मुम्बई

बच्चे: अनु मलिक, अबु मलिक, डब्बू
पोते या नाती: अरमान मलिक, अमाल मलिक, अदा मलिक, अनमोल मलिक,

सरदार मलिक का जन्म 13 जनवरी 1930 को कपूरथला , पंजाब, ब्रिटिश भारत में हुआ था । वह नृत्य और गायन सीखने के लिए सबसे पहले उत्तराखंड के अल्मोडा में उदय शंकर के इंडिया कल्चरल सेंटर के छात्र थे । वह वहां कथकली, मणिपुरी और भरतनाट्यम में प्रशिक्षित कोरियोग्राफर बने। इस संस्थान में रहते हुए, उन्होंने उस्ताद अलाउद्दीन खान से संगीत भी सीखा, जो उसी केंद्र में काम करते थे।

बाद में वह 1940 के दशक के अंत में बॉलीवुड में आये और 600 से अधिक गानों के संगीत निर्देशक रहे। उन्हें ठोकर (1953 फ़िल्म) , औलाद (1954), बचपन (1963 फ़िल्म), महारानी पद्मिनी (1964 फ़िल्म) और विशेष रूप से उनकी संगीतमय फ़िल्म सारंगा (1961) में उनके काम के लिए जाना जाता है। फलस्वरूप उन्हें 'सारंगा पुरुष' के नाम से जाना जाने लगा। 

सरदार मलिक का 76 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद 27 जनवरी 2006 को निधन हो गया। मलिक की पत्नी, बिलकिस, गीतकार हसरत जयपुरी की बहन थीं ।  इस जोड़े के तीन बेटे हैं, अनु मलिक , डब्बू मलिक और अबू मलिक । उनके तीनों बेटे अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए बॉलीवुड में संगीत निर्देशक बने।
📽️
चालीस करोड (1946) एक नृत्य कोरियोग्राफर के रूप में
राज़ (1949 फ़िल्म)
लैला मजनू (1953 फ़िल्म) 
ठोकर (1953 फ़िल्म) 
औलाद (1954) 
अब-ए-हयात (1955 फ़िल्म)
मान के आंसू (1959)
मेरा घर मेरे बच्चे (1960)
सारंगा (1961) 
बचपन (1963 फ़िल्म) 
महारानी पद्मिनी (1964 फ़िल्म)
जंतर मंतर (1964) 
ज्ञानी जी (1977) (पंजाबी फ़िल्म)

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

अभिनेत्री जमुना

जमुना अभिनेत्री
पुराने जमाने की अभिनेत्री
🎂जन्म की तारीख और समय: 30 अगस्त 1936, हम्पी
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 27 जनवरी 2023
पति: जुलुरी रमना राव (विवा. 1965–2014)
बच्चे: स्रवनती राव, वामसीकृष्णा राव, श्रावंती जुलुरी
माता-पिता: निप्पनी श्रीनिवास राव, कौसल्या देवी
जमुना का जन्म वर्तमान कर्नाटक के हम्पी में कन्नड़ भाषी निप्पानी श्रीनिवास राव और तेलुगु भाषी कौसल्या देवी के घर हुआ था और उनका नाम जना बाई रखा गया था। उनके पिता माधव ब्राह्मण थे , जबकि उनकी मां वैश्य थीं , जिसके परिणामस्वरूप अंतरजातीय प्रेम विवाह हुआ ।जमुना आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के दुग्गीराला में पली बढ़ीं । उनके पिता हल्दी और तंबाकू के व्यवसाय से जुड़े थे और जब वह सात साल की थीं, तब उनका परिवार वहां चला गया।जब सवित्री दुग्गीराला में नाटक कर रही थी, वह जमुना के घर पर रहेगी। बाद में, सावित्री ने जमुना को फिल्मों में अभिनय करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने 16 साल की उम्र में फिल्मों में नायिका के रूप में अभिनय करना शुरू कर दिया था।
जमुना स्कूल में एक स्टेज कलाकार थीं। उनकी माँ ने उन्हें स्वर संगीत और हारमोनियम सिखाया । 1952 में, इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन के डॉ. गरीकिपति राजा राव ने उनका स्टेज शो माँ भूमि देखा और उन्हें अपनी फिल्म पुत्तिलु में एक भूमिका की पेशकश की।

जमुना ने तेलुगु और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं की 198 फिल्मों में अभिनय किया । उन्होंने मूल तेलुगु फिल्म मूगा मनासुलु (1964) में अपनी भूमिका को दोहराते हुए, मिलान (1967) के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीतकर, हिंदी फिल्मों में भी अभिनय किया।

जमुना ने तेलुगु कलाकार संघ की भी स्थापना की और इसके माध्यम से 25 वर्षों तक सामाजिक सेवाएं प्रदान कीं।
जमुना 1980 के दशक में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं और 1989 में राजमुंदरी निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुनी गईं। वह 1991 का चुनाव हार गईं और राजनीति छोड़ दीं, लेकिन 1990 के दशक के अंत में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान कुछ समय के लिए भाजपा के लिए प्रचार किया।

उन्हों ने अवार्ड जीते

1968: सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - मिलान
1972: फ़िल्मफ़ेयर विशेष पुरस्कार - दक्षिण  पांडंती कपूरम
1999: तमिलनाडु राज्य फ़िल्म मानद पुरस्कार - एमजीआर पुरस्कार
2008: एनटीआर राष्ट्रीय पुरस्कार
2010: पद्मभूषण डॉ. बी. सरोजादेवी राष्ट्रीय पुरस्कार 
2019: 17वें संतोषम फिल्म अवार्ड्स में संतोषम लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड

उनकी हिंदी फिल्में

मिस मैरी (1957)
रामू दादा (1961)
एक राज़ (1963)
हमराही (1963)
बेटी बेटे (1964)
रिश्ते नाते (1965)
मिलन (1967) (फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार)
दुल्हन (1975)
नौकर बीवी का (1983)
राज तिलक (1984)

मृत्यु

1965 में जमुना ने एसवी विश्वविद्यालय में प्राणीशास्त्र के प्रोफेसर जुलुरी रमना राव से शादी की ; 10 नवंबर 2014 को 86 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट से उनकी मृत्यु हो गई। उनका एक बेटा, वामसी जुलुरी और एक बेटी, श्रावंती जुलुरी थी , और वे हैदराबाद , तेलंगाना , भारत में रहते थे।

जमुना का 86 वर्ष की आयु में 27 जनवरी 2023 को हैदराबाद में उनके घर पर निधन हो गया

बुधवार, 14 जून 2023

भारत भूषण

*अभिनेता भारत भूषण के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि*
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
*जन्म की तारीख और समय: 14 जून 1920,*
*मृत्यु की जगह और तारीख: 27 जनवरी 1992*, 
*पत्नी: रतना भूषण(विवा. 1967–1992), शारधा भूषण*
*माता-पिता: रायबहादुर मोतीलाल*
*बच्चे: अप्रिजित भूषण, अनुराधा भूषण*
*इनाम: सर्व श्रेष्ठ अभिनेता , फिल्मफेयर*
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भारत भूषण  हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे। अपने अभिनय के रंगों से कालिदास, तानसेन, कबीर और मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे ऐतिहासिक चरित्रों को नया रूप देने वाले अभिनेता रहे।

उत्तर प्रदेश के मेरठ में 14 जून 1920 में जन्मे भारत भूषण गायक बनने का ख्वाब लिए मुंबई की फ़िल्म नगरी में पहुंचे थे, लेकिन जब इस क्षेत्र में उन्हें मौका नहीं मिला तो उन्होंने निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की 1941 में निर्मित फ़िल्म 'चित्रलेखा' में एक छोटी भूमिका से अपने अभिनय की शुरुआत कर दी। 1951 तक अभिनेता के रूप में उनकी ख़ास पहचान नहीं बन पाई। इस दौरान उन्होंने भक्त कबीर (1942), भाईचारा (1943), सुहागरात (1948), उधार (1949), रंगीला राजस्थान (1949), एक थी लड़की (1949), राम दर्शन (1950), किसी की याद (1950), भाई-बहन (1950), आंखें (1950), सागर (1951), हमारी शान (1951), आनंदमठ और माँ (1952) फ़िल्मों में काम किया

भारत भूषण के अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की क्लासिक फ़िल्म बैजू बावरा से चमका। बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फ़िल्म की गोल्डन जुबली कामयाबी ने न सिर्फ विजय भट्ट के प्रकाश स्टूडियो को ही डूबने से बचाया, बल्कि भारत भूषण और फ़िल्म की नायिका मीना कुमारी को स्टार के रूप में स्थापित कर दिया। आज भी इस फ़िल्म के सदाबहार गीत दर्शकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ओ दुनिया के रखवाले.., मन तड़पत हरि दर्शन को आज.., तू गंगा की मौज में जमुना का धारा.., बचपन की मुहब्बत को.., इंसान बनो कर लो भलाई का कोई काम.., झूले में पवन के आई बहार.., और दूर कोई गाए.. धुन ये सुनाए जैसे फ़िल्म के इन मधुर गीतों की तासीर आज भी बरकरार है। इस फ़िल्म से जुडे़ कई रोचक पहलू हैं। निर्माता विजय भट्ट फ़िल्म के लिए दिलीप कुमार और नर्गिस के नाम पर विचार कर रहे थे, लेकिन संगीतकार नौशाद ने उन्हें अपेक्षाकृत नए अभिनेता-अभिनेत्री को फ़िल्म में लेने पर जोर दिया। इसी फ़िल्म के लिए नौशाद ने तानसेन और बैजू के बीच प्रतियोगिता का गाना शास्त्रीय गायन के धुरंधर उस्ताद आमिर खान और पंडि़त डी.वी. पलुस्कर से गवाया। फ़िल्म की एक और दिलचस्प बात यह थी कि इसके संगीतकार, गीतकार, शकील बदायूंनी और गायक मोहम्मद रफी तीनों ही मुसलमान थे और उन्होंने मिलकर भक्ति गीत 'मन तपड़त हरिदर्शन को आज..' जैसी उत्कृष्ट रचना का सृजन किया था। बैजू बावरा की सफलता से उत्साहित यही टीम एक बार फिर श्री चैतन्य महाप्रभु फ़िल्म के लिए जुड़ी और इसमें सशक्त अभिनय के लिए भारत भूषण को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। कलाकारों, साहित्यकारों, संगीतकारों, भक्तों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को अपने सहज स्वाभाविक अभिनय के रंगों से परदे पर जीवंत करने का भारत भूषण का यह सिलसिला आगे भी जारी रहा

भारत भूषण के फ़िल्मी करियर में निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी की फ़िल्म मिर्ज़ा ग़ालिब का अहम स्थान है। इस फ़िल्म में भारत भूषण ने शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के किरदार को इतने सहज और असरदार ढंग से निभाया कि यह गुमां होने लगता है कि ग़ालिब ही परदे पर उतर आए हों। बेहतरीन गीत-संगीत, संवाद और अभिनय से सजी यह फ़िल्म बेहद कामयाब रही और इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ संगीत के राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। इस फ़िल्म के लिए गजलों के बादशाह तलत महमूद की मखमली और गायिका, अभिनेत्री सुरैया की मिठास भरी आवाजों में गाई गई गजलें और गीत 'बेहद मकबूल हुए .., आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक.., फिर मुझे दीदए तर याद आया.., दिले नादां तुझे हुआ क्या है.., मेरे बांके बलम कोतवाल.., कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयां कुछ और भारत भूषण ने लगभग 143 फ़िल्मों में अपने अभिनय की विविधरंगी छटा बिखेरी और अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजकपूर तथा देवानंद जैसे कलाकारों की मौजूदगी में अपना एक अलग मुकाम बनाया

भारत भूषण ने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा, लेकिन उनकी कोई भी फ़िल्म बॉक्स आफिस पर सफल नहीं रही। उन्होंने 1964 में अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'दूज का चांद' का निर्माण किया, लेकिन इस फ़िल्म के भी बॉक्स आफिस पर बुरी तरह पिट जाने के बाद उन्होंने फ़िल्म निर्माण से तौबा कर ली।

वर्ष 1967 में प्रदर्शित फ़िल्म 'तकदीर नायक' के रूप में भारत भूषण की अंतिम फ़िल्म थी। इसके बाद वह माहौल और फ़िल्मों के विषय की दिशा बदल जाने पर चरित्र अभिनेता के रूप में काम करने लगे, लेकिन नौबत यहां तक आ गई कि जो निर्माता-निर्देशक पहले उनको लेकर फ़िल्म बनाने के लिए लालायित रहते थे। उन्होंने भी उनसे मुंह मोड़ लिया। इस स्थिति में उन्होंने अपना गुजारा चलाने के लिए फ़िल्मों में छोटी-छोटी मामूली भूमिकाएँ करनी शुरू कर दीं। बाद में हालात ऐसे हो गए कि भारत भूषण को फ़िल्मों में काम मिलना लगभग बंद हो गया। तब मजबूरी में उन्होंने छोटे परदे की तरफ रुख़ किया और दिशा तथा बेचारे गुप्ताजी जैसे धारावाहिकों में अभिनय किया। हालात की मार और वक्त के सितम से बुरी तरह टूट चुके हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णिम युग के इस अभिनेता ने आखिरकार 27 जनवरी 1992 को 72 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया

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भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...