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मंगलवार, 4 जुलाई 2023

नसीम बानो

🎂जन्म 4 जुलाई, 1916 ई

⚰️18 जून, 2002
ट्रेजेडी किंग दिलीप साहब की सासू माँ, अभिनेत्री सायरा बानो की माँ, ब्यूटी क्वीन नसीम बानो के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धाजंलि

नसीम बानो भारतीय सिनेमा' में चालीस के दशक की हिन्दी फ़िल्मों की प्रमुख अभिनेत्री थीं। भारतीय सिने जगत् में अपनी दिलकश अदाओं से दर्शकों को दीवाना बनाने वाली इस अभिनेत्री को उसकी ख़ूबसूरती के लिए "ब्यूटी क्वीन" कहा जाता था। हिन्दी सिनेमा की एक और प्रसिद्ध अभिनेत्री सायरा बानो, नसीम बानो की ही पुत्री हैं।

नसीम बानो का जन्म 4 जुलाई, 1916 ई. को हुआ था। इनकी परवरिश शाही ढंग से हुई थी। वह स्कूल पढ़ने के लिए पालकी से जाती थीं। नसीम बानो सुन्दरता की मिसाल थीं। उनकी सुंदरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें किसी की नज़र न लग जाए, इसलिये उन्हें पर्दे में रखा जाता था।

नसीम बानो ने अहसान मियाँ नामक एक अमीर व्यक्ति से प्रेम विवाह किया था। अहसान मियाँ ने नसीम बानो की खातिर कुछ फ़िल्मों का निर्माण भी किया था। बाद के समय में नसीम बानो और अहसान मियाँ का दाम्पत्य रिश्ता टूट गया। भारत का विभाजन होने और पाकिस्तान बन जाने के बाद अहसान मियाँ कराची जाकर बस गये। पति से अलग होने के बाद नसीम बानो मुंबई में ही बनी रहीं। बाद में वे अपनी बेटी सायरा बानो और बेटे सुल्तान को लेकर लंदन में जा बसीं।

सिनेमा जगत् में नसीब बानो का प्रवेश संयोगवश हुआ था। एक बार नसीम बानो अपनी स्कूल की छुटियों के दौरान अपनी माँ के साथ फ़िल्म 'सिल्वर किंग' की शूटिंग देखने गयीं। फ़िल्म की शूटिंग देखकर नसीम बानो मंत्रमुग्ध हो गयीं और उन्होंने निश्चय किया कि वह अभिनेत्री के रूप में अपना सिने कॅरियर बनायेंगी। इधर स्टूडियों में नसीम बानो की सुंदरता को देख कई फ़िल्मकारों ने नसीम बानो के सामने फ़िल्म अभिनेत्री बनने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उनकी माँ ने यह कहकर सभी प्रस्ताव ठुकरा दिये कि नसीम अभी बच्ची है। नसीम की माँ उन्हें अभिनेत्री नहीं बल्कि डॉक्टर बनाना चाहती थीं। इसी दौरान फ़िल्म निर्माता सोहराब मोदी ने अपनी फ़िल्म ‘हेमलेट' के लिये बतौर अभिनेत्री नसीम बानो को काम करने के लिए प्रस्ताव दिया और इस बार भी नसीम बानो की माँ ने इंकार कर दिया, लेकिन इस बार नसीम अपनी जिद पर अड़ गयी कि उन्हें अभिनेत्री बनना ही है। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी बात मनवाने के लिये भूख हड़ताल भी कर दी

सन् 1935 में नसीम को फ़िल्मों में ब्रेक दिया मशहूर फ़िल्मकार सोहराब मोदी ने और 'खून का खून' फ़िल्म का निर्माण किया। इसके बाद नसीम 1941 तक सोहराब मोदी की ही फ़िल्मों में व्यस्त रहीं और इस दौरान उनकी 'खान बहादुर' (1937), ' डाइवोर्स ' तथा 'मीठा जहर' (1938), 'पुकार' (1939) और 'मैं हारी' (1940) में प्रदर्शित हुई। मुग़ल सम्राट जहाँगीर के एक इंसाफ को आधार बनाकर बनाई गई 'पुकार' सुपरहिट रही। इसमें जहाँगीर का किरदार अभिनेता चंद्रमोहन ने निभाया, जबकि नसीम बानो जहाँगीर के बेगम की भूमिका में थीं। जब फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो उस दौर में मुंबई के सिनेमाघरों में फ़िल्म देखने वालों की भारी भीड़ जुटी। उस फ़िल्म की सफलता के बाद नसीम बानो फ़िल्म उद्योग में स्टार के रूप में स्थापित हो गईं और इंडस्ट्री की सबसे व्यस्त अभिनेत्री बन गईं।

अपनी इस सफलता के बाद 1942 में उनकी पृथ्वीराज कपूर के साथ फ़िल्म 'उजाला' आई। इसे भी दर्शकों ने पसंद किया। 'उजाला' का निर्माण 'ताजमहल पिक्चर' के बैनर तले हुआ था। फ़िल्मीस्तान कंपनी ने जब फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा तो अभिनेत्री के रूप में कंपनी की पहली पिक्चर में नसीम बानो को साइन किया। 'चल-चल रे नौजवान' नामक इस सफल फ़िल्म में नसीम के साथ नायक का किरदार निभाया 'दादा मुनि' उर्फ अशोक कुमार ने। इस फ़िल्म ने भी अच्छा कारोबार किया और नसीम बानो और व्यस्त कलाकार बन गईं। उन्होंने फ़िल्मकार महबूब खान की कई फ़िल्मों में भी अभिनय किया। उसके बाद अपनी बेटी सायरा बानो का दौर शुरू हो जाने से उन्होंने खुद को हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा से अलग कर लिया। यह संयोग ही है कि सायरा उनसे भी ज्यादा मशहूर अभिनेत्री हुईं

नसीम बानो का 18 जून, 2002 को मंगलवार रात में निधन हो गया। दिवंगत अभिनेत्री के शोक संतप्त परिवार में उनकी अभिनेत्री पुत्री सायरा बानो ही हैं।

रविवार, 18 जून 2023

नसीब बानो


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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
🎂जन्मरोशन आरा बेगम
4 जुलाई 1916
दिल्लीब्रिटिश इंडिया
⚰️मृत्यु18 जून 2002 (उम्र 85)
मुम्बईमहाराष्ट्र्भारत
व्यवसायअभिनेत्री
कार्यकाल1935–1957
जीवनसाथीएहसान-उल-हक
बच्चेसायरा बानो (बेटी)
सुल्तान अहमद (बेटा)
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ट्रेजेडी किंग दिलीप साहब की सासू माँ अभिनेत्री सायरा बानो की माँ ब्यूटी क्वीन नसीम बानो की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाजंलि

नसीम बानो भारतीय सिनेमा' में चालीस के दशक की हिन्दी फ़िल्मों की प्रमुख अभिनेत्री थीं। भारतीय सिने जगत् में अपनी दिलकश अदाओं से दर्शकों को दीवाना बनाने वाली इस अभिनेत्री को उसकी ख़ूबसूरती के लिए "ब्यूटी क्वीन" कहा जाता था। हिन्दी सिनेमा की एक और प्रसिद्ध अभिनेत्री सायरा बानो, नसीम बानो की ही पुत्री हैं।

नसीम बानो का जन्म 4 जुलाई, 1916 ई. को हुआ था। इनकी परवरिश शाही ढंग से हुई थी। वह स्कूल पढ़ने के लिए पालकी से जाती थीं। नसीम बानो सुन्दरता की मिसाल थीं। उनकी सुंदरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें किसी की नज़र न लग जाए, इसलिये उन्हें पर्दे में रखा जाता था।

नसीम बानो ने अहसान मियाँ नामक एक अमीर व्यक्ति से प्रेम विवाह किया था। अहसान मियाँ ने नसीम बानो की खातिर कुछ फ़िल्मों का निर्माण भी किया था। बाद के समय में नसीम बानो और अहसान मियाँ का दाम्पत्य रिश्ता टूट गया। भारत का विभाजन होने और पाकिस्तान बन जाने के बाद अहसान मियाँ कराची जाकर बस गये। पति से अलग होने के बाद नसीम बानो मुंबई में ही बनी रहीं। बाद में वे अपनी बेटी सायरा बानो और बेटे सुल्तान को लेकर लंदन में जा बसीं।

सिनेमा जगत् में नसीब बानो का प्रवेश संयोगवश हुआ था। एक बार नसीम बानो अपनी स्कूल की छुटियों के दौरान अपनी माँ के साथ फ़िल्म 'सिल्वर किंग' की शूटिंग देखने गयीं। फ़िल्म की शूटिंग देखकर नसीम बानो मंत्रमुग्ध हो गयीं और उन्होंने निश्चय किया कि वह अभिनेत्री के रूप में अपना सिने कॅरियर बनायेंगी। इधर स्टूडियों में नसीम बानो की सुंदरता को देख कई फ़िल्मकारों ने नसीम बानो के सामने फ़िल्म अभिनेत्री बनने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उनकी माँ ने यह कहकर सभी प्रस्ताव ठुकरा दिये कि नसीम अभी बच्ची है। नसीम की माँ उन्हें अभिनेत्री नहीं बल्कि डॉक्टर बनाना चाहती थीं। इसी दौरान फ़िल्म निर्माता सोहराब मोदी ने अपनी फ़िल्म ‘हेमलेट' के लिये बतौर अभिनेत्री नसीम बानो को काम करने के लिए प्रस्ताव दिया और इस बार भी नसीम बानो की माँ ने इंकार कर दिया, लेकिन इस बार नसीम अपनी जिद पर अड़ गयी कि उन्हें अभिनेत्री बनना ही है। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी बात मनवाने के लिये भूख हड़ताल भी कर दी

सन् 1935 में नसीम को फ़िल्मों में ब्रेक दिया मशहूर फ़िल्मकार सोहराब मोदी ने और 'खून का खून' फ़िल्म का निर्माण किया। इसके बाद नसीम 1941 तक सोहराब मोदी की ही फ़िल्मों में व्यस्त रहीं और इस दौरान उनकी 'खान बहादुर' (1937), ' डाइवोर्स ' तथा 'मीठा जहर' (1938), 'पुकार' (1939) और 'मैं हारी' (1940) में प्रदर्शित हुई। मुग़ल सम्राट जहाँगीर के एक इंसाफ को आधार बनाकर बनाई गई 'पुकार' सुपरहिट रही। इसमें जहाँगीर का किरदार अभिनेता चंद्रमोहन ने निभाया, जबकि नसीम बानो जहाँगीर के बेगम की भूमिका में थीं। जब फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो उस दौर में मुंबई के सिनेमाघरों में फ़िल्म देखने वालों की भारी भीड़ जुटी। उस फ़िल्म की सफलता के बाद नसीम बानो फ़िल्म उद्योग में स्टार के रूप में स्थापित हो गईं और इंडस्ट्री की सबसे व्यस्त अभिनेत्री बन गईं।

अपनी इस सफलता के बाद 1942 में उनकी पृथ्वीराज कपूर के साथ फ़िल्म 'उजाला' आई। इसे भी दर्शकों ने पसंद किया। 'उजाला' का निर्माण 'ताजमहल पिक्चर' के बैनर तले हुआ था। फ़िल्मीस्तान कंपनी ने जब फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा तो अभिनेत्री के रूप में कंपनी की पहली पिक्चर में नसीम बानो को साइन किया। 'चल-चल रे नौजवान' नामक इस सफल फ़िल्म में नसीम के साथ नायक का किरदार निभाया 'दादा मुनि' उर्फ अशोक कुमार ने। इस फ़िल्म ने भी अच्छा कारोबार किया और नसीम बानो और व्यस्त कलाकार बन गईं। उन्होंने फ़िल्मकार महबूब खान की कई फ़िल्मों में भी अभिनय किया। उसके बाद अपनी बेटी सायरा बानो का दौर शुरू हो जाने से उन्होंने खुद को हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा से अलग कर लिया। यह संयोग ही है कि सायरा उनसे भी ज्यादा मशहूर अभिनेत्री हुईं

नसीम बानो का 18 जून, 2002 को मंगलवार रात में निधन हो गया। दिवंगत अभिनेत्री के शोक संतप्त परिवार में उनकी अभिनेत्री पुत्री सायरा बानो ही हैं।

दान सिंह

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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
नोट↔️↔️वो जब याद आए...

यपुर निवासी बॉलीवुड के महान संगीत निर्देशक दान सिंह ने यूं तो आनंद बख्शी सहित कई गीतकारों की रचनाओं को अपनी धुनों से सजाया लेकिन इनमें गुलजार का लिखा एक गीत खास है, पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है। इससे एक वाकया भी जुड़ा है। इस गीत के लिए बनाई गई दान सिंह की धुन चोरी हो गई थी इसीलिए उन्हें दोबारा नई धुन की रचना करनी पड़ी।

‘भूल जाना’ फिल्म का यह गीत आज भी मुकेश के लोकप्रिय गीतों में शुमार है। यह फिल्म रिलीज नहीं हो पाई थी लेकिन इसके गाने बाजार में गए थे, जिनमें यह गाना उस दौर में बहुत मकबूल हुआ। बांसुरी और सितार के साथ राग यमन कल्याण पर आधारित सुंदर रूमानी धुन पर मुकेश की यह बेमिसाल गायकी है। गुलजार की इस खूबसूरत शायरी का मुखड़े के साथ एक अंतरा ही देखें, क्या कुछ नहीं है इसमेः-

पुकारो मुझे मेरा नाम लेकर पुकारो

मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है

खयालों में तुमने भी देखी तो होंगी

कभी मेरे ख्वाबों की धुंधली लकीरें,

तुम्हारी हथेली से मिलती हैं जा कर

मेरे हाथ की ये अधूरी लकीरें

बड़ी सर चढ़ी हैं ये जुल्फें तुम्हारी

ये जुल्फें मेरे बाजुओं में उतारो

पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो।

दान सिंह ने एक बार मुझे बातचीत में बताया था कि फिल्म पूरब-पश्चिम के गीत कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे...की धुन उन्होंने रात्रिकालीन पार्टी में एक गीतकार को सुना दी थी, जिसने इंपाला कार की कीमत पर यह धुन संगीतकार को बेच दी। उन दिनों इम्पाला कार के जलवों की चर्चा होती थी। यह बात अलग है कि दान सिंह अपने जीवन में कभी कार नहीं खरीद पाए और गुमनामी की जिंदगी जीते हुए साइकिल के पैडलों से ही जयपुर की सड़कें नापते रहे। ये वही दान सिंह थे जिन्होंने माई लव फिल्म के वो तेरे प्यार का गम...और जिक्र होता है कयामत का... जैसे मशहूर गीतों को धुनों से सजाया। इस फिल्म में लक्ष्मीकांत, प्यारेलाल, पं. शिव कुमार और हरि प्रसाद चौरसिया ने उनके सहायक के रूप में काम किया था। पंकज राग अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ के 767 नंबर पृष्ठ पर लिखते हैं, ‘यह कितना दुखदायी है कि इतने प्रतिभाशाली कम्पोजर की और कोई फिल्म पर्दे पर ही नहीं पाई। प्रतिभा के साथ किस्मत का होना भी हमारे फिल्म जगत में बहुत जरूरी है और एक ऐसा संगीतकार जिसके पास किसी का वरदहस्त था, फिल्मी दुनिया के षड्यंत्रों और तिकड़मों के सामने टिक पाया। पूरी तरह हताश दानसिंह वापस जयपुर लौट गए।’ दानसिंह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं।

मुकेश (दाएं) ने दान सिंह (ऊपर) से कहा था-ये बंबई है, पार्टियों में अपनी धुनें सुनाएंगे तो चोरी ही हो जाएंगी।

पुकारो मुझे...गीत की धुन चोरी होने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। जब मुकेश यह गीत रिकॉर्ड कराने आए तो धुन सुनकर बोले -"इस धुन पर तो गीत रिकॉर्ड हो चुका है। तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा...।' दान सिंह ने हैरान होकर पूछा, यह धुन वहां कैसे चली गई? इस पर मुकेश का जवाब था, दान सिंह जी यह बंबई है। आप तरल-गरल पार्टी में लोगों को धुन सुना देंगे तो यही होगा। दान सिंह ने बिना निराश हुए कहा, इससे क्या फर्क पड़ता है? एक घंटे में जाइए, मैं दूसरी धुन तैयार कर देता हूं। नई धुन पर यह गीत आज भी यू-ट्यूब पर सुना जा सकता है। दान सिंह की धुन चोरी होने का यह अकेला वाकया नहीं है। कितने लोगों को मालूम होगा कि इंदीवर के लिखे सदाबहार गीत, ‘चंदन सा बदन चंचल चितवन...’ की धुन दान सिंह की बनाई हुई है। दरअसल दान सिंह ने इंदीवर के लिखे इस गीत की धुन फिल्म भूल ना जाना के लिए बनाई थी लेकिन जब उन्हें पता चला कि यह फिल्म रिलीज नहीं हो रही है तो इंदीवर ने निर्माता जगन शर्मा से इजाजत लेकर यह गीत फिल्म सरस्वती चंद्र के लिए कल्याण जी आनंदजी को दे दिया। गीत के साथ ही यह धुन भी उनके पास पहुंच गई। इंदीवर ने जब भूल जाना के लिए यह गीत लिखा, तब चंदन सा बदन वाली पंक्ति मुखड़े में नहीं, अंतरे में थी। तब इसका मुखड़ा था- मतवाले नयन, जैसे नील गगन/पंछी की तरह खो जाऊं मैं। बाद में अंतरे को उठा कर मुखड़ा बना दिया गया लेकिन इसकी धुन दान सिंह वाली है।

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प्रसिद्ध संगीतकार दान सिंह की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

दान सिंह जयपुर राजस्थान के रहनेवाले थे, जिन्होंने संगीतकार खेमचंद प्रकाश से संगीत सीखा। वो एक अच्छा संगीतकार होने के साथ साथ एक अच्छा गायक भी थे। मुंबई आकर दो साल के संघर्ष के बाद 1969 में उनको पहला अवसर मिला किसी फ़िल्म में संगीत देने का और वह फ़िल्म थी 'तूफ़ान'। यह फ़िल्म नहीं चली। उसके अगले ही साल आई फ़िल्म 'माइ लव', जिसके गीतों नें धूम मचा दी। लेकिन अफ़सोस की बात कि 'माइ लव' के गीतों की अपार कामयाबी के बावजूद किसी नें उनकी तरफ़ न कोई तारीफ़ की और न ही कोई प्रोत्साहन मिला। वो पार्टियों में जाते और अपनी धुनें सुनाते। "वो तेरे प्यार का ग़म, एक बहाना था सनम" गीत में दान सिंह नें जिस तरह से राग भैरवी का इस्तेमाल किया, संगीतकार मदन मोहन को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने दान सिंह को कहा था कि "भैरवी का इस्तेमाल तो हमने भी किया, पर आप इसमें ऐसा वेरिएशन कैसे ले आये?" दान सिंह को किसी नें मौका तो नहीं दिया पर उन पार्टियों में मौजूद कुछ नामी संगीतकार उनकी धुनों को चुराने लगे और अपने गीतों में उन्हें इस्तेमाल करते रहे। इससे वो इतने हताश हो गए कि अपनी डॉक्टर पत्नी उमा के साथ जयपुर लौट गए। जयपुर लौटने से पहले उन्होंने 'भूल न जाना', 'मतलबी' और 'बहादुर शाह ज़फ़र' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया, पर इनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं चली।

संगीत निर्देशक दान सिंह ने यूं तो आनंद बख्शी सहित कई गीतकारों की रचनाओं को अपनी धुनों से सजाया लेकिन इनमें गुलजार का लिखा एक गीत खास है, पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है। इससे एक वाकया भी जुड़ा है। इस गीत के लिए बनाई गई दान सिंह की धुन चोरी हो गई थी इसीलिए उन्हें दोबारा नई धुन की रचना करनी पड़ी।

भूल जाना’ फिल्म का यह गीत आज भी मुकेश के लोकप्रिय गीतों में शुमार है। यह फिल्म रिलीज नहीं हो पाई थी लेकिन इसके गाने बाजार में गए थे, जिनमें यह गाना उस दौर में बहुत मकबूल हुआ। बांसुरी और सितार के साथ राग यमन कल्याण पर आधारित सुंदर रूमानी धुन पर मुकेश की यह बेमिसाल गायकी है।

दान सिंह ने एक बार बातचीत में बताया था कि फिल्म पूरब-पश्चिम के गीत कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे...की धुन उन्होंने रात्रिकालीन पार्टी में एक गीतकार को सुना दी थी, जिसने इंपाला कार की कीमत पर यह धुन संगीतकार को बेच दी। उन दिनों इम्पाला कार के जलवों की चर्चा होती थी। यह बात अलग है कि दान सिंह अपने जीवन में कभी कार नहीं खरीद पाए और गुमनामी की जिंदगी जीते हुए साइकिल के पैडलों से ही जयपुर की सड़कें नापते रहे। ये वही दान सिंह थे जिन्होंने माई लव फिल्म के वो तेरे प्यार का गम...और जिक्र होता है कयामत का... जैसे मशहूर गीतों को धुनों से सजाया। इस फिल्म में लक्ष्मीकांत, प्यारेलाल, पं. शिव कुमार और हरि प्रसाद चौरसिया ने उनके सहायक के रूप में काम किया था। पंकज राग अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ के 767 नंबर पृष्ठ पर लिखते हैं, ‘यह कितना दुखदायी है कि इतने प्रतिभाशाली कम्पोजर की और कोई फिल्म पर्दे पर ही नहीं पाई। प्रतिभा के साथ किस्मत का होना भी हमारे फिल्म जगत में बहुत जरूरी है और एक ऐसा संगीतकार जिसके पास किसी का वरदहस्त था, फिल्मी दुनिया के षड्यंत्रों और तिकड़मों के सामने टिक पाया। पूरी तरह हताश दानसिंह वापस जयपुर लौट गए।’ दानसिंह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में बसी हैं।

मुकेश ने दान सिंह से कहा था-ये बंबई है, पार्टियों में अपनी धुनें सुनाएंगे तो चोरी ही हो जाएंगी।

पुकारो मुझे...गीत की धुन चोरी होने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। जब मुकेश यह गीत रिकॉर्ड कराने आए तो धुन सुनकर बोले -"इस धुन पर तो गीत रिकॉर्ड हो चुका है। तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा...।' दान सिंह ने हैरान होकर पूछा, यह धुन वहां कैसे चली गई? इस पर मुकेश का जवाब था, दान सिंह जी यह बंबई है। आप तरल-गरल पार्टी में लोगों को धुन सुना देंगे तो यही होगा। दान सिंह ने बिना निराश हुए कहा, इससे क्या फर्क पड़ता है? एक घंटे में जाइए, मैं दूसरी धुन तैयार कर देता हूं। नई धुन पर यह गीत आज भी यू-ट्यूब पर सुना जा सकता है। दान सिंह की धुन चोरी होने का यह अकेला वाकया नहीं है। कितने लोगों को मालूम होगा कि इंदीवर के लिखे सदाबहार गीत, ‘चंदन सा बदन चंचल चितवन...’ की धुन दान सिंह की बनाई हुई है। दरअसल दान सिंह ने इंदीवर के लिखे इस गीत की धुन फिल्म भूल ना जाना के लिए बनाई थी लेकिन जब उन्हें पता चला कि यह फिल्म रिलीज नहीं हो रही है तो इंदीवर ने निर्माता जगन शर्मा से इजाजत लेकर यह गीत फिल्म सरस्वती चंद्र के लिए कल्याण जी आनंदजी को दे दिया। गीत के साथ ही यह धुन भी उनके पास पहुंच गई। इंदीवर ने जब भूल जाना के लिए यह गीत लिखा, तब चंदन सा बदन वाली पंक्ति मुखड़े में नहीं, अंतरे में थी। तब इसका मुखड़ा था- मतवाले नयन, जैसे नील गगन/पंछी की तरह खो जाऊं मैं। बाद में अंतरे को उठा कर मुखड़ा बना दिया गया लेकिन इसकी धुन दान सिंह वाली है।

बरसों बाद राजस्थान की पृष्ठभूमि पर फ़िल्म बनी 'बवंडर', जिसका संगीत तैयार किया दान सिंह नें, और उन्होंने यह साबित भी किया कि उनके संगीत में ठेठ और जादू आज भी बरक़रार है। विषय-वस्तु की वजह से फ़िल्म चर्चा में तो आई पर एक बार फिर दान सिंह का संगीत नहीं चल पाया। क़िस्मत के सिवा किसे दोष दें!!! किसी पत्रकार नें जब एक बार उनकी असफलता का कारण पूछा तो उनका जवाब था, "न पूछिये अपनी दास्तान।" दान सिंह के जीवन को देख कर यह स्पष्ट है कि प्रतिभा के साथ साथ क़िस्मत का होना भी अत्यावश्यक है, वर्ना इतने प्रतिभाशाली और सुरीले संगीतकार होने के बावजूद क्यों किसी नें उन्हें बड़ी फ़िल्मों में मौका नहीं दिया होगा! ख़ैर, आज इन सब बातों में उलझकर क्या फ़ायदा। आज दान सिंह हमारे बीच नहीं है, पर इस बात की संतुष्टि ज़रूर है कि अच्छे संगीत के रसिक कभी उनके कम पर स्तरीय योगदान को नहीं भूलेंगे।

18 जून 2011 में  संगीतकार दान सिंह का निधन हो गया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...