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गुरुवार, 1 फ़रवरी 2024

समिता शेट्टी

#02feb 

समिता शेट्टी
🎂जन्म02 फ़रवरी 1979 
मैंगलोर, कर्नाटक , भारत

शिक्षा
सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स
एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय
सेंट्रल सेंट मार्टिन्स
व्यवसायों अभिनेत्री ,आंतरिक डिज़ाइनर

रिश्तेदार

शिल्पा शेट्टी (बहन)
राज कुंद्रा (जीजा)
शेट्टी का जन्म 02 फरवरी 1979 को मुंबई में एक तुलु भाषी बंट परिवार में हुआ था।  उनके दिवंगत पिता सुरेंद्र और उनकी मां सुनंदा फार्मास्युटिकल उद्योग में टैम्पर-प्रूफ वॉटर कैप के निर्माता थे। शिल्पा शेट्टी उनकी बड़ी बहन हैं।

उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा सेंट एंथोनी गर्ल्स हाई स्कूल, मुंबई से की। सिडेनहैम कॉलेज से वाणिज्य में अपनी डिग्री पूरी करने के बाद , शेट्टी ने एसएनडीटी कॉलेज , मुंबई से फैशन डिजाइनिंग डिप्लोमा किया । इसके बाद उन्होंने फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ​​के साथ अपनी इंटर्नशिप शुरू की , लेकिन मनीष ने उनमें एक चमक देखी और उन्हें अपने अभिनय करियर के लिए तैयार करने का सुझाव दिया। 2011 में, शेट्टी ने इंटीरियर डिजाइन में अपने जुनून का पालन करने का फैसला किया।उनका पहला एकल प्रोजेक्ट रॉयल्टी, मुंबई का एक क्लब था । बाद में, इंटीरियर डिज़ाइन के प्रति उनके प्यार ने उन्हें लंदन के सेंट्रल सेंट मार्टिंस और इंचबाल्ड स्कूल ऑफ़ डिज़ाइन से डिप्लोमा करने के लिए प्रेरित किया ।

शेट्टी एक फिटनेस और वेलनेस उत्साही हैं। वह सक्रिय रूप से कसरत, ध्यान और योग को बढ़ावा देती हैं। शेट्टी को पेंटिंग करना भी पसंद है।शमिता की पहली फ़िल्म यश राज फ़िल्म्स की आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्देशित मोहब्बतें थी। उनके किरदार इशिका के लिए उन्हें अपनी सहकर्मी किम शर्मा और प्रीति झंगियानी को आईफा का बेस्ट डेब्यू पुरस्कार मिला था। मेरे यार की शादी है और साथिया में उनके आइटम नम्बर की तारीफ़ हुई थी। ज़हर और फरेब उनकी कुछ और फ़िल्में है। बिग बॉस 3 में वो प्रतिभागी थी।

जगजीत सिंह नेगी


#02feb 
21jun 
जीत सिंह नेगी 

🎂जन्म- 02 फ़रवरी, 1925; 
⚰️निधन 21 जून, 2020 
 
उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में जारी हुआ। जीत सिंह नेगी ने दो हिंदी फिल्मों में भी बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। वह संगीतकार और रंगकर्मी भी थे। वह पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक भी रहे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।
जीत सिंह नेगी उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया था। तब पहली बार ऐसा हुआ था, जब किसी उत्तराखंडी लोकगायक के गीतों का रेकॉर्ड उस समय देश की मशहूर ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया। 2 फरवरी, 1925 को पौड़ी जिले के अयाल गांव में जन्मे और वर्तमान में देहरादून के नेहरू कॉलोनी (धर्मपुर) के निवासी जीत सिंह नेगी के इसमें 6 गीत शामिल किए गए थे। जीत सिंह नेगी अपने दौर के न केवल जाने-माने लोकगायक रहे, बल्कि उत्कृष्ट संगीतकार, निर्देशक और रंगकर्मी भी रहे। दो हिंदी फिल्मों में भी उन्होंने बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। ‘शाबासी मेरो मोती ढांगा…’ ‘रामी बौराणी…’ ‘मलेथा की गूल…’ जैसे कई उनके नाटक भी लोकप्रिय हुए।

रेडियो पर पहले गढ़वाली लोकगायक
जीत सिंह नेगी के ‘शाबासी मेरो मोती ढांगा’ को चीनी प्रतिनिधिमंडल ने कानपुर में न केवल रिकॉर्ड किया, बल्कि रेडियो पीकिंग से उसका प्रसारण भी किया। वे पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक थे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।

लोकप्रिय गीत
1950 के दशक की शुरूआत में रेडियो से यह गीत प्रसारित हुआ तो उत्तराखंड से लेकर देश के महानगरों तक प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच पलक झपकते ही बेहद लोकप्रिय भी हो गया। इस सुमधुर खुदेड़ गीत के बोल थे, ‘तू होली उंचि डांड्यूं मा बीरा-घसियारी का भेष मां-खुद मा तेरी सड़क्यां-सड़क्यों रूणूं छौं परदेश मा…।’ (तू होगी बीरा उंचे पहाड़ों पर घसियारी के भेष में और मैं यहाँ परदेश की सड़कों पर तेरी याद में भटक रहा हूं-रो रहा हूं।)

निर्देशन कार्य
जीत सिंह नेगी के निर्देशन में 1954-1955 में दिल्ली में आयोजित गढ़वाली नाटक ‘भारी भूल’ का मंचन हुआ। कई अच्छे कलाकार नेगी जी की टोली से जुड़े रहे। मुंबई-दिल्ली-चंडीगढ़ समेत देश के कई प्रमुख नगरों में उस दौर में जीत सिंह नेगी के गीत और नाटक श्रोताओं-दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते थे।

मृत्यु
जीत सिंह नेगी का निधन 21 जून, 2020 को हुआ। उन्होंने अपने धर्मपुर स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से लोक कलाकारों के साथ ही प्रदेशवासियों में शोक दौड़ पड़ी। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उत्तराखण्ड के लोकगायक और गीतकार जीत सिंह नेगी के निधन पर शोक व्यक्त किया।

गोपालबाबू गोस्वामी

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#26nov 
गोपाल बाबू गोस्वामी 

🎂02 फ़रवरी 1941
चांदीखेत, अल्मोड़ा, संयुक्त प्रांत
⚰️निधन नवम्बर 26, 1996

उत्तराखण्ड राज्य के एक सुविख्यात व लोकप्रिय कुमाऊँनी लोकगायक थे।

दिल्ली, भारत
विधायें लोक संगीत
पेशा गायक
वाद्ययंत्र हारमोनियम, मुरली

हिमालय सुर सम्राट स्व•गोपाल बाबू गोस्वामी का जन्म संयुक्त प्रांत के अल्मोड़ा जनपद के पाली पछांऊॅं क्षेत्र में मल्ला गेवाड़ के चौखुटिया तहसील स्थित चांदीखेत नामक गॉंंव में २ फरवरी १९४१ को मोहन गिरी एवम् चनुली देवी के घर हुआ था। गोपाल बाबु ने प्राइमरी शिक्षा चौखुटिया के सरकारी स्कूल से प्राप्त की। ५वीं पास करने के बाद मिडिल स्कूल में उन्होंने नाम तो लिखवाया, परन्तु ८वीं उत्तीर्ण करने से पूर्व ही उनके पिता का देहावसान हो गया। इसके बाद गोस्वामी जी नौकरी करने पहाड़ के बेरोजगार युवाओं की परम्परानुसार दिल्ली चले गये। वहां वह कई वर्षों तक नौकरी की तलाश में रहे, पहले एक प्राइवेट नौकरी की, कुछ वर्ष डी. जी. आर. में आकस्मिक कर्मचारी के रूप में कार्यरत भी रहे परन्तु स्थाई नहीं हो सके। इस दौरान वे दिल्ली, पंजाब तथा हिमांचल में रहे। पक्की नौकरी न मिल सकने के कारण बाद में उन्हें गाँव वापस आना पड़ा, जहां वह खेती के कार्यों में लग गये।
1970 में उत्तर प्रदेश राज्य के गीत और नाटक प्रभाग का एक दल किसी कार्यक्रम के लिये चौखुटिया आया था, जहाँँ उनका परिचय गोपाल बाबू गोस्वामीजी से हुआ। तत्पश्चात् नाटक प्रभाग से आये हुए एक व्यक्ति ने उन्हें नैनीताल केन्द्र का पता दिया और नाटक प्रभाग में भर्ती होने का आग्रह किया। १९७१ में उन्हें गीत और नाटक प्रभाग में नियुक्ति मिल गई।

प्रभाग के मंच पर कुमाऊँनी गीत गाने से उन्हें दिन-प्रतिदिन सफलता मिलती रही और धीरे धीरे वे चर्चित होने लगे। इसी दौरान उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ में अपनी स्वर परीक्षा करा ली। वे आकाशवाणी के गायक भी हो गये। लखनऊ में ही उन्होंने अपना पहला गीत "कैलै बजै मुरूली ओ बैणा" गया था। आकाशवाणी नजीबाबाद व अल्मोड़ा से प्रसारित होने पर उनके इस गीत के लोकप्रियता बढ़ने लगी। १९७६ में उनका पहला कैसेट एच. एम. वी ने बनाया था। उनके कुमाऊँनी गीतों के कैसेट काफी प्रचलित हुए। पौलिडोर कैसेट कंपनी के साथ उनके गीतों का एक लम्बा दौर चला। उनके मुख्य कुमाऊँनी गीतों के कैसेटों में थे - "हिमाला को ऊँचो डाना प्यारो मेरो गाँव", "छोड़ दे मेरो हाथा में ब्रह्मचारी छों", "भुर भुरु उज्याव हैगो", "यो पेटा खातिर", "घुगुती न बासा", "आंखी तेरी काई-काई", तथा "जा चेली जा स्वरास"। उन्होंने कुछ युगल कुमाऊँनी गीतों के कैसेट भी बनवाए। गीत और नाटक प्रभाग की गायिका श्रीमती चंद्रा बिष्ट के साथ उन्होंने लगभग 15 कैसेट बनवाए।

नाटक प्रभाग में नियुक्ति से पहले गोपाल बाबू पहाड़ के मेलों,विभिन्न समाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा आम जनता के बीच में अपनी उपस्थिति दर्ज कर एक निस्वार्थ लोकप्रिय कलाकार के रूप में समाज की चेतना को जागृत करने के लिये मनमोहक लोकगीत गाते थे। स्वयं के द्वारा रचे हुये लोकगीतों को अपने मधुर कंठ के माध्यम से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन कर उत्कृष्ट समाजसेवा का उदाहरण प्रस्तुत करने वाले गोपाल बाबू सदी के बेहद ही दुर्लभतम कलाकार थे। गोस्वामी जी के मधुर कंठ को लोगों ने भी बहुत पसंद किया था। उनमें यह विशेषता भी थी की वे उच्च पिच के गीतों को भी बड़े सहज ढंग से गाते थे। उनके गाये अधिकांश कुमाऊँनी गाने स्वरचित थे। प्रसिद्ध कुमाऊँनी लोकगाथाओं, जैसे मालूशाही तथा हरूहीत के भी उन्होंने कैसेट बनवाए थे।

गोस्वामी जी ने कुछ कुमाऊँनी तथा हिंदी पुस्तकें भी लिखी थी। जिसमें से "गीत माला (कुमाऊँनी)" "दर्पण" "राष्ट्रज्योति (हिंदी)" तथा "उत्तराखण्ड" आदि प्रमुख थी। एक पुस्तक "उज्याव" प्रकाशित नहीं हो पाई। 55बर्ष की आयु में उन्होंने अनेक उतार-चढ़ाव देखे। 90 के दशक की शुरुआत में उन्हें ब्रेन ट्यूमर हो गया था। उन्होंने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में आपरेशन भी करवाया। परन्तु वे स्वस्थ नहीं हो सके।26नवम्बर 1996को उनका असामयिक निधन हो गया।
🎧प्रसिद्ध गीत

बेड़ू पाको बारमासा
घुघुती न बासा
कैलै बजै मुरूली
हाये तेरी रुमाला
हिमाला को ऊँचा डाना
भुर भुरु उज्याव हैगो

मृत्यु

गोपाल बाबु गोस्वामी का जीवन गढ़वाली - कुमाउनी संगीत को शीर्ष तक ले गया और अन्त में गोपाल बाबु गोस्वामी की मृत्यु ब्रेन ट्युमर से हुई जिसका इलाज उनके द्वारा दिल्ली से कराया गया था परन्तु इस रोग से उन्हें इजात ना मिल पाई और 26 नवम्बर 1996को गोपाल बाबु गोस्वामी का शरीर पंचतत्वों में विलीन हो गया |

गोपाल बाबु गोस्वामी के गीत आज भी हर युवा ने सुने और कहीं ना कहीं से जुबान पर निकल आते हैं गोपाल बाबु गोस्वामी आज भी हमारे दिलो में जीवित हैं।

सोमवार, 18 सितंबर 2023

ताहिर हुसैन

ताहिर हुसैन
भारतीय फ़िल्म निर्माता
अंग्रेज़ी से अनुवाद किया गया कॉन्टेंट-मोहम्मद ताहिर हुसैन खान, जिन्हें ताहिर हुसैन के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय फिल्म निर्माता, पटकथा लेखक, अभिनेता और फिल्म निर्देशक थे जो हिंदी सिनेमा में अपने काम के लिए जाने जाते थे।
🎂जन्म : 19 सितंबर 1938, शाहाबाद
⚰️मृत्यु: 02 फ़रवरी 2010, मुम्बई
पत्नी: ज़ीनत हुसैन (विवा. ?–2010)
भाई: नासिर हुसैन
माता-पिता: जाफ़र हुसैन खान
बच्चे: आमिर खान, फैसल ख़ान, फरहत खान, निखत खान
ताहिर हुसैन अभिनेता आमिर खान और फैसल खान के पिता थे । हिट फिल्म निर्माता, निर्देशक और लेखक नासिर हुसैन ताहिर हुसैन के बड़े भाई और गुरु थे। ताहिर के बेटे, आमिर खान ने कयामत से कयामत तक में अभिनय किया , यह फिल्म उनके चाचा नासिर हुसैन द्वारा निर्मित और उनके चचेरे भाई मंसूर खान द्वारा निर्देशित थी ।

ताहिर हुसैन ने अपने बेटे आमिर को पहली बार (और एकमात्र) 1990 में तुम मेरे हो निर्देशित फिल्म में निर्देशित किया था ।

ताहिर हुसैन भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के रिश्तेदार थे ।  02 फरवरी 2010 को गंभीर दिल का दौरा पड़ने से मुंबई में उनका निधन हो गया

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...