विराट स्वरूप लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विराट स्वरूप लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 28 नवंबर 2024

विराट स्वरूप

रयाल अवलोकन, विराट स्वरूप का वर्णन

आकाश भगवान का मस्तक था। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र थे। दिशाएँ कान के रूप में विद्यमान थी। वेद वाणी और वायु प्राण थे। विश्व हृदय था। पृथ्वी जंघ थी। पाताल नाभि, ज्योतिश्चक्र सीना थी, महरलोक सागर और जनलोक मुख था। सत्यलोकसे नीचे रहनेवाला तपोलोक ललाट था। इन्द्र प्रभृति बाँह थे। शब्द श्रोत्र था। विद्वान पुरुषों का कथन है कि अश्विनीकुमार विराटरूपि भगवतीकी नासिका थीं। गंध गृह-इंद्रिय थी। अग्निमय मुख था। दिन और रात दोनों पालें थे। ब्रह्मा बर्नह के स्थान थे। जल तालु था. रस जिह्वा बना था। यमराज दाढ़ थे, उन भगवान दाढ़ स्नेह थे, माया हँसी थी। सृष्टि कटाक्ष थे। लज्जा ओठ थी. वह विराट भगवान का निचला ओठ लोभ था। अधर्म मार्ग पृथिवी थी। जो जगत्में स्रष्टा कहलाते हैं, वे प्रजापति ब्रह्मा उस विरारूपमें लिङ्ग थे। समुद्र पेट था। पर्वत हड्डी थे। उन भगवान की नाड़ियाँ नदी थीं। वृक्षों को रोम का रूप प्राप्त था। समुचित रूपसे व्याप्त कुमार, यौवन और बुढ़ापा - ये भगवान के आयु रूप थे। मेघ सिरके बाल थे। प्रातः और सायं - दोनों संध्याएँ दो वरू थीं। उस समय भगवान का मन चन्द्रमा था। हरि विवेक शक्ति और रुद्र अन्तःकरण थे। अश्वजातिसे सम्बन्ध रखनेवाले जितने प्राणी हैं, वे सभी उन के कटिभाग थे। अतलसे लेकर पातालतक जितने महान् लोक हैं, वे उन की कमरसे नीचेके भाग 
थे ,ऐसे विरारूपके उन श्रेष्ठ भगवान का विराट स्वरूप था
उनके शरीरसे हजारों जीभ से बार-बार मुंह खुल बंद हो था ।

और अर्जुन इस विराट स्वरूप को देख कर थर थर कांप रहे थे।

और आज हम लोगों में विराट स्वरूप मूर्ति स्थापित करने की होड लगी हुई है।सोचो हम भय भीत क्यों नहीं होगे?
मूर्ति सदा आदम कद की ही होनी चाहिए यह मेरा खुद का मत है।

वैसे अर्जुन ने भगवान के दिव्य विराट रूप में असंख्य मुख और आंखों को देखा। उनका रूप अनेक दैवीय आभूषण से अलंकृत था और कई प्रकार के दिव्य शस्त्रों को उठाए हुए था। उन्होंने उस शरीर पर अनेक मालाएँ और वस्त्र धारण किए हुए थे जिस पर कई प्रकार की दिव्य मधुर सुगन्धिया लगी थी। बताया था।


इस विराट स्वरूप को अर्जुन ने भी देखा ना वो रोमांचित हुआ ना अर्जुन की भांति डरा?

क्यों किअर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप को देखा, जिसमें उन्होंने आकाश से पताल तक की सभी चीजों को देखा। यह अर्जुन का एक बहुत ही व्यापक और गहरा अनुभव था।

लेकिन संजय की दिव्य दृष्टि केवल युद्ध भूमि तक ही सीमित थी। उन्होंने केवल युद्ध भूमि में होने वाली घटनाओं को देखा, लेकिन इसके बाहर नहीं।

 अर्जुन का अनुभव संजय के अनुभव से बहुत ही अलग और व्यापक था।
इसलिए भी संजय विराट स्वरूप देख अर्जुन की भांति विचलित नहीं हुआ।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...