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शनिवार, 3 फ़रवरी 2024

ब्रिजू महाराज

#04feb
#17jan 
पंडित बृजमोहन मिश्र (जिन्हें बिरजू महाराज भी कहा जाता है)

🎂04 फ़रवरी 1938
 ⚰️ 17 जनवरी 2022

 प्रसिद्ध भारतीय कथक नर्तक थे। वे शास्त्रीय कथक नृत्य के लखनऊ कालिका-बिन्दादिन घराने के अग्रणी नर्तक थे। पंडित जी कथक नर्तकों के महाराज परिवार के वंशज थे जिसमें अन्य प्रमुख विभूतियों में इनके दो चाचा व ताऊ, शंभु महाराज एवं लच्छू महाराज; तथा इनके स्वयं के पिता एवं गुरु अच्छन महाराज भी आते हैं। हालांकि इनका प्रथम जुड़ाव नृत्य से ही है, फिर भी इनकी गायकी पर भी अच्छी पकड़ थी, तथा ये एक अच्छे शास्त्रीय गायक भी थे। इन्होंने कत्थक नृत्य में नये आयाम नृत्य-नाटिकाओं को जोड़कर उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इन्होंने कत्थक हेतु '''कलाश्रम''' की स्थापना भी की है। इसके अलावा इन्होंने विश्व पर्यन्त भ्रमण कर सहस्रों नृत्य कार्यक्रम करने के साथ-साथ कत्थक शिक्षार्थियों हेतु सैंकड़ों कार्यशालाएं भी आयोजित की।
बिरजू महाराज का जन्म कत्थक नृत्य के लिये प्रसिद्ध जगन्नाथ महाराज के घर हुआ था, जिन्हें लखनऊ घराने के अच्छन महाराज कहा जाता था। ये रायगढ़ रजवाड़े में दरबारी नर्तक हुआ करते थे।इनका नाम पहले दुखहरण रखा गया था, क्योंकि ये जिस अस्पताल पैदा हुए थे, उस दिन वहाँ उनके अलावा बाकी सब कन्याओं का ही जन्म हुआ था, जिस कारण उनका नाम बृजमोहन रख दिया गया। यही नाम आगे चलकर बिगड़ कर 'बिरजू' और उससे 'बिरजू महाराज' हो गया।

इनको उनके चाचाओ लच्छू महाराज एवं शंभु महाराज से प्रशिक्षण मिला, तथा अपने जीवन का प्रथम गायन इन्होंने सात वर्ष की आयु में दिया। 20 मई, 1947को जब ये मात्र 9 वर्ष के ही थे, इनके पिता का स्वर्गवास हो गया।परिश्रम के कुछ वर्षोपरान्त इनका परिवार दिल्ली में रहने लगा।
बिरजू महाराज को अपने क्षेत्र में आरम्भ से ही काफ़ी प्रशंसा एवं सम्मान मिले, जिनमें 1986 में पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा कालिदास सम्मान प्रमुख हैं। इनके साथ ही इन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं खैरागढ़ विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि मानद मिली।

2016 में हिन्दी फ़िल्म बाजीराव मस्तानी में "मोहे रंग दो लाल " गाने पर नृत्य-निर्देशन के लिये फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
2002 में लता मंगेश्कर पुरस्कार।
भरत मुनि सम्मान 
2012मे सर्वश्रेष्ठ नृत्य निर्देशन हेतु राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: फिल्म विश्वरूपम के लिये।

बुधवार, 17 जनवरी 2024

माया गोविंद कवि

#17jan
#06april 
माया गोविंद
 (🎂17 जनवरी 1940 -⚰️06 अप्रैल 2022) 
एक भारतीय गीतकार थे जिन्होंने कई बॉलीवुड फिल्मों के लिए गीत लिखे। उन्होंने "मेरा पिया घर आया", "गेले में लाल ताई", "मैंने पायल है छनकायी", "मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी", "आंखों में बसे हो तुम" आदि जैसे लोकप्रिय गीत लिखे थे। उन्होंने आरोप(1974), में खिलाड़ी तू अनाड़ी (1994), टक्कर(1995), याराना (1995), हम तुम्हारे है सनम(2001) आदि फिल्मों में गीत लिखे। उन्होंने 800 से अधिक गाने लिखे हैं। 
🎂जन्म17 जनवरी 1940
⚰️मृत्यु 06 अप्रैल 2022 
हिन्दी सिनेमा में गीतलेखन के क्षेत्र में हमेशा से ही पुरूषों का एकाधिकार रहा है, हालांकि अपवाद के तौर पर कभी कभार महिलाएं भी इस विधा में हाथ आज़माती रहीं| जैसे साल 1936 की फिल्म ‘मैडम फैशन’ में फ़िल्म की निर्मात्री-निर्देशिका-संगीतकार जद्दनबाई या 1958 की फ़िल्म ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ में फ़िल्म की नायिका निरूपा रॉय, या फिर सरोज मोहिनी नैयर, पद्मा सचदेव, रानी मलिक, कौसर मुनीर| ये सभी महिलाएं समय समय पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज ज़रूर कराती आयीं लेकिन गीतलेखन की मुख्यधारा में वो कभी भी शामिल नहीं हो पायीं| लेकिन इन सभी के बीच एक नाम ऐसा है जिन्होंने न सिर्फ़ इस क्षेत्र में पुरूषों के वर्चस्व को तोड़ा बल्कि लम्बे समय तक अपना एक सम्मानजनक स्थान भी बनाए रखा| और वो नाम है श्रीमती माया गोविन्द का|

17 जनवरी 1940 को लखनऊ के एक खत्री परिवार में जन्मीं माया जी के पिता श्री हरनाथ वहाल कपड़े के कारोबारी थे| माता पिता की 3 बेटियों में माया जी सबसे बड़ी थीं| वो बताती हैं, “हमारा सरनेम मूलत: ‘बहल’ था जो आगे चलकर वहाल हो गया था| पिताजी का कारोबार अच्छा चल रहा था लेकिन अचानक ही उनकी आंखों की रोशनी चली गयी| हम तीनों बहनें बहुत छोटी थीं| मां एक सीधीसादी गृहिणी थीं| हममें से कोई भी ऐसा नहीं था जो घर-व्यापार को संभाल सके| ऐसे में हमारी सभी 3-4 दुकानों और बंगले पर पिताजी के भाईयों ने कब्ज़ा कर लिया| और हम किराए के मकान में रहने पर मजबूर हो गए|” 

माया जी 5 साल की हुईं तो उनके पिता गुज़र गए| नतीजतन घर के माली हालात और भी बदतर होते चले गए| ऐसे में माया जी की मां के मामा मदद के लिए आगे आये| माया जी बताती हैं, “मां के मामा की दी गयी ढाई सौ रूपये महीने की मदद से हम तीनों बहनें पलींबढ़ी| मैंने वैदिक कन्या पाठशाला से 12वीं करने के बाद महिला कॉलेज से बी.ए. किया और फिर बी.एड. में दाखिला ले लिया| बी.एड. के पहले साल में थी कि मेरी शादी प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में कर दी गयी| लेकिन उस घर में एक एक दिन बिताना मेरे लिए मुश्किल हो गया| बहुत ही अजीब सा परिवार था| संस्कारों, संस्कृति, साहित्य, संगीत, कला से किसी का कोई रिश्ता नहीं| पीना-पिलाना, रात को देर से घर लौटना, बात बात में गाली गलौज, मारपीट| नतीजतन मैं तीन महीने में ही मां के घर वापस लौट आयी|”

लखनऊ लौटकर माया जी ने बी.एड. के साथ साथ भातखंडे संगीत विद्यालय से 4 साल का संगीत का कोर्स किया| शम्भू महाराज से एक साल कत्थक सीखा| लखनऊ रेडियो की स्टाफ़ आर्टिस्ट के तौर पर कई रेडियो नाटक किये| ‘बाल विद्या मंदिर’ में पढ़ाने लगीं| साथ ही लखनऊ के मशहूर रंगकर्मी कुंवर कल्याण सिंह के नाटकों में भी काम करने लगीं| माया जी बताती हैं, “11-12 साल की उम्र से मैं कविताएं भी लिखने लगी थी| साल 1966 में हमारे स्कूल में अभिनेता भारत भूषण और उनके निर्माता-निर्देशक भाई आर.चंद्रा (रमेश चन्द्र) आए| आर.चंद्रा ने नीरज को अलीगढ़ से बुलाकर फ़िल्म ‘नयी उमर की नयी फ़सल’ के गीत लिखवाए थे| साल 1966 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म से नीरज ने डेब्यू किया था| आर.चंद्रा ने मेरी कविताएं सुनीं जो उन्हें बहुत पसंद आयीं| उन्होंने उसी वक़्त मुझे तीन फिल्मों ‘मेघ मल्हार’, ‘मुशायरा’ और ‘बाप बेटे’ के लिए साईन कर लिया|” 

कुछ समय बाद आर.चंद्रा के बुलावे पर माया जी मुम्बई आयीं| उन्होंने फिल्म ‘मुशायरा’ के लिए 11 गाने लिखे और फिर वापस लखनऊ चली गयीं| इस फ़िल्म में खैयाम का संगीत था| माया जी के लखनऊ लौटने के बाद आशा भोंसले की आवाज़ में इस फ़िल्म के दो मुजरागीत रिकॉर्ड भी हुए| वो गीत थे, ‘सारी रतिया मचावे उत्पात सिपहिया सोने न दे, हाए अम्मा’ और ‘हमें हुक्म था ग़म उठाना पड़ेगा, इसी ज़िद पे हमने जवानी लुटा दी’|  लेकिन तभी अचानक आर.चंद्रा गुज़र गए और तीनों ही फ़िल्में बंद हो गयीं| आगे चलकर आर.चंद्रा के निर्माता बेटे राकेश चंद्रा ने ये दोनों गीत साल 1975 में बनी फ़िल्म ‘मुट्ठी भर चावल’ में इस्तेमाल किये|  

साल 1965-66 में माया जी राम गोविन्द जी के संपर्क में आयीं| समस्तीपुर बिहार के रहने वाले मशहूर लेखक-रंगकर्मी राम गोविन्द जी, जिनका असली नाम गोविन्द अरोड़ा है, अपने नाटकों की मुख्य भूमिका के लिए एक अभिनेत्री की तलाश में थे और इसी सिलसिले में वो लखनऊ आकर माया जी से मिले थे| माया जी ने समस्तीपुर जाकर नाटक में काम किया, राम गोविन्द जी के साथ उनकी दोस्ती हुई, नाटक के बाद राम गोविन्द जी उन्हें छोड़ने लखनऊ आए और फिर लखनऊ के ही होकर रह गए| 1967 में राम गोविन्द जी ने माया जी से शादी कर ली| उन दोनों ने मिलकर लखनऊ की ख्यातिप्राप्त नाट्यसंस्था ‘दर्पण’ की नींव रखी और 1968-69 में इस बैनर के तहत पहला नाटक ‘ख़ामोश अदालत जारी है’ किया| नाटकों से चूल्हा जलना मुश्किल था| रेडियो कार्यक्रमों से माया जी की जो थोड़ी बहुत आय होती थी उसी से गुज़ारा चलता था|

माया जी बताती हैं, “बतौर कवियित्री मेरी ख़ासी पहचान बन चुकी थी| प्रख्यात कवि रामरिख मनहर मुझे अक्सर कवि सम्मेलनों में भाग लेने के लिए आमंत्रित करते थे| 1972 में उन्होंने मुझे मुम्बई में होने वाले कवि सम्मलेन के लिए बुलाया जहां दर्शकों में रामानंद सागर भी शामिल थे| मैंने काव्यपाठ किया जो सबको बेहद पसंद आया| रामरिख मनहर ने मुझे ‘राजश्री प्रोडक्शंस‘ के मालिक ताराचंद बड़जात्या और उनके बेटे राजकुमार बड़जात्या से मिलवाया| उन्होंने प्राइवेट अल्बम के लिए मेरी तीन कविताएं रिकॉर्ड कीं| फिर उन्होंने कवियों और कविताओं पर ढाई घंटे की एक फ़िल्म ‘कवि सम्मेलन’ बनाई जिसमें मुझे भी शामिल किया गया| उसमें मैंने कविता पढ़ी थी, ‘तुम एक बार प्रिय आ जाओ तो आंचलभर सुहाग ओढूं’| उधर रामानंद सागर ने मुझसे फ़िल्म ‘जलते बदन’ में चारों गाने लिखवाए| ये फ़िल्म साल 1973 में रिलीज़ हुई थी|”

रामानंद सागर की फ़िल्म ‘गीत’ (1970) की सिल्वर जुबली पार्टी में माया जी और राम गोविन्द जी की मुलाक़ात गुरूदत्त के भाई आत्माराम से हुई| गुरूदत्त की मृत्यु के बाद ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स’ की कमान आत्माराम ने संभाल ली थी| उस बैनर में उन्होंने फ़िल्म ‘शिकार’ (1968) बनाई और फिर बैनर का नाम बदलकर ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स कम्बाईन’ कर दिया था| ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स कम्बाईन’ के बैनर में ‘चन्दा और बिजली’ (1969), ‘उमंग’ (1970), ‘मेमसाब’ (1972) और ‘ये गुलिस्तां हमारा’ (1972) जैसी कुछ फ़िल्में बनाने के बाद आत्माराम अब फ़िल्म ‘आरोप’ बनाने जा रहे थे| उन्होंने माया जी को इस फ़िल्म के गीत और राम गोविन्द जी को पटकथा लिखने के लिए साईन कर लिया| फ़िल्म ‘आरोप’ साल 1974 की कामयाब फ़िल्मों में से थी| भूपेन हज़ारिका द्वारा संगीतबद्ध इस फ़िल्म के तमाम गीत भी हिट हुए थे|

गोविन्द दंपत्ति ने शुरू के 5 महीने पाली हिल पर (स्व.) गुरूदत्त के फ्लैट में गुज़ारे जहां भूपेन हज़ारिका उनके बगल के कमरे में रहते थे| फिर उन्होंने पाली हिल छोड़कर रोड नम्बर 9 जुहू स्कीम पर किराये का मकान ले लिया| और फिर जल्द ही दोनों ने अपने अपने क्षेत्र में अपनी एक मज़बूत स्थिति बना ली| माया जी बताती हैं, “किराये के उस मकान में हम कुछ साल रहे| उस बीच रोड नम्बर 8 स्थित ‘लोखंडवाला बिल्डर्स’ की मोनालिसा बिल्डिंग में हमने 2 बेडरूम फ्लैट बुक करा लिया था| फ्लैट तैयार हुआ तो बिल्डर सिराज भाई ने वो फ्लैट देने से ये कहते हुए इनकार कर दिया कि मैं आपको 3 बेडरूम वाला फ्लैट दूंगा, बस शर्त ये है कि मेरे लिए आपको एक कवि सम्मेलन करना होगा| हमने सम्मेलन की तैयारी की| स्मारिका के लिए मिले विज्ञापनों से 1.25 लाख रूपये जमा हुए| सिराज भाई ने हमसे मात्र 90 हज़ार रूपये लिए और जुहू स्कीम के एन.एस. रोड नम्बर 10 पर 3 बेडरूम वाला ये फ्लैट हमारे नाम कर दिया| ये साल 1980 की बात है| तब से आज तक यही घर हमारा आशियाना बना हुआ है|”

तोहफ़ा मोहब्बत का’ के बाद माया जी और रामगोविंद जी ने गोविंदा, जीतेंद्र, जयाप्रदा को लेकर फ़िल्म ‘तांडव’ का निर्माण शुरू किया था| लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि 13 रील बन जाने के बावजूद वो फ़िल्म पूरी नहीं हो पायी| इससे हुए आर्थिक नुकसान की वजह से गोविन्द दम्पत्ति को अपना बैनर ‘बहार पिक्चर्स’ हमेशा के लिए बंद कर देना पड़ा| लेकिन बतौर गीतकार माया जी के करियर ने अपनी ऊंचाईयां बनाए रखीं| उनकी अभी तक की आख़िरी फ़िल्म ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ साल 2014 में रिलीज़ हुई थी| इस फिल्म के संगीतकार खैयाम थे| चार दशकों के अपने करियर में उन्होंने दर्जनों हिट गीत लिखे जैसे – 
वादा भूल न जाना’ (जलते बदन), ‘नैनों में दर्पण है’ (आरोप), ‘यहां कौन है असली कौन है नक़ली, ये तो राम जाने’ (क़ैद), ‘तेरी मेरी प्रेम कहानी किताबों में भी न मिलेगी’ (पिघलता आसमान), ‘कजरे की बाती अंसुअन के तेल में’ (सावन को आने दो), ‘चार दिन की ज़िंदगी है’ (एक बार कहो), ‘लो हम आ गए हैं फिर तेरे दर पर’ (खंज़र’), ‘मोरे घर आए सजनवा’ (ईमानदार), ‘ठहरे हुए पानी में कंकर न मार सांवरे’ (दलाल), ‘दरवज्जा खुल्ला छोड़ आयी नींद के मारे’ (नाजायज़), ‘प्रेम का ग्रन्थ पढ़ाओ सजनवा’ (तोहफ़ा मोहब्बत का), ‘आंखों में बसे हो तुम तुम्हें दिल में छुपा लूंगा’ (टक्कर), ‘शुभ घड़ी आयी रे’ (रज़िया सुल्तान), ‘हम दोनों हैं अलग अलग हम दोनों हैं जुदा जुदा’ (मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी), ‘चन्दा देखे चन्दा तो चन्दा शरमाए’ (झूठी), ‘मेरी पायल बोले छम...छमछम’ (गजगामिनी), ‘मुझे ज़िन्दगी की दुआ न दे’ (गलियों का बादशाह), डैडी कूल कूल कूल’ (चाहत) और ‘देखो कान्हा नहीं मानत बतियां’ (पायल की झंकार)|

साल 1993 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘दलाल’ के गीत ‘गुटुर गुटुर अरे चढ़ गया ऊपर रे अटरिया पे लोटन कबूतर’ को लेकर माया जी पर अश्लील लेखन के आरोप लगे थे| इस विवाद ने लम्बे अरसे तक उनका पीछा नहीं छोड़ा था| क़रीब 15 साल पहले साप्ताहिक ‘सहारा समय’ (हिन्दी) के अपने कॉलम ‘बाकलम ख़ुद’ के लिए हुई बातचीत के दौरान जब मैंने माया जी से इस गीत के बारे में बात करनी चाही तो उन्होंने खीझे हुए स्वर में कहा था, “लोटन कबूतर तो तुम्हें याद रहा, ‘देखो कान्हा नहीं मानत बतियां’ के बारे में क्या कहोगे? वो भी मेरा ही लिखा हुआ है|” उनकी बात सुनकर मुझे ख़ामोश हो जाना पड़ा था| इस बार जब मैंने उन्हें ये वाकया याद दिलाया तो उन्होंने कहा, “उस गीत को लेकर हो रही आलोचनाओं से मैं बहुत तंग आ गयी थी| मेरे लिखे अच्छे और काव्यात्मक गीत कोई याद ही नहीं करना चाहता था| लोगों की प्रतिक्रिया सुनकर ऐसा लगने लगा था जैसे उस एक गीत ने मेरी तमाम स्तरीय रचनाओं पर पानी फेर दिया हो| जबकि उस गीत के बोलों में कुछ भी अश्लील नहीं था| रहा सवाल गीत के पिक्चराईज़ेशन का, तो क्या उसके लिए मैं ज़िम्मेदार हूं|”

माया जी की बात सौ फ़ीसदी सही थी| उत्तर भारत में तो शादीब्याह के अवसर पर मस्ती और छेड़छाड़भरे ऐसे लोकगीत गाये जाने का प्रचलन बेहद आम है| अगर हम ‘लोटन कबूतर’ के पिक्चराईज़ेशन को नज़रअंदाज़ करके सिर्फ़ इसके बोलों पर गौर करें तो ये भी एक मस्ती और छेड़छाड़भरा आम लोकगीत सा ही नज़र आएगा|

उनके 11 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं| साथ ही वो ‘फ़िल्म जर्नलिस्ट अवार्ड (उत्तर प्रदेश)’, राष्ट्रभाषा परिषद (मुम्बई) का ‘महादेवी वर्मा पुरस्कार’, सुरसिंगार परिषद का ‘स्वामी हरिदास पुरस्कार’, ‘उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान’,  भारती प्रसार परिषद का ‘गौरव भारती पुरस्कार’, महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का ‘छत्रपति शिवाजी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार’ जैसे दर्जनों सम्मान भी हासिल कर चुकी हैं उनके परिवार में पति राम गोविन्द जी के अलावा इंजीनियर बेटा, बहू , एक पोता और एक पोती शामिल हैं|

06 अप्रैल 2022 को 82 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

मंगलवार, 16 जनवरी 2024

सुचित्रा सेन

#17jan 
#06april
सुचित्रा सेन

🎂जन्म 06 अप्रैल, 1931
जन्म भूमि पबना ज़िला, बंगाल (अब बांग्लादेश)
⚰️मृत्यु 17 जनवरी 2014
मृत्यु स्थान कोलकाता, पश्चिम बंगाल

अभिभावक करुणामॉय दासगुप्ता
संतान पुत्री- मुनमुन सेन
कर्म भूमि मुम्बई, कोलकाता
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म अभिनेत्री
मुख्य फ़िल्में 'सात पाके बांधा' (बांग्ला), देवदास, आंधी, ममता, 'दीप जवेले जाई' (बांग्ला) आदि।
पुरस्कार-उपाधि पद्मश्री, बंगो बिभूषण
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी सुचित्रा सेन प्रथम भारतीय अभिनेत्री थीं, जिनको किसी अंतर्राष्ट्रीय चलचित्र महोत्सव में पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्होंने 1963 के मॉस्को फ़िल्म फेस्टिवल में अपनी फ़िल्म 'सात पाके बांधा' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता था।
सुचित्रा सेन
सुचित्रा सेन का जन्म 6 अप्रैल, 1931 को बंगाल के पबना ज़िले में हुआ था, जो अब बांग्लादेश में है। सुचित्रा के पिता करुणामॉय दासगुप्ता एक स्थानीय स्कूल में हेड मास्टर थे। यह भी अजीब विडंबना रही कि सुचित्रा की पहली फ़िल्म 'शेष कथाय (बंगाली)' कभी रिलीज ही नहीं हुई।

कैरियर
सुचित्रा सेन ने अपने कैरियर की शुरुआत 1952 में बंगाली फ़िल्म 'शेष कोठई' से की थी। उन्हें 1955 में बिमल राय की हिन्दी फ़िल्म 'देवदास' में उन्होंने 'पारो' की भूमिका निभाई थी। इसमें उनके साथ दिलीप कुमार थे। दिग्गज अभिनेता उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी को कोई नहीं भुला सकता। दोनों ने 1953 से लेकर 1975 तक 30 फ़िल्मों में साथ काम किया। 1959 की बंगाली फ़िल्म 'दीप जवेले जाई' को सुचित्रा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है। 
1975 की फ़िल्म 'आंधी' में सुचित्रा का रोल इंदिरा गांधी से प्रेरित बताया गया था। सुचित्रा ने इतना जबरदस्त अभिनय किया था कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए नामित किया गया था। हालांकि सुचित्रा तो सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री नहीं चुनी गई, लेकिन फ़िल्म के उनके साथी कलाकार संजीव कुमार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता ज़रूर बन गए। उनकी बेटी मुनमुन सेन भी माँ के नक्शे कदम पर चलते हुए बंगाली फ़िल्मों के साथ हिंदी फ़िल्मों में भी आई। लगभग 25 साल के अभियन कैरियर के बाद उन्होंने 1978 में बड़े पर्दे से ऐसी दूरी बनाई कि उन्होंने लाइमलाइट से खुद को बिल्कुल अलग कर लिया।
बंगाली सिनेमा की 'दिलों की रानी'
सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा की एक ऐसी हस्ती थीं, जिन्होंने अपनी अलौकिक सुंदरता और बेहतरीन अभिनय के दम पर लगभग तीन दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया और 'अग्निपरीक्षा', 'देवदास' तथा 'सात पाके बंधा' जैसी यादगार फ़िल्में कीं। हिरणी जैसी आंखों वाली सुचित्रा 1970 के दशक के अंत में फ़िल्म जगत को छोड़कर एकांत जीवन जीने लगीं। उनकी तुलना अक्सर हॉलीवुड की ग्रेटा गाबरे से की जाती थी, जिन्होंने लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया था। कानन देवी के बाद बंगाली सिनेमा की कोई अन्य नायिका सुचित्रा की तरह प्रसिद्धि हासिल नहीं कर पाई। श्वेत-श्याम फ़िल्मों के युग में सुचित्रा के जबर्दस्त अभिनय ने उन्हें दर्शकों के दिलों की रानी बना दिया था। उनकी प्रसिद्धि का आलम यह था कि दुर्गा पूजा के दौरान देवी लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाओं के चेहरे सुचित्रा के चेहरे की तरह बनाए जाते थे।

सुचित्रा सेन का शुक्रवार 17 जनवरी 2014 को 82 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया। सुचित्रा सेन मधुमेह नामक रोग से पीड़ित थीं।

अक्कीनेनी लक्ष्मी वारा प्रसाद रावप्रसिद्ध नाम एल. वी. प्रसाद🎂जन्म 17 जनवरी, 1908जन्म भूमि इलुरु तालुका, आन्ध्र प्रदेश⚰️मृत्यु 22 जून, 1994

#17jan
#22jun 
अक्कीनेनी लक्ष्मी वारा प्रसाद राव
प्रसिद्ध नाम एल. वी. प्रसाद

🎂जन्म 17 जनवरी, 1908
जन्म भूमि इलुरु तालुका, आन्ध्र प्रदेश
⚰️मृत्यु 22 जून, 1994

अभिभावक अक्कीनेनी श्रीरामुलु और बासवम्मा
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्माता-निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'आलम आरा', 'कालीदास', 'भक्त प्रह्लाद', 'हमराही', 'खिलौना', 'मेरा घर मेरे बच्चे', 'विदाई', 'एक दूजे के लिए', 'शारदा' और 'छोटी बहन' आदि।
पुरस्कार-उपाधि 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' (1982), 'फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड'
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी एल. वी. प्रसाद की फ़िल्म 'छोटी बहन' में लता मंगेशकर द्वारा गाया गया का गीत "भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना" बेहद लोकप्रिय हुआ था।
एल. वी. प्रसाद का जन्म 17 जनवरी, 1908 को आन्ध्र प्रदेश के इलुरु तालुका में एक किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम अक्कीनेनी श्रीरामुलु और माता बासवम्मा थीं। एल. वी. प्रसाद का लालन-पालन बहुत ही लाड़-प्यार के साथ हुआ था। वे प्रारम्भ से ही बहुत बुद्धिमान थे, किंतु उनका पढ़ाई में ध्यान बिल्कुल भी नहीं लगता था। कम उम्र में ही वे नाटकों और नृत्य मंडलियों की ओर आकर्षित हो गए थे। इन्हीं सपनों को लेकर वे एक दिन घर छोड़कर मुंबई चले आये। लेकिन उनका ये सफर आसान नहीं रहा और उन्हें तमाम तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ा। दृढ़ निश्चयी एल. वी. प्रसाद ने हार नहीं मानी और अंतत: सफलता ने उनके कदम चूमे।

फ़िल्मी शुरुआत
एल. वी. प्रसाद ने भारत की तीन भाषाओं की पहली बोलती फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने वर्ष 1931 में प्रदर्शित आर्देशिर ईरानी की फ़िल्म 'आलम आरा' के अतिरिक्त 'कालिदास' और 'भक्त प्रह्लाद' में काम किया। 'आलम आरा' जहाँ हिन्दी की पहली बोलती फ़िल्म थी, वहीं 'कालिदास' पहली तमिल भाषा की बोलती फ़िल्म थी और 'भक्त प्रह्लाद' पहली तेलुगु बोलती फ़िल्म थी।

प्रसिद्ध कलाकारों के साथ कार्य

एल. वी. प्रसाद ने हिन्दी भाषा में कई चर्चित फ़िल्में बनाईं। इन फ़िल्मों में 'शारदा', 'छोटी बहन', 'बेटी बेटे', 'दादी माँ', 'शादी के बाद', 'हमराही', 'मिलन', 'राजा और रंक', 'खिलौना', 'एक दूजे के लिए' आदि शामिल हैं। उनकी फ़िल्में प्राय: सामाजिक उद्देश्यों के साथ स्वस्थ मनोरंजन पर केंद्रित हुआ करती थीं। उन्होंने प्रसिद्ध कलाकारों राज कपूर, मीना कुमारी, संजीव कुमार, कमल हासन, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त, अशोक कुमार, शत्रुघ्न सिन्हा, शशि कपूर, प्राण, मुमताज और राखी जैसे बड़े सितारों के साथ काम किया।

महमूद की हास्य भूमिका
वर्ष 1961 में एल. वी. प्रसाद की फ़िल्म 'ससुराल' से अभिनेता महमूद पूरी तरह कॉमेडियन बन गए। वे अब अधिकांश फ़िल्मों में हास्य भूमिका ही निभाने लगे थे। राजेंद्र कुमार और वी. सरोजा देवी अभिनीत इस फ़िल्म में उनके अपोजिट शुभा खोटे थीं। शुभा खोटे के साथ महमूद की जोड़ी बहुत हिट हुई। यह जोड़ी बाद में फ़िल्म 'दिल तेरा दीवाना', 'गोदान', 'हमराही', 'गृहस्थी', 'भरोसा', 'जिद्दी' और 'लव इन टोकियो' जैसी अनेक फ़िल्मों में भी आई।

फ़िल्म 'छोटी बहन'
निर्माता एल. वी. प्रसाद की वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'छोटी बहन' संभवत: पहली फ़िल्म थी, जिसमें भाई और बहन के प्यार भरे अटूट रिश्ते को रूपहले परदे पर दिखाया गया था। इस फ़िल्म में बलराज साहनी ने बड़े भाई और अभिनेत्री नन्दा ने छोटी बहन की भूमिका निभायी थी। इस फ़िल्म में शैलेन्द्र का लिखा और लता मंगेशकर द्वारा गाया का गीत "भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना" बेहद लोकप्रिय हुआ था। रक्षा बंधन के गीतों में इस गीत का विशिष्ट स्थान आज भी बरकरार है। इसके बाद निर्माता-निर्देशक ए. भीम सिंह ने भाई-बहन के रिश्ते पर आधारित दो और फ़िल्में 'राखी' और 'भाई-बहन' बनायी। वर्ष 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म 'राखी' में अशोक कुमार और वहीदा रहमान ने भाई-बहन की भूमिका निभायी थी।

पुरस्कार व सम्मान
जीवन के अंतिम दौर तक सार्वजनिक रूप से सक्रिय रहे एल. वी. प्रसाद को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया था। उन्हें फ़िल्मों में विशेष योगदान के लिए देश का सर्वोच्च सम्मान "दादा साहब फाल्के पुरस्कार" वर्ष 1982 में प्रदान किया गया था। इसके अतिरिक्त फ़िल्म 'खिलौना' के लिए उन्हें 'फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड' भी दिया गया।

निधन
भारतीय सिनेमा में विशिष्ट योगदान देने वाले एल. वी. प्रसाद का निधन 22 जून, 1994 हुआ। प्रसाद जी ऐसे फ़िल्मकार के रूप में प्रसिद्ध थे, जो एक ही साथ कई विभिन्न भाषाओं में फ़िल्म बनाते रहे। उनकी फ़िल्मों में जहाँ कहानी और संवाद पर विशेष तौर पर काम किया जाता था, वहीं संगीत पक्ष पर भी काफ़ी जोर दिया जाता था। उनकी फ़िल्मों के कई गीत अब भी काफ़ी लोकप्रिय हैं।

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एल. वी. प्रसाद ने एक निर्माता-निर्देशक होने के साथ-साथ कई फ़िल्मों में बतौर अभिनेता भी कार्य किया था। कुछ फ़िल्मों के नाम निम्नलिखित हैं-

बतौर अभिनेता

आलम आरा 1931 
भक्त प्रह्लाद 1931
कालीदास 1931 
सीता स्वयंवर 1933
बोंडम पेल्ली 1940 
चडुवुकुन्ना भार्या 1940
राजा पारवई 1982 

बतौर निर्देशक

ससुराल 1961 
हमराही 1963
मिलन 1967 
राजा और रंक 1968
खिलौना 1970 
उधार का सिन्दूर 1976
ये कैसा इंसाफ 1980 
एक दूजे के लिए 1981
मेरा घर मेरे बच्चे 1985 
स्वाती 1986
बिदाई 1990 
अर्चना 1993
नागपंचमी 1994
 सन्ध्याधरा 1994
मयर कथा 1996 
सुनापुआ 1996

बतौर निर्माता और निर्देशक

शारदा 1957 
छोटी बहन 1957
बेटी बेटे 1964
 दादी माँ 1966
जीने की राह 1969 
शादी के बाद 1972
बिदाई 1974
 जय विजय 1977

जावेद अख्तर

#17jan 
जावेद जान निसार अख़्तर
अन्य नाम जावेद साहब
जन्म 17 जनवरी, 1945
जन्म भूमि ग्वालियर, मध्य प्रदेश
अभिभावक श्री जान निसार अख़्तर और श्रीमती सफिया अख़्तर
पति/पत्नी हनी ईरानी और शबाना आज़मी
संतान फ़रहान अख़्तर और ज़ोया अख़्तर
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र कवि, गीतकार और पटकथा लेखक
मुख्य फ़िल्में ज़ंजीर, दीवार, शोले, त्रिशूल, शान, शक्ति आदि।
शिक्षा स्नातक
विद्यालय साफिया कॉलेज, भोपाल
पुरस्कार-उपाधि पद्म श्री, पद्म भूषण, राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (5) और फ़िल्मफेयर पुरस्कार (7)
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्ध गीत एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा (1942 ए लव स्टोरी), घर से निकलते ही (पापा कहते हैं), संदेशे आते हैं (बार्डर), तेरे लिए (वीर जारा)
एक कवि, गीतकार और पटकथा लेखक के रूप में भारत की जानी मानी हस्ती हैं। पटकथा लेखक के रूप में जावेद अख़्तर ने सलीम खान के साथ मिलकर बॉलीवुड की सबसे कामयाब फ़िल्मों की पटकथा लिखी है। सलीम जावेद की जोड़ी की लिखी फ़िल्मों ने अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेता को एक अलग पहचान दिलाई। जावेद अख़्तर ने शोले, दीवार, ज़ंजीर, त्रिशूल, जैसी फ़िल्मों की पटकथा लिखी। सन 2007 में इन्हें कला क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
पिता जान निसार अख़्तर प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि और माता सफिया अख़्तर मशहूर उर्दू लेखिका तथा शिक्षिका थीं। इनके बचपन का नाम 'जादू जावेद अख़्तर' था। बचपन से ही शायरी से जावेद अख़्तर का गहरा रिश्ता था। उनके घर शेरो-शायरी की महफिलें सजा करती थीं जिन्हें वह बड़े चाव से सुना करते थे। जावेद अख़्तर ने ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव को बहुत क़रीब से देखा था, इसलिए उनकी शायरी में ज़िंदगी के फसाने को बड़ी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
जावेद अख़्तर के जन्म के कुछ समय के बाद उनका परिवार लखनऊ आ गया। जावेद अख़्तर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ कॉल्विन ताल्लुकेदार कॉलेज से पूरी की। कुछ समय तक लखनऊ रहने के बाद जावेद अख़्तर अलीगढ़ आ गए, जहां वह अपनी खाला के साथ रहने लगे। वर्ष 1952 में जावेद अख़्तर को गहरा सदमा पहुंचा जब उनकी माँ का इंतकाल हो गया। जावेद अख़्तर ने अपनी मैट्रिक की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पूरी की। इसके बाद उन्होंने अपनी स्नातक की शिक्षा भोपाल के “साफिया कॉलेज” से पूरी की, लेकिन कुछ दिनों के बाद उनका मन वहां नहीं लगा और वह अपने सपनों को नया रूप देने के लिए वर्ष 1964 में मुंबई आ गए थे

मुंबई पहुंचने पर जावेद अख़्तर को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मुंबई में कुछ दिनों तक वह महज 100 रुपये के वेतन पर फ़िल्मों मे डॉयलाग लिखने का काम करने लगे। इस दौरान उन्होंने कई फ़िल्मों के लिए डॉयलाग लिखे, लेकिन इनमें से कोई फ़िल्म बॉक्स आफिस पर सफल नहीं हुई। इसके बाद जावेद अख़्तर को अपना फ़िल्मी कैरियर डूबता नजर आया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपना संघर्ष जारी रखा। धीरे-धीरे मुंबई में उनकी पहचान बनती गई।

ज़ंजीर से बदली क़िस्मत
वर्ष 1973 में उनकी मुलाकात निर्माता-निर्देशक प्रकाश मेहरा से हुई जिनके लिए उन्होंने फ़िल्म “ज़ंजीर” के लिए संवाद लिखे। फ़िल्म ज़ंजीर में उनके द्वारा लिखे गए संवाद दर्शकों के बीच इस कदर लोकप्रिय हुए कि पूरे देश में उनकी धूम मच गई। इसके साथ ही फ़िल्म के जरिए फ़िल्म इंडस्ट्री को अमिताभ बच्चन के रूप में सुपर स्टार मिला। इसके बाद जावेद अख़्तर ने सफलता की नई बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक फ़िल्मों के लिए संवाद लिखे। जाने माने निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी की फ़िल्मों के लिए जावेद अख़्तर ने जबरदस्त संवाद लिखकर उनकी फ़िल्मों को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके संवाद के कारण ही रमेश सिप्पी की ज्यादातार फ़िल्में आज भी याद की जाती हैं। इन फ़िल्मों में ख़ासकर “सीता और गीता”( 1972), “शोले” (1975), “शान” (1980), “शक्ति” (1982) और “सागर” (1985) जैसी सफल फ़िल्में शामिल हैं। रमेश सिप्पी के अलावा उनके पसंदीदा निर्माता-निर्देशकों में यश चोपड़ा, प्रकाश मेहरा प्रमुख रहे हैं।
मुंबई में उनकी मुलाकात सलीम खान से हुई, जो फ़िल्म इंडस्ट्री में बतौर संवाद लेखक अपनी पहचान बनाना चाह रहे थे। इसके बाद जावेद अख़्तर और सलीम खान संयुक्त रूप से काम करने लगे। वर्ष 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म “अंदाज़” की कामयाबी के बाद जावेद अख़्तर कुछ हद तक बतौर संवाद लेखक फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। फ़िल्म “अंदाज़” की सफलता के बाद जावेद अख़्तर और सलीम खान को कई अच्छी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। इन फ़िल्मों में “हाथी मेरे साथी”, “सीता और गीता”, “ज़ंजीर” और “यादों की बारात” जैसी फ़िल्में शामिल हैं। वर्ष 1980 में सलीम-जावेद की सुपरहिट जोड़ी अलग हो गई। इसके बाद भी जावेद अख़्तर ने फ़िल्मों के लिए संवाद लिखने का काम जारी रखा।
फ़िल्म “सीता और गीता” के निर्माण के दौरान उनकी मुलाकात हनी ईरानी से हुई और जल्द ही जावेद अख़्तर ने हनी ईरानी से निकाह कर लिया। हनी इरानी से उनके दो बच्चे फ़रहान अख़्तर और ज़ोया अख़्तर हुए लेकिन हनी ईरानी से उन्होंने तलाक लेकर साल 1984 में प्रसिद्ध अभिनेत्री शबाना आज़मी से दूसरा विवाह किया।

पुरस्कार

फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार
वर्ष 1994 में प्रदर्शित फ़िल्म “1942 ए लव स्टोरी” के गीत एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा.. के लिए
वर्ष 1996 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पापा कहते हैं' के गीत घर से निकलते ही..(1997) के लिए
फ़िल्म 'बार्डर' के गीत संदेशे आते हैं…2000) के लिए
फ़िल्म 'रिफ्यूजी' के गीत पंछी नदिया पवन के झोंके.. (2001) के लिए
फ़िल्म 'लगान' के सुन मितवा.. (2003) के लिए
फ़िल्म 'कल हो ना हो' (2004) कल हो ना हो के लिए
फ़िल्म 'वीर जारा' के तेरे लिए…के लिए

नागरिक सम्मान
पद्मश्री (1999)
पद्मभूषण (2007)

राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ गीतकार)
वर्ष 1996 में फ़िल्म 'साज'
वर्ष 1997 में 'बार्डर'
वर्ष 1998 में 'गॉड मदर'
वर्ष 2000 में फ़िल्म 'रिफ्यूजी'
वर्ष 2001 में फ़िल्म 'लगान'

मंगलवार, 20 जून 2023

अनीता गुहा


जन्म17 जनवरी 1932
मृत20 जून 2007 (75 वर्ष की आयु)
सक्रिय वर्ष1953-1989
जीवनसाथीमाणिक दत्त
अभिनेत्री अनीता गुहा की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

अनीता गुहा एक भारतीय बंगाली अभिनेत्री थीं, जो आमतौर पर फिल्मों में पौराणिक किरदार निभाती थीं।  वह जय संतोषी मां (1975) में शीर्षक भूमिका निभाने के लिए जानी गईं।  पहले, उन्होंने अन्य पौराणिक फिल्मों में सीता की भूमिका निभाई थी;  सम्पूर्ण रामायण (1961), श्री राम भरत मिलाप (1965) और तुलसी विवाह (1971)।  इसके अलावा, उन्होंने गूंज उठी शहनाई (1959), पूर्णिमा (1965), प्यार की राहें (1959), गेटवे ऑफ इंडिया (1957), देख कबीरा रोया (1957) और संजोग (1961) जैसी फिल्मों में भी उल्लेखनीय भूमिकाएँ निभाईं

जब वह 15 वर्ष की थी, तब वह एक सौंदर्य प्रतियोगिता की प्रतियोगी के रूप में 1950 के दशक में मुंबई आईं। वह यहां  एक अभिनेत्री बन गईं और ताँगा-वाली (1955) में अपनी फिल्म की शुरुआत की।  वह देख कबीरा रोया (1957), शारदा (1957),और गूंज उठी शहनाई जैसी हिट फिल्मों में काम किया जिसके लिए उन्होंने अपने करियर का एकमात्र नामांकन सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री श्रेणी के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार में नामांकन अर्जित किया  1961 में, वह बाबूभाई मिस्त्री की सम्पूर्ण रामायण में सीता के रूप में दिखाई दीं, जिसने उन्हें  एक घरेलू नाम बना दिया

लेकिन जय संतोषी मां (1975) में उनकी शीर्षक भूमिका थी जिसने उन्हें सबसे अधिक प्रसिद्धि दिलाई उन्होंने देवी संतोषी की भूमिका निभाने से पहले देवी संतोषी के बारे में कभी नहीं सुना था, क्योंकि यह एक छोटी देवी थी  उनके दृश्य 10-12 दिनों में शूट किए गए थे।  उन्होंने शूटिंग के दौरान उपवास किया कम बजट वाली यह फ़िल्म एक आश्चर्यजनक हिट थी, और एक सांस्कृतिक घटना बनते हुए बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड को तोड़ दिया  देवी संतोषी अब एक प्रसिद्ध देवी बन गईं, और पूरे भारत में महिलाओं ने उनकी पूजा की गुहा ने दावा किया कि लोग उनसे आशीर्वाद लेने के लिए उनके पास आते थे क्योंकि वे उन्हें एक वास्तविक देवी मानते थे  हालाँकि, वह खुद कभी देवी की भक्त नहीं बनीं, उन्होंने दावा किया कि वह देवी काली की भक्त थीं

अन्य पौराणिक फिल्मों में उन्होंने कवि कालिदास (1959), जय द्वारकाधीश (1977) और कृष्णा कृष्णा (1986) जैसी फिल्मों में काम किया।  वह खुश नहीं थी कि वह एक पौराणिक अभिनेत्री के रूप में टाइपकास्ट हो जाए उन्हें फिल्में मिलना लगभग बंद हो गया उनके उन्होंने कुछ पीरियड फिल्मों में भी अभिनय किया संगीत सम्राट तानसेन (1962), कण कण में भगवान (1963) और वीर भीमसेन (1964) जैसी फिल्में शामिल हैं।  उन्होंने बड़ी हिट आराधना (1969) में राजेश खन्ना की दत्तक माँ की भूमिका निभाई थी

उन्होंने अभिनेता माणिक दत्त से शादी की थी;  उनके कोई बच्चे नहीं थे।  उन्होंने बाद में एक बच्ची को गोद लिया।  अपने पति की मृत्यु के बाद, वह मुंबई में अकेली रहती थीं, जहाँ 20 जून 2007 को उनका निधन हो गया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...