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सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

निर्मल पांडे

#10aug
#18feb 
निर्मल पांडे

🎂जन्म: 10 अगस्त 1962, नैनीताल
⚰️मृत्यु : 18 फ़रवरी 2010, मुम्बई

पत्नी: अर्चना शर्मा (विवा. 2005–2010), कौसर मुनीर (विवा. 1997–2000)
भाई: भारती पांडे, मिथिलेश पांडे, लता पांडे, ज्योति पांडे
माता-पिता: रेवा पांडे
एक भारतीय बॉलीवुड अभिनेता थे, जिन्हें शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन (1994) में विक्रम मल्लाह की भूमिका के लिए जाना जाता था , और टेलीविजन श्रृंखला हातिम में दज्जाल की भूमिका, दायरा में एक ट्रांसवेस्टाइट की भूमिका निभाने के लिए जाना जाता था । 1996) जिसके लिए उन्होंने फ्रांस, ट्रेन टू पाकिस्तान (1998) और गॉडमदर (1999) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री वैलेंटी पुरस्कार जीता ।  उन्होंने मलयालम भाषा की फिल्म दुबई (2001) में किशन भट्टा की भूमिका निभाई ।
उनकी आखिरी फिल्म लाहौर जो उनकी मृत्यु के एक महीने बाद 19 मार्च 2010 को रिलीज़ हुई थी।

निर्मल पांडे की स्मृति में, निर्मल पांडे स्मृति न्यास और फिल्म महोत्सव की स्थापना फिल्म और टीवी निर्देशक अनिल दुबे और फिल्म निर्माता, निर्देशक और सामाजिक कार्यकर्ता रवींद्र चौहान ने मई 2020 में की थी। यह फिल्म महोत्सव उनके जन्मदिन 10 अगस्त को आयोजित किया जाता है।
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा छोड़ने के बाद वह लंदन चले गए, एक थिएटर ग्रुप, तारा के साथ, उन्होंने हीर रांझा और एंटीगोन जैसे नाटक किए और लगभग 125 नाटकों में अभिनय किया।

दो छोटी भूमिकाएँ करने के बाद, उन्हें पहली बार शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन (1994) में देखा गया । उन्हें अमोल पालेकर की दायरा (स्क्वायर सर्कल) (1996), ट्रेन टू पाकिस्तान (1998), इस रात की सुबह नहीं और हम तुम पे मरते हैं जैसी फिल्मों के लिए सकारात्मक समीक्षा मिली । उन्होंने लैला , प्यार किया तो डरना क्या , वन 2 का 4 और शिकारी जैसी फिल्मों और हातिम और प्रिंसेस डॉली और उसका मैजिक बैग (2005) सहित कई टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय किया ।

एक अभिनेता होने के अलावा, वह एक गायक थे, जिन्होंने 1999 में जज़्बा नामक एक एल्बम जारी किया था । 2002 में, उन्होंने प्रसिद्ध नाटककार धर्मवीर भारती द्वारा लिखित एक हिंदी नाटक अंधायुग का निर्देशन किया , जो महाभारत युद्ध के 18 दिनों के बाद की कहानी है। इसमें 70 कलाकार हैं, जिनमें से सभी 1994 में उनके द्वारा शुरू किए गए थिएटर ग्रुप संवेदना से संबंधित हैं।

उनका गाजियाबाद में एक अभिनय संस्थान, "फ्रेश टैलेंट एकेडमी" है और थिएटर कार्यशालाएँ आयोजित करता है। 
निर्मल पांडे की 47 वर्ष की आयु में 18 फरवरी 2010 को उनके 48वें जन्मदिन से लगभग 6 महीने पहले मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई।
📽️
1994 दस्यु रानी 
1996 क्या रात की सुबह नहीं
1996 दायरा ट्रांसवेस्टाइट 
2008 कोई बच ना पायेगा 
1997 औज़ार
1998 पाकिस्तान के लिए ट्रेन 
1998 प्यार किया तो डरना क्या
1999 जहां तुम ले चलो 
1999 धर्म-माता
1999 हम तुम पे मरते हैं
2000 हद कर दी आपने 
2000 शिकारी
2001 दुबई
2001 एक 2 का 4
2002 दीवानगी 
2003 आंच
2003 पथ 
2005 लैला
2008 देशद्रोही 
2008 उलाढाल
2009 मड्रैंक: द स्टाम्प 
2010 केडी
2010 लाहौर

गुरुवार, 10 अगस्त 2023

खेम चंद परकाश

महान संगीतकाऱ खेमचंद प्रकाश की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म 12 दिसम्बर
⚰️10 अगस्त 1949
खेमचन्द प्रकाश का जन्म 12 दिसम्बर 1907 में सुजानगढ़ बीकानेर राजपूताना में हुआ था

जितनी जिज्ञासा गंगा और यमुना हमारे अवचेतन या चेतन मन में जगाती हैं, उतनी ही दिलचस्पी हमें इनके उद्गम यानी गंगोत्री और यमनोत्री ग्लेशियरों को लेकर भी रही है. कहना ग़लत नहीं होगा कि ये ग्लेशियर न होते तो नदियां न होतीं. यानी उद्गम है, तो प्रवाह है और प्रवाह है तो जीवन है. क्या यह तथ्य गुरू और शिष्य या गॉडफ़ादर और प्रोटीज के सन्दर्भ में कायम रहता है? रमाकांत आचरेकर न होते या फिर राजसिंह डूंगरपुर न होते तो सचिन तेंदुलकर को सामने कौन और कैसे लाता? महमूद न होते तो अमिताभ बच्चन कब या कभी ‘अमिताभ बच्चन’ बनते? ठीक इसी तरह जिस शख्स की हम बात कर रहे हैं, अगर वे न होते तो सोचिये, महान किशोर कुमार और महानतम लता मंगेशकर को कौन दुनिया के सामने लाता?

शायद इनको नयी पीढ़ी तो भूल चुकी होगी. यहां बात राजस्थान के सुजानगढ़ क़स्बे में जन्मे संगीतकार खेमचंद प्रकाश की हो रही है. वे खेमचंद प्रकाश जिन्होंने लता मंगेशकर से फ़िल्म ‘महल’ (1949) का गाना ‘आएगा आने वाला’ और किशोर कुमार से ‘जिद्दी’ (1948) का ‘मरने की दुआएं क्यूं मांगूं, जीने की तम्मना कौन करे’ गवाकर दुनिया को दो सितारे दे दिए. आप कहेंगे, प्रतिभाएं किसी शख्स या परिस्थिति की मोहताज नहीं होतीं. तो यह बात बहस का मुद्दा हो सकती है कि अगर नूरजहां पाकिस्तान न गई होतीं या उनको खेमचंद प्रकाश, नौशाद या मदन मोहन जैसे संगीतकार मिले होते तो क्या वे लता को पीछे छोड़ देतीं?

खेमचंद प्रकाश को संगीत विरसे में मिला था. उनके पिता पंडित गोवर्धन प्रसाद जयपुर के महाराज माधो सिंह (द्वितीय) के दरबारी गायक थे. खेमचंद 19 बरस की उम्र में यहीं दरबारी गायक और कथक नृत्यकार बन गए. क़िस्मत में बॉम्बे (मुंबई) आना बदा था. पर देखिये, वही क़िस्मत पहले कहां-कहां लेकर गयी. बीसवीं सदी में भारत के राजाओं-महाराजाओं की स्थिति ख़राब थी. जयपुर से निकलकर खेमचंद प्रकाश कुछ दिनों के लिए राजा गंगा सिंह के बुलावे पर बीकानेर चले गए. वहां मन नहीं लगा तो नेपाल के राजदरबार में गायक हो गए. कुछ समय बाद वहां से कलकत्ता आकर रेडियो कलाकार बन गए. यहां उनकी मुलाकात संगीतकार तिमिर बरन से हुई जिन्होंने खेमचंद को ‘न्यू थिएटर्स’ के लिए अनुबंधित कर लिया. 1935 में आई पहली ‘देवदास’ का संगीत तिमिर बरन का ही था. कहते हैं कि इसके गाने ‘बालम आये बसो मेरे मन में’ और ‘दुःख के दिन अब बीतत नाहीं’ खेमचंद ने ही कंपोज़ किये थे. हालांकि, इनके गीतकार केदार शर्मा इनका क्रेडिट महान कुंदन लाल सहगल को देते हैं.

1938 में ‘न्यू थिएटर्स’ की एक और फ़िल्म आई थी ‘स्ट्रीट सिंगर’. वही जिसमें केएल सहगल ने ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ गाया था. इस फ़िल्म में एक हल्का-फुल्का गाना था ‘लो मैडम खा लो खाना’. यह खेमचंद पर फ़िल्माया गया था.

उन दिनों पृथ्वीराज कपूर अपनी थिएटर कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर्स’ लेकर शहर-शहर घूमते थे. उन्होंने कलकत्ते में ये फ़िल्म देखी. ‘पापाजी’ खेमचंद की प्रतिभा पहचान गए और उन्हें बॉम्बे आने के लिए कह दिया. 1939 के आसपास खेमचंद प्रकाश सामान उठाकर मायानगरी चले आये.

1939 से लेकर 1943 तक खेमचंद ने कभी अच्छा और कहीं दरमियाना संगीत जिन फ़िल्मों में दिया था वे ‘गाज़ी सलाउद्दीन’, ‘फ़रियाद’ ‘खिलौना’, ‘चिराग’ आदि थीं. इस दौरान वे ‘सुप्रीम पिक्चर्स’ और ‘रणजीत मूवीटोन’ के साथ जुड़े. फिर 1943 में आई ‘तानसेन’ ने सब कुछ हमेशा के लिए बदल दिया. केएल सहगल से उन्होंने राग दीपक में ‘दिया जलाओ जगमग जगमग’ गवाकर तहलका मचा दिया. बताते हैं कि इस गीत के लिए खेमचंद ने महीने भर मेहनत की थी!

ग़ुलाम हैदर के साथ-साथ खेमचंद प्रकाश ने भी लता मंगेशकर की प्रतिभा को बहुत पहले ही भांप लिया था, तब, जब वे रणजीत मूवीटोन के लिए संगीत रचते थे. खेमचंद ने लता को गानों के लिए अनुबंधित करने की बात रणजीत के मालिक चंदूलाल शाह से की. शाह को लता की आवाज़ पसंद नहीं आई. खेमचंद और शाह में झगड़ा हो गया. लता को गवाने की ज़िद पर उन्होंने रणजीत मूवीटोन छोड़कर बॉम्बे टाकीज़ पकड़ लिया.

यह वही स्टूडियो था जिसकी स्थापना देविका रानी के पति हिमांशु रॉय ने की थी और उनके पार्टनर थे संगीतकार मदन मोहन के पिता रायबहादुर चुन्नीलाल. इसी स्टूडियो से अशोक कुमार निकले और देवानंद की पहली हिट फ़िल्म ‘जिद्दी’ भी इसी का प्रोडक्शन थी. किशोर कुमार का पहला हिट गीत यहीं से आया. फ़िल्म के डुएट ‘ये कौन आया करके सोलह सिंगार’ की वजह से लता और किशोर एक साथ आये.

इस फ़िल्म के दौरान इन दोनों से जुड़ा हुआ एक बेहद दिलचस्प क़िस्सा है. हुआ यह कि एक रोज़ लता रिकॉर्डिंग के लिए लोकल ट्रेन से बॉम्बे टाकीज़ के स्टूडियो गोरेगांव जा रहीं थीं. उनके साथ एक दुबला सा लड़का भी उतरा और उनके पीछे हो लिया. लता घबराई सी स्टूडियो पंहुचीं और खेमचंद को क़िस्सा बताया. यह बताने के बाद जैसे ही वे मुड़ीं तो उस लड़के को खड़ा पाकर लगभग बदहवास हो गयीं. अब तक खेमचंद पूरा माजरा समझ गए थे. हंसते-हंसते पूरी यूनिट लोट-पोट हो गयी और तब लता को मालूम हुआ कि वह लड़का मशहूर अभिनेता अशोक कुमार का छोटा भाई किशोर कुमार है.

साल 1949 में बॉम्बे टाकीज़ ने अपनी सबसे बड़ी और शानदार फ़िल्म ‘महल’ प्रोड्यूस की. इसका संगीत खेमचंद की ज़िम्मेदारी था. लता उनके कैंप का स्थायी हिस्सा बन चुकी थीं. फ़िल्म के डायरेक्टर थे कमाल अमरोही. नक्शब के गीत ‘आएगा आनेवाला’ की शुरुआती लाइनें कमाल अमरोही ने लिखी थीं जिन्हें खेमचंद गाने में शामिल करना नहीं चाहते थे. पर अमरोही के इसरार के आगे हार गए. इन्ही दो पंक्तियों से गाने में ज़बरदस्त प्रभाव पैदा हो गया.

खेमचंद ने लता को इन्हें गाते हुए माइक से दूर जाकर फिर पास आने को कहा था. ‘धुनों की यात्रा में पंकज राग लिखते हैं, ‘खेमचंद प्रकाश इस गीत की धीमी लय को लेकर इतने आशंकित थे कि उन्होंने इसको फ़िल्म से निकालने का मन बना लिया था’. पर इस गीत की वजह से लता समकालीन गायिकाओं से मीलों आगे निकल गयीं और फिर बाकी इतिहास हो गया. इस गीत के मुखड़े में सिर्फ़ दो लफ्ज़ हैं-‘आएगा’ और ‘आनेवाला’ और शायद यह सबसे छोटे मुखड़े वाला गीत है. इसके बाद भी इसका कंपोज़िशन कमाल का है. ऐसी ही एक कोशिश आनंद बख्शी और एसडी बर्मन ने ‘इश्क़ पर ज़ोर नहीं’(1970) के गीत ‘ये दिल दीवाना है, दिल तो दीवाना है, दीवाना दिल है ये, दिल दीवाना’ बनाकर की थी, पर वह बात नहीं बनी’. ‘महल’ के गाने के बिना लता अधूरी हैं, खेमचंद प्रकाश अधूरे हैं और अधूरा रहेगा यह लेख ग़र वह गीत न बजाया.

‘लता सुर गाथा’ में यतींद्र मिश्र लिखते हैं कि ‘महल’ लता मंगेशकर के संघर्ष के शुरुआती दिनों की फ़िल्म है और इसके गानों के लिए उन्हें क्रेडिट न देकर रिकॉर्ड पर मधुबाला के किरदार ‘कामिनी’ का नाम दिया गया था!. उनके साथ एक बातचीत में वे कहती हैं, ‘खेमचंद जी का संगीत इतना दुरुस्त होता था कि उसकी रिहर्सल भी हम लोग न जाने कितनी बार करते’. शायद यही कारण है कि राजू भारतन लता मंगेशकर की जीवनी ‘अ बायोग्राफी’ में लिखते हैं, ‘रिकॉर्डिंग रुम में जाने से पहले यह धुन लता के पूरे अंतर्मन का हिस्सा बन चुकी थी’. लता मंगेशकर ने खेमचंद के साथ तीन फ़िल्मों के लिए गाने गाये थे. तीसरी फ़िल्म थी आशा (1948).

ठीक इसी प्रकार कुंदनलाल सहगल और खेमचंद प्रकाश की बात की जा सकती है. जानकरों के मुताबिक़ यह सवाल बेमानी है कि सहगल की गायकी ने ऐसे गीतों को हिट बनाया या खेमचंद प्रकाश की भावपूर्ण तर्ज़ों ने. दोनों ही एक दूसरे के पूरक थे. पंकज राग लिखते हैं कि खेमचंद सहगल के बिना भी माधुर्य रच सकते थे और यह बात उन्होंने ‘भर्तृहरि’(1944) के गानों को अन्य गायकों से गवाकर सिद्ध कर दी थी. वहीं 40 के दशक की गायिका ख़ुर्शीद के ज़्यादातर लोकप्रिय गाने खेमचंद प्रकाश ने ही रचे थे. एक बात और. मन्ना डे और नौशाद भी खेमचंद प्रकाश की निगहबानी में पले-बढ़े और पके.

खेमचंद प्रकाश ने कई फ़िल्मों में शानदार संगीत दिया. पर वे ‘महल’ के पार नहीं जा पाए. शायद क़िस्मत की बात थी कि इस फिल्म के रिलीज़ होने के चंद महीनों बाद, महज़ 42 साल की उम्र में 10 अगस्त, 1950 को वे चल बसे. ‘महल’ का संगीत उनका ‘स्वान सांग’ (अंतिम रचना) नहीं था, पर यकीनन यह उनकी, लता मंगेशकर की और बॉलीवुड की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है. अफ़सोस! वे अपनी सबसे बड़ी कामयाबी न देख पाए.

सुजानगढ़ में एक हवेली है, जो खेमचंद प्रकाश ने अपनी बेटी के नाम पर ख़रीदी थी. मुफ़लिसी के दिनों में यह गिरवी रखी गयी. अब कोई और ही इसका मालिक है. कुछ समय पहले खबर आई थी कि मध्य प्रदेश की सरकार ने किशोर कुमार की खंडवा के बॉम्बे बाज़ार स्थित हवेली को गिराकर रास्ता बड़ा करने का फ़ैसला किया है. गिरा दीजिये. यादें हवेलियों में नहीं, ज़हनों में पलती हैं.

बुधवार, 9 अगस्त 2023

प्रेम अदीब

नाम  प्रेम अदीब
पूरा नाम
अन्यनाम

प्रेम अदीब
शिवप्रसाद, प्रेम नारायण

🎂जन्म 10 अगस्त, 1916
जन्म स्थान सुल्तानपुर
पिता का नाम रामप्रसाद दर
माता का नाम –
राष्ट्रीयता भारतीय
⚰️मृत्यु25 दिसंबर 1959
मृत्यु स्थान
सुल्तानपुर

उनके पिता का नाम रामप्रसाद दर था। कश्मीरी मूल के प्रेम अदीब के दादा-परदादा अवध के नवाब वाजिद अली शाह के ज़माने में कश्मीर छोड़कर अवध के शहर फ़ैज़ाबाद (अब अयोध्या उत्तरप्रदेश) में आ बसे थे। उनके दादा का नाम देवीप्रसाद दर था। प्रेम अदीब के पिता रामप्रसाद दर फ़ैज़ाबाद से सुल्तानपुर चले आए थे।
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प्रेम अदीब का झुकाव बचपन से ही फ़िल्मों की तरफ था। प्रेम अदीब 1943 में ‘प्रकाश पिक्चर्स’ के बैनर में बनी इस धार्मिक फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट, गीतकार रमेश गुप्ता और संगीतकार  शंकर राव व्यास। जिनका नाम उस दौर के फ़िल्म प्रेमियों के ज़हन में आज भी ताज़ा है। 1930 के दशक के मध्य में सामाजिक फ़िल्मों से अपना करियर शुरू करने वाले अभिनेता प्रेम अदीब 1940 के दशक में धार्मिक फ़िल्मों का एक मशहूर नाम बन चुके थें।

फ़िल्मी सफ़र
प्रेम अदीब ने 1941 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म ‘दर्शन’ के साथ ही एंट्री ‘प्रकाश पिक्चर्स’ में हुई। ‘घूंघटवाली’ (1938), ‘सागर मूवीटोन’ की ‘भोलेभाले’ और ‘साधना’ (1939), ‘हिंदुस्तान सिनेटोन’ की ‘सौभाग्य’ (1940) जैसी फ़िल्मों के साथ प्रेम अदीब के करियर का ग्राफ लगातार ऊपर उठता चला गया। भारत की “पारंपरिक मूल्यों” में शामिल इन फ़िल्मों में प्रेम अदिब और शोभना समर्थ “आदर्श राम और सीता” का चित्रण करते थे। अदीब और समर्थ ने अपनी जोड़ी को राम और सीता के रूप में जारी रखा, और एक रामायण आधारित फ़िल्म रामबाण (1948) में एक साथ अभिनय किया।

प्रेम अदीब ने फ़िल्मी जीवन में मशहूर अभिनेत्रिओं के साथ अभिनय किया वे थीं सुरैया, सुलोचना, शोभना समर्थ, सुमित्रा देवी, रतन माला और बेगम पारा।

प्रमुख फ़िल्में
भाग्यलक्ष्मी 1944
चांद 1944
पुलिस 1944
आम्रपाली 1945
विक्रमादित्य 1945
महारानी मीनलदेवी 1946
सुभद्रा 1946
उर्वशी 1946
चन्द्रहास 1947
गीत गोविंद 1947
क़सम 1947
मुलाक़ात 1947
सती तोरल 1947
वीरांगना 1947
एक्ट्रेस 1948
अनोखी अदा 1948
 रामबाण 1948
 भोली 1949
हमारी मंज़िल 1949
राम विवाह 1949
भाई बहन 1950
प्रीत के गीत 1950
भोला शंकर 1951
लव कुश 1951
इंद्रासन 1952
मोरध्वज 1952
राजा हरिश्चन्द्र 1952
रामी धोबन 1953
हनुमान जन्म 1954
महापूजा 1954
रामायण 1954
शहीदे आज़म भगतसिंह 1954
भागवत महिमा 1955
प्रभु की माया 1955
श्री गणेश विवाह 1955
दिल्ली दरबार 1956
राजरानी मीरा 1956
रामनवमी 1956
आधी रोटी 1957
चंडीपूजा 1957
कृष्ण सुदामा 1957
नीलमणि 1957
राम हनुमान युद्ध 1957
मृत्यु
Prem Adib की मृत्यु को ब्रेन -हैम्रेज के कारण 25 दिसंबर 1959 को हुई ।

निर्मल पांडेय

निर्मल पांडे
फ़िल्म अभिनेता
🎂जन्मतिथि: 10-अगस्त -1962
नैनीताल, उत्तराखंड, भारत
⚰️मृत्यु तिथि: 18-फ़रवरी-2010
व्यवसाय: अभिनेता, टेलीविजन अभिनेता
निर्मल पांडे (10 अगस्त 1962 - 18 फरवरी 2010) एक भारतीय बॉलीवुड अभिनेता थे, जिन्हें शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन (1994) में विक्रम मल्लाह की भूमिका के लिए जाना जाता था, और टेलीविजन श्रृंखला हातिम में दज्जाल, दायरा (1996) में एक ट्रांसवेस्टाइट की भूमिका निभाने के लिए जाना जाता था। जिसके लिए उन्होंने फ्रांस, ट्रेन टू पाकिस्तान (1998) और गॉडमदर (1999) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता वैलेंटी पुरस्कार जीता। उन्होंने मलयालम मूवी दुबई (2001) में ममूटी के सामने मुख्य प्रतिद्वंद्वी किशन भट्टा की भूमिका निभाई, उन्हें 22 फरवरी 2010 को हास्य कलाकार आर के साथ एक विशेष स्क्रीनिंग में अपनी नवीनतम फिल्म लाहौर देखनी थी।
क।
लक्ष्मण और संगीत उस्ताद एम.
एम।
क्रीम.
यह 19 मार्च 2010 को रिलीज़ होने वाली थी और यह पांडे की आखिरी फिल्म साबित होगी।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...