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सोमवार, 15 जनवरी 2024

ओपी नयर

#16jan
#28jan 
ओंकार प्रसाद नैय्यर
प्रसिद्ध नाम ओ.पी. नैय्यर
अन्य नाम ओपी

🎂जन्म 16 जनवरी, 1926
जन्म भूमि लाहौर (पाकिस्तान)
⚰️मृत्यु 28 जनवरी, 2007
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र संगीतकार
मुख्य फ़िल्में 'आर-पार', 'नया दौर', 'तुमसा नहीं देखा', 'कश्मीर की कली', 'सी. आई. डी' आदि।
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्ध गीत 'लेके पहला पहला प्यार', 'ये चांद-सा रोशन चेहरा', 'ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का', 'चल अकेला', 'ये देश है वीर जवानों का' आदि।
अन्य जानकारी सिने जगत् के लोगों ने आशा भोंसले को ओ. पी. नैय्यर की ही खोज बताया। ओ. पी. नैय्यर ने लता मंगेशकर जैसी सुर सम्राज्ञी के साथ कभी काम नहीं किया।
हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। अपने सुरों के जादू से आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी जैसे कई पार्श्वगायक और पार्श्वगायिकाओं को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने वाले महान् संगीतकार ओ. पी. नैय्यर के संगीतबद्ध गीत आज भी लोकप्रिय है।

जीवन परिचय

16 जनवरी 1926 को लाहौर (पाकिस्तान) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे ओंकार प्रसाद नैय्यर उर्फ ओ.पी. नैय्यर का रुझान बचपन से ही संगीत की ओर था। वह पार्श्वगायक बनना चाहते थे। भारत विभाजन के पश्चात् उनका पूरा परिवार लाहौर छोड़कर अमृतसर चला आया। ओंकार प्रसाद ने संगीत की सेवा करने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। अपने संगीत के सफ़र की शुरूआत इन्होंने आल इंडिया रेडियो से की।

फ़िल्मी सफर

बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने के लिये ओ. पी. नैय्यर वर्ष 1949 में मुंबई आ गये। मुंबई मे उनकी मुलाकात जाने माने निर्माता निर्देशक कृष्ण केवल से हुई जो उन दिनों फ़िल्म 'कनीज़' का निर्माण कर रहे थे। कृष्ण केवल उनके संगीत बनाने के अंदाज़से काफ़ी प्रभावित हुये और उन्होंने फ़िल्म के बैक ग्राउंड संगीत देने की पेशकश की। इस फ़िल्म के असफल होने से ओ. पी. नैय्यर बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने मे भले ही सफल न हो सके लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री मे उनका कैरियर अवश्य ही शुरू हो गया।

वर्ष 1951 में अपने एक मित्र के कहने पर वह मुंबई से दिल्ली चले गये और बाद में उसी मित्र के कहने पर उन्होंने निर्माता पंचोली से मुलाकात की जो उन दिनों फ़िल्म नगीना का निर्माण कर रहे थे। बतौर संगीतकार उन्होंने फ़िल्म 'आसमान' से अपने सिने कैरियर की शुरूआत की। इस फ़िल्म के लिये उन्होंने सी. एच. आत्मा की आवाज में अपना पहला गाना रिकार्ड करवाया। गाने के बोल कुछ इस प्रकार थे 'इस बेवफा जहां में वफा ढूंढते हैं' । इस बीच उनकी छमा छम छम और बाज जैसी फ़िल्में भी प्रदर्शित हुई लेकिन इन फ़िल्मों के असफल होने से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा और उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ वापस अमृतसर जाने का निर्णय कर लिया।
वर्ष 1953 पार्श्वगायिका गीता दत्त ने ओ.पी. नैय्यर को गुरुदत्त से मिलने की सलाह दी। वर्ष 1954 में गुरुदत्त ने अपनी निर्माण संस्था शुरू की और अपनी फ़िल्म आरपार के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी ओ. पी. नैय्यर को सौंप दी। फ़िल्म आरपार के ओ .पी.नैय्यर के निर्देशन में संगीतबद्ध गीत सुपरहिट हुए और इस सफलता के बाद ओ. पी. नैय्यर अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये। उन्होंने वापस अपने घर जाने का इरादा छोड दिया। इसके बाद गुरुदत्त की ही फ़िल्म 'मिस्टर एंड मिसेज 55' के लिये भी ओ.पी. नैय्यर ने संगीत दिया। फ़िल्म में उनके संगीत निर्देशन में बने गाने 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी' और 'ठंडी हवा काली घटा' काफ़ी लोकप्रिय हुए।
आर−पार, सी. आई. डी., तुमसा नहीं देखा आदि एक के बाद एक लगातार हिट फ़िल्में देते हुए ये सिने जगत् में सबसे महंगे संगीतकार बने। 1950 में एक फ़िल्म में संगीत देने के 1 लाख रुपये लेने वाले पहले संगीतकार थे। “नया दौर” इनकी सबसे लोकप्रिय फ़िल्म रही। इस फ़िल्म के लिए उन्हें 1957 में फ़िल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला। सिर्फ़ कुछ ही फ़िल्मों में अपनी कला का लोहा मनवा देने वाले ये संगीतकार ज़िद्दी और एकांतप्रिय स्वभाव के कारण भी चर्चा में रहे। कुछ लोग इन्हें घमंडी, दबंग और निरंकुश स्वभाव के भी कहते थे, हालाँकि नये एवं जूझते हुए गायकों के साथ ये बहुत उदार रहे। पत्रकार हमेशा से ही इनके ख़िलाफ़ रहे और इनको हमेशा ही बागी संगीतकार के रूप में पेश किया गया। पचास के दशक के दौरान आल इंडिया रेडियो ने इनके संगीत को आधुनिक कहते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया और इनके गाने रेडियो पर काफ़ी लंबे समय तक नहीं बजाए गये। इस बात से उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ बल्कि वे अपनी धुन बनाते रहे और वे सभी देश में बड़ी हिट रही। उस समय सिर्फ़ श्रीलंका के रेडियो पर ही इनके नये गाने सुने जा सकते थे। बहुत जल्दी ही अंग्रेज़ी अख़बारों में इनकी तारीफ के चर्चे शुरू हो गये और इन्हें हिन्दी संगीत में उस्ताद कहा जाने लगा, तब ये बहुत जवान थे।
गीता दत्त, आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी के साथ इन्होंने सबसे ज़्यादा काम किया। मोहम्मद रफ़ी से अलग होने के बाद ओपी महेंद्र कपूर के साथ काम करने लगे। महेंद्र कपूर जी ओपी के लिए दिल से गाते थे। उनकी आवाज़ और एहसास की गहराई ने ओपी के गानों में भावनाओं को उभारा और लोगों के दिलों तक ओपी के विचारों की गहराई पहुँचाई। आशा भोंसले के साथ ओपी ने लगभग सत्तर फ़िल्मों में काम किया। सिने जगत् के लोगों ने आशा भोंसले को उनकी ही खोज बताया। ऐसा लगता था कि नैय्यर साहब आशा जी के लिए विशेष धुन बनाते हों, जिन्हें आशा बिना किसी मेहनत के गा लेती। ओपी ने लता मंगेशकर जैसी सुर सम्राज्ञी के साथ कभी काम नहीं किया। ये सिने जगत् में हमेशा ही चर्चा का विषय रहा। ओपी कहते थे कि उनके गाने लता की आवाज़ से मेल नहीं खाते। वे ज़्यादातर पंजाबी धुन के साथ मस्ती भरे गाने बनाते थे। लेकिन मुकेश के द्वारा गाया हुआ बहुत गंभीर गाना ‘चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला’ ओ. पी नैय्यर की चहुँमुखी प्रतिभा को दर्शाता है।
📽️
आर-पार
नया दौर
तुमसा नहीं देखा
कश्मीर की कली
मेरे सनम
एक मुसाफिर एक हसीना
फिर वो ही दिल लाया हूँ
सी. आई. डी
सावन की घटा
रागिनी
किस्मत
फागुन
हावड़ा ब्रिज
प्राण जाए पर वचन ना जाए
बहारें फिर भी आयेंगी
संबंध
सोने की चिड़िया
कहीं दिन कहीं रात
ये रात फिर ना आयेगी
मि. & मिसेज 55
नया अन्दाज़

कामिनी कौशल

#16jan 

कामिनी कौशल
अन्य नाम उमा कश्यप
🎂जन्म 16 जनवरी, 1927
जन्म भूमि लाहौर, पंजाब, ब्रिटिश भारत
अभिभावक शिवराम कश्यप
पति/पत्नी ब्रह्मस्वरूप सूद
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अभिनेत्री
मुख्य फ़िल्में 'जेलयात्रा', 'जिद्दी', 'नीचा नगर', 'बिराज बहू', 'हीरालाल पन्नालाल', 'पूरब और पश्चिम', 'लागा चुनरी में दाग', 'शहीद' आदि।
शिक्षा बी.ए. ऑनर्स (अंग्रेज़ी)
विद्यालय 'लेडी मैकक्लैगन हाईस्कूल', 'किन्नेयर्ड कॉलेज', लाहौर
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्म 'बिरज बहू' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार'।
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख चेतन आनन्द, दिलीप कुमार
विशेष वर्ष 1946 में बनी फ़िल्म 'नीचा नगर' के संगीतकार पंडित रविशंकर थे। 'कांस फ़िल्म समारोह' में शामिल होने और पुरस्कार हासिल करने वाली ये पहली भारतीय फ़िल्म थी।
अन्य जानकारी प्रसिद्ध निर्देशक चेतन आनंद ने कामिनी कौशल को उनके असली नाम 'उमा कश्यप' की जगह फ़िल्मी नाम 'कामिनी कौशल' दिया था। आगे चलकर वे इसी फ़िल्मी नाम से मशहूर हुईं।
फ़िल्मों की एक ऐसी अभिनेत्री और टीवी कलाकार, जिसने अपनी शालीनता से सभी का दिल जीत लिया। इनका वास्तविक नाम 'उमा कश्यप' था। फ़िल्मी नाम 'कामिनी कौशल' चेतन आनन्द ने दिया और इसी नाम से ये जानी गईं। यूँ तो कामिनी कौशल ने कई यादगार फ़िल्में दी हैं, किंतु फ़िल्म 'नीचा नगर' (1946) और 'बिराज बहू' (1955) में निभाई गई भूमिका के लिए उन्हें ख़ासतौर पर जाना जाता है। इन फ़िल्मों में निभाई गई भूमिका के लिए कामिनी कौशल को पुरस्कार भी प्राप्त हुए थे। अपने समय के ख्याति प्राप्त अभिनेता दिलीप कुमार और राज कपूर के साथ कई फ़िल्में कर चुकीं कामिनी कौशल ने टीवी की दुनिया में कई धारावाहिकों में भी कार्य किया है।
कामिनी के पिता प्रोफ़ेसर शिवराम कश्यप अंतर्राष्ट्रीय स्तर के जाने-माने वनस्पति शास्त्री थे और लाहौर के ही 'गवर्नमेंट कॉलेज' में पढ़ाते थे। लाहौर के मशहूर 'बॉटैनिकल गार्डन' के संस्थापक होने के साथ-साथ वे साईंस कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। दो भाई और तीन बहनों में सबसे छोटी कामिनी कौशल के बड़े भाई डॉक्टर के. एन. कश्यप बतौर सर्जन कई सालों तक पी. जी. आई. चंडीगढ़ से जुड़े रहे। उनके छोटे भाई कर्नल ए. एन. कश्यप को दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान में युद्ध बंदी बना लिया गया था और वे चार साल बाद अचानक तब वापस लौटे थे, जब परिवार की उम्मीदें लगभग समाप्त हो गई थीं।

शिक्षा

कामिनी कौशल का परिवार लाहौर के चौबुर्जी इलाक़े में रहता था। 'लेडी मैकक्लैगन हाईस्कूल' से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की थी। इसके बाद 'किन्नेयर्ड कॉलेज' से अंग्रेज़ी में बी.ए. ऑनर्स किया। इनके परिवार का माहौल काफ़ी खुला हुआ था। कामिनी कौशल बचपन से ही रेडियो नाटकों में हिस्सा लेती थी, इसके अतिरिक्त घुड़सवारी, तैराकी और साईक्लिंग भी करती थीं।

विवाह

कामिनी कौशल की बहन की असामयिक ही मृत्यु हो गई थी, जिस कारण अपनी भ‍तीजियों के भविष्य की चिंता उन्हें थी। अपनी भतीजियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए ही कामिनी कौशल ने अपने जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से विवाह कर लिया और मुंबई आ गईं। ब्रह्मस्वरूप सूद पोर्ट ट्रस्ट में काम करते थे। उन्होंने कामिनी को फिल्मों में काम करने की पूरी आज़ादी दे दी थी।

फ़िल्मी शुरुआत

उस समय फ़िल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। चेतन आनन्द कामिनी के बड़े भाई के क़रीबी दोस्त थे और उन दिनों अपनी पहली फ़िल्म 'नीचा नगर' की तैयारियों में लगे हुए थे। एक रोज़ उन्होंने रेडियो नाटक सुनकर कामिनी को अपनी फ़िल्म की मुख्य भूमिका के लिए लेना चाहा, किंतु कामिनी ने साफ इंकार कर दिया। चेतन आनंद से उनकी अगली मुलाक़ात मुंबई में हुई, जहाँ वह अपनी विवाहिता बड़ी बहन के घर आयी हुई थीं। चेतन आनंद ने एक बार फिर से उन पर अपनी फ़िल्म में काम करने के लिए दबाव डाला, जिसके लिए अपने बड़े भाई के कहने पर कामिनी कौशल को हाँ करना पड़ा। चूंकि चेतन आनंद की पत्नी उमा आनंद भी उस फ़िल्म में एक अहम भूमिका कर रही थीं, इसलिए चेतन आनंद ने कामिनी कौशल को उनके असली नाम उमा कश्यप की जगह फ़िल्मी नाम कामिनी कौशल दिया था। आगे चलकर वे इसी फ़िल्मी नाम से मशहूर हुईं।

मुम्बई आगमन

वर्ष 1946 में बनी फ़िल्म 'नीचा नगर' के संगीतकार पंडित रविशंकर थे। 'कांस फ़िल्म समारोह' में शामिल होने और पुरस्कार हासिल करने वाली ये पहली भारतीय फ़िल्म थी। कामिनी कौशल के अनुसार- "तमाम तारीफ़ें बटोरने के बावजूद शुरूआत में ये फ़िल्म बिक नहीं पाई थी। लेकिन जब आगे चलकर मेरा थोड़ा नाम हुआ और इस फ़िल्म में दो गाने डाले गए, तब कहीं ये फ़िल्म प्रदर्शित हो पाई थी। लेकिन उसके बाद जितने भी प्रस्ताव मुझे मिले, उन सभी को ठुकराकर मैं वापस लाहौर लौट गयी। उस समय तक मैंने मुश्किल से चार-पाँच ही फ़िल्में देखी होंगी, जिनमें से 'प्रभात फ़िल्म कंपनी, पुणे' की गजानन जागीरदार निर्देशित फ़िल्म 'रामशास्त्री' मुझे बेहद पसंद आयी थी। इसीलिए जब गजानन जागीरदार ने अपने प्रोडक्शन की फ़िल्म 'जेलयात्रा' के लिए मुझसे संपर्क किया तो मैं इंकार नहीं कर पायी और मुझे स्थायी रूप से मुंबई आ जाना पड़ा"।[१] कई लोग यह भी कहते हैं कि बड़ी बहन के अचानक गुज़र जाने के बाद उनकी दो छोटी बेटियों की देखभाल के लिए कामिनी कौशल को 1947 में अपने जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से शादी करनी पड़ी थी और इसीलिए वे शादी के बाद स्थायी तौर पर मुंबई आई थीं।

1947 में बनी फ़िल्म 'जेलयात्रा' में कामिनी कौशल के नायक राज कपूर थे, जिनकी बतौर निर्माता-निर्देशक पहली फ़िल्म 'आग' (1948) में भी कामिनी कौशल ने एक अहम भूमिका की। 'फ़िल्मिस्तान स्टूडियो' की फ़िल्म 'दो भाई' (1947) में कामिनी कौशल के नायक उल्हास थे तो इसी बैनर की 'शहीद' और 'नदिया के पार' (1948) में दिलीप कुमार। इन सभी फ़िल्मों में कामिनी कौशल के लिए पार्श्वगायन शमशाद बेगम, गीता दत्त, ललिता देऊलकर और सुरिंदर कौर ने किया था। 'बॉम्बे टॉकीज़' की खेमचंद प्रकाश द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म 'ज़िद्दी' (1948) में उनके लिए लता मंगेशकर ने पहली बार गाने गाए थे। बतौर गायक किशोर कुमार की भी ये पहली फ़िल्म थी, जिसमें उन्होंने माली की एक छोटी सी भूमिका भी की थी। इसके बाद अगले दस वर्षों में कामिनी कौशल ने 'नमूना', 'शबनम', 'शायर' (सभी 1949), 'आरज़ू' (1950), 'बिखरे मोती' (1951), 'पूनम' (1952), 'आंसू', 'आस', 'शहंशाह' (सभी 1953), 'बिराज बहू', 'चालीस बाबा एक चोर', 'संगम' (सभी 1954), 'आबरू' (1956), 'बड़ा भाई', 'बड़े सरकार' (दोनों 1957), 'जेलर', 'नाईट क्लब' (दोनों 1958) और 'बैंक मैनेजर' (1959) जैसी कुल मिलाकर 33 फ़िल्मों में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं।

प्रेम प्रसंग
दिलीप कुमार के साथ दो अभिनेत्रियों के प्रेम प्रसंग की बातें भी काफ़ी उड़ीं। इन अभिनेत्रियों में एक थीं 'कामिनी कौशल' और दूसरी 'मधुबाला'। 1948 और 1950 के बीच दिलीप कुमार और कामिनी कौशल ने चार फिल्मों में साथ काम किया था। इनमें 'शहीद' के अलावा अन्य तीन फिल्में 'नदिया के पार', 'शबनम', और 'आरजू' थीं। दर्शकों को इन फिल्मों के प्रणय दृश्य देखकर ही इनके बीच परस्पर प्रेम का अहसास हो जाता था। तब कामिनी कौशल और दिलीप कुमार दोनों ही फिल्मी करियर की बुनियाद डाल रहे थे। कामिनी कौशल ब्याहता थीं, जिन्होंने बहन के निधन के बाद अपने जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से विवाह किया था। इनके पति ने फ़िल्मों में काम करने की आज़ादी दी थी, लेकिन प्रेम की इजाजत भला कैसे देते। दिलीप और कामिनी ने अपने प्रेम को दबाया और वर्षों तक एक-दूसरे के सामने भी नहीं आए।

फ़िल्म निर्माण
'के आर्ट्स' के बैनर में बनी फ़िल्म 'पूनम' और 'चालीस बाबा एक चोर' का निर्माण कामिनी कौशल ने ही किया था। फ़िल्म 'बिरज बहू' के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' जीता था। फ़िल्म 'बैंक मैनेजर' के बाद उन्हें घरेलू वजहों से कुछ सालों के लिए फ़िल्मों से अलग हो जाना पड़ा। क़रीब पाँच साल बाद कामिनी कौशल अभिनेता राजकुमार के साथ निर्माता-निर्देशक त्रिलोक जेटली की फ़िल्म 'गोदान' (1963) में नज़र आयीं। इस फ़िल्म का संगीत भी पंडित रविशंकर ने तैयार किया था। ये कामिनी कौशल की बतौर नायिका आख़िरी प्रदर्शित फ़िल्म थी।

चरित्र अभिनेत्री

बतौर चरित्र अभिनेत्री कामिनी कौशल के दूसरे फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत वर्ष 1965 में बनी फ़िल्म 'शहीद' से हुई। इस फ़िल्म में वे अभिनेता मनोज कुमार द्वारा अभिनीत सरदार भगत सिंह की माँ की भूमिका में नज़र आयी थीं। फ़िल्म 'शहीद' की जबर्दस्त कामयाबी के बाद उन्होंने मनोज कुमार की लगभग सभी फ़िल्मों में उनकी माँ की भूमिका की। कामिनी कौशल बतौर चरित्र अभिनेत्री 40 से भी ज़्यादा सालों तक सक्रिय रहीं। अभिनय के इस दूसरे दौर में उन्होंने 60 से ज़्यादा फ़िल्मों, 1980 के दशक के मध्य में बने अंग्रेज़ी धारावाहिक 'ज्वैल इन द क्राऊन' और "वक़्त की रफ़्तार', 'ऊपरवाली घरवाली', 'संजीवनी', 'शन्नो की शादी' जैसे कुछ हिन्दी धारावाहिकों में अभिनय किया। 2007 में बनी 'लागा चुनरी में दाग' कामिनी कौशल की अभी तक की आख़िरी हिन्दी फ़िल्म है। 2008 में लंदन में बनी उनकी एक अंग्रेज़ी फ़िल्म 'द स्क्वायर रूट 2' भी प्रदर्शित हुई थी।

📽️
2007 लागा चुनरी में दाग 
2003 चोरी चोरी 
2000 हर दिल जो प्यार करेगा
1992 हमशक्ल 
1989 संतोष
1984 द ज्वैल इन द क्राउन दूरदर्शन धारावाहिक फ़िल्म
1983 पेंटर बाबू 
1981 खुदा कसम 
1980 टक्कर 
1979 बगुला भगत 
1978 हीरालाल पन्नालाल 
1978 आहूति 
1978 दिल और दीवार
1978 स्वर्ग नर्क 
1977 चाँदी सोना 
1976 महा चोर
1976 दस नम्बरी राधा 
1976 भँवर 
1975 दो झूठ 
1975 कैद 
1975 सन्यासी 
1974 रोटी कपड़ा और मकान 
1974 प्रेम नगर 
1973 अनहोनी 
1973 जैसे को तैसा
1972 शोर 
1972 ताँगेवाला 
1971 उपहार अनूप की माँ 
1971 बिखरे मोती 
1970 यादगार 
1970 पूरब और पश्चिम 
1970 इश्क पर ज़ोर नहीं
1969 विश्वास नीना 
1969 मेरी भाभी शांति 
1969 एक श्रीमान एक श्रीमती रमा 
1969 दो रास्ते माधवी गुप्ता 
1969 वारिस रुक्मनी 
1965 शहीद 
1954 बिरज बहू 
1953 चालीस बाबा एक चोर 
1953 आस आशा 
1952 पूनम 
1949 पारस गीता 
1949 शाइर बीना 
1949 शायर 
1948 आग निर्मला 
1948 ज़िद्दी 
1947 जेल यात्रा

कबीर बेदी

#16jan 
कबीर बेदी
🎂16 जनवरी 1946 
Lahore, Punjab, British India
पेशा
ActorTelevision presenter
कार्यकाल
1971–present
जीवनसाथी
Protima Gauri (वि॰ 1969; divorce 1974)
Susan-Humphreys (वि॰ 1980; divorce 1990)
Nikki Bedi (वि॰ 1992; divorce 2005)
Parveen Dosanjh (वि॰ 2016)
बच्चे
3, including पूजा बेदी
माता-पिता
Baba Pyare Lal Singh Bedi

कबीर बेदी का जन्म 16 जनवरी 1946 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत (अब पंजाब, पाकिस्तान में) के लाहौर में एक पंजाबी खत्री सिख परिवार में हुआ था, 

कबीर बेदी एक भारतीय फिल्म अभिनेता हैं, जो सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि यूनाइटेड स्टेट और इटली में भी सक्रिय हैं। कबीर को हिंदी सिनेमा में विलेन की भूमिका के लिए प्रमुख तौर पर जाना जाता है। वह अब तक कई फिल्मों में विलेन की भूमिका निभा चुके हैं, जिनमे खून भरी मांग, मोहन-जोदारो, साहेब बीवी गैंगस्टर प्रमुख है।

निजी जीवन 
कबीर बेदी का जन्म 16 जनवरी 1946 को एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता बाबा प्यारे लाल सिंह बेदी, एक पंजाबी सिख, एक लेखक और दार्शनिक थे। उनकी मां, फ्रेडा बेदी एक ब्रिटिश महिला थीं जो इंग्लैंड के डर्बी में पैदा हुई थी। कबीर बेदी ने शेरवुड कॉलेज, नैनीताल, उत्तराखंड में अपनी स्कूली शिक्षा और सेंट स्टीफन कॉलेज, दिल्ली से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

शादी 
कबीर बेदी ने चार शादी की हैं, जिनसे उन्हें तीन बच्चे हैं-पूजा, सिद्दार्थ और एडम। कबीर की पहली शादी प्रोतिमा बेदी से हुई थी, जोकि एक ओडिशी डांसर थी, कबीर-प्रोतिमा की बेटी पूजा बेदी हैं, जोकि एक एक कोलमनिस्ट हैं। उनके दूसरे बेटे सिद्धार्थ, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्नेगी मेलॉन विश्वविद्यालय पढाई करने गये, जहां उन्हें स्किज़ोफ्रेनिया  बीमारी हो गयी और फिर उन्होंने आत्महत्या कर ली।

प्रोतिमा से शादी के बाद कबीर बेदी और फिल्म एक्ट्रेस परवीन बॉबी के लव अफेयर की अफवाहों ने खूब सुर्खियां बटोरी। वर्ष 1990 में कबीर ने निक्की बेदी से शादी रचाई, जोकि एक टीवी रेडियो प्रेजेंटर थी। दोनों का तलाक वर्ष 2005 में हो गया इसके बाद कबीर परवीन दोसांझ को डेट करने लगे, और उन्होंने अपने 70 वें जन्मदिन पर परवीन से शादी रचाई।

करियर 
कबीर बेदी ने भारतीय थिएटर में अपना करियर शुरू किया और फिर हिंदी फिल्मों में चले गए। बेदी भारत के पहले अंतरराष्ट्रीय कलाकारों में से एक हैं जिन्होंने हिंदी फिल्मों में शुरुआत की, हॉलीवुड की फिल्मों में काम किया और यूरोप में एक बेहतरीन स्टार के रूप में उभरे।

प्रासिद्ध फ़िल्में 
हलचल, सीम, सजा, इश्क इश्क इश्क, कच्चे धागे, अशांति, खून भरी मांग, मेरा शिकार ,आखरी कसम, कुर्बान, यलगार, मोहन-जोदारो,आतंक ही आतंक क्रांति,मै हूं ना, काइट्स, शैब बीवी और गैंगस्टर आदि।

उन्होंने 60 से अधिक भारतीय फिल्मों में अभिनय किया
📽️
1971 हलचल 
1972 राखी और हथकड़ी
1973 कच्चे धागे
1974 मंजिलें और भी हैं 
माँ बहन और बीवी 
इश्क इश्क इश्क
1975 अनाड़ी विक्रम
डाकू डाकू राजू
नागिन उदय
1976 हरफन मौला

सोमवार, 18 सितंबर 2023

रूपेश

रूपेश कुमार हिन्दी फ़िल्मों के एक चरित्र अभिनेता थे, जो खलनायक की भूमिका के लिए प्रसिध्द थे। अपनी फ़िल्मी यात्रा के दौरान उन्होने 100 से अधिक फ़िल्मो मे काम किया। वे अभिनेत्री मुमताज़ के चचेरे भाई थे। 

🎂जन्म: 16 जनवरी 1946, मुम्बई
⚰️मृत्यु : 29 जनवरी 1995, मुम्बई
कुमार का जन्म मुंबई में अब्बास फरशाही के रूप में हुआ था। वह अली असगर फरशाही (पुणे शहर, मंडई के असगर सेठ) और मरियम की सबसे बड़ी संतान थे। वह पुणे के दस्तूर स्कूल के छात्र थे। बचपन से ही उन्हें अभिनय में रुचि थी। उनका परिवार पुणे में रेस्तरां और बेकरी व्यवसाय में था लेकिन उन्होंने अभिनेता बनना चुना। कुमार को प्यार से दादाश (फारसी में भाई का अर्थ) के नाम से जाना जाता था। वह अपनी चचेरी बहन अभिनेत्रियों मुमताज और मलिका के बहुत करीब थे । उनकी सबसे बड़ी बेटी की शादी दिलीप कुमार के भतीजे जाहिद खान से हुई है और उनके दो बच्चे हैं।

29 जनवरी 1995 को, एक पुरस्कार समारोह में भाग लेने के दौरान कुमार को दिल का दौरा पड़ा और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। 49 वर्ष की आयु में अस्पताल ले जाते समय एम्बुलेंस में उनकी मृत्यु हो गई।

📽️
1995 पापी देवता कुंदन 
1994 आ गले लग जा 
1993 मेरी आन
1990 पति पत्नी और तवायफ़ 
1990 वर्दी 
1989 गुरु रुपेश 
1989 ज़ुर्रत 
1989 मुज़रिम 
1989 दाता जी 
1988 ज़ख्मी औरत राज 
1988 आखिरी अदालत 
1986 जाल 
1986 इंसाफ़ की आवाज़ 
1986 पाले ख़ान 
1986 मुद्दत 
1985 निशान 
1985 हम दोनों 
1985 प्यार झुकता नहीं
1984 आशा ज्योति 
1984 राम तेरा देश 
1984 माटी माँगे खून 
1983 सौतन 
1983 बड़े दिल वाला 
1982 जानवर
1981 महफ़िल 
1980 दो प्रेमी 
1980 हम पाँच 
1980 सबूत 
1980 यारी दुश्मनी 
1979 सावन को आने दो
1979 अमर दीप 
1979 द ग्रेट गैम्बलर 
1979 मुकाबला 
1979 राधा और सीता
1978 खून की पुकार भीमा 
1978 दिल और दीवार 
1977 जय विजय 
1977 चाचा
1977 कर्म 
1977 दिलदार 
1977 कसम कानून की 
1976 शंकर दादा 
1976 नाच उठे संसार 
1975 दफ़ा 302
1975 धोती लोटा और चौपाटी 
1974 पाप और पुण्य 
1973 प्रभात 
1973 लोफर 
1972 सीता और गीता 
1971 चाहत 
1971 कल आज और कल 
1971 अंदाज़ 
1970 माँ और ममता 
1970 नया रास्ता सूरज
1970 जीवन मृत्यु 
1969 जीने की राह
1969 बंधन 
1968 सपनों का सौदागर

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

शरत चंद्र चटोपाध्या

देवदास जैसे उपन्यास के लेखक शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म 15 सितम्बर सन् 1876ई 
⚰️मृत्यु 16 जनवरी सन् 1938 ई
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय बांग्ला के अमर कथाशिल्पी और सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे। इनका जन्म 15 सितम्बर सन् 1876 ई. को हुगली ज़िले के एक देवानंदपुर गाँव में हुआ था। शरतचंद्र अपने माता-पिता की नौ संतानों में एक थे। शरतचंद्र ने अठ्ठारह साल की उम्र में बारहवीं पास की थी। शरतचंद्र ने इन्हीं दिनों 'बासा' (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई कॉलेज की पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर वे तीस रुपए मासिक के क्लर्क होकर बर्मा (वर्तमान म्यांमार) पहुँच गए। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उनके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की है। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फ़िल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी बने। इनकी कृतियाँ देवदास, चरित्रहीन और श्रीकान्त के साथ तो यह बार-बार घटित हुआ है।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय यथार्थवाद को लेकर साहित्य क्षेत्र में उतरे थे। यह लगभग बंगला साहित्य में नई चीज़ थी। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने लोकप्रिय उपन्यासों एवं कहानियों में सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया था, पिटी-पिटाई लीक से हटकर सोचने को बाध्य किया था।

शरतचंद्र की प्रतिभा उपन्यासों के साथ-साथ उनकी कहानियों में भी देखने योग्य है। उनकी कहानियों में भी उपन्यासों की तरह मध्यवर्गीय समाज का यथार्थ चित्र अंकित है। शरतचंद्र प्रेम कुशल के चितेरे थे। शरतचंद्र की कहानियों में प्रेम एवं स्त्री-पुरुष संबंधों का सशक्त चित्रण हुआ है। इनकी कुछ कहानियाँ कला की दृष्टि से बहुत ही मार्मिक हैं। ये कहानियाँ शरत के हृदय की सम्पूर्ण भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने कहानियाँ अपने बालपन के संस्मरण से और अपने संपर्क में आये मित्र व अन्य जन के जीवन से उठाई हैं। ये कहानियाँ जैसे हमारे जीवन का एक हिस्सा है ऐसा प्रतीत होता है।

महात्मा गांधी ने कहा था- "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।" विश्वविख्यात बांग्ला कथाशिल्पी शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने गांधी जी के उपरोक्त कथन को अपने साहित्य में उतारा था। उन्होंने पतिता, कुलटा, पीड़ित दहबी-कुचली और प्रताड़ित नारी की पीड़ा को अपनी रचनाओं में स्वर दिया

शरतचंद्र के मन में नारियों के प्रति बहुत सम्मान था वे नारी हृदय के सच्चे पारख़ी थे। उनकी कहानियों में स्त्री के रहस्यमय चरित्र, उसकी कोमल भावनाओं, दमित इच्छाओं, अपूर्ण आशाओं, अतृप्त आकांक्षाओं, उसके छोटे-छोटे सपनों, छोटी-बड़ी मन की उलझनों और उसकी महत्त्वकांक्षाओं का जैसा सूक्ष्म, सच्चा और मनोवैज्ञानिक चित्रण-विश्लेषण हुआ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है

शरतचंद्र का सम्पूर्ण साहित्य नारी के उत्थान से पतन और पतन से उत्थान की करुण कथाओं से भरा पड़ा है। शरतचंद्र अपनी कहानियों में केवल पीडित-प्रताड़ित नारी की पतनगाथा नहीं गाते, सिर्फ़ उसके पतिता और कुलटा हो जाने की कथा नहीं कहते, उसके स्नेह, त्याग, बलिदान ममता और प्रेम की पावन-कथा भी सुनाते हैं। शरतचंद्र की कहानियों में नारी के नीचतम और महानतम दोनों रूपों के एक साथ दर्शन होते हैं। जब शरतचंद्र नारी के अधोपतन की कथा कहते-कहते उसी नारी के उदात्त और उज्ज्वल चरित्र को उद्घाटित करते हैं, तो पाठक सन्न रह जाता है। उसने मन में यह प्रश्न कहीं गहरे घर कर जाता है कि एक ही स्त्री के दो रूप कैसे हो सकते हैं और वह यह नहीं समझ पाता कि आख़िर वह नारी के किस रूप को स्वीकार करे। शरतचंद्र अपनी कहानियों में नारी हृदय की गांठों और गुत्थियों को जिस कुशलता से खोलते हैं, उनकी रचनाओं में नारी का जो बहुरूप सामने आता है, वैसी झलक विश्व-साहित्य में कहीं नहीं मिलती

शरतचंद्र ने अनेक उपन्यास लिखे हैं जिनमें पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, अभागिनी का स्वर्ग, श्रीकांत, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, अनुपमा का प्रेम, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, ब्राह्मण की लड़की, सती, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। इन्होंने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर 'पथेर दावी' उपन्यास लिखा था। कई भारतीय भाषाओं में शरत के उपन्यासों के अनुवाद हुए हैं। शरतचंद्र के कुछ उपन्यासों पर आधारित हिन्दी फ़िल्में भी कई बार बनी हैं। 1974 में इनके उपन्यास 'चरित्रहीन' पर आधारित फ़िल्म बनी थी। उसके बाद देवदास को आधार बनाकर देवदास फ़िल्म का निर्माण तीन बार हो चुका है। पहली देवदास (1936) कुन्दन लाल सहगल द्वारा अभिनीत, दूसरी देवदास (1955) दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला द्वारा अभिनीत तथा तीसरी देवदास (2002) शाहरुख़ ख़ान, माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या राय द्वारा अभिनीत है। इसके अतिरिक्त 1974 में चरित्रहीन, परिणीता 1953 और 2005 में भी बनी थी, बड़ी दीदी (1969) तथा मँझली बहन, आदि पर भी चलचित्रों के निर्माण हुए हैं।

शरतचंद्र बाबू ने मनुष्य को अपने विपुल लेखन के माध्यम से उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित परम्पराओं को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। शरत बाबू ने समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की विलख-चीख और आर्तनाद को परख़ा और यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से इस षड्यन्त्र के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक 'आम सहमति' पर रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्रण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्दधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी थी। शरत का प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में विरल योगदान है। शरत-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है

प्रसिद्ध उपन्यासकार शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की मृत्यु 16 जनवरी सन् 1938 ई. को हुई थी। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय को यह गौरव हासिल है कि उनकी रचनाएँ हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में आज भी चाव से पढ़ी जाती हैं। लोकप्रियता के मामले में बंकिम चंद्र चटर्जी और शरतचंद्र रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी आगे हैं।

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