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मंगलवार, 19 दिसंबर 2023

मानव कोल

#19dic

मानव कोल
19 दिसंबर 1976 (आयु 46)
बारामूला, जम्मू और कश्मीर, भारत
व्यवसायों
थिएटर निर्देशक
नाटककार
लेखक,अभिनेता ,फिल्म निर्माता,

उल्लेखनीय कार्य
शक्कर के पांच दाने (चीनी के पांच दाने)
नेल पॉलिश
तुम्हारी सुलु
इल्हाम (ज्ञानोदय)
पार्क
पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड (एमईटीए), 2006
एचटी मुंबई का सबसे स्टाइलिश थिएटर पर्सनैलिटी अवार्ड, 2017
भारत के काश्मीर में, एक कश्मीरी पंडित परिवार में। बाद में उनका परिवार होशंगाबाद, मध्य प्रदेश चला गया, जहां उनका पालन-पोषण हुआ। .

वह अपनी किशोरावस्था के अंत में एक प्रतिस्पर्धी तैराक थे और उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लिया था। उन्होंने तैराकी में 14 राष्ट्रीय पदक जीते हैं
2012 में, कौल ने हंसा से फिल्म निर्देशक के रूप में डेब्यू किया, जिसके लिए उन्होंने पटकथा लिखी. उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय करियर की शुरुआत फंतासी फिल्म जजंतरम ममंतरम से की। 2003, और गुजरात-आधारित हिंदी नाटक Kai में एक दक्षिणपंथी राजनेता के रूप में उनके प्रदर्शन के लिए सराहना की गई। 
कौल एक लेखक हैं जो अलगाव, उदासीनता, जड़हीनता आदि विषयों पर लिखते हैं।उनकी कुछ उल्लेखनीय पुस्तकों में शामिल हैं उनकी खोई हुई मातृभूमि, कश्मीर में वापस लौटने की उनकी यात्रा का वर्णन करता है।रूह कौल'हाल ही में प्रकाशित उपन्यास चलता फिरता, अंतिमा, बहुत दूर कितना दूर होता है, ठीक तुम्हारे पीछे।

उनकी यह सभी पुस्तकें हिन्दी में मिल जाती हैं।

ठीक तुम्हारे पीछे (2016): लघु कहानी संग्रह।
प्रेम कबूतर (2017): लघु कहानी संग्रह।अंग्रेजी अनुवाद:  (2019)ए नाइट इन द हिल्स
तुम्हारे बारे में. अंग्रेजी अनुवाद: मेरी खिड़की पर एक पक्षी (2023).
बहुत दूर, कितना दूर होता है: यात्रा वृतांत
चलता फिरता प्रेत
अंतिमा: उपन्यास
करता ने कर्म से
शर्ट का तीसरा बटन (2022)
रूह (2022): यात्रा वृतांत। अंग्रेजी अनुवाद: रूह (2023).
तितली (2023): उपन्यास
पतझड़ (2023): उपन्यास
📽️
2003 जजन्तरम् ममन्तरम्
2004 साचच्य आत घरात
2006 सातत्य
2007 1971
2010 दायें या बायें 
2010मैं हूँ
2013 काई पो चे!
2014 शहर की रोशनी
2016 वज़ीर 
2016 गंगा जल
2016 लाल रंग -
2016 एक घोटाला

माही गिल

Mahie Gill
Born as Rimpy Kaur Gill
🎂Date of Birth
 19 December 1975
🎂19 दिसंबर 1975 चण्डीगढ़
भाई: नवनित गिल, शिवेंदर गिल

माही गिल भारतीय अभिनेत्री है। फलस्वरूप, साहेब, बीवी और गैंगस्टर, साथ ही इसके सीक्वल, साहेब, बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स में यौन रूप से कुंठित पत्नी माधवी देवी को चित्रित करने के बाद उन्हें पहचान मिली।
गिल का जन्म चंडीगढ़ पंजाबी जाट में हुआ था सिख परिवार 19 दिसंबर 1975 को उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की 1998 में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से थिएटर में मास्टर डिग्री ली
गिल को पहला ब्रेक पंजाबी आधारित बॉलीवुड फिल्म हवाएं और थिएटर के साथ-साथ उन्होंने कुछ पंजाबी फिल्में भी की हैं। . अनुराग ने पहली बार उन्हें एक पार्टी में देखा और तुरंत उन्हें फिल्म देव डी में पारो का किरदार निभाने के लिए फाइनल कर लिया।उन्होंने राम गोपाल वर्मा की नॉट ए लव स्टोरी में काम किया, जो पर आधारित थी 2008 का नीरज ग्रोवर मर्डर केस।उन्होंने साहेब, बीवी और गैंगस्टर में भी काम किया था। जिम्मी शेरगिल और रणदीप हुडा के साथ, जो था 30 सितंबर 2011 को रिलीज़ हुई। इस फ़िल्म ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार में नामांकन दिलाया।

गिल पान सिंह तोमर में इरफान खान के साथ नजर आए . यह एक एथलीट की सच्ची कहानी है जो डकैत बन गया। इसमें उन्होंने शीर्षक किरदार की पत्नी की भूमिका निभाई। गिल ने अपूर्वा लाखिया' की फिल्म तूफान से डेब्यू किया था। , एक साथ हिंदी संस्करण, ज़ंजीर के साथ शूट किया गया। उन्होंने अपना पहला आइटम नंबर तिग्मांशु धूलिया' एस फिल्म बुलेट राजा.

माही गिल अगली बार आगामी वेब सीरीज '1962 द वॉर इन द हिल्स'' में नजर आएंगी, जिसका निर्देशन महेश मांजरेकर. श्रृंखला में अभय देओल, सुमीत व्यास,आकाश ठोसर.
📽️
2021 जोरा: दूसरा अध्याय पंजाबी
2020 दुर्गामती सताक्षी गांगुली 
दूरदर्शन
2019 ठाकुरगंज का परिवार शरबती हिंदी 
पोशम पा
2018 प्रसिद्ध हिंदी 
साहेब, बीवी और गैंगस्टर 3
2017 शादी की सालगिरह
2016 आतिशबाजी इश्क
2015 अरे भाई
2014 ट्रैफिक जाम में बुद्ध
और शरीफ
2013 
ज़ंजीर मोना 
बुलेट राजा
2012 पान सिंह तोमर हिंदी 
कैरी ऑन जट्टा माही कौर पंजाबी 
दबंग 2

वेद पाल वर्मा

वेदपाल का कल्पनाशील पार्श्वसंगीत : ‘ओ मेरे हमराही क्यूं तेरा मन घबराए’...|रसरंग,Rasrang - Dainik Bhaskar
'ओ बेवफ़ा' मूवी में हेमलता के गाए गीत 'अब वफ़ा का नाम न ले कोई' का संगीत निर्देश वेदपाल ने ही किया था।

आज अधिकांश लोग वेदपाल वर्मा का नाम भी नहीं जानते होंगे, लेकिन एक ज़माना था जब उन्होंने फ़िल्म संगीत को कुछ दिलकश धुनें दी थीं। सिरसा (हरियाणा) के आर्यसमाजी परिवार में जन्मे वेदपाल वर्मा को बचपन में पिता अकसर भजन सुनाने मंदिर में ले जाते थे। संगीत के मूल तत्व उन्हें यहीं से प्राप्त हुए। बाद में संगीत की शिक्षा ली, कुछ दिनों तक मैकेनिक भी रहे, फिर ऑल इंडिया रेडियो में संगीतकार बने और मोतीराम जी तथा जीतूराम जी जैसे संगीतज्ञों से सीखते भी रहे। उनके काम से प्रभावित होकर एस.एस. ओबेराॅय और गीतकार मधुकर ने उन्हें बम्बई में काम का न्योता दिया। छठे दशक में अन्य कई संगीतकारों की तरह वे बम्बई गायक बनने चले गए। संघर्ष करते रहे, पर उन्हें सही अवसर नहीं मिला। तभी एक बार गीतकार रमेश शास्त्री ने निर्माता राधेश्याम झुनझुनवाला और निर्देशक सत्येन बोस की 'परिचय' (1954) में शैलेष के साथ संगीतकार के रूप में काम दिलवाया। इस फ़िल्म में वेदपाल ने 'मेरा घोड़ा बड़ा है निगोड़ा' (किशोर), 'देखा जो बालमा ने मेरी तरफ' (शमशाद) और 'मैं जनम जनम से हूं दुखिया' (आशा) की धुनें बनाई थीं पर गीत खास लोकप्रिय नहीं हुए। वैसे इससे पहले वेदपाल ने 'आई फिर से बहार' नाम की एक फ़िल्म में संगीत दिया था। ज्यादा गीत फ़िल्म के तमिल वर्ज़न से ही डब थे और फ़िल्म रिलीज़ न हो सकी थी। वैसे इस फ़िल्म में भी लता और साथियों के स्वर में 'शर्मीली शाम है' एक अच्छी मेलोडी थी, जिसमें कोरस का सुंदर प्रयोग किया गया था। 'परिचय' की असफलता के बाद फ़िल्म 'सारंग' भी रिलीज़ नहीं हुई। वेदपाल ने बांग्ला फ़िल्म 'साॅरी मैडम' (1962) में मुकेश से एक बांग्ला गीत 'साॅरी मैडम साॅरी सिस्टर' इसी दरमियान गवाया और पंजाबी फ़िल्म 'छोरियां दी टोली' में भी संगीत दिया।

वर्षों खोए रहने के उपरान्त नानाभाई भट्ट निर्देशित 'भूतनाथ' (1963) में उन्हें फिर मौका मिला। यह फ़िल्म कुछ चली भी थी, पर हम इसे याद करेंगे लता के दो अत्यंत मेलोडियस नगमों के लिए। वैसे तो उषा मंगेशकर का गाया 'मेरे महबूब सुन' भी हिट रहा था, पर लता के 'तुम न आए सनम शमा जलती रही' का पहाड़ी आधारित अनुकम्पन और 'भूले से कर लिया प्यार, हो गई नादानी' की झूमती धुन आज भी प्रभावित किए बिना नहीं रहती। 'संत तुकाराम' (1965) के गीत भी कुछ चले थे विशेषकर 'राम जिसे तारे तो कौन उसे मारे' (मन्ना डे, साथी), 'अब तो बना दे अवगुण मेरे' (रफ़ी), 'ओ भोले जोगी सुन मेरी पायलिया' (मन्ना डे, साथी)। 'संत तुकाराम' में वेदपाल ने बहुत कल्पनाशील पार्श्वसंगीत दिया था तथा जहां भी आवश्यकता देखी, वहां स्थानीय वाद्ययंत्रों का भी बखूबी इस्तेमाल किया। 'गुनहगार' (1967) में भी वेदपाल ने अच्छा ही संगीत दिया था, भले ही आधुनिक आॅर्केस्ट्रा वाला 'नई-नई हैं मंज़िलें नए नए हैं रास्ते' (महेन्द्र, उषा मंगेशकर) या 'शाम ढली, शमा जली, झूम उठी जिं़दगी' (आशा) जैसे गीत न चले।

फ़िल्मों में अच्छे अवसर न मिलने से वेदपाल गै़रफ़िल्मी गीतों की ओर भी मुड़े और एचएमवी के लिए भी उन्होंने कुछ गीत रेकाॅर्ड कराए जो रेडियो पर बजे भी। वेदपाल ने ढेर सारे जिंगल, वृत्तचित्रों और नाटकों में भी संगीत दिया। उनका 'निरमा' का विज्ञापन तो बेहद मशहूर हुआ। वेदपाल को गीत लिखने का भी शौक था और कल्याणजी-आनंदजी संगीतबद्ध 'सुनहरी नागिन' में उनका लिखा भी एक गीत था 'लेते लेते तेरा नाम मैं तो हो गई रे बदनाम'। 'माया सुंदरी' (1967) में संगीत देने के अलावा उन्होंने गीत लेखन में भी सहयोग किया था, हालांकि नाम सिर्फ सरस्वती कुमार 'दीपक' का ही रहा। हरमिंदर सिंह 'हमराज़' के हिंदी फ़िल्म गीतकोश, खण्ड 4 के अनुसार मूल तमिल से डब की गई इस फ़िल्म की डबिंग कलकत्ता में हुई थी और शायद इसी कारण 'किरणों की डोरी चांद का पलना', 'आज मिले हैं दो प्यार भरे दिल' जैसे सुंदर, नाजुक गीतों को आरती मुखर्जी, मानवेंद्र मुखर्जी जैसे बंगाली गायक-गायिकाओं से वेदपाल ने गवाया। इसी दौर में वेदपाल वर्मा ने कुछ तमिल और मलयालम फ़िल्मों में भी संगीत दिया।

वेदपाल मानते थे कि फ़िल्मों में संगीतकार को निर्बाध स्वतंत्रता नहीं रहती - उसे कहानी, चरित्र और निर्माता-निर्देशकों की मांग का बहुत ध्यान रखना पड़ता है। वेदपाल का दुर्भाग्य यह था कि उनको मिलने वाली अधिकांश फिल्में बाॅक्स आॅफिस पर इतनी असफल थीं कि उसके गीत सुने ही नहीं जा सके, जैसे 'भीमा मेरा हाथी' (1973) के स्वलिखित 'हजार दिल में हों तो ऐसे निकले वो अरमां' (मुकेश, हेमलता) और 'नन्ही, मुन्नी मेरी कलियन की अंखियन में मीठी नींद सजा ले' (मन्ना डे), 'हम जंगली हैं' (1973) का भी खुद का ही लिखा हुआ 'बातों बातों में मेरे दिल को चुराया तुम ने' (रफ़ी, उषा मंगेशकर), 'कोरा बदन' (1974) का 'झुरमुट बोले' (मनहर, कृष्णा बोस), 'वफ़ादार' (1976) का मुकेश का दुर्लभ गीत 'रोने को तो रात पड़ी है' एवं इसी फ़िल्म के 'ऐ मेरी जाने वफ़ा ऐ मेरी जाने हयात' (महेंद्र, कृष्णा बोस) और 'कभी दिल और कभी शमा जलकर रोए' (उषा मंगेशकर)। 1970 की भारतीय और ऐफ्रो कैरीबियन मजदूरों को लेकर बनाई गई फ़िल्म 'द राइट एंद द रांग' में वेदपाल वर्मा ने मुकेश से एक लाज़वाब गीत गवाया था - 'ओ मेरे हमराही क्यूं तेरा मन घबराए'। यह आज भी मुकेश के खूबसूरत गीतों में स्थान रखता है।

वेदपाल को पहली बार एक बड़े निर्माता के साथ काम करने का अवसर मिला 1980 में जब सावन कुमार ने अपनी पत्नी उषा खन्ना से सम्भवतः मनमुटाव के कारण 'ओ बेवफ़ा' का संगीत उन्हें सौंपा। 'ओ बेवफ़ा' में कहानी की सिचुएशन के हिसाब से धुन और वाद्य-संयोजन क़ाबिलेतारीफ़ था तथा धुनों में एक ताज़गी भी थी, जो शोरगुल के आ चुके दौर में और भी आकर्षक लगती है, विशेषकर हेमलता के गाए पीलू पर आधारित 'भरी बरसात में दिल जलाया' तथा 'अब वफ़ा का नाम न ले कोई' में। वहीं 'प्रीत न करियो मन ने कहा था' (हेमलता) और 'मेरा दिल किसने लिया' (हेमलता, सुरेश वाडकर) में लोक धुनों और खय्याम की शैली का प्रभाव साफ नज़र आता है। 'ज़ख्मी दिल' (1984) तथा 'गर्ल फ्राॅम इंडिया' जैसी फ़िल्मों से वेदपाल को कोई विशेष फ़ायदा नहीं हुआ, पर सावन कुमार ने पुनः उन्हें 'सौतन की बेटी' (1988) में लिया। गीतों को 'सौतन' की तुलना में तो कुछ भी लोकप्रियता नहीं मिली, पर यह निर्विवाद है कि इस फ़िल्म में वेदपाल ने लता से 'भूतनाथ' की तरह फिर दो बड़े मीठे मेलोडी प्रधान गीत गवाए थे - 'हम भूल गए रे हर बात' और 'कहां थे आप'। 'मेरा पति मेरी ज़िंदगी' (1993) और 'पिया का घर' (1997) में भी वेदपाल का संगीत था। पर कुल मिलाकर वेदपाल कामयाब संगीतकारों की श्रेणी में नहीं ही आ पाए। गोरेगांव के प्रसाद शाॅपिंग सेंटर के तीसरे माले के एक छोटे-से कमरे में वे रहते थे और अंततः 19 दिसम्बर, 1996 को अपनी गुमनाम-सी ज़िंदगी की तरह ही गुमनामी में उनका निधन हो गया।

सोमवार, 18 दिसंबर 2023

ओमप्रकाश (बक्शी)

ओम प्रकाश बक्शी
🎂जन्म 19 दिसंबर, 1919
जन्म भूमि जम्मू
⚰️मृत्यु 21 फ़रवरी, 1998
मृत्यु स्थान मुम्बई
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'पड़ोसन', 'जूली', 'दस लाख', 'चुपके-चुपके', 'बैराग', 'शराबी', 'नमक हलाल', 'प्यार किए जा', 'खानदान', 'चौकीदार', 'लावारिस', 'आंधी', 'लोफर', 'ज़ंजीर' आदि।
प्रसिद्धि चरित्र अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी फ़िल्म 'नमक हलाल' का दद्दू और 'शराबी' का मुंशीलाल बनकर ओमप्रकाश ने प्रत्येक भारतीय के दिल में जगह बनाई।
 🎂जन्म: 19 दिसंबर, 1919 जम्मू; 
⚰️मृत्यु: 21 फ़रवरी, 1998 मुम्बई) भारतीय सिनेमा जगत में प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता थे। ओमप्रकाश ने लगभग 350 फ़िल्मों में काम किया। उनकी प्रमुख फ़िल्मों में 'पड़ोसन', 'जूली', 'दस लाख', 'चुपके-चुपके', 'बैराग', 'शराबी', 'नमक हलाल', 'प्यार किए जा', 'खानदान', 'चौकीदार', 'लावारिस', 'आंधी', 'लोफर', 'ज़ंजीर' आदि शामिल हैं। उनकी अंतिम फ़िल्म 'नौकर बीवी का' थी। महानायक अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों में वे ख़ासे सराहे गए। 'नमक हलाल' का दद्दू और 'शराबी' का मुंशीलाल बनकर ओमप्रकाश ने प्रत्येक भारतीय के दिल में जगह बनाई।
उनकी शिक्षा-दीक्षा लाहौर में हुई। उनमें कला के प्रति रुचि शुरू से थी। लगभग 12 वर्ष की आयु में उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। 1937 में ओमप्रकाश ने 'ऑल इंडिया रेडियो सीलोन' में 25 रुपये वेतन में नौकरी की थी। रेडियो पर उनका 'फतेहदीन' कार्यक्रम बहुत पसंद किया गया।

अभिनय का प्रारम्भ

उन दिनों ओम प्रकाश 'अविभाजित भारत' के 'लाहौर रेडियो स्टेशन' पर स्थायी कलाकार के रूप में कार्यरत थे, और उनकी आवाज़ के जादू से सारा ज़माना परिचित था। द्वितीय महायुद्ध के समय की बात है। ओमप्रकाश को रावलपिण्डी से लाहौर तक का सफर करना था। फ़ौज़ी जवानों से ठसाठस भरी रेलगाडि़यां, और उस भीड़ के बावजूद यात्रा की अनिवार्यता।

तीसरे दर्जे़ का रेल-टिकट था ओमप्रकाश के पास, और घुसने की जगह थी मात्र पहले दर्जे़ में – और वह भी तीन-चार अंगरेज़ सैनिकों के मध्य। मजबूरन उसी डिब्बे में घुसकर जगह बनाने की कोशिश कर डाली ओमजी ने, और अपने उन प्रयत्नों में उनको किंचित सफलता भी मिली।  सैनिक अधिकारी अपने अनजाने,  अनचीन्हें लहज़े में गिटपिट किये जा रहे थे उस समय, और ओमप्रकाश उनकी उस टामी अंगरेज़ी से सर्वथा अनभिज्ञ यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखि़र किस तरह वह उन लोगों की बातचीत में  कोई हिस्सा लें।

तभी उनके दिमाग़ में आया – क्यों न उन लोगों के सामने गूँगे का अभिनय कर डाला जाये? इज़्ज़त तो कम से कम बच ही जायेगी ऐसा करने से। और क़िस्सा -कोताह यह कि खानपान, सुरासेवन आदि के बाद फ़ौज़ी अफ़सरों ने जब ओमप्रकाश से पूछा कि क्या वह जन्म से ही गूंगे हैं तो ओमजी ने इस खबसूरती से अपना सर हिलाया जिससे न यह मालूम हो सकता था कि वह गूंगे हैं और न यही कि वह गूंगे नहीं हैं। सैनिक अधिकारियों के मन में उनके प्रति सहानुभूति जगी. उन्होंने ओमजी को न सिफऱ् भरपूर खिलाया-पिलाया बलिक लेटने के लिये एक पूरी बर्थ भी उनके हवाले कर दी. सुबह होने पर अँग्रेजी ढंग का ब्रेकफ़ास्ट भी उनको मिला और ख़ूब मज़े के साथ उनकी वह यात्रा सम्पन्न हो गयी।

लेकिन लाहौर पहुंचने पर इस अभिनय का पटाक्षेप जब हुआ तो वह सैनिक अधिकारी भी हंसी से सराबोर हो उठे जिन्होंने अपंग समझ कर ओमप्रकाश की इतनी खातिरबाजी की थी। हुआ यह कि जो व्यक्ति ओमजी को लेने स्टेशन आया था उसने पूछ ही लिया – 'कहो बर्खुरदार, सफ़र कैसा कटा?'

सैनिक अधिकारी घूर घूर कर ओमजी की ओर देखते जा रहे थे, और ओम थे कि उनकी ज़बान ही सिमटती जा रही थी। तभी, अपने आत्मविश्वास का संचय करते हुए ओमप्रकाश बोल उठे – 'माफ़ कीजिएगा, बिरादरान, आप लोगों की यह लंगड़ी अँग्रेजी मेरे भेजे के अन्दर नहीं घुस पा रही थी, इसीलिये मुझे गूंगे का अभिनय करना पड़ गया। वैसे यह न समझ लीजिएगा कि अँग्रेजी ज़बान मुझे नहीं आती, मैं भी लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ चुका हूं और उनकी इस बात को सुनते ही उपस्थित लोगों के मध्य हंसी का जो दौर-दौरा शुरू हुआ था उसकी समाप्ति ओमजी के स्टेशन छोड़ने के बाद ही हो पायी।

फ़िल्मी सफ़र
हिन्दी फ़िल्म जगत में ओमप्रकाश का प्रवेश फ़िल्मी अंदाज़में हुआ। वह अपने एक मित्र के यहां शादी में गए हुए थे, जहां पर 'दलसुख पंचोली' ने उन्हें देखा और तार भेजकर उन्हें लाहौर बुलवाया। दलसुख पंचोली ने फ़िल्म ‘दासी’(1950) के लिए ओम प्रकाश को 80 रुपये वेतन पर अनुबंधित कर लिया। यह ओमप्रकाश की पहली बोलती फ़िल्म थीं। संगीतकार सी. रामचंद्र से ओमप्रकाश की अच्छी दोस्ती थी। इन दोनों ने मिलकर ‘दुनिया गोल है’, ‘झंकार’, ‘लकीरे’ आदि फ़िल्मों का निर्माण किया। उसके बाद ओमप्रकाश ने खुद की फ़िल्म कंपनी बनाई और ‘भैयाजी’, ‘गेट वे ऑफ इंडिया’, ‘चाचा ज़िदांबाद’, ‘संजोग’ आदि फ़िल्मों का निर्माण इस कम्पनी के अंतर्गत किया।

हास्य अभिनेता

क्लासिक फ़िल्म 'प्यार किये जा' का वह दृश्य लें जब महमूद और ओम प्रकाश के बीच एक हॉरर फ़िल्म की कहानी सुनाई जाती है। ओम प्रकाश यहाँ निश्चित रूप से एक 'फॉइल' की भूमिका अदा कर रहे हैं और उनके शानदार प्रदर्शन से ही महमूद का कहानी सुनाना जीवंत हो पाता है। ओम प्रकाश की भूमिका यहाँ (बिना किसी संवादों के) एकदम निष्क्रिय सी है लेकिन उनकी प्रतिक्रियाओं की बदौलत ही दृश्य उस चरम तक पहुँच पाता है जब कैमरे के फ़्रेम से परे किसी तीसरी पार्टी की आवाज़ हस्तक्षेप करती है और दोनों एक आकस्मिक नीले रंग की रोशनी से सराबोर हो डर जाते हैं। यहाँ इन दोनों के बीच में एक शानदार लेन-देन है जो इनकी भूमिकाओं को और धार प्रदान करता है। जितना अधिक ओमप्रकाश डरते हैं अर्थात् जितना ज्यादा वे पिटे हुए आदमी का अभिनय करते हैं उतना ही दृश्य में मज़ा आता है। इसी सिलसिले में यह भी प्रचलित है कि जब महमूद को इस फ़िल्म में उनके प्रदर्शन के लिए पुरस्कार दिया गया, तब न सिर्फ़ उन्होंने अपने 'फॉइल' ओम प्रकाश को इसका पूरा श्रेय दिया बल्कि मंच से दर्शकों के बीच जाकर उनके पैर भी छुए। एक हास्य अभिनेता हमेशा अभिनय में सहयोगी के महत्व को समझता है और इसे विनम्रता से स्वीकार करता है।

आख़िरी समय
जिस खुले दिल से ओमप्रकाश ने दुनियादारी निभाई थीं इसके ठीक विपरित उनके अंतिम दिन गुजरे। उन्हीं दिनों ओमप्रकाश ने अपने साक्षात्कार में कहा था- 'सभी साथी एक एक करके चले गए। आगा, मुकरी, गोप, मोहनचोटी, कन्हैयालाल, मदनपुरी, केश्टो मुकर्जी आदि चले गए। बड़ा भाई बख्शीजंग बहादुर, छोटा भाई पाछी, बहनोई लालाजी, पत्नी प्रभा सभी तो चले गए...लाहौर में पैदा हुआ. बचपन में चंचल था। रामलीला प्ले में सीता बना करता था। क्लासिकल संगीत की खुजली थीं-10 साल सीखा। रेडियो सीलोन में खुद के लिखे प्रोग्राम पेश किया करता था। मेरा प्रोग्राम बहुत पापुलर हुआ। लोग मुझे देखते तो फतेहदीन नाम से पुकारते थे। असली नाम पर यह नाम हावी होने लगा।

रोचक तथ्य
‘मैंने कई फ़ाकापरस्ती के दिन भी देखे हैं, ऐसी भी हालत आई जब मैं तीन दिन तक भूखा रहा। मुझे याद है इसी हालात में दादर खुदादाद पर खडा था। भूख के मारे मुझे चक्कर से आने लगे ऐसा लगा कि अभी मैं गिर ही पडूंगा। क़रीब की एक होटल में दाखिल हुआ। बढिया खाना खाकर और लस्सी पीकर बाहर जाने लगा तो मुझे पकड लिया गया। मैनेजर को अपनी मजबूरी बता दी और 16 रुपयों का बिल फिर कभी देने का वादा किया। मैनेजर को तरस आ गया वह मान गया। एक दिन 'जयंत देसाई' ने मुझे काम पर रख लिया और 5,000 रुपये दिए। मैंने इतनी बडी रकम पहली बार देखी थीं। सबसे पहले होटल वाले का बिल चुकाया था और 100 पैकेट सिगरेट के ख़रीद लिए।’ -ओम प्रकाश
बहुत कम लोग जानते हैं कि ओमप्रकाश ने ‘कन्हैया’ फ़िल्म का निर्माण भी किया था, जिसमें राज कपूर और नूतन की मुख्य भूमिका थी।
कई रंगारंग व्यक्ति उनके जीवन में आए। इनमें चार्ली चैपलिन, पर्ल एस.बक, सामरसेट मॉम, फ्रेंक काप्रा, जवाहरलाल नेहरू जी भी शामिल हैं।
अओमप्रकाश के समय में हिंदी फ़िल्मों के बडे सितारे मोतीलाल, अशोककुमार, और पृथ्वीराज हुआ करते थे। अपने समय में लोग उन्हें ‘डायनेमो’ कहा करते थे।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...