शिव जी कहते हैं इसके उपरान्त उसे स्थान में एक आठ का बड़ा रख प्रादुर्भूत हुआ जिसकी अनेक रतनी किसी क्रांति से सब दिशाएं चित्र विचित्र हो गई थी
नदी के किनारे के पंख में जिसके चारों चक्र स्थित थी मोतियों की झाला और सैकड़ों से क्षेत्र से युक्त ली
की खुमारी हुए चार गोलों से शोभित मोतियों की झालर और चंदू भी शोभायमान जिसके ध्वजा में वर्ष का था जिसके निकट एक वक्त नहीं चाहती थी जिस पर रेशम की गड्डियां बिछाई थी
पाँच भूतों के अधिष्ठाता देवताओं से शोभित गई पारिजात वृक्ष के फूलों की मालाओं से कच्चे तेल होगा न रखना भी थे
उत्पन्न हुई कटोरी के मधुबाला का और अगर धूप खिल उठे हुए घर से बोरों को आकर्षित करने वाला प्रलय काल के समान समुदाय बाद अनेक प्रकार के बाजू से युक्त ही बिना बिंदु मधुर बातचीत और किन्नर गुणों से युक्त
वह रस था
इस प्रकार की शेष राशि को देखकर वृषभ से उत्तर शिवजी पार्वती सहित वस्त्र की शैय्या वाली उस रस के स्थान में प्रविष्ट हुई उसमें देवांगना शेष चमार और बेसन के चलाने से ही शिवजी को प्रसन्न कर भी लगी
शब्दार्थ बाद कंकालों की धोनी और निर्मल मंजूरी के शव कहीं जीना वीरों के ही से मानो लोग को पूर्ण रही थी
तोतों के वाक्य की मधुरता और फिर कबूतरों के शब्द से जगह शब्द गायब हो गया
प्रसन्नता रहेगी अपने फन उठाए हुए शिवजी के भूषण रोग शरीर में लिखती सड़कों को देख कर करोड़ों महिलाओं और पुरुषों को अपनी शहर का दिखाते हुए नजर अधिकार भी लगी
जी प्रणाम करते हुए राम को उठाकर प्रसन्न मन से ही रह गई आई और भी डिग्री कमंडल के जल से सावधान को आचमन कर रामचंद्र को आचमन आया और अपनी गोद में बिठाया इसके उपरांत रामचंद्र को
दिव्य धनुष से अक्षर रखकर और माह पाशुपतास्त्र प्रदान किया और रामचंद्र ने यह मेरा उग्र जगत का नाश करने वाला है इस कारण सामान्य युद्ध में इसका प्रयोग नहीं करना इसका निवारण
करने वाला त्रिलोकी में दूसरा नहीं है इस कारण ही रहा प्राण संकट उपस्थित होने पर ही इसका प्रयोग करना उचित है
दूसरे समय इसका प्रयोग करने से जगत का नाश जाता है
देवताओं में श्रेष्ठ लोकपालों को बुला प्रसन्न मन होली रामचंद्र को सबको अपने अपने अस्त्र प्रधान करून यह रामचंद्र उन राष्ट्रों से ही राहुल को हुआ रहेगी
कारण कि मैंने उसको व भैया है किन्तु देवताओं भी हमारे था इस कारण तुम सब युद्ध में भयंकर कम करने वाले वाहनों का शरीर धारण करके इनकी सहायता करो
इससे तुम सुखी हो कि शिव जी की आज्ञा को सिर पर धारण कर परिणाम का हाथ जरूर देवताओं ने शिव जी के चरणों में प्रणाम कर अपने अपने श्री श्रीराम खुद ही विषयों में नारायण
अहमदाबाद ब्रह्मा ने मोहम्मद उक्त अवधि में आग्नेयास्त्र दिया यमराज ने या में विकृति में मोहनदास वरुण ने रहा वाह वाही उन्हें वाइफ यहां
कुबेर ने सौम्या ईशांत ने रुद्राक्ष सूर्य चन्द्रमा ने सौम्या विश्व सेवा पर्व का आठों में वाह वाह पत्र प्रदान किया था वेश्या कुमार राम
चंद्र प्रसन्न हो शिव जी को प्रणाम कर हाथ जोड़े खड़े हो भक्तिपूर्वक में श्री रामचंद्र बोली हे भगवान मनुष्य से दो चार पुत्र उल्लंघन नहीं किया जाएगा और लंका दूर भेजा था तहत दानवों को भी दुर्गम
और वहां करोड़ लोग बड़ी राक्षस रहते ही भेजा जितेन्द्रिय वेद पाठ करने में तत्पर और आपके हफ्ते ही अनेक प्रकार की माया जानने वाले बुद्धिमान अग्निहोत्री ही केवल में और भ्राता लक्ष्मण
युद्ध में को कैसे जीत सकेंगे
शिवजी बोले ही रामचंद्र राव और राक्षसों के मामले में ही विचार कर दें कि कुछ आवश्यकता नाही का
कि उसका काम आ गया
था और ब्राह्मण का दुख देने भी अगर हम में प्रवेश हुआ है
सो रहे थे इसी कारण उसकी आयु और लक्ष्मी का छः
गया है
राज्य स्तरीय जानकी जी की अवमानना की है
इस कारण तुम भी सहज भाषा को की कहा कि वह इस समय मध्य पाने में असमर्थ रहता है
धर्म में वृद्धि करने वाला शत्रु भाग्य से ही प्राप्त होता है
वेद शास्त्र पड़ा हो और सदा धर्म में प्रीति करता हो वह विनाशकाल आने पर धर्म का त्याग कर देता है
जो काफी सदा देवता ब्रह्मा और शिव को दुख देता है उसका नाश स्वयं होता है
घेराव किष्किन्धा नामक नगर में देवताओं के अंश से बहुत से महाबली और तुझे वाला उत्पन्न हुए थी वे सब तुम्हारी सहायता करेंगी
उनके द्वारा ढोल सागर पर से तो मंगवाना अनेक पर वोट लाकर वे मामला पुल की उस पर सपा उधर जाएंगी
इस प्रकार राहुल को उसके साथियों सहित मारकर वहां से अपनी प्रिया खो दिया जहां संग्राम में शस्त्र से ही जब प्राप्त होने की संभावना हो वहां उत्तरों का प्रयोग न करना और जिनके पास आजकल नहीं हैं अथवा शब्द
तरह तथा जो भाग रहे हैं ऐसे पुरुषों के ऊपर दिव्यास्त्र का प्रयोग करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है
बहुत कहने से क्या हाला यह संस्था जो मेरा ही की याद में ही इसका पहला और में ही इसका शाह करता हूं
मैं ही एक जगत की मृत्यु का भी मृत्यु रूप को ही राज्य में ही इस चराचर जगत का भक्षण करने वाला हूँ
यंत्र जुमा सब राक्षस तो मेरे मुख में प्राप्त हो चुके हैं
तुम निमित्त मात्र होकर संग्राम मिली होगी