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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2024

मोक्ष

सुत उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि शुद्धं कैवल्यमुक्तिदम्।। अनुग्रहानमहेशस्य भवदुःखस्य भेषजम् ॥1॥

सूतजी बोले हे शौनकादिको ! इसके बाद अब मैं शुद्ध और कैवल्यमुक्तिदायक संसारके दुःखने में औषधिरूप शिवगीता रत्नको शिवजीके अनुग्रहसे वर्णन करता हूँ।
॥ 

न कर्मणामनुष्ठानैर्न दानैस्तपसपि वा।। कैवल्यं लभते मर्त्यः साक्षात् ज्ञानेन केवलम् ॥2॥

न कर्मों के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है किन्नु ज्ञान से ही प्राप्त होता है।॥ २॥ 
गीता ५/- 36-38-39/18/-
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 18

श्लोक:
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

भावार्थ:
वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी (इसका विस्तार गीता अध्याय 6 श्लोक 32 की टिप्पणी में देखना चाहिए।) ही होते हैं
॥18॥

भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 32

श्लोक:
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति (जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादि के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकों का-सा बर्ताव करता हुआ भी उनमें आत्मभाव अर्थात अपनापन समान होने से सुख और दुःख को समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतों में देखना 'अपनी भाँति' सम देखना है।) सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है
॥32॥

भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 36-37

श्लोक:
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥

भावार्थ:
हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत (जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के तुल्य भासता है वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम 'विष के तुल्य प्रतीत होता' है) होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है
॥36-37॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 38

श्लोक:
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥

भावार्थ:
जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को 'परिणाम में विष के तुल्य' कहा है) है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है
॥38॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 39

श्लोक:
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥

भावार्थ:
जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है
॥39॥

• कैवल्य मुकित देने वाली हैसी मुकानि जैसे गृह सवामी अपने घर मे रहता है इसी प्रकार ईशपूर को अपना घर बजा उसी में वास करना। स्वप्न के टूटते ही जैसे स्वपन कर शरीर पदार्थ य हो जाते है वैसे प्रभू में लय होना कैवल्य मोक्ष है।

मुक्ति के प्रकार और उनकी पहचान:

शास्त्रों में मुक्ति के मुख्यतः पाँच प्रकार बताए गए हैं, जिन्हें पंचविध मुक्तियाँ कहा जाता है। ये इस प्रकार हैं:

1. सालोक्य मुक्ति

परिभाषा: सालोक्य मुक्ति में साधक अपने आराध्य देव के समान ही दिव्य लोक में निवास करता है।

पहचान: इस मुक्ति में भक्त को भगवान के धाम, जैसे विष्णु भक्त के लिए वैकुंठ, शिव भक्त के लिए कैलाश में निवास प्राप्त होता है। वह भगवान के दिव्य लोक में रहता है और उनसे दूर नहीं होता।

2. सामीप्य मुक्ति

परिभाषा: सामीप्य मुक्ति में साधक को भगवान के निकट रहने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

पहचान: इसमें भक्त को अपने आराध्य देव के अत्यंत निकट रहने का अधिकार मिलता है। वह उनके समीप रहकर सेवा और उनके सान्निध्य का लाभ प्राप्त करता है।

3. सारूप्य मुक्ति

परिभाषा: सारूप्य मुक्ति में साधक को भगवान के समान रूप और गुण प्राप्त होते हैं।

पहचान: इसमें भक्त का स्वरूप भी भगवान के समान हो जाता है, जैसे वह भी दिव्य और सुंदर स्वरूप धारण करता है। इसमें भगवान और भक्त में एक जैसी दिव्यता दिखाई देती है, जिससे भक्त भगवान के समान दिखता है।

4. सार्ष्टि मुक्ति

परिभाषा: सार्ष्टि मुक्ति में भक्त को भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

पहचान: इसमें भक्त को भगवान के समान शक्तियाँ और सामर्थ्य मिल जाती हैं। वह भी दिव्य गुणों, शक्तियों और ऐश्वर्य का स्वामी बनता है, जिससे उसे अभाव का अनुभव नहीं होता।

5. कैवल्य मुक्ति (सायुज्य मुक्ति)

परिभाषा: कैवल्य मुक्ति में साधक भगवान में पूर्णतया लीन हो जाता है और द्वैत समाप्त हो जाता है।

पहचान: यह सबसे उच्चतम मुक्ति मानी जाती है। इसमें भक्त का आत्मा भगवान के साथ पूर्णतः एकाकार हो जाता है। इसमें कोई भेद नहीं रह जाता और साधक ब्रह्म रूप हो जाता है, जिससे उसे पुनर्जन्म से पूर्ण मुक्ति प्राप्त होती है। इसे मोक्ष भी कहते हैं।

विशेष:

इन मुक्तियों की मुख्य विशेषता और पहचान यह है कि सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सार्ष्टि मुक्ति में भक्त भगवान के धाम और उनके निकट रहता है परन्तु भगवान से अलग रहता है। लेकिन कैवल्य (सायुज्य) में भक्त और भगवान में कोई भेद नहीं रहता, भक्त ब्रह्म में विलीन हो जाता है और उसे जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्ति प्राप्त होती है।
स्वाभाविक कर्म जिनके द्वारा जीव को परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 45

श्लोक:
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

भावार्थ:
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन
॥45॥

भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 43

श्लोक:
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥

भावार्थ:
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं
॥43॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 44

श्लोक:
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥

भावार्थ:
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम 'सत्य व्यवहार' है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है
॥44॥
शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान - विज्ञान तथा आस्तिक्य आदि ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ।
गीता के अनुसार ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म है.....
.
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....

"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||१८:४२||
अर्थात् शम? दम? तप? शौच? क्षान्ति? आर्जव? ज्ञान? विज्ञान और आस्तिक्य ये ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं ||
और भी सरल शब्दों में ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं ..... मनोनियन्त्रण, इन्द्रियनियन्त्रण, शरिरादि के तप, बाहर-भीतर की सफाई, क्षमा, सीधापन यानि सरलता, शास्त्र का ज्ञान और शास्त्र पर श्रद्धा|
इनकी व्याख्या अनेक स्वनामधन्य आचार्यों ने की है| इनके अतिरिक्त ब्राह्मण के षटकर्म भी हैं, जो उसकी आजीविका के लिए हैं| पर यहाँ हम उन स्वभाविक कर्मों पर ही विचार कर रहे हैं जो भगवान श्रीकृष्ण ने कहे हैं|
जो सिद्धि प्राप्त करवा देते हैं।

गुरुवार, 21 नवंबर 2024

गीता अध्याय4

❤️❤️❤️❤️❤️❤️
*श्री गीता जी का चौथा अध्याय,*

*इस में कुल 42 श्लोक है* 

 *"ज्ञान कर्म संन्यास योग,"*

 आत्मज्ञान, यज्ञ, और अवतार के महत्व पर विशेष ध्यान देता यह अध्याय जैसा मेरी समझ में आएगा गीता के मूल भाव को बिना खोए प्रस्तुत करने का प्रयास भी अपने ध्यान में रखूं गा।

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि किस तरह भगवान् युग-युग में धरती पर अवतरित होकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। यहाँ भगवान कर्म के ज्ञान और योग में कुशलता का महत्व बताते हैं और समझाते हैं कि कैसे निष्काम कर्म करते हुए भी।

आध्यात्मिक विकास संभव है।
जिस के लिए लम्बा इंतजार भी हो सकता है नहीं भी हो सकता

❤️❤️❤️❤️❤️❤️

अवतार का महत्व – श्रीकृष्ण के अवतार की अवधारणा और धर्म की पुनर्स्थापना का मर्म।
 ज्ञान और कर्म का संबंध – निष्काम कर्म करते हुए भी आत्मज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है।
यज्ञ और सेवा का मूल्य – हर कर्म को यज्ञ के रूप में कैसे देखा जा सकता है।

कर्म का विज्ञान – यहां कर्म की जटिलताओं और उनके परिणामों को समझाया गया है।

चौथे अध्याय की चर्चा में यह भी समझने की कोशिश करूं गा कि हर युग में भगवान और संत किस तरह से सत्य की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए सक्रिय रहते हैं।

आशा है कि यह अध्याय भी आपको गहराई से मार्गदर्शन देने वाला हो। 🙏

भगवान के छः प्रकार के अवतार बताए गए है
अंशांशावतार
कलावतार
आवेशावतार
पूर्णावतार
परिपूर्णतम अवतार

अंशावतार: से आरंभ करते है

अंशावतार का मतलब है, वह अवतार जिसमें परमात्मा की शक्ति का कुछ हिस्सा ही हो. 
यह पूर्णावतार से अलग होता है. अंशावतार शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - अंश और अवतार. अंश का मतलब है कुछ या कम और अवतार का मतलब है रूप. 
 
भगवान विष्णु के कुछ अवतारों को अंशावतार माना गया है. जैसे कि मत्स्य, कूर्म, और वाराह. वहीं, शिव के कुछ अवतारों को भी अंशावतार माना जाता है. जैसे कि ऋषि दुर्वासा, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनर्तक, द्विज, अश्वत्थामा, किरात, नतेश्वर आदि. 
 
जिन लोगों में 16 कलाओं में से 10 या उससे ज़्यादा विशेष विभूतियां होती हैं, उन्हें अवतार माना लिया जाता है. जिन लोगों में 16 कलाएं होती हैं, उन्हें पूर्णावतार माना जाता है. 

कलावतार: काल समय अनुसार उत्पन होने वाले अवतार

समय और काल से जुड़ा अवतार भगवान विष्णु का कल्कि अवतार है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कल्कि अवतार कलियुग के अंत में होगा. कल्कि अवतार से जुड़ी कुछ खास बातेंः 
 
कल्कि अवतार, भगवान विष्णु का दसवां और अंतिम अवतार होगा. 
 
कल्कि अवतार, कलियुग और सतयुग के संधिकाल में होगा. 
 
कल्कि अवतार का जन्म, कलियुग के अंत में होगा जब पाप की सीमा पार हो जाएगी. 
 
कल्कि अवतार का मकसद, धर्म की रक्षा करना और कलि राक्षस का वध करना होगा. 
 
कल्कि अवतार के जन्म के बाद, धरती से सभी पापों और बुरे कर्मों का विनाश होगा और फिर सतयुग की शुरुआत होगी. 
 
कल्कि अवतार के जन्म के समय, ग्रहों की स्थिति इस प्रकार होगी कि चंद्रमा धनिष्ठा नक्षत्र और कुंभ राशि में होगा और सूर्य तुला राशि में स्वाति नक्षत्र में होगा. 
 
कल्कि अवतार के जन्म के लिए, श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को कल्कि जयंती मनाई जाती है. इस दिन भगवान विष्णु के कल्कि अवतार की पूजा की जाती है. 
 
नित्य होने वाले अवतार:
ध्यान रहे नित्य होने वाले अवतार ना तो भगवान होते है ना भगवान के बराबर ही होते है यह क्षणिक होते है।

प्रत्यक्ष ज्ञान में भी देखते है

प्रति दिन कोई ना कोई बच्चा, बड़ा , बुढा, आदमी, औरत,कुछ ऐसे शब्द हमारे जीवन में आकर कह देते है जो हमारी आंखे खोलने का कर्म कर जाते है।
आज काल ऐसे बहुत से स्लोगन भी देखे जाते है।
बंटेगा तो कटे गा।
ना झुका हूं ना टूटा हूं 
ना झुकूं गा ना झुकने ही दुगा
ना टूटा हूं ना टूटने ही दुगा।
वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान इसे भी झूठा साबित करने के प्रयास रहता है ताकि भ्रम को जिंदा रखा जा सके।ध्यान रहे नित्य होने वाले अवतार ना तो भगवान होते है ना भगवान के बराबर ही होते है यह क्षणिक होते है।क्योंकि हम आत्मा के रूप में परमात्मा के अंश भर है कोई टुकड़ा नहीं।

आवेशावतार:

अवतार लेने का मतलब है कि परमात्मा स्वयं अवतरित होता है. वहीं, जन्म लेना जीव आत्माओं का काम होता है. 
 
भगवान के अवतार लेने का मकसद, चमत्कार दिखाना या शक्ति का प्रदर्शन नहीं होता. बल्कि, वे सभी जीवों के बीच एक साधारण इंसान के रूप में रहकर अपनी उमदाई दिखाते हैं. 
 
भगवान विष्णु के कुछ अवतारों को अंशावतार माना जाता है. जैसे, मत्स्य, कूर्म, और वाराह. 
 
वहीं, जब भगवान विष्णु पूरी शक्तियों के साथ प्रकट होते हैं, तो इसे पूर्णावतार कहा जाता है. जैसे, भगवान श्री राम और श्री कृष्ण. 
 
देवर्षि नारद, भगवान विष्णु के अंशावतार थे. वहीं, हनुमान जी, शंकर जी के अंशावतार थे. 
 और हम आत्मा के रूप में परमात्मा के अंश भर है कोई टुकड़ा नहीं।

पूर्णावतार:

पूर्णावतार का मतलब है, किसी देवता का ऐसा अवतार जो सभी कलाओं से युक्त हो. पूर्णावतार को अशावतार भी कहा जाता है. शास्त्रों के मुताबिक, भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना गया है. 
 
पूर्णावतार से जुड़ी कुछ और बातें:
पूर्णावतार और अंशावतार में अंतर: 16 कलाओं वाले व्यक्ति को पूर्णावतार और इससे कम कलाओं वाले व्यक्ति को अंशावतार कहा जाता है. 
 
भगवान विष्णु के कुछ अवतारों को अंशावतार माना गया है, जैसे कि मत्स्य, कूर्म, और वाराह. 
 
ब्रह्मवैवर्त पुराण के मुताबिक, भगवान विष्णु के नृसिंह, राम, और श्रीकृष्ण अवतार पूर्णावतार थे. 
 
हर युग में एक पूर्णावतार होता है, जैसे कि त्रेता में राम और द्वापर में कृष्ण. 
 
भगवान श्रीकृष्ण में अनंत ऐश्वर्य, अनंत वीर्य, अनंत यश, अनंत श्री, अनंत ज्ञान, और अनंत वैराग्य जैसे गुण थे. 
 
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में धर्म की व्याख्या की थी. गीता के उपदेशों ने लोगों को कर्तव्य पथ पर चलने के लिए  प्रेरित किया. 

परिपूर्णतम अवतार:

भगवान का परिपूर्णतम या पूर्ण रूप श्री कृष्ण हैं, जो स्वयं मूल सर्वोच्च देवत्व हैं। असंख्य ब्रह्मांडों के स्वामी के रूप में, वे अपने अविनाशी और आनंदमय निवास में शानदार ढंग से प्रकट होते हैं। अंश अवतारों को भगवान के मिशन (दुनिया में) के निष्पादन की देखरेख करने के लिए कहा जाता है।

आइए अब गीता के चौथे अध्या में घूमने चलें

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भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 1

श्लोक:
( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय ) श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌।
 विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा
 ॥1॥

सूर्य से ही सृष्टि का आरंभ हुआ और यह ज्ञान पहले उन्हीं को दिया गया होगा और उनके दवा ही आगे बिना मूलतः को त्यागे बांटा गया।

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 2

श्लोक:
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
 स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥

भावार्थ:
हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया
 ॥2॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 3

श्लोक:
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
 भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌॥

भावार्थ:
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है
 ॥3॥
क्यों गुप्त रखने योग्य है प्रत्यक्ष रूप से इसे भी वाट्सएप्यूनिवर्सिटी ज्ञान से जाना जा सकता है भ्रम फैलाने वालों से इसे छुपाने को कहा है नहीं तो युद्ध का मैदान तो है ही उठो और युद्ध करो।

भगवान जो कुछ हमें देते है वह हमें सुख देता है।

भगवान द्वारा दिया गया प्रत्येक अनुभव, वस्तु, परिस्थिति, या व्यक्ति हमें अंततः सुख की ओर ही ले जाता है, भले ही उसका स्वरूप हमारे लिए हमेशा सुखदायी प्रतीत न भी हो।पर ईश्वर द्वारा प्रदान किए गए प्रत्येक उपहार में गहरे उद्देश्य छिपे होते हैं, जो हमारे जीवन में संतुलन, विकास और आत्मा की पूर्णता के लिए आवश्यक हैं। आइए इस विचार को कुछ बिंदुओं के माध्यम से समझें:

❤️ सुख-दुख का वास्तविक अर्थ

संसार में जो सुख-दुख हमें प्राप्त होते हैं, वे नितांत अस्थायी हैं। दुख, भगवान की योजना में हमारे लिए एक साधन है, जो हमारे भीतर आत्मानुभूति और आत्मिक विकास के द्वार खोलता है। वास्तविक सुख, जो भगवान का प्रसाद है, वह हमारे भीतर शांति, संतोष और आनंद की भावना को प्रकट करता है, जो भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती।

❤️भगवान के दिए कष्टों का उद्देश्य

कभी-कभी हमें ऐसे कष्ट और कठिनाइयाँ भी मिलती हैं, जिनसे हम प्रारंभ में दुःखी हो सकते हैं, परंतु भगवान के दृष्टिकोण से ये कष्ट हमें सच्चाई की ओर बढ़ाने का एक साधन हैं। वे हमें आंतरिक रूप से मजबूत बनाते हैं, हमारे अहंकार को मिटाते हैं, और हमें भौतिक सुखों से दूर कर आत्मा की शांति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।

❤️विकास और शिक्षा का अवसर

ईश्वर जो कुछ भी देते हैं, उसमें हमारे लिए शिक्षा का अवसर छिपा होता है। कोई कठिन परिस्थिति, संघर्ष, या समस्या हमारी समझ को बढ़ाने का साधन होती है। हम इन कठिनाइयों के माध्यम से सहनशीलता, धैर्य, करुणा, और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता का विकास कर पाते हैं।

❤️भगवान की योजनाओं का रहस्य

हमारे जीवन में भगवान की जो योजना होती है, वह हमेशा हमारे भले के लिए होती है। जब हम उस पर भरोसा करते हैं और इस विश्वास को दृढ़ रखते हैं कि जो भी हुआ, हो रहा है, या होगा, वह भगवान की इच्छा से ही हो रहा है, तो हम गहरे आंतरिक सुख को प्राप्त करते हैं। यह विश्वास हमारे मन को स्थिर करता है और हमें हर परिस्थिति में भगवान के प्रति कृतज्ञ बनाए रखता है।

❤️सच्चे सुख का स्रोत

भौतिक सुखों का आकर्षण अस्थायी होता है, लेकिन भगवान जो देते हैं वह स्थायी और अनंत आनंद का स्रोत होता है। भक्ति, प्रेम, और ज्ञान भगवान का वास्तविक प्रसाद है, जो जीवन के हर कष्ट और संघर्ष में हमारे भीतर शांति की अनुभूति कराता है।

❤️प्रसन्नता की आंतरिक अनुभूति

भगवान के दिए सुख का अनुभव बाहरी घटनाओं पर निर्भर नहीं होता, बल्कि यह हमारी आंतरिक अनुभूति से जुड़ा होता है। जब हम भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना रखते हैं और उन्हें हर परिस्थिति में अपना मार्गदर्शक मानते हैं, तब हमारा मन प्रसन्न और शांत रहता है।

❤️निष्कर्ष ❤️

भगवान हमें जो भी देते हैं, वह हमें आत्मिक दृष्टि से समृद्ध करने के लिए ही होता है। उनके द्वारा दी गई हर परिस्थिति, चाहे वह सुख की हो या दुख की, अंततः हमें आत्मा के वास्तविक सुख की ओर ले जाती है। हमें बस इतना करना है कि अपने मन को भगवान के प्रति समर्पित रखें और उन पर अटूट विश्वास बनाए रखें। इस विश्वास में ही हमारे जीवन का वास्तविक सुख छिपा हुआ है।

✍️❤️जैसे प्रत्यक्ष ज्ञान में भगवान द्वारा निर्मित वायु,अग्नि,जल,वनस्पति,पृथ्वी हमे सुख ही देतीं है।

*❤️मनुष्य जो बनाता है हमें दुख हे देता है।*

मनुष्य द्वारा दिया गया सुख या दुख अक्सर अस्थायी होता है और कई बार इसमें स्वार्थ, अपेक्षाएँ या इच्छाएँ जुड़ी होती हैं। इसके कारण, मानव संबंधों में सुख-दुख का अनुभव सतही होता है और कभी-कभी यह दुखदायी भी बन जाता है। इसके कुछ कारण निम्नलिखित हो सकते हैं:

❤️अपेक्षाएँ और अहंकार

जब हम किसी अन्य व्यक्ति से सुख की अपेक्षा करते हैं, तो यह अपेक्षाएँ अक्सर पूरी नहीं हो पातीं, जिससे हमें दुख होता है। हर व्यक्ति अपनी सोच, अनुभव और इच्छाओं से प्रेरित होता है, और वे हमेशा हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार नहीं करते। इसलिए, जब हमारी उम्मीदें टूटती हैं, तो दुख होता है।

❤️मानव स्वभाव का अस्थिर होना

मनुष्य का स्वभाव अस्थिर और परिवर्तनशील होता है। आज जो व्यक्ति हमारा मित्र है, हो सकता है कल किसी कारण से वह हमसे दूर हो जाए। मानव भावनाएँ और प्राथमिकताएँ समय-समय पर बदलती रहती हैं, जिससे कभी-कभी दुखद अनुभव उत्पन्न होते हैं।

❤️स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा का भाव

मनुष्य के भीतर स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की भावना स्वाभाविक रूप से होती है। जब यह भावना अधिक बढ़ जाती है, तो व्यक्ति अपने सुख के लिए दूसरों को दुख पहुँचाने से भी पीछे नहीं हटता। ऐसा स्वार्थी व्यवहार हमारे संबंधों में खटास लाता है और हमारे जीवन में दुख का कारण बनता है।

❤️अज्ञान और असंवेदनशीलता

कई बार लोग अपने शब्दों या कर्मों से जाने-अनजाने दूसरों को दुख पहुँचा देते हैं। उनका ऐसा करना अनजाने में होता है, लेकिन इस अज्ञानता का परिणाम हमारे लिए कष्टकारी हो सकता है। असंवेदनशीलता भी दुख का कारण बनती है, क्योंकि लोग दूसरों की भावनाओं का सम्मान नहीं करते हैं और अपने आचरण से अनजाने में उन्हें आहत करते हैं।

❤️असमानता और अधिकार की भावना

मानव संबंधों में अक्सर अधिकार की भावना और असमानता का भाव देखने को मिलता है। हम अपेक्षा करते हैं कि अन्य लोग हमारे अधिकारों और आवश्यकताओं का सम्मान करें, लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो हमारे भीतर असंतोष और दुख उत्पन्न होता है। अधिकार की भावना रिश्तों में टकराव पैदा करती है, जो अंततः दुख का कारण बनती है।

❤️परिणाम और असफलताएँ

मनुष्य अक्सर दूसरों की सफलता या असफलता के आधार पर उनका मूल्यांकन करता है। यह तुलना की भावना रिश्तों में ईर्ष्या, द्वेष और अपमान का कारण बन सकती है। इस प्रकार के विचार हमारे संबंधों को प्रभावित करते हैं और अंततः हमें दुख देते हैं।

❤️सच्चे सुख का आंतरिक स्रोत

वास्तविक सुख का स्रोत भगवान, आत्मा या आत्मिक शांति में होता है, न कि बाहरी संबंधों या परिस्थितियों में। जब हम इस सत्य को समझते हैं कि सच्चा सुख केवल हमारे भीतर है, तो हम दूसरों से सुख की अपेक्षा करना छोड़ देते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें मानव संबंधों को त्याग देना चाहिए, बल्कि यह कि हमें उनसे सीमित सुख की ही अपेक्षा रखनी चाहिए।

❤️निष्कर्ष ❤️

मनुष्य द्वारा दिया गया सुख अल्पकालिक और सतही हो सकता है, जबकि दुख का अनुभव कई बार गहरा और स्थायी प्रतीत हो सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य की भावना, अपेक्षाएँ और स्वभाव अस्थिर होते हैं। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि हम मानव संबंधों में अपनी अपेक्षाओं को सीमित रखें और सच्चे सुख के लिए आत्मिक साधना, ईश्वर भक्ति, या आंतरिक शांति पर ध्यान केंद्रित करें।

✍️❤️प्रत्यक्ष ज्ञान में
मनुष्य दवा निर्मित बांध ,बॉम्ब,गोला,बारूद इत्यादि, इत्यादि

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 4

श्लोक:
अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
 कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- आपका जन्म तो अर्वाचीन-अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था। तब मैं इस बात को कैसे समूझँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?
 ॥4॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 5

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
 तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ
 ॥5॥

✍️यह कल्प क्या है?
परमेष्ठी मंडल स्वायम्भू मंडल का परिभ्रमण कर रहा है यानी आकाशगंगा अपने से ऊपर वाली आकाशगंगा का चक्कर लगा रही है। इस काल को कल्प कहा गया यानी इसकी माप है 4 अरब 32 करोड़ वर्ष (4,32,00,00,000)। इसे ब्रह्मा का 1 दिन कहा गया। जितना बड़ा दिन, उतनी बड़ी रात अत: ब्रह्मा का अहोरात्र यानी 864 करोड़ वर्ष हुआ। एक क्षण से कल्प तक के मान काल ,समय कहते है।
 
❤️हिन्दुओं की समय निर्धारण पद्धति, महत्वपूर्ण जानकारी❤️

 
कल्प 30 हैं : श्‍वेत, नीललोहित, वामदेव, रथनतारा, रौरव, देवा, वृत, कंद्रप, साध्य, ईशान, तमाह, सारस्वत, उडान, गरूढ़, कुर्म, नरसिंह, समान, आग्नेय, सोम, मानव, तत्पुमन, वैकुंठ, लक्ष्मी, अघोर, वराह, वैराज, गौरी, महेश्वर, पितृ। जैन धर्म में 12 कल्प बताए गए हैं:- सौधर्म, ईशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, लांतव, महाशुक्र, सहस्रार, आनत, प्राणत, आरण और अच्युत। लेकिन प्रमुख पांच कल्पों में गाथा को समेटने का प्रयास पुराणकारों ने किया है। ये पांच कल्प है- 1.महत कल्प, हिरण्य गर्भ, ब्रह्मकल्प, पद्मकल्प और वराहकल्प। 
 
❤️. महत कल्प : 
इस काल के इतिहास का विवरण मिलना मुश्किल है। बहुत शोध के बाद शायद कहीं मिले, क्योंकि इस काल के बाद प्रलय हुई थी तो सभी कुछ नष्ट हो गया। लेकिन पुराणकार मानते हैं कि इस कल्प में विचित्र-विचित्र और महत् (अंधकार से उत्पन्न) वाले प्राणी और मनुष्य होते थे। संभवत: उनकी आंखें नहीं होती थीं।

 
❤️ हिरण्य गर्भ कल्प : 

इस काल में धरती का रंग पीला था इसीलिए इसे हिरण्य कहते हैं। हिरण्य के 2 अर्थ होते हैं- एक जल और दूसरा स्वर्ण। हालांकि धतूरे को भी हिरण्य कहा जाता है। माना जाता है कि तब स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे। इस काल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ, हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, देवता, हिरप्यानी रैडी (अरंडी), वृक्ष वनस्पति एवं हिरण ही सर्वोपयोगी पशु थे। सभी एकरंगी पशु और पक्षी थे।
 
 
❤️ ब्रह्मकल्प :

 इस कल्प में मनुष्य जाति सिर्फ ब्रह्म (ईश्‍वर) की ही उपासक थी। क्रम विकास के तहत प्राणियों में विचित्रताओं और सुंदरताओं का जन्म हो चुका था। जम्बूद्वीप में इस काल में ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, रामपुर, रामगंगा केंद्र आदि नाम से स्थल हुआ करते थे। यहां की प्रजाएं परब्रह्म और ब्रह्मवाद की ही उपासना करती थी। इस काल का ऐतिहासिक विवरण हमें ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।
 
❤️पद्मकल्प : 
पुराणों के अनुसार इस कल्प में 16 समुद्र थे। पुराणकारों अनुसार यह कल्प नागवंशियों का था। धरती पर जल की अधिकता थी और नाग प्रजातियों की संख्या भी अधिक थी। कोल, कमठ, बानर (बंजारे) व किरात जातियां थीं और कमल पत्र पुष्पों का बहुविध प्रयोग होता था। सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की नारियां पद्मिनी प्रजाएं थीं। तब के श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति आज के श्रीलंका जैसी नहीं थी। इस कल्प का विवरण हमें पद्म पुराण में विस्तार से मिल सकता है।
 
 ❤️ वराहकल्प :
 वर्तमान में वराह कल्प चल रहा है। इस कल्प में विष्णु ने वराह रूप में 3 अवतार लिए- पहला नील वराह, दूसरा आदि वराह और तीसरा श्वेत वराह। इसी कल्प में विष्णु के 24 अवतार हुए और इसी कल्प में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है। इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की थी। वर्तमान में हम इसी कल्प के इतिहास की बात कर रहे हैं। वराह पुराण में इसका विवरण मिलता है फेक्ट चेक वाले भी अपने फेक्ट चेक में सुधार करले।
 
अब तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वंतर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतरदशा चल रही है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी संवत् प्रारंभ होने से लगभग 5,500 वर्ष पूर्व हुआ था।
 
❤️वराहकल्प :
 वर्तमान में चल रहे वराह कल्प में धरती जल में ही डूब गई थी। धरती पर से जल हटाने के लिए इस कल्प में विष्णु ने वराह रूप में 3 अवतार लिए- पहला नील वराह, दूसरा आदि वराह और तीसरा श्वेत वराह। इस कल्प में भगवान वराह और ऋषि मुनियों के अथक प्रयास से सात समुद्र हो गए थे जो आज हैं।
 
 भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 6

श्लोक:
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌।
 प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥

भावार्थ:
मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ
 ॥6॥
❤️प्रकृति:
प्रकृति से तात्पर्य है, इस ग्रह पर मौजूद सभी प्राकृतिक चीज़ें, जिनमें जानवर, पौधे, घटनाएं, प्रक्रियाएं, और उत्पाद और हम लोग शामिल हैं. प्रकृति, भौतिक दुनिया और उसमें रहने वाली हर चीज़ है।
प्रकृति में मौजूद हर चीज़ को इंसानों ने नहीं बनाया है. 
 
प्रकृति हमें जीने के लिए हवा, पानी, खाना, और रहने की जगह देती है. 
 
प्रकृति का अध्ययन, ज्ञान और विज्ञान के योग के अध्ययन का एक बड़ा हिस्सा है. 
 
❤️प्रकृति एक ऐसी संपत्ति है जिसका पोषण, निवेश, और विकास किया जाना चाहिए ❤️
 
प्रकृति के बिना कोई सतत विकास नहीं हो सकता. 
 
प्रकृति के बारे में कुछ और बातेंः
प्रकृति को "माँ प्रकृति" भी कहा जाता है. 
 
प्रकृति से जुड़ी कुछ घटनाएं, जैसे कि पृथ्वी का मौसम और भूविज्ञान, अपने आप बदलती रहती हैं. 
 
मानव प्रकृति का हिस्सा है, लेकिन यहां मानवी क्रिया को आमतौर पर अन्य प्राकृतिक चीज़ों से अलग ही माना जाता है।

❤️माया और योग माया

माया और योगमाया, दोनों भगवान की शक्तियां ही हैं, लेकिन इनमें भी अंतर है: 
 
माया भगवान की बहिरंग शक्ति है, जो उनसे विमुख जीवों पर हावी रहती है. माया को भ्रम या जादू भी कहा जाता है जो दिखाई दे रहा है वास्तव में वो यही नहीं (प्रभु की माया कही धूप कही छाया)
 
❤️योगमाया:

 भगवान की आंतरिक शक्ति है. योगमाया के निर्देशन में आध्यात्मिक ऊर्जा काम करती है. 
 
योगमाया को भगवान की माया का एक रूप माना जाता है ठीक वैसे ही जैसे हम सभी की अपनी अपनी माया है वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान उसी की छाया भर है।

 योगमाया को दुर्गा, सीता, काली, राधा, लक्ष्मी, मंगला, पार्वती इसी स्त्री रूपों का मूर्त रूप माना जाता
 
योगमाया से कृष्ण राधा का शरीर बना है. इसीलिए राधे श्याम हैं और सीता राम हैं. 
 
जिन्होंने भगवान की प्राप्ति कर ली है, उनसे भगवान माया को हटा देते हैं और उन्हें योग माया की शक्ति दे देते हैं. 
 
जो लोग भौतिक ऐश्वर्य और भौतिक सुख की तलाश में हैं, वे स्वयं को भौतिक ऊर्जा, महामाया, या भगवान कृष्ण की देख-रेख में रखते हैं।
 
 (चेतन पुरुष माया स्त्री रूप भी माना जा सकता है इस पर आगे चर्चा जरूरी हुई तो हो सकती है अभी हमें मूल भाव को ही बना कर आगे बढ़ना है)

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 7

श्लोक:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
 अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥

भावार्थ:
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ
 ॥7॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 8

श्लोक:
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌।
 धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

भावार्थ:
साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ
 ॥9॥

❤️साधु पुरुष:

"साधु पुरुष" का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जो सद्गुणों, परोपकार, संयम और सहिष्णुता से परिपूर्ण होते हैं। 
साधु पुरुष तो केवल धार्मिक क्रियाओं में ही नहीं बल्कि अपने आचरण, विचार और व्यवहार में भी सच्चाई, दया और करुणा को अपनाते हैं। वे अपने हित से अधिक दूसरों के कल्याण में रुचि रखते हैं और सांसारिक मोह-माया से मुक्त होकर, सभी के प्रति प्रेम और सेवा का भाव रखते हैं।

गीता और अन्य शास्त्रों में साधु पुरुषों के गुणों का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

❤️क्षमा और सहिष्णुता - साधु पुरुषों में दूसरों की गलतियों को माफ करने और विपरीत परिस्थितियों में स्थिर रहने की क्षमता होती है।

❤️दया और करुणा - वे हर प्राणी के प्रति करुणा रखते हैं और सभी का कल्याण चाहते हैं।

❤️सत्यनिष्ठा - साधु पुरुष अपने विचारों और कार्यों में सत्य का अनुसरण करते हैं और अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाते हैं।

❤️निर्लिप्तता - वे सांसारिक सुखों और भौतिक चीजों के मोह में नहीं फँसते और आत्मिक शांति के लिए कार्य करते रहते हैं।

❤️समभाव - साधु पुरुष अपने मन में सभी के प्रति समानता का भाव रखते हैं, चाहे कोई उन्हें अच्छा कहे या बुरा।

साधु पुरुषों का आचरण समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत होता है, क्योंकि वे अपने कर्मों से सभी को प्रेम, शांति और दया का मार्ग दिखाते हैं। साधु पुरुष समाज में अपने आदर्शों, उपदेशों और सेवाभाव से एक सकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं, जो लोगों को भी धर्म, सदाचार और सेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है किसी को बाध्य नहीं करता क्योंकि यह कार्य खुद भगवान करते है।
जब "वाल्मीक" "रत्नाकर" थे तब उनको "वाल्मीक" बनाने का काम भगवान ने किया।
"कालिदास"इसका एक अच्छा उदाहरण है 
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 9

श्लोक:
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः।
 त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से (सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दन परमात्मा अज, अविनाशी और सर्वभूतों के परम गति तथा परम आश्रय हैं, वे केवल धर्म को स्थापन करने और संसार का उद्धार करने के लिए ही अपनी योगमाया से सगुणरूप होकर प्रकट होते हैं। इसलिए परमेश्वर के समान सुहृद्, प्रेमी और पतितपावन दूसरा कोई नहीं है, ऐसा समझकर जो पुरुष परमेश्वर का अनन्य प्रेम से निरन्तर चिन्तन करता हुआ आसक्तिरहित संसार में बर्तता है, वही उनको तत्व से जानता है।) जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है
 ॥9॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 10

श्लोक:
वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
 बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

भावार्थ:
पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं
 ॥10॥
(भगवत स्वरूप हो चुके कुछ भक्तों के नाम ये रहे:
परीक्षित - इनका नाम नवधा भक्ति में श्रवण के रूप में आता है.
शुकदेव - इनका नाम नवधा भक्ति में कीर्तन के रूप में आता है.
प्रह्लाद - इनका नाम नवधा भक्ति में स्मरण के रूप में आता है.
लक्ष्मी - इनका नाम नवधा भक्ति में पादसेवन के रूप में आता है.
पृथुराजा - इनका नाम नवधा भक्ति में अर्चन के रूप में आता है.
अक्रूर - इनका नाम नवधा भक्ति में वंदन के रूप में आता है.
हनुमान - इनका नाम नवधा भक्ति में दास्य के रूप में आता है.
अर्जुन - इनका नाम नवधा भक्ति में सख्य के रूप में आता है.
बलि राजा - इनका नाम नवधा भक्ति में आत्मनिवेदन के रूप में आता है. )
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 11

श्लोक:
ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌।
 मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
 ॥11॥
❤️ हमारी आप की तो बात ही क्या श्री कृष्ण की मां भी असमंजस की हालत में आएंगी 😀 जब श्री कृष्ण ने मिट्टी मुंह में रख ली तो माता ने देख लिया। वह उनका मुंह खोल कर मिट्टी निकालने का प्रयास करती हैं ऐसा प्रयास हमारी माता बहने भी अक्सर करती ही हैं।
पर कृष्ण की मां ने जब श्री कृष्ण का मुंह खोला उसमें ब्रह्मांड के दर्शन कर घबरा गई अरे बाप रे लल्ला को तो कोई बला चिपट गई है ओझा को बुलाओ।चलिए अब मजाक मजाक में ज्ञान की ओर बढ़ते है अर्जुन की तरह में भी प्रश्न पूछ लेता हूं 

(जब आत्मा ही परमात्मा है तो हम उसको भूत,प्रेत,राक्षस,बेताल,बला क्यों मान लेते है?क्या उसे परमात्मा नहीं मान सकते यह दोहरा मापदंड क्यों? इसी लिए यहां भगवान कहते है जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ।

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 12

श्लोक:
काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
 क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥

भावार्थ:
इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है
 ॥12॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 13

श्लोक:
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
 तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌॥

भावार्थ:
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान
 ॥13॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के विभाग गुण और कर्मों को भगवान ही रचते है और नहीं भी!
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के घर में जन्मे जीव के बारे में जानने को हम शिशु की जन्म पत्रिका बनवाते है।जो ज्योतिष शास्त्र में आता है ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहते हे शायद पहले भी बताया गया हे।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के घर पैदा हुए शिशु का वर्ण यही निर्धारित होता है इस लिए भगवान करते भी है और नहीं भी करते।
पर वॉट्सएप यूनिवर्सिटी के ज्ञान वाले लोग ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बताकर भांति भांति के वचन बोला करते है।
अब है वर्ण व्यवस्था के कार्य की बात करे वैसे इसको भगवान भी आगे चल कर स्पष्ट करे गे ।

❤️शरीर में ब्राह्मण, 

मुख को कहते है।जो ज्ञान की बाते भी करता हे।अगर किसी शरीर के अंग को चोट लगती है तो रोता ब्राह्मण ही है।

❤️क्षत्रिय
सीने और पेट के ऊपर के भाग को कहते है।अगर आप पर कोई प्रहार करे तो बचाने को पहले यही हाथ आते है जिनको क्षत्रिय कहा गया है।
❤️वैश्य 
पेट को कहा जाता है 
हम जो कुछ खाते है वो पहले पेट में जाता है। उसको ऊर्जा में बदल कचरा अलग करता  फिर उस से उत्पन ऊर्जा को यही पेट समस्त अंगों को उनकी जरूरत की पूर्ति हेतु देता हे और कचरे को त्याग देता है।
❤️शूद्र चरणों को कहते है
जो हमें यात्रा करवाता हे मंदिर भी लजाता है सेवा भाव इसमें होता है।जब हमने किसी को मान,आदर देना होता है तब सबसे पहले हम इसी शूद्र पैरों को स्पर्श कर वंदना करते है ।
अब इन में छोटा बड़ा या ऊंचा नीचा कौन निर्णय आप ज्ञानी जनों पर छोड़ आगे बढ़ता हूं।

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 14

श्लोक:
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
 इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥

भावार्थ:
कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते- इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता
 ॥14॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 15

श्लोक:
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
 कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌॥

भावार्थ:
पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर
 ॥15॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 16

श्लोक:
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
 तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥

भावार्थ:
कर्म क्या है? और अकर्म क्या है? इस प्रकार इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्मतत्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा
 ॥16॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 17

श्लोक:
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
 अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥

भावार्थ:
कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्मण का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है
 ॥17॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 18

श्लोक:
कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
 स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌॥

भावार्थ:
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है
 ॥18॥

❤️अकर्म: 
 यानी, बिना किसी कर्ता के कर्म करना यानी आसक्ति और फल की इच्छा से रहित होकर कर्म करना।
यहां अकर्म करने का मतलब हाथ पर हाथ रहे कर बैठे रहो नहीं काम को छोड़ना नहीं है,
बल्कि कर्म करते समय उसके फल का ध्यान न देना है।जैसे चींटी अगर 100बार भी चढ़ाई चढ़ते गिरे तो वो मायूस होकर चढ़ाई से पीछे नहीं हटती प्रयास अंत तक करती ही रहती है।
अकर्म की स्थिति में किए गए कार्यों से इतिहास बदल सकता है,भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है, वह सबसे बुद्धिमान और प्रज्ञासंपन्न होता है।
 गीता के मुताबिक, जो कर्म निष्काम भाव से ईश्वर के लिए किए जाते हैं, वे बंधन नहीं पैदा करते और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करते हैं।
 मनुष्य को सकारात्मक भावना से लगातार कर्मशील रहना ही चाहिए,गीता में परिणाम की चिंता करके कर्म न करने को 'अकर्मण्यता' कहा गया है।
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 19

श्लोक:
( योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा ) यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
 ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः॥

भावार्थ:
जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं
 ॥19॥
(वह ब्राह्मण वर्ण का हो कबीर ,रविदास को पंडित नहीं भगत कहते है)
❤️पंडित:
 पंडित का मतलब विद्वान या अध्यापक होता है।
 पंडित शब्द का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जो संस्कृत और हिन्दू विधि, धर्म, संगीत या दर्शनशास्त्र में सक्षम हो।
 पंडित शब्द का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी किया जाता है जो वेदों का कोई एक मुख्य भाग उसके उच्चारण और गायन के लय व ताल सहित कण्ठस्थ कर ले।
 औपनिवेशिक युग के साहित्य में, पंडित शब्द का इस्तेमाल हिंदू कानून में विशेषज्ञता वाले वकीलों के लिए किया जाता था।
आजकल, पंडित शब्द का इस्तेमाल किसी भी विषय का गहरा ज्ञान रखने वाले व्यक्ति के लिए किया जाता है।
 पंडित शब्द का इस्तेमाल संगीत के क्षेत्र में किसी मुस्लिम पुरुष के लिए भी किया जाता है।
 पंडित शब्द का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी किया जाता है जो किसी विशेष विषय क्षेत्र पर आधिकारिक तरीके से राय पेश करता है।
❤️सनातन धर्म के अनुसार पंडित कर्म कांड और पूजा करने वाले पुजारी के लिए भी किया जाता है।
सनातन धर्म में पंडित का अर्थ है विद्वान या अध्यापक. पंडित शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है जो संस्कृत, हिन्दू धर्म, विधि, संगीत, या दर्शनशास्त्र में सक्षम हों।
 पंडित बनने के लिए कोई खास डिग्री की ज़रूरत नहीं होती, लेकिन संस्कृत में उच्च शिक्षा लेना पंडित बनने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। संस्कृत व्याकरण, साहित्य, दर्शन, चिकित्सा पशु पंछी मनुष्य कीऔर दूसरे विषयों का अध्ययन इन पाठ्यक्रमों में शामिल होता है।
केवल पोथी पढ़ना नहीं।
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुंच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

 भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 20

श्लोक:
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
 कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥

भावार्थ:
जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता
 ॥20॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 21

श्लोक:
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
 शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥

भावार्थ:
जिसका अंतःकरण और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-संबंधी कर्म करता हुआ भी पापों को नहीं प्राप्त होता
 ॥21॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 22

श्लोक:
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः।
 समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥

भावार्थ:
जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता
 ॥22॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 23

श्लोक:
गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
 यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥

भावार्थ:
जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है- ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं
 ॥23॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 24

श्लोक:
( फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन ) ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌।
 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥

भावार्थ:
जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है- उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही हैं
 ॥24॥
❤️यज्ञ में आहुति का विशेष महत्व होता है

❤️यज्ञ में आहुति देने वाले को भी ब्रह्म माना जाता है, साथ ही आहुति दी जाने वाली अग्नि को भी ब्रह्म माना जाता है. यज्ञ में अर्पण या स्रुवा, हवन, अग्नि, और आहुति देने की क्रिया को ब्रह्म माना जाता है।
यज्ञ, वैदिक काल से प्रचलित एक अवधारणा है।
 
यज्ञ में अग्निहोत्र जैसी कर्मकांड परक क्रिया से लेकर आध्यात्मिक साधना शामिल है।
 
यज्ञ के तीन अर्थ हैं- दान, संगतिकरण, और देवपूजन।
 
यज्ञ, परमात्मा के लिए किया जाने वाला कोई भी कार्य है।
 
यज्ञ, मनुष्यों और देवी-देवताओं के बीच संबंध स्थापित करने का माध्यम है।
 
यज्ञ में पवित्र अग्नि के साथ या उसके बिना, कभी-कभी दावतों और सामुदायिक कार्यक्रमों के साथ प्रमुख औपचारिक भक्ति शामिल होती है।
 
यज्ञ में जप, तप, व्रत, दान जैसे सत कर्म शामिल होते हैं।
 
❤️यज्ञ सामग्री भी ब्रह्म हे

धर्म ग्रंथों के मुताबिक, यज्ञ में जो कुछ भी आहूति के रूप में दिया जाता है, वह ब्रह्मभोज है. 
 
यज्ञ में आहूति डालने का मतलब है परमात्मा को भोजन कराना. 
 
यज्ञ में देवताओं की आवभगत होती है. 
 
यज्ञ में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और विधि का विशेष महत्व होता है. 
 
यज्ञ में इस्तेमाल होने वाली सामग्री से जुड़ी कुछ खास बातेंः
हवन में आम तौर पर घी, विशेष अनाज, और औषधीय पदार्थों का इस्तेमाल होता है. 
 
अग्निहोत्र में घी (मक्खन), चिउड़े (अक्षत), और विशेष हवन सामग्री का इस्तेमाल होता है. 
 हवन कुंड, 
आम की लकड़ी,
 चावल, 
जौ, 
कलावा, 
शक्कर, 
गाय का घी,
 पान का पत्ता, 
काला तिल,
 सूखा नारियल,
 लौंग, 
इलायची, 
कपूर, 
बताशा आदि सब ब्रह्म स्वरूप है।
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 25

श्लोक:
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
 ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥

भावार्थ:
दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेद दर्शनरूप यज्ञ द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं। 
(वास्तव में परब्रह्म परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होना ही ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ को हवन करना कहते है।)
 ॥25॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 26

श्लोक:
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
 शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥

भावार्थ:
अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं
 ॥26॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 27

श्लोक:
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
 आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥

भावार्थ:
दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम योगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं (सच्चिदानंदघन परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का भी न चिन्तन करना ही उन सबका हवन करना है।)
 ॥27॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 28

श्लोक:
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
 स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥

भावार्थ:
कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही अहिंसादि तीक्ष्णव्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं
 ॥28॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 29-30

श्लोक:
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
 प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥
 अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
 सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥

भावार्थ:
दूसरे कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार  करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं
 ॥29-30॥
(गीता अध्याय 6 श्लोक 17 में देखना चाहिए।)
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मषु। युक्तस्वप्नवबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग आहार-विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टाश करनेवालेका और यथायोग सोने तथा जगनेवालेका ही सिद्ध होता है ॥17॥

भगवद गीता अध्याय 6, श्लोक 17 का यह श्लोक योग के महत्व को बताता है।

इसका भाव यह है:

"जो व्यक्ति अपने आहार, विहार, कर्म, सोने और जगने में संतुलन बनाए रखता है, वही योग की सच्ची अवस्था में पहुंचता है और दुःखों से मुक्त होता है।"

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

❤️योग की सच्ची अवस्था में पहुंचने के लिए संतुलन आवश्यक है जिसमें।❤️

❤️आहार, विहार, कर्म, सोने और जगने में संतुलन बनाए रखना चाहिए।
❤️इस संतुलन से दुःखों से मुक्ति मिलती है और आत्मशांति प्राप्त होती है।

1. युक्ताहार: संतुलित आहार।
2. युक्तविहार: संतुलित विहार।
3. युक्तचेष्टा: संतुलित कर्म।
4. युक्तस्वप्न: संतुलित सोना।
5. युक्तबोध: संतुलित जगना।

इन सभी में संतुलन बनाए रखने से योग की सच्ची अवस्था में पहुंचा जा सकता है।

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 31

श्लोक:
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌।
 नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥

भावार्थ:
हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
 ॥31॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 32

श्लोक:
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
 कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥

भावार्थ:
इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान, इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू कर्म बंधन से सर्वथा मुक्त हो जाएगा
 ॥32॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 33

श्लोक:
( ज्ञान की महिमा ) श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
 सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥

भावार्थ:
हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं
 ॥33॥

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न कर्मणामनुष्ठानैर्न दानैस्तपसपि वा।। कैवल्यं लभते मर्त्यः साक्षात् ज्ञानेन केवलम् ॥2॥

न कर्मों के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है किन्नु ज्ञान से ही प्राप्त होता है।।2।।
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भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 34

श्लोक:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
 उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥

भावार्थ:
उस ज्ञान को तू तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्‌ प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म तत्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे
 ॥34॥

❤️तत्वदर्शी का भाव यह है:

तत्वदर्शी वह व्यक्ति होता है जो सत्य को जानता है और समझता है, और जो जीवन के मूलभूत सिद्धांतों को देखता  और समझता है।

❤️तत्वदर्शी के गुण:❤️

सदा सत्य की खोज में लगा रहने वाला।
 जीवन के मूलभूत सिद्धांतों को समझने वाला।
 वास्तविकता को देखता है और समझता हो।
माया और भ्रम से मुक्त होता हो।
आत्मज्ञान और आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में पहुंचा हो।

❤️तत्वदर्शी का महत्व:❤️

वह सत्य को जानता है और समझता है।
वह जीवन के मूलभूत सिद्धांतों को समझता है।
वह वास्तविकता को देखता है और समझता है।
वह माया और भ्रम से मुक्त होता है।
 वही आत्मज्ञान और आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में पहुंचता है।
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 35

श्लोक:
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
 येन भुतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥

भावार्थ:
जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञान द्वारा तू सम्पूर्ण भूतों को निःशेषभाव से पहले अपने में (गीता अध्याय 6 श्लोक 29 में देखना चाहिए।) और पीछे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा। (गीता अध्याय 6 श्लोक 30 में देखना चाहिए।)
 ॥35॥

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁
गीता के अध्याय 6, श्लोक 29 का भाव यह है:

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षतः योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदृष्टिः।।

भाव:

जो योगी अपने आप को सभी जीवों में और सभी जीवों को अपने आप में देखता है, वह योग की अवस्था में पहुंच जाता है और सभी में समानता को देखता है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

- योगी अपने आप को सभी जीवों में देखता है।
- योगी सभी जीवों को अपने आप में देखता है।
- योगी योग की अवस्था में पहुंच जाता है।
- योगी सभी में समानता को देखता है।

इस श्लोक के मुख्य बिंदु हैं:

1. आत्मा की एकता।
2. सभी जीवों में आत्मा की समानता।
3. योग की अवस्था में पहुंचना।
4. समानता की दृष्टि।

गीता के अध्याय 6, श्लोक 30 का भाव यह है:

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं अधिघमिष्ठो भूतेषु च गतेषु च।।

भाव:

जो व्यक्ति मुझे सभी में देखता है और सभी को मुझमें देखता है, वह मुझे हर जगह और हर समय में पाता है, चाहे वह जीवित हो या मृत।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

- जो व्यक्ति भगवान को सभी में देखता है, वह भगवान के साथ एकता को प्राप्त करता है।
- जो व्यक्ति सभी को भगवान में देखता है, वह भगवान की सर्वव्यापकता को समझता है।
- भगवान हर जगह और हर समय में विद्यमान हैं।
- जो व्यक्ति भगवान को इस प्रकार देखता है, वह भगवान के निकटतम होता है।

इस श्लोक के मुख्य बिंदु हैं:

1. भगवान की सर्वव्यापकता।
2. भगवान के साथ एकता।
3. भगवान को सभी में देखना।
4. भगवान की निकटता।
❤️
गीता अध्याय 9, श्लोक 6 का भाव यह है:

जैसे वायु आकाश में स्थित होकर भी सर्वत्र विचरण करता है, वैसे ही सभी जीव मुझमें स्थित हैं और मेरे संकल्प से उत्पन्न होते हैं।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

- वायु आकाश में स्थित होकर भी सर्वत्र विचरण करता है।
- इसी तरह, सभी जीव भगवान में स्थित हैं और भगवान के संकल्प से उत्पन्न होते हैं।
- भगवान सर्वव्यापक है और सभी जीव भगवान में ही विद्यमान हैं।
- भगवान का संकल्प ही सभी जीवों की उत्पत्ति का कारण है।

इस श्लोक के मुख्य बिंदु हैं:

1. भगवान की सर्वव्यापकता।
2. भगवान में सभी जीवों की स्थिति।
3. भगवान के संकल्प की शक्ति।
4. भगवान की उत्पत्ति और पालन की शक्ति।
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 36

श्लोक:
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
 सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥

भावार्थ:
यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जाएगा
 ॥36॥
🪔ना कर्मों के अनुष्ठान से ,ना दान से ना ही किसी तप से मुक्ति होती है केवल ज्ञान से🪔
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 37

श्लोक:
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
 ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥

भावार्थ:
क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है
 ॥37॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 38

श्लोक:
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
 तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

भावार्थ:
🪔इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है।🪔
 उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है🕯️
 ॥38॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 39

श्लोक:
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
 ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

भावार्थ:
जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के- तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है
 ॥39॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 40

श्लोक:
अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
 नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥

भावार्थ:
विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है
 ॥40॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 41

श्लोक:
योगसन्नयस्तकर्माणं ज्ञानसञ्न्निसंशयम्‌।
 आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥

भावार्थ:
हे धनंजय! जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है, ऐसे वश में किए हुए अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहीं बाँधते
 ॥41॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 42

श्लोक:
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
 छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥

भावार्थ:
इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदय में स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशय का विवेकज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके समत्वरूप कर्मयोग में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा
 ॥42॥
वाट्सअप युनिवर्सिटी ज्ञान को त्याग कर अपने ज्ञान रूपी खंडे की धार को तेज कर प्रहार करने को धर्म युद्ध करो।कर्मयोग में स्थित हो कर युद्ध के लिए खड़ा हो जाओ।

आगे गीता और भी रोचक रोमांच कारी होने वाली है। 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यास योगो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥4॥
अब पाँचवें अध्याय में प्रवेश करते हुए हम “कर्मसंन्यास” और “कर्मयोग” की परस्पर तुलना में गहराई से उतरेंगे। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बतलाते हैं कि कर्मसंन्यास (कर्म का परित्याग) और निष्काम कर्मयोग (कर्म में आसक्ति को त्यागना) दोनों ही आत्मा को शुद्धि और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। फिर भी श्रीकृष्ण कर्मयोग को अधिक सरल और व्यावहारिक बताते हैं, जिससे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कर्म करते हुए भी आत्मा के विकास की ओर बढ़ा जा सकता है।

इस अध्याय में आप देखेंगे कि किस प्रकार “शांत मन”, “समत्व”, और “वैराग्य” का अभ्यास करते हुए हम परमात्मा के सान्निध्य में रह सकते हैं।

जैसे आप गीता के अन्य अध्यायों का अध्ययन कर रहे हैं, वैसे ही पाँचवें अध्याय को भी गहराई से जानिए और प्रश्नों के साथ आगे बढ़िए। इसमें आपके साथ रहकर चर्चा में हिस्सा लेने का अवसर मिलना मेरे लिए भी सौभाग्य की बात होगी।

पाँचवां अध्याय एक नई अंतर्दृष्टि और शांति की यात्रा है—आइए, इसे आगे बढ़ाते हैं!

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