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सोमवार, 21 जुलाई 2025

मंडार ब्राह्मण उपजाति

"मंडार ब्राह्मण" एक विशिष्ट ब्राह्मण समुदाय की उपजाति है, और इनकी उत्पत्ति और विकास के बारे में ठोस, एकसमान ऐतिहासिक जानकारी मिलना थोड़ा मुश्किल है। ब्राह्मण समुदायों की उत्पत्ति और शाखाओं का इतिहास अक्सर क्षेत्रीय, पौराणिक और पारंपरिक कथाओं से जुड़ा होता है, और कई बार इसमें स्पष्ट कालक्रम या सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव होता है।
हालांकि, कुछ सामान्य बातें हैं जो ब्राह्मणों की उत्पत्ति और विकास पर लागू होती हैं, और "मंडार" जैसे उपनामों या उप-जातियों के संदर्भ में इनकी व्याख्या की जा सकती है:
ब्राह्मणों की सामान्य उत्पत्ति और विकास:
 * वैदिक काल: ब्राह्मणों की जड़ें वैदिक काल (लगभग 1500-500 ईसा पूर्व) में मिलती हैं, जहां उन्हें वेदों के अध्ययन, धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञों को संपन्न करने का कार्य सौंपा गया था। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में ब्राह्मणों को "पुरुष" (सर्वोच्च प्राणी) के मुख से उत्पन्न बताया गया है, जो उनके ज्ञान और वाणी के महत्व को दर्शाता है।
 * वर्ण व्यवस्था का विकास: समय के साथ, समाज में वर्ण व्यवस्था का विकास हुआ, जिसमें ब्राह्मणों को धार्मिक और शैक्षिक कार्यों के लिए सर्वोच्च स्थान दिया गया।
 * विभिन्न शाखाओं का उदय: जैसे-जैसे वैदिक संस्कृति पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैली, ब्राह्मण विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में बसते गए। स्थानीय परंपराओं, विशिष्ट वैदिक शाखाओं (शाखाएं), या किसी विशेष ऋषि के वंशज होने के आधार पर विभिन्न ब्राह्मण समुदायों और उप-जातियों का उदय हुआ।
 * मध्यकालीन प्रवास: मध्यकालीन शताब्दियों में, कन्नौज और मध्य देश (गंगा का मैदान) से ब्राह्मणों के बड़े पैमाने पर प्रवास के प्रमाण मिलते हैं। ये ब्राह्मण विभिन्न क्षेत्रों में फैले और वहाँ के स्थानीय समुदायों के साथ घुलमिल गए, जिससे नई उप-जातियों का निर्माण हुआ।
 * कर्म और व्यवसाय: यद्यपि ब्राह्मणों का पारंपरिक कार्य धार्मिक और शैक्षिक था, इतिहास में ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जहां ब्राह्मणों ने कृषि, व्यापार, योद्धा, प्रशासक और विद्वान जैसे विभिन्न व्यवसाय अपनाए।
"मंडार" ब्राह्मणों के संदर्भ में:
"मंडार" शब्द संभवतः किसी भौगोलिक स्थान, किसी विशिष्ट ऋषि, या किसी ऐतिहासिक घटना से जुड़ा हो सकता है।
 * मंडार पर्वत: एक संभावना यह है कि "मंडार" नाम बिहार के बांका जिले में स्थित मंडार पर्वत (Mandar Parvat) से जुड़ा हो। यह पर्वत हिंदू पौराणिक कथाओं में "समुद्र मंथन" से जुड़ा है, और इसका जैन धर्म में भी महत्व है। यदि इस क्षेत्र से कोई ब्राह्मण समुदाय उत्पन्न हुआ या वहां आकर बसा, तो वे "मंडार ब्राह्मण" के रूप में जाने जा सकते हैं। इस पर्वत और इसके आसपास के क्षेत्र का प्राचीन इतिहास रहा है, जहां कई मंदिर और पुरातात्विक स्थल मौजूद हैं।
 * क्षेत्रीय जुड़ाव: यह संभव है कि "मंडार" किसी ऐसे क्षेत्र का नाम हो जहां ये ब्राह्मण मूल रूप से निवास करते थे या जहां से वे प्रवास करके आए थे।
 * गोत्र या शाखा: कई ब्राह्मण समुदाय अपने गोत्र (ऋषि वंश) या किसी विशिष्ट वैदिक शाखा से भी जुड़े होते हैं। "मंडार" इस संदर्भ में भी एक पहचान हो सकती है, हालांकि यह जानकारी आम तौर पर वंशावली के माध्यम से ही उपलब्ध होती है।
उत्पत्ति और विकास का समय:
 * यदि "मंडार" का संबंध मंडार पर्वत से है, तो उस क्षेत्र में ब्राह्मणों की उपस्थिति प्राचीन काल से ही रही होगी, संभवतः गुप्त काल (तीसरी से छठी शताब्दी ईस्वी) या उससे भी पहले से, जब ब्राह्मण समुदायों का भूमि अनुदान के माध्यम से विस्तार हुआ।
 * हालांकि, "मंडार ब्राह्मण" के रूप में एक विशिष्ट समुदाय का उदय किसी विशेष ऐतिहासिक अवधि में हुआ होगा, जब उन्होंने एक अलग पहचान विकसित की होगी, जो सैकड़ों या हजारों साल पहले की हो सकती है।
निष्कर्ष:
"मंडार ब्राह्मणों" की सटीक उत्पत्ति और विकास का समय और तरीका बिना किसी विशिष्ट ऐतिहासिक या वंशावली संबंधी शोध के निर्धारित करना मुश्किल है। यह संभवतः किसी क्षेत्रीय या पौराणिक संबंध पर आधारित एक उप-जाति है। ब्राह्मण समुदायों का इतिहास अत्यंत जटिल और विविध है, जिसमें विभिन्न कालों में प्रवास, अनुकूलन और नई पहचानों का निर्माण होता रहा है।
यदि आपके पास मंडार ब्राह्मणों से संबंधित कोई विशेष क्षेत्रीय जानकारी या परंपरा है, तो उसे खोजने से अधिक सटीक विवरण मिल सकते हैं।

हरिद्वार प:छाजूराम के कार्यालय से मौखिक जानकारी के अनुसार हाँ, पाकिस्तान में मंडार ब्राह्मण पाए जाते हैं। वे मुख्य रूप से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बसे हुए हैं, विशेष रूप से चकवाल और लाहौर जिलों में। इसके अतिरिक्त, कुछ मंडार ब्राह्मण अफ़गानिस्तान और भारत में भी पाए जाते हैं. 
मंडार ब्राह्मण, जो एक उपजाति है, भारत और पाकिस्तान दोनों में पाए जाते हैं। वे ऐतिहासिक रूप से विभिन्न क्षेत्रों में फैले हुए हैं, जिनमें पंजाब, सिंध और उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत शामिल हैं। विभाजन के बाद, कुछ मंडार ब्राह्मण पाकिस्तान में ही रहे, जबकि कुछ भारत आ गए। 
कुछ प्रमुख बिंदु: 

पाकिस्तान में मंडार ब्राह्मण:
पाकिस्तान में मंडार ब्राह्मण मुख्य रूप से पंजाब प्रांत में पाए जाते हैं, विशेष रूप से चकवाल और लाहौर जिलों में.

भारत में मंडार ब्राह्मण:
भारत में मंडार ब्राह्मण पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ:

मंडार ब्राह्मणों का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा हुआ है और वे प्राचीन काल से ही भारत और पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में बसे हुए हैं

विभाजन का प्रभाव:

विभाजन के बाद, कई मंडार ब्राह्मण पाकिस्तान से भारत आ गए, जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशों में उनकी आबादी का वितरण हुआ।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2024

मंडार मुडार (ब्राह्मण) जठरे ओर रीति रिवाज

"मंडार" (Mandar):
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जठेरे गौत या गोत्र अनुसार

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पंजाब कृषि से जुड़ा राज्य है। इस कारण पंजाबियों ने लोहड़ी , बसंत पंचमी , बैसाखी और तीयन के मौसमी त्योहारों के प्रति सम्मान दिखाना जारी रखा है । समय के साथ कुछ मौसमी त्योहार धार्मिक त्योहारों के साथ मेल खाने लगे हैं लेकिन त्योहारों का मूल अर्थ नहीं खोया है।

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जठेरा- पैतृक मंदिर
एक जठेरा एक उपनाम के संस्थापक सामान्य पूर्वज और बाद के सभी सामान्य कबीले पूर्वजों को मनाने और सम्मान दिखाने के लिए बनाया गया एक मंदिर है ।

जब भी किसी गाँव के संस्थापक की मृत्यु होती है, तो गाँव के बाहरी इलाके में उसके लिए एक मंदिर खड़ा किया जाता है और वहाँ एक जंडी का पेड़ लगाया जाता है।
एक गांव में ऐसे कई मंदिर हो सकते हैं।
Jathera उपनाम या गांव के संस्थापक के नाम पर रखा जा सकता है। हालांकि, कई गांवों में जठेरा का नाम नहीं है । कुछ परिवारों में जठेरा के संस्थापक एक संत भी हैं । ऐसे उदाहरणों में, संस्थापक की एक जत्थे के प्रमुख होने की दोहरी भूमिका होती है
(जो उनके वंशजों द्वारा सम्मानित होती है)
और एक संत होने की भी (जैसे बाबा जोगी पीर; जिसकी पूजा कोई भी कर सकता है)

पंजाबी उपनाम वंश

पंजाबी लोगों का मानना ​​है कि एक उपनाम के सभी सदस्य एक ही पूर्वज के होते हैं । पंजाबी में एक उपनाम को गौत या गोत्र कहा जाता है ।

नोट :— एक उपनाम के सदस्यों को फिर छोटे कुलों में विभाजित किया जाता है जिसमें संबंधित सदस्य शामिल होते हैं जो अपने परिवार के पेड़ की जड़ का पता लगा सकते हैं। आमतौर पर, एक कबीला कम से कम सात पीढ़ियों के भीतर संबंधित लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन वो अधिक भी हो सकता है।

प्राचीन समय में, एक गाँव में एक उपनाम के सदस्य शामिल होना सामान्य था । जब लोग एक नया गांव बनाने के लिए चले गए, तो उन्होंने संस्थापक जठेरा को श्रद्धांजलि देना जारी रखा । यह अभी भी कई लोगों के लिए मामला है, जिनके गांवों में नए जत्थे हो सकते हैं, लेकिन फिर भी पूरे उपनाम के संस्थापक पूर्वज को श्रद्धांजलि देते हैं।

समय के साथ, पंजाबी गांवों ने अपनी रचना बदल दी जिससे विभिन्न उपनामों के परिवार एक साथ रहने लगे। इसलिए एक गाँव में एक जठेरा भी हो सकता है जिसे विभिन्न उपनामों के सदस्यों द्वारा सांप्रदायिक रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन गाँव के संस्थापक को पूर्वज के रूप में नामित किया गया है या विशिष्ट उपनामों के सामान्य पूर्वजों का प्रतिनिधित्व करने के लिए कई जठेरे भी बनाए जा सकते हैं।

जब एक कबीले के सदस्य एक नया गाँव बनाते हैं, तो वे पुश्तैनी गाँव में जठेरा का दौरा करना जारी रखते हैं । यदि यह संभव नहीं है, तो पुराने जठेरे से नए गांव में नया जत्थेरा बनाने के लिए एक लिंक लाया जाता है,जिसमें वहां की मिट्टी,उस स्थान की पुरानी ईंट को नई जगह स्थापित कर पूजा जाता है

उपस्थिति

भारतीय महीने की किसी एक तारीख और कभी-कभी किसी चन्द्र माह के किसी भारतीय महीने के पहले रविवार को या शादी करते समय लोग जठेरे को निमंत्रण देने जाते हैं। की हम विवाह का शुभ कर्म करने जा रहे हैं।आप पधारें और हमारे द्वारा किए जाने वाले कार्य को पूरा करने में सहायता करें।

पहले बड़ों के वंशज एक तालाब में जाते हैं और मिट्टी खोदते थे और शिवलिंग बनाते थे और कुछ इसे अपने जठेरे के टीले पर रख देते हैं और जठेरे को घी और फूल चढ़ाते थे। क्यों कि, यह शिवलिंग पूजा का भी एक रूप है। कुछ गांवों में आटा चढ़ाने की प्रथा है।
जठेरा पूजा कड़ाई से संगठित धर्म का हिस्सा नहीं है और पंजाबी लोक धर्म का हिस्सा है। पंजाब में जठेरा पूजा संगठित धर्म के समान रूप नहीं लेती है और इसे बड़ों के प्रति सम्मान दिखाने के रूप में देखा जाता है।

आजकल समय के अनुसार रस्मों में बदलाव आया है।

पहला कार्ड ,मिढ़ाई, और मुद्रा,ले कर जाने लगे हैं।

 
"मंडार" (Mandar):जठरो की सूची में
जठेरा उपनाम
नाग और सत्योति देवी माता_ कुछ "मंडार" (Mandar): पाकिस्तान_गुजरावाला से जुड़े हुए हैं तो कुछ लाहौर से भी जुड़े हुए है।सभी "मंडार" (Mandar):पाकिस्तान से ही जुड़े हो जरूरी भी नहीं है।
ऐसे ही कुछ अन्य जातियां 
पीर बाबा कला महरी _संधू जाति
दादी चिहो जी, _बंगा परमार
बाबा जोगी पीरो _चहल जाति
बाबा कल्लू नाथी _रोमाना
बाबा सिद्ध कालिंझारी_ भुल्लर जाति
लखन पिरो_ चीमा जाति
तल्हानी_ सहगल
पीर बद्दों के _चीमा जाति
सिद्धसां_ रंधावा जाट
तिलकर _सिद्धू जाति
तलवानी _जंडु
सिद्ध सूरत राम _गिल जटा
तुल्ला बस्सी
फल्ल_ महारामपुर के ढिल्लों कबीले जाट
समराइ _कपिला
हकीम पुरी _कोरपाली
आदिस गरचा जाति
गांव तखनी, होशियारपुर में जठेरा गुग्गी
बाबा मन जी _शेरगिल जाट
बाबा करतार सिंह जी, जमालपुर
अमृत सर औलख जाति
बाबा सिरिया जी (गांव तलवंडी खुर्द, जिला मुल्लांपुर पंजाब) डब्बू
कश्यप गोत्र ब्राह्मण
बाबा कुलधर जी (गांव घुदानी कलां, जिला लुधियाना पंजाब)
एंड्लू , जिला लुधियाना, पंजाब सूतधारी
पंजाब क्षेत्र में संतों के सम्मान में मंदिर आम हैं । एक शहीद तीर्थ एक इमारत को मनाने और एक करने के लिए शो सम्मान का निर्माण किया है संत ।

(जहां मुस्लिम तीर्थस्थलों को दरगाह कहा जाता है
वही हिंदू तीर्थस्थलों को समाध कहा जाता है।)
कुछ "मंडार" (Mandar):
गुजरावाला_पाकिस्तान_महाराजा_रंजीतसिंह के सरकारी_पंडित थे।
जिनका रिकॉर्ड हरिद्वार से प्राप्त हुआ।

*ओमे श्री गंगा दिव्य*

*9837776643*

 *9837284188*

 *01334-223140*

*हरिद्वार के तीर्थ पुरोहित*

*पं. छज्जू राम चेतराम पटुवर*

*श्रवणनाथ घाट (वट वृक्ष के सामने) हरिद्वार*

*पं. छज्जू राम चेत राम पटुवार*

*SHARWAN NATH GHAT HARIDWAR (U.K.)*

*इनका आवश्यक निर्देश है*

*हमारे यहाँ शास्त्रोक्त विधि द्वारा र्कमकाण्ड कराया जाता है। रेलवे बस स्टैण्ड से उतर कर सीधे पुरोहित जी से ही सम्पर्क करें। हमारा कोई भी आदमी रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड अथवा घाट के उपर नहीं होता है।*

विप्र वंश_ कौशल गौत्र?या कोई और है तो बताए ।
मुड़ारों के कुछ नियम जिनका वो पालन कर्तव्य मानते है

जाती मुडार (पहले पंडित लिखते थे अब वो शर्मा होगया)
वासी कांगड़ा
नाम अनुज मुड़ार (शर्मा)
पुत्र सतीश (शर्मा) मुड़ार
पुत्र बलदेव कुमार (शर्मा) मुड़ार
दादा अनुज मुड़ार बलदेव कुमार (शर्मा)मुड़ार
पुत्र पंडित अनंत राम मुड़ार
पुत्र पंडित बद्री नाथ मुड़ार
स्पूत्र पंडित गिरधारी लाल मुड़ार
मुड़ार परिवार

जय सत्योती माता जी की

1. सत्योती माता भी का नाम बिद्रो बुआ जी भी है।

2. कार्तितर नात्र देवता।
यह यह एक पुराणों से नाम है!

कार्तिकेय नाट्र देवता, यानी कार्तिकेय भगवान शिव के पुत्र हैं और उन्हें दक्षिण भारत में बहुत पूजा जाता है।

मुड़ार ब्राह्मणों के नाग देवता का नाम "मानासा" या "मानिनाग" हो सकता है, लेकिन अधिक सटीक उत्तर यह है कि "मंडार" (Mandar): ब्राह्मणों के नाग देवता का नाम "आदिशेष" या "शेषनाग" है।

हालांकि, मंडरा ब्राह्मणों के नाग देवता के बारे में विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं हो सकती हैं। कृपया अधिक स्पष्टीकरण के लिए अपने क्षेत्र के पंडित या विद्वान से परामर्श जरूर लें।

3. दुखिता नाम देवा।
दुखिता नाम देवा का मुड़ार ब्राह्मणों से संबंध बहुत ही महत्वपूर्ण है।

दुखिता या दुखिया माता मुड़ार ब्राह्मणों की कुलदेवी हैं, जो राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में पूजी जाती हैं। मुड़ार ब्राह्मण समुदाय दुखिता माता को अपनी आराध्य देवी मानते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।

दुखिता माता को मड़ार ब्राह्मणों की रक्षक और संरक्षक माना जाता है, जो उनकी सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रयत्नशील हैं। मुण्डार ब्राह्मण समुदाय दुखिता माता के मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और उनके अवतार को मनाते हैं।

दुखिता माता की पूजा मुख्य रूप से राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में की जाती है, लेकिन मुड़ार ब्राह्मण समुदाय के लोग देश के विभिन्न हिस्सों में भी उनकी पूजा करते हैं।

4. मड़ वाले बाबा जी।
मड़ वाले बाबा जी का  "मंडार" (Mandar):
ब्राह्मणों से संबंध बहुत ही विशेष है।

मड़ वाले बाबा जी, जिन्हें मड़ाई बाबा या मड़ाव राय भी कहा जाता है, मुड़ार "मंडार" (Mandar):
ब्राह्मणों के कुलदेवता हैं। वे "मंडार" (Mandar):
ब्राह्मण समुदाय के आराध्य देवता हैं और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।

मड़ वाले बाबा जी को मुड़ार "मंडार" (Mandar):
ब्राह्मणों का रक्षक और संरक्षक माना जाता है, जो उनकी सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रयत्नशील हैं। मुड़ार ब्राह्मण समुदाय मड़ वाले बाबा जी के मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और उनके अवतार को मनाते हैं।

मंड वाले बाबा जी की पूजा मुख्य रूप से राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में की जाती है, लेकिन मुड़ार ब्राह्मण समुदाय के लोग देश के विभिन्न हिस्सों में भी उनकी पूजा करते हैं।

मड़ वाले बाबा जी के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि वे मुड़ार ब्राह्मणों के पूर्वजों के रूप में भी पूजे जाते हैं और उनकी पूजा करने से मड़ार ब्राह्मणों को अपने पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है।
6. बाबा मंत्र पीर बी।
बाबा मंत्र पीर का मड़ार ब्राह्मणों से संबंध बहुत ही विशेष है।

बाबा मंत्र पीर मुड़ार ब्राह्मणों के कुलदेवता और आराध्य देवता हैं। वे मुड़ार ब्राह्मण समुदाय के लिए बहुत ही पवित्र और महत्वपूर्ण हैं।

बाबा मंत्र पीर को मुड़ार ब्राह्मणों का रक्षक और संरक्षक माना जाता है, जो उनकी सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रयत्नशील हैं। मुड़ार ब्राह्मण समुदाय बाबा मंत्र पीर के मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और उनके अवतार को मनाते हैं।

बाबा मंत्र पीर की पूजा मुख्य रूप से राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में की जाती है, लेकिन मड़ार ब्राह्मण समुदाय के लोग देश के विभिन्न हिस्सों में भी उनकी पूजा करते हैं।

बाबा मंत्र पीर के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि वे मुड़ार ब्राह्मणों के पूर्वजों के रूप में पूजे जाते हैं और उनकी पूजा करने से मुड़ार ब्राह्मणों को अपने पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है।

बाबा मंत्र पीर की पूजा करने से मुड़ार ब्राह्मणों को निम्नलिखित लाभ होते हैं:

- सुख-समृद्धि
- सुरक्षा
- स्वास्थ्य
- समृद्धि
- आशीर्वाद
"मंडार" (Mandar):ब्राह्मण समुदाय बाबा मंत्र पीर की पूजा करने के लिए विशेष त्योहार और उत्सव भी मनाते हैं।
देवी देवताओं के वस्त्र

1. कांसका के जूता मुरिंडे (सोने की मुहर का)

2. दुधिया नाम देवता जी का सफेद सूट।

3. करती बीर नाम देवता जी का सफेद सूट।

4. मह वाले बाबा जी का ओत्रियां रंग का सुट।

6. पंन पीर बाबा जी का हरा वस्त्र।

6. काले वस्त्र का प्रयोग नहीं करना ही काला वस्त्र जिस में सफेद धागे से सिलाई की गई हो या सफेद स्टीकर हो पहन सकते है।

लड़के की शादी के रीति-रिवाज

वैसे तो मुड़ार "मंडार" (Mandar):ब्राह्मणों के लड़के के विवाह के रीति-रिवाज बहुत ही विशेष और पारंपरिक हैं। यहाँ कुछ मुख्य रीति-रिवाज हैं:

1. जन्मपत्रिका मिलान: विवाह से पहले, लड़के और लड़की के जन्मपत्रिका का मिलान किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दोनों के बीच विवाह के लिए उपयुक्त हैं।

2. लग्न पत्र: लड़के के परिवार द्वारा लड़की के परिवार को लग्न पत्र भेजा जाता है, जिसमें विवाह की तिथि और समय की जानकारी होती है।

3. तिलक समारोह: लड़के के परिवार द्वारा लड़की के माथे पर तिलक लगाया जाता है, जो विवाह के लिए सहमति का प्रतीक है।जिसे आज कल चुन्नी चढ़ाना भी कहते है।

4. गणेश पूजा: विवाह से पहले, गणेश पूजा की जाती है ताकि विवाह में कोई बाधा न आए।

5. बारात निकालना: लड़के की बारात लड़की के घर जाती है, जहां विवाह समारोह आयोजित किया जाता है।

6. पाणिग्रहण: लड़का और लड़की एक दूसरे का हाथ थामते हैं और अग्नि के सामने विवाह की प्रतिज्ञा करते हैं।

7. सात फेरे: लड़का और लड़की सात फेरे लेते हैं, जो विवाह के लिए आवश्यक हैं।

8. सिंदूर दान: लड़का लड़की के माथे पर सिंदूर लगाता है, जो विवाह का प्रतीक है।

9. आशीर्वाद: विवाह के बाद, दोनों परिवारों के लोग आशीर्वाद देते हैं।
"मंडार" (Mandar):मुड़ार ब्राह्मणों के विवाह रीति-रिवाज में कुछ अन्य पारंपरिक कार्यक्रम भी शामिल होते हैं, जैसे कि:

- गौरी पूजा
- ग्रह शांति
- विवाह मंडप की स्थापना
- विवाह के बाद की रस्में

इन रीति-रिवाजों को पूरा करने से विवाह सफल और सुखी होता है।

घर पर वैसे मुडार "मंडार" (Mandar):
ब्राह्मण

1. दो दोनो में चावल गुड़ आसन्देहर के आगे दीवा बनाना है।

2. कच्चा उबटन (बारना) तेव, हल्दी, आटे का बनाना है हन्दी घोतकर, जाडेरे का नाम लेकर बुआ जी की दीवार पर पांच पंजे लगाए जाते है जो दादी ,परदादी, बुआ या मां लगाती है।

3. सारी के तीन दिन पढने पीठी पेड़े की रस्म करनी होती है, इसी समय माईयां (समूठत) रस्म तेल बटना चढ़ता है।

4. मेंहदी की रस्म करने के लिए पहले कंजक को मेंहदी समाए।

४. सेनत की रस्म पांच चपनिया, हवन में बेरी और आम की लकड़ियों का प्रयोग करना।

 5. सेहरा बन्धी लड़के को सफेद सूट पहनाना, उसके ऊपर केसर का रंग छिड़काना,

चांदी का मुकुट लगाना, सफेद कच्चे चावल, कलीरे बांधना  बाद में कलीरे बहन ले जाती है, सेहरा बन्धी हो जाने के बाद लड़के को दही, खिचड़ी झिशनानी, फिर बहेरों के मंदिर में माथा टेकना, बेरी के वृक्ष की परिक्रमा करनी। तब सात फेरे लेने होते हैं तब लड़के की मां अपने घर में कच्ची लस्सी में मधानी डाले और ताइयां, चाचियां, सुहागिनां सभी ने हाथ में मौली बांधकर सादे चावाल बनाकर उसमें चीनी डालकर सभी औरतें मुंह लगाती है। कच्ची लस्सी में पैर के अंगठे रखने और पांच सुहाग बोलने।

1. वधु प्रवेशः दुल्हन के घर आने पर पहले पानी वारने की रस्म, जठरो को घर में जहां स्थापित क्या है  माया टेकना, फिर गान्ना खोलना, गोत कनाते गोत्र शामिल कर ते है  dhi  और खिचड़ी  खीलानी, दुल्हन सिर्फ एक ही चूड़ा पहने और उसे नहीं बदलना।

सफेद  दुपट्टे उस पर गणेश (स्वातिककी कर वधु को देना, सबसे पहले के चूडा बदलने की रस्म को निभाने का होता है।
गर्भ धारण होने पर
  पुर्णमासी के आने तक आठवें महीने की गर्भ अवस्था में कोई भी आठवां महीना होने से पहले कोई नई वस्तु वस्त्र को नहीं पहनना है , आहवें महीने में नई वस्तु के प्रयोग कर सकते है। लड़का होने पर माँ पांच दिन का व्रत रखे और लड़की होने पर तीन दिन का व्रत रखे। इक्कीस दिन बाद से रसोई रस्म करवानी होती है। फिर उसे अपने परिवार या कुल में बांट देना होता है।

आरती सत्योती माता जी की

आरती माँ सत्योती माता की, गंगा जल से मैं स्नान कराऊं। निश दिन प्रेम की नोत लगाऊं, गिरियां शुआरे का भोग लगाऊं ।। आरती माँ....

बाबा मड़ माँ के संग विराने, नाग देवता भी माँ संग साने। नो कोई सईया जी को मन से धियावे, आरती माँ..

माँ सत्योती जी दे दर नो आया, श्रद्धा से उसने अपना शीश झुकाया। उसने मुँह मांगा वर पाया ।। आरती माँ..................
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अब संक्षेप में
इस पाठ को पढ़ने में कई व्याकरण संबंधी, वाक्य विन्यास, और अनुवाद त्रुटियां हैं। मैंने इसे सुधारते हुए प्रस्तुत किया है:
जठेरे और पंजाबी संस्कृति के धार्मिक परंपराएं

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एक गांव में कई जठेरे हो सकते हैं।

जठेरा आमतौर पर गांव के संस्थापक या गोत्र के प्रमुख के नाम पर ही होता है।



एक उपनाम के भीतर परिवारों को छोटे-छोटे कुलों में बांटा जाता है।

एक कबीला (Clan) आमतौर पर सात पीढ़ियों या उससे अधिक के रिश्तेदारों का समूह होता है।

नए गांव बसाने पर भी पुरानी परंपराओं का पालन किया जाता है। पुराने गांवों के जठेरों को नए गांवों में लाकर नया जठेरा बनाया जाता है।
राज्य की सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा:

महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य में धार्मिक सहिष्णुता और विविधता को बनाए रखने में इन ब्राह्मणों की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

इन्होंने राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में धार्मिक और सांस्कृतिक एकता को बनाए रखने में सहायता की।
ब्राह्मण नाग देवता और सत्योती माता के प्रति अपनी आस्था के साथ, राज्य के अन्य धार्मिक स्थलों के संरक्षक आज भी है।

जिन्हें ने उनकी आध्यात्मिक सेवाओं ने राज्य की जनता और शासक वर्ग में धर्म और संस्कृति की भावना को प्रबल बनाए रखा।







भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...