आनंद प्रभु की आनंद मई स्तुति
शिव गीता की अध्याय 11 से श्रवण करें
ज्ञानमार्ग जीव कि वे अंतर्गत और पर लोग नकद देन के कारण है
यह वहां संक्षेप से कहकर विस्तार से वर्णन करते हुए श्री भगवान ने ही
रमेश उस झील के लिए हंटर घटे और पर लॉक कर मैं तुमसे वादा करता हूं
धान होकर इस धूल वे भी जो कुछ भोजन किया जाता और पिया चाहता थी उसी के कारण रही और ढूंढ रहे भी संबंध उत्पन्न होता है
उसी से जीवन धारण होता है
जिस समय भी आनंद या जरावस्था से का प्रबल होता है तब जसराना की मंद हो जाने से गुजर किया हुआ अच्छी तरह नहीं पचता है
जैसे भूजल बिना रस के न प्राप्त होने से शीघ्र ही धातु सूख जाते है और भोजन की तथा पान से ही शरीर में जठराग्नि के रहे रहते जो भक्षण किया जाता है
वे रूप होकर शरीर को पुष्ट करता है
उस समय प्राण वायु में संपूर्ण रस लेकर सब धातुओं में पहुंचाता है इसी कारण से यह समान कहलाता है
जो वृद्धावस्था में उत्पन्न नहीं होता इस कारण शरीर के बंधन जो दृढ़ता से परस्पर संघर्ष करते थे शिथिल हो जाते है
जिस प्रकार भी आमतौर पर रखकर अपने भार से आप ही शीघ्र पतित हो जाता है
इसी प्रकार शरीर को शिथिल होने से लिंग शरीर का इस टूल से जीव हो जाता है
संपूर्ण इंद्रियों की वासना आध्यात्मिक जीवन संबंधी बुद्धि और ज्ञानेन्द्रिय आदि आधिभौतिक प्राप्त होने वाली देरी का कारण हूँ
सूक्ष्म रूप वाले कारण ये तीनों आकर्षित होकर करने का मन में एकता को प्राप्त होते ही था
मुख्य प्राणवायु शेष नौ आयोग से युक्त होकर श्वास रोग भी हो जाता है
और वे सब एक होकर जीवात्मा का रूप से ही विद्या कर और वासना से युक्त हो ये ही अपने कारण से ही नारी मार्ग का आश्रय करके नेत्र मार्ग अथवा ब्रह्मरंध्र के द्वारा के बाहर रहता है
जिस प्रकार से घड़े को इस देश से दूसरे स्थान में ले कर जाते ही परन्तु वे आकाश से पूर्ण ही जाता है
जहां घट जाएगा उसी स्थान पर घटा आकाश भी जाता है इसी प्रकार से जहां जहां लिंग शरीर गमन करता है
उसे उसी स्थान मिली जीव होता है
और कमान उसका दूसरे दिल को प्राप्त था ही
जिस प्रकार नदी का मनुष्य कभी इस किनारे और का भी दूसरे किनारे जाता है
इसी प्रकार यह मोक्ष न होने तक अनेक योनियों में भ्रमण करता रहता है
जो पापी हैं उनको यमदूत ले जाते ही यह यातना देने का जो नरक दुख भोगने के लिए ले कर जाते है ध्यान रहे यह यम दूत काम क्रोध लोभ मोह और अहंकार ही है जो साथ साथ रह कर अच्छे बुरे कर्मों का लेखा जोखा याद रखते है
उनका आश्रय करके केवल न को ही को भोगता है और जिन्होंने सदा ही यज्ञ आदि पूत वापी को को तरह भी निर्माण करना उन का काम है
वे लोग को गमन करती ही यमदूत उन्हें लोक को प्राप्त करते ही कुछ माह का क्रम यह है कि लू फिर रात्री अभिमानी देवता के निकट से कृषि पक्ष अभिमानी देवता के लिखकर शेर दक्षिणायन
विमान देवता के निकट फिर वहां से ही पितृलोक में जाता है प्रतिलोक से आगे चंद्र लोगों को प्राप्त हो से थे पाकर महालक्ष्मी का भोग करता है
वहां यह चंद्रमा के ही समान होकर कर्म के फल कि अभी तक चंद लोग में वास करता है
जब पुण्य फल समाप्त हो जाता है तो जिस क्रम से इस लोक में का मन हुआ था उसी क्रम भी इस लोक में छेड़ रखा है
चंद लोग से चलते समय उस शरीर कुछ हो या आकाश रूप होकर आकाश से भाई और वायु से जल में आता है
झलक भी में हूँ
में प्राप्त होकर शरीर वसा द्वारा पृथ्वी पर प्रतीत होता है फिर अनेक करण के वश का भक्षण योग्य अन्य में प्राप्त होता है और कितनी एक शरीर प्राप्ति के निमीत मनुष्य आदि की योनि में प्राप्त होते है और कितने
ज्ञान की तारतम्य में भी से इस था और आदि योनि को प्राप्त हो जाती ही झूठी अन्य में प्राप्त हुए ही उस अन्न को इस स्त्री पुरुष भक्षण करते ही उसे स्त्री और पुरुषों का राज और शुक्र होकर उन दोनों के संभोग से ही स्त्री
गर्भ धारण करती ही यही कर्म के अनुसार इस स्त्री पुरुष और नपुंसक होता है
इस प्रकार इस झील की इस लोक में घर और पर लोग गलत थी अब इस की मुक्ति का वर्णन करता हूं
यह जो शम धर्म कर्म आदि साधन संपन्न सदा नहीं गाना श्रम के करती और फल की आकांक्षा न करके शुल्क और
पर कहते ही वे मनुष्य देवयानी मार्ग से लोग पर वन गमन करती या ध्यान रहे धर्म कर्म दोनों भगवान के पुत्र और शर्म नामक लड़की है जिनमें यह गुण हों वही भगवान के बच्चे हैं
जब कि में प्राप्त को पीछे धकेल और से शुकल पक्ष अभिमानी देवता के लिख कर जाता है
से उत्तरायण को प्राप्त होकर संवत्सर के लिख कर गमन करता है
फिल्म सूर्य लोक को प्राप्त होता है
लोग से भी उन पर दुष्ट लोग को प्राप्त होता है
से आगे कोई पुरुष ही विविध को प्राप्त हो ब्राह्मणों को जाता है और वहां से यहां नहीं आता ब्रह्मलोक में प्राप्त होकर उपाधि से के आश्रित हो यह जीव रहता
डेविड हेडली ब्रह्मलोक में अनेक प्रकार के मन पसंद भोगों को घूरता हुआ बहुत काल तक उसे स्थान में भास्कर ब्रह्मा के का मुक्त हो जाता है
उसके से आवृत्ति नहीं होती जिस प्रकार से स्वप्न में देशी दृष्टि जागृत होते ही लाई जाती है
इसी प्रकार से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने से यह सब सृष्टि ले जाती है
और जिन्होंने केवल पाते ही और उपासना तरह पूंजीकरण से रहित की तीसरी कट थी न रख सकती है
वे अनेक प्रकार की राह और घोर लड़कों को धोकर पीछे शेष कर्मों के अनुसार शूद्र जंतुओं के शरीर को प्राप्त होते है पर भी में भी मदद शहर दास आदि का जन्म लेता है
इस प्रकार झील की गति तो रंग की
और क्या तुमने की गई श्री रामचंद्र हो रही
हे भगवान आपने उपासना और कर्म फल से अनेक प्रकार से ही चंद्र लो और ब्रह्मलोक लोक की प्राप्ति वर्णन की
हाथी गंधर्व आदी लोग और इन्द्रादि लोगों को में किस प्रकार से ही गौरव प्राप्त होते ही कोई भी का कोई इंद्र और कोई गंधर्व था ही शंकर यह कर्म का फल है
यह उपासना का फल ही तो कृपा करके वर्णन किया
इस में मुझे बड़ा भी शिवजी बोले उपासना और शुभ कारण इन दोनों के ही योग से फल प्राप्त होता है
मैं हम वादा करते ही जो मनुष्य युवा कई भर शू नियमों और बलवान हो गए थे
शब्द भी प्रयोग पृथ्वी को निष्कंटक भोग करता हूं
उसका ना मानुष आनंद ही आनंद प्रभु साधारण मनुष्यों को वे प्राप्त होने वाले आनंद से सौ गुना अधिक है
जो मनुष्य तप आदि से संयुक्त हो गए
गंधर्व होता है मनुष्य के आनंद भी सौ गुना आनंद गंधर्वों को प्राप्त हुई
इसी प्रकार से ऊपर लोग देवलोक आदि में उत्तरोत्तर चौगुना आना बढ़ता जाता है
फिर भी देवि देवता से इंद्र से बृहस्पति बृहस्पति से भ्रम ते ब्रह्मदेव से ब्रह्मानंद उत्तरोत्तर सौ गुना अधिक से जान के आनंद से अधिक आनंद तो देवलोक में मिलना कहा है जाने किसी को किसी की
तो की अपेक्षा कहीं
कहीं से भय ही है
जो ग्राहम क्षत्रिय आदि वेद वेदांग कि पाक आर्मी निशाः और काम ही और भागवत की उपासना करने वाले ही वे अनुक्रम भी उत्तरा उत्तर आनंद को पुरा को पढ़ें
दर्शन को माह ये जो कुछ आनंद है सो आत्मज्ञान की बराबर ही हर इस लिए आत्मज्ञान का ही अनुष्ठान करना है
जो ग्राम भ्रम देवता है उसे कर्म उपासना से कुछ प्रयोजन नहीं है
नौ की करंसी कुछ वृद्धि और ना न करने दें कुछ नहीं है
निशाः गहरी वे करने का विधान और विशेषकर वो का निश्चय किया है
वे केवल जिस तरह ज्ञान नहीं तभी तक है ज्ञान होने पर कुछ नहीं और यदि ज्ञानी लोग विस्थापन के लिमिट करें तो भी कुछ आनंद ही इस कारण जान माल ब्रह्मा सबसे श्रेष्ठ जो कोई भी बन गया है
जानकर कम करता है
उसके पुण्य का फल अक्षय का है जिस पर को मनुष्य करोड़ों ब्राह्मण की भोजन कराने से प्राप्त करता है
वे एक यानी कि भोजन कराने से प्राप्त हो जाता है
जो बहुत ज्ञानी जनों को दिया जाता है में करोड़ों गुना मिलती है और जो मनुष्यों में अदम के आने की निंदा करता है
क्षय रोग को प्राप्त होकर मृतक हो जाता है का की जानी साक्षात ईश्वर है
अध्याय शिव गीता 11 का समापन
आनंद प्रभु आनंद ही आनंद