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सोमवार, 23 अक्टूबर 2023
शुक्रवार, 15 सितंबर 2023
जसपाल भट्टी
जसपाल भट्टी हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली, लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए.
🎂जन्म: 03 मार्च 1955, अमृतसर
⚰️मृत्यु: 25 अक्तूबर 2012, शाहकोट
पत्नी: सविता भट्टी (विवा. 1985–2012)
बच्चे: जसराज भट्टी, राबिया भट्टी
माता-पिता: सरदार नरिंदर सिंह भट्टी, मंजित कौर कैलर
हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए. व्यंग-चित्रकार (कार्टूनिस्ट) जसपाल भट्टी, 80 के दशक के अंत में दूरदर्शन की नई प्रातःकालीन प्रसारण सेवा में उल्टा-पुल्टा कार्यक्रम के माध्यम से प्रसिद्ध हुए थे।उनके इस सबसे लोकप्रिय फ़्लॉप शो को उनकी उनकी पत्नी सविता भट्टी ने प्रोड्यूस किया साथ ही उसमें अभिनय भी किया| इस शो से इससे पहले जसपाल भट्टी चण्डीगढ़ में द ट्रिब्यून नामक अख़बार में व्यंग्य चित्रकार के रूप में कार्यरत थे। एक व्यंग्य चित्रकार होने के नाते इन्हे आम आदमी से जुड़ी समस्याओं और व्यवस्था पर व्यंग्य के माध्यम से चोट करने का पहले से अनुभव था। अपनी इसी प्रतिभा के चलते उल्टा-पुल्टा को जसपाल भट्टी बहुत रोचक बना पाए थे। 90के दशक के प्रारम्भ में जसपाल भट्टी दूरदर्शन के लिए एक और टेलीविज़न धारावाहिक, फ्लॉप शो लेकर आए जो बहुत प्रसिद्ध हुआ और इसके बाद जसपाल भट्टी को एक कार्टूनिस्ट की बजाय एक हास्य अभिनेता के रूप में जाना जाने लगा। 25 अक्टूबर 2012 को सुबह 3बजे जालंधर, पंजाब में एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
📽️
2006 फ़ना
2005 कुछ मीठा हो जाये
2003 कुछ ना कहो
2003 तुझे मेरी कसम
2002 जानी दुश्मन
2002 कोई मेरे दिल से पूछे
2002 शक्ति
2002 ये है जलवा
2000 हमारा दिल आपके पास है
2000 खौफ़
1999 जानम समझा करो
1999 काला साम्राज्य
1999 आ अब लौट चलें
1999 कारतूस
बुधवार, 14 जून 2023
शारदा
*🎂जन्म 25 अक्टूबर 1937*
*⚰️मृत्यु 14 जून 2023*
शारदा राजन आयंगर जिन्हें केवल शारदा नाम से श्रेय दिया गया, हिन्दी फिल्मों की पार्श्वगायिका रही हैं। 1960 और 70 के दशक में वो सक्रिय रही और 1969 से लेकर 1972 तक फिल्मफेयर पुरस्कारों में उन्हें चार नामांकन प्राप्त हुए, जिसमें से उन्हें जहाँ प्यार मिले के "बात ज़रा है आपस की" के लिये पुरस्कार प्राप्त भी हुआ। हालाँकि उन्हें सर्वाधिक रूप से सूरज (1966) के गीत "तितली उड़ी" के लिये पहचाना जाता है।
शारदा का परिवार तमिल है। लेकिन उन्हें बचपन से हिन्दी गीत गाने का शौक था। तेहरान में एक बड़े फिल्म वितरक श्रीचंद आहुजा ने राज कपूर के लिये पार्टी रखी थी जिसमें शारदा ने गायन किया। राज कपूर ने उन्हें मुम्बई आने पर शंकर-जयकिशन के शंकर से मिलवाया। थोड़े अभ्यास और रियाज़ के बाद उन्हें सूरज के "तितली उड़ी, उड़ जो चली" को गाने का मौका मिला। ये गीत 1966 का लोकप्रिय गीतों में से एक हुआ। उस समय ऐसा होता था कि प्रतिष्ठित फिल्मफेयर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायन के लिये एक ही श्रेणी थी (या तो किसी पुरुष या किसी महिला को मिलता), लेकिन मोहम्मद रफी के "बहारों फूल बरसाओ" के साथ "तितली उड़ी" को समान वोट प्राप्त हुए। पुरस्कार तो मोहम्मद रफी को ही मिला लेकिन उन्हें इस कीर्तिमान के लिये एक विशेष पुरस्कार दिया गया।
अगले वर्ष से महिला और पुरुष के लिये अलग-अलग श्रेणी बना दी गई। फिर उन्हें लगातार 4 वर्षों के लिये नामांकित किया गया जब दोनों बहनें लता मंगेशकर और आशा भोंसले का दबदबा था। परंतु बाद में शंकर-जयकिशन के समय का क्षण होने लगा और उनको रवि और उषा खन्ना के अलावा किसी ने काम नहीं दिया। 1987 में शंकर के निधन तक आते-आते उनको गाने के मौके खत्म हो गए थे।
सन्दर्भ
"तितली उड़ी, उड़ जो चली ! मेरा दिल मचल गया, उन्हें देखा और बदल गया". अमर उजाला. 27 जनवरी 2018. मूल से 6 जनवरी 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 6 जनवरी 2019.
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