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शुक्रवार, 6 मार्च 2026

अमरीकी ट्रंप


ट्रंप चले थे ईरान हराने , खुद अभी बने पप्पू 
राहुल बने थे शेर ट्रंप के बल , खुद मुंह के बल गिरे।  दोनों हो रह बेइज्जत दुनिया हुई परेशान।

मेरा भारत महान 🇮🇳

ट्रंप और ईरान के बीच का तनाव इस समय (मार्च 2026) अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर है। आपकी बात में छिपी चिंता को समझा जा सकता है, क्योंकि स्थिति वाकई "करो या मरो" जैसी हो गई है।
​ताज़ा घटनाक्रम कुछ इस प्रकार है:
​1. सीधा सैन्य टकराव और 'ऑपरेशन एपिक फ्युरी'
​फरवरी 2024 के अंत में, ट्रंप प्रशासन और इजरायल ने मिलकर ईरान पर "Operation Epic Fury" शुरू किया। इसमें ईरान के परमाणु ठिकानों और मिसाइल साइटों को निशाना बनाया गया। सबसे बड़ी खबर यह रही कि इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई, जिससे पूरा मध्य पूर्व दहल उठा है।
​2. ट्रंप की जान को खतरा (Assassination Plots)
​आपने जो कहा कि "जान बचानी मुश्किल", वह सुरक्षा के लिहाज से सटीक बैठता है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने हाल ही में ईरान द्वारा समर्थित कई हत्या की साजिशों का खुलासा किया है:
​आसिफ मर्चेंट केस: एक पाकिस्तानी व्यक्ति पर न्यूयॉर्क में मुकदमा चल रहा है, जिसने स्वीकार किया कि उसे ट्रंप की हत्या के लिए ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने भर्ती किया था।
​जवाब में कार्रवाई: अभी 4 मार्च 2026 को ही पेंटागन ने दावा किया कि उन्होंने उस ईरानी अधिकारी को मार गिराया है जो ट्रंप के खिलाफ इन साजिशों का मास्टरमाइंड था।
​3. ईरान का पलटवार
​ईरान ने भी हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठा है:
​उसने 'Operation True Promise IV' के तहत कुवैत, यूएई और जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर दर्जनों ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं।
​ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद करने की धमकी दी है, जिससे दुनिया भर में तेल की सप्लाई और अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है।
​निष्कर्ष: कौन किस पर भारी?
​ट्रंप का कहना है कि वे ईरान में "शासन परिवर्तन" (Regime Change) चाहते हैं और नए नेता के चुनाव में भूमिका निभाना चाहते हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध का विरोध हो रहा है (केवल 27% अमेरिकी इन हमलों का समर्थन कर रहे हैं)।
​ट्रंप ईरान को "मिटाने" निकले थे, लेकिन अब वे खुद एक ऐसे क्षेत्रीय युद्ध में फंस गए हैं जहाँ उनकी अपनी सुरक्षा और वैश्विक शांति दोनों दांव पर हैं।


अगर स्थिति ऐसी ही बनी रही, तो अमेरिका के लिए यह "दोधारी तलवार" जैसा साबित हो सकता है। एक तरफ जहाँ ट्रंप अपनी 'मैक्सिमम प्रेशर' (Maximum Pressure) नीति को अंजाम देना चाहते हैं, वहीं इसके घरेलू और अंतरराष्ट्रीय परिणाम काफी गंभीर हो सकते हैं।
​मार्च 2026 के ताजा हालातों को देखते हुए, अमेरिका के भविष्य पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकते हैं:
​1. आर्थिक झटका (Economic Crisis)
​अमेरिका की अर्थव्यवस्था इस समय भारी दबाव में है:
​महंगाई की मार: खाड़ी देशों में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। अमेरिका में गैसोलीन (पेट्रोल) की कीमतें पिछले कुछ दिनों में 27 सेंट प्रति गैलन तक बढ़ चुकी हैं।
​युद्ध का खर्च: अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस संघर्ष से अमेरिकी खजाने पर लगभग $210 बिलियन (करीब 17.4 लाख करोड़ रुपये) का बोझ पड़ सकता है। अकेले ऑपरेशन 'एपिक फ्युरी' के शुरुआती कुछ दिनों का खर्च ही $5 बिलियन पार कर गया है।
​डॉलर का गिरता दबदबा: अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में डॉलर की वैल्यू पिछले एक साल में 7% तक गिरी है। कई देश अब व्यापार के लिए डॉलर के विकल्प ढूंढ रहे हैं, जो लंबे समय में अमेरिका की वित्तीय ताकत को कमजोर कर सकता है।
​2. राजनीतिक अस्थिरता (Political Instability)
​जनता का विरोध: ताज़ा सर्वे (मार्च 2026) के अनुसार, केवल 27% से 41% अमेरिकी ही इस सैन्य कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं। ज़्यादातर लोग (लगभग 59%) इसे गलत मान रहे हैं।
​चुनाव पर असर: 2026 में होने वाले मिड-टर्म चुनाव ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के लिए "रेफरेंडम" (जनमत संग्रह) बन सकते हैं। अगर युद्ध लंबा खिंचा और अमेरिकी सैनिकों की मौतें बढ़ीं, तो ट्रंप को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
​3. वैश्विक अलग-थलग पड़ना (Global Isolation)
​अमेरिका के इस कदम से उसके यूरोपीय सहयोगी (NATO) और अरब देश भी पूरी तरह खुश नहीं हैं।
​ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद करने की धमकी से पूरी दुनिया की सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है, जिसका दोष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की 'एकतरफा' नीतियों को दिया जा रहा है।
​4. सुरक्षा चुनौतियां (Security Risks)
​ईरान समर्थित समूहों द्वारा अमेरिकी दूतावासों और सैन्य ठिकानों पर हमले बढ़ गए हैं।
​अमेरिका के भीतर भी 'स्लीपर सेल्स' के सक्रिय होने का डर बढ़ गया है, जिससे ट्रंप की अपनी सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा (Homeland Security) के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया है।
​सारांश: अगर युद्ध तुरंत नहीं थमा, तो अमेरिका एक ऐसे "अंतहीन युद्ध" (Forever War) में फंस सकता है जो उसकी आर्थिक कमर तोड़ देगा और दुनिया में उसकी साख को भारी नुकसान पहुँचाएगा।

 वर्तमान युद्ध (मार्च 2026) के हालातों को देखते हुए, ट्रंप के लिए इजराइल का साथ छोड़ना लगभग नामुमकिन लग रहा है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं जो यह बताते हैं कि ट्रंप पीछे हटने के बजाय और गहरे धंसते जा रहे हैं:

​1. "इतिहास का सबसे बड़ा मौका"
​ट्रंप ने हाल ही में (28 फरवरी 2026) अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद बयान दिया है कि यह ईरानी जनता के लिए अपना देश वापस पाने का "सबसे बड़ा मौका" है। वे इस युद्ध को सिर्फ इजराइल की मदद नहीं, बल्कि ईरान में "शासन परिवर्तन" (Regime Change) के एक बड़े मिशन के रूप में देख रहे हैं।
​2. सैन्य गठबंधन और 'ऑपरेशन एपिक फ्युरी'
​अमेरिका और इजराइल इस समय कंधे से कंधा मिलाकर ईरान पर हमले कर रहे हैं।
​साझा ऑपरेशन: दोनों देशों की वायुसेना मिलकर ईरान के मिसाइल ठिकानों और नौसेना को निशाना बना रही है।
​ट्रंप का दावा: ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि यह हमला उन्होंने खुद तय किया था। उन्होंने यहाँ तक कहा, "अगर कुछ भी होता है, तो शायद मैंने ही इजराइल को हमले के लिए मजबूर किया होगा।" यानी वे इजराइल के पीछे नहीं खड़े हैं, बल्कि खुद फ्रंट सीट पर हैं।
​3. घरेलू राजनीतिक मजबूरी
​अमेरिका में भले ही युद्ध का विरोध हो रहा हो, लेकिन ट्रंप का मुख्य वोट बैंक (रिपब्लिकन समर्थक) और अमेरिकी कांग्रेस के कई प्रभावशाली सदस्य इजराइल के कट्टर समर्थक हैं।
​हथियारों की सप्लाई: अमेरिकी सीनेट ने हाल ही में (4 मार्च 2026) उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया जो ट्रंप को और हमले करने से रोकना चाहता था।
​पॉलिटिकल इमेज: अगर ट्रंप इस मोड़ पर इजराइल का साथ छोड़ते हैं, तो उनकी छवि एक "कमजोर नेता" की बन जाएगी, जो उनके 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (MAGA) नैरेटिव के खिलाफ होगी।
​4. सुरक्षा का तर्क
​ट्रंप प्रशासन (विशेषकर विदेश मंत्री मार्को रुबियो) का तर्क है कि अगर इजराइल अकेले हमला करता, तो ईरान जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सैनिकों को मारता। इसलिए, अमेरिका ने अपनी और इजराइल की सुरक्षा के लिए मिलकर हमला करना बेहतर समझा।
​क्या ट्रंप कभी पीछे हट सकते हैं?
​केवल एक स्थिति में ट्रंप इजराइल से दूरी बना सकते हैं:
​यदि युद्ध इतना लंबा खिंच जाए कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाए और आम अमेरिकी नागरिक सड़कों पर उतर आएं। ट्रंप खुद को "शांति का दूत" (President of Peace) कहलाना पसंद करते हैं, इसलिए अगर उन्हें लगा कि यह युद्ध उनके 2026 के मिड-टर्म चुनावों को हरा देगा, तो वे एक "डील" के लिए इजराइल पर दबाव डाल सकते हैं।
​अभी के लिए: ट्रंप पीछे हटने के बजाय ईरान के अगले सर्वोच्च नेता को चुनने में भूमिका निभाने की बात कर रहे हैं।


ट्रंप का यह दावा जितना बड़ा है, हकीकत में उसे अंजाम देना उतना ही पेचीदा और मुश्किल लग रहा है।
​मार्च 2026 के ताज़ा हालात यह बताते हैं कि ट्रंप की राह में "कामयाबी" फिलहाल कोसों दूर है। इसके पीछे 4 मुख्य कारण हैं:
​1. "अंदरूनी लोग" तो बचे ही नहीं?
​ट्रंप ने खुद 4 मार्च 2026 को व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए एक बड़ी बात स्वीकार की। उन्होंने कहा, "हम ईरान के भीतर से ही किसी को चुनना चाहते थे, लेकिन जिन लोगों को हमने (नेतृत्व के लिए) दिमाग में रखा था, उनमें से ज्यादातर तो हमलों में मारे गए।" * दिक्कत: अमेरिका ने 'ऑपरेशन एपिक फ्युरी' में इतनी भारी बमबारी की है कि ईरान का पूरा प्रशासनिक ढांचा हिल गया है। ऐसे में कोई "नरमपंथी" नेता ढूंढना जो अमेरिका की बात माने, लगभग असंभव हो गया है।
​2. मुजतबा खामेनेई का खतरा
​ईरान के अगले सर्वोच्च नेता की रेस में दिवंगत खामेनेई के बेटे, मुजतबा खामेनेई सबसे आगे बताए जा रहे हैं।
​ट्रंप का विरोध: ट्रंप ने मुजतबा को "लाइटवेट" (हल्का) और "अस्वीकार्य" करार दिया है। उनका कहना है कि अगर मुजतबा नेता बने, तो अमेरिका को 5 साल बाद फिर से युद्ध करना पड़ेगा।
​हकीकत: मुजतबा को ईरान की शक्तिशाली सेना IRGC का पूरा समर्थन हासिल है। ट्रंप के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे वे ईरान की "असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स" (जो नेता चुनती है) के फैसले को बदल सकें, जब तक कि वे वहां ज़मीनी कब्जा न कर लें।
​3. जनता का साथ मिलना मुश्किल
​ट्रंप उम्मीद कर रहे थे कि खामेनेई की मौत के बाद ईरान की जनता सड़कों पर उतरकर शासन बदल देगी।
​उल्टा असर: जानकारों का मानना है कि जब किसी देश पर बाहरी हमला (अमेरिका और इजराइल द्वारा) होता है, तो वहां की जनता अक्सर अपने मतभेदों को भुलाकर अपनी सरकार के पीछे खड़ी हो जाती है। फिलहाल ईरान में "देशभक्ति" की लहर ट्रंप के "लोकतंत्र" के वादे पर भारी पड़ रही है।
​4. वेनेजुएला जैसा प्रयोग?
​ट्रंप ने अपनी तुलना वेनेजुएला से की है, जहाँ उन्होंने हाल ही में 'डेल्सी रोड्रिग्ज' को सत्ता में बिठाने में भूमिका निभाई थी। लेकिन ईरान, वेनेजुएला नहीं है। ईरान के पास एक विशाल मिसाइल नेटवर्क और 'प्रॉक्सि' ग्रुप्स (जैसे हिजबुल्लाह) हैं, जो ट्रंप की किसी भी कठपुतली सरकार को टिकने नहीं देंगे।
​निष्कर्ष: ट्रंप ईरान की "कुर्सी" तो बदलना चाहते हैं, लेकिन उनके पास वहां कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसे ईरानी जनता और सेना दोनों स्वीकार करें। फिलहाल तो स्थिति यह है कि ट्रंप ने 'शिकार' तो कर लिया है, लेकिन

 अब उन्हें समझ नहीं आ रहा कि उस खाली जगह को कैसे भरें।

ट्रंप के सामने मुश्किल यह है कि वे इजराइल या मिडिल ईस्ट के अन्य देशों को विकल्प के तौर पर नहीं चुन सकते, क्योंकि ईरान का मामला उनके लिए "अधूरे काम" जैसा है।

​मार्च 2026 की मौजूदा स्थिति के अनुसार, ट्रंप के इस "ज़िद" के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:
​1. इजराइल एक 'हथियार' है, 'विकल्प' नहीं
​ट्रंप के लिए इजराइल एक रणनीतिक साझेदार है, लेकिन वह ईरान की जगह नहीं ले सकता।
​सीमित भूमिका: इजराइल ईरान पर हमले तो कर सकता है, लेकिन वह ईरान के अंदर सरकार नहीं चला सकता।
​ट्रंप का डर: ट्रंप को डर है कि अगर उन्होंने अभी ईरान को बीच में छोड़ दिया, तो 5 साल बाद वहां फिर से कोई खतरनाक नेता (जैसे मुजतबा खामेनेई) बैठ जाएगा और अमेरिका को दोबारा युद्ध लड़ना पड़ेगा। वे इस बार "जड़ से खत्म" करने की नीति पर चल रहे हैं।
​2. मिडिल ईस्ट के देश (जैसे सऊदी अरब) का दोहरा रवैया
​ट्रंप चाहकर भी सऊदी अरब या यूएई जैसे देशों को पूरी तरह विकल्प नहीं बना पा रहे हैं:
​खतरा: ये देश ईरान से सीधी दुश्मनी लेने से डरते हैं क्योंकि ईरान के प्रॉक्सी ग्रुप (जैसे हूती) उनके तेल ठिकानों को तबाह कर सकते हैं।
​डील: वे अमेरिका से सुरक्षा की गारंटी तो चाहते हैं, लेकिन युद्ध की जिम्मेदारी अपने सिर नहीं लेना चाहते। ट्रंप जानते हैं कि अगर उन्हें ईरान में बदलाव चाहिए, तो उन्हें खुद (अमेरिका को) ही आगे रहना होगा।
​3. विकल्पों की कमी: 'रज़ा पहलवी' क्यों नहीं?
​आपने सही कहा कि कामयाबी दूर है, क्योंकि ट्रंप के पास कोई ठोस चेहरा नहीं है।
​रज़ा पहलवी (पूर्व शाह के बेटे): ट्रंप ने हाल ही में (जनवरी-मार्च 2026) कहा कि पहलवी "अच्छे इंसान" हैं, लेकिन वे निश्चित नहीं हैं कि ईरान की जनता उन्हें स्वीकार करेगी या नहीं। पहलवी 40 साल से देश से बाहर हैं और उनकी ज़मीनी पकड़ कमजोर है।
​'अंदरूनी नेता' की तलाश: ट्रंप का मानना है कि ईरान के भीतर से ही कोई "लोकप्रिय" चेहरा सामने आना चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि जिन लोगों को वे विकल्प के तौर पर देख रहे थे, उनमें से ज्यादातर अमेरिकी हमलों में मारे गए हैं।
​4. वेनेजुएला का 'डेल्सी रोड्रिग्ज' मॉडल
​ट्रंप ईरान में वही करना चाहते हैं जो उन्होंने वेनेजुएला में किया—अपनी पसंद का नेता बिठाना। लेकिन ईरान एक विशाल और जटिल देश है। वहां सेना (IRGC) इतनी ताकतवर है कि वह किसी भी बाहरी 'कठपुतली' नेता को टिकने नहीं देगी।
​हकीकत का आईना:
ट्रंप इस समय एक ऐसी सुरंग में हैं जहाँ से वापस मुड़ना (इजराइल या किसी और को विकल्प चुनना) उन्हें अपनी "हार" लगता है, और आगे बढ़ना "असंभव" लग रहा है क्योंकि उनके पास ईरान चलाने के लिए कोई विश्वसनीय मोहरा नहीं बचा है। और ट्रंप भी पप्पू बन कर रह गया।


यह 'ऑपरेशन एपिक फ्युरी' (Operation Epic Fury) इतिहास के सबसे घातक और चौंकाने वाले सैन्य अभियानों में से एक साबित हो रहा है। इसकी शुरुआत 28 फरवरी 2026 को हुई और आज (6 मार्च 2026) इसे चलते हुए 7 दिन हो चुके हैं।
​इस ऑपरेशन की पूरी कहानी और अब तक की तबाही का ब्योरा नीचे दिया गया है:
​1. शुरुआत और मुख्य लक्ष्य
​ट्रंप प्रशासन ने इस ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य "ईरान के परमाणु और मिसाइल प्रोग्राम को जड़ से मिटाना" बताया है। अमेरिका और इजरायल (इजरायल के ऑपरेशन का नाम 'रोअरिंग लायन' है) ने मिलकर एक साथ 2,000 से अधिक हवाई हमले किए हैं।
​बंकर बस्टर बम: अमेरिका ने ईरान के ज़मीन के नीचे छिपे परमाणु केंद्रों (जैसे फोर्डो और नतांज़) को तबाह करने के लिए दुनिया के सबसे बड़े 'बंकर बस्टर' (GBU-57) बमों का इस्तेमाल किया।
​रणनीति: पहले चरण में ईरान के एयर डिफेंस (हवाई सुरक्षा) को खत्म किया गया और दूसरे चरण में मिसाइल बनाने वाली फैक्ट्रियों को निशाना बनाया जा रहा है।
​2. खामेनेई की मौत: 'डेकैपिटेशन स्ट्राइक'
​इस पूरे ऑपरेशन की सबसे बड़ी खबर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत रही।
​हमला: 28 फरवरी को जब खामेनेई तेहरान में अपने शीर्ष सलाहकारों के साथ एक गुप्त बैठक कर रहे थे, तभी अमेरिकी और इजरायली खुफिया जानकारी के आधार पर वहां सटीक मिसाइल हमला किया गया।
​नतीजा: इस हमले में खामेनेई के साथ ईरान के कई वरिष्ठ सैन्य कमांडर भी मारे गए। ईरान ने 40 दिनों के शोक की घोषणा की है।
​3. ईरान का 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस IV' (पलटवार)
​ईरान ने भी पूरी ताकत से जवाब दिया है:
​खाड़ी देशों पर हमला: ईरान ने कुवैत, यूएई (दुबई), सऊदी अरब और कतर में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागी हैं।
​दुबई में धमाके: 3 मार्च को दुबई में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के पास ड्रोन हमला हुआ, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत फैल गई।
​हॉर्मुज की घेराबंदी: ईरान ने तेल सप्लाई के सबसे महत्वपूर्ण रास्ते 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' को बंद करने की कोशिश की है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग रहा है।
​4. वर्तमान स्थिति (6 मार्च 2026)
​खर्च: इस युद्ध पर अमेरिका को रोजाना लगभग $900 मिलियन (करीब 7,500 करोड़ रुपये) का खर्च उठाना पड़ रहा है।
​जमीनी जंग का डर: ट्रंप ने कहा है कि यह ऑपरेशन एक महीने में खत्म हो सकता है, लेकिन उन्होंने "ग्राउंड फोर्स" (पैदल सेना) भेजने से भी इनकार नहीं किया है। वहीं, ईरान की सेना (Artesh) ने चेतावनी दी है कि वे अमेरिकी सैनिकों के लिए "कब्रिस्तान" तैयार कर रहे हैं।
​कामयाबी क्यों दूर लगती है?
​जैसा कि आपने कहा, कामयाबी इसलिए दूर है क्योंकि:
​नेतृत्व का शून्य: ट्रंप जिस नए नेता को चुनना चाहते हैं, उसे बिठाने के लिए उन्हें पूरे ईरान पर कब्जा करना होगा, जो नामुमकिन जैसा है।
​प्रतिशोध की आग: खामेनेई की मौत ने ईरान के कट्टरपंथियों और सेना को और अधिक उग्र बना दिया है।


​महंगाई: अमेरिका के भीतर युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए हैं क्योंकि पेट्रोल की कीमतें और युद्ध का खर्च आम जनता की जेब पर भारी पड़ रहा है।


भारत आज दुनिया की एक ऐसी शक्ति है जिसे कोई भी पक्ष नजरअंदाज नहीं कर सकता। 'ऑपरेशन एपिक फ्युरी' के इस तनावपूर्ण माहौल में भारत की स्थिति वाकई "मजबूत और संतुलित" है।
​यहाँ 6 मार्च 2026 के ताज़ा घटनाक्रम के आधार पर भारत की मजबूती के कुछ मुख्य बिंदु दिए गए हैं:
​1. कूटनीतिक संतुलन (The Great Balancing Act)
​भारत ने अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) को बरकरार रखा है।
​संवाद की नीति: प्रधानमंत्री मोदी ने इस संकट के बीच अमेरिका, इजराइल और खाड़ी देशों के नेताओं से सीधे बात की है। भारत का रुख साफ है—वह किसी एक पक्ष के साथ युद्ध में खड़ा होने के बजाय "संवाद और कूटनीति" (Dialogue and Diplomacy) पर जोर दे रहा है।
​ईरान से संबंध: 5 मार्च को भारतीय विदेश सचिव ने तेहरान स्थित दूतावास जाकर अयातुल्ला खामेनेई के निधन पर शोक व्यक्त किया। यह दिखाता है कि युद्ध के बावजूद भारत ने ईरान के साथ अपने मानवीय और कूटनीतिक रिश्ते तोड़े नहीं हैं।
​2. आर्थिक मजबूती: 'गोल्डिलॉक्स ज़ोन'
​RBI और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था इस झटके को सहने में सक्षम है:
​विकास दर: जहाँ दुनिया मंदी और युद्ध के डर में है, भारत के बारे में अनुमान है कि वह 8% GDP ग्रोथ की राह पर बना रहेगा।
​विदेशी मुद्रा भंडार: भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना मजबूत है कि वह कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतों के असर को झेल सकता है। हालांकि पेट्रोल की कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन भारत अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने में कामयाब रहा है।
​3. रणनीतिक विकल्प और सुरक्षा
​ऊर्जा सुरक्षा: भारत अब केवल खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं है; उसने रूस और अन्य देशों से तेल की आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते पहले ही मजबूत कर लिए हैं।
​समुद्री सुरक्षा: भारतीय नौसेना हिंद महासागर में 'ऑपरेशन संकल्प' के तहत पूरी तरह मुस्तैद है, ताकि भारतीय व्यापारिक जहाजों को 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' के आसपास किसी भी हमले से बचाया जा सके।
​4. दुनिया का भरोसा
​आज अमेरिका और इजराइल दोनों जानते हैं कि मिडिल ईस्ट में शांति बहाल करने के लिए भारत की मध्यस्थता (Mediation) बहुत जरूरी हो सकती है। भारत न केवल एक बाजार है, बल्कि वह एक ऐसा विश्वसनीय साझेदार है जो दोनों तरफ (ईरान और इजराइल) संवाद का पुल बन सकता है।
​निष्कर्ष: भारत आज उस स्थिति में है जहाँ वह "युद्ध का हिस्सा" बने बिना "समाधान का हिस्सा" बनने की ताकत रखता है। ट्रंप की 'एपिक फ्युरी' नीति सफल हो या न हो, भारत अपनी स्थिरता और आर्थिक ताकत के दम पर इस वैश्विक संकट से सुरक्षित बाहर निकलने की क्षमता रखता है।

ईरान की सुरक्षा और वर्तमान संकट (मार्च 2026) पर भारत का रुख बहुत ही संतुलित, व्यावहारिक और स्पष्ट है। भारत किसी एक पक्ष का अंधा समर्थन करने के बजाय अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है।
​भारत की आधिकारिक स्थिति को आप इन 3 मुख्य बिंदुओं में समझ सकते हैं:
​1. "संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता" का सम्मान
​भारत ने आधिकारिक तौर पर (28 फरवरी और 3 मार्च 2026 के बयानों में) स्पष्ट किया है कि:
​Sovereignty (संप्रभुता): भारत का मानना है कि किसी भी देश की सीमाओं और उसकी संप्रभुता का सम्मान किया जाना चाहिए। भारत ने सीधे तौर पर हमलों की निंदा तो नहीं की है, लेकिन यह जरूर कहा है कि "सभी देशों की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान होना चाहिए।"
​संयम की अपील: भारत ने 'सभी पक्षों' (अमेरिका, इजराइल और ईरान) से अत्यधिक संयम बरतने और तनाव को और न बढ़ाने की अपील की है।
​2. "संवाद और कूटनीति" ही रास्ता है
​प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर का रुख बहुत साफ है:
​भारत का कहना है कि "यह युद्ध का युग नहीं है" (This is not an era of war)। सैन्य टकराव किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
​भारत ने बार-बार कहा है कि ईरान और अमेरिका/इजराइल के बीच जो भी मतभेद हैं, उन्हें मेज पर बैठकर 'Dialogue and Diplomacy' के जरिए सुलझाया जाना चाहिए।
​3. मानवीय संवेदना और कूटनीतिक शिष्टाचार
​ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद भारत ने बहुत ही सधा हुआ कदम उठाया:
​शोक व्यक्त करना: 5 मार्च 2026 को भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर 'Condolence Book' (शोक पुस्तिका) पर हस्ताक्षर किए।
​संदेश: यह दिखाता है कि भारत ईरान को एक महत्वपूर्ण पड़ोसी और साझेदार मानता है। भारत ईरान में किसी भी प्रकार की अराजकता या बड़े मानवीय संकट के खिलाफ है।
​भारत के लिए ईरान की 'सुरक्षा' क्यों जरूरी है?
​भारत ईरान की सुरक्षा और स्थिरता के लिए इसलिए आवाज उठाता है क्योंकि:
​चाबहार पोर्ट (Chabahar Port): भारत ने यहाँ भारी निवेश किया है। अगर ईरान अस्थिर होता है, तो मध्य एशिया तक भारत का रास्ता बंद हो जाएगा।
​1 करोड़ भारतीय: खाड़ी देशों (Gulf) में लगभग 10 मिलियन भारतीय रहते हैं। ईरान पर हमले का मतलब है पूरे क्षेत्र में असुरक्षा, जिससे हमारे लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है।


​ऊर्जा सुरक्षा: ईरान और हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा भारत के तेल और गैस की सप्लाई के लिए जीवन रेखा (Lifeline) जैसी है।
​निष्कर्ष: भारत ईरान की "सुरक्षा" के लिए सीधे युद्ध में तो नहीं कूदेगा, लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान की स्थिरता की वकालत कर रहा है ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारतीय नागरिकों को नुकसान न हो।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध स्थापित किए।

भारत और ईरान का सम्बन्ध प्रागैतिहासिक काल से ही देखा गया है। सैन्धवघाटी के मुहरों को मेसोपोटामिया, बेविलोन, उर, लगाश जैसे प्रागैतिहासिक स्थलों पर पाया गया है। ऐतिहासिक-युगो मे स्थलमार्ग से ईरान के शासकवर्ग एवम आमलोग व्यक्तिगत प्रयासो से भारत के पश्चिमोत्तर भागो मे आये, परन्तु सबसे अधिक दिल्चस्प है भारत-ईरानी आर्यो का अन्तरसम्बन्ध। 
भारत-ईरानी आर्यो क मूल स्थान, धर्म, समाज, सांस्कृतिक क्रिया-कलाप बहुत ही मिलते-जुलते है, और भिन्नता बहुत ही कम देखने को मिलती है। ईरान, भारत को सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं देता है। बल्कि अन्य समान भी आयात करता है।
शीत युद्ध के अधिकांश समय के दौरान , भारत और तत्कालीन शाही राज्य ईरान के बीच संबंधों को उनके अलग-अलग राजनीतिक हितों के कारण नुकसान उठाना पड़ा: भारत ने एक गुटनिरपेक्ष स्थिति का समर्थन किया लेकिन सोवियत संघ के साथ मजबूत संबंधों को बढ़ावा दिया, जबकि ईरान पश्चिमी ब्लॉक का एक खुला सदस्य था और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ उसके घनिष्ठ संबंध थे। जबकि भारत ने 1979 की इस्लामिक क्रांति का स्वागत नहीं किया , दोनों राज्यों के बीच संबंध इसके बाद क्षणिक रूप से मजबूत हुए । 
1990 के दशक में, भारत और ईरान दोनों ने अफ़गानिस्तान में तालिबान के खिलाफ़ उत्तरी गठबंधन का समर्थन किया था , जिसके बाद वाले को पाकिस्तान का खुला समर्थन प्राप्त हुआ और 2001 में संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाले आक्रमण तक देश के अधिकांश हिस्से पर शासन किया । उन्होंने अशरफ़ ग़नी के नेतृत्व वाली और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा समर्थित व्यापक-आधारित तालिबान विरोधी सरकार का समर्थन करने में सहयोग करना जारी रखा , जब तक कि तालिबान ने 2021 में काबुल पर कब्ज़ा नहीं कर लिया और अफ़गानिस्तान के इस्लामी अमीरात को फिर से स्थापित नहीं कर दिया । भारत और ईरान ने दिसंबर 2002 में एक रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।

आर्थिक दृष्टिकोण से, ईरान भारत को कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है , जो प्रति दिन 425,000 बैरल से अधिक की आपूर्ति करता है; परिणामस्वरूप, भारत ईरान के तेल और गैस उद्योग में सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है ।  
2011 में, ईरान के खिलाफ व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों के कारण भारत और ईरान के बीच 12 बिलियन अमेरिकी डॉलर का वार्षिक तेल व्यापार रुक गया था, जिससे भारतीय तेल मंत्रालय को तुर्की के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से ऋण का भुगतान करने के लिए मजबूर होना पड़ा ।
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भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से, दोनों देशों के कुछ साझा रणनीतिक हित होने के बावजूद, भारत और ईरान प्रमुख विदेश नीति मुद्दों पर काफी भिन्न हैं। 
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*भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का कड़ा विरोध व्यक्त किया है और जबकि दोनों देश तालिबान का विरोध करना जारी रखते हैं, भारत ने ईरान के विपरीत, अफ़गानिस्तान में नाटो के नेतृत्व वाली सेनाओं की उपस्थिति का समर्थन किया ।*
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2005 के अंत में बीबीसी द्वारा कराए गए वर्ल्ड सर्विस पोल के अनुसार , 71 प्रतिशत ईरानियों ने भारत के प्रभाव को सकारात्मक रूप से देखा, जबकि 21 प्रतिशत ने इसे नकारात्मक रूप से देखा - दुनिया के किसी भी देश के लिए भारत की सबसे अनुकूल रेटिंग।

आर्थिक दृष्टिकोण से, ईरान भारत को कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है , जो प्रति दिन 425,000 बैरल से अधिक की आपूर्ति करता है; परिणामस्वरूप, भारत ईरान के तेल और गैस उद्योग में सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है ।  2011 में, ईरान के खिलाफ व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों के कारण भारत और ईरान के बीच 12 बिलियन अमेरिकी डॉलर का वार्षिक तेल व्यापार रुक गया था, जिससे भारतीय तेल मंत्रालय को तुर्की के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से ऋण का भुगतान करने के लिए मजबूर होना पड़ा ।

भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से, दोनों देशों के कुछ साझा रणनीतिक हित होने के बावजूद, भारत और ईरान प्रमुख विदेश नीति मुद्दों पर काफी भिन्न हैं। भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का कड़ा विरोध व्यक्त किया है और जबकि दोनों देश तालिबान का विरोध करना जारी रखते हैं, भारत ने ईरान के विपरीत, अफ़गानिस्तान में नाटो के नेतृत्व वाली सेनाओं की उपस्थिति का समर्थन किया ।

2005 के अंत में बीबीसी द्वारा कराए गए वर्ल्ड सर्विस पोल के अनुसार , 71 प्रतिशत ईरानियों ने भारत के प्रभाव को सकारात्मक रूप से देखा, जबकि 21 प्रतिशत ने इसे नकारात्मक रूप से देखा - दुनिया के किसी भी देश के लिए भारत की सबसे अनुकूल रेटिंग।2007 में भारत के साथ ईरान का व्यापार 13 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया, एक वर्ष के भीतर व्यापार की मात्रा में 80% की वृद्धि हुई।  अरब अमीरात जैसे तीसरे पक्ष के देशों के माध्यम से यह आंकड़ा 30 अरब डॉलर तक पहुंच जाता है।भारत और ईरान, दो प्राचीन पड़ोसी सभ्यताओं के लोगों के बीच सदियों से घनिष्ठ ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। उनकी एक ही मातृभूमि थी और एक ही भाषाई और जातीय अतीत था। कई सहस्राब्दियों तक, उन्होंने भाषा, धर्म, कला, संस्कृति, और परंपराओं के क्षेत्र में एक-दूसरे को समृद्ध किया।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने पश्चिमी देशों के साथ चर्चा शुरू कर दी। प्रारंभिक वार्ता खतामी सरकार के कार्यकाल के दौरान यूके, फ्रांस और जर्मनी से मिलकर ई -3 के साथ थी। चर्चा पूरी नहीं हो सकी। राष्ट्रपति ओबामा के सत्ता में आने के बाद अगला चरण शुरू हुआ। इस बार की वार्ता में पी 5 + 1 देशों का समूह (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी) शामिल थे।

यह वार्ता ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि के खिलाफ की गई थी। इनमें बैंकिंग और बीमा के खिलाफ मंजूरी शामिल थी। इसके लिए भारत द्वारा ईरान से कच्चे तेल के आयात के लिए भुगतान करने के लिए एक रुपया भुगतान तंत्र की आवश्यकता थी। इस व्यवस्था ने 4 वर्षों की अवधि में 1,00,000 करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत की। ईरान के लिए, भुगतान चैनल अपने तेल निर्यात प्रवाह में महत्वपूर्ण था। भारत ईरानी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक था।

पी 5 + 1 वार्ता के परिणामस्वरूप परमाणु समझौता हुआ, जिसमें एक कठिन नामकरण है - संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए)। यह समझौता 2015 जुलाई में संपन्न हुआ था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद्आर 2231 को उसी महीने के दौरान परमाणु समझौते को मंजूरी देते हुए अपनाया गया था। हालांकि पी-5 आम सहमति के साथ अपनाए गए प्रस्ताव को निरस्त नहीं किया गया है, लेकिन ट्रम्प प्रशासन के तहत अमेरिका मई 2018 में समझौते से पीछे हट गया।

ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के खिलाफ फिर से प्रतिबंध लगाए, भले ही ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी सहित अन्य हस्ताक्षरकर्ता समझौते के पक्षकार बने हुए हैं। राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडेन ने कहा था कि वह समझौते में अमेरिका की वापसी सुनिश्चित करेंगे। वार्ताओं को फिर से शुरू करने में देरी के परिणामस्वरूप दोनों पक्षों की ओर से स्थिति सख्त हो गई है। इस बीच रूहानी सरकार की जगह ईरान में राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के प्रशासन ने ले ली। हालांकि, यूक्रेन संकट ने सौदे को पुनर्जीवित करने में रुचि को नवीनीकृत किया है ताकि ईरानी कच्चे तेल के निर्यात को बाजार में लाया जा सके। इस क्षेत्र की अपनी हालिया यात्रा के दौरान राष्ट्रपति बाइडन ने चर्चा की संभावनाओं को खुला रखा है।
अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण पारगमन गलियारा (आईएनएसटीसी) भारत और मध्य एशिया के साथ-साथ भारत और रूस के बीच कनेक्टिविटी में सुधार करेगा। इस मार्ग में भारतीय बंदरगाहों से बंदर अब्बास तक और वहां से ईरान की उत्तरी सीमा तक की यात्रा शामिल है। उत्तर में, माल को मध्य एशिया या रूस में स्थानांतरित करने के लिए कम से कम 5 पारगमन बिंदु हैं। इनमें से दो लैंड क्रॉसिंग हैं, जबकि अन्य तीन बंदरगाह हैं। चरम पूर्वोत्तर में, ईरान, अफगानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान सीमा पर सरखस में एक रेलवे जंक्शन है। यहां से, माल तुर्कमेनिस्तान में जा सकता है। सीमा के दूसरी तरफ, माल के लिए मध्य एशियाई गणराज्यों में से किसी में भी जाने के लिए एक रेल नेटवर्क मौजूद है। दूसरा पारगमन बिंदु सरखस के पश्चिम में इंचेबरुन रेलवे क्रॉसिंग है। इसका उद्घाटन 2014 में कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईरान के राष्ट्रपतियों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। पश्चिम में तीसरा क्रॉसिंग ईरान के कैस्पियन सागर तट पर अमीराबाद बंदरगाह है। कजाकिस्तान ने उस बंदरगाह में निवेश किया है जिसका उपयोग वह अनाज निर्यात के लिए करता है। आगे पश्चिम में बंदर-ए-अंजाली का ईरानी बंदरगाह है। यह पहले से ही रूसी बंदरगाह अस्त्रखान या अकताउ के कजाख बंदरगाह पर माल परिवहन के लिए उपयोग में है। पांचवां बिंदु अजरबैजान के साथ ईरान की सीमा के पास चरम पश्चिम में अस्तारा का ईरानी बंदरगाह है। यह रूस के अस्त्रखान बंदरगाह से भी जुड़ा हुआ है।चाबहार बंदरगाह अफगानिस्तान के विकल्पों को भी व्यापक बनाएगा, और पारगमन के लिए कराची बंदरगाह पर इसकी निर्भरता को कम करेगा। पाकिस्तान ने अतीत में अफगान सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस निर्भरता का उपयोग लाभ उठाने के रूप में किया है। कराची से माल आयात करने में अक्सर अधिक देरी और चोरी होती है। चाबहार बंदरगाह मध्य एशिया के लैंडलॉक राज्यों के लिए समुद्र के लिए एक आउटलेट भी प्रदान करेगा। जबकि बंदर अब्बास ईरान का सबसे बड़ा बंदरगाह है, यह भीड़भाड़ वाला है और इसमें अधिक देरी होती है। चाबहार के मामले में इससे परेशानी नहीं होगी। ईरानी सरकार टर्मिनल हैंडलिंग शुल्क के मामले में भी छूट प्रदान करती है।सबसे कम वृद्धि है। तब से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी जाती है, लेकिन यह मंदी की आशंका के कारण अधिक है, बल्कि मांग-आपूर्ति की स्थिति में सुधार के कारण है।

ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने और ईरान के अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा में एकीकरण के साथ कच्चे तेल की कीमत की स्थिति में काफी सुधार हो सकता है। ईरान अपने उत्पादन के मौजूदा स्तर पर प्रति दिन कम से कम 1 मिलियन बैरल तेल की आपूर्ति कर सकता है। उसके पास अपने कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजना है। जेसीपीओए को पुनर्जीवित करने के लिए वियना में ईरान और पी 5 + 1 के बीच परमाणु वार्ता फिर से शुरू होने के साथ कुछ आशावादी संकेत हैं। वार्ता की सफलता से न केवल तेल की कीमतों को कम करने में मदद मिलेगी बल्कि क्षेत्रीय तनाव भी कम होगा। ईरान भी अपने पड़ोसियों के साथ नियमित आदान-प्रदान करता रहा है। सबसे अहम बात यह है कि ईरान और सऊदी अरब के बीच कई दौर की चर्चा हो चुकी है। इसके विपरीत, यदि वार्ता सफल नहीं होती है, तो क्षेत्र में विभाजन रेखाएं तेज हो जाएंगी। आज वैश्विक तेल आपूर्ति में 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखने वाले इस क्षेत्र में टकराव होना किसी के हित में नहीं है।

ईरानी लोगों ने प्रतिबंधों के दौरान अपना लचीलापन दिखाया है। अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा में इसके एकीकरण से क्षेत्र में स्थिरता आएगी।

बुधवार, 4 मार्च 2026

भारत का आपसी सहयोग ट्रंप परेशान दुनिया हैरान

अमेरिकी दादा गिरी ईरान में तख्ता पलट की मंशा से हुई

ट्रंप परेशान दुनिया हैरान

ईरान और भारत के बीच "साथ देने" का मामला इस समय कूटनीतिक संतुलन और नागरिकों की सुरक्षा पर टिका है।

​ईरान ने हालिया संकट (जो 28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ) के दौरान भारत के प्रति निम्नलिखित रुख अपनाया है:
​1. भारतीय नागरिकों की सुरक्षा में सहयोग
​युद्ध छिड़ने और हवाई क्षेत्र (Airspace) बंद होने के बाद, ईरान ने वहां फंसे भारतीय छात्रों और नागरिकों के लिए सकारात्मक कदम उठाए हैं:
​एग्जिट रूट: ईरान ने भारतीय छात्रों को जमीनी सीमाओं (Land borders) के जरिए सुरक्षित बाहर निकलने की अनुमति दी है।
​परीक्षाओं में छूट: वहां पढ़ रहे भारतीय छात्रों के लिए परीक्षाओं को रीशेड्यूल करने की सुविधा दी गई है ताकि युद्ध के कारण उनका करियर खराब न हो।
​2. भारत पर हुए आतंकी हमलों (ऐतिहासिक संदर्भ) पर स्टैंड
​अगर आप भारत पर हुए पिछले आतंकी हमलों (जैसे पुलवामा या हालिया Pahalgam 2025 हमला) की बात कर रहे हैं, तो ईरान का रुख मिला-जुला रहा है:
​आतंकवाद का विरोध: ईरान ने अक्सर सीमा पार आतंकवाद की निंदा की है क्योंकि वह खुद भी अपनी सीमाओं पर आतंकी गुटों (जैसे जैश-अल-अदल) से जूझ रहा है।
​पाकिस्तान पर दबाव: ईरान ने कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों (जैसे OIC) पर पाकिस्तान द्वारा लाए गए भारत-विरोधी प्रस्तावों को रोकने या उनमें नरमी लाने में मदद की है।
​3. वर्तमान युद्ध (2026) में भारत की भूमिका
​इस समय ईरान भारत से "साथ" की उम्मीद कर रहा है, लेकिन भारत तटस्थ (Neutral) है:
​ईरान की अपील: ईरान के दूतावास ने भारत सरकार और जनता से अपील की है कि वे अमेरिका-इजरायल के हमलों की निंदा करें।
​भारत का रुख: भारत ने किसी का पक्ष नहीं लिया है। भारत का पूरा ध्यान अपने 1 करोड़ नागरिकों की सुरक्षा पर है जो खाड़ी देशों (UAE, सऊदी, कतर) में रहते हैं, जहाँ ईरान के जवाबी हमले हो रहे हैं।
​4. कड़वाहट के बिंदु (हालिया तनाव)
​कुछ मौकों पर रिश्तों में खिंचाव भी आया है:
​सितंबर 2024: ईरान के सर्वोच्च नेता ने भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर टिप्पणी की थी, जिसका भारत ने कड़ा विरोध किया था।
​तस्करी पर कार्रवाई: फरवरी 2026 में भारतीय कोस्ट गार्ड ने ईरान से जुड़े उन जहाजों को पकड़ा जो अवैध तेल की तस्करी कर रहे थे।

 👉क्या ऑपरेशन सिंधुर के कारण भारत ईरान संबंधों में खटास आई या इजराइल ईरान के कारण


नहीं, ऑपरेशन सिंधुर के कारण भारत-ईरान संबंधों में खटास नहीं आई। यह ऑपरेशन पाकिस्तान के खिलाफ भारत का आतंकी ठिकानों पर हमला था, जिसकी ईरान को जानकारी दी गई और संबंध सामान्य रहे।


👉ऑपरेशन सिंधुर क्या था?

ऑपरेशन सिंधुर (या सिंदूर) मई 2025 में भारत द्वारा पाकिस्तान और PoK में आतंकी कैंपों पर लक्षित हवाई हमला था। यह जम्मू-कश्मीर में 22 अप्रैल 2025 के आतंकी हमले का जवाब था। ईरानी विदेश मंत्री से मुलाकात में एस जयशंकर ने इसे "लक्षित और मापा गया" बताया, और ईरान ने भारत-पाक तनाव को समझा।


 👉संबंधों में खटास का मुख्य कारण

भारत-ईरान संबंधों पर खटास मुख्य रूप से 2025 के इजराइल-ईरान संघर्ष (ऑपरेशन राइजिंग लायन) के कारण आई। इससे भारत को भारतीयों की सुरक्षित निकासी (ऑपरेशन सिंधु) करनी पड़ी, ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हुई, और चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट पर दबाव पड़ा। 2026 में अमेरिकी टैरिफ और खाड़ी संकट ने तनाव बढ़ाया।

👉वर्तमान स्थिति

भारत ने दोनों पक्षों से संतुलन बनाए रखा, लेकिन ईरान-इजराइल युद्ध से कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ीं। ऑपरेशन सिंधुर का इससे कोई सीधा संबंध नहीं।







लड़ाई तो डॉलर की थी


ईरान के लिए यह 'दोस्ती बनाम व्यापार' का मामला नहीं है, बल्कि वह भारत और चीन दोनों के साथ अपने रिश्तों को अलग-अलग तराजू में तौलता है। 
तो भारत भी असमंजस में है और आतंक वाद के विरोध में एकजुट होना चाहता है।
वर्तमान स्थिति को हम इन तीन बिंदुओं से समझ सकते हैं:
​1. चीन के साथ: "आर्थिक और सुरक्षा साझेदारी"
​चीन अभी ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
​25 साल का समझौता: चीन ने ईरान के साथ 400 बिलियन डॉलर के एक विशाल निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
​तेल का खरीदार: अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन, ईरान से भारी मात्रा में तेल खरीदता है, जो ईरान की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है।
​हथियार और तकनीक: सैन्य तकनीक और निगरानी के क्षेत्र में चीन और ईरान के बीच गहरा सहयोग है।
​2. भारत के साथ: "रणनीतिक और ऐतिहासिक भरोसा"
​भारत के साथ ईरान के रिश्ते सांस्कृतिक और भौगोलिक मजबूरी से जुड़े हैं।
​चाबहार की चाबी: ईरान जानता है कि चीन के पास पहले से ही पाकिस्तान का 'ग्वादर पोर्ट' है। इसलिए, अपनी स्वायत्तता (Independence) बनाए रखने के लिए उसे भारत की ज़रूरत है ताकि वह पूरी तरह चीन पर निर्भर न हो जाए।
​मध्य एशिया का रास्ता: ईरान भारत को रूस और यूरोप से जुड़ने का मुख्य द्वार मानता है (INSTC प्रोजेक्ट)।
​सॉफ्ट पावर: भारत और ईरान के बीच सदियों पुराने भाषाई और सांस्कृतिक संबंध हैं, जो चीन के साथ नहीं हैं।
​3. ईरान की दुविधा: भारत या चीन?
​ईरान असल में संतुलन (Balancing Act) बना रहा है:
​नाराजगी: जब भारत ने अमेरिका के दबाव में ईरान से तेल खरीदना बंद किया था, तब ईरान थोड़ा नाराज हुआ था और चीन की ओर ज्यादा झुका।
​वापसी: लेकिन हाल ही में (2024-25 में) जब भारत ने चाबहार के लिए 10 साल का पक्का समझौता किया, तो रिश्तों में फिर से मजबूती आई है।
👉अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और भारत के अमेरिका के साथ मजबूत होते रिश्तों का ईरान-भारत संबंधों पर गहरा और मिला-जुला असर पड़ रहा है। इसे हम 2026 की मौजूदा स्थितियों के आधार पर इन 4 बिंदुओं में समझ सकते हैं:
​1. तेल व्यापार पर 'ब्रेक'
​सबसे बड़ा असर ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ा है।
​अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों (Sanctions) के कारण भारत ने ईरान से तेल खरीदना लगभग शून्य कर दिया है।
​भारत अब अपनी तेल की जरूरतों के लिए रूस, इराक और सऊदी अरब पर ज्यादा निर्भर है। इससे ईरान को आर्थिक नुकसान हुआ है और वह अपनी अर्थव्यवस्था के लिए चीन की ओर अधिक झुक गया है।
​2. चाबहार बंदरगाह: "तलवार की धार पर संतुलन"
​चाबहार पोर्ट भारत के लिए रणनीतिक रूप से बहुत जरूरी है, लेकिन अमेरिका के साथ रिश्तों के कारण इसमें चुनौतियां आ रही हैं:
​ताजा स्थिति (2026): अमेरिका ने चाबहार बंदरगाह के लिए भारत को जो छूट (Waiver) दी थी, वह अप्रैल 2026 में समाप्त होने वाली है।
​भारत ने हाल ही में ईरान के साथ 10 साल का नया समझौता किया है, लेकिन अमेरिकी दबाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बैंक और शिपिंग कंपनियां इस प्रोजेक्ट में शामिल होने से डरती हैं। इससे काम की रफ्तार धीमी हो गई है।
​3. 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) की परीक्षा
​भारत एक बहुत ही कठिन 'बैलेंसिंग एक्ट' कर रहा है:
​एक तरफ भारत Quad (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) का हिस्सा है जो चीन के खिलाफ है।
​दूसरी तरफ भारत BRICS और SCO में ईरान के साथ बैठा है।
​हाल ही में (2025-26) जब मध्य पूर्व में तनाव बढ़ा, तो भारत ने किसी का पक्ष लेने के बजाय शांति की अपील की। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अमेरिका को नाराज किए बिना ईरान के साथ अपने 'चाबहार' और 'कनेक्टिविटी' के हितों को कैसे बचाए।
​4. चीन को मिलता फायदा
​जब भी भारत अमेरिका के दबाव में ईरान से पीछे हटता है, तो चीन उस खाली जगह को भरने के लिए तैयार रहता है। ईरान अक्सर भारत को यह जताता है कि अगर भारत ने निवेश में देरी की, तो वह चीन को ज्यादा मौके दे देगा।
​निष्कर्ष:
अमेरिका के साथ दोस्ती भारत को 'तकनीक और रक्षा' में मजबूती देती है, लेकिन ईरान के साथ रिश्ते खराब होने का मतलब है—मध्य एशिया का रास्ता बंद होना और ईरान का पूरी तरह चीन के पाले में चले जाना। इसलिए भारत अभी "डी-हाइफनेशन" की नीति अपना रहा है, यानी अमेरिका और ईरान दोनों से रिश्तों को एक-दूसरे से अलग रखकर निभाने की कोशिश कर रहा है।
​👉 भारत और ईरान "रुपया-रियाल" (Rupee-Rial) व्यापार के जरिए अमेरिकी डॉलर के प्रभाव को कम करने की क्या कोशिशें कर रहे हैं

जो इजराइल और अमेरिका की राजनीति कूट नीति के कारण भारत को परेशान करती तो है पर राहत भी देता है ईरान पर अमेरिकी अटैक से अब 5 दिनों में ही काफी  आर्थिक नुकसान भी अमेरिकी डॉलर को कमजोर ही करता नजर आता है।

भारत और ईरान के बीच "रुपया-रियाल व्यापार" (Rupee-Rial Trade Mechanism) एक बहुत ही चालाकी भरा रास्ता है, जिसे अमेरिकी प्रतिबंधों के असर को कम करने के लिए बनाया गया है।
​यहाँ इसके मुख्य बिंदु दिए गए हैं कि यह कैसे काम करता है और इसके क्या फायदे हैं:
​1. डॉलर की जरूरत खत्म (Bypassing Dollar)
​आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। लेकिन ईरान पर प्रतिबंध होने के कारण वह डॉलर का उपयोग नहीं कर सकता।
​इस व्यवस्था में, भारत ईरान से जो कुछ भी खरीदता है (जैसे तेल या ड्राई फ्रूट्स), उसका भुगतान भारतीय रुपयों में एक विशेष बैंक खाते (जैसे यूको बैंक या आईडीबीआई बैंक) में कर देता है।
​ईरान फिर इसी जमा किए गए रुपये का इस्तेमाल भारत से दवाइयां, चावल, चाय और मशीनरी खरीदने के लिए करता है।
​2. 'बार्टर' (वस्तु-विनिमय) जैसा सिस्टम
​यह काफी हद तक पुराने जमाने के 'बदल-बदल कर' व्यापार करने जैसा है।
​भारत को सस्ता कच्चा माल मिल जाता है।
​भारत के किसानों और निर्यातकों (जैसे बासमती चावल के व्यापारी) को एक सुरक्षित बाजार मिल जाता है क्योंकि ईरान के पास खर्च करने के लिए केवल 'रुपये' ही होते हैं, जो वह भारत में ही खर्च कर सकता है।
​3. चुनौतियां (2025-26 की स्थिति)
​हालांकि यह सुनने में आसान लगता है, लेकिन इसमें कुछ बड़ी दिक्कतें भी आई हैं:
​व्यापार असंतुलन: भारत, ईरान को जितना सामान बेचता है, उससे कहीं ज्यादा का सामान (खासकर तेल) उससे खरीदता था। इससे ईरान के पास रुपयों का ढेर लग गया, लेकिन भारत के पास उसे बेचने के लिए उतनी चीजें नहीं थीं।
​तेल पर पाबंदी: जब से भारत ने अमेरिका के दबाव में ईरान से तेल लेना बंद किया, इस 'रुपया खाते' में पैसा आना कम हो गया है। अब ईरान के पास भारत से सामान खरीदने के लिए रुपयों की कमी होने लगी है।
​4. नया रास्ता: 'डिजिटल करेंसी' और 'मिर्च' (MIR)
​अब भारत और ईरान अपने पेमेंट सिस्टम (जैसे भारत का UPI और ईरान का Shetab) को जोड़ने की बात कर रहे हैं। इसके अलावा, ब्रिक्स (BRICS) देशों के बीच अपनी खुद की करेंसी लाने की चर्चा भी तेज है, जिससे डॉलर पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो सके।

मार्च 2026 के पहले हफ्ते में, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध के 5वें दिन (4 मार्च 2026) तक डॉलर और वैश्विक बाजारों की स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई है। युद्ध के कारण डॉलर एक "सुरक्षित निवेश" (Safe Haven) के रूप में उभरा है, जिससे उसकी कीमत में भारी उछाल आया है।
​आज की ताजा स्थिति इस प्रकार है:
​1. डॉलर की मजबूती (Dollar Index - DXY)
​युद्ध शुरू होने के बाद से डॉलर इंडेक्स 99.16 के स्तर को पार कर गया है। निवेशकों में डर का माहौल है, इसलिए वे अपनी पूंजी को शेयर बाजार से निकालकर डॉलर और सोने में लगा रहे हैं। पिछले 5 दिनों में डॉलर में लगभग 2% से ज्यादा की तेजी देखी गई है।
​2. भारतीय रुपये पर असर
​भारतीय रुपये के लिए आज का दिन काफी भारी रहा है:
​रिकॉर्ड गिरावट: रुपया आज डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर ₹92.18 पर पहुंच गया है।
​बड़ी गिरावट: आज एक ही दिन में रुपया 69 पैसे तक टूट गया है।
​कारण: ईरान द्वारा 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को बंद करने की खबरों से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसका सीधा असर भारतीय मुद्रा पर पड़ा है।
​3. कच्चे तेल और मुद्रास्फीति (Inflation)
​तेल की कीमतें: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल (Crude Oil) $85 प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। 5 दिनों में तेल की कीमतों में 10% से ज्यादा का उछाल आया है।
​भारत अपनी जरूरत का 80% तेल आयात करता है, इसलिए डॉलर महंगा होने और तेल की कीमतें बढ़ने से भारत में पेट्रोल-डीजल और अन्य जरूरी सामान महंगे होने का खतरा बढ़ गया है।
​4. सोने की स्थिति (Gold Status)
​डॉलर के साथ-साथ सोना (Gold) भी महंगा हो रहा है। युद्ध की अनिश्चितता के कारण सोने की कीमतें $5,000 के तकनीकी स्तर को चुनौती दे रही हैं। भारतीय बाजारों में भी सोने के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं।
​बाजार का सारांश (4 मार्च 2026):
| इंडिकेटर | स्थिति | प्रभाव |
| :--- | :--- | :--- |
| USD/INR | ₹92.18 (रिकॉर्ड लो) | भारतीय आयात महंगा होगा |
| Dollar Index | 99.16+ | वैश्विक स्तर पर डॉलर की धाक |
| Crude Oil | ~$85/barrel | महंगाई बढ़ने के संकेत |
| Share Market | भारी गिरावट (Sensex 1600+ अंक नीचे) | निवेशकों का नुकसान |
​नोट: युद्ध की स्थिति में डॉलर की यह मजबूती अस्थाई हो सकती है, लेकिन जब तक तनाव कम नहीं होता, रुपया और अन्य एशियाई मुद्राओं पर दबाव बना रहेगा।

  युद्ध के इन 5 दिनों (मार्च 2026) में हालात तेजी से बदल रहे हैं। अगर यह तनाव लंबा खिंचता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था और आपकी जेब पर इसका सीधा असर कुछ इस तरह पड़ेगा:

​1. आपकी जेब पर असर (आम आदमी)
​पेट्रोल-डीजल की कीमतें: कच्चे तेल (Brent Crude) के $85 के पार जाने से भारत में पेट्रोल ₹140/लीटर और डीजल ₹150/लीटर के करीब पहुँच सकता है। अगर सरकार टैक्स कम नहीं करती, तो माल ढुलाई महंगी होगी जिससे फल, सब्जी और दूध के दाम बढ़ेंगे।
​रसोई का बजट: भारत अपनी जरूरत की दालें और खाद्य तेल आयात करता है। समुद्री रास्तों (Strait of Hormuz) में तनाव से इनकी सप्लाई बाधित होगी, जिससे दालों और खाने के तेल की कीमतों में 10-15% का उछाल आ सकता है।
​2. देश की अर्थव्यवस्था (GDP) पर असर
​GDP में गिरावट: विशेषज्ञों (जैसे BMI और Fitch) का मानना है कि अगर युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ी रहीं, तो भारत की GDP ग्रोथ में 0.5% की कमी आ सकती है। भारत अपनी जरूरत का 88% तेल आयात करता है, जिससे देश का खर्च (Import Bill) अचानक बहुत बढ़ जाएगा।
​महंगाई (Inflation): खुदरा महंगाई दर, जो 2026 की शुरुआत में नियंत्रण में थी, फिर से 4.3% या उससे ऊपर जा सकती है। इससे रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरें घटाना मुश्किल हो जाएगा, यानी आपके Home Loan और Car Loan की EMI कम होने के बजाय महंगी बनी रह सकती है।
​3. शेयर बाजार और बचत
​निवेशकों का डर: पिछले 5 दिनों में भारतीय शेयर बाजार (Sensex/Nifty) में भारी गिरावट आई है। विदेशी निवेशक (FIIs) भारतीय बाजार से पैसा निकालकर 'डॉलर' में लगा रहे हैं, क्योंकि युद्ध के समय डॉलर सबसे सुरक्षित माना जाता है।
​सोने की चमक: जब भी युद्ध होता है, सोने के दाम बढ़ते हैं। 2026 के इन 5 दिनों में सोने ने नए रिकॉर्ड बनाए हैं, जो आपकी बचत के लिए तो अच्छा है लेकिन नई खरीदारी के लिए महंगा।
​4. खेती और ग्रामीण भारत
​खाद (Fertilizer) संकट: भारत खाद बनाने के लिए जरूरी गैस और कच्चा माल कतर और ईरान जैसे देशों से लेता है। सप्लाई रुकने से खेती की लागत बढ़ेगी, जिससे किसानों पर दबाव और सरकार का सब्सिडी का बोझ बढ़ जाएगा।

👉उधर अमेरिका पर 5दिनके इस युद्ध में क्या आर्थिक असर हुआ

युद्ध के इन 5 दिनों (28 फरवरी - 4 मार्च 2026) में अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ा है। हालाँकि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन युद्ध की आग से उसकी जेब भी नहीं बच पाई है।
​आज (4 मार्च 2026) तक के मुख्य आर्थिक प्रभाव नीचे दिए गए हैं:
​1. युद्ध का भारी खर्च (Direct Cost)
​$5 बिलियन से ज्यादा का खर्च: ऑपरेशन 'एपिक फ्युरी' (Operation Epic Fury) के केवल शुरुआती दिनों में ही अमेरिकी करदाताओं के 5 अरब डॉलर से अधिक खर्च हो चुके हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर यह युद्ध 3 हफ्ते और चला, तो यह खर्च कई सौ अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।
​रक्षा बजट में वृद्धि: अमेरिकी संसद (Congress) में रक्षा बजट को बढ़ाकर $925 बिलियन करने की चर्चा तेज हो गई है, जो पहले से ही कर्ज में दबे अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती है।
​2. महंगाई और गैस की कीमतें (Inflation)
​महंगा पेट्रोल: अमेरिका में गैस (पेट्रोल) की कीमतें औसतन $3.50 प्रति गैलन के पार पहुँच गई हैं। युद्ध शुरू होने से पहले यह $3 के आसपास थीं।
​महंगाई का खतरा: अमेरिका में महंगाई दर (Inflation) पहले से ही 3% पर अटकी हुई थी। अब तेल और शिपिंग महंगी होने से इसके और ऊपर जाने का डर है, जिससे वहां के आम नागरिकों का 'कॉस्ट ऑफ लिविंग' (Cost of Living) बढ़ गया है।
​3. शेयर बाजार (Wall Street) में हलचल
​बड़ी गिरावट और रिकवरी: युद्ध के पहले और दूसरे दिन वॉल स्ट्रीट (Dow Jones और S&P 500) में 1200 अंकों तक की भारी गिरावट देखी गई थी। हालांकि, बाद में रक्षा कंपनियों (जैसे Lockheed Martin, RTX) के शेयरों में उछाल आने से बाजार थोड़ा संभला है।
​निवेशकों का डर: लोग अपना पैसा 'रिस्की' शेयरों से निकालकर सोने और डॉलर में लगा रहे हैं, जिससे बाकी सेक्टर्स (जैसे टेक और एयरलाइंस) को नुकसान हो रहा है।
​4. कर्ज और डॉलर की स्थिति
​बढ़ता राष्ट्रीय कर्ज: अमेरिका का कुल राष्ट्रीय कर्ज (National Debt) पहले ही रिकॉर्ड स्तर पर है। युद्ध के कारण बढ़ते सैन्य खर्च ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है कि भविष्य में अमेरिका की अर्थव्यवस्था अस्थिर हो सकती है।
​मजबूत डॉलर (एक मुसीबत भी): डॉलर दुनिया के लिए "सुरक्षित" होने के कारण महंगा हो रहा है, लेकिन इससे अमेरिका का अपना 'निर्यात' (Export) महंगा हो जाता है, जिससे उनकी कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में घाटा होता है।
​सारांश:
| क्षेत्र | असर (5 दिनों में) |
| :--- | :--- |
| युद्ध खर्च | $5 बिलियन+ |
| गैस कीमतें | 15-20% की वृद्धि |
| शेयर बाजार | भारी उतार-चढ़ाव (Volatility) |
| सोना | रिकॉर्ड $5,300/oz के करीब |
​

👉अगर यह युद्ध अगले कुछ महीनों तक खिंचता है, तो डॉलर की स्थिति "अस्थिर और खतरनाक" हो सकती है। मार्च 2026 के मौजूदा हालातों को देखते हुए, अर्थशास्त्रियों ने डॉलर के लिए दो बड़े परिदृश्य (Scenarios) बताए हैं:

1. अल्पकालिक मजबूती: "सेफ हेवन" प्रभाव

शुरुआती कुछ हफ्तों में डॉलर और ज्यादा मजबूत हो सकता है।

 * डॉलर इंडेक्स (DXY): यह 100 या उसके पार जा सकता है। जब दुनिया में कहीं भी युद्ध होता है, तो निवेशक अपना पैसा सुरक्षित रखने के लिए डॉलर खरीदते हैं।

 * रुपये पर दबाव: रुपया ₹94 - ₹95 के स्तर को छू सकता है, क्योंकि भारत को महंगा तेल खरीदने के लिए और अधिक डॉलर की जरूरत होगी।

2. दीर्घकालिक खतरा: "डॉलर का दबदबा" कम होना

अगर युद्ध 3-6 महीने चलता है, तो डॉलर के लिए मुश्किलें शुरू हो सकती हैं:

 * भारी कर्ज का बोझ: अमेरिका पहले से ही भारी कर्ज (National Debt) में है। युद्ध का खर्च चलाने के लिए उसे और नोट छापने पड़ेंगे या कर्ज लेना पड़ेगा, जिससे डॉलर की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हो सकती है।

 * विकल्पों की तलाश: अगर अमेरिका ईरान पर और कड़े वित्तीय प्रतिबंध लगाता है, तो चीन, रूस और यहाँ तक कि भारत भी डॉलर के बजाय अपनी मुद्राओं (Yuan, Rupee) में व्यापार तेज कर देंगे। इसे 'डी-डॉलरलाइजेशन' कहते हैं, जो लंबे समय में डॉलर की वैश्विक बादशाहत को कमजोर कर सकता है।

3. 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) का डर

लंबे युद्ध का मतलब है—लंबे समय तक महंगा तेल।

 * इससे अमेरिका में महंगाई फिर से बढ़ जाएगी और उनकी आर्थिक विकास दर (Growth) रुक जाएगी। ऐसी स्थिति में फेडरल रिजर्व (Fed) के लिए ब्याज दरें संभालना मुश्किल होगा, जिससे डॉलर की वैल्यू में अचानक गिरावट भी आ सकती है।

युद्ध खिंचने पर क्या-क्या हो सकता है?

| स्थिति | प्रभाव |

|---|---|

| कच्चा तेल (Oil) | $100 - $120 प्रति बैरल तक जा सकता है। |

| सोना (Gold) | $5,500/oz के नए रिकॉर्ड स्तर को पार कर सकता है। |

| भारतीय रुपया | आयात महंगा होने से ₹95 प्रति डॉलर तक गिर सकता है। |

| अमेरिकी शेयर बाजार | टेक और कंज्यूमर कंपनियों के शेयरों में 10-15% की गिरावट आ सकती है। |

निष्कर्ष: शुरुआत में तो डॉलर "राजा" बनकर उभरेगा, लेकिन अगर युद्ध महीनों चला, तो अमेरिका की अपनी अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है और दुनिया डॉलर के विकल्प ढूंढने पर मजबूर हो जाएगी।

जिसे लगाम लगाने को सभी देश आगे आ कर नई करने बनाने को मजबूर हों




मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...