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बुधवार, 24 जनवरी 2024

पंडित भीमसेन गुरुराज जोशी

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#24jan 
पंडित भीमसेन गुरुराज जोशी
🎂जन्म 04 फ़रवरी, 1922
जन्म भूमि गडग, कर्नाटक
⚰️मृत्यु 24 जनवरी, 2011
मृत्यु स्थान पुणे, महाराष्ट्र
अभिभावक गुरुराज जोशी
संतान श्रीनिवास जोशी (पुत्र)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र शास्त्रीय गायन
मुख्य रचनाएँ 'मिले सुर मेरा तुम्हारा'
विषय शास्त्रीय संगीत
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्‍न, पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण, पद्म श्री
प्रसिद्धि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी पंडित जोशी किराना घराने के गायक हैं। उन्हें उनके ख़्याल शैली और भजन गायन के विशेष रूप से जाना जाता है।

उन्होंने 19 साल की उम्र से गायन शुरू किया था और वे सात दशकों तक शास्त्रीय गायन करते रहे। भीमसेन जोशी ने कर्नाटक को गौरवान्वित किया है। भारतीय संगीत के क्षेत्र में इससे पहले एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान, पंडित रविशंकर और लता मंगेशकर को 'भारत रत्न' से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी योग्यता का आधार उनकी महान् संगीत साधना है। देश-विदेश में लोकप्रिय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान् गायकों में उनकी गिनती होती थी। अपने एकल गायन से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में नए युग का सूत्रपात करने वाले पंडित भीमसेन जोशी कला और संस्कृति की दुनिया के छठे व्यक्ति थे, जिन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्‍न' से सम्मानित किया गया था। 'किराना घराने' के भीमसेन गुरुराज जोशी ने गायकी के अपने विभिन्‍न तरीकों से एक अद्भुत गायन की रचना की। देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिलने के बारे में जब उनके पुत्र श्रीनिवास जोशी ने उन्हें बताया था तो भीमसेन जोशी ने पुणे में कहा था कि-

"मैं उन सभी हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायकों की तरफ से इस सम्मान को स्वीकार करता हूं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी संगीत को समर्पित कर दी।"
वर्ष 1941 में भीमसेन जोशी ने 19 वर्ष की उम्र में मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति दी। उनका पहला एल्बम 20 वर्ष की आयु में निकला, जिसमें कन्नड़ और हिन्दी में कुछ धार्मिक गीत थे। इसके दो वर्ष बाद वह रेडियो कलाकार के तौर पर मुंबई में काम करने लगे। अपने गुरु की याद में उन्होंने वार्षिक 'सवाई गंधर्व संगीत समारोह' प्रारम्भ किया था। पुणे में यह समारोह हर वर्ष दिसंबर में होता है। भीमसेन के पुत्र भी शास्त्रीय गायक एवं संगीतकार हैं।

बुलंद आवाज़ तथा संवेदनशीलता
पंडित भीमसेन जोशी को बुलंद आवाज़, सांसों पर बेजोड़ नियंत्रण, संगीत के प्रति संवेदनशीलता, जुनून और समझ के लिए जाना जाता था। उन्होंने 'सुधा कल्याण', 'मियां की तोड़ी', 'भीमपलासी', 'दरबारी', 'मुल्तानी' और 'रामकली' जैसे अनगिनत राग छेड़ संगीत के हर मंच पर संगीत प्रमियों का दिल जीता। पंडित मोहनदेव ने कहा, "उनकी गायिकी पर केसरबाई केरकर, उस्ताद आमिर ख़ान, बेगम अख़्तर का गहरा प्रभाव था। वह अपनी गायिकी में सरगम और तिहाईयों का जमकर प्रयोग करते थे। उन्होंने हिन्दी, कन्नड़ और मराठी में ढेरों भजन गाए थे।
Pt. Bhimsen Joshi
भीमसेन जोशी को 1972 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।
'भारत सरकार' द्वारा उन्हें कला के क्षेत्र में सन 1985 में 'पद्म भूषण' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पंडित जोशी को सन 1999 में 'पद्म विभूषण' प्रदान किया गया था।
4 नवम्बर, 2008 को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्‍न' भी जोशी जी को मिला। कला और संस्कृति के क्षेत्र से संबंधित उनसे पहले सत्यजीत रे, कर्नाटक संगीत की कोकिला एम.एस.सुब्बालक्ष्मी, पंडित रविशंकर, लता मंगेशकर और उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ को 'भारत रत्न' मिल चुका था। भीमसेन जोशी दूसरे शास्त्रीय गायक रहे, जिन्हें 'भारत रत्न' प्रदान किया गया था।
'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' से भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका था।
अविस्मरणीय संगीत
पंडित भीमसेन जोशी को मिले सुर मेरा तुम्हारा के लिए याद किया जाता है, जिसमें उनके साथ बालमुरली कृष्णा और लता मंगेशकर ने जुगलबंदी की। 1985 से ही वे ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ के जरिये घर-घर में पहचाने जाने लगे थे। तब से लेकर आज भी इस गाने के बोल और धुन पंडित जी की पहचान बने हुए हैं।

फ़िल्मों के लिए गायन
पंडित भीमसेन जोशी ने कई फ़िल्मों के लिए भी गाने गाए। उन्होंने ‘तानसेन’, ‘सुर संगम’, ‘बसंत बहार’ और ‘अनकही’ जैसी कई फ़िल्मों के लिए गायिकी की। पंडित जी शराब पीने के शौकीन थे, लेकिन संगीत कैरियर पर इसका प्रभाव पड़ने पर 1979 में उन्होंने शराब का पूरी तरह से त्याग कर दिया।

भीमसेन जोशी बड़े सादे इंसान थे। उन्हें कार चलाने का शौक था। मर्सिडीज की कारें उनकी कमज़ोरी थीं। जवान थे तो तैराकी, योग और फ़ुटबॉल खेलने का शौक रखते थे। शराब पीना उनका शौक था, लेकिन कहते हैं कि कॅरियर पर असर होते देखकर उन्होंने पीना छोड़ दिया था। संगीतज्ञों के बीच एक कहावत है- "जब तक कला जवान होती है, तब तक कलाकार बूढ़ा हो चुका होता है।" जोशी जी भी तन से बूढ़े हुए और उनका निधन 24 जनवरी, 2011 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ। आज के संगीत जगत् में भीमसेन जोशी घर के एक बड़े बुजुर्ग की तरह थे। बुजुर्ग, जिनके रूप में एक पूरा का पूरा युग हमारे बीच मौजूद रहता है, जिनकी उपस्थिति ही शुभ का, सुरक्षा का अहसास देती है, बताती है कि हम अनाथ नहीं हुए हैं। जोशी जी के जाने के साथ ही समकालीन संगीत के सिर से एक बड़े-बुजुर्ग का हाथ उठ गया।

सुभाष घई

#24jan
सुभाष घई

🎂जन्म 24 जनवरी, 1945
जन्म भूमि नागपुर, महाराष्ट्र
पति/पत्नी मुक्ता घई
संतान दो पुत्री- मेघना घई, मुस्कान घई
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिंदी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'कालीचरण', 'विश्वनाथ', 'कर्ज़', 'विधाता', 'कर्मा', 'हीरो', 'सौदागर', 'राम-लखन', 'ताल', 'खलनायक', 'परदेश' और 'ऐतराज़' आदि।
विद्यालय फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे
प्रसिद्धि फ़िल्म निर्माता-निर्देशक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी बॉलिवुड को नए ऐक्टर्स देने के लिए सुभाष घई ने एक ऐक्टिंग स्कूल की स्थापना भी की है। इसे दुनिया के टॉप-10 ऐक्टिंग स्कूलों में गिना जाता है।
24 जनवरी, 1945 को नागपुर में जन्मे सुभाष घई बचपन के दिनों से ही फ़िल्मों में काम करना चाहते थे। अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने पुणे के 'फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया' में प्रशिक्षण लिया और अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुंबई आ गए। सुभाष घई ने अपने जीवन में महज 16 फ़िल्मों का निर्देशन किया है। इनमें से 13 फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर रही हैं। उनकी पहली फ़िल्म 'कालीचरण' खूब सफल रही थी। इस फ़िल्म की कहानी भी घई ने ही लिखी थी।

सुभाष घई ने साल 1970 में मुक्ता घई से विवाह किया। उनकी दो बेटियां हैं। इनमें से एक बेटी मेघना को उन्होंने गोद लिया था। बॉलिवुड को नए ऐक्टर्स देने के लिए सुभाष घई ने एक ऐक्टिंग स्कूल की स्थापना भी की है। इसे दुनिया के टॉप-10 ऐक्टिंग स्कूलों में गिना जाता है।
अपने कॅरियर के शुरुआती दौर में सुभाष घई ने कुछ फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन बतौर अभिनेता अपनी पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो सके। बतौर निर्देशक सुभाष घई ने अपने कॅरियर की शुरुआत वर्ष 1976 में प्रदर्शित फ़िल्म 'कालीचरण' से की। फ़िल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई। वर्ष 1978 में उन्होंने एक बार फिर से शत्रुघ्न सिन्हा को लेकर 'विश्वनाथ' बनाई। इस फ़िल्म में शत्रुघ्न सिन्हा ने एक तेजतर्रार वकील की भूमिका निभाई थी। फ़िल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई। इस फ़िल्म में शत्रुघ्न सिन्हा का बोला गया यह संवाद जली को आग कहते हैं, बुझी को राख कहते हैं, जिस राख से बारूद बने, उसे विश्वनाथ कहते हैं दर्शकों के बीच आज भी लोकप्रिय है।
वर्ष 1980 में प्रदर्शित फ़िल्म 'कर्ज' सुभाष घई के कॅरियर की एक और सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई। पुनर्जन्म पर आधारित इस फ़िल्म में ऋषि कपूर, टीना मुनीम, सिमी ग्रेवाल, प्राण, प्रेमनाथ और राजकिरण ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। इस फ़िल्म में सिमी ग्रेवाल ने नेगेटिव किरदार निभाकर दर्शकों को रोमांचित कर दिया था। 'कर्ज' टिकट खिड़की पर सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई।

वर्ष 1982 में प्रदर्शित फ़िल्म 'विधाता' सुभाष घई के करियर की महत्वपूर्ण फ़िल्मों में शुमार की जाती है। इस फ़िल्म के जरिए सुभाष घई ने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, संजीव कुमार, संजय दत्त जैसे मल्टी सितारों को एक साथ पेश किया। फ़िल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए।
वर्ष 1982 में सुभाष घई ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'मुक्ता आर्ट्स' की स्थापना की, जिसके बैनर तले उन्होंने वर्ष 1983 में प्रदर्शित फ़िल्म 'हीरो' का निर्माण-निर्देशन किया। इस फ़िल्म के जरिए सुभाष घई ने फ़िल्म इंडस्ट्री को जैकी श्रॉफ और मीनाक्षी शेषाद्रि के रूप में नया सुपरस्टार दिया।

वर्ष 1986 में सुभाष घई ने दिलीप कुमार को लेकर अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'कर्मा' का निर्माण किया। दिलीप कुमार, नूतन, जैकी श्रॉफ, अनिल कपूर, नसीरुद्दीन शाह, श्रीदेवी, पूनम ढिल्लो और अनुपम खेर जैसे सुपर सितारों से सजी इस फ़िल्म के जरिए सुभाष घई ने दर्शकों के बीच देशभक्ति की भावना का संचार किया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...