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मंगलवार, 12 मार्च 2024

ममता कुलकर्णी

#,20april 
ममता कुलकर्णी
जन्म की तारीख और समय: 20 अप्रैल 1972, मुम्बई
पति: विक्की गोस्वामी (विवा. 2013)
माता-पिता: मुकुंद कुलकर्णी
ममता कुलकर्णी ( 20 अप्रैल , 1972 - जीवित) एक पूर्व मराठी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में काम किया। उनकी बहनें मिथिला और मोलिना हैं। साल 1993 में ममता अचानक उस वक्त चर्चा में आ गईं, जब स्टारडस्ट पत्रिका में उनकी आधी बिना सेंसर वाली तस्वीर प्रकाशित हुई। हालाँकि, वह 2002 से फिल्मों में काम नहीं किया है। फिल्मों में उनकी भूमिकाएं ज्यादातर कामुक प्रकृति की थीं। वह पहले विक्की गोस्वामी नाम के शख्स के साथ दुबई और फिर केन्या गई।
फिलहाल वह केन्या में अपने पार्टनर के साथ रहती हैं। उनकी पत्नी का नाम विजयगिरि आनंदगिरी गोस्वामी उर्फ ​​विक्की गोस्वामी है। यह शख्स कुख्यात ड्रग माफिया है। उनका दुबई में एक होटल है। 14 नवंबर 2014 को उन्हें केन्याई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और कैद कर लिया। विक्की के साथ पुलिस ने केन्या के प्रमुख ड्रग माफिया बरकत आकाश, उसके भाई और पाकिस्तानी ड्रग तस्कर गुलाम हुसैन को भी गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी को अंतरराष्ट्रीय तस्कर और आतंकी दाऊद इब्राहिम के इशारे पर माना जा रहा है। ममता कुलकर्णी को 9 नवंबर 2014 को हिरासत में लिया गया था, लेकिन पूछताछ के बाद रिहा कर दिया गया।

हिंदी के नाम और अन्य फिल्मों में अभिनय किया

अनोखा प्रेमयुद्ध
अशांत
अहंकार
आंदोलन
आशिक आवारा
कभी तुम कभी हम
करण अर्जुन
किला
किस्मत (नवा)
क्रांतिवीर
बदमाश
घटक
घातक
चंदामामा (मलयाली)
चायना गेट
छुपा रुस्तम
जाने जिगर
जीवन का युद्ध
दिव्य मंदिर खजुराहो
डोंगा पोलीस (तेलुगू)
तिरंगा
दिलबर
नसीब
नानबर्गल (तमिल)
पुलिस वाला गुंडा है
प्रेमशिखरम (तेलुगू)
बाजी (नवा)
बेकाबू
बेताब बादशाह
भूकंप
मेरा दिल तेरे लिये
राजा और रंगीली
वक्त हमारा है
वंशाधार (बंगाली)
वादे इरादे
सबसे बडा खिलाडी
सेंसर
इत्यादि

सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

जूथिका रॉय

#20april
#05feb 

जुथिका रॉय

🎂जन्म 20 अप्रैल, 1920
जन्म भूमि आमता, हावड़ा ज़िला (बंगाल)
⚰️मृत्यु 05 फ़रवरी, 2014 (93 वर्ष)
मृत्यु स्थान कोलकाता, पश्चिम बंगाल
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भजन गायिका
पुरस्कार-उपाधि पद्म श्री
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्ध गीत 'घुंघट के पट खोल', 'पग घुंघुरू बांध मीरा नाची', 'मैं तो वारी जाऊँ राम', 'कन्हैया पे तन मन'
जुथिका रॉय महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की पसन्दीदा गायिकाओं में से एक थीं।
भारतीय भजन (भक्ति संगीत) गायिका थीं। उन्होंने अपने चार दशक लम्बे कैरियर में 200 से अधिक हिन्दी और 100 से अधिक बंगाली गानों को अपनी आवाज़ दी। उन्होंने हिन्दी फ़िल्मों हेतु हिन्दी भक्ति संगीत भी रिकॉर्ड करवाये। जुथिका रॉय को 1972 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से पुरस्कृत किया गया था। 
जुथिका रॉय का जन्म संयुक्त बंगाल के हावड़ा ज़िले के आमता नामक स्थान पर 20 अप्रैल, 1920 में हुआ। जुथिका रॉय ने छोटी आयु में ही गाना आरम्भ कर दिया था। जुथिका रॉय को ख्याति 1930 में मिली। इन्हें मीरा के मधुर भजनों के लिए 'आधुनिक मीरा' के नाम से भी जाना जाता था। वे जब 12 साल की थीं तब उन्होंने अपना पहला एलबम 1932 में रिकॉर्ड किया था। जुथिका रॉय की प्रतिभा को कवि क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम और बंगाली संगीत निर्देशक कमल दास गुप्ता ने पहचाना था और ये दोनों ही उनके संरक्षक रहे। 1940 व 1950 में ये देश के चुनिंदा गायिकाओं में से एक थीं। इनके भजन 'घुंघट के पट खोल' और 'पग घंघरू बांध मीरा नाची' काफ़ी लोकप्रिय थे। उन्हें 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। 15 अगस्त 1947 को भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस पर नेहरूजी ने झंडा फहराने के साथ उन्हें रेडियो पर लगातार गाने की विनती की थी। उन्हें नेहरू जी ने कहा था कि वे जब तक लाल क़िले पहुंचे और तिरंगा झंडा फहराएं तब तक वे गाती रहें। यहीं नहीं गांधीजी जब पुणे की जेल में थे तब उनके गाने हर दिन सुनते थे। वे हर सुबह प्रार्थना सभा की शुरूआत उनके ही गाने बजाकर करते थे। जुथिका रॉय ने दो बंगाली फिल्म 'धुली' और 'रतनदीप' में अपनी मधुर आवाज़ भी दी है।

प्रसिद्ध गीत
घुंघट के पट खोल
कन्हैया पे तन मन
पग घुंघुरू बांध मीरा नाची
तोरे अंगसे अंग मिलाके कन्हाई
मैं राम नाम की चुड़ियाँ पहेनु
मैं तो वारी जाऊँ राम
निधन
भजन गायिका जुथिका रॉय का कोलकाता में 5 फ़रवरी, 2014 को निधन हो गया। वह वर्ष 93 की थीं। उन्हें उम्र से संबंधित बीमारियों से ग्रसित होने के कारण जनवरी 2014 में रामकृष्ण मिशन सेवा प्रतिष्ठान में भर्ती कराया गया था।

सोमवार, 21 अगस्त 2023

ओपी रल्हन

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, निर्माता, लेखक एवं अभिनेता ओ पी रल्हन के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

ओपी रल्हन
 🎂21 अगस्त 1928 
⚰️ 20 अप्रैल 1999
 एक बॉलीवुड निर्माता, निर्देशक, लेखक, अभिनेता थे जिन्होंने 1960, 1970 और 1980 के दशक में कई हिट फिल्में बनाईं

ओम प्रकाश (ओ.पी.) रल्हन का जन्म 21 अगस्त 1928 को सियालकोट, ब्रिटिश भारत, वर्तमान पाकिस्तान में एक समृद्ध अरोड़ा परिवार में हुआ था।  जब भारत का विभाजन हुआ तब वह 19 वर्ष के थे।  उन्हें और उनके परिवार को घर छोड़कर शरणार्थी के रूप में भारत में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।  यहां, अपनी सारी पूंजी और व्यवसाय खो देने के बाद, उन्हें जीविकोपार्जन के लिए छोटी-छोटी नौकरियों में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा।  ओपी को फिल्म निर्माताओं के साथ काम मिल गया।  इसी दौरान कुछ और हुआ जो उन्हें फिल्मी दुनिया के करीब ले गया।  

रल्हन ने 1950 के दशक की शुरुआत से 1960 के दशक की शुरुआत तक फिल्मों में छोटी छोटी भूमिकाएँ निभाईं।  इस समय तक, उनके साले राजेन्द्र कुमार एक बहुत बड़े फिल्म स्टार बन गए थे, और राजेन्द्र कुमार ने रल्हन को उनकी अभिनीत एक फिल्म का निर्माण करने के लिए कहा  रल्हन ने अपनी पहली फिल्म: गहरा दाग (1963) के लिए वितरकों को प्राप्त करने में कामयाबी हासिल की, जिसमें राजेंद्र कुमार और माला सिन्हा मुख्य भूमिका में थे।  फिल्म मामूली रूप से सफल रही, लेकिन रल्हन ने इस फ़िल्म से फ़िल्म उद्योग में पैर जमा लिया  रल्हन द्वारा निर्देशित फूल और पत्थर, मीना कुमारी, शशिकला और धर्मेंद्र सहित कलाकारों के साथ, जिसने उन्हें एक सुपर स्टार बना दिया  फिल्म हिंदी में काफी सफल रही और तमिल में भी बनी, "ओली विलाक्कू" जिसमें एम.जी.  रामचंद्रन, जया ललिता और सौकर जानकी  हालांकि, उन्हें फिल्म के लिए निर्देशक (और इसके निर्माता भी) के रूप में सबसे ज्यादा याद किया जाता है:  तलाश (1969) (मुख्य अभिनेता: राजेंद्र कुमार और शर्मिला टैगोर फिल्म देखने में काफी मनोरंजक थी, और शायद अब भी है इसमे संगीतकार सचिन देव बर्मन द्वारा उत्कृष्ट संगीत दिया गया था।  यह अपने समय की सबसे महंगी फिल्म थी।  हलचल बिना किसी गाने वाली कॉमेडी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म थी।  बंधे हाथ एक डोपेलगैंगर कहानी थी जिसमें मुमताज और अमिताभ बच्चन ने अभिनय किया है।  "मारी बेना" रीता भादुड़ी, अरविंद किराड, दीना पाठक और श्री ओ.पी रल्हन अभिनीत क्षेत्रीय भाषा की फिल्म थी  पापी सुनील दत्त, संजीव कुमार, जीनत अमान, रीना रॉय, प्रेम चोपड़ा, डैनी डेन्जोंगपा जैसे कलाकारों के साथ एक मल्टी स्टारर फ़िल्म थी।  प्यास सामाजिक विषय पर बनी एक फिल्म थी जिसमें तनुजा, जीनत अमान, कवलजीत सिंह और ओ.पी. रल्हन ने अभिनय किया था।

रल्हन की उल्लेखनीय उपलब्धियों में संघर्षरत अभिनेताओं को ब्रेक देना और उनकी फिल्मों में नए अभिनेताओं को शामिल करना शामिल है। उन्होंने शम्मी कपूर और रागिनी अभिनीत फिल्म मुजरिम (1958) का निर्देशन किया उन्होंने धर्मेंद्र को फूल और पत्थर (1966) में ब्रेक दिया यह उनकी पहली गोल्डन जुबली ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी धर्मेंद्र को इस फ़िल्म ने एक स्टार बना दिया।  ज़ीनत अमान को पहली बार बॉलीवुड में ओ. पी. रल्हन ने अपनी 1971 की फिल्म हलचल में पेश किया था, हालांकि लोगों को यह गलत धारणा है कि देव आनंद ने उन्हें हरे राम हरे कृष्णा में ब्रेक दिया था  रल्हन ने कबीर बेदी को भी हलचल में पेश किया  उन्होंने अमिताभ बच्चन को बंधे हाथ (1973) में उस समय कास्ट किया जब वह अभी तक एक जाना-पहचाना नाम नहीं थे फ़िल्म बंधे हाथ के बाद उनकी ज़ंज़ीर हिट हुई थी

ओपी रल्हन की बहन जुबली स्टार राजेंद्र कुमार की पत्नी और कुमार गौरव की मां थीं।  रल्हन के कोई पुत्र नहीं था।  उनके नाती अरमान (उनकी बेटी रूपल्ली के बेटे) ने बॉलीवुड में अपने नाना की विरासत को जारी रखने के लिए अपने नाना का उपनाम 'रल्हन' अपना लिया है।

20 अप्रैल 1999 में उनका निधन हो गया

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

वजहत मिर्जा

🎂जन्म की तारीख और समय: 20 अप्रैल 1908, सीतापुर
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 4 अगस्त 1990, कराची, पाकिस्तान
इनाम: फिल्मफेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ संवाद
किताबें: द डायलाग ऑफ़ मदर इंडिया : मेहबूब ख़ानस् इम्मोर्टल क्लासिक
🎬वजाहत मिर्ज़ा.【पुण्यस्मृति】
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फ़िल्में कला का सबसे श्रेष्ठतम माध्यम होती हैं.इनमें सभी कलाओं का संगम होता है.मसलन:संगीत,अदाकारी,लेखन इत्यादि. इनमें से एक भी पक्ष कमज़ोर हो तो उसका पूरी फ़िल्म पर प्रभाव पड़ता है. दर्शक अक्सर फिल्मों के नायक-नायिकाओं को ही तवज्जो देते हैं पर इनके इतर भी बहुत कुछ होता है. उनके द्वारा बोले गए संवाद,उनके अभिनय करने और संवाद बोलने का तरीक़ा एक पटकथा लेखक तय करता. तब कहीं जाकर वे दर्शकों के दिलों में अपना घर बना पाते हैं.

भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग में ऐसे ही एक पटकथा और संवाद लेखक थे-‘वजाहत मिर्जा.’ जिन्होंने उस दौर की बेहतरीन फिल्मों के संवाद लिखे. उनके लिखे संवादों और पटकथाओं ने न जाने कितने नायक और नायिकाओं को अमर कर दिया.

अपनी लेखन कला से करोड़ों लोगों के दिल पर राज करने वाले वजाहत मिर्ज़ा का जन्म 20 अप्रैल 1908 के दिन लखनऊ के निकट स्थित सीतापुर में हुआ था. सम्पन्न घराने से होने के कारण इन्हें पढने-लिखने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा.जैसे-जैसे ये बड़े होते गए, वैसे-वैसे उनका रुझान सिनेमा और लेखन की तरफ होता गया. इस उद्देश्य से उन्होंने 'गवर्नमेंट जुबिली इंटर कॉलेज' में दाखिला ले लिया.यह वही समय था, जब उन्होंने कुछ ठोस काम करने का मन बनाया.अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने कलकत्ता के सिनेमेटोग्राफर कृष्ण गोपाल से संपर्क साधा. उनके साथ मिलकर उन्होंने निर्देशन और सिनेमा लेखन की बारीकियां सीखीं. उनके सीखने की गति इतनी तेज़ थी कि वे जल्द ही उनके सहायक भी बन गए.

दोनों ने मिलकर कुछ अच्छी का निर्माण किया.उनके फिल्म बनाने का अंदाज़ एकदम नया था.उन्हें जल्द ही जाने-पहचाने निर्देशकों और निर्माताओं की तरफ से बुलावे आने लगा. 

चालीस के दशक में उन्होंने कुछ फिल्मों का निर्देशन किया. इन फिल्मों में ‘स्वामीनाथ’, ‘जवानी’ और ‘प्रभु का घर’ जैसी फ़िल्में शामिल थीं. निर्देशन के साथ-साथ वे लेखन भी कर रहे थे.

जैसे-जैसे वक़्त बीता उन्हें एहसास होने लगा कि लेखन ही उनके लिए सही विकल्प है और उन्हें अपना सारा ध्यान केवल लेखन पर ही लगाना इसका परिणाम यह हुआ कि फ़िल्में हिट होने लगीं.1940 में उन्होंने ‘औरत’ फिल्म के लिए लेखन किया. इसके बाद 1956 में फिल्म ‘आवाज़’ में भी उन्होंने पटकथा और संवाद लिखे. इसके लिए उनकी खूब सराहना हुई.आगे 1957 में मेहबूब खान के निर्देशन में ‘मदर इंडिया’ फिल्म रिलीज हुई तो यह 'ब्लॉकबस्टर' साबित हुई. यह फिल्म अपने संवादों के लिए 'ऑस्कर पुरस्कार' के लिए नॉमिनेट भी हुई और केवल एक वोट से इस पुरस्कार को जीत नहीं पाई. इस फ़िल्म के संवाद वजाहत मिर्ज़ा ने ही लिखे थे.1960 में सदी महान फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ आई. इस फिल्म के संवाद और पटकथा चार लेखकों ने तैयार किये. इनमें से एक वजाहत मिर्ज़ा भी थे.अगले ही साल फिल्म ‘गंगा-जमुना’ रिलीज़ हुई. यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर हिट रही.

वजाहत मिर्जा का संवाद और पटकथा लिखने का अंदाज बिल्कुल निराला था.वे कठिन से कठिन बातों को सीन के अनुरूप ढालकर इतनी सहजता से कह देते थे कि लगता ही नहीं था कि फिल्म में कहीं भारीपन या ऊब है.अगर हम मदर इंडिया की बात करें तो जब राधा अपने दो भूखे बच्चों को लेकर सूदखोर सुखी लाला के पास जाती है, तब लाला उसके सामने एक प्रस्ताव रखता है. लाला कहता कि राधा अगर अपनी इज्जत का सौदा कर ले तो वह उसे पैसे दे देगा. इस बात को वजाहत मिर्ज़ा ने बिल्कुल आसान और प्रभावशाली शब्दों संवाद में ढाला था: "अच्छी तरह सोच विचार कर लो राधा. कौनो जल्दी नाही है, सुखी लाला बहुत सबर वाला आदमी है." वहीँ अगर फिल्म ‘गंगा-जमुना’ की बात करें, तो इसमें भी किरदार जमुना की ख़ुद्दारी को मिर्ज़ा साहब ने बहुत ही आसान शब्दों में  बयान किया है. जमुना जब काम की तलाश में आता है, तब उसे एक  सोने का हार मिलता है. वह यह हार पुलिस को दे देता है. पुलिस वाला उसकी हालत देखकर पूछता है," मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूँ?". तब जमुना जवाब देता है,: "कोई नौकरी मिल सकती है,मैं बहुत तकलीफ में हूँ."

संवाद और पटकथा लिखने का मिर्ज़ा साहब का यह अनोखा अंदाज ही था, जिसकी वजह से उन्हें लगातार दो बार 'फिल्म-फेयर अवार्ड' मिला. 1961 में ‘मुगल-ए-आज़म’ और 1962 में ‘गंगा-जमुना’ के लिए उन्हें इस पुरस्कार से नवाजा गया. आगे उन्होंने ‘लीडर’, ‘शतरंज’, ‘गंगा की सौगंध’ और ‘लव एंड गॉड’ जैसी सुपरहिट फिल्मों के संवाद भी उन्होंने ही लिखे.अपने 53 साल के करियर में उन्होंने कुल मिलाकर 31 फिल्मों के लिए संवाद और पटकथा तैयार की.

अपने संवादों से उन्होंने अनेकानेक कलाकारों को सिनेमा जगत के सबसे ऊपरी पायदान पर बिठाया.उन्होंने ताउम्र अपना काम पूरी शिद्दत से किया और 4 अगस्त 1990 के दिन इस दुनिया को अलविदा कह गए.

☄️स्वर्णिम युग के इस महान संवाद और पटकथा- लेखक को उनकी 33वीं पुण्यतिथि पर हम नमन करते हैं.
🙏🙏

रविवार, 23 जुलाई 2023

पन्नाला घोष बांसुरी वादन के जनक

बांसुरी वादन के जनक पन्नला घोष

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  ꧁ बांसुरी वादक पन्नला घोष


*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*

🎂 जन्म : 24 जुलाई 1911, बरिसल, बांग्लादेश

⚰️मृत्यु : 20 अप्रैल 1960, नई दिल्ली

बच्चे: शान्ति-सुधा

माता-पिता: अक्षय कुमार घोष

पत्नी: पारुल घोष

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अमल ज्योति घोष के नाम से जाने जाने वाले पं. पन्नालाल घोष का जन्म 24 जुलाई 1911 में पूर्वी बंगाल के बारीसाल में हुआ था। शुरू में उनका परिवार अमरनाथगंज के गांव में रहता था जो बाद में फतेहपुर आ गया। उनका जन्म संगीतसुधी परिवार में हुआ था। उनके पिता अक्षय कुमार घोष सितार वादक थे और उनकी मां सुकुमारी गायक थीं।

प्रारंभिक जीवन

हारमोनियम उस्ताद खुशी मोहम्मद ख़ान उनके पहले गुरु थे और ख्याल गायक पंडित गिरजा शंकर चक्रवर्ती एवं उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान साहब से भी उन्होंने शिक्षा हासिल की थी। 1940 में पन्नाबाबू ने संगीत निर्देशक अनिल विश्वास की बहन और जानी मानी पार्श्व गायिका पारुल घोष से विवाह कर लिया। इसके पहले 1938 में पन्नालाल घोष ने यूरोप का दौरा किया और वे उन आरंभिक शास्त्रीय संगीतकारों में से एक थे जिन्होंने विदेश में कार्यक्रम पेश किया।

बांसुरी के जन्मदाता

पन्नाबाबू शास्त्रीय बांसुरी के जन्मदाता हैं और उन्हें बांसुरी का मसीहा कहना समीचीन होगा। जिन्हें बांसुरी को लोक वाद्य से शास्त्रीय वाद्य यंत्र के रूप में स्थापित करने का श्रेय जाता हैं। उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम था कि 1930 में उनका पहला एलपी जारी हुआ। आने वाली सदियां पन्ना बाबू के काम को कभी भूल नहीं सकती हैं। उन्हीं का प्रयास है कि कृष्ण कन्हैया की बांसुरी का आज के फ्यूजन संगीत में भी अहम स्थान है। बांसुरी को शास्त्रीय वाद्य के रूप में लोगों के दिलों में बसाने का काम पन्ना बाबू ने शुरू किया था और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जैसे बांसुरी वादकों ने इस वाद्य यंत्र को विदेशों में लोकप्रिय कर दिया। पन्नालाल जी ने कई फ़िल्मों में भी बांसुरी बजाई थी, जो आज भी अद्वितीय है। 

(जिनमें मुग़ले आज़म, बसंत बहार, बसंत, दुहाई, अंजान और आंदोलन जैसी कई प्रसिद्ध फ़िल्में प्रमुख हैं) 

जिसके संगीत के साथ पंडित पन्नालाल घोष का नाम जुड़ा रहा।

निधन

पारंपरिक भारतीय वाद्य यंत्र बांसुरी की अतुल्य विरासत अपने शिष्य और प्रशंसकों के हाथों में सौंप कर 20 अप्रैल 1960 में पन्नाबाबू हमेशा के लिए इस दुनिया से कूच कर गये। पन्नालाल जी की बांसुरी जब आज भी सुनते हैं तो उनकी मिठास तथा विविधता का कोई जोड़ नज़र नहीं आता। उनका बजाया हुआ राग मारवा तथा अन्य राग जब आज सुनते हैं तो अध्यात्मिक अहसास होने लगता है।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...