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गुरुवार, 1 फ़रवरी 2024

जगजीत सिंह नेगी


#02feb 
21jun 
जीत सिंह नेगी 

🎂जन्म- 02 फ़रवरी, 1925; 
⚰️निधन 21 जून, 2020 
 
उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में जारी हुआ। जीत सिंह नेगी ने दो हिंदी फिल्मों में भी बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। वह संगीतकार और रंगकर्मी भी थे। वह पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक भी रहे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।
जीत सिंह नेगी उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया था। तब पहली बार ऐसा हुआ था, जब किसी उत्तराखंडी लोकगायक के गीतों का रेकॉर्ड उस समय देश की मशहूर ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया। 2 फरवरी, 1925 को पौड़ी जिले के अयाल गांव में जन्मे और वर्तमान में देहरादून के नेहरू कॉलोनी (धर्मपुर) के निवासी जीत सिंह नेगी के इसमें 6 गीत शामिल किए गए थे। जीत सिंह नेगी अपने दौर के न केवल जाने-माने लोकगायक रहे, बल्कि उत्कृष्ट संगीतकार, निर्देशक और रंगकर्मी भी रहे। दो हिंदी फिल्मों में भी उन्होंने बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। ‘शाबासी मेरो मोती ढांगा…’ ‘रामी बौराणी…’ ‘मलेथा की गूल…’ जैसे कई उनके नाटक भी लोकप्रिय हुए।

रेडियो पर पहले गढ़वाली लोकगायक
जीत सिंह नेगी के ‘शाबासी मेरो मोती ढांगा’ को चीनी प्रतिनिधिमंडल ने कानपुर में न केवल रिकॉर्ड किया, बल्कि रेडियो पीकिंग से उसका प्रसारण भी किया। वे पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक थे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।

लोकप्रिय गीत
1950 के दशक की शुरूआत में रेडियो से यह गीत प्रसारित हुआ तो उत्तराखंड से लेकर देश के महानगरों तक प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच पलक झपकते ही बेहद लोकप्रिय भी हो गया। इस सुमधुर खुदेड़ गीत के बोल थे, ‘तू होली उंचि डांड्यूं मा बीरा-घसियारी का भेष मां-खुद मा तेरी सड़क्यां-सड़क्यों रूणूं छौं परदेश मा…।’ (तू होगी बीरा उंचे पहाड़ों पर घसियारी के भेष में और मैं यहाँ परदेश की सड़कों पर तेरी याद में भटक रहा हूं-रो रहा हूं।)

निर्देशन कार्य
जीत सिंह नेगी के निर्देशन में 1954-1955 में दिल्ली में आयोजित गढ़वाली नाटक ‘भारी भूल’ का मंचन हुआ। कई अच्छे कलाकार नेगी जी की टोली से जुड़े रहे। मुंबई-दिल्ली-चंडीगढ़ समेत देश के कई प्रमुख नगरों में उस दौर में जीत सिंह नेगी के गीत और नाटक श्रोताओं-दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते थे।

मृत्यु
जीत सिंह नेगी का निधन 21 जून, 2020 को हुआ। उन्होंने अपने धर्मपुर स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से लोक कलाकारों के साथ ही प्रदेशवासियों में शोक दौड़ पड़ी। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उत्तराखण्ड के लोकगायक और गीतकार जीत सिंह नेगी के निधन पर शोक व्यक्त किया।

बुधवार, 21 जून 2023

अभिनेता डेविड अब्राहम चेउलकर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

*🎂जन्म 21 जून*
 *⚰️28 दिसंबर 1981*
अभिनेता डेविड अब्राहम चेउलकर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

खेलों की दुनिया में कोई बड़ा मौका नहीं मिला, वकालत चली नहीं, बस शौक में फिल्मों में अभिनय क्या किया वही उनका कैरियर बन गया। उनका नाम था डेविड। कद तो महज पांच फुट तीन इंच था, लेकिन छोटा कद उन्हें फिल्मों में लंबी पारी खेलने से नहीं रोक पाया।

21 जून 1909 को महाराष्ट्र के ठाणे में जन्मे डेविड अब्राहम एक संपन्न यहूदी परिवार से संबंध रखते थे। उनकी परवरिश मुंबई में हुई, जहां उनके पिता रेलवे में इंजीनियर थे। उन्हें कसरत करने का खासा शौक था और घरवालों की ख्वहिश के चलते कानून की पढ़ाई पूरी की, लेकिन इस दौरान उनकी खेलों में रूचि बढ़ती गयी। वे न सिर्फ वेटलिफ्टिंग करने लगे बल्कि कई प्रतियोगिताएं भी जीतीं। कानून की पढ़ाई के बाद डेविड अदालत में बैठने लगे, मगर कई महीने तक कोई केस ही नहीं मिला। उन्होंने नौकरी ढूंढने की भी जीतोड़ कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। खेलों की दुनिया ने उन्हें शोहरत तो जरूर दी लेकिन इतना पैसा नहीं मिला कि खेलों को अपना कैरियर बना पाते।

कालेज के दिनों में डेविड इंडियन पीपुल्स थियेटर से जुड़े थे। उसी दौर के एक दोस्त ने उनके मन में फिल्मों के प्रति दिलचस्पी जगायी। डेविड काम की तलाश में बहुत परेशान थे और कुछ पैसे कमाने के लिए वे फिल्मों में काम करने को राजी हो गए। 1937 में फिल्म ‘जम्बो’ में उन्हें छोटा सा रोल मिला। इसमें युवा डेविड को एक बूढ़े प्रोफेसर का किरदार निभाना पड़ा। इसके बाद एक दो और फिल्मों में उन्होंने कुछ छोटे छोटे रोल किए। फिर फिल्म ‘नया संसार’ (1940) में उन्हें अहम रोल मिला और उनकी पहचान एक अभिनेता के रूप में बनी। 1944 में आई फिल्म ‘द्रौपदी’ में शकुनी का किरदार निभा कर डेविड ने अपने अभिनय की नयी रेंज का प्रदर्शन किया।

संवाद याद करने, कैमरे का सामना करने और फिल्म यूनिट में लोगों के साथ बात चीत करना डेविड को इतना भाता था कि फिर उन्होंने किसी और दूसरे काम के बारे में सोचा ही नहीं। फिल्मी दुनिया को ही उन्होंने हमेश के लिये अपना परिवार बना लिया। डेविड को जो भी रोल मिलते थे, वे स्वीकर कर लेते थे। इससे उनकी अच्छी आमदनी तो हुई ही साथ ही हर तरह के रोल निभाने का मौका भी मिला। फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास डेविड के बड़े प्रशंसक थे और अपनी कई फिल्मों में उन्हें मौका दिया।

डेविड एक चरित्र अभिनेता के रूप मे स्थापित हो चुके थे। तभी उनकी जिंदगी में फिल्म ‘बूट पालिश’ (1954) का अध्याय जुड़ा। इस फिल्म में उन्होंने बच्चों से प्यार करने वाले दयालु जॉन चाचा का किरदार निभाया। पर्दे पर उनका गाया गीत ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…’ बरसों तक रेडियो पर बजता रहा। इस फिल्म के लिये डेविड को फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। यह फिल्म उनके जीवन में मील का पत्थर बन गयी। सालों तक लोग उन्हें जॉन चाचा कह कर बुलाते रहे।

डेविड फिल्मों से जरूर जुड़े, लेकिन खेलों के प्रति उनकी दिलचस्पी कम नहीं हुई। वे महाराष्ट्र वेटलिफ्टिंग एसोसिएशन के 30 साल तक अध्यक्ष रहे। 1952 में हेलसिंकी में हुए ओलंपिक में वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता के जज भी बने। बात चीत में तेज तर्रार डेविड ने खेलों की कमेंट्री भी की और फिल्मी प्रशंसकों से अधिक खेल के प्रशंसकों में लोकप्रिय रहे। उन्हें सरकारी और गैरसरकारी कार्यक्रमों के संचालन का काम भी मिलने लगा। फिल्म फेयर के पहले अवार्ड का संचालन डेविड ने ही किया था।

निजी जीवन में भी डेविड का हास्य बोध बहुत जबरदस्त था। डेविड ने सवा सौ से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी चर्चित फिल्मों में हाथी मेरे साथी, बातों बातों में, अभिमान, कालीचरण, गोलमाल, खट्टा मीठा, सत्यकाम और खूबसूरत शामिल हैं। डेविड ने जीवन भर शादी नहीं की। 1979 में डेविड ने इजराइल में बसने का फैसला लिया, इसी सिलसिले में वे अपने रिश्तेदारों के पास टोरंटो गए। ⚰️28 दिसंबर 1981 को वहां उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

मंगलवार, 20 जून 2023

निगार सुल्ताना

🎂जन्म
21 जून 1932
हैदराबाद , हैदराबाद राज्य , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत
21 अप्रैल 2000 (आयु 67)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
पेशा
अभिनेत्री

निगार सुल्ताना (21 जून 1932 - 21 अप्रैल 2000) एक भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में काम किया। वह आग (1948), पतंगा (1949), शीश महल (1950), मिर्जा गालिब (1954), यहूदी (1958), दो कलियां (1968) आदि में दिखाई दीं, लेकिन उन्हें "की भूमिका निभाने के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है" बहार बेगम" ऐतिहासिक महाकाव्य फिल्म मुगल-ए-आज़म (1960) में । वह फिल्म निर्माता के. आसिफ की पत्नी थीं । मई 2000 में, मुंबई , भारत में उनकी मृत्यु हो गई।

निगार सुल्ताना का जन्म 21 जून 1932 को हैदराबाद , भारत में हुआ था ।  वह पांच लोगों के परिवार की सबसे छोटी बेटी थी। उसके दो भाई और दो बहनें हैं। उन्होंने अपना बचपन हैदराबाद में बिताया जहां उनके पिता निज़ाम की राज्य सेना में एक मेजर के पद पर थे।

वह कुछ समय के लिए स्कूल गई और बाद में घर पर ही पढ़ाई की। उसने एक अवसर पर एक स्कूल नाटक में भाग लिया और उसके बाद से वह अभिनय के लिए उत्सुक थी।

पहली फिल्म निगार कभी देखी थी हम तुम और वो (1938)। वह इससे इतनी रोमांचित थी कि जब उसके पिता के एक दोस्त जगदीश सेठी ने उसे मोहन भवनानी के साथ बनाई जा रही एक फिल्म में मुख्य भूमिका की पेशकश की, तो उसने उसे वहीं ले लिया। 

उन्होंने 1946 में आई फिल्म रंगभूमि से फिल्मों में एंट्री की । राज कपूर की आग (1948) हिंदी फिल्मों के लिए उनका पहला बड़ा ब्रेक थी। उन्होंने "निर्मला" की चरित्र भूमिका निभाई, जिसे आलोचकों और दर्शकों द्वारा समान रूप से सराहा गया। उसके बाद, उन्होंने कई फिल्मों में चरित्र भूमिकाएँ निभाईं। 

उनकी पहली बड़ी फिल्म शिकायत (1948) थी, जो पूना में बनी थी; उसके बाद बेला (1947), रंजीत प्रोडक्शन आई , और उसके बाद कई और जिसमें उसने प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। उन्होंने मुग़ल-ए-आज़म (1960) फिल्म में दरबारी नर्तकी बहार की भूमिका निभाई, जो अनारकली ( मधुबाला ) के लिए राजकुमार सलीम ( दिलीप कुमार ) के प्यार से ईर्ष्या करती है। तेरी महफ़िल में और जब रात हो ऐसी मतवाली गाने उन पर फ़िल्माए गए थे। उनकी अन्य फिल्मों में दारा (1953) और खैबर शामिल हैं ।

पतंगा (1949), दिल की बस्ती (1949), शीश महल (1950), खेल (1950), दमन (1951), आनंद भवन (1953), मिर्जा गालिब (1954), तनखाह (1956), दुर्गेश नंदिनी (1956) तथा यहूदी (1958) उनकी प्रसिद्ध फिल्मों में से हैं। वह 1950 के दशक के दौरान सबसे अधिक सक्रिय थीं और बाद में केवल कुछ ही फिल्मों में दिखाई दीं। 1986 में आई जुंबिश: ए मूवमेंट - द मूवी उनकी आखिरी हिंदी फिल्म थी। 

निगार सुल्ताना का नाम पाकिस्तानी अभिनेता दर्पण कुमार के साथ जोड़ा गया था । 13 जून 1959 को, निगार सुल्ताना ने विशेष रूप से उन खबरों का खंडन करने के लिए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की कि उन्होंने पाकिस्तानी अभिनेता से शादी की थी। 

बाद में निगार सुल्ताना ने मुग़ल-ए-आज़म (1960) के निर्माता-निर्देशक के आसिफ से शादी कर ली।

निगार सुल्ताना अभिनेत्री हीना कौसर की मां थीं, जिनसे उन्होंने फिल्म निर्माता के.आसिफ के साथ शादी की थी। हीना कौसर 1970 और 1980 के दशक के दौरान बड़ी संख्या में फिल्मों में माध्यमिक भूमिकाओं में दिखाई दीं।

1950 के दशक की दो अभिनेत्रियाँ, चित्रा (जन्म अफसर-उन-निसा) और पारस (जन्म यूसुफ-उन-निसा) निगार सुल्ताना की भतीजी हैं। 

21 अप्रैल 2000 को मुंबई , भारत में उनकी मृत्यु हो गई।
उनकी कुछ फिल्मे
आग में सुल्ताना (1948)
रंगभूमि (1946)
1857 (1946)
बेला (1947)
शिकायत (1948)
नाव (1948)
मिट्टी के खिलौने (1948)
आग उर्फ ​​फायर (1948)
पतंगा (1949)
सुनेहरे दिन (1949)
बाजार (1949)
बालम (1949)
शीश महल (1950)
खेल (1950)
खामोश सिपाही (1950)
फूलन के हार (1951)
दमन (1951)
हैदराबाद की नाज़नीन (1952)
आनंद भवन (1953)
रिश्ता (1954)
मिर्जा गालिब (1954)
मस्ताना (1954)
मंगू (1954)
खैबर (1954)
सरदार (1955)
उमर मारवी (1956)
दुर्गेश नंदिनी (1956)
यहूदी (1958)
कमांडर (1959)
मुग़ल-ए-आज़म (1960)
राज़ की बात (1962)
ताज महल
मेरे हमदम मेरे दोस्त (1968)
दो कलियाँ (1968)
बंसी बिरजू (1972)
जुम्बिश: ए मूवमेंट-द मूवी (1986)

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...