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गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

शिव गीता अध्याय 2



दूसरा अध्याय ऋषियों ने पूछा अगर भी रामचंद्र के निकट क्यों आए थे और इस प्रकार श्री रामचन्द्रजी गुजराती शाह कराई थी इससे रामचंद्र को किस फल की प्राप्ति हुई थी सो आप हम
शिखर ही सूझी मूवी जिस समय झलक कुमारी सीता को रावण ने हरण किया था तब रामचंद्र ने योग के कारण बहुत विलाप किया निंद्रा देहाभिमान और भोजन तैयार कर दिन शो करती भाई सहित रहा
चंद्र ने प्राण त्याग करने की इच्छा थी
तिरछी यह बात जानकर रामचन्द्रजी के समीप पाए और उन्होंने ही रामचंद्र को संसार की असारता चाहिए अगर मिली ही रांची कि क्या विसात करते हो इस ड्रिंक की इसका विचार तो करो
फिर भी आपको तेज वायु और आकाश इन पांच महाभूतों का बना हुआ यह से ही झड़ गई
इसको ज्ञान नहीं होता और आत्मा तो निर्लेप को सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदानंद स्वरूप थे
आत्मा न कभी उत्पन्न होता नम्रता दुख भोगता है
जिस का यह सूर्य सम्पूर्ण संसार की चर्चा रूप से फिर थे और चक्षुओं के दोस् से कवि लिफ्ट नहीं होता इसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का आत्मा ही दुख में लिप्त नहीं होता और यह भी मलका पिंड तरह
यह कला रहित होने से ही झड़ गए इस काश अगली के सहयोग से भस्म हो जाता है
सियार आदि इसको खा जाते हैं तो भी नहीं जानता कि उसके वियोग में क्या दुख खा है जिसका स्वर्ण के समान भगवान अथवा दूर्वा दल के समान श्याम रूप से कुछ कलश जिसके उन्नत थे मध्य भाग सूक्ष्म है
बड़ी नितम्ब और जाने वाले क्षरण अटल जिसका का कमल के सदस्य रक्त वर्ण के जिसका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान और करके रिणवा हल्के शर्मा जिसकी होस्टिंग नील कमल के समान जिसके विशाल
नेत्र ही मुक्त को के समान जिसके बच्चन और मस्त हाथी के समान जिसकी चहल ही राजन सावधान होकर सुनो मैं इस का गठन करता हूं
इस स्त्री पुरुष यह रकम तक नहीं है
यह दे ही मूर्ति रहित सब देवों में स्थित रोक रहे सर्वव्यापी सबका साक्षी वे में तो प्राणों को सजीव करने वाला है
जिसको सूक्ष्म ही सुकुमार वाला कहते हैं
वे का पेन और जल रूपये वे न कुछ थी न तुम थी न होती है
जिसका शरीर धर्म मात्र का है ही रामचंद्र बुद्धि से विचारो और जो प्राणों से भी अधिक प्यारी वहीं दीपिका कुमारी दुख का कारण भी पंच महाभूतों से उत्पन्न होने के कारण पाँच भौतिक देरी उत्पन्न होती
परन्तु उन में आत्मा इस पर को सनातन ही इस विचार से कॉल हिस्ट्री कौन पुरुष ही सब ही घर है
जिस प्रकार अनेक गिर है निर्माण करने में आकाशी अविच्छिन्न पिता को प्राप्त होता है
अर्थात में मिल जाता है
पश्चात उन घरों के जल जाने पर कुछ खाने को में पूरा नहीं होता इसी प्रकार वे हो में आत्मा पर को और सनातन है
वे संबंध थे
अनेक प्रकार का प्रतीत होता है
परंतु उसके नाश होने पर आत्मा नष्ट नहीं होता वे एक हो गए
जो मारने वाला जानता है मैंने मारा जो मरने वाला जानता है कि मैं मरा यह हूँ न जानने से मूर्ख हैं
कहा कि लाई है मानता है और न वे मारा जाता है
छः रहा इसका है अति दूर करने से छेद का कारण क्या है
अपना सर इस प्रकार जानकर दुख को त्याग कर चुके श्री रामचंद्र होली है
जल्द ही को भी दुख नहीं होता और परमात्मा को भी दुख नहीं होता है तो सीता के वियोग भी जो वस्तु रहा
कही जाती है
तुम कहते हो कि वे नहीं है
हे मुनिश्रेष्ठ फिर इस बात में मुझे कैसे विश्वास हो झा सुख दुख को भोक्ता जीव नहीं तो कौन है जिसके द्वारा प्राणी दुखी होता है
सुख दुख को गुप्ता कौन है
जिबूती शिवजी की माया कठिनता से जानने योग्य है
जिसने जगत को मोह लिया
उस महिला को तो प्रकृति झाली और माया वाले वहीं शैलजा ने उसी के रूप जीव भी सम्पूर्ण जगत व्याप्त है
वे महेश सच्चा को ज्ञानस्वरूप अनंत और सर्वव्यापी है
उसी का वंश जीव लोक में सब प्राणियों के हृदय में स्थित होगा
जिस प्रकार थी कास्ट के योग से अग्नि में इस फुली उठते ही इसी प्रकार ही भी ऐसा परमात्मा से था
वे श्रेयांश जी अनादिकाल के कर्म बंधन में ही अनादि वासनाओं से युक्त है
और क्षेत्र के रहते ही मन बुद्धि चित्त अहंकार एक शहरों अन्तः करण के ही भेली इस अन्तः करण चलते पश्चिमी क्षेत्र क्यों का पृथ्वी पड़ता है
वहीं जीवन को प्राप्त होकर कर्म फल के गुप्ता ही वहीं ही कम होने के था वे हो को प्राप्त होकर विशेष सेवन करने से सुख या दुख भोग करते ही इस टावर जन्म के भेद से दो प्रकार का शरीर
कहा जाता है
कितनी ही प्राणी शरीर धारा के लिमिट कर्मानुसार योनियों में प्रवेश करते ही और दूसरे
श्रेय करते ही वृक्ष लता गोल इस था और सूक्ष्म वे ही कहलाते हैं
और अंदाज पहुंची सिर्फ इत्यादि स्वेटर फिर में शिकार हुई जरायुज मनुष्य घाव आदि यह जंगलों मुशहरी कहलाते हैं
जलीय जीव विषयों में लिमिट होता है तब मैं सुखी हूँ दुखी हूं ऐसा रहा था है
यद्यपि वे निर्मल जो रूप है परन्तु शिव जी की माया से मोहित सुख दुख का अनुमान नहीं था
काम क्रोध लोभ मद मास्टर और मुहूर्त के छह माह महाशत्रु अहंकार से उत्पन्न होते हैं
यह का शौक और जागृत अवस्था में जीव को दुख देता है
और सृष्टि में सूक्ष्म रूप के होने और अहंकार के अभाव से यह रिशी आनंद को प्राप्त था
इस था यह माया में मिलने से सुख दुख का कारण उत्पन्न होता है
जिस दिन था सूर्य की किरणों के पढ़ने से सीपी में शामिल है
इसी प्रकार शिव स्वरूप को में माया से दृश्य दिखता है
इसका तत्व ज्ञान से तो कोई भी दुर्भाग्य ही है
इससे ही रहा तुम को तिहाड़ जेल था क्यों दुखी हो श्री रामचन्द्र जी कहते हैं हे मुने रांची जिसे तुमने मेरे सम्मुख कहा कि यह सब सकते हैं तथा भयंकर प्रारंभ देव का दुख में
मुझे नहीं छोड़ता है
जिस प्रकार मध्ये प्राणी को नष्ट कर देता है
इसी प्रकार अज्ञान ही तत्व ज्ञान युक्त ब्राह्मण को भी प्रारब्ध कर्म में नहीं छोड़ता मौके आनंद झाला
यह का प्रारब्ध का मंत्री है यह मुझको दिन रात पीड़ा देता रहता है
और इसी प्रकार से अहंकार भी दुख देता है जीव अत्यंत पीड़ित होकर इस देह का प्रयास करता है
इस कहा हे ब्राह्मण मेरे जीवन के लिमिट उपाय करो

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