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सोमवार, 11 सितंबर 2023

भावना सौम्या

भावना सोमाया
🎂जन्म 7 सितंबर, 1950
जन्म भूमि मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
पुरस्कार-उपाधि 'पद्म श्री' (2017)
प्रसिद्धि पत्रकार, आलोचक, लेखिका, फ़िल्म इतिहासकार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी भावना सोमाया ने 1978 में फिल्मी पत्रकार और स्तंभकार के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की और द विक प्रेस जर्नल द्वारा प्रकाशित सिनेमा जर्नल में कैसली स्पीकिंग नामक कॉलम लिखा।

16:02, 27 जून 2021 (IST)
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची
भावना सोमाया (अंग्रेज़ी: Bhawana Somaaya, जन्म- 7 सितंबर, 1950, मुम्बई, महाराष्ट्र) भारतीय लेखक, फ़िल्म इतिहासकार, पत्रकार तथा आलोचक हैं। साल 1978 में फ़िल्म रिपोर्टर के रूप में अपने पेशा शुरू करने के बाद भावना सोमाया 1980 और 1990 के दौरान कई फ़िल्म पत्रिकाओं के साथ काम करने लगीं। आख़िरकार साल 2000 से 2007 तक वह 'स्क्रीन' नामक अग्रणी फ़िल्म पत्रिका की संपादक बनीं। भावना सोमाया ने हिन्दी सिनेमा के इतिहास और बॉलीवुड सितारों की आत्मकथाओं पर 13 किताबें लिखी हैं। वर्ष 2017 में उन्हें तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा 'पद्म श्री' से नवाजा गया था।

परिचय
भावना सोमाया का जन्म 7 सितंबर, 1950 को मुंबई में हुआ था। वह अपने आठ भाई बहनों में सबसे छोटी हैं। उन्होंने मुंबई के सायन में हमारी लेडी ऑफ गुड काउंसिल हाई स्कूल से स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी और अंधेरी पश्चिम में वल्लभ संगीतालय से भरतनाट्यम में भी प्रशिक्षित हैं। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने मनोविज्ञान में स्त्रातक किया और मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, मुंबई विश्वविद्यालय से एलएलबी क्रिमिनोलॉजी कि डिग्री हासिल की। उन्होंने के.सी. कॉलेज मुंबई में पत्रकारिता की पढाई भी की थी।

कार्यक्षेत्र
भावना सोमाया ने फिल्म रिपोर्टर के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की। वह 1990 के दशक में कई फिल्मी पत्रिकाओं के साथ काम करने चली गईं। भावना सोमाया ने 1978 में फिल्मी पत्रकार और स्तंभकार के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की और द विक प्रेस जर्नल द्वारा प्रकाशित सिनेमा जर्नल में कैसली स्पीकिंग नामक कॉलम लिखा। सुपर पत्रिका 1980-1981 में काम करने के बाद वह इंडिया बुक हाऊस द्वारा एक सहायक संपादक के रूप में प्रकाशित मूवी पत्रिका में शामिल हो गईं और 1985 में सह संपादक बन गईं। 1989 में वह जी की संपादक बन गईं।

इस बीच उन्होंने अभिनेत्री शबाना आज़मी के साथ 'कामयाव' (1984), 'भावणा' (1984), 'आज का विधायक राम अवतार' (1984) और 'मूख्या आजाद हूँ' (1989) जैसी फिल्मों में बतौर कॉस्टयूम डिजाइनर काम किया। इन वर्षों में उनके कॉलम द ऑब्जर्वर दोपहर जन्मभूमि द हिंदू, द हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस जैसे प्रकाशनों में छपे। 1999 में उन्होंने जीवनी, अमिताभ द लेजेंड के साथ एक लेखक के रूप में अपना कॅरियर शुरू किया।

बच्चनलिया को ऑसियंस सेंटर फॉर आर्काइविंग रिसर्च एंड डेवलपमेंट सीएआरडी द्वारा सहलेखल किया गया था और उनके फिल्मी कॅरियर के 40 वर्षों की प्रचार साम्रग्री भी शामिल थी। उन्होंने हिंदी सिनेमा के इतिहास, सलाम बॉलीवूड 2000 और टेक 25 स्टार इनसाइटस एंड एटिटयूडस 2002 पर किताबें भी लिखी हैं जिसे अभिनेत्री रेखा ने मुंबई में एक समारोह में जारी किया था। 25 साल पूरे होने पर भावना सोमाया ने एक फिल्मी पत्रकार के रूप में भी कार्य किया।

वर्ष 2008 में भावना सोमाया स्वस्तिक पिक्चर्स में शामिल हुईं जो एक टेलीविजन प्रोडक्शन कंपनी थी। जिसने टीवी सीरीज 'अम्बर धरा' बनाई थी। इसमें भावना सोमाया ने एक मीडिया सहकार के रूप में कार्य किया। मई 2012 में वह शुक्रवार फिल्म समीक्षक बिगएफ़एम92.7 रिलायंस मीडिया के एफ़एम रेडियो स्टेशन के लिये कार्य करने लगीं। 2012 में वह ब्लॉकबस्टार में शामिल हुईं, जो नई लॉन्च की गई फिल्म ट्रेड पत्रिका थी।

पुस्तकें
हिंदी सिनेमा के इतिहास और बॉलीवुड सितारों की जीवनी पर 13 किताबें लिखी हैं।
अमिताभ बच्चन द लेजेंड, 1999
बच्चनालिया द फिल्म एंड मेमोरिलिया ऑफ अमिताभ बच्चन, 2009
अमिताभ लेक्किन, 2011
द स्टोरी सो फ़ॉर, 2003
सिनेमा छवियाँ और मुद्रदे, 2004
हेमा मालिनी : द ऑथराइ्जड बायोग्राफी, 2007
खंडित फ्रेम: एक आलोचना के प्रतिबिंब
मदर मेडन मालकिन : महिलाएं हिंदी सिनेमा में, 2012
सलाम बॉलीवुड : द पेन एंड द पैशन, 2000
कृष्ण भगवान जो मनुष्य के रूप में रहते थे, 2008
टॉकिंग सिनेमा : अभिनेताओं और फिल्म निर्माताओं के साथ बातचीत, 2013

राधिका आप्टे

"वाह! लाइफ हो तो ऐसी!" (2005)
फिल्म की अभिनेत्री

राधिका आप्टे
🎂07 सितम्बर 1985
वेल्लोर, तमिलनाडु, भारत
आवास
मुम्बई, महाराष्ट्र, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
पेशा
अभिनेत्री
आप्टे की पहली मुख्य भूमिका 2009 की बंगाली सामाजिक नाटक अंतहीन में थी। उन्होंने 2015 की बॉलीवुड प्रस्तुतियों में से तीन में उनके सहायक काम के लिए व्यापक प्रशंसा प्राप्त की: बदलापुर, कॉमेडी हंटरर, और जीवनी फिल्म मांझी - द माउंटेन मैन। 2016 की स्वतंत्र फिल्मों फोबिया और पार्च्ड में उनकी प्रमुख भूमिकाओं ने उन्हें और प्रशंसा दिलाई।2018 में, आप्टे ने नेटफ्लिक्स की तीन प्रस्तुतियों- एंथोलॉजी फिल्म लस्ट स्टोरीज़, थ्रिलर सीरीज़ सेक्रेड गेम्स,और हॉरर मिनी सीरीज़ घोल में अभिनय किया।इनमें से पहले में उनके काम के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय एमी पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था।

स्वतंत्र फिल्मों में अपने काम के अलावा, आप्टे ने अधिक मुख्यधारा की फिल्मों में काम किया है, जिसमें तमिल एक्शन फिल्म कबाली (2016), हिंदी जीवनी फिल्म पैड मैन (2018), शेयर बाजार बाजार के बारे में हिंदी ड्रामा-थ्रिलर (2018) शामिल हैं। , और हिंदी ब्लैक कॉमेडी अंधाधुन (2018), जो सभी व्यावसायिक रूप से सफल रहीं। 2021 में, उन्होंने भारत की पहली साइंस फिक्शन कॉमेडी सीरीज़, ओके कंप्यूटर में अभिनय किया, जहाँ उन्होंने एआई वैज्ञानिक लक्ष्मी सूरी की भूमिका निभाई। उन्होंने 2012 से लंदन के संगीतकार बेनेडिक्ट टेलर से शादी की है।

आप्टे ने गुलशन देवैया और शाहाना गोस्वामी अभिनीत द स्लीपवॉकर्स के साथ अपने निर्देशन की शुरुआत की। द स्लीपवॉकर्स बेस्ट मिडनाइट शॉर्ट कैटेगरी के तहत पाम स्प्रिंग्स इंटरनेशनल शॉर्टफेस्ट 2020 में प्रतिस्पर्धा में थी।
इन्होंने अपने अभिनय की शुरुआत एक बॉलीवुड फ़िल्म वाह लाइफ हो तो ऐसी में एक छोटे से किरदार को निभा कर की। जिसके पश्चात उन्होंने अन्य भाषा के फ़िल्मों में कार्य करना शुरू किया।यह श्रीराम राघवन द्वारा निर्देशित बदलापुर में भी कार्य कर चुकीं हैं।

बुधवार, 6 सितंबर 2023

भावना सौम्या

भावना सोमाया
🎂जन्म 7 सितंबर, 1950
जन्म भूमि मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
पुरस्कार-उपाधि 'पद्म श्री' (2017)
प्रसिद्धि पत्रकार, आलोचक, लेखिका, फ़िल्म इतिहासकार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी भावना सोमाया ने 1978 में फिल्मी पत्रकार और स्तंभकार के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की और द विक प्रेस जर्नल द्वारा प्रकाशित सिनेमा जर्नल में कैसली स्पीकिंग नामक कॉलम लिखा।

16:02, 27 जून 2021 (IST)
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची
भावना सोमाया (अंग्रेज़ी: Bhawana Somaaya, जन्म- 7 सितंबर, 1950, मुम्बई, महाराष्ट्र) भारतीय लेखक, फ़िल्म इतिहासकार, पत्रकार तथा आलोचक हैं। साल 1978 में फ़िल्म रिपोर्टर के रूप में अपने पेशा शुरू करने के बाद भावना सोमाया 1980 और 1990 के दौरान कई फ़िल्म पत्रिकाओं के साथ काम करने लगीं। आख़िरकार साल 2000 से 2007 तक वह 'स्क्रीन' नामक अग्रणी फ़िल्म पत्रिका की संपादक बनीं। भावना सोमाया ने हिन्दी सिनेमा के इतिहास और बॉलीवुड सितारों की आत्मकथाओं पर 13 किताबें लिखी हैं। वर्ष 2017 में उन्हें तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा 'पद्म श्री' से नवाजा गया था।

परिचय
भावना सोमाया का जन्म 7 सितंबर, 1950 को मुंबई में हुआ था। वह अपने आठ भाई बहनों में सबसे छोटी हैं। उन्होंने मुंबई के सायन में हमारी लेडी ऑफ गुड काउंसिल हाई स्कूल से स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी और अंधेरी पश्चिम में वल्लभ संगीतालय से भरतनाट्यम में भी प्रशिक्षित हैं। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने मनोविज्ञान में स्त्रातक किया और मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, मुंबई विश्वविद्यालय से एलएलबी क्रिमिनोलॉजी कि डिग्री हासिल की। उन्होंने के.सी. कॉलेज मुंबई में पत्रकारिता की पढाई भी की थी।

कार्यक्षेत्र
भावना सोमाया ने फिल्म रिपोर्टर के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की। वह 1990 के दशक में कई फिल्मी पत्रिकाओं के साथ काम करने चली गईं। भावना सोमाया ने 1978 में फिल्मी पत्रकार और स्तंभकार के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की और द विक प्रेस जर्नल द्वारा प्रकाशित सिनेमा जर्नल में कैसली स्पीकिंग नामक कॉलम लिखा। सुपर पत्रिका 1980-1981 में काम करने के बाद वह इंडिया बुक हाऊस द्वारा एक सहायक संपादक के रूप में प्रकाशित मूवी पत्रिका में शामिल हो गईं और 1985 में सह संपादक बन गईं। 1989 में वह जी की संपादक बन गईं।

इस बीच उन्होंने अभिनेत्री शबाना आज़मी के साथ 'कामयाव' (1984), 'भावणा' (1984), 'आज का विधायक राम अवतार' (1984) और 'मूख्या आजाद हूँ' (1989) जैसी फिल्मों में बतौर कॉस्टयूम डिजाइनर काम किया। इन वर्षों में उनके कॉलम द ऑब्जर्वर दोपहर जन्मभूमि द हिंदू, द हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस जैसे प्रकाशनों में छपे। 1999 में उन्होंने जीवनी, अमिताभ द लेजेंड के साथ एक लेखक के रूप में अपना कॅरियर शुरू किया।

बच्चनलिया को ऑसियंस सेंटर फॉर आर्काइविंग रिसर्च एंड डेवलपमेंट सीएआरडी द्वारा सहलेखल किया गया था और उनके फिल्मी कॅरियर के 40 वर्षों की प्रचार साम्रग्री भी शामिल थी। उन्होंने हिंदी सिनेमा के इतिहास, सलाम बॉलीवूड 2000 और टेक 25 स्टार इनसाइटस एंड एटिटयूडस 2002 पर किताबें भी लिखी हैं जिसे अभिनेत्री रेखा ने मुंबई में एक समारोह में जारी किया था। 25 साल पूरे होने पर भावना सोमाया ने एक फिल्मी पत्रकार के रूप में भी कार्य किया।

वर्ष 2008 में भावना सोमाया स्वस्तिक पिक्चर्स में शामिल हुईं जो एक टेलीविजन प्रोडक्शन कंपनी थी। जिसने टीवी सीरीज 'अम्बर धरा' बनाई थी। इसमें भावना सोमाया ने एक मीडिया सहकार के रूप में कार्य किया। मई 2012 में वह शुक्रवार फिल्म समीक्षक बिगएफ़एम92.7 रिलायंस मीडिया के एफ़एम रेडियो स्टेशन के लिये कार्य करने लगीं। 2012 में वह ब्लॉकबस्टार में शामिल हुईं, जो नई लॉन्च की गई फिल्म ट्रेड पत्रिका थी।

पुस्तकें
हिंदी सिनेमा के इतिहास और बॉलीवुड सितारों की जीवनी पर 13 किताबें लिखी हैं।
अमिताभ बच्चन द लेजेंड, 1999
बच्चनालिया द फिल्म एंड मेमोरिलिया ऑफ अमिताभ बच्चन, 2009
अमिताभ लेक्किन, 2011
द स्टोरी सो फ़ॉर, 2003
सिनेमा छवियाँ और मुद्रदे, 2004
हेमा मालिनी : द ऑथराइ्जड बायोग्राफी, 2007
खंडित फ्रेम: एक आलोचना के प्रतिबिंब
मदर मेडन मालकिन : महिलाएं हिंदी सिनेमा में, 2012
सलाम बॉलीवुड : द पेन एंड द पैशन, 2000
कृष्ण भगवान जो मनुष्य के रूप में रहते थे, 2008
टॉकिंग सिनेमा : अभिनेताओं और फिल्म निर्माताओं के साथ बातचीत, 2013

सोमवार, 7 अगस्त 2023

प्यारेलाल संतोषी

प्रसिद्ध निर्देशक, लेखक,गीतकार पी एल संतोषी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म: 07 अगस्त 1916
⚰️07 सितंबर 1978 में मुम्बई में उनका निधन हो गया
पी.एल.संतोषी, यानी आज के ख्यातनाम फिल्मकार राजकुमार संतोषी के पिता, अपने दौर के कामयाब लेखक, निर्देशक और गीतकार थे। उनका कमाल यह था कि लोग फिल्म भले याद न रख पाए हों, पर उनके गीत कभी नहीं भूल पाएंगे..
ये जो फिल्मी दुनिया है न, बड़े कमाल की दुनिया है। बहुत सारी बातें तो हम लोग यहीं बैठ कर कर चुके हैं। आपने कुछ और भी सुन रखी होंगी। मतलब कमाल है। कभी अर्श पर तो कभी फर्श पर। और कभी-कभी तो उससे भी बदतर।
पी एल संतोषी अपने दौर के एक ऐसा कामयाब फिल्मसाज थे, जिसकी फिल्मों में सिनेमा घरों की टिकट खिड़की पर दौलत की बरसात हुई, लेकिन एक दिन उन्हें ख़ुद दिवालिया होना पड़ा। जिसने जमाने को अपने हुनर से दीवाना बना दिया था, एक दिन ख़ुद दीवाना बनकर अपनी ख़ुदी को नीलाम कर बैठे
पहले  हम लोग पी एल संतोषी के कुछ ख़ूबसूरत नग्मे  सुन लें।
आना मेरी जान-2, संडे के संडे’ (चितलकर-शमशाद बेगम), ‘जवानी की रेल चली जाए रे’ (गीता राय (दत्त), चितलकर-लता), और ‘मार कटारी मर जाना, वे अंखियां किसी से मिलाना ना’(अमीरबाई कर्नाटकी- फिल्म- शहनाई 1947), ‘किस्मत हमारे साथ है, जलने वाले जला करें’ (खिड़की 48), ‘जब दिल को सताए ग़म-2, छेड़ सखी सरगम’, (लता-सरस्वती राणो) ‘कोई किसी का दीवाना न बने’ (लता), और ‘बाप भला ना भैया, भैया सबसे भला रुपैया’ (सरगम- 1950), ‘जो दिल को सताए, रुलाए, जलाए, ऐसी मोहब्बत से हम बाज आए’ और ‘महफिल में जल उठी शमा परवाने के लिए / प्रीत बनी है दुनिया में जल जाने के लिए’ (लता- निराला-50), ‘तुम क्या जानो, तुम्हारी याद में, हम कितना रोए’, (लता- शिनशिनाकी बूबलाबू-52), ‘अच्छा होता जो दिल में तू आया न होता / हाय रुलाना था गर’ ‘हम पंछी एक डाल के’ (रफी-आशा), ‘लो छुप गया चंद, बहे हवा मंद-मंद’ (आशा भोंसले) और ‘एक से भले दो, दो से भले चार, मंजिल अपनी दूर है, रस्ता करना पार’ (हम पंछी एक डाल के -57), ‘ओ नींद न मुझको आए, दिल मेरा घबराए, चुपके-चुपके कोई आ के, सोया प्यार जगाए’, ‘कोई आ जाए-2, बिगड़ी तक़दीर बना जाए’ और ‘मेरे दिल में है इक बात, कह दो तो भला क्या है’ (सम्राट चंद्रगुप्त -58)।
हम आज श्रद्धांजलि दे रहे है अपने दौर के बेहद कामयाब लेखक, निर्देशक और गीतकार। आज के प्रसिद्ध फिल्मकार राजकुमार संतोषी के पिता
किस्सा थोड़ा पुराना है लेकिन यहां बताना जरूरी है। मध्यप्रदेश के जबलपुर में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान एकाएक किसी ऐसे बंदे की जरूरत आन पड़ी जिसे हिंदी आती हो। पता चला पी एल श्रीवास्तव नाम का लड़का है जो लिखने पढ़ने में तेज है। उसे बुलाया गया। लोगों को उसका काम पसंद आया और वह फिल्म यूनिट के साथ बंबई चला आया है। ये बात है सन 1930 के आसपास की। बाद में इस लड़के ने अपने सरनेम से श्रीवास्तव उड़ाया है और बन गया पी एल संतोषी। वही पी एल संतोषी जिन्होंने हिंदी सिनेमा को दिया 1946 में फिल्म ‘हम एक हैं’ में दिया एक नया सितारा, देव आनंद।
बीसवीं सदी का यह एक ऐसा दौर था, जब गूंगे सिनेमा ने नया-नया बोलना सीखा था। इसके बोलने में जादू था। ऐसा जादू जिसकी जद में छोटे-बड़े, अमीर-ग़रीब सब आ चुके थे। संतोषी की मंजिल भी यही थी। वे फिल्मों में अभिनय के साथ लेखक, गीतकार, निर्देशक, निर्माता सब कुछ बनना चाहते थे। उनके सौभाग्य से बंबई में उन्हें नरगिस की मां जद्दन बाई का साथ मिल गया। वे उनके निजी सहायक बन गए।
जद्दन बाई कुछ अरसा पहले ही कलकत्ता छोड़कर बंबई आई थीं। गाने-बजाने का काम छोड़कर फिल्में बनाने और अपने साथ अपनी नन्ही सी बेटी नरगिस, जिसका नाम उस व़क्त था बेबी फातिमा था, का भविष्य बनाने। जद्दन बाई के घर मुल्क के बड़े-बड़े लेखकों, शायरों और हर तरह के फनकारों की महफिलें लगभग हर शाम जमती थीं।
फिल्में भी बन रही थीं। इन्ही में से एक फिल्म ‘मोती का हार’(1937) में संतोषी को भी एक छोटी भूमिका मिल गई। इस फिल्म का संगीत, निर्माण, निर्देशन सब कुछ जद्दन बाई का ही था। फिल्म में नरगिस ने बेबी रानी के नाम से बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी और संतोषी ने अभिनय के साथ फिल्म के कुछ गीत भी लिखे थे।
एक गीत था ‘मन के वासी, मन में आओ / मेरे हृदय की वीणा पर ऐसा गीत सुनाओ’ और दूसरा ‘ऐसा बाग़ लगाया, फूलों में जिसके छुपकर, ये मेरा मन मुस्काया’।
इसी साल जद्दन बाई की ही एक और फिल्म ‘जीवन स्वप्न’ के चार गीतों के गीतकार के रूप में संतोषी का नाम मिलता है। इसके बाद वे रणजीत मूवीटोन पहुंच गए। यहां से वे बॉम्बे टाकीज की फिल्मों में गीत लिखने पहुंच गए।
1942 में रिलीज हुई बॉम्बे टाकीज की फिल्म ‘बसंत’ के लिए लिखे संतोषी के गीतों ने उस दौर में धूम मचा दी। महान बांसुरी वादक पन्नालाल घोष (पर्दे के पीछे से अनिल बिस्वास भी साथ में) के गीतों ने भारी धूम मचाई। पारुल घोष और साथियों के गाए ‘तुमको मुबारक हो ऊंचे महल ये/ हमको तो प्यारी, हमारी गलियां’, ‘कांटा लागो रे साजनवा, मोसे राह चली न जाय’, ‘आया बसंत सखी, बिरहा का अंत सखी’ जैसे गीत आज भी संगीत रसिकों के लिए कर्णामृत का काम करते हैं।
1946 में पहली बार वे निर्देशक-गीतकार के रूप में सामने आए। फिल्म थी ‘हम एक हैं’। इस फिल्म की ख़ास बात यह है कि इसी फिल्म से देव आनंद, अभिनेता रहमान और अभिनेत्री रेहाना पहली बार पर्दे पर आए थे। इस फिल्म की दूसरी ख़ास बात है गुरु दत्त, जो इस फिल्म में बतौर निर्देशक सतोषी के पांचवें सहायक थे और साथ ही फिल्म की कोरियोग्राफी मतलब नृत्य निर्देशन भी उन्होंने ही किया था।
1947 में फिल्मिस्तान के लिए बनाई ‘शहनाई’ तो सुपरहिट साबित हुई। इसके गीत-संगीत (सी.रामचंद्र और संतोषी) ने तो संगीत का एक नया ट्रेंड ही चालू कर दिया। संतोषी के इन हिट गीतों में बहुत ही चलताऊ शब्दों की भरमार थी, लेकिन उस दौर के साथ इन गीतों का ऐसा तादात्म्य पैदा हुआ कि लोगों में उनका असर आज भी ख़त्म नहीं हुआ है।
आना मेरी जान संडे के संडे’ तो आज भी बहुत लोकप्रिय है। इस गीत की एक और मजेदार बात यह है कि फिल्म ‘शहनाई’ में यह गीत हास्य अभिनेता महमूद के पिता मुमताज अली पर फिल्माया गया है। इसमें वे चार्ली चैप्लिन वाली मुद्राओं में इस गीत को गाते हुए दिखाई देते हैं।
इस फिल्म के 21 साल बाद 1968 में महमूद पर अपने पिता की तरह ही चार्ली चैप्लिन वाले अंदाज में इसी गीत से प्रेरित होकर रची गई सिचुएशन और शब्दों वाला गीत फिल्माया गया है। फिल्म ‘औलाद’ में मन्ना डे-आशा भोंसले का गाया ‘जोड़ी हमारी, जमेगा कैसे जानी’ सुनकर देखें। वही हिंदी-इंगलिश की खिचड़ी, वही मुहावरा। ‘तुमको भी मुश्किल, मुझे भी परेशानी / बात मानो संैया बन जाओ, हिंदुस्तानी’। उधर असल गीत में है ‘मैं धरम करम की नारी / तू नीच विदेसी अभिचारी’।
महमूद और उनके ख़ानदान से संतोषी का बड़ा मजबूत रिश्ता रहा है। संतोषी की फिल्मों में अक्सर मुमताज अली दिखाई दे जाते थे और महमूद ख़ुद उस व़क्त उनके ड्राइवर थे। महमूद की जिंदगी पर संतोषी का हर अच्छा-बुरा असर बाद में दिखाई भी दिया। जिसकी कभी और बात करेंगे।
अभी तो इतना और तो बता ही सकता हूं न कि महमूद ने इस गीत की ही तरह एक और गीत, बल्कि पूरी फिल्म संतोषी के गीत से प्रभावित होकर क्रिएट की। फिल्म ‘सरगम’(50) में संतोषी ने लिखा था ‘बाप भला न भैया, भैया सबसे भला रुपैया’।
महमूद ने 26 साल बाद अपनी फिल्म ‘सबसे बड़ा रुपैया’ में ख़ुद ही गाया ‘ना बीवी न बच्चा, ना बाप बड़ा ना भैया/ द होल थिंग इज दैट कि भैया, सबसे बड़ा रुपैया’। इसके 30 साल बाद इसी गीत को आज के दौर के कामयाब संगीतकार विशाल-शेखर ने उठाकर अपनी फिल्म ‘ब्लफ मास्टर’ में नए सिरे से सजाकर इस्तेमाल किया और इसे अभिषेक बच्चन पर फिल्माया गया है।
इसी तरह अगर आप थोड़ा सा और याद करें, तो आपको याद आएगा कि फिल्म ‘प्यार किए जा’ (66) में महमूद एक जगह अपने डायलॉग में पिता (ओमप्रकाश) से कहता है कि वह एक नहीं अनेक प्रोडक्शन कंपनीज खोलेगा। इनके नाम होंगे ‘हा-हा प्रोडक्शन, हो-हो प्रोडक्शन, ही-ही प्रोडक्शन। संतोषी ने 1955 में इस नाम की एक फिल्म बनाई थी।
ख़ैर तो किस्सा कोताह यह कि शहनाई के पीछे-पीछे ‘खिड़की’ (48), ‘सरगम’ (50) जैसी हिट फिल्में बनाकर संतोषी ने बाजार में अपना सिक्का जमा लिया। निर्माता उसे फिल्में बनाने और गीत लिखने के लिए मुंहमांगे पैसे देते और संतोषी? वे उस पैसे में आग लगा देते। कैसे? अभी दो मिनट बाद बताता हूं। पहले जरा बतौर निर्देशक उनकी कुछ और फिल्मों को याद कर लें।
अपनी छाया’ (50),‘छम छमा छम’(52), शिनशिनाकी बूबलाबू’ (52), चालीस बाबा एक चोर (53), ‘सबसे बड़ा रुपैया’ (55), ‘हा-हा,ही-ही,हू-हू’ (55), ‘हम पंछी एक डाल के’ (57), ‘गरमा गरम’(57), ‘पहली रात’(59), ‘नई मां’(60), ‘बरसात की रात’(60), ‘ऑपेरा हाऊस’ (61), ‘हॉलीडे इन बॉम्बे’ (63), ‘दिल ही तो है’(64), ‘क़व्वाली की रात’ (64) और आखि़र में ‘रूप रुपैया’ (68)। इन फिल्मों में से कुछ में उनके और कुछ में अन्य गीतकारों के गीत थे। पटकथा और संवाद लेखक के तौर पर भी उनकी कई फिल्में हैं।
1941 की अशोक कुमार की ‘झूला’ में शाहिद लतीफ और ज्ञान मुखर्जी के साथ मिलकर पटकथा और संवाद लिखे, तो ‘स्टेशन मास्टर’ (42) की कहानी। इस फिल्म में उन्होंने नौशाद के साथ गीत भी लिखे हैं। बतौर संवाद लेखक मुझे उनकी एक उल्लेखनीय फिल्म और याद आती है- राजश्री पिक्चर्स की 1973 की फिल्म ‘सौदागर’। अमिताभ बच्चन और नूतन की इस फिल्म में अगर आपको याद हों तो कुछ अच्छे संवाद थे।

7 सितंबर 1978 में मुम्बई में उनका निधन हो गया

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...