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शनिवार, 3 फ़रवरी 2024

भगवान दादा

#01aug
#04feb 
भगवान आभाजी पालव
प्रसिद्ध नाम भगवान दादा

🎂जन्म 01 अगस्त, 1913
जन्म भूमि मुम्बई, महाराष्ट्र
⚰️मृत्यु 04 फ़रवरी, 2002
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'अलबेला', 'मतलबी', 'लालच', 'मतवाले', 'बदला' आदि
नागरिकता भारतीय

भगवान दादा का जन्म एक मिल के श्रमिक के घर 1 अगस्त, 1913 को हुआ। बचपन से ही उन्हें फ़िल्मों के प्रति आकर्षण था और पढ़ाई के प्रति उन्हें विशेष रुचि नहीं थी। इस कारण उन्हें पिता के कोप का शिकार भी होना पड़ा, लेकिन धुन के पक्के दादा ने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी और हिंदी सिनेमा के रोमांटिक नायक की पारंपरिक छवि को नया आयाम मिला। शुरू में उन्होंने अपने शरीर पर काफ़ी ध्यान दिया और बदन कसरती बना लिया। इसका फायदा उन्हें आगे मिला। फ़िल्मों में प्रवेश के लिए उन्हें काफ़ी मशक्कत करना पड़ी और अंतत: उन्हें 1930 में ब्रेक मिला, जब निर्माता सिराज अली हकीम ने अपनी मूक फ़िल्म 'बेवफा आशिक' में एक कॉमेडियन की भूमिका दी। इसके बाद उन्होंने कई मूक फ़िल्मों में अभिनय किया।

फ़िल्मी कैरियर
भगवान दादा यानी भगवान आभाजी पालव की आंखों में बचपन से फ़िल्मों के रूपहले परदे का सम्मोहन था। उन्होंने अपने जीवन की शुरूआत श्रमिक के रूप में की लेकिन फ़िल्मों के आकर्षण ने उन्हें उनके पसंदीदा स्थल तक पहुंचा दिया। भगवान मूक फ़िल्मों के दौर में ही सिनेमा की दुनिया में आ गए। उन्होंने शुरूआत में छोटी-छोटी भूमिकाएँ की। बोलती फ़िल्मों का दौर शुरू होने के साथ उनके करियर में नया मोड़ आया। भगवान दादा के लिए 1940 का दशक काफ़ी अच्छा रहा। इस दशक में उन्होंने कई फ़िल्मों में यादगार भूमिकाएँ की। इन फ़िल्मों में 'बेवफा आशिक', 'दोस्ती', 'तुम्हारी कसम', 'शौकीन' आदि शामिल हैं। अभिनय के साथ ही उन्हें फ़िल्मों के निर्माण निर्देशन में भी दिलचस्पी थी। उन्होंने जागृति मिक्स और भगवान आर्ट्स प्रोडक्शन के बैनर तले कई फ़िल्में बनाई जो समाज के एक वर्ग में विशेष रूप से लोकप्रिय हुई। इन फ़िल्मों में 'मतलबी', 'लालच', 'मतवाले', 'बदला' आदि प्रमुख हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनकी अधिकतर फ़िल्में कम बजट की तथा एक्शन फ़िल्में होती थी।

फ़िल्म निर्माण और निर्देशन

इस दौरान भगवान दादा ने अपनी लगन से फ़िल्म निर्माण से जुड़ी अन्य विधाओं का भी अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया। 1934 में प्रदर्शित 'हिम्मत-ए-मर्दां' उनकी पहली बोलती फ़िल्म थी। 1938 से 1949 के बीच उन्होंने कम बजट वाली कई स्टंट फ़िल्मों एवं एक्शन फ़िल्मों का निर्देशन किया। उन फ़िल्मों को समाज के कामकाजी वर्ग के बीच अच्छी लोकप्रियता मिली। उन फ़िल्मों में दोस्ती, जालान, क्रिमिनल, भेदी बंगला आदि प्रमुख हैं।

भगवान दादा की फ़िल्मों में गहरी समझ तथा प्रतिभा को देखते हुए राजकपूर ने उन्हें सामाजिक फ़िल्में बनाने की राय दी। भगवान ने उनकी सलाह को ध्यान में रखते हुए 'अलबेला' फ़िल्म बनाई। इसमें भगवान के अलावा गीता बाली की प्रमुख भूमिका थी। इस फ़िल्म के संगीतकार सी. रामचंद्र थे और उन्होंने ही इसमें चितलकर के नाम से पा‌र्श्व गायन भी किया। अलबेला फ़िल्म अपने दौर में सुपर हिट रही और कई स्थानों पर इसने जुबली मनाई। इस फ़िल्म के गीत-संगीत का जादू सिने प्रेमियों के सर चढ़ कर बोला। इसका एक गीत 'शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के..' आज भी खूब पसंद किया जाता है। अलबेला के बाद भगवान दादा ने 'झमेला' और 'लाबेला' बनाई लेकिन दोनों ही फ़िल्में नाकाम रहीं और उनके बुरे दिन शुरू हो गए।

बुरा दौर

कभी सितारों से अपने इशारों पर काम कराने वाले भगवान दादा का करियर एक बार जो फिसला तो फिर फिसलता ही गया। आर्थिक तंगी का यह हाल था कि उन्हें आजीविका के लिए चरित्र भूमिकाएँ और बाद में छोटी-मोटी भूमिकाएँ करनी पड़ी। बदलते समय के साथ उनके मायानगरी के अधिकतर सहयोगी उनसे दूर होने लगे। सी. रामचंद्र, ओम प्रकाश, राजिन्दर किशन जैसे कुछ ही मित्र थे जो उनके बुरे वक्त में उनसे मिलने जाया करते थे।

शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के' गीत में अपने अदभुत, अनोखी व अद्वितीय डांसिंग स्टेप देने वाले भगवान दादा को आज भी उनकी गलियों में लोग अमिताभ बच्चन ही मानते हैं। भगवान दादा हिंदी सिनेमा जगत के पहले डांसिंग मास्टर थे। अलबेले भगवान दादा शुरू से ही फ़िल्म बनाने का सपना देखते थे। वे मिल में एक लेबर के रूप में काम करते, लेकिन ख्वाब फ़िल्म बनाने के देखते। वे चॉल में भी कुछ न कुछ इंतजाम करके फ़िल्में देख ही लेते थे। थियेटर में स्टॉल में भी फ़िल्म देखने के लिए पैसों की जुगाड़ कर ही लिया करते थे। शुरुआती दौर में मूक फ़िल्मों से मौका मिला। अभिनय के बाद वे ज्यादा से ज्यादा समय सेट पर देते, ताकि बारीकियां समझ पायें। उन्होंने सीखी भी। उन्होंने तय किया कि वह कम बजट की फ़िल्म बनायेंगे। किसी तरह उन्होंने उस वक्त 65 हजार रुपये इकट्ठे किये। उनके डांसिंग स्टेप्स में प्रॉप्स का भी ख़ास ध्यान रखा जाता था। उन्होंने ही पहली बार सिर पर बड़े आकार की टोपी रख कर डांस करने की संस्कृति शुरू की। गीता बाली के साथ उन्होंने कई फ़िल्मों में अभिनय किया। अपने निर्देशन के दौर में उन्होंने 1938 से 1949 तक लगातार लो बजट की फ़िल्मों का निर्माण किया। उनमें स्टंट व एक्शन फ़िल्में भी थीं। वे अपनी फ़िल्मों को अपनी गलियों में भी सभी लोगों को एकत्रित करके दिखाया करते थे। धीरे धीरे उन्होंने चैंबूर में जागृति पिक्स व भगवान आर्ट्स प्रोडक्शन के रूप में हाउस शुरू किया। राज कपूर ने उनकी काबिलियत को देखते हुए कहा कि भगवान तुम अच्छी और बड़ी फ़िल्म बनाओ। राज कपूर की राय पर भगवान दादा ने गीता बाली अभिनीत फ़िल्म 'अलबेला' का निर्देशन किया। फ़िल्म का गीत 'शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के' बेहद लोकप्रिय हुआ। आज भी डांसिंग पार्टी में इस गीत पर युवा थिरकना ज़रूर पसंद करते हैं।

चॉल में जमती रहती थी मजलिस
चूंकि भगवान दादा खुद विपरीत परिस्थितियों को झेल चुके थे। उन्होंने कई चुनौतियां व ज़िंदगी की कठिन परिस्थितियों में पहचान पाई थी, लेकिन जाहिर है वह अपनी जमीन या जड़ को नहीं भूल सकते थे। ऐसे में उन्होंने ऐसी कई फ़िल्मों का निर्माण किया, जिसमें कामकाजी वर्ग व मील मज़दूरों को फोकस किया गया। 1934 में प्रदर्शित 'हिम्मत ए मर्दा' ऐसी ही फ़िल्मों में से एक थी। यह उनकी पहली बोलती फ़िल्म थी। भगवान दादा से कभी मीलों के मज़दूरों के साथ अपने सरोकार नहीं बदले। उन्होंने मीलों के कई होनहार व प्रतिभावान लोगों को यथासंभव अपने फ़िल्म निर्माण में अवसर दिलाये। सुपरस्टार बनने के बाद भी जब भी वे चॉल आते। यहां के लोगों के साथ मजलिस जमाते व जम कर मस्ती किया करते थे। गौरतलब है कि उनकी फ़िल्मों के गीत 'शाम ढले खिड़की तले तुम सिटी बजाना, शोला जो भड़के आज की पीढ़ी भी गुनगुना पसंद करती हैं।

'ला' से रहा विशेष लगाव
भगवान दादा को 'ला' शब्द से बेहद लगाव रहा। इसलिए उन्होंने अपनी हर फ़िल्म में 'ला' शब्द का इस्तेमाल ज़रूर किया। यहां तक कि फ़िल्म के गीत लिखते समय भी उन्होंने गीतकार से आग्रह किया कि वह इन बातों को ध्यान में रखें। 'शोला जो भड़के' उसी आधार पर लिखी गयी। 'अलबेला' के बाद 'झमेला' व 'लाबेला' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया। अलबेला उस दौर की सुपरहिट फ़िल्म रही थी। इस फ़िल्म ने जुबली मनाई थी।

कॉमेडी को दी नई परिभाषा
हिंदी सिनेमा के पहले डांसिंग स्टार भगवान दादा ने अभिनय एवं नृत्य की अनोखी शैली से कॉमेडी को नई परिभाषा दी और उनकी अदाओं को बाद की कई पीढ़ियों के अभिनेताओं ने अपनाया। भगवान दादा ने मूक फ़िल्मों के दौर से अपने अभिनय जीवन की शुरुआत की थी, लेकिन उनके हास्य अभिनय और नृत्य शैली ने अपने दौर में जबरदस्त धूम मचाई। आज के दौर के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी उनकी नृत्य शैली का अनुसरण किया। फ़िल्मों में प्रवेश के लिए उन्हें काफ़ी मशक्कत करना पड़ी और अंतत: उन्हें 1930 में ब्रेक मिला, जब निर्माता सिराज अली हकीम ने अपनी मूक फ़िल्म बेवफा आशिक में एक कॉमेडियन की भूमिका दी।

निधन
करीब छह दशक लंबे अपने फ़िल्मी जीवन में भगवान दादा ने क़रीब 48 फ़िल्मों का निर्माण या निर्देशन किया, लेकिन बॉम्‍बे लैबोरेट्रीज में लगी आग के कारण 'अलबेला' और 'भागमभाग' छोड़कर सभी फ़िल्मों का निगेटिव जल गया और नई पीढ़ी बेहतरीन कृतियों से वंचित रह गई। एक समय बंगला और कई कारों के मालिक भगवान अपनी मित्रमंडली से घिरे रहते थे, पर नाकामी के साथ ही धीरे-धीरे सब छूटने लगा। जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें चॉल में रहना पड़ा। अभिनय और नृत्य की नई इबारत लिखने वाला यह कलाकार 4 फ़रवरी 2002 को 89 साल की उम्र में अपना दर्द समेटे हुए बेहद खामोशी से इस दुनिया को विदा कह गया।

भगवान दादा

भगवान दादा

🎂01 अगस्त 1913
Amravati, India
⚰️04 फ़रवरी 2002
Mumbai, India
भगवान दादा 1913 में भगवान Abhaji Palav के रूप अमरावती, महाराष्ट्र में में पैदा हुआ था। वह एक कपड़ा मिल मजदूर का बेटा था, लेकिन फ़िल्मों के साथ जुनून सवार था। वह एक मजदूर के रूप में काम किया, लेकिन फ़िल्मों का सपना देखा था। भगवान दादा मूलतः सिंधी समुदाय के थे। उनके पूर्वज बहुत पहले सिंध से महाराष्ट्र आकर बस गए थे। युवा होने पर उनका सपना अभिनेता बनना था।वह मूक फ़िल्मों में बिट भूमिकाओं के साथ उसका तोड़ मिल गया और स्टूडियो के साथ पूरी तरह से शामिल हो गया। उन्होंने फ़िल्म बनाने और कम बजट फ़िल्मों (जिसमें वह सब कुछ कलाकारों के लिए भोजन की व्यवस्था और वेशभूषा की डिजाइन सहित के लिए व्यवस्था) रु. के लिए 65,000 बनाने के लिए इस्तेमाल एक मंच पर सीखा है।
📽️1980 फ़िर वही रात 
1977 मुक्ति 
1955 झनक झनक पायल बाजे

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महान हास्य अभिनेता भगवान दादा के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
भगवान दादा

🎂01 अगस्त 1913
Amravati, India
⚰️04 फ़रवरी 2002
भगवान दादा भारतीय अभिनेता और फ़िल्म निर्देशक थे। भगवान दादा अपनी प्रसिद्ध सामाजिक और हास्य फ़िल्म 'अलबेला' के लिए जाने जाते हैं। हिन्दी फ़िल्मों में नृत्य की एक विशेष शैली की शुरूआत करने वाले भगवान दादा ऐसे 'अलबेला' सितारे थे, जिनसे महानायक अमिताभ बच्चन सहित आज की पीढ़ी तक के कई कलाकार प्रभावित और प्रेरित हुए। भगवान दादा का वास्तविक नाम 'भगवान आभाजी पालव' था। भगवान दादा का जीवन और फ़िल्मी कैरियर जबरदस्त उतार चढ़ाव से भरा रहा लेकिन यह कलाकार सिनेमा के इतिहास में अपनी ख़ास जगह रखता है।

भगवान दादा का जन्म एक मिल के श्रमिक के घर 1 अगस्त , 1913 को हुआ। बचपन से ही उन्हें फ़िल्मों के प्रति आकर्षण था और पढ़ाई के प्रति उन्हें विशेष रुचि नहीं थी। इस कारण उन्हें पिता के कोप का शिकार भी होना पड़ा, लेकिन धुन के पक्के दादा ने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी और हिंदी सिनेमा के रोमांटिक नायक की पारंपरिक छवि को नया आयाम मिला। शुरू में उन्होंने अपने शरीर पर काफ़ी ध्यान दिया और बदन कसरती बना लिया। इसका फायदा उन्हें आगे मिला। फ़िल्मों में प्रवेश के लिए उन्हें काफ़ी मशक्कत करना पड़ी और अंतत: उन्हें 1930 में ब्रेक मिला, जब निर्माता सिराज अली हकीम ने अपनी मूक फ़िल्म 'बेवफा आशिक' में एक कॉमेडियन की भूमिका दी। इसके बाद उन्होंने कई मूक फ़िल्मों में अभिनय किया

पालव की आंखों में बचपन से फ़िल्मों के रूपहले परदे का सम्मोहन था। उन्होंने अपने जीवन की शुरूआत श्रमिक के रूप में की लेकिन फ़िल्मों के आकर्षण ने उन्हें उनके पसंदीदा स्थल तक पहुंचा दिया। भगवान मूक फ़िल्मों के दौर में ही सिनेमा की दुनिया में आ गए। उन्होंने शुरूआत में छोटी- छोटी भूमिकाएं की। बोलती फ़िल्मों का दौर शुरू होने के साथ उनके करियर में नया मोड़ आया। भगवान दादा के लिए 1940 का दशक काफ़ी अच्छा रहा। इस दशक में उन्होंने कई फ़िल्मों में यादगार भूमिकाएं की। इन फ़िल्मों में 'बेवफा आशिक', 'दोस्ती', 'तुम्हारी कसम', 'शौकीन' आदि शामिल हैं। अभिनय के
साथ ही उन्हें फ़िल्मों के निर्माण निर्देशन में भी दिलचस्पी थी। उन्होंने जागृति मिक्स और भगवान आर्ट्स प्रोडक्शन के बैनर तले कई फ़िल्में बनाई जो समाज के एक वर्ग में विशेष रूप से लोकप्रिय हुई। इन फ़िल्मों में 'मतलबी', 'लालच', 'मतवाले', 'बदला' आदि प्रमुख हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनकी अधिकतर फ़िल्में कम बजट
की तथा एक्शन फ़िल्में होती थी।

इस दौरान भगवान दादा ने अपनी लगन से फ़िल्म निर्माण से जुड़ी अन्य विधाओं का भी अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया। 1934 में प्रदर्शित 'हिम्मत-ए-मर्दां' उनकी पहली बोलती फ़िल्म थी। 1938 से 1949 के बीच उन्होंने कम बजट वाली कई स्टंट फ़िल्मों एवं एक्शन फ़िल्मों का निर्देशन किया। उन फ़िल्मों को समाज के कामकाजी वर्ग के बीच अच्छी लोकप्रियता मिली। उन फ़िल्मों में दोस्ती, जालान, क्रिमिनल, भेदी बंगला आदि प्रमुख हैं। 

भगवान दादा की फ़िल्मों में गहरी समझ तथा प्रतिभा को देखते हुए राजकपूर ने उन्हें सामाजिक फ़िल्में बनाने की राय दी। भगवान ने उनकी सलाह को ध्यान में रखते हुए 'अलबेला' फ़िल्म बनाई। इसमें भगवान के अलावा गीता बाली की प्रमुख भूमिका थी। इस फ़िल्म के संगीतकार
सी. रामचंद्र थे और उन्होंने ही इसमें चितलकर के नाम से पार्श्व गायन भी किया। अलबेला फ़िल्म अपने दौर में सुपर हिट रही और कई स्थानों पर इसने जुबली मनाई। इस फ़िल्म के गीत-संगीत का जादू सिने प्रेमियों के सर चढ़ कर बोला। इसका एक गीत 'शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के..' आज भी खूब पसंद किया जाता है। अलबेला के बाद भगवान दादा ने 'झमेला' और 'लाबेला' बनाई
लेकिन दोनों ही फ़िल्में नाकाम रहीं और उनके बुरे दिन शुरू हो गए। 

कभी सितारों से अपने इशारों पर काम कराने वाले भगवान दादा का करियर एक बार जो फिसला तो फिर फिसलता ही गया। आर्थिक तंगी का यह हाल था कि उन्हें आजीविका के लिए चरित्र भूमिकाएं और बाद में छोटी-मोटी भूमिकाएं करनी पड़ी। बदलते समय के साथ उनके मायानगरी के अधिकतर सहयोगी उनसे दूर होने लगे। सी.रामचंद्र, ओम प्रकाश , राजिन्दर किशन जैसे कुछ ही मित्र थे जो उनके बुरे वक्त में उनसे मिलने जाया करते थे। 

'शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के' गीत में अपने अदभुत, अनोखी व अद्वितीय डांसिंग स्टेप देने वाले भगवान दादा को आज भी उनकी गलियों में लोग अमिताभ बच्चन ही मानते हैं। भगवान दादा हिंदी सिनेमा जगत के पहले डांसिंग मास्टर थे। अलबेले भगवान दादा शुरू से ही फ़िल्म बनाने का सपना देखते थे। वे मिल में एक लेबर के रूप में काम करते, लेकिन ख्वाब फ़िल्म बनाने के देखते। वे चॉल में भी कुछ न कुछ इंतजाम करके फ़िल्में देख ही लेते थे। थियेटर में स्टॉल में भी फ़िल्म देखने के लिए पैसों
की जुगाड़ कर ही लिया करते थे।शुरुआती दौर में मूक फ़िल्मों से मौका मिला। अभिनय के बाद वे ज्यादा से ज्यादा समय सेट पर देते, ताकि बारीकियां समझ पायें। उन्होंने सीखी भी। उन्होंने तय किया कि वह कम बजट की फ़िल्म बनायेंगे। किसी तरह उन्होंने उस वक्त 65 हजार रुपये इकट्ठे किये। उनके डांसिंग स्टेप्स में प्रॉप्स का भी ख़ास ध्यान रखा जाता था। उन्होंने ही पहली बार सिर पर बड़े आकार की टोपी रख कर डांस करने की संस्कृति शुरू की। गीता बाली के साथ उन्होंने कई फ़िल्मों में अभिनय किया। अपने निर्देशन के दौर में उन्होंने 1938 से 1949 तक लगातार लो बजट की फ़िल्मों का
निर्माण किया। उनमें स्टंट व एक्शन फ़िल्में भी थीं। वे अपनी फ़िल्मों को अपनी गलियों में भी सभी लोगों को एकत्रित करके दिखाया करते थे।धीरे धीरे उन्होंने चैंबूर में जागृति पिक्स व भगवान आर्ट्स प्रोडक्शन के रूप में हाउस शुरू किया। राज कपूर ने उनकी काबिलियत को देखते हुए कहा कि भगवान तुम अच्छी और बड़ी फ़िल्म बनाओ। राज कपूर की राय पर भगवान दादा ने गीता बाली अभिनीत फ़िल्म 'अलबेला' का निर्देशन किया। फ़िल्म का गीत 'शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के'
बेहद लोकप्रिय हुआ। आज भी डांसिंग पार्टी में इस गीत पर युवा थिरकना जरूर पसंद करते हैं। चॉल में जमती रहती थी चूंकि भगवान दादा खुद विपरीत परिस्थितियों को झेल चुके थे। उन्होंने कई चुनौतियां व ज़िंदगी की कठिन परिस्थितियों में पहचान पाई थी, लेकिन जाहिर है वह अपनी जमीन या जड़ को नहीं भूल सकते थे। ऐसे में उन्होंने ऐसी कई फ़िल्मों का निर्माण किया, जिसमें कामकाजी वर्ग व मील मज़दूरों को फोकस किया गया। 1934 में प्रदर्शित 'हिम्मत ए मर्दा' ऐसी ही फ़िल्मों में से एक थी। यह उनकी पहली बोलती फ़िल्म थी। भगवान दादा से कभी मीलों के मज़दूरों के साथ अपने सरोकार नहीं बदले। उन्होंने मीलों के कई होनहार व प्रतिभावान लोगों को यथासंभव अपने फ़िल्म निर्माण में अवसर दिलाये। सुपरस्टार बनने के बाद भी जब भी वे चॉल आते। यहां के लोगों के साथ मजलिस जमाते व जम कर मस्ती किया करते थे। गौरतलब है कि उनकी फ़िल्मों के गीत 'शाम ढले खिड़की तले तुम सिटी बजाना, शोला जो भड़के आज की पीढ़ी भी गुनगुना पसंद करती हैं।

भगवान दादा को 'ला' शब्द से बेहद लगाव रहा। इसलिए उन्होंने अपनी हर फ़िल्म में 'ला' शब्द का इस्तेमाल जरूर किया। यहां तक कि फ़िल्म के गीत लिखते समय भी उन्होंने गीतकार से आग्रह किया कि वह इन बातों को ध्यान में रखें। 'शोला जो भड़के' उसी आधार पर लिखी गयी। 'अलबेला' के बाद 'झमेला' व 'लाबेला' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया। अलबेला उस दौर की सुपरहिट फ़िल्म रही थी। इस फ़िल्म ने जुबली मनाई थी।

हिंदी सिनेमा के पहले डांसिंग स्टार भगवान दादा ने अभिनय एवं नृत्य की अनोखी शैली से कॉमेडी को नई परिभाषा दी और उनकी अदाओं को बाद की कई पीढ़ियों के अभिनेताओं ने अपनाया। भगवान दादा ने मूक फ़िल्मों के दौर से अपने अभिनय जीवन की शुरुआत की
थी, लेकिन उनके हास्य अभिनय और नृत्य शैली ने अपने दौर में जबरदस्त धूम मचाई। आज के दौर के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी उनकी नृत्य शैली का अनुसरण किया। फ़िल्मों में प्रवेश के लिए उन्हें काफ़ी मशक्कत करना पड़ी और अंतत: उन्हें 1930 में ब्रेक मिला, जब निर्माता सिराज अली हकीम ने अपनी मूक फ़िल्म बेवफा आशिक में एक कॉमेडियन की भूमिका दी

करीब छह दशक लंबे अपने फ़िल्मी जीवन में भगवान दादा ने क़रीब 48 फ़िल्मों का निर्माण या निर्देशन किया, लेकिन बॉम्बे लैबोरेट्रीज में लगी आग के कारण 'अलबेला' और 'भागमभाग' छोड़कर सभी फ़िल्मों का निगेटिव जल गया और नई पीढ़ी बेहतरीन कृतियों से वंचित रह गई। एक समय बंगला और कई कारों के मालिक भगवान अपनी मित्रमंडली से घिरे रहते थे, पर नाकामी के साथ ही धीरे- धीरे सब छूटने लगा। जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें चॉल में रहना पड़ा। अभिनय और नृत्य की नई इबारत लिखने वाला यह कलाकार 4 फ़रवरी 2002 को 89 साल की उम्र में अपना दर्द समेटे हुए बेहद खामोशी से इस दुनिया को विदा कह गया
भगवान दादा

🎂01 अगस्त 1913
Amravati, India
⚰️04 फ़रवरी 2002

मंगलवार, 28 नवंबर 2023

शायर गीतकार अली सरदार जाफरी


महान शायर गीतकार अली सरदार जाफरी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
*●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●
  ꧁

*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
जन्म की तारीख और समय: 29 नवंबर 1913, 
मृत्यु की जगह और तारीख: 1 अगस्त 2000, 
किताबें:  मेरा सफर , नई दुनिया कोसलाम
इनाम:  ज्ञानपीठ पुरस्कार
●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●
  
काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा 
रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा 

बाइस-ए-रश्क है तन्हा-रवी-ए-रह-रव-ए-शौक़ 
हम-सफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंज़िल के सिवा 

हम ने दुनिया की हर इक शय से उठाया दिल को 
लेकिन एक शोख़ के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा 

तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद 
बे-गुनह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा 

जाने किस रंग से आई है गुलिस्ताँ में बहार 
कोई नग़्मा ही नहीं शोर-ए-सलासिल के सिवा

अली सरदार जाफरी उर्दू साहित्य में.एक अलग मुकाम रखते है | आप अपनी शायरी से अधिक उर्दू साहित्य को आम जनों तक उपलब्ध कराने के लिये मशहूर है | आपने उर्दू शायरी के कई महान शायरों की अमूल्य कृतियों को कहकशा नाम के प्रोग्राम से जनता के समक्ष पहुचाया था 

इस अदीब का जन्म 29 नवम्बर 1913 को गोंडा ज़िले के बलरामपुर गाँव में हुआ था वही पर आपकी शिक्षा-दीक्षा भी हुई आप शुरुवात में जोश मलीहाबादी , जिगर मुरादाबादी और फिराक गोरखपुरी से प्रभावित थे | आगे की शिक्षा के लिये आपने 1933 में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय Aligarh Muslim University ( AMU) में दाखिला ले लिया | वहा पर अख़्तर हुसैन रायपुरी , सिब्ते-हसन , जज़्बी , मजाज़ , जाँनिसार अख़्तर और ख़्वाजा अहमद अब्बास की संगत मिली | यही पर आप कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित हुए
और सन 1936 में ही राजनितिक कारणों से आप विश्वविद्यालय से निकल गए | बाद में आपने 1938 में जाकिर हुसैन कालेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) से स्नातक किया | परन्तु आपकी उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय
में जाकर संपत हुई जहा आप युद्ध विरोधी गज़ले और इंडियन नेशनल कांग्रेस की राजनितिक गतिविधियों में भाग लेने के लिये 1940-41 में गिरफ्तार भी हुए | आपका साहित्यिक सफर 1938 में लघु कथाओ के प्रथम संग्रह मंजिल के प्रकाशन से प्रारंभ हुआ | आपकी गज़लों का पहला संग्रह 'परवाज' 1943 में प्रकाशित हुआ | संयोग की बात देखिये इसी वर्ष मखदूम
मोहीउद्दीन का पहला संग्रह ‘ सुर्ख सबेरा ’, जज्बी का पहला संग्रह ‘ फरोजां ’ और कैफ़ी आज़मी का पहला संग्रह ‘ झंकार’ भी प्रकाशित हुए | 1936 में आप प्रोग्रेसिव रायटर्स मूवमेंट की पहली सभा के प्रेसिडेंट बने |इस मूवमेंट के प्रेसिडेंट आप अपनी बाकी की जिंदगी भी बने रहे |प्रोग्रेसिव रायटर्स मूवमेंट को समर्पित ‘ नया अदब’ साहित्यिक पत्रिका के 1939 में आप सह-संपादक बने, जिसका प्रकाशन 1949 तक जारी रहा |
आपका विवाह जनवरी 1948 को सुल्ताना से हुआ | आपको 20 जनवरी 1949 को प्रोग्रेसिव उर्दू रायटर्स की सभा आयोजित करने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया | आपको मुंबई के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने
भी इस हेतु कई चेतावनिया दी थी और इन चेतावनी के 3 महीनो बाद आपको गिरफ्तार किया गया |
आपकी मुख्य साहित्यिक कृतियों में
‘परवाज’ ( 1943), ‘नई दुनिया को सलाम’ ( 1948), ‘खून की लकीर’ (1949), अम्न का सितारा ( 1950) एशिया जाग उठा ( 1951), 'पत्थर की दीवार' ( 1953), एक ख्वाब और (1964), पैरहन-ए-शरार ( 1965) और 'लहू पुकारता है' ( 1978) | इसके अतिरिक्त अवध की 'खाक-ए-हसीन ', 'सुब्हे फर्दा ', 'मेरा सफर' और आखिरी कृति 'सरहद' ( 1999) रही |
आप तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ पकिस्तान गए थे तब सरहद पर एक ऑडियो एल्बम भी बनाया गया Squadron Leader अनिल सहगल निर्माता थे और बुलबुल-ए-कश्मीर “सीमा सहगल ” ने गाया था | जिसे ( सरहद ऑडियो एल्बम) तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को 20-21 फ़रवरी 1999 को लाहौर सम्मिट में भेट स्वरूप प्रदान किया था |आपने अपने 5 दशको के साहित्यिक सफर में कबीर , मीर, ग़ालिब और मीरा बाई की रचनाओं के संग्रह पर काम किया था | इसके अतिरिक्त आपने दो मशहूर टी.वी. प्रोग्रामो को बनाया था एक था 18 एपिसोड में बना कहकशा, जिसमे आपने 20वी सदी के सात मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़, फिराक गोरखपुरी , जोश मलीहाबादी ,मजाज़ , हसरत मोहानी, मखदूम
मोहिउद्दीन और जिगर मुरादाबादी के जीवन पर बहुत अच्छी और विश्लेष्णात्मक रूप से प्रकाश डाला था; और दूसरा महफ़िल-ए-यारां जिसमे आपने अलग-अलग हस्तियों के इंटरव्यू लिये थे | इसके साथ-साथ ही आप उर्दू की प्रसिद्द पत्रिका गुफ्तगू के संपादक भी रहे|
तारीख 1 अगस्त, 2000 को यह महान शायर मुंबई में
यह दुनिया-ए-फानी छोडकर चले गए |
उनकी मृत्यु के एक वर्ष उपरांत Squadron Leader अनिल सहगल ने एक किताब प्रकाशित करवाई नाम था
अली सरदार जाफरी The Youthful Boatman of Joy.
"कोई सरदार कब था इससे पहले तेरी महफ़िल में बहुत अहले-सुखन उट्ठे बहुत अहले-कलाम आये"
आपको 1997 में जगन्नाथ पुरस्कार से नवाजा गया इस पुरस्कार को पाने वाले आप तीसरे शायर थे इससे पहले इसे फिराक गोरखपुरी ( 1969) और कुर्रतुलैन हैदर को दिया जा चुका था | आप कई साहित्यिक और अन्य उपाधियो सेनगोरवान्वित किये गए जिनमे पद्म श्री ( 1967),इकबाल पर कार्य करने हेतु पाकिस्तान सरकार द्वारा स्वर्ण पदक ( 1978), शायरी के लिये उत्तर प्रदेश उर्दू अकेडमी पुरस्कार , मखदूम पुरस्कार , फैज़
अहमद फैज़ पुरस्कार , मध्यप्रदेश सरकार की और से इकबाल सम्मान , और महाराष्ट्र सरकार की और
से संत दयानेश्वर पुरस्कार दिया गया |आप आज हमारे बीच में नहीं है लेकिन आपकी एक नज्म “ मेरा सफर” में आपने अपने जीवन दर्शन को बताया है जिसमे आपने फारसी के शायर रूमी के एक मिसरे का उपयोग कर जीवन की मौत पर विजय बताई है | सरदार जाफरी ने अपनी शायरी में कई नए शब्दों की रचनाए की और उसे उर्दू के बोझिलपने से दूर रखा |

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...