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बुधवार, 20 अगस्त 2025

विपन गुप्ता

विपिन गुप्ता
🎂जन्मतिथि 21 अगस्त 1905 
⚰️देहावसान 9 सितंबर 1981
मित्रों इस महान  चरित्र अभिनेता की जयंती 21 अगस्त को थी विलंब के लिए क्षमा आपने फिल्म "खिलौना" जरूर देखा होगा उस फिल्म में संजीव कुमार साहब" जितेंद्र साहब" और रमेश देव साहब ,के पिता का रोल किया था और फिल्म में इनका नाम था ठाकुर सूरज सिंह यह चरित्र अभिनेता है आदरणीय" विपिन गुप्ता जी" फिल्मों में इनका लगभग 40 वर्षों का लंबा सफर रहा है जयंती विशेष पर विनम्र श्रद्धांजलि कोटि-कोटि नमन विपिन गुप्ता जी की प्रमुख फिल्में खिलौना, घराना, जागृति, आम्रपाली ,हरिश्चंद्र तारामती, सती सुलोचना, बालक, बाबुल की गलियां, गृहस्ती ,जय चित्तौड़ ,भाभी ,एक गांव की कहानी ,नाग पंचमी जीवन मृत्यु इत्यादि( जन्मतिथि 21 अगस्त 1905 देहावसान 9 सितंबर 1981) 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏❤❤❤❤❤❤
#21aug  न्यू पोस्ट

शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

विपन गुप्ता

विपिन गुप्ता
🎂जन्मतिथि 21 अगस्त 1905 
⚰️देहावसान 9 सितंबर 1981
मित्रों इस महान  चरित्र अभिनेता की जयंती 21 अगस्त को थी विलंब के लिए क्षमा आपने फिल्म "खिलौना" जरूर देखा होगा उस फिल्म में संजीव कुमार साहब" जितेंद्र साहब" और रमेश देव साहब ,के पिता का रोल किया था और फिल्म में इनका नाम था ठाकुर सूरज सिंह यह चरित्र अभिनेता है आदरणीय" विपिन गुप्ता जी" फिल्मों में इनका लगभग 40 वर्षों का लंबा सफर रहा है जयंती विशेष पर विनम्र श्रद्धांजलि कोटि-कोटि नमन विपिन गुप्ता जी की प्रमुख फिल्में खिलौना, घराना, जागृति, आम्रपाली ,हरिश्चंद्र तारामती, सती सुलोचना, बालक, बाबुल की गलियां, गृहस्ती ,जय चित्तौड़ ,भाभी ,एक गांव की कहानी ,नाग पंचमी जीवन मृत्यु इत्यादि( जन्मतिथि 21 अगस्त 1905 देहावसान 9 सितंबर 1981) 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏❤❤❤❤❤❤
09 सितंबर न्यू पोस्ट

सोमवार, 21 अगस्त 2023

शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल खान

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ
🎂जन्म 21 मार्च 1916
जन्म भूमि डुमरांव, बिहार
⚰️मृत्यु 21 अगस्त, 2006 (90 वर्ष)
अभिभावक पैंगबर ख़ाँ
कर्म भूमि बनारस
कर्म-क्षेत्र शहनाई वादक
मुख्य फ़िल्में ‘सन्नादी अपन्ना’ (कन्नड़), ‘गूंज उठी शहनाई’ और ‘जलसाघर’ (हिंदी)
विद्यालय 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' और 'शांतिनिकेतन'
पुरस्कार-उपाधि 'भारत रत्न', 'रोस्टम पुरस्कार', 'पद्म श्री', 'पद्म भूषण', 'पद्म विभूषण', 'तानसेन पुरस्कार'
विशेष योगदान 1947 में आजादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहरा रहा था, तब बिस्मिल्लाह ख़ाँ की शहनाई भी वहाँ आज़ादी का संदेश बाँट रही थी। तब से लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का शहनाई वादन एक प्रथा बन गयी।
नागरिकता भारतीय
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ 
🎂 जन्म- 21 मार्च, 1916, बिहार;⚰️ मृत्यु- 21 अगस्त, 2006) 'भारत रत्न' से सम्मानित प्रख्यात शहनाई वादक थे। सन 1969 में 'एशियाई संगीत सम्मेलन' के 'रोस्टम पुरस्कार' तथा अनेक अन्य पुरस्कारों से सम्मानित बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई को भारत के बाहर एक विशिष्ट पहचान दिलवाने में मुख्य योगदान दिया। वर्ष 1947 में देश की आज़ादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर भारत का तिरंगा फहरा रहा था, तब बिस्मिल्लाह ख़ान की शहनाई भी वहाँ आज़ादी का संदेश बाँट रही थी। तब से लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह ख़ान का शहनाई वादन एक प्रथा बन गयी।

जीवन परिचय
बिस्मिल्लाह ख़ाँ का जन्म 21 मार्च, 1916 को बिहार के डुमरांव नामक स्थान पर हुआ था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ विश्व के सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक माने जाते थे। उनके परदादा शहनाई नवाज़ उस्ताद सालार हुसैन ख़ाँ से शुरू यह परिवार पिछली पाँच पीढ़ियों से शहनाई वादन का प्रतिपादक रहा है। बिस्मिल्लाह ख़ाँ को उनके चाचा अली बक्श 'विलायतु' ने संगीत की शिक्षा दी, जो बनारस के पवित्र विश्वनाथ मन्दिर में अधिकृत शहनाई वादक थे।

नामकरण तथा शिक्षा
उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के नाम के साथ एक दिलचस्प वाकया भी जुड़ा हुआ है। उनका जन्म होने पर उनके दादा रसूल बख्श ख़ाँ ने उनकी तरफ़ देखते हुए 'बिस्मिल्ला' कहा। इसके बाद उनका नाम 'बिस्मिल्ला' ही रख दिया गया। उनका एक और नाम 'कमरूद्दीन' था। उनके पूर्वज बिहार के भोजपुर रजवाड़े में दरबारी संगीतकार थे। उनके पिता पैंगबर ख़ाँ इसी प्रथा से जुड़ते हुए डुमराव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई वादन का काम करने लगे। छह साल की उम्र में बिस्मिल्ला को बनारस ले जाया गया। यहाँ उनका संगीत प्रशिक्षण भी शुरू हुआ और गंगा के साथ उनका जुड़ाव भी। ख़ाँ साहब 'काशी विश्वनाथ मंदिर' से जुड़े अपने चाचा अली बख्श ‘विलायतु’ से शहनाई वादन सीखने लगे।

जटिल संगीत रचना
बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने जटिल संगीत की रचना, जिसे तब तक शहनाई के विस्तार से बाहर माना जाता था, में परिवर्द्धन करके अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और शीघ्र ही उन्हें इस वाद्य से ऐसे जोड़ा जाने लगा, जैसा किसी अन्य वादक के साथ नहीं हुआ। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह की पूर्व संध्या पर नई दिल्ली में लाल क़िले से अत्यधिक मर्मस्पर्शी शहनाई वादक प्रस्तुत किया।

उल्लेखनीय
उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां पर जारी डाक टिकट
बिस्मिल्ला ख़ाँ ने 'बजरी', 'चैती' और 'झूला' जैसी लोकधुनों में बाजे को अपनी तपस्या और रियाज़ से ख़ूब सँवारा और क्लासिकल मौसिक़ी में शहनाई को सम्मानजनक स्थान दिलाया। इस बात का भी उल्लेख करना आवश्यक है कि जिस ज़माने में बालक बिस्मिल्लाह ने शहनाई की तालीम लेना शुरू की थी, तब गाने बजाने के काम को इ़ज़्जत की नज़रों से नहीं देखा जाता था। ख़ाँ साहब की माता जी शहनाई वादक के रूप में अपने बच्चे को कदापि नहीं देखना चाहती थीं। वे अपने पति से कहती थीं कि- "क्यों आप इस बच्चे को इस हल्के काम में झोक रहे हैं"।

उल्लेखनीय है कि शहनाई वादकों को तब विवाह आदि में बुलवाया जाता था और बुलाने वाले घर के आँगन या ओटले के आगे इन कलाकारों को आने नहीं देते थे। लेकिन बिस्मिल्लाह ख़ाँ साहब के पिता और मामू अडिग थे कि इस बच्चे को तो शहनाई वादक बनाना ही है। उसके बाद की बातें अब इतिहास हैं।

विदेशों में वादन
जितना भी कहूँगा बहुत कम होगा क्योंकि वो एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने कभी दिखावे में यकीन नहीं किया। वो हमेशा सबको अच्छी राह दिखाते थे और बताते थे। वो ऑल इंडिया रेडियो को बहुत मानते थे और हमेशा कहा करते कि मुझे ऑल इंडिया रेडियो ने ही बनाया है। वो एक ऐसे फरिश्ते थे जो धरती पर बार-बार जन्म नहीं लेते हैं और जब जन्म लेते हैं तो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते है।

मेरा मानना है कि उनका निधन नहीं हो सकता क्योंकि वो हमारी आत्मा में इस कदर रचे बसे हुए हैं कि उनको अलग करना नामुमकिन है।
हरिप्रसाद चौरसिया के श्रीमुख से
बाँसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया का कहना है- बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब भारत की एक महान् विभूति थे, अगर हम किसी संत संगीतकार को जानते है तो वो हैं बिस्मिल्ला खा़न साहब। बचपन से ही उनको सुनता और देखता आ रहा हूं और उनका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहा। वो हमें दिशा दिखाकर चले गए, लेकिन वो कभी हमसे अलग नहीं हो सकते हैं। उनका संगीत हमेशा हमारे साथ रहेगा। उनके मार्गदर्शन पर अनेक कलाकार चल रहे हैं। शहनाई को उन्होंने एक नई पहचान दी। शास्त्रीय संगीत में उन्होंने शहनाई को जगह दिलाई इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। यह उनकी मेहनत और शहनाई के प्रति समर्पण ही था कि आज शहनाई को भारत ही नहीं बल्कि पूरे संसार में सुना और सराहा जा रहा है। उनकी कमी तो हमेशा ही रहेगी। मेरा मानना है कि उनका निधन नहीं हो सकता क्योंकि वो हमारी आत्मा में इस कदर रचे बसे हुए हैं कि उनको अलग करना नामुमकिन है।
सन 1956 में बिस्मिल्लाह ख़ाँ को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सन 1961 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
सन 1968 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
सन 1980 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
2001 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
मध्य प्रदेश में उन्हें सरकार द्वारा तानसेन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
निधन
बिस्मिल्ला ख़ान ने एक संगीतज्ञ के रूप में जो कुछ कमाया था वो या तो लोगों की मदद में ख़र्च हो गया या अपने बड़े परिवार के भरण-पोषण में। एक समय ऐसा आया जब वो आर्थिक रूप से मुश्किल में आ गए थे, तब सरकार को उनकी मदद के लिए आगे आना पड़ा था। उन्होंने अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा व्यक्त की थी लेकिन उस्ताद की यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई और 21 अगस्त, 2006 को 90 वर्ष की आयु में इनका देहावसान हो गया।

रविवार, 20 अगस्त 2023

शास्त्रीय संगीत गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर

प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂19 अगस्त 1872
 ⚰️21 अगस्त 1931
विष्णु दिगम्बर पलुस्कर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में एक विशिष्ट प्रतिभा थे, जिन्होंने भारतीय संगीत में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। वे भारतीय समाज में संगीत और संगीतकार की उच्च प्रतिष्ठा के पुनरुद्धारक, समर्थ संगीतगुरु, अप्रतिम कंठस्वर एवं गायनकौशल के घनी भक्त हृदय गायक थे। विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में महात्मा गांधी की सभाओं सहित विभिन्न मंचों पर रामधुन गाकर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाया। पलुस्कर ने लाहौर में 'गंधर्व महाविद्यालय' की स्थापना कर भारतीय संगीत को एक विशिष्ट स्थान दिया। इसके अलावा उन्होंने अपने समय की तमाम धुनों की स्वरलिपियों को संग्रहित कर आधुनिक पीढ़ी के लिए एक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

जीवन परिचय

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर का जन्म 18 अगस्त, 1872 को अंग्रेज़ी शासन वाले बंबई प्रेसीडेंसी के कुरूंदवाड़ (बेलगाँव) में हुआ था। पलुस्कर को घर में संगीत का माहौल मिला था। क्योंकि उनके पिता दिगम्बर गोपाल पलुस्कर धार्मिक भजन और कीर्तन गाते थे। विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को बचपन में एक भीषण त्रासदी से गुजरना पड़ा। समीपवर्ती एक कस्बे में दत्तात्रेय जयंती के दौरान उनकी आंख के समीप पटाखा फटने के कारण उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई थी। आंखों की रोशनी जाने के बाद उपचार के लिए वह समीप के मिरज राज्य चले गए।

संगीत की शिक्षा

ग्वालियर घराने में शिक्षित पं. बालकृष्ण बुवा इचलकरंजीकर से मिरज में संगीत की शिक्षा आरंभ की। बारह वर्ष तक संगीत की विधिवत तालीम हासिल करने के बाद पलुस्कर के अपने गुरु से संबंध खराब हो गए। बारह वर्ष कठोर तप:साधना से संगीत शिक्षाक्रम पूर्ण करके सन्‌ 1896 में समाज की कुत्या और अवहेलना एवं संगीत गुरुओं की संकीर्णता से भारतीय संगीत के उद्धार के लिए दृढ़ संकल्प सहित यात्रा आरंभ की। इस दौरान उन्होंने बड़ौदा और ग्वालियर की यात्रा की। गिरनार में दत्तशिखर पर एक अलौकिक पुरुष के संकेतानुसार लाहौर को सर्वप्रथम कार्यक्षेत्र चुना।

ब्रजभूमि भ्रमण

धनार्जन के लिए उन्होंने संगीत के सार्वजनिक कार्यक्रम भी किए। पलुस्कर संभवत: पहले ऐसे शास्त्रीय गायक हैं, जिन्होंने संगीत के सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए। बाद में विष्णु दिगम्बर पलुस्कर मथुरा आए और उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बंदिशें समझने के लिए ब्रज भाषा सीखी। बंदिशें अधिकतर ब्रजभाषा में ही लिखी गई हैं। इसके अलावा उन्होंने मथुरा में ध्रुपद शैली का गायन भी सीखा।

गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर मथुरा के बाद पंजाब घूमते हुए लाहौर पहुंचे और 1901 में उन्होंने गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना की। इस स्कूल के जरिए उन्होंने कई संगीत विभूतियों को तैयार किया। हालांकि स्कूल चलाने के लिए उन्हें बाज़ार से कर्ज़ लेना पड़ा। बाद में उन्होंने मुंबई में अपना स्कूल स्थापित किया। कुछ वर्ष बाद आर्थिक कारणों से यह स्कूल नहीं चल पाया और इसके कारण विष्णु दिगम्बर पलुस्कर की संपत्ति भी जब्त हो गई।

पलुस्कर के शिष्य

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के शिष्यों में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित विनायकराव पटवर्धन, पंडित नारायण राव और उनके पुत्र डी. वी. पलुस्कर जैसे दिग्गज गायक शामिल थे।

रचनाएँ

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने तीन खंडों में 'संगीत बाल-बोध' नामक पुस्तक लिखी और 18 खंडों में रागों की स्वरलिपियों को संग्रहित किया। इसके अतिरिक्त पं. पलुस्कर ने 'स्वल्पालाप-गायन', 'संगीत-तत्त्वदर्शक', 'राग-प्रवेश' तथा 'भजनामृत लहरी' इत्यादि नामक पुस्तकों की रचना की।

निधन

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इस पुरोधा गायक और महान् साधक का निधन 21 अगस्त, 1931 को हो गया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...