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शनिवार, 21 दिसंबर 2024

शिव गीता अध्याय 9


शिव गीता अध्याय 9

भगवान का अल्ट्रासाउंड का ही ज्ञान है
चलिए देखें और सुने हर हर महा देव 



शेष था नामक अध्याय श्री भगवान बोली हे राजन तुम सावधान होकर लोग तुम से वे का स्वरूप काम यह सब था मुझे से उत्पन्न होता है मुझे इसे धारण किया जाता है और जिस प्रकार
भ्रम निवृत होने से रजत में लाई जाती है
इसी प्रकार यह जगह ज्ञान से मुझे में ले हो जाता है में निर्माण पूर्ण सच्चिदानंद स्वरूप को में संग्रहित शुद्ध कर्नाटक हूं
मैं अनाज सिद्धि माया से युक्त होकर जगत का अकारण था
मेरी माया का वर्णन नहीं हो सकता उसमें सत्व रज तम गुणों है ही सकता हूँ शुकुल वर्ण वाले मनुष्य को सुख और ज्ञान का देने वाला है
और रजो गुण का रक्त वर्ण ही यह चंचल और मनुष्यों को दुख देने वाला है
तम का कृषि वन है कि जाए और सुख दुख से उदासीन रहता है
इसी कारण मेरे सहयोग से जीतकर रघुनाथन कमाया प्रकट होती है
मेरे लिए भी थी इस प्रकार जगत को रचना करके दिखाती है जिसके का अज्ञान शक्ति भी रजत और अस्सी में फर्क दिखाई देता है
मुस्लिम माया के द्वारा आकाश आदि की उत्पत्ति होती है
मुझसे प्रथम आकाश आकाश वायु वायु से ही अगली से जल जल पृथ्वी उत्पन्न होती है उन्हें पांचों से उत्पन्न हुआ ये सब दें ही पंचभूत आत्मक कलाकारी पिता माता की भक्षण किए अनुमति इस शर्त को
तुम शरीर उत्पन्न होता है
जिसमें स्नायु थी और मनोचा पिता के कोष से उत्पन्न होती कच्चा मांस और उधेड़ यह माता के वीर से उत्पन्न होते ही इसी प्रकार माता और पिता संबंधी शतकों शास्त्र मकडी ही में माता से उत्पन्न होने वाली
पिता से उत्पन्न होने वाली रज से उत्पन्न होने वाली आत्मा से उत्पन्न होने वाली चार पदार्थ की उस रात में का मजा प्लीहा यह ख़त गुदा फिर गए न ही इतिहास ही मधु पदार्थ माता
से उत्पन्न होते ही मशरूम लोग के इस दिन शेरा धमनी नारी नाक धाक वे आदि इस फिर पर्दा प्रथा के संबंध से होते ही पुष्टता वह
रखती भर अवयवों की दृढ़ता अनुरूपता कहा इत्यादि रस से उत्पन्न होती इच्छा दृश्य सुख दुख धम धर्म भावना क्रियान्वयन जहां आयुष्य इन्द्रिय इत्यादि की आत्मा जी
आत्मा से उत्पन्न हुए कहलाती शुरुआत तेल त्वचा चक्षु जीव लिया और ग्रांड यह भी पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही क्रम से ही शब्द स्पर्श रूप रस गंध ये पाँच इनके विषय ही
ही हाथ पैर घुसा और उपवास ये पाँच करोड़ रुपये ही भूल ना लेना देना चलना मल विसर्जन और रहती यह क्रम से पांचों इंद्रियों की पाँच कहानी और माह या मक्खी
मन बुद्धि अहंकार और यह करण की चार ही सुख और दुख यह मन का लक्ष्य है इस भी भय विकल्प इत्यादि मन के कारण ही और जो निश्चय करती है उसी को बुद्धि कहती ही और हैं
मम यह जो अहंकार में मन के प्रति है इससे ही चित्र खेती ही यह अन्तः करण भी सतोगुण आदि के भीड़ जुटती तीन प्रकार का है
सत रज तम यह तीन घोड़े नहीं जब सतोगुण प्रधान था है
असंख्य बुद्धि स्वच्छता धर्म में रुचि इत्यादि साथ एक धन प्राप्त होते ही और झा रजोगुण होता है तो काम क्रोध मद इत्यादि ही तमोगुण की प्रधानता में निद्रा अलग से प्रमाद मंच
है इन्द्रियों की प्रसन्नता होगी आलस्य का न होना यह गोल सत्तर से उत्पन्न ही इन पांच महाभूतों की मात्रा से उत्पन्न हुआ यह देह ही उनके गुणों को धारण करता है
उनमें शब्द श्रौत सूत्र इन्द्रिय वाहन कुशलता लघुता झेल रहे और बल साथ गुण आकाश से इसे स्टूल अंधेरे में प्राप्त ही इस वर्ष तभी
उस पर
था ऊपर को फेंकना अब से पर अर्थात नीचे तो फेंकना अकुंश चक्र अर्थात खोदना प्रसाद अर्थात फैलना गमन अर्थात चलना यह पाँच कम नहीं रहा अपान व्यान उदान यह पाँच रहाणे भी
नाक को कल वे रात धनंजय यह पाँच उपरांत लगते ही यह एक ही वायु विकार को प्राप्त होने पर दर्शना ढली ही उन सभी प्रकार पवन है
जो नाभि से लेकर कंठ तक स्थित रहता है
अनन्नास का नाम ही तरह हृदय कमल में गमन करता है
शब्द के उच्चारण निशब्द निश्वास और श्वास अधिक का यही कारण भी
लिंग करती जंग उधार न कंठ अंडकोष जोड़ों की संधि और जंघाओं में अपान वायु रहता है उसका कारण मूत्र और पुरुष का प्रयास करना नहीं भी
कारण कामों के भूतनी जीव तथा नाथ का इन पांच स्थानों में ज्ञान वाइन रहता है
प्राणायाम रेचक पूरक कुम्भक इसके कारण ही समान भाई सब शरीर में व्याप्त होकर जठराग्नि के सहित बहत्तर हजार नारियों के रंग में संचार करता है
भोजन की और यह हुए संपूर्ण रसों की देह की पुष्टि के निमित्त लेकर चलना हाथ और अमेरिकी संधियों में उदान वायु रहता है
वे का उठाना चलाना ये इसका कर कहा कि कर्जा माफ हो रही थी और स्नायु इन पांच धातुओं के आश्रय नाग आदि पाँच उपरांत व्यक्ति द कहा हिचकी यह नाग पवन का कारण पलक खोलना लगा
ना कटाक्ष यह
उनका कर भूख प्यास चीखना कनखल का कारण आलस्य निद्रा जब हाई डैम दर्द का कारण पर शोक और हाँ से धनंजय रखकर नहीं अग्नि के भारत चक्षु
क्रिसिल ने शुक्ल इत्यादि रूप भोजन का वाहक स्वतः प्रकाश क्रूड विश्व पर क्रिस्टा इन्द्रियों का तेज चलता शूरता और रोक थी यह गुण तेज से प्राप्त होते ही और नींबू रस शीट
चिता पर दिनभर तो पसीने और संपूर्ण अवयवों में कोमलता ये घर जल से उत्पन्न होते ही ग्राइंडर रहे गंध इस भिन्नता गहरे गुरु यह शहर पृथ्वी से उत्पन्न होते ही त्वचा रुधिर माह में
अस्थि मज्जा और शुक्र यह साथ धातु शरीर को धारण करती ही पुरुषों का भक्षण किया अहं जठराग्नि से तीन भाग हो जाता है जिसका है
भारत मध्य भाग मास्क और सूक्ष्म हा मन था ही इससे निर्माण अन्नमय कहा था है झटका है फूल भाग मूत्र मध्यभाग रखते हैं और कनिष्ठ भाव कहता है इससे जल में रहने में तेज का इस टूल में था
थी मज़ा मध्य भाग और वाहिनी तुच्छ विभाग ने आश्चर्य यह है कि अहं उदक और से शुरू कर झट से रक्त से मार्च पर होता है
मास्टर से नहीं था मेफेयर थी और अस्थि मज्जा उत्पन्न होती है
मां से ही नारी उत्पन्न होती है और मज़ाक भी जी ने उत्पन्न होता है
वाह प्रेरित का हो या तीन धातु शरीर में रेतीली शरीर भी दस अंजलि फिर शर्मा जल रहता है
अंजलि रथ को तथा अन्य रहता है
रफ्तार ली विशाखा तक बिजली कर छः अंजली पित्त चली चली और मूत्र चार अधजली रहता है
भी तीन अंजली मीटर दो अंजली मचा एक ली और भी रहे आदि अंजलि रहता है इसी को भले ही शरीर में थी तीन सौ साठ शर्म का रोचक आप तरह और न ये पाँच प्रकार की थी
शरीर ही दो सौ अस्सी और की भी है उनको रोड़ा प्रसार इस कद्र फीचर उल्लू खद समर्थक मंदक शंका भारत और बाईस तुलना ये आठ वे अस्थियों की संधि के ही सहारे फिर करो सब शरीर
पर रोम ही और दाढ़ी के बाद से ही दर्शकों को मां इस प्रकार यह भी का हो तुम्हारे प्रति की किया इस देह के समान निस्तार पड़ा दूसरा त्रिलोकी में कोई ही इस भी को प्राप्त होकर पास बुद्धि पुरुष माह अभी
भ्रम निवृत होने से रजत में लाई जाती है

हर हर महादेव

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...