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सोमवार, 9 दिसंबर 2024

गीता अध्याय 12

*📚भगवद गीता अध्याय12📚*

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श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 12: भक्ति योग

अध्याय 12 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को भक्ति योग की महिमा बताते हैं। यह अध्याय भक्त और परमात्मा के संबंध, भक्ति के प्रकार, और सच्चे भक्त के गुणों का वर्णन करता है।

मुख्य विषय:

1. साकार और निराकार उपासना का तुलनात्मक वर्णन:
अर्जुन पूछते हैं कि भगवान की साकार उपासना श्रेष्ठ है या निराकार? श्रीकृष्ण बताते हैं कि दोनों मार्ग श्रेष्ठ हैं, लेकिन साकार उपासना सरल और भक्तिपूर्ण जीवन जीने के लिए अधिक अनुकूल है।

2. भक्ति मार्ग की महिमा:
भगवान कहते हैं कि जो भक्त निस्वार्थ भाव से केवल ईश्वर को प्रेम और श्रद्धा से पूजता है, वह शीघ्र ही मुझे प्राप्त करता है।

3. सच्चे भक्त के गुण:
श्रीकृष्ण ने 36 गुणों का वर्णन किया है जो एक सच्चे भक्त में होते हैं, जैसे अहिंसक, दया भाव रखने वाला, शत्रुता रहित, स्थिर चित्त, मितभाषी, संतुष्ट और क्षमाशील होना।
✍️36 गुणों का विस्तृत विचार:

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 12 में श्रीकृष्ण ने सच्चे भक्त के 36 गुणों का उल्लेख किया है। यह गुण एक भक्त के शुद्ध चरित्र और भक्ति की गहराई को दर्शाते हैं। विस्तार से:

1. अद्वेष्टा (शत्रुता रहित):

भक्त किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति प्रेमभाव रखता है।

2. मैत्र (मित्रता):

सबके प्रति मित्रवत व्यवहार करता है।

3. करुण (दयालु):

दूसरों के दुख को समझता है और उनकी सहायता के लिए तत्पर रहता है।

4. निर्मम (ममता रहित):

सांसारिक चीज़ों से मोह नहीं करता।

5. निर्मान (अहंकार रहित):

स्वयं को बड़ा समझने की भावना से मुक्त होता है।

6. संतोषी (संतुष्ट):

जो कुछ भी प्राप्त होता है, उसमें संतुष्ट रहता है।

7. युक्त आत्मा:

मन और आत्मा को नियंत्रित रखता है।

8. दृढ़निश्चयी:

अपने मार्ग पर दृढ़ता से चलता है।

9. मयि अर्पितमनोबुद्धि:

अपना मन और बुद्धि भगवान में लगाता है।

10. असक्त:

किसी भी सांसारिक वस्तु या संबंध के प्रति आसक्ति नहीं रखता।

11. अनपेक्ष:

अपेक्षाओं से मुक्त रहता है।

12. शुचि (पवित्र):

अंतःकरण और आचरण से पवित्र होता है।

13. दक्ष:

सभी कार्यों में कुशल और योग्य होता है।

14. उदासीन:

सुख-दुख, लाभ-हानि से प्रभावित नहीं होता।

15. गृहत्यागी (सर्वारंभ परित्यागी):

सभी प्रकार की इच्छाओं और आरंभों का त्याग करता है।

16. हर्ष-शोक रहित:

खुशी और दुख के समय समान भाव रखता है।

17. क्षमी (क्षमाशील):

अपमान और कष्ट सहन करता है।

18. सुख-दुख समः:

सुख और दुख में समता बनाए रखता है।

19. नवद्यति:

किसी कार्य में दोष नहीं निकालता।

20. सर्वभूतहितरतः:

सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।

21. आत्माराम:

आंतरिक शांति में संतुष्ट रहता है।

22. विगत स्पृह:

इच्छाओं से मुक्त रहता है।

23. योगी:

योग साधना में रत रहता है।

24. निर्मल:

मनोमालिन्य से रहित होता है।

25. सर्वत्र समदर्शी:

सभी को समान दृष्टि से देखता है।

26. तुल्य निंदा-स्तुति:

निंदा और स्तुति में समान रहता है।

27. मौन:

अनावश्यक बोलने से बचता है।

28. संतोषी:

जैसा भी है, उसमें संतुष्ट रहता है।

29. अप्रमतः:

चेतन और सजग रहता है।

30. भयमुक्त:

डर और संदेह से परे रहता है।

31. सदाचारी:

सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है।

32. ईश्वरनिष्ठ:

सदैव ईश्वर की शरण में रहता है।

33. निश्चल प्रेम:

ईश्वर के प्रति अनवरत प्रेम रखता है।

34. द्वेष रहित:

सभी से द्वेष और ईर्ष्या से मुक्त रहता है।

35. सद्गुणी:

सभी श्रेष्ठ गुणों से युक्त होता है।

36. अनन्य भक्त:

अखंड और विशुद्ध भक्ति करता है।

निष्कर्ष:

ये गुण सच्चे भक्त की परिभाषा हैं। इनका अनुसरण करने से व्यक्ति भक्ति और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है।

भक्ति के स्तर:

श्रीकृष्ण ने भक्ति के विभिन्न स्तर सुझाए हैं:

1. यदि ध्यान और पूजा संभव हो, तो उसे करना चाहिए।

2. यदि ऐसा न हो सके, तो कर्मयोग द्वारा प्रभु को समर्पित भाव से सेवा करनी चाहिए।

3. यदि यह भी कठिन हो, तो स्वयं को प्रभु पर छोड़ देना चाहिए।

सार:

भक्ति योग, प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का मार्ग है। भगवान के प्रति अडिग विश्वास रखने वाले व्यक्ति में दैवीय गुण स्वतः विकसित होते हैं। यह अध्याय हमें सिखाता है कि भक्ति और समर्पण के मार्ग से परमात्मा की कृपा कैसे प्राप्त की जा सकती है।चलिए गीता में देखते हैं।
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भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 1

श्लोक:
(साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय) 
 अर्जुन उवाच
 एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
 ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं- उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
 12॥1॥

आते ही अर्जुन ने दो प्रकार के भक्तों का उल्लेख किया है:
यह दो प्रकार के भगत कौन से हैं देखते चलें?

1. देवताओं की पूजा करने वाले भक्त
2. अक्षर ब्रह्म (परमात्मा) की पूजा करने वाले भक्त

अब आगे अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि इन दो प्रकार के भक्तों में  अधिक श्रेष्ठ कौन है। स्पष्ट है कि हम भी तो जानना चाहते है कि भगवत ज्ञान का सर्व श्रेष्ठ मार्ग क्या है?

जो भगवान से अर्जुन ने सिखा क्या भगवान के अर्जुन को बताए उस मार्ग को अनुसरण कर हम अपना कल्याण नहीं कर सकते? इतनी सी बात सीखने को क्या किसी गुरु या शिक्षक की कोई आवश्यकता है? नहीं ना अपना भला बुरा हम खुद ही जान सकते हैं बिना गुरु अपनी इंद्रियों की और बुद्धि की शक्ति द्वारा।जब कोई व्यक्ति अपना बुरा हो नहीं सोच सकता। तो है भी क्यों सोचेंगे? हम भी श्रेष्ठ को चुन उस श्रेष्ठ का ही अनुसरण करेंगे।

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 2

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
 मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
 श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए (अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे हुए प्रकार से निरन्तर मेरे में लगे हुए) जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं
 मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे को देख कर आगे बढ़ते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 55

श्लोक:
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः।
 निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।
अब संपूर्ण गीताशास्त्र का सारभूत अर्थ कल्याण संक्षेप में कर्तव्यरूपसे बताया जाता है --, जो मुझे भगवान के लिए कर्म करने वाला है और मेरा ही परायण है -- सेवक स्वामी के लिए कर्म करता है लेकिन शेष प्राप्तयोग्य अपनी परमगति उसे प्रमाणित नहीं करता और यह तो मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, और मुझे ही अपनी परमगति समझ वाला होता है? इस प्रकार परमगति मैं ही हूं ऐसा जो मत्परायण है। तथापि मेरा एक ही भक्त है अर्थात जो सबसे प्रकार की सभी इंद्रियों से परिपूर्ण उत्साह रखता है वह मेरा ही भजन है? ऐसा मेरा भक्त है। तथा जो धन, पूत, मित्र, स्त्री और बंधुवर्गमें सङ्ग--प्रीति--प्रेमसेअनुपयोगी है। तथा सभी भूतों में वैरभाव से अनुपयोगी है अर्थात अपना अत्यंत अनिष्ट करने की चेष्टा करने वालों में भी जो शत्रुभाव से अनुपयोगी है। ऐसा जो मेरा भक्त है।हे पाण्डव वह मुझे ही पाता है अर्थात् मैं ही उसकी परमगति हूँ। ओर क्या चाहिए?
(तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा पर मैने देखा है लोग मंदिर में अपना धूप ना ले जाकर वही पहले से पड़े धूप को जला कर भी पूजा कर लेते है और तेरा तुझ को अर्पण पूरा कर देते हैं। इसे ऐसा समझते हुए बुद्धि से निर्णय गलत सही का भी तो हमें ही करना है अगर कुछ नहीं ला सके तो प्रणाम तो कर ही सकते थे कि नहीं?)भगवान कहते है उसकी दूसरी कोई गति कभी नहीं होती। यह मैंने तेरे दर्शन के लिए इष्ट उपदेश दिया है।
11 ॥55॥ 
जिन लोगों ने अपने मन को पूर्ण रूप से मेरे में समर्पित कर दिया है।जो लोग नियमित रूप से मेरी उपासना और भक्ति करते हैं। वे मेरे अनुसार सबसे उन्नत और उत्कृष्ट भक्त माने जाते हैं।इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण भक्ति के उच्चतम स्तर की व्याख्या करते हैं और बताते हैं कि एक सच्चा भक्त वह है जो मन, श्रद्धा और निरंतरता के साथ भगवान की उपासना करता है।
12॥2॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 3-4

श्लोक:
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
 सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌॥
 सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
 ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥

भावार्थ:
परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं
 12॥3-4॥
श्लोक
ये त्वक्षरं निर्देशितमव्यक्तं प्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।12.3।।
इस श्लोक का भावार्थ यह है:

जो लोग अव्यक्त (निराकार) और अक्षर (अविनाशी) परमात्मा की उपासना करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है, जो कूटस्थ (स्थिर) और अचल (अप्राप्य) है, और जो ध्रुव (स्थिर) है, वे भी मेरी पूजा करते हैं।

आगे इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग निराकार परमात्मा की उपासना करते हैं, वे भी उनकी पूजा करते हैं। यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण निराकार परमात्मा के गुणों का वर्णन कर रहे हैं, जैसे कि सर्वत्र व्याप्त, अकल्पनीय, स्थिर, अचल और ध्रुव।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र संबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।12.4।।

इस श्लोक का भावार्थ यह हैकि:

जो लोग अपने इन्द्रियों को वश में करके और सर्वत्र बुद्धि को व्याप्त करके, सबके हित में रत होकर, मेरी पूजा करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त करते हैं।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग अपने इन्द्रियों को वश में करके और सर्वत्र बुद्धि को व्याप्त करके, सबके हित में रत होकर, उनकी पूजा करते हैं, वे उनके साथ एकता प्राप्त करते हैं। यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि उनकी पूजा करने के लिए अपने इन्द्रियों को वश में करना और सर्वत्र बुद्धि को व्याप्त करना अति आवश्यक है।

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 5

श्लोक:
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌।
 अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥

भावार्थ:
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है
 12॥5॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्तियोग की कठिनाई और उसके लाभ के बारे में बात कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो लोग अनिश्चित और अव्यक्त (अस्पष्ट) ब्रह्म को ध्यान में रखकर भक्ति करते हैं, उनके लिए यह मार्ग अधिक कठिन होता है। यहाँ पर 'अव्यक्ता' से तात्पर्य है कि निराकार, अदृश्य और अपार ब्रह्म को पकड़ना और समझना बहुत ही कठिन है।

इस कठिनाई के कारण, जो भक्त ऐसे ब्रह्म को ध्यान में रखते हैं, उनके लिए भक्ति का मार्ग बहुत ही क्लेशपूर्ण और दुःखदाई हो सकता है। यह कठिनाई इसलिए होती है क्योंकि उनके मन की चंचलता और शरीर की इंद्रियों की सीमाएँ इस ब्रह्म के अनन्त और अदृश्य स्वरूप को स्वीकार करने में ही बाधा डालती हैं।इस से यह भी स्पष्ट होता है कि जब भक्ति का मार्ग स्पष्ट और साकार रूप में हो, जैसे कि भगवान की एक निश्चित पूजा या उनकी लीलाओं का ध्यान, तो यह कठिनाई कम हो जाती है।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि निराकार ब्रह्म की भक्ति कठिन हो सकती है, और इसके लिए विशेष प्रयास और काफी धैर्य की आवश्यकता होती है।

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 6

श्लोक:
0 ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः।
 अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥

भावार्थ:
परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। (इस श्लोक का विशेष भाव जानने के लिए गीता अध्याय 11 श्लोक 55 देखना चाहिए)
 12॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 11
श्लोक 55

श्लोक:
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः।
 निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है
 11॥55॥ 
तब और क्या चाहिए?

विचार की बात यह है कि निराकार रूप कष्ट कारक और सुगम मार्ग बिना कष्ट प्राप्त होता है सही मार्ग हो सकता है पर दोनों का लक्ष तो परमात्मा की प्राप्ति ही है।तो निराकार साकार रूप के द्वारा मनुष्य को भटकाना भर तो नहीं?

जिस का सही ज्ञान मार्ग कलयुग में गुरु ग्रंथ साहिब ने समझा है और समझाया है कि निराकार रूप में साकार क्या है?

✍️गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को बहुत महत्व दिया गया है। गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख एक निराकार और सर्वशक्तिमान ईश्वर है, जो सभी जीवों में व्याप्त है।

गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को निम्नलिखित तरीकों से समझाया गया है:

1. नाम सिमरन: गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख का नाम सिमरन करना सबसे महत्वपूर्ण उपासना है। नाम सिमरन से जीव को अकाल पुरख के साथ जुड़ने का अवसर मिलता है।
2. सेवा और सिमरन: गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख की सेवा करना और उनका सिमरन करना दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। सेवा से जीव को अकाल पुरख के प्रति समर्पण का अवसर मिलता है, जबकि सिमरन से जीव को अकाल पुरख के साथ जुड़ने का अवसर मिलता है।

3. गुरु की शरण: गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख की उपासना करने के लिए गुरु की शरण में जाना आवश्यक है। गुरु जीव को अकाल पुरख के बारे में समझाता है और जीव को अकाल पुरख की उपासना करने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है।

गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को निराकार और साकार दोनों रूपों में समझाया गया है। गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि अकाल पुरख एक निराकार ईश्वर है, लेकिन वह साकार रूप में भी प्रकट हो सकता है।

इस प्रकार, गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को एक समग्र और व्यापक दृष्टिकोण से समझाया गया है, जिसमें निराकार और साकार दोनों रूपों को शामिल किया गया है।
🪯जैसे कि गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है:

"एक ओंकार सतनामु कर्ता पुरखु निरभऊ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि।"

इसका अर्थ है कि एक ओंकार, सतनाम, कर्ता, पुरख, निरभऊ, निरवैर, अकाल, मूरति, अजूनी, सैभं, गुरु प्रसादि।

इस श्लोक में अकाल पुरख के गुणों का वर्णन किया गया है, जैसे कि वह निराकार है, निरभऊ है, निरवैर है, अकाल है, मूरति है, अजूनी है, और सैभं है।

इस प्रकार, गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना को एक समग्र और व्यापक दृष्टिकोण से समझाया गया है, जिसमें निराकार और साकार दोनों रूपों को शामिल किया गया है।
गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख के साकार रूप का वर्णन भी किया गया है। इसमें कहा गया है कि अकाल पुरख ने स्वयं को साकार रूप में प्रकट किया है, जिसे गुरु रूप में जाना जाता है।

गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है:

"गुरु नानक देव जी ने कहा है कि अकाल पुरख ने स्वयं को गुरु रूप में प्रकट किया है, जो साकार रूप में है।"

इस प्रकार, गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख के साकार रूप का वर्णन किया गया है, जिसे गुरु रूप में जाना जाता है।

"आज्ञा भई सब सीखन को हुक्म है गुरु मानो ग्रंथ" का भावार्थ सिख धर्म के मुख्य सिद्धांत पर आधारित है। इसमें सिखों को आदेश दिया गया है कि वे गुरु ग्रंथ साहिब को ही अपना गुरु मानें।

विस्तार:

1. गुरु ग्रंथ साहिब की महिमा: यह वचन सिख धर्म के अंतिम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने दिया। उन्होंने सिख समुदाय को आदेश दिया कि अब से कोई मानव गुरु नहीं होगा, और केवल गुरु ग्रंथ साहिब को ही मार्गदर्शक एवं आध्यात्मिक गुरु माना जाएगा।

2. सर्वज्ञान का स्रोत: गुरु ग्रंथ साहिब सिख धर्म की धार्मिक, आध्यात्मिक, और नैतिक शिक्षाओं का संग्रह है। इसे "जीवित गुरु" का दर्जा दिया गया है।

3. अनुभव और शिक्षाएं: यह आदेश सभी सिखों को समर्पण, विश्वास और समानता का पालन करने की प्रेरणा देता है।

इस प्रकार, यह वचन सिख धर्म के केंद्रीय सिद्धांत का प्रतीक है।

और निराकार में साकार के भी दर्शन करवाता है जिस से निराकार रूप की पूजा कर मोक्ष की कामना पूर्ण हो जाती है।

गुरु ग्रंथ साहिब में अकाल पुरख की उपासना के रूप में पांच ककार का महत्व बताया गया है जो साकार रूप ही है। पांच ककार हैं:

1. केश (केश धारण करना)
2. कंगा (कंगा धारण करना)
3. कच्छा (कच्छा धारण करना)
4. किरपान (किरपान धारण करना)
5. कड़ा (कड़ा धारण करना)

इन पांच ककारों को धारण करने से सिखों को अकाल पुरख की उपासना करने में मदद मिलती है और वे अपने जीवन में अधिक धार्मिक और नैतिक बनते हैं।

इस प्रकार, पांच ककार अकाल पुरख निराकार स्वरूप की उपासना के रूप में महत्वपूर्ण हैं और सिख धर्म में उनका विशेष स्थान भी है।
12॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 7

श्लोक:
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌।
 भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ
 12॥7॥
 जो लोग निराकार , साकार को मानने वाले अपने सभी कर्मों को मुझ से संबंधित मानते हुए मेरे प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण रखते हैं, और जो केवल मेरी भक्ति में तल्लीन रहते हैं, वे मेरे लिए अनन्य भक्ति करते हैं। ये लोग योग के माध्यम से, अर्थात ध्यान और भक्ति के माध्यम से, मुझमें पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं और केवल मुझे ही अपना एकमात्र लक्ष्य मानते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 8

श्लोक:
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
 निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥

भावार्थ:
मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है
 12॥8॥
भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को भक्तियोग की राह पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि आप अपने मन और बुद्धि को मुझमें पूर्ण रूप से समर्पित कर देंगे, तो आप मुझमें स्थिर हो जाएंगे। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, जब व्यक्ति अपने मन और बुद्धि को पूरी तरह से भगवान में लिप्त कर देता है, तो उसकी आत्मा भगवान के साथ विलीन हो जाती है और वह परम शांति की प्राप्ति करता है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि भगवान में पूरी तरह से समर्पित रहने से, हमारे भीतर शांति और सुख का आगमन होता है। इस प्रकार, जब हम भगवान की शरण में आत्म-समर्पण करते हैं और अपनी समस्त क्षमताओं को उन्हीं में समर्पित कर देते हैं, तो न केवल हमें आध्यात्मिक उन्नति मिलती है, बल्कि जीवन की हर कठिनाई से भी उबरने की क्षमता प्राप्त होती है।
संक्षेप में: भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में यह स्पष्ट किया है कि जब हम पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ अपने मन और बुद्धि को भगवान में लिप्त कर लेते हैं, तो हम उनकी कृपा प्राप्त करते हैं और हमारे जीवन का हर पहलू ऊर्ध्वगति की ओर अग्रसर होता है।
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 9

श्लोक:
अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌।
 अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥

भावार्थ:
यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यदि तुम मेरी भक्ति में अपने चित्त को स्थिर करने में असमर्थ हो, तो तुम्हारे लिए एक और मार्ग है।
यदि तुम मेरे प्रति एकाग्रचित्त होकर ध्यान नहीं कर पाते, अर्थात् तुम्हारा मन मेरी भक्ति में स्थिर नहीं हो पाता है, तो कोई बात नहीं। इसका मतलब है कि यदि भक्ति में ध्यान की स्थिरता प्राप्त करना तुम्हारे लिए कठिन है या असंभव लगता है।तब तुम्हें अभ्यास के माध्यम से, अर्थात् नियमित साधना और प्रयत्न के द्वारा मुझ तक पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए। भगवान कृष्ण अर्जुन को सुझाव दे रहे हैं कि यदि ध्यान के माध्यम से स्थिरता प्राप्त नहीं हो पा रही है, तो निरंतर अभ्यास और साधना द्वारा भी वह भगवान तक पहुँच सकते हैं।इस श्लोक में भगवान कृष्ण यह सिखाते हैं कि भक्ति का मार्ग केवल एक ही नहीं है। यदि किसी को ध्यान में स्थिरता प्राप्त करना कठिन लगे, तो भी निरंतर प्रयास और अभ्यास के माध्यम से भगवान की प्राप्ति संभव है। यह दर्शाता है कि भगवान की भक्ति में विविध मार्ग और साधन हो सकते हैं, और हर व्यक्ति की स्थिति और क्षमता के अनुसार मार्ग अपनाया जा सकता है।

अभ्यास:

जैसे हम अपनी  किसी पाठ्य पुस्तक के किसी पाठ का अध्ययन करते है तो उसके अंत में अभ्यास का उल्लेख आता है जिस में कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं।जिनका उत्तर उसी पाठ में होता है। यदि हमें समझ नहीं आता तो हम उसे उसी पाठ में पुनः खोजते है तो हमें प्राप्त हो जाता है।
यही नियम धार्मिक पवित्र पुस्तकों पर भी तो लागू है इनको पड़ते समय कापी पेंसिल,pen (लेखनी) को पास रखे जो समझ नहीं आ रहा उसको लिख लें क्या समझ नहीं आया ।पाठ पूरा होने पर उसी पाठ में पुनः खोजें तो प्रश्न का उत्तर मिल जाता है।पर अभ्यास करना जरूरी होता है।
गुरु ग्रंथ साहिब में एक प्रसिद्ध शब्द है:

"आपे गुरु आपे चेला, आपे ही दातारु।"

इसका भावार्थ है:

"आप ही गुरु हैं, आप ही चेला हैं, और आप ही दातारु (देने वाला) हैं।"

इस शब्द में गुरु नानक देव जी ने बताया है कि अकाल पुरख एक ही है, जो गुरु, चेला, और दातारु सभी रूपों में प्रकट होता है। यह शब्द अकाल पुरख की एकता और सर्वशक्तिमानता को दर्शाता है।
गुरु ग्रंथ साहिब में "आपे गुरु आपे चेला आपे ही दातारु" शब्द के तीन मुख्य पहलू हैं:

1. गुरु (आपे गुरु):
गुरु का अर्थ है आध्यात्मिक मार्गदर्शक या शिक्षक। अकाल पुरख स्वयं ही गुरु है, जो जीवों को आध्यात्मिक ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करता है। गुरु के रूप में, अकाल पुरख जीवों को अपने असली स्वरूप को समझने और आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है।

2. चेला (आपे चेला):
चेला का अर्थ है शिष्य या अनुयायी। अकाल पुरख स्वयं ही चेला है, जो अपने स्वयं के गुणों और स्वभाव को समझने के लिए प्रयासरत है। चेला के रूप में, अकाल पुरख जीवों को अपने स्वयं के गुणों और स्वभाव को समझने के लिए प्रेरित करता है।

3. दातारू (आपे ही दातारु):
दातारू का अर्थ है देने वाला या प्रदाता। अकाल पुरख स्वयं ही दातारू है, जो जीवों को सभी प्रकार की सामग्री और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है। दातारू के रूप में, अकाल पुरख जीवों को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रेरित करता है और उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करता है।
12॥9॥

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 10

श्लोक:
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
 मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥

भावार्थ:
यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण (स्वार्थ को त्यागकर तथा परमेश्वर को ही परम आश्रय और परम गति समझकर, निष्काम प्रेमभाव से सती-शिरोमणि, पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और शरीर द्वारा परमेश्वर के ही लिए यज्ञ, दान और तपादि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों के करने का नाम 'भगवदर्थ कर्म करने के परायण होना' है) हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा
 यह श्लोक भक्ति और कर्म के संबंध को स्पष्ट करता है। भगवान श्रीकृष्ण यह कह रहे हैं कि यदि कोई व्यक्ति भक्तियोग के लिए पूरी तरह समर्थ नहीं भी है, तो भी यदि वह मेरे लिए समर्पित होकर कर्म करता है, तो उसे पवित्रता और आत्मसिद्धि प्राप्त होगी। इस प्रकार, भक्ति और समर्पण के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को साध सकता है और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है।इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया है कि भक्ति का मार्ग सिर्फ साधना या नियमित अभ्यास तक ही सीमित नहीं है। बल्कि, भगवान के लिए किए गए कर्म भी उस व्यक्ति को उच्चतम उद्देश्य की ओर ले जाते हैं। यही इस श्लोक का प्रमुख संदेश है कि भक्ति और कर्म की सही दिशा में किया गया प्रयास भी फलदायी होता है।
 12॥10॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 11

श्लोक:
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
 सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌॥

भावार्थ:
यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में विस्तार देखना चाहिए) 
चलो पहले गीता के अध्याय 9 के श्लोक 27 में देखते है।
भगवद  गीता अध्याय: 9

भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 27

श्लोक:

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्‌।

 यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्‌॥

भावार्थ:

हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर
भगवान का यह नियम है कि जो मेरी शरण लेता है, मैं उसी प्रकार उसे शरण देता हूँ । जो भक्त अपनी वस्तु मुझे अर्पण करता है, मैं उसे अपनी वस्तु देता हूं। भक्त तो सीमित ही वस्तु देता है, पर मैं अनंत गुणा करके देता हूं। परन्तु जो अपना- तुम्हें ही मुझे देता है, मैं तुम्हें ही उसे देता हूं। वास्तव में मैंने अपने- तुम्हें संसारमात्रको दे रखा है , और सब कुछ करनेकी स्वतन्त्रता दे रखा है। यदि मनुष्य अपनी दी हुई स्वतन्त्रता को मेरा अर्पण कर देता है, तो मैं भी अपनी स्वतन्त्रता को उसका अर्पण कर देता हूँ। इसलिए यहां भगवान स्वतन्त्रताको अपने अर्पण करने के लिए अर्जुनसे कहते हैं।
इस का प्रत्यक्ष ज्ञान है कि किसान एक बीज बोता है भगवान उस एक को कई गुना बड़ा कर देते है।

अब इस पदके में संपूर्ण शारीरिक क्रियाएं भी ली जाती हैं अर्थात शरीरके लिए तू जो भोजन करता है, जल पीता है, कुपथ्य त्याग और पथ्य सेवन करता है, ओष-सेवन करता है, कपड़ा पहनना है, सर्दी-गर्मीसे शरीर की रक्षा करना है, स्वास्थ्य के लिए समय-सोता और जागता है, घूमना-फिरना है, शौच-स्नान करना है, आदि सभी कामो को मेरा अर्पण करना है फिर कर दें ना।

इसी प्रकार यज्ञ-संबन्धी सभी क्रियाएं होती हैं अर्थात् शाकल्य-सामग्री एकत्र करना, अग्नि समर्पण करना, मन्त्र समर्पण करना, आहुति देना आदि सभी शास्त्रीय क्रियाएं मेरे अर्पण कर दे।

अब तू जो कुछ देता है अर्थात् दस्तावेज़ी सेवाएँ करता है, अध्ययन की सहायता करता है, अध्ययन की आवश्यकता-विशेषता करता है, आदि जो कुछ शास्त्रीय क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।

तू जो कुछ तप करता है विषय-वस्तु से अपनी इन्द्रियोंका संयम करता है, अपनी कर्तव्या पालना करता है अनुपयुक्त-प्रतिकूल वैज्ञानिकों को सिद्धांतों का पालन करना और तीर्थ, व्रत, भजन-ध्यान, जप-कीर्तन, श्रवण-मनन, समाधि आदि जो कुछ भी पारमार्थिक क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। 
उच्च तीर्थ पद शास्त्रीय और पारमार्थिक कार्यका दूसरा विभाग है।
इसका सरल भाव है कि
हे भगवान! मैं अपने सभी कार्यों को आपको अर्पण करता हूं। जब मैं ऐसा करता हूं, तो मेरा 'मैं' और 'मेरा'पन समाप्त हो जाता है, और मुझे पूर्णता की प्राप्ति होती है। यह पूर्णता ऐसी है कि जिसमें कोई दुःख नहीं होता है, और जिसमें स्थित होने पर कोई भी दुःख मुझे प्रभावित नहीं कर सकता है।"

इस श्लोक में भगवान को अर्पण करने के महत्व को बताया गया है, और यह भी बताया गया है कि जब हम अपने कार्यों को भगवान को अर्पण करते हैं, तो हमें पूर्णता की प्राप्ति होती है।

चलो सांसारिक बंधन से मुक्ति का सरल उपाय है। प्रभु बच्चे को सद्बुद्धि दो की इस कठिन उपाय को करने पर आने वाली सभी अड़चनों को भी आप में अर्पण कर निश्चिंत हो कर बाकी जीवन जिए।

✍️सभी प्रकार के कर्म करते हुए हम ईश्वरप्रणय की भावना से रह सकते हैं। संपूर्ण गीता में इस पर बल दिया गया है कि केवल शारीरिक कर्म की आवश्यकता ईश्वर दर्पण की भावना है और यह एक ऐसा तथ्य है। जिसका अभ्यासे को विस्मरण हो जाता है।शरीर, मन,  बुद्धि के स्तर पर होने वाले विषय ग्रहण और उनकी प्रति हमारी प्रतिक्रिया के रूप में भी व्यवसाय हैं? 

उन सबको भक्ति से वंचित करें मुझे अर्पण करे। यह किसी भी प्रकार से मनुष्य के लिए पालन-पोषण करना बहुत कठिन है। एक ही आत्मा ,ईश्वर, गुरु ,और भक्त में और सर्वत्र राम रहते हुए हम अपने व्यावहारिक जीवन में सामान्य नाम और सिद्धांत के साथ व्यवहार करते हैं। हम जानते हैं कि इन लोगों के लिए आत्मसत्ता की आवश्यकता होती है। यदि हम अपने समग्र व्यवहार में इस आत्मतत्व का स्मरण रखते हैं तो वह जगत् के अधिष्ठान का ही स्मरण होगा। यदि किसी वस्त्र की दुकान में विभिन्न रूप  रंग हो।किसे सदा इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि वह समुद्र तट के सूती वस्त्रों का व्यापार कर रहे हैं। किसी भी तरह से व्यापार को समझना मुश्किल नहीं होगा। में देखा गया तो इस का स्मरण रखें कि उसके लिए अधिक सुरक्षित और प्रकार के फायदे हैं अन्यथा वह किसी कप की कीमत ऊनी प्रतिबंध के खाते से बहुत अधिक बता देता है या अपने माल को टाट के बोरे जैसे कि बहुमत में बेच देता है। यदि किसी स्वर्णकार को यह स्मरण-गृह की सलाह दी जाए कि वह सोने पर काम कर रहा है तो वह सलाह देता है कि उसके लाभ के लिए ही हैं। जैसे गहनों में सोने और कपडे में सूत हैं वैसे ही विश्व के सभी नाम और सिद्धांतों में आत्मा ही मूल तत्व हैं। जो भक्त अपने जीवन के सर्वांगीण व्यवहार में इस दिव्य तत्त्व का स्मरण रखता है वही पुरुष जीवन को आदर और सम्मान दे सकता है जो योग्य जीवन हैं। यह नियम है कि जीवन को जो तुम दोगे, तुम्हें जीवन से  वही पाओ गे। तुम हँसोगे तो जीवन हँसोगे और तुम खिलोगे तो जीवन भी खिलेगा उसके पास आत्मज्ञान से उत्पन्न आदर और सम्मान के साथ तो जीवन रक्षा में भी आदर और सम्मान प्राप्त होगा।समर्पण की भावना से सभी कर्मों को करने पर न केवल भगवान के प्रति हमारा प्रेम बढ़ता है। बल्कि आदर्श जीवन और दिव्य लक्ष्य के कारण हमारा भी जीवन पवित्र बन जाता है। गीता में अद्वितीय भाव और सतत आत्मानुसंधान पर विशेष बल दिया गया है। इस श्लोक में हम देख सकते हैं कि एक ऐसे उपाय का वर्णन किया गया है जिसके उपदेश से ही साधक को ईश्वर का अखंड स्मरण बना रहता है। इसके लिए जहां कहीं भी निर्जन सोसायटी वन या गुप्त गुफाओं में इसे रखने की आवश्यकता नहीं है तो हम अपने दैनिक कार्य क्षेत्र में ही कर सकते हैं। इस प्रकार का संकेत भावना का जीवन जीने से  लाभ जो अब कार्य कर रहे हैं लाभ हो या हानि मैनेजर बने भगवान ही जाने सारी टेंशन यह की।
9॥27॥
 12॥11॥से आगे
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 12

श्लोक:
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते।
 ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌॥

भावार्थ:
मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग (केवल भगवदर्थ कर्म करने वाले पुरुष का भगवान में प्रेम और श्रद्धा तथा भगवान का चिन्तन भी बना रहता है, इसलिए ध्यान से 'कर्मफल का त्याग' श्रेष्ठ कहा है) श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है
 इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने भक्ति और ध्यान के विभिन्न प्रकारों की तुलना की है। यहाँ पर ज्ञानयोग, ध्यानयोग, और कर्मफल त्याग की महत्वपूर्णता का वर्णन किया गया है।
ध्यान की साधना करने से कर्मफल का त्याग होता है। अर्थात् ध्यान करने वाले व्यक्ति को अपने कर्मों के परिणामों को त्यागने में सहायता मिलती है, जिससे शांति और संतोष की प्राप्ति होती है। त्याग का अर्थ है कि व्यक्ति अपने कर्मों के परिणामों से बंधा नहीं रहता, जिससे वह शांति और स्थिरता अनुभव करता है।
यह श्लोक हमें बताता है कि ज्ञान और ध्यान की साधना के माध्यम से कर्मों के परिणामों को त्यागकर शांति प्राप्त की जा सकती है। ज्ञान की साधना श्रेष्ठ है, और ध्यान द्वारा कर्मफल का त्याग करना अधिक प्रभावी है, जिससे अंततः शांति की प्राप्ति होती है।
अर्थात:
यहाँ क्रमवार विस्तार से समझाया गया है:

1. अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है:
अभ्यास का अर्थ है प्रयोग और अनुभव। जब हम किसी विषय का अध्ययन करते हैं और उसका प्रयोग करते हैं, तो हमें उस विषय का ज्ञान प्राप्त होता है। अभ्यास से ज्ञान प्राप्त करना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे हमें अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने में मदद मिलती है।

2. ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है:
जब हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो हमें परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान करने की प्रेरणा मिलती है। परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान करने से हमें अपने जीवन में शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है। यह ध्यान हमें अपने जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।

3. ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग:
जब हम परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान करते हैं, तो हमें अपने कर्मों के फल का त्याग करने की प्रेरणा मिलती है। कर्मों के फल का त्याग करने से हमें अपने जीवन में मुक्ति और शांति प्राप्त होती है। यह त्याग हमें अपने जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।
✍️ना दान से ,ना जप से, ना तप से, ना ध्यान से।मुक्ति मिलती है तो सिर्फ :"ज्ञान" से।
12॥12॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 13-14

श्लोक:
(भगवत्‌-प्राप्त पुरुषों के लक्षण) 
 अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
 निर्ममो निरहङ्‍कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
 संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।
 मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥

भावार्थ:
जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है- वह मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है
 
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः कुरुण एव च।

निर्ममो निर्हङकारः समदुःखसुखः क्षमि।।12.13।।
इसलीए प्रेमी ने सभी का त्याग कर दिया है ऐसे अक्षरोपासक यथार्थ ज्ञाननिष्ठा संतोंका जो साक्षात् मोक्षका कारणरूप अद्वैष्ठा सर्वभूतानाम् एक ही धर्म का समूह है उसका वर्णन स्टॉक भंडार इस उद्देश्य से भगवान कहते हैं--, जो सभी भूतों में द्वेषभाव से अनुपयोगी है अर्थात अपने दुःख देने वाले भी किसी जीव से द्वेष नहीं करते संपूर्ण भूतोंको आत्मारूपसे ही दृष्टिगोचर होता है। तथा जो मित्रता से युक्त है अर्थात् व्यक्तिगत साथ मित्र भावसे बढ़ता है और करुणामय है। दिनदुखियोंपर दया करना करुणा है वह युक्त है अभिप्राय यह है कि जो सब भूतोंको अभय देनेवाला संत है। तथा जो अनैतिक से अनुपयोगी और अनुपयुक्त है एवं सुखदुःख में सम है अर्थात जिनके सुख और दुख अंतःकरण में रागद्वेष उत्पन्न नहीं हो सकता। जो क्षमावान है अर्थात किसी के द्वारा गाली दी जाने पर या पीटे जानेपर भी जो विकार रहित ही रहता है।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।
जो सदा ही सन्तुष्ट है अर्थात देहके स्थिति कारणरूपदुग्धकी लाभ हानि जिसमें जो कुछ होता है वही ठीक है ऐसा आलम भाव हो गया है इस प्रकार जो गुण युक्त वस्तु के लाभ में और उसका नुकसान में सदा ही सन्तुष्ट रहता है। तथा जो सम्मिलितचित्त जीव बने स्वभाववाला और दृढ़ निश्चय वाला है अर्थात् आत्मतत्त्वके विषय में जिसका निश्चय स्थिर हो गया है। तथा जो मुझे अर्पण किये हुए मनबुद्धिवाला है अर्थात जिस संतिका संकल्प विकल्प वास्तविक मन और स्थिरात्मिका बुद्धि ये दोनों मुझमें समर्पित हैं--स्थापित हैं। जो ऐसा मेरा भक्त है वो मेरा प्यारा है। ज्ञानीको मैं अत्यंत प्रिय हूं और वह मुझे प्रिय है, इस प्रकार जो सप्तम अध्याय में बताया गया है उसका यहां विस्तार से वर्णन किया गया है।

अध्याय 7 में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों के गुणों का वर्णन किया है और बताया है कि कैसे वे अपने जीवन में भगवान की भक्ति को महत्व दे सकते हैं।

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि उनके भक्तों को निम्नलिखित गुणों का पालन करना चाहिए:

- मुझमें विश्वास रखना और मेरी शरण में आना
- मेरी भक्ति करना और मेरे नाम का जाप करना
- मेरी पूजा करना और मुझे अर्पण करना
- मेरे गुणों का चिंतन करना और मेरी महिमा का गान करना
- मेरी शरण में आने वाले सभी जीवों को समान रूप से देखना और उनके प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखना

इसके अलावा, भगवान श्रीकृष्ण ने इस अध्याय में बताया है कि उनके भक्तों को कैसे अपने जीवन में भगवान की भक्ति को महत्व देना चाहिए और कैसे वे अपने जीवन में भगवान की कृपा को प्राप्त कर सकते हैं।
॥13-14॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 15

श्लोक:
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
 हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥

भावार्थ:
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (दूसरे की उन्नति को देखकर संताप होने का नाम 'अमर्ष' है), भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुझको प्रिय है
 12॥15॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों की एक विशेषता का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों की क्रियाओं से प्रभावित नहीं होता और न ही दूसरों के द्वारा उत्पन्न कष्टों से परेशान होता है, वह भक्त भगवान को अत्यंत प्रिय होता है।इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति स्वयं को लोगों के कार्यों से विचलित नहीं होने देता, जो दूसरों के व्यवहार या घटनाओं से उत्तेजित नहीं होता।इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति दूसरों को उसके अपने कार्यों या व्यवहार से परेशान नहीं करता, यानी जो नकारात्मक प्रभाव दूसरों पर नहीं डालता।हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः" - इसका मतलब है कि जो व्यक्ति खुशी, क्रोध, भय या किसी भी प्रकार की भावनात्मक उथल-पुथल से मुक्त होता है। वह मानसिक रूप से शांत और संतुलित रहता है।
"स च मे प्रियः" - इसका अर्थ है कि ऐसा व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है।
इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह संकेत दे रहे हैं कि एक सच्चा भक्त वह होता है, जो आत्मिक शांति और संतुलन बनाए रखता है, और जो अपने आंतरिक और बाहरी वातावरण को संतुलित बनाए रखता है। ऐसा व्यक्ति भगवान के लिए विशेष रूप से प्रिय होता है, क्योंकि वह अनुकूल और सकारात्मक दृष्टिकोण से जीवन जीता है।
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 15
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 15 से आगे इसी अध्याय के श्लोक नंबर 16 की ओर बढ़ते है।
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 16

श्लोक:
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
 सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥

भावार्थ:
जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए) चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है- वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है
 चलो अब पहले गीता अध्याय 13 श्लोक 7 पर छलांग लगाते हैं ।
मूल श्लोकः
इच्छा द्वेषः सुखं दुखं संघातश्चेतनाधृतिः।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।13.7।।
इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात, आत्मशक्ति और धृति--इसमें पोषक तत्वसंहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।

अब जिन इच्छा आदिको वैशेशिकमतावलंबी आत्माके धर्म मानते हैं वे भी क्षेत्रके ही धर्म हैं आत्माके नहीं यह बात भगवान कहते हैं --, इच्छा -- जिस प्रकारके सुखदायक विषयका पहले उपभोग किया गया था फिर वैसा ही पदार्थ के होने पर प्राप्त होने वाला सुखका कारण समझकर मनुष्य उसे लेना चाहता है वह चाहत है नाम की चाहत वह अन्तःकरण का धर्म है और ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र है। तथा द्वितीय--जिस प्रकार के पदार्थको दुःखका कारण समझकर पहले अनुभव हुआ हो फिर एक ही जाति के पदार्थ के प्राप्त होने पर कौन सा मनुष्य द्वेष करता है उस भावका नाम क्या है वह भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। वही प्रकार सुख कौन सा उपयुक्त आशारूप और सात्विक है ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है तथा विपरीतरूप दुःख भी ज्ञेय होने के कारण क्षेत्र ही है। देह और इंद्रियोंका समूह संघ के सदस्य हैं। प्रकाशित हुई जो अन्तःकरणकी वृत्ति है जो अग्निसे कलश लोहपिण्डकी भाँति आत्मचैतन्यके आभासरूपसे व्याप्त है वह स्वयं भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। व्याकुल हुए शरीर और इन्द्रियादि किस आधार पर मिलते हैं? वह धृति भी ज्ञेय होने से ही क्षेत्र है। अंतःकरण के लिए समस्त धर्मों का संकेत करने के लिए यहां इच्छादि धर्मों का ग्रहण किया गया है। कौन सा कुछ कहा गया है उनके उपसंहार हैं--महत्तत्त्वदि अलवरसे सम्मिलित क्षेत्रका इसका स्वरूप संक्षेपसे कहा गया है। अर्थात् जिन समस्त क्षेत्रभेदोंका समूह में यह शरीर क्षेत्र ऐसा कहा गया है महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त भेदोंसे अलग-अलग उस क्षेत्र की व्याख्या कर दी गई। जो आगे कहे जानेवाले विशेष क्षेत्र से सम्बंधित है? जिस क्षेत्रज्ञ को प्रभावयुक्त जन लेने से (मनुष्य) अमृतरूप हो जाता है? भगवान स्वयं वाम आश्रम ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि, अन्य वचनों से विशेषों सहित।

संक्षेप में ऐसे समझें:

इस श्लोक का भावार्थ और व्याख्या निम्नलिखित है:

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने 
क्षेत्र (शरीर) 
क्षेत्रज्ञ (आत्मा) इन दोनों के बीच के संबंध को समझाने के लिए एक विस्तृत व्याख्या दी है।

श्लोक का पहला भाग कहता है:

इच्छा द्वेषः सुखं दुखं संघातश्चेतनाधृतिः

इसका अर्थ है:

इच्छा (कामना),
 द्वेष (घृणा), 
सुख (आनंद), 
दुख (पीड़ा), संघात (शरीर के अवयवों का संयोजन),
  चेतनाधृति (जीवन शक्ति) 
ये सभी क्षेत्र (शरीर) के गुण हैं।

श्लोक का दूसरा भाग कहता है:

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्

इसका अर्थ है:

यह क्षेत्र (शरीर) समग्र रूप से विकारों से युक्त है, जैसा कि ऊपर वर्णित है।

इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण ने 
क्षेत्र (शरीर) के गुणों और विकारों का वर्णन किया है, जो क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के साथ जुड़े हुए हैं। यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच का संबंध कैसे काम करता है।

जिनमें इनके गुण अवगुण है।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के गुण और अवगुण भगवद गीता में वर्णित हैं। यहाँ उनका विवरण दिया गया है:

क्षेत्र (शरीर) के गुण:

1. इच्छा (कामना)
2. द्वेष (घृणा)
3. सुख (आनंद)
4. दुख (पीड़ा)
5. संघात (शरीर के अवयवों का संयोजन)
6. चेतनाधृति (जीवन शक्ति)
7. विकार (दोष)
8. अविद्या (अज्ञानता)

क्षेत्र (शरीर) के अवगुण:

1. मोह (माया का प्रभाव)
2. अज्ञानता (अविद्या)
3. द्वेष (घृणा)
4. क्रोध (क्रोध)
5. लोभ (लालच)
6. मादकता (नशा)
7. अहंकार (अहंकार)

क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के गुण:

1. ज्ञान (ज्ञान)
2. विज्ञान (विशेष ज्ञान)
3. असंगता (माया से अलगाव)
4. शुद्धता (पवित्रता)
5. निर्लेपता (माया से अलगाव)
6. निर्विकारिता (विकारों से मुक्ति)
7. निराकारिता (आकार से मुक्ति)

क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के अवगुण:

क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के अवगुण नहीं होते हैं, क्योंकि वह माया से अलग और विकारों से मुक्त होता है।

12॥16॥

भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 17

श्लोक:
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति।
 शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥

भावार्थ:
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है।

व्याख्या:
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में उन भक्तों की विशेषताएँ बताते हैं, जो सच्चे भक्त होते हैं। वे भक्त कौन होते हैं, जो भगवान के अनुसार प्रिय होते हैं, यह श्लोक उसकी व्याख्या करता है

"यो न हृष्यति" – ऐसा भक्त जो खुशी और उत्तेजना के बाहरी प्रभाव से प्रभावित नहीं होता। वह आत्म-संतोषी रहता है और सुख-स्वाद का अनुभव बिना किसी अशांति या अतिरेक के करता है।

"न द्वेष्टि" – ऐसा भक्त जो नफरत और द्वेष से दूर रहता है। किसी से द्वेष रखने की बजाय, वह सबको समान दृष्टि से देखता है और हर स्थिति को सकारात्मक तरीके से लेता है।

"न शोचति" – ऐसा भक्त जो शोक और चिंता से मुक्त रहता है। वह जीवन की कठिनाइयों और समस्याओं को धैर्य और शांति के साथ स्वीकार करता है।

"न काङ्क्षति" – ऐसा भक्त जो किसी भी प्रकार की आकांक्षा या इच्छाओं के पीछे नहीं दौड़ता। उसकी इच्छाएँ केवल ईश्वर की भक्ति और सेवा में सीमित होती हैं, न कि भौतिक लाभ में।
 
"श्रुभाश्रुभपरित्यागी" – ऐसा भक्त जो सुख और दुःख दोनों को समान रूप से देखता है। वह सुख और दुःख के भेद को समझता है और दोनों के प्रति एक जैसा दृष्टिकोण रखता है।

इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, वह भक्त जो इन गुणों को अपनाता है और सच्चे प्रेम और भक्ति से भगवान की सेवा करता है, वह भगवान के लिए अत्यंत प्रिय होता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि भक्ति में सच्ची साधना और निरपेक्षता के बिना कोई भी व्यक्ति ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति नहीं कर सकता।

✍️मुख्य विकार चार हैं --
 (1) राग,
 (2) द्वेष, 
(3) हर्ष 
(4) शोक 
 सिद्ध भक्तों में ये चारों ओर कोई विकार नहीं होता। उनका यह अनुभव होता है कि संसार का प्रतिक्षण वियोग हो रहा है और भगवान से कभी वियोग होता ही नहीं। इसी लिए वह अविनाश कहे जाते हैं 
दुनिया के साथ कभी संयोग नहीं था,ना है , आगे रहेगा भी नहीं और रह भी नहीं सकता। 
वस्तुतः संसार की कोई, स्वतन्त्र सत्ता तो है ही नहीं 

इस वास्तविकता का अनुभव कर लेने के बाद (जायदाद का कोई सम्बन्ध नही रहता है) भक्त का केवल भगवान के साथ अपने नित्यसिद्ध सम्बन्ध का अनुभव कर अटलरूपसे रहता है। इस कारण उनका अंतःकरण राग-द्वेषादि क्रोध से सर्वथा मुक्त होता है। भगवान् का साक्षात्कार होने पर ये विकार सर्वथा मिट जाते हैं।
साधन-विज्ञान में भी साधक ज्यों-ज्यों साधन आगे बढ़ते हैं, त्यों-ही-त्यों में राग-द्वेषादि कम होते चले जाते हैं। जो कम होने वाला होता है,वास्तव में वह मिटने वाला भी होता है। मूलतः जब साधनकुशलता में ही विकार कम होते हैं, तब सहजता  से ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सिद्धावस्थामें भक्तमें ये विकार नहीं रहता, पूर्णतया मिट जाता है।
  
हर्ष और शोक:
 
दोनों राग-द्वेषके ही परिणाम हैं। जो प्रति राग होता है, उसका संयोग जिससे और प्रति द्वेष से होती है, उसका वियोगसे 'हर्ष' होता है। इसके विपरीत प्रति राग होता है, उसके वियोग या वियोगकी अश्क से और जिसके प्रति द्वेष होता है, उसके संयोग या संयोग से अश्क से 'शोक' होता है। सिद्ध भक्त में राग-द्वेष्का अत्यंतभाव होने से स्वतः एक साम्य सिद्धांत रहता है। इस लिए वह घटकों से सर्वथा अनुपयोगी होता है।
 जैसे रात के समय अंधकार में दीपक जलने की चाहत होती है; दीपक जलाने से हर्ष होता है, दीपक बर्तनवाले के प्रति द्वेष या क्रोध होता है और दीपक कैसे जले -- ऐसी चिंता होती है। रात होने से ये चारों बातें होती हैं। लेकिन मध्याह्नका सूर्य तपता हो तो दीपक जलाए जाने की इच्छा नहीं होती, दीपक जलाने से हर्ष नहीं होता, दीपक सितारे के प्रति द्वेष या क्रोध नहीं होता और (अंधेरा न होने से) प्रकाश के अभाव की चिंता भी नहीं होती। इसी प्रकार भगवान से विमुख और संसार के सम्मुख होने से शरीर निर्वाह और सुखके लिए उपयुक्त पदार्थ, परिस्थिति आदि के मिलनकी इच्छा होती है, इनमें से प्रत्येक मिलन पर हर्ष होता है; प्रामाणिक में बाधा व्यक्तित्ववालेके प्रति द्वेष या क्रोध होता है; और इनसे न मुलाकात पर 'कैसे मिलें' ऐसी चिंता होती है। परंतु (मध्याह्नके सूर्य की तरह) भगवत्प्राप्ति हो गई है, इसमें ये विकार कभी नहीं रहते। वह पूरा काम हो जाता है। मूलतः तब दुनिया की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती।
भक्ति, अकर्म और फलेच्छा से अनुपयुक्त ही शुभ कर्म करने के कारण भक्त के कर्म 'अकर्म' हो जाते हैं।
 इसलिए भक्त को शुभ कर्मों वाला भी कहा गया है। राग-द्वेष सर्वथा अभाव होने के कारण अशुभ कर्म होते ही नहीं। अशुभ कर्मों में इच्छा, मैत्री, भक्ति ही प्रमुख कारण होती है, और भक्त होने में इस की सर्वथा कमी होती है। इस लिए अशुभ कर्मों का भी उल्लेख किया गया है। भक्त शुभ-कर्मों से तो राग नहीं करता और अशुभ-कर्मोंसे द्वेष नहीं करता। वह स्वभावतः शास्त्रविहित शुभ कर्मों का आचरण और अशुभ (निषिद्ध एवं काम्य) कर्मों का त्यागी होता है, राग-द्वेष अंधकार नहीं। राग-द्वेषका सर्वथा त्याग करने वाला ही सच्चा त्यागी है।
 मनुष्य को कर्म नहीं छोड़ते, प्रत्युत् कर्मों में राग-द्वेष ही छोड़ते हैं। भक्त के संपूर्ण कर्म राग-द्वेषरहित होते हैं, इसलिए वह शुभाशुभ संपूर्ण कर्मों का परित्यागी है।

(अब आगे के दो श्लोकों में सिद्ध भक्त के दसवें दशक वाला पंचवाँ और अंतिम प्रसंग कहा गया है।)
12॥17॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 18

श्लोक:
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
 शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्‍गविवर्जितः॥

भावार्थ:
जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है
 जो शत्रु और मित्र में सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दु:ख में सम है एवं आस्तिकसे अयोग्य है, और जो निन्दास्तुतिको समान बुद्धिवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकार भी (शरीरका)। निर्वासन (निर्वासन) में (निवास में) निवास स्थान और शरीर में ममता-आसक्तिसे अनुपयोगी और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान मनुष्य मुझे प्रिय है।
12॥18॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 19

श्लोक:
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌।
 अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥

भावार्थ:
जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है
 
जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है।
श्री कृष्ण बताते हैं कि एक भक्त जो निंदा और स्तुति दोनों को समान रूप से स्वीकार करता है, मौन रहने वाला, संतुष्ट रहने वाला, और जो स्थिर मति (धारणा) वाला होता है, वह भगवान को प्रिय होता है। इस श्लोक का आशय यह है कि ऐसा व्यक्ति जो अपने मन और शरीर को हर परिस्थिति में स्थिर रखता है, चाहे उसे निंदा मिले या प्रशंसा, और जो किसी भी बाहरी प्रभाव से प्रभावित नहीं होता, वह सच्चे भक्त का आदर्श है। ऐसे व्यक्ति को भगवान अत्यंत प्रिय मानते हैं।
सार: 
ये दोनों ही श्लोक भक्तियोग के गहरे और महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सच्चा भक्त वह है जो सभी परिस्थितियों में संतुलित रहता है, मान और अपमान, सुख और दुःख में समान दृष्टिकोण रखता है। ऐसे भक्त की मानसिक स्थिरता और अपरिग्रह उसे भगवान के निकट ले जाते हैं।
12॥19॥
भगवद  गीता अध्याय: 12
श्लोक 20

श्लोक:
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
 श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥

भावार्थ:
परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम 'श्रद्धा' है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं।
 
हिंदू धर्म ही नहीं सभी धर्मो का मुख्य उद्देश्य आत्मसाक्षात्कार करना है, जिससे हम अपने जीवन को सही दिशा में आगे बढ़ा सकें। इसके लिए हमें अपने व्यक्तित्व के सभी पहलुओं - शारीरिक, मानसिक और विरासत - को समझना और उन्हें अपने जीवन में लागू करना होगा।

केवल शास्त्रों का अध्ययन करना या उनका पाठ करना पर्याप्त नहीं है। हमें अपने जीवन में शास्त्रीय ज्ञान को प्रमाणित करना होगा और स्वयं को पूर्ण पुरुष बनाना होगा।

भगवान कहते हैं कि इसके लिए हमें श्रद्धावान होना चाहिए, जिसका अर्थ है स्वयं के अनुभव के द्वारा शास्त्र प्रतिपादित आत्मज्ञान को सिद्ध करने की क्षमता। ऐसे भक्त भगवान को अतिशय प्रिय हैं।

यह भाव हमें अपने जीवन में आत्मसाक्षात्कार के महत्व को समझने और शास्त्रीय ज्ञान को प्रमाणित करने के लिए प्रेरित करता है।

निष्कर्ष: इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि भगवान को वही भक्त प्रिय हैं, जो पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी बताई हुई शिक्षाओं का पालन करते हैं और अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य भगवान की भक्ति को मानते हैं।
12॥20॥ 
 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः
 ॥12॥

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