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बुधवार, 31 जनवरी 2024

राजेश विवेक उपाध्याए

#14jan
#31jan 
राजेश विवेक उपाध्याय 

🎂31 जनवरी 1949 - 

⚰️14 जनवरी 2016

माता-पिता: राज बहादुर उपाध्याय, प्रेम कुमारी उपाध्याय
बच्चे: वैभव उपाध्याय
 एक भारतीय अभिनेता थे।
उन्हें हिंदी फिल्म दर्शकों के बीच लगान (2001) में ज्योतिषी गुरन और स्वदेस (2004) में पोस्टमास्टर निवारण के रूप में उनकी भूमिका के लिए जाना जाता है।
उन्होंने लोकप्रिय भारतीय श्रृंखला महाभारत में हिंदू महाकाव्य महाभारत के लेखक व्यास की भूमिका भी निभाई थी।
उन्होंने शुरुआत में वीराना (1988) और जोशीले (1989) जैसी फिल्मों से खलनायक के रूप में अपनी पहचान बनाई, अक्सर एक गुर्गे की भूमिका निभाई, और बाद में हास्य और सहायक पात्रों को चित्रित करना शुरू कर दिया।
उनके अन्य क्रेडिट में मुझसे शादी करोगी, व्हाट्स योर राशी शामिल हैं? और बंटी और बबली।
राजेश को ऐतिहासिक टीवी श्रृंखला भारत एक खोज और टीवी धारावाहिक अघोरी में उनकी भूमिकाओं के लिए भी जाना जाता है।
उन्हें दो बेटों के पिता के रूप में कैडबरी 5 स्टार की एक विज्ञापन श्रृंखला के लिए चुना गया था।
📽️

2008 जोधा अकबर 
2006 भूत अंकल 
2005 वादा 
2005 बंटी और बबली 
2004 अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों 
2004 हत्या 
2004 स्वदेश 
2004 असंभव 
2003 दिल का रिश्ता 
2001 लगान 
1998 परदेसी बाबू 
1997 लोहा 
1992 नागिन और लुटेरे 
1992 पारसमणी 
1991 गंगा जमुना की ललकार 
1991 विषकन्या 
1989 जोशीले 
1989 त्रिदेव 
1988 वीराना

सुरैया

#15jun 
#31jan 

सुरैया जमाल शेख़
प्रसिद्ध नाम सुरैया

🎂जन्म 15 जून, 1929
जन्म भूमि गुजरांवाला, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान)
⚰️मृत्यु 31 जनवरी, 2004
मृत्यु स्थान मुम्बई, भारत

पति/पत्नी अविवाहित
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनय और गायन
मुख्य फ़िल्में 'मिर्ज़ा ग़ालिब', 'खिलाड़ी', 'जीत', 'विद्या', 'दो सितारे' आदि।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी हिंदी फ़िल्मों में अपार लोकप्रियता हासिल करने वाली सुरैया उस पीढ़ी की आख़िरी कड़ी में से एक थीं जिन्हें अभिनय के साथ ही पार्श्व गायन में भी निपुणता हासिल थी।

, हिन्दी फ़िल्मों की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री और गायिका थीं। 40वें और 50वें दशक में इन्होंने हिन्दी सिनेमा में अपना योगदान दिया। अदाओं में नज़ाकत, गायकी में नफ़ासत की मलिका सुरैया जमाल शेख़ ने अपने हुस्न और हुनर से हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक नई इबारत लिखी। वो पास रहें या दूर रहें, नुक़्ताचीं है ग़मे दिल, और दिल ए नादां तुझे हुआ क्या है जैसे गीत सुनकर आज भी जहन में सुरैया की तस्वीर उभर आती है।
जीवन परिचय
15 जून, 1929 को गुजरांवाला, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मी सुरैया अपने माता पिता की इकलौती संतान थीं। नाज़ों से पली सुरैया ने हालांकि संगीत की शिक्षा नहीं ली थी लेकिन आगे चलकर उनकी पहचान एक बेहतरीन अदाकारा के साथ एक अच्छी गायिका के रूप में भी बनी। सुरैया ने अपने अभिनय और गायकी से हर कदम पर खुद को साबित किया है।

फ़िल्मी कैरियर
सुरैया के फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बड़े रोचक तरीक़े से हुई। गुजरे ज़माने के मशहूर खलनायक जहूर सुरैया के चाचा थे और उनकी वजह से 1937 में उन्हें फ़िल्म 'उसने क्या सोचा' में पहली बार बाल कलाकार के रूप में भूमिका मिली। 1941 में स्कूल की छुट्टियों के दौरान वह मोहन स्टूडियो में फ़िल्म 'ताजमहल' की शूटिंग देखने गईं तो निर्देशक नानूभाई वकील की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने सुरैया को एक ही नज़र में मुमताज़ महल के बचपन के रोल के लिए चुन लिया। इसी तरह संगीतकार नौशाद ने भी जब पहली बार ऑल इंडिया रेडियो पर सुरैया की आवाज़ सुनी और उन्हें फ़िल्म 'शारदा' में गवाया। 1947 में भारत की आज़ादी के बाद नूरजहाँ और खुर्शीद बानो ने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली, लेकिन सुरैया यहीं रहीं।

देवानंद और सुरैया
एक वक़्त था, जब रोमांटिक हीरो देव आनंद सुरैया के दीवाने हुआ करते थे। लेकिन अंतत: यह जोड़ी वास्तविक जीवन में जोड़ी नहीं पाई। वजह थी सुरैया की दादी, जिन्हें देव साहब पसंद नहीं थे। मगर सुरैया ने भी अपने जीवन में देव साहब की जगह किसी और को नहीं आने दिया। ताउम्र उन्होंने शादी नहीं की और मुंबई के मरीनलाइन में स्थित अपने फ्लैट में अकेले ही ज़िंदगी जीती रहीं। देव आनंद के साथ उनकी फ़िल्में 'जीत' (1949) और 'दो सितारे' (1951) ख़ास रहीं। ये फ़िल्में इसलिए भी यादगार रहीं क्योंकि फ़िल्म 'जीत' के सेट पर ही देव आनंद ने सुरैया से अपने प्रेम का इजहार किया था, और 'दो सितारे' इस जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म थी। खुद देव आनंद ने अपनी आत्मकथा 'रोमांसिंग विद लाइफ' में सुरैया के साथ अपने रिश्ते की बात कबूली है। वह लिखते हैं कि सुरैया की आँखें बहुत ख़ूबसूरत थीं। वह बड़ी गायिका भी थीं। हां, मैंने उनसे प्यार किया था। इसे मैं अपने जीवन का पहला मासूम प्यार कहना चाहूंगा।

प्रमुख फ़िल्में
शमा (1961)
मिर्ज़ा ग़ालिब (1954)
दो सितारे (1951)
खिलाड़ी (1950)
सनम (1951)
कमल के फूल (1950)
शायर (1949)
जीत (1949)
विद्या (1948)
अनमोल घड़ी (1946)
हमारी बात (1943)
गायन
अभिनय के अलावा सुरैया ने कई यादगार गीत गाए, जो अब भी काफ़ी लोकप्रिय है। इन गीतों में, सोचा था क्या मैं दिल में दर्द बसा लाई, तेरे नैनों ने चोरी किया, ओ दूर जाने वाले, वो पास रहे या दूर रहे, तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी, मुरली वाले मुरली बजा आदि शामिल हैं।

बुधवार, 14 जून 2023

सुरैया

सुरैया
*🎂सुरैया का जन्म 15 जून, 1929 को गुजरांवाला, पंजाब में हुआ था*

*⚰️31 जनवरी, 2004 को मुंबई, भारत में सुरैया की मृत्यु हो गई ।*
वे अपने माता पिता की इकलौती संतान थीं। उनका पूरा नाम सुरैया जमाल शेख़ था। सुरैया नाज़ों से पली सुरैया ने हालांकि संगीत की शिक्षा नहीं ली थी लेकिन आगे चलकर उनकी पहचान एक बेहतरीन अदाकारा के साथ एक अच्छी गायिका के रूप में भी बनी। सुरैया ने अपने अभिनय और गायकी से हर कदम पर खुद को साबित किया है।
सुरैया के फ़िल्मी करियर की शुरुआत बड़े रोचक तरीक़े के साथ हुई। मशहूर खलनायक जहूर जी सुरैया के चाचा थे और उनकी वजह से 1937 में उन्हें फ़िल्म ‘उसने क्या सोचा’ में पहली बार बाल कलाकार के रूप में अभिनय करने की मौका मिला। 1941 में स्कूल की छुट्टियों के दौरान वे मोहन स्टूडियो में फ़िल्म ‘ताजमहल’ की शूटिंग देखने गईं तो निर्देशक नानूभाई वकील की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने सुरैया को एक ही नज़र में मुमताज़ महल के बचपन के रोल के लिए चुन लिया। इसी तरह संगीतकार नौशाद ने भी जब पहली बार ऑल इंडिया रेडियो पर सुरैया की आवाज़ सुनी और उन्हें फ़िल्म ‘शारदा’ में गवाया। 1947 में भारत की आज़ादी के बाद नूरजहाँ और खुर्शीद बानो ने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली, लेकिन सुरैया यहीं रहीं।
एक वक़्त था, जब रोमांटिक हीरो देव आनंद सुरैया के दीवाने हुआ करते थे। लेकिन आखिर में भी यह जोड़ी वास्तविक जीवन में जोड़ी नहीं पाई। क्योंकि सुरैया की दादी देव साहब पसंद नहीं करती थी। लेकिन सुरैया ने भी अपने जीवन में देव साहब की जगह किसी और को नहीं आने दिया। ताउम्र उन्होंने शादी नहीं की और मुंबई के मरीनलाइन में स्थित अपने फ्लैट में अकेले ही ज़िंदगी व्यतीत करती रही। देव आनंद के साथ उनकी फ़िल्में ‘जीत’ (1949) और ‘दो सितारे’ (1951) काफी प्र्सिध रही । ये फ़िल्में इसलिए भी यादों में ताजा रहीं क्योंकि फ़िल्म ‘जीत’ के सेट पर ही देव आनंद ने सुरैया से अपने प्यार का इजहार किया था, और ‘दो सितारे’उन दोनों की आख़िरी फ़िल्म थी। खुद देव आनंद ने अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ में सुरैया के साथ अपने रिश्ते की बात कबूली है। वह लिखते हैं कि सुरैया की आंखें बहुत ख़ूबसूरत थीं। वे इसके साथ ही एक बड़ी गायिका भी थीं। हां, मैंने उनसे प्यार किया था। इसे मैं अपने जीवन का पहला मासूम प्यार कहना चाहूंगा।
अभिनय के अतिरिक्त सुरैया ने कई यादगार गीत भी गाए, जो अब भी काफ़ी लोकप्रिय है। इन गीतों में, सोचा था क्या मैं दिल में दर्द बसा लाई, तेरे नैनों ने चोरी किया, ओ दूर जाने वाले, वो पास रहे या दूर रहे, तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी, मुरली वाले मुरली बजा आदि शामिल हैं।
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
1948 से 1951 तक केवल तीन साल के दौरान सुरैया ही ऐसी महिला कलाकार थीं, जिन्हें बॉलीवुड में सर्वाधिक पारिश्रमिक दिया जाता था।
हिन्दी फ़िल्मों में 40 से 50 का दशक सुरैया के नाम कहा जा सकता है। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी एक झलक पाने के लिए उनके प्रशंसक मुंबई में उनके घर के सामने घंटों खड़े रहते थे और यातायात जाम हो जाता था।
‘जीत’ फ़िल्म के सेट पर देव आनंद ने सुरैया से अपने प्यार का इजहार किया और सुरैया को तीन हज़ार रुपयों की हीरे की अंगूठी दी।
हिंदी फ़िल्मों में अपार लोकप्रियता हासिल करने वाली सुरैया उस पीढ़ी की आख़िरी कड़ी में से एक थीं जिन्हें अभिनय के साथ ही पार्श्व गायन में भी निपुणता हासिल की थी और इस वजह से उन्हें अपनी समकालीन अभिनेत्रियों से बढ़त मिली।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी सुरैया की महानता के बारे में कहा था कि उन्होंने ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ की शायरी को आवाज़ देकर उनकी आत्मा को अमर बना दिया।
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प्रमुख फिल्में

1961 में ‘शमा’
 1954 में ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’
1951 में ‘दो सितारे’
1950 में ‘खिलाड़ी’
1951 में ‘सनम’
1950 में ‘कमल के फूल’
1940 में ‘शायर’
1949 में ‘जीत’
1948  में ‘विद्या’
1946 में ‘अनमोल घड़ी’
1943 में ‘हमारी बात

31 जनवरी, 2004 को मुंबई, भारत में सुरैया की मृत्यु हो गई ।

भारत ईरान संबंध

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