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मंगलवार, 16 जनवरी 2024

अक्कीनेनी लक्ष्मी वारा प्रसाद रावप्रसिद्ध नाम एल. वी. प्रसाद🎂जन्म 17 जनवरी, 1908जन्म भूमि इलुरु तालुका, आन्ध्र प्रदेश⚰️मृत्यु 22 जून, 1994

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अक्कीनेनी लक्ष्मी वारा प्रसाद राव
प्रसिद्ध नाम एल. वी. प्रसाद

🎂जन्म 17 जनवरी, 1908
जन्म भूमि इलुरु तालुका, आन्ध्र प्रदेश
⚰️मृत्यु 22 जून, 1994

अभिभावक अक्कीनेनी श्रीरामुलु और बासवम्मा
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्माता-निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'आलम आरा', 'कालीदास', 'भक्त प्रह्लाद', 'हमराही', 'खिलौना', 'मेरा घर मेरे बच्चे', 'विदाई', 'एक दूजे के लिए', 'शारदा' और 'छोटी बहन' आदि।
पुरस्कार-उपाधि 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' (1982), 'फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड'
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी एल. वी. प्रसाद की फ़िल्म 'छोटी बहन' में लता मंगेशकर द्वारा गाया गया का गीत "भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना" बेहद लोकप्रिय हुआ था।
एल. वी. प्रसाद का जन्म 17 जनवरी, 1908 को आन्ध्र प्रदेश के इलुरु तालुका में एक किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम अक्कीनेनी श्रीरामुलु और माता बासवम्मा थीं। एल. वी. प्रसाद का लालन-पालन बहुत ही लाड़-प्यार के साथ हुआ था। वे प्रारम्भ से ही बहुत बुद्धिमान थे, किंतु उनका पढ़ाई में ध्यान बिल्कुल भी नहीं लगता था। कम उम्र में ही वे नाटकों और नृत्य मंडलियों की ओर आकर्षित हो गए थे। इन्हीं सपनों को लेकर वे एक दिन घर छोड़कर मुंबई चले आये। लेकिन उनका ये सफर आसान नहीं रहा और उन्हें तमाम तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ा। दृढ़ निश्चयी एल. वी. प्रसाद ने हार नहीं मानी और अंतत: सफलता ने उनके कदम चूमे।

फ़िल्मी शुरुआत
एल. वी. प्रसाद ने भारत की तीन भाषाओं की पहली बोलती फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने वर्ष 1931 में प्रदर्शित आर्देशिर ईरानी की फ़िल्म 'आलम आरा' के अतिरिक्त 'कालिदास' और 'भक्त प्रह्लाद' में काम किया। 'आलम आरा' जहाँ हिन्दी की पहली बोलती फ़िल्म थी, वहीं 'कालिदास' पहली तमिल भाषा की बोलती फ़िल्म थी और 'भक्त प्रह्लाद' पहली तेलुगु बोलती फ़िल्म थी।

प्रसिद्ध कलाकारों के साथ कार्य

एल. वी. प्रसाद ने हिन्दी भाषा में कई चर्चित फ़िल्में बनाईं। इन फ़िल्मों में 'शारदा', 'छोटी बहन', 'बेटी बेटे', 'दादी माँ', 'शादी के बाद', 'हमराही', 'मिलन', 'राजा और रंक', 'खिलौना', 'एक दूजे के लिए' आदि शामिल हैं। उनकी फ़िल्में प्राय: सामाजिक उद्देश्यों के साथ स्वस्थ मनोरंजन पर केंद्रित हुआ करती थीं। उन्होंने प्रसिद्ध कलाकारों राज कपूर, मीना कुमारी, संजीव कुमार, कमल हासन, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त, अशोक कुमार, शत्रुघ्न सिन्हा, शशि कपूर, प्राण, मुमताज और राखी जैसे बड़े सितारों के साथ काम किया।

महमूद की हास्य भूमिका
वर्ष 1961 में एल. वी. प्रसाद की फ़िल्म 'ससुराल' से अभिनेता महमूद पूरी तरह कॉमेडियन बन गए। वे अब अधिकांश फ़िल्मों में हास्य भूमिका ही निभाने लगे थे। राजेंद्र कुमार और वी. सरोजा देवी अभिनीत इस फ़िल्म में उनके अपोजिट शुभा खोटे थीं। शुभा खोटे के साथ महमूद की जोड़ी बहुत हिट हुई। यह जोड़ी बाद में फ़िल्म 'दिल तेरा दीवाना', 'गोदान', 'हमराही', 'गृहस्थी', 'भरोसा', 'जिद्दी' और 'लव इन टोकियो' जैसी अनेक फ़िल्मों में भी आई।

फ़िल्म 'छोटी बहन'
निर्माता एल. वी. प्रसाद की वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'छोटी बहन' संभवत: पहली फ़िल्म थी, जिसमें भाई और बहन के प्यार भरे अटूट रिश्ते को रूपहले परदे पर दिखाया गया था। इस फ़िल्म में बलराज साहनी ने बड़े भाई और अभिनेत्री नन्दा ने छोटी बहन की भूमिका निभायी थी। इस फ़िल्म में शैलेन्द्र का लिखा और लता मंगेशकर द्वारा गाया का गीत "भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना" बेहद लोकप्रिय हुआ था। रक्षा बंधन के गीतों में इस गीत का विशिष्ट स्थान आज भी बरकरार है। इसके बाद निर्माता-निर्देशक ए. भीम सिंह ने भाई-बहन के रिश्ते पर आधारित दो और फ़िल्में 'राखी' और 'भाई-बहन' बनायी। वर्ष 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म 'राखी' में अशोक कुमार और वहीदा रहमान ने भाई-बहन की भूमिका निभायी थी।

पुरस्कार व सम्मान
जीवन के अंतिम दौर तक सार्वजनिक रूप से सक्रिय रहे एल. वी. प्रसाद को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया था। उन्हें फ़िल्मों में विशेष योगदान के लिए देश का सर्वोच्च सम्मान "दादा साहब फाल्के पुरस्कार" वर्ष 1982 में प्रदान किया गया था। इसके अतिरिक्त फ़िल्म 'खिलौना' के लिए उन्हें 'फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड' भी दिया गया।

निधन
भारतीय सिनेमा में विशिष्ट योगदान देने वाले एल. वी. प्रसाद का निधन 22 जून, 1994 हुआ। प्रसाद जी ऐसे फ़िल्मकार के रूप में प्रसिद्ध थे, जो एक ही साथ कई विभिन्न भाषाओं में फ़िल्म बनाते रहे। उनकी फ़िल्मों में जहाँ कहानी और संवाद पर विशेष तौर पर काम किया जाता था, वहीं संगीत पक्ष पर भी काफ़ी जोर दिया जाता था। उनकी फ़िल्मों के कई गीत अब भी काफ़ी लोकप्रिय हैं।

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एल. वी. प्रसाद ने एक निर्माता-निर्देशक होने के साथ-साथ कई फ़िल्मों में बतौर अभिनेता भी कार्य किया था। कुछ फ़िल्मों के नाम निम्नलिखित हैं-

बतौर अभिनेता

आलम आरा 1931 
भक्त प्रह्लाद 1931
कालीदास 1931 
सीता स्वयंवर 1933
बोंडम पेल्ली 1940 
चडुवुकुन्ना भार्या 1940
राजा पारवई 1982 

बतौर निर्देशक

ससुराल 1961 
हमराही 1963
मिलन 1967 
राजा और रंक 1968
खिलौना 1970 
उधार का सिन्दूर 1976
ये कैसा इंसाफ 1980 
एक दूजे के लिए 1981
मेरा घर मेरे बच्चे 1985 
स्वाती 1986
बिदाई 1990 
अर्चना 1993
नागपंचमी 1994
 सन्ध्याधरा 1994
मयर कथा 1996 
सुनापुआ 1996

बतौर निर्माता और निर्देशक

शारदा 1957 
छोटी बहन 1957
बेटी बेटे 1964
 दादी माँ 1966
जीने की राह 1969 
शादी के बाद 1972
बिदाई 1974
 जय विजय 1977

गुरुवार, 22 जून 2023

वी बलसारा

लगभग भुला दिये गये गुमनाम संगीतकाऱ वी बलसारा के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
*🎂जन्म 22 जून*
*⚰️मृत्यु 24मार्च*
वी बलसारा, जो वाद्य आर्केस्ट्रा के जादूगर थे, ने अपने कैरियर के दौरान 32 बंगाली फिल्मों और 12 हिंदी फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया था उन्होंने 200 से  अधिक एल्बम रिलीज किये हैं उन्हें पियानो, यूनीवॉक्स और मेलोडिका सहित संगीत वाद्ययंत्र में महारत हासिल थी

संगीत की दुनिया में वी बलसारा के नाम से मशहूर विस्टास अर्देशिर बलसारा का जन्म 22 जून, 1922 को बॉम्बे में एक गुजराती भाषी पारसी  परिवार में हुआ था।  बचपन से ही उनका झुकाव पश्चिमी संगीत की ओर था।

उनके फिल्मी संगीत कैरियर की शुरुआत हिंदी फिल्म बादल (1942) से हुई, जिसमें उन्होंने संगीत निर्देशक उस्ताद मुस्ताक हुसैन की सहायता की।  बाद में उन्होंने मास्टर गुलाम हैदर, और खेमचंद प्रकाश की सहायता की।  उनकी पहली स्वतंत्र असाइनमेंट फिल्म सर्कस गर्ल (1943) थी जिसमें उन्होंने एक अन्य संगीत निर्देशक वसंत कुमार नायडू के साथ संगीत की रचना की थी।  कुल मिलाकर, वह लगभग एक दर्जन हिंदी फिल्मों के संगीत निर्देशक थे, जिनमें से अधिकांश 1940 और 1950 के दशक की शुरुआत में रिलीज़ हुई थीं।  1943 में 'सर्कस गर्ल' के अतिरिक्त ओ पंछी ,रंगमहल, मदमस्त,तलाश,चार दोस्त,विद्यापति एवं प्यार जैसी फिल्मों में संगीत दिया  मधु श्राबोनी, जय बाबा बैद्यनाथ, माँ, चलाचल, पंचतपा, सुभो बिभा, माणिक कंचन कन्या, पन्ना, एवं पाथेय होलो देखा जैसी बंगाली फिल्मों में संगीत दिया उनकेे पास कई संगीत एल्बम थे, विशेष रूप से  सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा  संगीतकार के रूप में।

1947 में, वह आर्केस्ट्रा निदेशक के रूप में एचएमवी में शामिल हो गए और आर.के. बैनर और नौशाद के लिए काम किया।  वी बलसारा ऐसे संगीत निर्देशकों में से एक थे, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत की, लेकिन संगीत निर्देशक के रूप में लंबे समय तक टिक नहीं पाए।  लेकिन उन्होंने अपने करियर का ट्रैक बदल दिया और अपने जीवन के बाकी दिनों में एक प्रसिद्ध वादक, ऑर्केस्ट्रा कंडक्टर, एक संगीत शिक्षक और गैर-फिल्मी गीतों और कुछ बंगाली फिल्मों के संगीत निर्देशक बन गए।

एक प्रतिष्ठित संगीतकार होने के नाते, वह बॉम्बे सिने म्यूज़िशियंस एसोसिएशन और बॉम्बे सिने म्यूज़िक डायरेक्टर्स एसोसिएशन के संस्थापक सचिव बने।

संगीत में डूबे बलसारा ने अपने अंतिम दिनों में एकाकी जीवन व्यतीत किया।  उन्हें अपने अधिकांश प्रियजनों के अंतिम संस्कार में शामिल होने का दुर्भाग्य झेलना पड़ा, जिनमें उनकी पत्नी और दो बेटे भी शामिल थे

वी बलसारा का 24 मार्च, 2005 को निधन हो गया कई दिग्गजों के अनुसार उनके संगीत भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक खजाना साबित होंगे

मंगलवार, 20 जून 2023

अमरीश पुरी

Amrish Puri
अमरीश पुरी
*🎂जन्म की तारीख और समय: 22 जून 1932, नवांशहर*
*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 12 जनवरी 2005, Hinduja Hospital OPD Building, मुम्बई*
बच्चे: नम्रता पुरी, राजीव पुरी
पत्नी: उर्मिला दिवेकर (विवा. 1957–2005)
भाई: मदन पुरी, चमन पुरी, हरीश सिंह पुरी, चंद्रकांता मेहरा
अमरीश पुरी (जन्म:२२ जून १९३२ -मृत्यु:१२ जनवरी २००५) चरित्र अभिनेता मदन पुरी के छोटे भाई अमरीश पुरी हिन्दी फिल्मों की दुनिया का एक प्रमुख स्तंभ रहे हैं। अभिनेता के रूप निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फ़िल्मों से अपनी पहचान बनाने वाले श्री पुरी ने बाद में खलनायक के रूप में काफी प्रसिद्धी पायी। उन्होंने १९८४ में बनी स्टीवेन स्पीलबर्ग की फ़िल्म "इंडियाना जोन्स एंड द टेम्पल ऑफ़ डूम" (अंग्रेज़ी- Indiana Jones and the Temple of Doom) में मोलाराम की भूमिका निभाई जो काफ़ी चर्चित रही। इस भूमिका का ऐसा असर हुआ कि उन्होंने हमेशा अपना सिर मुँडा कर रहने का फ़ैसला किया। इस कारण खलनायक की भूमिका भी उन्हें काफ़ी मिली। व्यवसायिक फिल्मों में प्रमुखता से काम करने के बावज़ूद समांतर या अलग हट कर बनने वाली फ़िल्मों के प्रति उनका प्रेम बना रहा और वे इस तरह की फ़िल्मों से भी जुड़े रहे। फिर आया खलनायक की भूमिकाओं से हटकर चरित्र अभिनेता की भूमिकाओं वाले अमरीश पुरी का दौर। और इस दौर में भी उन्होंने अपनी अभिनय कला का जादू कम नहीं होने दिया फ़िल्म मिस्टर इंडिया के एक संवाद "मोगैम्बो खुश हुआ" किसी व्यक्ति का खलनायक वाला रूप सामने लाता है तो फ़िल्म DDLJ का संवाद "जा सिमरन जा - जी ले अपनी ज़िन्दगी" व्यक्ति का वह रूप सामने लाता है जो खलनायक के परिवर्तित हृदय का द्योतक है। इस तरह हम पाते हैं कि अमरीश पुरी भारतीय जनमानस के दोनों पक्षों को व्यक्त करते समय याद किये जाते हैं ।
माता-पिता: एस० निहाल सिंह पुरी, वेद कौर
पढ़ाई● अमरीश पुरी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पजाब से की। उसके बाद वह शिमला चले गए। शिमला के बी एम कॉलेज(B.M. College) से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत में वह रंगमंच से जुड़े और बाद में फिल्मों का रुख किया। उन्हें रंगमंच से उनको बहुत लगाव था। एक समय ऐसा था जब अटल बिहारी वाजपेयी और स्व. इंदिरा गांधी जैसी हस्तियां उनके नाटकों को देखा करती थीं। पद्म विभूषण रंगकर्मी अब्राहम अल्काजी से 1961 में हुई ऐतिहासिक मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और वे बाद में भारतीय रंगमंच के प्रख्यात कलाकार बन गए।

●करियर● अमरीश पुरी ने 1960 के दशक में रंगमंच की दुनिया से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। उन्होंने सत्यदेव दुबे और गिरीश कर्नाड के लिखे नाटकों में प्रस्तुतियां दीं। रंगमंच पर बेहतर प्रस्तुति के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरस्कार दिया गया, जो उनके अभिनय कॅरियर का पहला बड़ा पुरस्कार था।

अमरीश पुरी के फ़िल्मी करियर शुरुआत साल 1971 की ‘प्रेम पुजारी’ से हुई। पुरी को हिंदी सिनेमा में स्थापित होने में थोड़ा वक्त जरूर लगा, लेकिन फिर कामयाबी उनके कदम चूमती गयी। 1980 के दशक में उन्होंने बतौर खलनायक कई बड़ी फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी। 1987 में शेखर कपूर की फिल्म ‘मिस्टर इंडिया में मोगैंबो की भूमिका के जरिए वे सभी के जेहन में छा गए। 1990 के दशक में उन्होंने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ‘घायल’ और ‘विरासत’ में अपनी सकारात्मक भूमिका के जरिए सभी का दिल जीता।

अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड़, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उन्होंने अपने पूरे कॅरियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में 'निशांत', 'गांधी', 'कुली', 'नगीना', 'राम लखन', 'त्रिदेव', 'फूल और कांटे', 'विश्वात्मा', 'दामिनी', 'करण अर्जुन', 'कोयला' आदि शामिल हैं। दर्शक उनकी खलनायक वाली भूमिकाओं को देखने के लिए बेहद उत्‍साहित होते थे।

उनके जीवन की अंतिम फिल्‍म 'किसना' थी जो उनके निधन के बाद वर्ष 2005 में रिलीज़ हुई। उन्‍होंने कई विदेशी फिल्‍मों में भी काम किया। उन्‍होंने इंटरनेशनल फिल्‍म 'गांधी' में 'खान' की भूमिका निभाई था जिसके लिए उनकी खूब तारीफ हुई थी। अमरीश पुरी का 12 जनवरी 2005 को 72 वर्ष के उम्र में ब्रेन ट्यूमर की वजह से उनका निधन हो गया। उनके अचानक हुए इस निधन से बॉलवुड जगत के साथ-साथ पूरा देश शोक में डूब गया था। आज अमरीश पुरी इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें आज भी फिल्मों के माध्यम से हमारे दिल में बसी हैं।

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