08फरवरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
08फरवरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

जयदीप अहलावत (हरयाणवी)

#08feb 
जयदीप अहलावत (हरियानवी)

🎂जन्म 08 फरवरी 1980

गाँव खरकड़ा रोहतक,हरियाणा भारत
पेशा
अभिनेता

 एक भारतीय फिल्म अभिनेता हैं।
वह अक्षय कुमार द्वारा निर्मित बॉलीवुड फिल्म खट्टा मीठा में दिखाई दिए; हालाँकि, उन्हें अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ वासेपुर (2012) में शाहिद खान की भूमिका और फिल्म कमांडो में एके 74 के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है।
उनका जन्म रोहतक, हरियाणा के गाँव खरकड़ा के एक जाट परिवार में हुआ और उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में अपनी स्नातक की शिक्षा भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान से 2008 में पूर्ण की।

करियर

जयदीप अहलावत ने अपने स्नातक के बाद अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने प्रथम अभिनय प्रियदर्शन की फ़िल्म खट्टा मिट्ठा (2010) में खलनायक के रूप में किया। उसी वर्ष वो अजय देवगन के साथ फ़िल्म आक्रोश में नजर आये। उसके बाद उन्होंने कई बड़े बैनर की फ़िल्में भी की जैसे अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ़ वासेपुर (2012) और कमल हासन की विश्वरूपम (2012)

📽️
2008 नरमीन
2010 आक्रोश
2010 खट्टा मीठा
2011 चिट्टगोंग
2011 रॉकस्टार
2012 गैंग्स ऑफ़ वासेपुर

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

जगजीत सिंह

#10oct
#08feb 

जगजीत सिंह

🎂08 फ़रवरी 1941, श्रीगंगानगर
 ⚰️: 10 अक्तूबर 2011, Lilavati Hospital And Research Centre, मुम्बई

पत्नी: चित्रा सिंह (विवा. 1969–2011)
बच्चे: विवेक सिंह
माता-पिता: बच्चन कौर, अमर सिंह
भाई: इंदरजीत कौर, करतार सिंह, जसवंत सिंह
जगजीत सिंह का नाम बेहद लोकप्रिय ग़ज़ल गायकों में शुमार हैं। उनका संगीत अंत्यंत मधुर है और उनकी आवाज़ संगीत के साथ खूबसूरती से घुल-मिल जाती है। 

जगजीत जी का जन्म 08 फरवरी1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे। जगजीत जी का परिवार मूलतः पंजाब (भारत) के रोपड़ ज़िले के दल्ला गांव का रहने वाला है। मां बच्चन कौर पंजाब के ही समरल्ला के उट्टालन गांव की रहने वाली थीं। जगजीत का बचपन का नाम जीत था। करोड़ों सुनने वालों के चलते सिंह साहब कुछ ही दशकों में जग को जीतने वाले जगजीत बन गए। शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद में पढ़ने के लिए जालंधर आ गए। डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया।

बहुतों की तरह जगजीत जी का पहला प्यार भी परवान नहीं चढ़ सका। अपने उन दिनों की याद करते हुए वे कहते हैं, ”एक लड़की को चाहा था। जालंधर में पढ़ाई के दौरान साइकिल पर ही आना-जाना होता था। लड़की के घर के सामने साइकिल की चैन टूटने या हवा निकालने का बहाना कर बैठ जाते और उसे देखा करते थे। बाद मे यही सिलसिला बाइक के साथ जारी रहा। पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं थी। कुछ क्लास मे तो दो-दो साल गुज़ारे.” जालंधर में ही डीएवी कॉलेज के दिनों गर्ल्स कॉलेज के आसपास बहुत भटकते थे। एक बार अपनी चचेरी बहन की शादी में जमी महिला मंडली की बैठक में जाकर गीत गाने लगे थे। पूछे जाने पर कहते हैं कि सिंगर नहीं होते तो धोबी होते। पिता के इजाज़त के बग़ैर फ़िल्में देखना और टाकीज में गेट कीपर को घूंस देकर हॉल में घुसना आदत थी।
बचपन में अपने पिता से संगीत विरासत में मिली। गंगानगर में ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत में उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफ़ेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह जी को काफ़ी उत्साहित किया। उनके ही कहने पर वे 1965 में मुंबई आ गए। यहां से उनके संघर्ष का दौर शुरू हुआ। वे पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे।  1967में जगजीत जी की मुलाक़ात चित्रा जी से हुई। दो साल बाद दोनों 1969 में परिणय सूत्र में बंध गए।
जगजीत सिंह फ़िल्मी दुनिया में पार्श्वगायन का सपना लेकर आए थे। तब पेट पालने के लिए कॉलेज और ऊंचे लोगों की पार्टियों में अपनी पेशकश दिया करते थे। उन दिनों तलत महमूद, मोहम्मद रफ़ी साहब जैसों के गीत लोगों की पसंद हुआ करते थे। रफ़ी-किशोर-मन्नाडे जैसे महारथियों के दौर में पार्श्व गायन का मौक़ा मिलना बहुत दूर था। जगजीत जी याद करते हैं, ”संघर्ष के दिनों में कॉलेज के लड़कों को ख़ुश करने के लिए मुझे तरह-तरह के गाने गाने पड़ते थे क्योंकि शास्त्रीय गानों पर लड़के हूट कर देते थे।” तब की मशहूर म्यूज़िक कंपनी एच एम वी (हिज़ मास्टर्स वॉयस) को लाइट क्लासिकल ट्रेंड पर टिके संगीत की दरकार थी। जगजीत जी ने वही किया और पहला एलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स (1976)’ हिट रहा। जगजीत जी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ”उन दिनों किसी सिंगर को एल पी (लॉग प्ले डिस्क) मिलना बहुत फ़ख्र की बात हुआ करती थी।” बहुत कम लोग जानते हैं कि सरदार जगजीत सिंह धीमान इसी एलबम के रिलीज़ के पहले जगजीत सिंह बन चुके थे। बाल कटाकर असरदार जगजीत सिंह बनने की राह पकड़ चुके थे। जगजीत ने इस एलबम की कामयाबी के बाद मुंबई में पहला फ़्लैट ख़रीदा था।
जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब फ़िल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने ग़ज़ल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की लेकिन ग़ज़ल के जानकारों की भौहें टेढ़ी हो गई। ख़ासकर ग़ज़ल की दुनिया में जो मयार बेग़म अख़्तर, कुन्दनलाल सहगल, तलत महमूद, मेहदी हसन जैसों का था।। उससे हटकर जगजीत सिंह की शैली शुद्धतावादियों को रास नहीं आई। दरअसल यह वह दौर था जब आम आदमी ने जगजीत सिंह, पंकज उधास सरीखे गायकों को सुनकर ही ग़ज़ल में दिल लगाना शुरू किया था। दूसरी तरफ़ परंपरागत गायकी के शौकीनों को शास्त्रीयता से हटकर नए गायकों के ये प्रयोग चुभ रहे थे। आरोप लगाया गया कि जगजीत सिंह ने ग़ज़ल की प्योरटी और मूड के साथ छेड़खानी की। लेकिन जगजीत सिंह अपनी सफ़ाई में हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने प्रस्तुति में थोड़े बदलाव ज़रूर किए हैं लेकिन लफ़्ज़ों से छेड़छाड़ बहुत कम किया है। बेशतर मौक़ों पर ग़ज़ल के कुछ भारी-भरकम शेरों को हटाकर इसे छह से सात मिनट तक समेट लिया और संगीत में डबल बास, गिटार, पिआनो का चलन शुरू किया।.यह भी ध्यान देना चाहिए कि आधुनिक और पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में सारंगी, तबला जैसे परंपरागत साज पीछे नहीं छूटे।

प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका बल्कि तबले के साथ ऑक्टोपेड, सारंगी की जगह वायलिन और हारमोनियम की जगह कीबोर्ड ने भी ली। कहकशां और फ़ेस टू फ़ेस संग्रहों में जगजीत जी ने अनोखा प्रयोग किया। दोनों एलबम की कुछ ग़ज़लों में कोरस का इस्तेमाल हुआ। विनोद खन्ना, डिंपल कपाड़िया अभिनीत फिल्म 'लीला' के गीत 'जाग के काटी सारी रैना' में गिटार का अद्भुत प्रयोग किया। जलाल आग़ा निर्देशित टीवी सीरियल कहकशां के इस एलबम में मजाज़ लखनवी की ‘आवारा’ नज़्म ‘ऐ ग़मे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं’ और फ़ेस टू फ़ेस में ‘दैरो-हरम में रहने वालों मयख़ारों में फूट न डालो’ बेहतरीन प्रस्तुति थीं। जगजीत ही पहले ग़ज़ल गुलुकार थे जिन्होंने चित्रा जी के साथ लंदन में पहली बार डिजीटल रिकॉर्डिंग करते हुए ‘बियॉन्ड टाइम' अलबम जारी किया।

इतना ही नहीं, जगजीत जी ने क्लासिकी शायरी के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम-आदमी की जिंदगी को भी सुर दिए। "अब मैं राशन के कतारों में नज़र आता हूँ , अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ’", "मैं रोया परदेस में", ‘मां सुनाओ मुझे वो कहानी’ जैसी रचनाओं ने ग़ज़ल न सुनने वालों को भी अपनी ओर खींचा।

शायर निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र, गुलज़ार, जावेद अख़्तर जगजीत सिंह जी के पसंदीदा शायरों में हैं। निदा फ़ाज़ली के दोहों का एलबम ‘इनसाइट’ कर चुके हैं। जावेद अख़्तर के साथ ‘सिलसिले’ ज़बर्दस्त कामयाब रहा। लता मंगेशकर जी के साथ ‘सजदा’, गुलज़ार के साथ ‘मरासिम’ और ‘कोई बात चले’, कहकशां, साउंड अफ़ेयर, डिफ़रेंट स्ट्रोक्स और मिर्ज़ा ग़ालिब अहम हैं। करोड़ों लोगों को दीवाना बनाने वाले जगजीत सिंह ने मीरो-ग़ालिब से लेकर फ़ैज-फ़िराक़ तक और गुलज़ार-निदा फ़ाजली से लेकर राजेश रेड्डी और आलोक श्रीवास्तव तक हर दौर के शायर की ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी।

गजल के बादशाह कहे जानेवाले जगजीत सिंह का 10 अक्टूबर 2011की सुबह 8 बजे मुंबई में देहांत हो गया।उन्हें ब्रेन हैमरेज होने के कारण 23 सितम्बर को मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। ब्रेन हैमरेज होने के बाद जगजीत सिंह की सर्जरी की गई, जिसके बाद से ही उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। वे तबसे आईसीयू वॉर्ड में ही भर्ती थे। जिस दिन उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ, उस दिन वे सुप्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली के साथ एक शो की तैयारी कर रहे थे।

सम्मान और पुरस्कार

जगजीत सिंह को सन2003 में भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

शोभा गुर्टू

#08feb 
#27sep 
शोभा गुर्टू
प्रसिद्ध नाम शोभा गुर्टू
अन्य नाम भानुमति शिरोडकर

🎂जन्म- 08 फ़रवरी, 1925, कर्नाटक; मृत्यु-
⚰️ 27 सितम्बर, 2004, मुंबई 

अभिभावक मेनेकाबाई शिरोडकर
पति/पत्नी विश्वनाथ गुर्टू
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र शास्त्रीय गायन
मुख्य फ़िल्में 'पाक़ीज़ा', 'फागुन', 'मैं तुलसी तेरे आँगन की'
पुरस्कार-उपाधि 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' (1978), 'पद्मभूषण' (2002), 'महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार', 'लता मंगेशकर पुरस्कार', 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार'
प्रसिद्धि ठुमरी गायिका
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी 1978 में फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' में शोभा जी ने एक ठुमरी 'सैय्याँ रूठ गए मैं मनाऊँ कैसे' गायी, जो कि बहुत प्रसिद्ध हुई।
भारतीय शास्त्रीय शैली की एक प्रसिद्ध गायिका थीं। उनका मूल नाम 'भानुमति शिरोडकर' था। वे एक ऐसी शास्त्रीय शिल्पी थीं, जिन्होंने गायन की ठुमरी शैली को विश्व भर में ख्याति दिलाई। शोभा गुर्टू को 'ठुमरियों की रानी' कहा जाता है। उन्होंने ठुमरी के अतिरिक्त कजरी, होरी और दादरा आदि उप-शास्त्रीय शैलियों के अस्तित्व को भी बचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

उनकी माताजी मेनेकाबाई शिरोडकर स्वयं भी एक नृत्यांगना थीं तथा जयपुर-अतरौली घराने के उस्ताद अल्लादिया ख़ाँ से गायकी सीखती थीं। शोभा गुर्टू को शास्त्रीय संगीत सीखने की प्रेरणा अपनी माँ से ही मिली थी। उन्होंने संगीत की प्राथमिक शिक्षा उस्ताद अल्लादिया ख़ाँ के सुपुत्र उस्ताद भुर्जी ख़ाँ साहब से प्राप्त की। इसके बाद उस्ताद अल्लादिया ख़ाँ के भतीजे उस्ताद नत्थन ख़ाँ से मिली तालीम ने उनके सुरों में जयपुर-अतरौली घराने की नींव को सुदृढ़ किया। किंतु उनकी गायकी को एक नयी दिशा और पहचान मिली उस्ताद घाममन ख़ाँ की छत्रछाया में, जो उनकी माँ को ठुमरी और दादरा व अन्य शास्त्रीय शैलियाँ सिखाने मुंबई में उनके परिवार के साथ रहने आये थे।

विवाह
शोभा जी का विवाह बेलगाँव के विश्वनाथ गुर्टू से हुआ था, जिनके पिता पंडित नारायणनाथ गुर्टू बेलगाँव पुलीस के एक वरिष्ठ अधिकारी थे। इसके साथ ही वह स्‍वयं भी एक संगीत विद्वान तथा सितार वादक थे। गुर्टू दंपत्ति के तीन सुपुत्रों में सबसे छोटे त्रिलोक गुर्टू एक प्रसिद्ध तालवाद्य शिल्पी हैं।

प्रसिद्धि
शुद्ध शास्त्रीय संगीत में शोभा जी की अच्छी पकड़ तो थी ही, किन्तु उन्हें देश-विदेश में ख्याति प्राप्त हुई ठुमरी, कजरी, होरी, दादरा आदि उप-शास्त्रीय शैलियों से, जिनके अस्तित्व को बचाने में उन्होंने विशेष भूमिका निभाई थी। आगे चलकर अपने मनमोहक ठुमरी गायन के लिए वे 'ठुमरी क्वीन' कहलाईं। वे न केवल अपने गले की आवाज़ से बल्कि अपनी आँखों से भी गाती थीं। एक गीत से दूसरे में जैसे किसी कविता के चरित्रों की भांति वे भाव बदलती थीं, चाहे वह रयात्मक हो या प्रेमी द्वारा ठुकराया हुआ हो अथवा नख़रेबाज़ या इश्कज़ हो। उनकी गायकी बेगम अख़्तर तथा उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब से ख़ासा प्रभावित थी। उन्होंने अपने कई कार्यक्रम कथक नृत्याचार्य पंडित बिरजू महाराज के साथ प्रस्तुत किए थे, जिनमें विशेष रूप से उनके गायन के 'अभिनय' अंग का प्रयोग किया जाता था।

फ़िल्मों में योगदान

शोभा गुर्टू ने कई हिन्दी और मराठी फ़िल्मों में भी गीत गाए। सन 1972 में आई कमल अमरोही की फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' में उन्हें पहली बार पार्श्वगायन का मौका मिला था। इसमें उन्होंने एक भोपाली 'बंधन बांधो' गाया था। इसके बाद 1973 में फ़िल्म 'फागुन' में 'मोरे सैय्याँ बेदर्दी बन गए कोई जाओ मनाओ' गाया। फिर सन 1978 में असित सेन द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' में शोभा जी ने एक ठुमरी 'सैय्याँ रूठ गए मैं मनाऊँ कैसे' गाया, जो कि बहुत प्रसिद्ध हुई।

पुरस्कार व सम्मान
अपनी विशिष्ट गायिका के लिए शोभा गुर्टू को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आँगन की' की ठुमरी के लिए उन्हें "फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार" के लिए नामांकित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें निम्न पुरस्कार भी प्राप्त हुए-

'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' - (1978)
'पद्मभूषण' - (2002)
महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार
लता मंगेशकर पुरस्कार

निधन

लगभग पाँच दशकों तक 'ठुमरियों की रानी' के रूप में शोभा जी प्रसिद्ध रहीं। 27 सितम्बर, 2004 को शोभा गुर्टू नामक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का यह नक्षत्र अस्त हो गया।

बुधवार, 20 दिसंबर 2023

सवर्ण लता

#20dic
#08feb 
स्वर्ण लता 
🎂जन्म की तारीख और समय: 20 दिसंबर 1924, रावलपिंडी, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 08 फ़रवरी 2008, लाहौर, पाकिस्तान
पति: नज़ीर एहमद खान (विवा. 1945–1983)

एक पाकिस्तानी अभिनेत्री थीं। इन्होंने अपनी फिल्मी यात्रा ब्रिटिश भारत से आरंभ की बाद में पाकिस्तान चली गयीं। स्वर्ण लता ने अपने भावुक, दुःखात्मक भूमिकाओं एवं प्रवाहपूर्ण संवाद अदायगी के माध्यम से अपने अभिनय कौशल को साबित किया। इन्होंने बॉलीवुड और पाकिस्तानी सिनेमा में काम किया।
🌹स्वर्ण लता का जन्म सियाल खत्री सिख के परिवार में रावलपिंडी, ब्रिटिश भारत, अब पाकिस्तान में 20 दिसंबर 1924  को हुआ। उन्होंने दिल्ली से डिप्लोमा सीनियर कैंब्रिज किया और फिर संगीत और कला अकादमी में शामिल हो गई। लखनऊ। 1940ई के दशक की शुरुआत में, उनका परिवार बॉम्बे चला गया। उन्होंने 1942 से 1948 तक ब्रिटिश भारत में कुल 22 फिल्मों में अभिनय किया।

निजी जीवन

स्वर्ण लता ने उस समय के प्रसिद्ध अभिनेता, निर्देशक और निर्माता नजीर अहमद से शादी करने के बाद बाद में इस्लाम धर्म अपना लिया। उसने अपना नाम बदलकर सईदा बानो रख लिया। स्वर्ण-नज़ीर की जोड़ी एक बहुत ही रचनात्मक जोड़ी थी, जिसने 1947 में भारत के विभाजन से पहले और बाद में एक साथ कई फिल्में बनाईं।
📽️
स्वर्ण लता फिल्म्स
आवाज़
तस्वर
प्रतिज्ञा
इशारा
हमें पार
रोनक
रतन
घर के शोभा
प्रीत
लैला मजनू
प्रतिमा
चाँद तारा
वमक अज़रा
शाम सवेरा
आबिदा
घरबार
सच्चा
फेरे
अनोखी दास्तान
लारे
भीगी पलकें
शहरी बाबू
खातून
नोकार
हीर
साबिरा
सोतेली माँ
नूर ई इस्लाम
शम्मा
बिल्लो जी
अज़मत-ए-इस्लाम
सवाल
दुनिया ना माने

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...